1.2 सागर मंथन और उससे निकले 14 रत्न
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| सागर मंथन |
सागर मंथन
दोनों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए क्षीर सागर का मंथन किया। सागर मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी, विष्णु के अवतार कच्छप को आधार तथा नागराज वासुकी को रस्सी बनाया गया। जिसमें लक्ष्मी और अमृत सहित चौदह रत्न निकले। सागर मंथन में सबसे पहले कालकूट (हलाहल) विष निकला जिसकी गरमी से देव तथा दानवों सहित सभी जीव त्रस्त होने लगे। इस विष का पान करके सदाशिव ने सबकी रक्षा की। कहा जाता है कि उन्होने इस विष को गले से नीचे नहीं उतरने दिया इसकारण उनका गला नीला पड़ गया। नीली गर्दन हो जाने के कारण वे नीलग्रीव तथा नीलकंठ के नाम से जगत में प्रसिद्ध हुए।
अनेकों अमूल्य व अतुलनीय पदार्थो की प्राप्ति के पश्चात सागर मंथन के अंत में चिकित्सक धनवंतरी अमृत कुम्भ (कलश) लेकर प्रकट हुए। जब अमृत कलश प्रकट हुआ तो दानों इस पर अपना अधिकार जमाने लगे। देवताओं व दानवों में एक बार फिर से युद्ध छिड़ गया। यह युद्ध बारह वर्ष तक चला। कुम्भ की छीन-झपट के दौरान इन्द्र का पुत्र ज्यंत अमृत कुम्भ को लेकर भाग निकला।
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| अमृत कलश के साथ धनवंतरी जी |
इस दौरान सूर्य, चन्द्रमा, गुरू अर्थात बृहस्पति एवं शनि ने अमृत कलश की रक्षा में सहयोग दिया। चन्द्रमा ने इसे गिरने से बचाया, सूर्य ने इसे फूटने से तथा गुरू अर्थात बृहस्पति ने इसे असुरों के हाथ जाने से बचाया।
जो इस श्लोक के आधार पर ज्ञात होते हैं। सागर मंथन मे निलने वाले चौदह रत्न निम्न प्रकार थे।
क्रम
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रत्न का नाम
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किसे मिला
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01
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विष
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कालकूट (हलाहल विश)
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इस विष का पान करके सदाशिव ने जीवों की रक्षा की।
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02
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धनुश
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शारंग धनुश
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विष्णु जी को
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03
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वाजि (घोड़ा)
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सप्तमुखी अश्व (उच्चेश्रवा घोड़ा)
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दैत्यराज को
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04
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रम्भा
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रम्भादि अपसराएं
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इन्द्र को
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05
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गजराज
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ऐरावत हाथी (चार दांत व चार सूंड वाला सफेद हाथी।)
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इन्द्र को
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06
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धेनु
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कामधोनु (इच्छाधारी गाय) पुराणों में कामधेनु गाय को नंदा, सुनंदा, सुरभी, सुशीला और सुमन भी कहा गया है।
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इन्द्र को
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07
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शशि
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चन्द्रमां
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आकाश में (बाद में सदाशिव के सिर पर विराजित हुआ।)
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08
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वारूणि
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मदिरा
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दैत्यों को
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09
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कल्पद्रुम
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पारिजात नामक कल्पवृक्ष
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इन्द्र को
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10
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मणि
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कोस्तुम्भ मणि
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विष्णु जी को
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11
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श्री
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लक्ष्मी जी
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विष्णु जी को
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12
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शंख
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शंख
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विष्णु जी को
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13
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धनवंतरि
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वैद्यशिरोमणि धनवंतरी
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देवों के पास
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14
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अमिय
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अमृत
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देव-दानवों में वितरण
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जयंत बारह देव दिनों तक भागता रहा। (एक देव-दिन मानव के एक वर्ष के बराबर होता है।) इस दौरान बारह स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें छलक कर गिर गईं। इनमें से चार स्थल धरती पर तथा आठ स्थल देवलोक में हैं। चूंकि एक देव दिन मानव के एक वर्श के बराबर होता है। इसलिए बारह देववर्षों में एक महाकुम्भ पडता है। पृथ्वी पर इन चारों स्थानों पर लगभग प्रत्येक तीन वर्ष के अन्तराल से कुम्भ का आयोजन होता है। इसी अमृत की चाह में असंख्य लोग इन चार स्थान प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन तथा नाशिक स्थ्लों की ओर खिंचे चले आते हैं। गंगा, क्षिप्रा, गोदावरी और संगम (प्रयाग) के तटों पर सम्पन्न होने वाले पर्वो ने पूरे भारत को एक सामाजिक तथा भौगोलिक एकता प्रदान कर इसे प्रगाढ़ बनाया है।



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