1.4 स्वरोदय किस प्रकार होता है

1.4 स्वरोदय किस प्रकार होता है 


जैसा कि हम बता चुके हैं कि नाक के छिद्रों से वायु ग्रहण करने को हम श्वास कहते हैं। वायु जीव का प्राण है। स्वर का बन्द होना मृत्युका प्रतीक है। इसी श्वास को स्वर कहा गया है। इस प्रकार वायुवेग के संचार की क्रिया-श्वास-प्रश्वास को ही स्वर कहते हैं। स्वर ही साँस है। साँस ही जीवन का प्राण है। स्वर का दिन-रात 24 घंटे बना रहना ही जीवन है। स्वर चलने या स्वर के प्रारंभ होने की क्रिया को स्वर का उदय होना मानकर इसे 'स्वरोदय' नाम दिया गया है। तथा वह ज्ञान जिसमें कुछ विधियां बताई गई हो उस विषय के रहस्य को समझने का प्रयास किया गया हो उसे विज्ञान का जाता है। स्वर विज्ञान की एक आसान प्रणाली है। जिससे प्रत्येक श्वास लेने वाला जीव प्रयोग में लाता है।


प्राचीन ऋषि और मनीषियों ने चल रहे सांस को ही स्वर की संज्ञा दी है । जैसा कि हम जानते हैं कि मनुष्य नासिका में दो छिद्र हैं-दाहिना और बायाँ। दोनों छिद्रों में से केवल एक छिद्र से ही वायु का प्रवेश और बाहर निकलना होता रहता है। दूसरा छिद्र बन्द रहता है। जब दूसरे छिद्र से वायु का प्रवेश और बाहर निकलना प्रारम्भ होता है तो पहला छिद्र स्वत ही स्वाभाविक रूप से बन्द हो जाता है अर्थात् एक चलित रहता है तो दूसरा बन्द हो जाता है। 

प्रत्येक (दाहिना-बायाँ) स्वर का स्वाभाविक गति से 1 घंटा-900 श्वास संचार का क्रम होता है और पाँच तत्त्व 60 घड़ी में 12 बार बदलते हैं। एक स्वस्थ व्यक्तिकी श्वास-प्रश्वास-क्रिया दिन-रात अर्थात् 24 घंटे में 21600 बार होती है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि साधारणतया स्वर प्रतिदिन प्रत्येक अढ़ाई घड़ी पर अर्थात एक-एक घंटे के बाद दायाँ से बायाँ और बायाँ से दायाँ बदलते हैं । कभी-कभी तिथि के घटने पर 2 दिन में और बढ़ने पर 4 दिन में स्वर स्वत: बदल जाते हैं, और इन घड़ियों के बीच स्वरोदय के साथ ही शरीर में पंच महाभूतों का संचार होता रहता है। ये पाँच तत्त्व 60 घड़ी में 12 बार निम्नक्रम से बदलते रहते हैं। पृथ्वी (20 मिनट), जल (16 मिनट), अग्नि (12 मिनट), वायु (8 मिनट), आकाश (4 मिनट) भी एक विशेष समय-क्रम से उदय होकर क्रिया करते रहते हैं। 

स्वरोदय-विज्ञान में चन्द्रमा को अधिष्ठात्री माना गया है। चन्द्रमा की गति के अनुसार प्रत्येक मास में पन्द्रह-पन्द्रह दिनों के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष होते हैं। इनमें तिथियों की गणना सुर्योदय के समय से ही दिन-रात 24 घंटे की मानी जाती है। सुर्योदय के साथ स्वर और तिथियों का नैसर्गिक घनिष्ठ सम्बन्ध है। स्वस्थ पुरुष का स्वरोदय दोनों पक्षों में निम्न प्रकार है।

शुक्लपक्ष में स्वरोदय..शुक्लपक्षमें 1, 2, 3, 7, 8, 9, 13, 14, 15 (पूर्णिमा) तिथियों तक प्रात: काल सूर्योदय काल में शय्या त्याग के साथ चन्द्रस्वर (बायें स्वर) का संचार होता है और इसी प्रकार 4, 5, 6, 10,11, 12 तिथियों को सूर्यस्वर (दायें स्वर) का संचार होता है।

कृष्ण पक्ष में स्वरोदय..कृष्णपक्षमें 1, 2, 3, 7, 8, 9, 13, 14, 15 (अमावस्या) तिथियों में सूर्योदयकाल में प्रात:काल शय्यात्याग के साथ सूर्यस्वर (दाहि ने स्वर)- का संचार होता है। इसी प्रकार 4, 5, 6, 10, 11, 12 तिथियों को चन्द्रस्वर का संचार होता है।


शुक्ल पक्ष की 
प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया को                 बांयां स्वर 
चतुर्थी, पंचमी और षष्ठी को                          दांया स्वर 
सप्तमी, अष्टमी और नवमी को                     बांयां स्वर 
दशमी, एकादशी और द्वादशी को                दांया स्वर 
त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को               बांया स्वर चलता है।

जबकि कृष्ण पक्ष में यह क्रम उलट जाता है।

प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया को                 दांया स्वर 
चतुर्थी, पंचमी और षष्ठी को                          बांया स्वर 
सप्तमी, अष्टमी और नवमी को                     दांया स्वर 
दशमी, एकादशी और द्वादशी को                बांया स्वर 

त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को               दांया स्वर चलता है।

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