003. अम्बे जी की आरती
जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥
मांग सिंदूर विराजत टीको मृगमद को ।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥
जय..
कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥
जय…
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुःखहारी ॥
जय…
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत समज्योति ॥
जय…
शुम्भ-निशुम्भ बिडारे, महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना निशदिन मदमाती ॥
जय…
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
जय…
ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥
जय…
चौंसठ योगिनि गावत, नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥
जय..
तुम हो जग की माता, तुम ही हो भर्ता।
भक्तन की दुखहर्ता, सुख सम्पति कर्ता ॥
जय…
भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥
जय…
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।
श्री मालकेतु में राजत कोटि रतन ज्योति ॥
जय…
श्री अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै ।
कहत शिवानंद स्वामी सुख-सम्पत्ति पावै ॥
जय…
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