महाभारत का युद्ध समाप्त होने के पश्चात हस्तिनापुर में युधिष्ठिर को गद्दी पर बैठाया जा रहा था। उसी समय वहाँ पर अपने सौ पुत्रों की मृत्यु का विलाप करते हुए माता गान्धारी ने क्रोध में श्री कृष्ण को उस महायुद्ध का कारण बताकर क्रोद्ध में उन्हें श्राप दे दिया। उन्होंने कहा- "हम सब जानते हैं कि कृष्ण बहुत शक्तिशाली है, यदि ये चाहते तो युद्ध रोक सकते थे किन्तु इतनी शक्ति होते हुए भी उन्होंने इस युद्ध को होने दिया। मैं तुम्हे श्राप देती हूँ- जिस प्रकार मेरे वंश का नाश हुआ उसी प्रकार तुम्हारी आँखों के सामने तुम्हारे यादव वंश का नाश होगा। पशुओं की भांति सारे यादव पुरुष एक दूसरे का रक्त पी जायेंगे। जिस प्रकार मेरा नगर दुःख के सागर में डूबा है, उसी प्रकार तुम्हारी द्वारिका भी दुःख के सागर में डूब जाएगी और फिर समुद्र में डूब जायगी। और तुम किसी वन में अकेले, निहत्थे किसी शिकारी के हाथों मारे जाओगे।”
महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद श्रीकृष्ण 36 वर्ष तक द्वारका में राज्य करते रहे। उनके सुशासन में भोज, वृष्णि, अंधक आदि यादव राजकुमार असीम सुख भोग रहे थे। अधिक भोग-विलास के कारण उनका संयम और शील जाता रहा। महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व, देवर्षि नारद आदि द्वारका आए। वहां यादव कुल के कुछ नवयुवकों ने उनके साथ परिहास (मजाक) करने की सोची। वे श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेष धराकर ऋषियों के पास ले गए और उनसे परिहास में पूछने लगे, कि ये स्त्री गर्भवती है। इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा ? ऋषियों ने जब देखा कि ये युवक हमारा अपमान कर रहे हैं तो क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि- श्रीकृष्ण का यह पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा तुम जैसे क्रूर और क्रोधी लोग अपने समस्त कुल के संहार का कारण बनेगा। उस मूसल के प्रभाव से केवल श्रीकृष्ण व बलराम ही बच पाएंगे।
श्राप के प्रभाव से समय आने पर ऋषियों के कहे अनुसार स्त्री वेषधारी साम्ब के एक मूसल पैदा हुआ। इस पर यादवों की घबराहट और बढ़ गई। जब यह बात राजा उग्रसेन को पता चली तो उन्होंने मूसल को जलाकर भस्म कर दिया किंतु उसका लोहे का सिरा बचा रह गया। उस मूसल के लोहे के सिरे को घिसकर चूरा किया गया। लोहे का सिरा पूरा नहीं घिसा मूसल का एक खंड जो भाले के नोक के समान शेष रह गया। उस भस्म और भाले के नोक के समान शेष खंड को समुद्र समुद्र में फेंकवा दिया गया। यादवगण यह सब करने के बाद निश्चिंत हो गए। वह चूरा लहरों के सहारे प्रभास तीर्थ में आकर जम गया। उधर ऋषियों के श्राप के कारण लोहे का चूर्ण समुद्र में सरकंडे और पटेर नामक खरपतवार के रूप में उत्पन्न हुए। उस लौह खंड को मछली ने निगल लिया। उस मछली को पकड़कर मछुवारों ने पकड़ा तो उसके पेट से वह लौह खंड निकला। उस लोहे के टुकड़े को मछुवारे बेकार समझकर वहीं छोड़कर चले गए। जिसे वहां पहुंचे एक बहलियें ने ले लिया और अपने वाण की नोक पर लगा लिया।
इसके बाद राजा उग्रसेन व श्रीकृष्ण ने नगर में घोषणा करवा दी कि आज से कोई भी वृष्णि व अंधकवंशी अपने घर में मदिरा तैयार नहीं करेगा। जो भी व्यक्ति छिपकर मदिरा तैयार करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। घोषणा सुनकर द्वारकावासियों ने मदिरा नहीं बनाने का निश्चय किया। उस समय यदुवंशियों को पाप करते शर्म नहीं आती थी। गांधारी के श्राप को सत्य करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने यदुवंशियों को तीर्थयात्रा करने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण की आज्ञा से सभी राजवंशी समुद्र के तट पर प्रभास तीर्थ में आकर निवास करने लगे। पुराणों में इसका वर्णन इस प्रकार मिलता है।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित ! जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में बड़े-बड़े उत्पात-अपशकुन हो रहे हैं, तब उन्होंने सुधर्मा-सभा में यदुवंशियों से कहा- "श्रेष्ठ यदुवंशियों! द्वारका में बड़े-बड़े भयंकर उत्पात होने लगे हैं। ये महान अनिष्ट के सूचक हैं। अब हमें यहाँ घड़ी-दो-घड़ी भी नहीं ठहरना चाहिये। स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े यहाँ से शंखद्धार क्षेत्र में भेज दिया जायँ और हम लोग प्रभास क्षेत्र में स्नान करके पवित्र होंगे, उपवास करेंगे और एकाग्रचित्त से स्नान एवं चन्दन आदि सामग्रियों से देवताओं की पूजा करेंगे। वहाँ स्वस्तिवाचन के बाद हम लोग गौ, भूमि, सोना, वस्त्र, हाथी, घोड़े, रथ और घर आदि के द्वारा महात्मा ब्राह्मणों का सत्कार करेंगे। यह विधि सब प्रकार के अमंगलों का नाश करने वाली और परम मंगल की जननी है। सरस्वती पश्चिम की ओर बहकर समुद्र में जा मिली हैं। श्रेष्ठ यदुवंशियों वहां देवता, ब्राह्मण और गौओं की पूजा ही प्राणियों के जन्म को साकार कर परम लाभ प्राप्त होगा।"
परीक्षित! सभी वृद्ध यदुवंशियों ने भगवान श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर ‘तथास्तु’ कहकर उसका अनुमोदन किया और तुरंत नौकाओं से समुद्र पार करके रथों द्वारा प्रभास क्षेत्र की यात्रा की। वहाँ पहुँचकर यादवों ने यदुवंशशिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण के आदेशानुसार बड़ी श्रद्धा और भक्ति से शान्ति पाठ आदि तथा और भी सब प्रकार के मंगल कृत्य किये।
उस के उपरांत वे 'मैरेयक' नामक मदिरा का पान करने लगे, जिसके नशे से बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। उस तीव्र मदिरा के पान से सब-के-सब उन्मत्त हो गये।
एक दिन जब अंधक व वृष्णि वंशी आपस में बात कर रहे थे। बातों-बातों में उनमें विवाद हो गया और हाथा-पायी होने लगी। वे घमंडी वीर एक-दूसरे से लड़ने-झगड़ने लगे। तभी सात्यकि ने आवेश में आकर कृतवर्मा का उपहास और अनादर कर दिया। कृतवर्मा ने भी कुछ ऐसे शब्द कहे कि सात्यकि को क्रोध आ गया और उसने कृतवर्मा का वध कर दिया। यह देख अंधकवंशियों ने सात्यकि को घेर लिया और हमला कर दिया। सात्यकि को अकेला देख श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उसे बचाने दौड़े। सात्यकि और प्रद्युम्न अकेले ही अंधकवंशियों से भिड़ गए। परंतु संख्या में अधिक होने के कारण वे अंधकवंशियों को पराजित नहीं कर पाए और अंत में उनके हाथों मारे गए। उस समय वे क्रोध से भरकर एक-दूसरे पर आक्रमण करने लगे और धनुष-बाण, तलवार, भाले, गदा, तोमर और ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रों से वहाँ समुद्र तट पर ही एक-दूसरे से भिड गये। अपने साथियों की मृत्यु से क्रोधित होकर सात्यकि और प्रद्युम्न ने जब सारे अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गए तो वे एक-दूसरे पर सरकंडों और पटेर नामक खरपतवार से प्रहार करने लगे। हाथ में आते ही पटेर नामक खरपतवार वज्र के समान भयंकर धारदार बन गई। उस धारदार पटेर से श्रीकृष्ण सभी का वध करने लगे। जो कोई भी वह घास उखाड़ता वह भयंकर धारदार बन जाती (ऐसा ऋषियों के श्राप के कारण हुआ था)। उन पटेर के एक ही प्रहार से प्राण निकल जाते थे। उस समय काल के प्रभाव से अंधक, भोज, शिनि और वृष्णि वंश के वीर मूसलों से एक-दूसरे का वध करने लगे। यदुवंशी भी आपस में लड़ते हुए मरने लगे।
प्रद्युम्न साम्ब से, अक्रूर भोज से, अनिरुद्ध सात्यकि से, सुभद्र संग्रामजित से, भगवान श्रीकृष्ण के भाई गद उसी नाम के उनके पुत्र से और सुमित्र सुरथ से युद्ध करने लगे। ये सभी बड़े भयंकर योद्धा थे और क्रोध में भरकर एक-दूसरे का नाश करने पर तुल गये थे। इनके अतिरिक्त निशठं, उल्मुक, सहस्रजित, शतजित और भानु आदि यादव भी एक-दूसरे से गुँथ गये। भगवान श्रीकृष्ण की माया ने तो इन्हें अत्यन्त मोहित कर ही रखा था, इधर मदिरा के नशे ने भी इन्हें अंधा बना दिया था। दशार्ह, वृष्णि, अन्धक, भोज, सात्वत, मधु, अर्बुद, माथुर, शूरसेन, विसर्जन, कुकुर और कुन्ति आदि वंशों के लोग सौहार्द और प्रेम को भुलाकर आपस में मार-काट करने लगे। मूढ़तावश पुत्र पिता का, भाई भाई का, भानजा मामा का, नाती नाना का, मित्र मित्र का, सुहृद सुहृद का, चाचा भतीजे का तथा एक गोत्र वाले आपस में एक-दूसरे का खून करने लगे।
भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें मना किया, तो उन्होंने उनको और बलरामजी को भी अपना शत्रु समझ लिया। उन आततायियों की बुद्धि ऐसी मूढ़ हो रही थी कि वे उन्हें मारने के लिये उनकी ओर दौड़ पड़े। कुरुनन्दन! अब भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी भी क्रोध में भरकर युद्धभूमि में इधर-उधर विचरने और मुट्टी-की-मुट्टी एरका घास उखाड़-उखाड़ कर उन्हें मारने लगे। एरका घास की मुट्टी ही मुद्गर के समान चोट करती थी। जैसे बाँसों की रगड़ से उत्पन्न होकर दावानल बाँसों को ही भस्म कर देता है, वैसे ही ब्रह्मशाप से ग्रस्त और भगवान श्रीकृष्ण की माया से मोहित यदुवंशियों के स्पर्द्धामूलक क्रोध ने उनका ध्वंस कर दिया। इस तरह वे सभी मारे गए।
श्रीकृष्ण और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने शेष बचे सभी वीरों का संहार कर डाला। अंत में केवल दारुक (श्रीकृष्ण के सारथी) ही शेष बचे थे। श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा कि तुम तुरंत हस्तिनापुर जाओ और अर्जुन को पूरी घटना बता कर द्वारका ले आओ।
इसके बाद श्रीकृष्ण बलराम को उसी स्थान पर रहने का कहकर द्वारका लौट आए। द्वारका आकर श्रीकृष्ण ने पूरी घटना अपने पिता वसुदेवजी को बता दी। यदुवंशियों के संहार की बात जान कर उन्हें भी बहुत दुख हुआ। श्रीकृष्ण ने वसुदेवजी से कहा कि आप अर्जुन के आने तक स्त्रियों की रक्षा करें। इस समय बलरामजी वन में मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनसे मिलने जा रहा हूं। जब श्रीकृष्ण ने नगर में स्त्रियों का विलाप सुना तो उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि शीघ्र ही अर्जुन द्वारका आने वाले हैं। वे ही तुम्हारी रक्षा करेंगे। ये कहकर श्रीकृष्ण बलराम से मिलने चल पड़े।
वन में जाकर श्रीकृष्ण ने देखा कि बलरामजी समाधि में लीन हैं। देखते ही देखते उनके मुख से सफेद रंग का बहुत बड़ा सांप निकला और समुद्र की ओर चला गया। उस सांप के हजारों मस्तक थे। समुद्र ने स्वयं प्रकट होकर भगवान शेषनाग का स्वागत किया।
बलरामजी द्वारा देह त्यागने के बाद श्रीकृष्ण उस सूने वन में विचार करते हुए घूमने लगे। घूमते-घूमते वे एक स्थान पर बैठ गए और गांधारी द्वारा दिए गए श्राप के बारे में विचार करने लगे। उसके बाद श्रीकृष्ण जी वन में चले गए और घूमते-घूमते वे एक पेड़ के नीचे आँखें बंद करके लेट गए। देह त्यागने की इच्छा से श्रीकृष्ण ने अपनी इंद्रियों का संयमित किया और महायोग (समाधि) की अवस्था में पृथ्वी पर लेट गए।
जिस समय भगवान श्रीकृष्ण समाधि में लीन थे, उसी समय जरा नाम का एक शिकारी हिरणों का शिकार करने के उद्देश्य से वहां आ गया। बहेलिया ने दूर से देखा तो उसे कृष्ण जी के पैरो के तलवे हिरन के मुँह जैसे दिखाई दिए और उसने श्रीकृष्ण जी के पैर को हिरन समझकर उनके पैर पर तीर छोड़ा। तीर लगते ही रक्त की एक धारा फूट पड़ी। जब बहेलिया कृष्ण जी के पास पहुँचा तब उसने देखा कि उसने गलती से श्री कृष्ण पर तीर छोड़ दिया है तो वह बार-बार कृष्ण जी से क्षमा मांगने लगा। कृष्ण जी ने उससे कहा कि मुझसे क्षमा मत मांगो तुमने बस अपना कर्म किया है और अपने पूर्वजन्म के वरदान को सार्थक किया है। वह बहेलिया पूर्वजन्म में वानरराज बलि था जिसे श्रीराम ने वरदान दिया था कि "क्योंकि मैंने तुम्हे छल से तीर मारा है इसलिए मैं तुम्हे वरदान देता हूँ कि अगले जन्म में तुम भी छलपूर्वक मुझे मृत्यु प्रदान करोगे।" श्रीकृष्ण को उसे आश्वासन दिया और अपने परमधाम चले गए। अंतरिक्ष में पहुंचने पर इंद्र, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु, मुनि आदि सभी ने भगवान का स्वागत किया।
इधर दारुक ने हस्तिनापुर जाकर यदुवंशियों के संहार की पूरी घटना पांडवों को बता दी। यह सुनकर पांडवों को बहुत शोक हुआ। अर्जुन तुरंत ही अपने मामा वसुदेव से मिलने के लिए द्वारका चल दिए। अर्जुन जब द्वारका पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर उन्हें बहुत शोक हुआ। श्रीकृष्ण की रानियां उन्हें देखकर रोने लगी। उन्हें रोता देखकर अर्जुन भी रोने लगे और श्रीकृष्ण को याद करने लगे। इसके बाद अर्जुन वसुदेवजी से मिले। अर्जुन को देखकर वसुदेवजी बिलख-बिलख रोने लगे। वसुदेवजी ने अर्जुन को श्रीकृष्ण का संदेश सुनाते हुए कहा कि द्वारका शीघ्र ही समुद्र में डूबने वाली है अत: तुम सभी नगरवासियों को अपने साथ ले जाओ। वसुदेवजी की बात सुनकर अर्जुन ने दारुक से सभी मंत्रियों को बुलाने के लिए कहा। मंत्रियों के आते ही अर्जुन ने कहा कि मैं सभी नगरवासियों को यहां से इंद्रप्रस्थ ले जाऊंगा, क्योंकि शीघ्र ही इस नगर को समुद्र डूबा देगा। अर्जुन ने मंत्रियों से कहा कि आज से सातवे दिन सभी लोग इंद्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान करेंगे इसलिए आप शीघ्र ही इसके लिए तैयारियां शुरू कर दें।
सभी मंत्री तुरंत अर्जुन की आज्ञा के पालन में जुट गए। अर्जुन ने वह रात श्रीकृष्ण के महल में ही बिताई। अगली सुबह श्रीकृष्ण के पिता वसुदेवजी ने प्राण त्याग दिए। अर्जुन ने विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार किया। वसुदेवजी की पत्नी देवकी, भद्रा, रोहिणी व मदिरा भी चिता पर बैठकर सती हो गईं। इसके बाद अर्जुन ने प्रभास तीर्थ में मारे गए समस्त यदुवंशियों का भी अंतिम संस्कार किया। सातवे दिन अर्जुन श्रीकृष्ण के परिजनों तथा सभी नगरवासियों को साथ लेकर इंद्रप्रस्थ की ओर चल दिए। उन सभी के जाते ही द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई। ये दृश्य देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ।
Post a Comment
Post a Comment