ब्रजभूमि का महत्व
वर्तमान ब्रज का नाम ही प्राचीन काल में व्रज था। ‘व्रज’ का अर्थ है ‘व्याप्त’ अर्थात व्यापक होने के कारण इस क्षेत्र को व्रज कहा गया। कहते हैं कि सत्व, रज व तम से परे जो पारब्रह्म है वही व्यापक है। वही सदानन्द स्वरूप परम ज्योर्तिमय, अविनाशी तथा जीवन मुक्त पुरूष रूप में स्थित रहता है। वे ही इस व्रज के कण कण में व्याप्त हैं। इसलिए भी इसे व्रज कहा जाता है। इसी व्रजधाम में नन्दनंदन भगवान श्रीकृष्ण का निवास स्थान है।
ब्रजभूमि विष्णु भगवान के अवतार भगवान श्री कृष्ण एवं उनकी शक्ति श्री राधारानी की लीला स्थली थी, है और रहेगी। ब्रज भूमि 84 कोस के लगभग वृताकार भाग में फैली हुई है। द्वापर युग में यह संपूर्ण ब्रज भूमि राधा-कृष्ण व उनकी लीलाओं की साक्षी रही थी।
भगवान श्रीकृश्ण की आत्मा राधिका के उसमें रमण करने के कारण ज्ञानी पुरूष उन्हे ‘आत्माराम’ कहते हैं। व्रज में श्रीकृष्ण के वांछित पदार्थ गौएँ, ग्वालबाल, गोपियाँ तथा उनके लीला विहार आदि हैं। ये पदार्थ सब के सब नित्य प्राप्त होते हैं। इसी लिए श्रीकृष्ण को ‘आत्मकाम’ भी कहा जाता है।
ब्रज के महल स्थलों की खोज के लिए महर्षि शाण्डिल्य जी ने वज्रनाभ जी से कहा कि तुम मेरी आज्ञा से व्रज भूमि का भली भाँति से सेवन (भ्रमण) करो और अनेक गाँव बसाओ और गोवर्धन, दीर्धपुर (डींग), मथुरा, महावन (गोकुल), नन्दिग्राम (नन्दग्राम) और वहत्सानु (बरसाना) में अपनी छावनी बसाओ।
यह भूमि सचिदानन्दमयी है अतः इसका प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिए। इस प्रकार श्री भगवान की कृपा से वज्रनाभ ने उन सभी स्थानों को खोजा जहाँ भगवान श्रीकृष्ण लीलाएँ किया करते थे। उन्होने भगवान के लीला विगहों की स्थापना की तथा भगवान से जुडे उन-उन स्थान पर गाँव, कुण्ड़, कुएँ, कुंज व बगीचे आदि स्थापित किए तथा शिवादि की स्थापना की। ऐसा कहा जाता है कि इन्होने ही गोविन्ददेव, हरिदेवादि नामों के विग्रहों को स्थापित किया था।
ऐसा विश्वास किया जाता है कि यह संपूर्ण ब्रज भूमि आज भी राधा और कृष्ण की नित्य व चमत्कारिक लीलाओं का केन्द्र बना हुआ है। माना जाता है कि यहाँ समस्त तीर्थ विद्यमान है और तीर्थराज प्रयाग ने भी इन गोवर्धन महाराज की पूजा की थी। इस प्रकार कहा जाता है कि ब्रज के दर्शन मात्र से कोटि-कोटि तीर्थो का फल प्राप्त हो जाता है। ब्रज में भागवत लीलाओं के दर्शन मात्र से असम सुख व आनन्द की प्राप्ति होती है। ब्रज रज में आराधना करने पर वृषभानुजा श्री राधा जी तथा नन्दलाल श्री कृश्ण जी के श्री चरणों में अनुराग व प्रेम की वृद्धि होती है।
इसी ब्रज भूमि पर प्रेम, सौहार्द, श्रद्धा, विश्वास, भक्ति तथा भावनात्मक एकता के प्रतीक श्री गोवर्धन अर्थात गिरिराज जी विराजमान हैं। इनकी परिक्रमा करने के लिए तीर्थ यात्री जाति, भाषा व प्रांत की सीमाओं को लाँघकर उपस्थित होते हैं। अतः यहाँ केवल ये भगवान के भक्त हैं।
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| लेखक ॐ जितेंद्रर सिंह तोमर |


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