चन्द्रग्रहण अर्थात चन्द्रोपराग
चन्द्रग्रहण : - जब पृथ्वी का छाया चन्द्र मंडल पर पडती है। तो उसकी चमक
धुंधली हो जाती है। इसे ही चन्द्रग्रहण कहते हैं। ध्यान रहे कि सूर्य व चन्द्रमा
के बीच से गुजरने वाली पृथ्वी के बाई ओर के आधे भाग पर रहने वालां की ही
चन्द्रग्रहण दिखाई देता है।
सूर्य बहुत बड़ा है तथा पृथ्वी
उससे बहुत छोटी व गालाकार है। इसलिए उसकी छाया शंक्वाकार होकर चन्द्रमा के बहुत
बडे़ क्षेत्र को देखते हुए बहुत दूर तक निकल जाती है। पृथ्वी की छाया लगभग 8,57,000
मील (13,71,200 किलोमीटर) तक लम्बी होती है। जो पृथ्वी व सूर्य के बीच की दूरी पर
निर्भर करती हैं। यह 8,71,000 से 8,43,000 मील तक लम्बी हो सकती है। उपछाया में
चन्द्रमा पर कोई विशेष परिवर्तन दिखाई नहीं देता। प्रच्छाया के पास आने पर ही
ग्रहण दिखाई देना शुरू होता है अर्थात चन्द्रग्रहण लगता है।
चन्द्रग्रहण दो प्रकार के
अ) सर्वग्रास चन्द्रग्रहण तथा
आ) खण्ड़ग्रास चन्द्रग्रहण के नाम से जानते हैं।
सर्वग्रास चन्द्रग्रहण को पूर्ण चन्द्रग्रहण भी कहते हैं। इसमें पूरा
चन्द्रमा ढ़क जाता है। यह लगभग चार घंटे रहता है। इसमें दो घंटे यह गहरा काला दिखाई
देता है। जबकि खण्ड़ग्रास में इसका कुछ ही भाग ढ़कता है। कुछ ही खण्ड़ या भाग के
ग्रसित होने के कारण ही इसे खण्ड़ग्रास नाम दिया गया है।
हर
पूर्णिमा को ग्रहण क्यों नहीं लगता इसका एक कारण है। इसका कारण पृथ्वी व चन्द्रमा
के बीच का झुकाव 5° है। चन्द्रग्रहण के बारे में एक बात
जाननी जरूरी है। वह है पात रेखा। चन्द्रमा की पात रेखा चल है जिसका परिक्रमण काल
18 वर्ष 11 दिन है। यह अवधि वह है जिसके बाद ग्रहणों की पुनावृत्ति होती है। इस
समय को चन्द्रकक्ष भी कहते हैं।
इसी आधार पर खगोलशास्त्रियों ने गणितीय गणना से निश्चित किया है कि इस काल
में 41 सूर्य ग्रहण तथा 29 चन्द्रग्रहण होते हैं। सामान्यतः एक वर्ष में 5 सूर्य
तथा 2 चन्द्रग्रहण हो सकते हैं परंतु ऐसा बहुत ही कम होता है। एक वर्ष में चार से
अधिक ग्रहण बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। यदि किसी वर्ष में दो ग्रहण होने हैं
तो वे दोनों ग्रहण सूर्य ग्रहण होंगें चन्द्रग्रहण नहीं। जैसा कि हम जानते हैं कि
ग्रहण पुनरावृत्ति 18 वर्ष 11 दिन बाद होती है। परंतु संपात बिन्दु के चलायमान
होने के कारण पूर्व स्थान पर ही दिखें यह संभव नहीं है। अर्थात स्थान बदल जाता है।
प्राय हमने देखा है कि हमे लगता है कि हम सूर्य ग्रहण की तुलना में
चन्द्रग्रहण अधिक होते हैं। परंतु हम जान जान चुके है कि सूर्य ग्रहण चन्द्रग्रहण
से अधिक होते हैं। यदि हम अनुपात देखें तो पाते हैं कि चार सूर्य ग्रहण पर तीन
चन्द्रग्रहणों का योग बनता है। इस भ्रम का कारण है कि चन्द्रग्रहण आधे से अधिक
पृथ्वी पर तथा बहुत लम्बे समय तक दिखाई देता हैं इसके विपरीत समय्र ग्रहण थोड़े समय
के लिए तथा पृथ्वी के बहुत छोटे भाग में ही दिखाई देता है। आपको बता दें कि सूर्य
ग्रहण 100 मील चौड़े तथा दो से तीन हजार मील लम्बे मार्ग पर ही दिखाई देता है। इसी
मार्ग पर ही हम सूर्य ग्रहण देख पाते हैं अन्य स्थानों पर नहीं।
खग्रास चन्द्रग्रहण लगभग चार घंटे रहता है। इसमें दो घंटे यह गहरा काला
दिखाई देता है। इसके विपरीत खग्रास सूर्य ग्रहण केवल दो घंटे तक रहता है जबकि
पूर्ण सूर्य ग्रहण केवल 8 से 10 मिनट ही रहता है। साधारण ग्रहणों में यह अवस्था
केवल दो से तीन मिनट के बीच ही होती है।
ग्रहण लगने में केतु व सूर्य का योग ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केतु
व सूर्य का योग यदि नियत संख्या में 5 राशि व 16° से लेकर 6 राशि 14° अथवा 11 राशि 16° से लेकर 12 राशि 14° के बीच होता है तभी ग्रहण लगता है। यदि योग इस नियत
संख्या से बाहर है तो ग्रहण नहीं लगेगा।
ग्रहण के समय सूर्य के समान चन्द्रमा पूर्ण रूप से अदृष्य नही होता बल्कि
तांबे की तरह लालिमा युक्त दिखाई देता है। ऐसा होने का कारण है कि सूर्य की लाल
किरणे पृथ्वी के वायु मंडल से गजरने के समय नीलांश शोषित हो जाने के बाद परावर्तित
हो जाता है। इसी कारण हम चन्द्रमा को पूर्ण ग्रहण में भी देख सकते हैं। यदि ऐसा
नहीं होता तो चन्द्रमा भी अदृष्य हो जाता।
सूर्य ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाएं रखें खास ध्यान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब भी ग्रहण लगता है इसका बुरा प्रभाव गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है ऐसे में ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाएं विशेष ध्यान रखना चाहिए।
★ गर्भवती महिलाओं को सूर्य ग्रहण के दौरान भोजन नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि ग्रहण के दुष्प्रभाव से भोजन दूषित हो जाता है, इसलिए पहले से रखे पके हुए भोजन पर तुलसी का पत्ता या गंगाजल डाल दें।
★ गर्भवती महिलाओं को सूर्य ग्रहण के दौरान सूई, चाकू, कैंची जैसी नोकदारी वस्तुओं से दूर रहना चाहिए। कहा जाता है कि इनका उपयोग करने से गर्भ में पल रहे बच्चे पर दुष्प्रभाव हो सकता है।
★ जब सूर्य ग्रहण प्रारंभ हो और ग्रहण के समापन तक गर्भवती महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, क्योंकि इसका नकारात्मक प्रभाव पल रहे बच्चे पर पड़ता है।
★ गर्भवती महिलाओं को सूर्य ग्रहण को भी नहीं देखना चाहिए। इससे उनकी और गर्भ में पल रहे बच्चे की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।
★ सूर्य ग्रहण के समय में गर्भवती महिलाओं को अपने इष्टदेव का स्मरण करना चाहिए।
वहीं इस तरह के संयोग से कुछ राशि के जातकों को विशेष लाभ के मिलने की संकेत हैं। जिनमें मेष, कर्क और वृश्चिक राशि शामिल है।



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