1.0 सप्तश्लोकी दुर्गास्तोत्रम् (दुर्गा सप्तशती))

।। सप्तश्लोकी दुर्गास्तोत्रम् ।।

[दुर्गा सप्तश्लोकी माँ दुर्गा की प्रार्थना है । इन सात श्लोकों में सप्तशती का संपूर्ण सार समाहित होता है । दुर्गा सप्तश्लोकी नवरात्रि दुर्गा पूजा के दौरान सबसे महत्वपूर्ण पाठ माना गया है।]

।।सप्‍तश्र्लोकी दुर्गा का पाठ।।

सप्तश्लोकी दुर्गास्तोत्रम् ।

शिव उवाच –
देवी  त्वं   भक्त-सुलभे  सर्व-कार्य-विधायिनी। 
कलौ हि कार्य-सिद्ध्यर्थम्-उपायं ब्रूहि यत्नतः ।।

देव्युवाच –
श्रृणु     देव   प्रवक्ष्यामि   कलौ    सर्वेष्ट-साधनम्। 
मया तवैव स्नेहेन-आप्य-अम्बा-स्तुतिः प्रकाश्यते ।।

ॐ अस्य श्री-दुर्गा-सप्तश्लोकी-स्तोत्र-मंत्रस्य नारायण ऋषि:, अनुष्टुप् छ्न्द:, श्री-महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवता:, श्री-दुर्गा-प्रीत्यर्थे सप्तश्लोकी-दुर्गा-पाठे विनियोग: ।

ॐ ज्ञानि-नामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादा-कृष्य  मोहाय  महामाया   प्रयच्छति ॥1॥

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिम-शेष-जन्तोः, 
         स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । 
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या 
सर्वोप-कारकरणाय         सदार्द्रचित्ता     ॥2॥

सर्व-मङ्गल-मङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके । 
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥3॥

शरणागत-दीनार्त-परित्राण-परायणे । 
सर्वस्य-आर्ति-हरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥4॥

सर्व-स्वरूपे सर्वेशे सर्व-शक्ति-समन्विते । 
भय-अभ्य-स्त्राहि नो देवि दुर्गे देवी नमोऽस्तु ते ॥5॥

रोगान-शेषान-पहंसि तुष्टा रुष्टा 
               तु कामान् सकलान-अभीष्टान् । 
त्वाम-आश्रितानां न विपन्नराणां 
             त्वाम-आश्रिता ह्य-आश्रयतां प्रयान्ति ॥6॥

सर्वा-बाधा-प्रशमनं त्रैलोक्यस्य-अखिलेश्वरि । 
एवमेव त्वया कार्यम-स्मद्वै-अरि-विनाशनम् ॥7॥




भावार्थ :

॥इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा संपूर्णम्‌॥
।।सप्‍तश्र्लोकी दुर्गा का पाठ।।
सप्तश्लोकी दुर्गास्तोत्रम् का अनुवाद

शिव उवाच –
हे देवी आप भक्तों के लिए कलयुग में सर्व कार्यों को सुलभ बनाने वाले तथा  कार्यों को सिद्ध करने वाला उपाय प्रयत्न पूर्वक कहिए।

देव्युवाच –
हे देव ! ध्यान पूर्वक सुनिए,  मैं आपको स्नेह पूर्वक, कलिकाल का सर्वश्रेष्ठ साधन, अपनी ही स्तुति प्रकाशित कर रही हूं।

। विनियोगः।

ॐ – इन श्री दुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र मंत्रों के नारायण (विष्णु) ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, श्री महाकाली, महालक्ष्मी , महासरस्वत्यो देवता हैं, श्री दुर्गादेवी की प्रसत्रता के लिये सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ का विनियोग है।

भावार्थ :
वे भगवती महामाया देवी जो ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं॥1॥ 

माँ दुर्गे ! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्धारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। दुःख, दरिद्रता और भय हरने वाली देवी ! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो॥2॥ 

नारायणी ! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करनेवाली मंगलमयी हो, कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थ्रो को सिद्ध करने वाली, दीनों की शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली गौरी देवी आपको नमस्कार है ॥3॥ 

शरणागतों, दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवी ! आपको नमस्कार है ॥4॥ 

सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवी ! सब भयों से हमारी रक्षा कीजिये ; आपको नमस्कार है॥5॥ 

हे देवी ! आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हैं और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हैं । जो लोग आपकी शरण में आ गए हैं, उनपर विपत्ति तो कभी आती ही नहीं ; आपकी शरण में आए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं॥6॥ 

सर्वेश्वरि ! आप इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो ॥7॥

॥इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा संपूर्णम्‌॥

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