1.1 स्वरविज्ञान और स्वर-शास्त्र
स्वरोदय विज्ञान एक अत्यंत प्राचीन ग्रंथ है जिसमें कुल 395 श्लोक हैं। यह ग्रंथ शिव और पार्वती जी के संवाद के रूप में लिखा गया है। इस ग्रंथ के रचयिता साक्षात भगवान शिव को माना जाता है। प्राचीन काल में इस विद्या के फल और साधना की सरलता को देखते हुए। यह जन जन का प्रसिद्ध रहस्य था, परंतु समय के प्रभाव से इसके बहुत से हिस्से लुप्त हो गए। जो भी हिस्से जहां कहीं से भी मिले हैं। उन्हें आपके सामने रखने का प्रयास किया है।
इस विद्या के अनुसार ज्योतिष से फलित शास्त्र और भविष्य कथन को बहुत अधिक सटीक माना जाता था । लेकिन वर्तमान में पूर्ण ज्ञान न होने के कारण कुछ-कुछ प्रयोग ज्योतिषियों को को करते हुए देख सकते हैं। भगवान शिव कहते हैं कि हे देवी 'स्वर विज्ञान से बड़ा कोई भी गुण और गुप्त ज्ञान नहीं है , क्योंकि स्वर विज्ञान के अनुसार कार्य करने वाले व्यक्ति को सभी वांछित फल अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। इस विद्या को हमने एक शोध के रूप में ग्रहण किया है। और इस शोध को आपके सामने रखने का प्रयास भी कर रहे हैं। ताकि आप भी इसका लाभ प्राप्त कर सकें। यह लेख एक प्रमुख शोध ग्रंथ के रूप में आपके सामने आ रहा है।
स्वर योग शरीर शास्त्र श्वांस संचालन से संबंध रखता है और श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष संबंध उदर अर्थात पीठ से है। इसलिए प्राणायाम द्वारा उदर संस्थान तक प्राणवायु को ले जाकर नाभि केंद्र में इस प्रकार घर्षण किया जाता है कि वहां की सुप्त शक्तियों का जागरण हो सके। इस वायु तत्व पर यदि अधिकार प्राप्त कर लिया जाए तो साधक अनेक प्रकार से अपना हित संपादित या साधित किया जा सकता है। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर का विज्ञानमय कोश मुख्यत: वायु प्रधान कोश है।
सुर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है । यह शिव स्वरूप है । यह शरीर में दाहिनी तरफ स्थित है। यह पिंगला नाड़ी में वास करता है।
इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है। इसका रंग गोरा है। यह शक्ति अर्थात पार्वती का स्वरूप है। यह शरीर में बांयी तरफ स्थित है। यह इड़ा नाड़ी में वास करता है।
जब स्वास दोनों ओर से चलते हैं अर्थात दोनों नासिकाओं या स्वरों से चलते हैं। उसी सुषुम्ना कहते हैं यह दोनों के मध्य में स्थित रहता है। यह नपुंसक है।
सुर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है । यह शिव स्वरूप है । यह शरीर में दाहिनी तरफ स्थित है। यह पिंगला नाड़ी में वास करता है।
इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है। इसका रंग गोरा है। यह शक्ति अर्थात पार्वती का स्वरूप है। यह शरीर में बांयी तरफ स्थित है। यह इड़ा नाड़ी में वास करता है।
जब स्वास दोनों ओर से चलते हैं अर्थात दोनों नासिकाओं या स्वरों से चलते हैं। उसी सुषुम्ना कहते हैं यह दोनों के मध्य में स्थित रहता है। यह नपुंसक है।
1000 ईसवी के आसपास जब सोमनाथ पर आक्रमण हुआ तो उस समय इस ज्ञान का लॉक हो चुका था और जो किसी का बहुत उदय हो चुका था जिसमें मुहूर्त प्रकरण प्रमुख था उसमें जो वहां के वर्तमान राजा थे उन्होंने आता तारों के सोमनाथ लूट को रोकने का प्रयास किया लेकिन ज्योतिष आचार्यों के अनुसार शुभ मुहूर्त में होने के कारण विमान महसूस कर रह गए और आदत ही सोमनाथ मंदिर को लूट कर ले गए ऐसे अनेक प्रकरण हमें मिल जाएंगे परंतु हम यहां पर केवल स्वर्ग विज्ञान पर ही विशेष ध्यान दे रहे हैं इसलिए हम इसके पहले भाग को यहीं विराम देते हैं।
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