1.2 नाड़ियों की शरीर में स्थिति
जैसा कि हम बता चुके हैं कि नाक के छिद्रों से वायु ग्रहण करने को हम श्वास कहते हैं। वायु जीव का प्राण है। इसी श्वास को स्वर कहा गया है। स्वर चलने या स्वर के प्रारंभ होने की क्रिया को स्वर का उदय होना मानकर इसे 'स्वरोदय' नाम दिया गया है। तथा वह ज्ञान जिसमें कुछ विधियां बताई गई हो उस विषय के रहस्य को समझने का प्रयास किया गया हो उसे विज्ञान का जाता है।
स्वर-संचार-क्रिया में अनेकानेक प्राणवाही नाड़ियाँ होती हैं, जिसमें प्रमुख इडा, पिंगला और सुषुम्ना ही हैं। हमारे शरीरमें 72 हजार नाड़ियों (धमनियों, शिराओं, कोशिकाओं) का जाल फैला हुआ होता है, जिसका नियन्त्रण-केन्द्र मस्तिष्क है।
स्वर विज्ञान की एक आसान प्रणाली है। जिससे प्रत्येक श्वास लेने वाला जीव प्रयोग में लाता है। यदि आप समाज की गति निशा आदि की स्थिति का अभ्यास कर लेंगे तो आप अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त करने लगेंगे इसके लाभ को पाने के लिए कोई कठिन उपासना या तपस्या नहीं करनी होती आप इसे पढ़ने मात्र से ही समझ सकते हैं।
स्वर-संचार-क्रिया में अनेकानेक प्राणवाही नाड़ियाँ होती हैं, जिसमें प्रमुख इडा, पिंगला और सुषुम्ना ही हैं। हमारे शरीरमें 72 हजार नाड़ियों (धमनियों, शिराओं, कोशिकाओं) का जाल फैला हुआ होता है, जिसका नियन्त्रण-केन्द्र मस्तिष्क है।
स्वर विज्ञान की एक आसान प्रणाली है। जिससे प्रत्येक श्वास लेने वाला जीव प्रयोग में लाता है। यदि आप समाज की गति निशा आदि की स्थिति का अभ्यास कर लेंगे तो आप अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त करने लगेंगे इसके लाभ को पाने के लिए कोई कठिन उपासना या तपस्या नहीं करनी होती आप इसे पढ़ने मात्र से ही समझ सकते हैं।
स्वर शास्त्र के अनुसार श्वांस–प्रश्वांस के मार्गों को नाड़ी कहते हैं। हमारा शरीर ऐसी ही नाड़ियों से बना हुआ है और हमारे शरीर में इन नाड़ियों की संख्या 72,000 है । नाड़ियों को सिर्फ नसें समझना मूर्खता है । स्पष्ट रूप से हम यह बता दें कि ये नाड़ियों प्राणवायु आवागमन के मार्ग हैं।
इन 72000 नदियों में से 10 नाड़ियां प्रमुख हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं।
1. इडा
2. पिंगला
3. सुषुम्ना
4. गांधारी
5. हस्त-जिह्वा
6. पूषा
7. यशश्विनी
8. आलम्बुषा
9. कुहू तथा
10.शंखिनी
इनमें से पहले 3 नाड़ियां प्रधान मानी गई है। ये नाड़ियां शरीर में कहां-कहां स्थित हैं बताने का प्रयास करते हैं। नासिका के दाहिने छिद्र को दाहिना स्वर या सूर्यस्वर या पिंगला नाडी-स्वर कहते हैं । 1. इड़ा को चंद्र नाड़ी कहते हैं। जो शरीर में बाएं नथुने में स्थित है, जबकि नासिका के बायें छिद्र को बायाँ स्वर या चन्द्रस्वर या इडा नाडी-स्वर कहते हैं। 2. पिंगला को सूर्य नाड़ी कहते हैं जो दाहिने नथुने में स्थित होती है। शरीर की रीढ़की - हड्डी में ऊपर मस्तिष्क से लगाकर मूलाधारचक्र (गुदद्वार) तक सुषुम्ना नाड़ी रहती है। इस नाड़ी के बायीं ओर चन्द्रस्वर नाड़ी और दायीं ओर सूर्यस्वर नाड़ी रहती है। इसी सुषुम्ना को वायु नाड़ी भी कहते हैं। यह नाड़ी दोनों नथुनों के मध्य में स्थित होती है। कभी-कभी दोनों छिद्रों से वायु-प्रवाह एक साथ निकलना प्रारम्भ हो जाता है, जिसे सुषुम्ना नाड़ी-स्वर कहते हैं । इसे उभय-स्वर भी कहते हैं ।
जिस प्रकार संसार में सूर्य और चंद्र नियमित रूप से अपना अपना काम करते हैं उसी प्रकार इडा पिंगला भी इस जीवन में अपना अपना कार्य नियमित रूप से करती रहती हैं।
अन्य सात प्रमुख नाड़ियों में 4. गांधारी बाई आंख में, 5. हस्त जिह्वा दाहिनी आंख में, 6. पूषा दाहिने कान में, 7. यशश्विनी बाएं कान में, 8. अलम्बुषा मुख में, 9. कुहू लिंगदेश में तथा 10. शंखिनी गुदाद्वार या मूलाधार में स्थित है। हरेक शरीर में इस प्रकार 10 नाड़ियां स्थित होते हैं।
प्राचीन ऋषि और मनीषियों ने चल रहे सांस को ही स्वर की संज्ञा दी है । जैसा कि हम जानते हैं कि मनुष्य नासिका में दो छिद्र हैं-दाहिना और बायाँ। दोनों छिद्रों में से केवल एक छिद्र से ही वायु का प्रवेश और बाहर निकलना होता रहता है। दूसरा छिद्र बन्द रहता है। जब दूसरे छिद्र से वायु का प्रवेश और बाहर निकलना प्रारम्भ होता है तो पहला छिद्र स्वत ही स्वाभाविक रूप से बन्द हो जाता है अर्थात् एक चलित रहता है तो दूसरा बन्द हो जाता है।

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