स्वरों के प्रकार
स्वर शास्त्र के अनुसार श्वांस–प्रश्वांस के मार्गों को नाड़ी कहते हैं। हमारा शरीर ऐसी ही नाड़ियों से बना हुआ है और हमारे शरीर में इन नाड़ियों की संख्या 72,000 है । इन 72000 नदियों में से 10 गाड़ियां प्रमुख हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं - 1. इडा, 2. पिंगला, 3. सुषुम्ना, 4. गांधारी, 5. हस्त-जिह्वा, 6. पूषा, 7. यशश्विनी, 8. आलम्बुषा, 9. कुहू तथा 10.शंखिनी।
इनमें से पहले 3 नाडिया प्रधान मानी गई है। इड़ा को चंद्र नाड़ी कहते हैं। जो शरीर के बाएं नथुने में स्थित है, जबकि पिंगला को सूर्य नाड़ी कहते हैं जो शरीर के दाहिने नथुने में स्थित होती है। इसी प्रकार सुषुम्ना को वायु नाड़ी कहते हैं। जो दोनों नथुनों के मध्य में स्थित होती है।
सुर्य स्वर - जब कभी शरीर के नासिका के दाहिने छिद्र को दाहिना स्वर या सूर्यस्वर या पिंगला नाडी-स्वर कहते हैं । सुर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है । यह शिव स्वरूप है । यह शरीर में दाहिनी तरफ स्थित है। यह पिंगला नाड़ी में वास करता है। पिंगला को सुर्य स्वर के नाम से जाना जाता है क्योंकि उसमें सूर्य की गर्मी अर्थात उष्णता समाई रहती है।
चन्द्रस्वर - जब कभी शरीर के नासिका के बायें छिद्र को बायाँ स्वर या चन्द्रस्वर या इडा नाडी-स्वर कहते हैं। इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है। इसका रंग गोरा है। यह शक्ति अर्थात पार्वती का स्वरूप है। यह शरीर में बांयी तरफ स्थित है। यह इड़ा नाड़ी में वास करता है। इड़ा को चंद्र स्वर नाम दिया जाता है अर्थात यह चंद्रमा के समान शीतल है।
सुषुम्ना नाड़ी-स्वर - जब कभी दोनों छिद्रों से वायु-प्रवाह एक साथ निकलना प्रारम्भ हो जाता है, जिसे सुषुम्ना नाड़ी-स्वर कहते हैं । इसे उभय-स्वर भी कहते हैं । जब स्वास दोनों ओर से चलते हैं अर्थात दोनों नासिकाओं या स्वरों से चलते हैं। उसी सुषुम्ना कहते हैं यह दोनों के मध्य में स्थित रहता है। यह नपुंसक है। शरीर की रीढ़की - हड्डी में ऊपर मस्तिष्क से लगाकर मूलाधारचक्र (गुदद्वार) तक सुषुम्ना नाड़ी रहती है। इस नाड़ी के बायीं ओर चन्द्रस्वर नाड़ी और दायीं ओर सूर्यस्वर नाड़ी रहती है।
हम जानते हैं कि जिस प्रकार भगवान सूर्य देव की दो गतियां उत्तरायण तथा दक्षिणायन है उसी प्रकार शरीर में इडा पिंगला नाम की दो स्वास गतियां हैं । इड़ा को हम उत्तरायन मांने तो पिंगला को दक्षिणायन मानना होगा। जिस प्रकार उत्तरायण के महीनों में शीत की प्रधानता रहती है । उसी प्रकार चंद्र नाड़ी शीतल होती है और दक्षिणायन के महीने में जिस प्रकार गर्मी की प्रधानता रहती है । उसी प्रकार सूर्य नाड़ी में उष्णता एवं उत्तेजना की प्रधानता होती है।

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