राहु क्या है ?
आइऐं देखें कि राहु क्या है ?
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| राहु |
अमरकोश में राहु को तम कहा गया है। (तमस्तु राहु) जब पूर्व की ओर चलता हुआ
राहु पृथ्वी की छाया में प्रतिश्ठित हो जाता है। पृथ्वी की छाया का अधिश्ठाता यह
राहु चंद्रमा को ढक लेता है।
कूर्म पुराण में भी एक स्थान पर वर्णन आता है कि पृथ्वी की छाया से राहु का
अंधकार मय मंडल (गोलकोश) बनता है। राहु का रथ धूसर या मटियाले रंग का बताया गया
है। उसमें काले रंग के 8 घोडे़ जुडें हुए हैं। जो निरंतर गतिशील रहते हैं।
राहुमण्डल सूर्य से 10,000 योजन नीचे बताया गया है। राहु का जन्म सिंहिका
के गर्भ से बताया जाता है। समुंद्र मंथन के उपरांत अमृत बटवारे के समय यह भगवान विष्णु
के धोखे में नहीं आया तथा देवता रूप धारण करके देवताओं की पक्ति में आ बैठा था।
जैसे ही उसे अमृत पिया सूर्य व चन्द्रमा ने उसकी पोल खोल दी। इस पर विष्णु भगवान
ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार राहु के शरीर के दो भाग हो गए। सिर वाला
भाग राहु कहलाया तथा धड़ वाला भाग केतु कहलाया।
चन्द्रपर्व में राहु चन्द्रमा के निकट तथा सौर पर्व में सूर्य के निकट जाते
हैं। सूर्यमंडल के बिम्ब का विस्तार 10,000 योजन है। चन्द्रमा का 12,000 योजन
विस्तार का है। जबकि राहु का विस्तार 13,000 योजन है।
राहु बैरवश सूर्य व चन्द्रमा को ढकने का प्रयास करता है। इतनी दूरी से यह
ढकना तो चाहता है परंतु विष्णुजी के सुदर्शन चक्र असीम ज्वाला के तेज से
चन्द्रमंडल घिरा रहता है। वह कुछ क्षण ठहरकर लौट जाता है। इस स्थिति को जगत में
उपराग (ग्रहण) कहते हैं। पुरा ग्रंथों में अनेक स्थनों पर ग्रहण की उपराग नाम से
ही वर्णित किया गया है।
राहु के नीचे 10,000 योजन विस्तार वाले लोक में जो पृथ्वी से 100 योजन दूर
है। यक्ष, राक्षस, भूत-प्रेत व पिशाच
आदि की विहार स्थली है। जो अंतरिक्ष लोक में है।
ज्योतिष शस्त्र के अनुसार पृथ्वी जिस मार्ग पर सूर्य का परिक्रमा करती है।
वह कान्तिवृत है। चन्द्रमा का पृथ्वी के चारों आरे का परिक्रमा मार्ग दो बिन्दुओं
पर काटता है। आकार में उत्तर की ओर जाते हुए चन्द्रमा की कक्षा जब सूर्य की कक्षा
को काटती है तो सम्पात बिन्दु को राहु कहते हैं।
इसी प्रकार जब दक्षिण की ओर नीचे उतरते हुए चन्द्रमा की कक्षा सूर्य की
कक्षा को काटती है तो उसे संपात बिन्दु को केतु कहते हैं। इस प्रकार राहु व केतु
उन दो बिन्दुओं के नाम हैं जहाँ पर कांतिवृत व सूर्य, चन्द्रमा व पृथ्वी के परिक्रमा मार्ग एक दूसरे को
काटते हैं।
ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की छाया (राहु) सूर्य से छः राशि के अंतर पर
भ्रमण करता है और पूर्णमासी को चन्द्रमा की छाया या केतु सूर्य से छः राशि के
अन्तर पर भ्रमण करता है।
छः राशियों का अंतर होने के कारण पृथ्वी की छाया जब चन्द्रमा को ढक लेती है
तो चन्द्रग्रहण होता है। छः राशियों का अंतर होते हुए भी जिस पूर्णमासी को सूर्य
तथा चन्द्रमा के अंश, कला और विकला पृथ्वी के समान होते हैं। उस पूर्णमासी
को चन्द्रग्रहण होता है।
अमावस्या दूसरा नाम सूर्येन्दु संगम भी है। अर्थात अपनी अपनी कक्षाओं में
होते हुए भी सूर्य व चन्द्रमा अमावस्या को एक ही राशि में आ जाते हैं। सूर्य व
चन्द्रमा के इस संगम को अमावस्या या सूर्येन्दु संगम कहते हैं। इस प्रकारर वह
स्थान जहाँ सूर्य व चन्द्रमा एक राशि में मिलते हैं। अमावस्या कहलाता है। जिस
अमावस्या को सूर्य व चन्दमा के अंश, कला व विकला
समान हो उस अमावस्या को सूर्यग्रहण होता है।
ज्योतिष ग्रंथों में महर्शि अत्रि को ग्रहण ज्ञान के उपज्ञ (प्रथम ज्ञाता)
बताया जाता है। उन्होनें कहा जाता है कि उन्होनें ग्रहण पर बहुत मनन व अध्ययन किया
होगा। इसी कारण उन्हे यह उपाधि प्राप्त हुई होगी।
चन्द्रमा पृथ्वी का एक ठोस उपग्रह होने के कारण अपारदर्शी है। अपारदर्शी
पदार्थ होने के कारण इसकी छाया बनती है। इसी प्रकार पृथ्वी भी छाया ग्रह बनती है। जो स्वतः प्रकाशक न होने के कारण अप्रकाशित पिण्ड़ के रूप में देखा
जाता है। यह सूर्य के भांति प्रकाशित पिण्ड़ नहीं है। पृथ्वी व चन्द्रमा दोनो
अण्ड़कार पथ (मंडल) पर परिक्रमा करते रहते हैं। साथ ही साथ अपने तारे सूर्य की
परिक्रमा करते रहते हैं। चन्द्रमा अपनी कक्षा की परिक्रमा 27 दिन 7 घंटे 43 मिनट
12 सेकेण्ड में पूरा करता है। चन्द्रमा पृथ्वी के बहुत पास 1,21,000 मील (193600
किलोमीटर) तथा अधिक से अधिक 2,53,000 मील (404800 किलोमीटर) होता है।

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