सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण की पौराणिक कथा
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| सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण |
जैसा कि हम पहले ही वर्णन कर चुके हैं कि हमारे ग्रंथों का पुर्नलेखन करने
वालों की एक यही कमी रही की विज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए उन्होने इतिहास को
उससे जोड़ दिया। हमें इतिहास की उसी कहानी से फिर से विज्ञान को अलग करना है। कहानी
अपने स्थान पर एक सत्य घटना है क्योंकि वह एक ऐतिहासिक घटना है। परंतु विज्ञान
अपने आप में सत्य है। हम इस समय जिन्हे वैज्ञानिक नाम से पुकारते हैं। उस समय इन
वैज्ञानिकों का कार्य ऋषि किया करते थे। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ऋषि उस समय
के वैज्ञानिक हुआ करते थे। जिन्हे राजाओं की शरण प्राप्त होती थी।
सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण की पौराणिक कथा
पुराणों में वर्णित संदर्भो के अनुसार यह सुर्य ग्रहण तथा चन्द्र ग्रहण का
संबंध सागर मंथन में निकले अमृत से जुडा है। इस कथा के अनुसार एक बार देवों तथा
दानवों में युद्ध छिड़ गया और देवता हारने लगे तो असुरों से भयभीत होकर भगवान विष्णु
की शरण गए। उन्होने असुरों के साथ मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए सागर मंथन की सलाह
दी।
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| सागर मंथन |
सागर मंथन
दोनों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए क्षीर सागर का मंथन किया। सागर मंथन
के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी, विष्णु के अवतार कच्छप
को आधार तथा नागराज वासुकी को रस्सी बनाया गया। जिसमें लक्ष्मी और अमृत सहित चौदह
रत्न निकले। सागर मंथन में सबसे पहले कालकूट (हलाहल) विष निकला जिसकी गरमी से देव
तथा दानवों सहित सभी जीव त्रस्त होने लगे। इस विष का पान करके सदाशिव ने सबकी
रक्षा की। कहा जाता है कि उन्होने इस विष को गले से नीचे नहीं उतरने दिया इसकारण
उनका गला नीला पड़ गया। नीली गर्दन हो जाने के कारण वे नीलग्रीव तथा नीलकंठ के नाम
से जगत में प्रसिद्ध हुए।
अनेकों अमूल्य व अतुलनीय पदार्थो की प्राप्ति के पश्चात सागर मंथन के अंत
में चिकित्सक धनवंतरी अमृत कुम्भ (कलश) लेकर प्रकट हुए। जब अमृत कलश प्रकट हुआ तो
दानों इस पर अपना अधिकार जमाने लगे। देवताओं व दानवों में एक बार फिर से युद्ध छिड़
गया। यह युद्ध बारह वर्ष तक चला। कुम्भ की छीन-झपट के दौरान इन्द्र का पुत्र ज्यंत
अमृत कुम्भ को लेकर भाग निकला।
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| अमृत कलश के साथ धनवंतरी जी |
इस दौरान सूर्य, चन्द्रमा, गुरू अर्थात बृहस्पति
एवं शनि ने अमृत कलश की रक्षा में सहयोग दिया। चन्द्रमा ने इसे गिरने से बचाया, सूर्य ने इसे फूटने से तथा गुरू अर्थात बृहस्पति ने
इसे असुरों के हाथ जाने से बचाया।
जो इस श्लोक के आधार पर ज्ञात होते
हैं। सागर मंथन मे निलने वाले चौदह रत्न निम्न प्रकार थे।
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क्रम
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रत्न
का नाम
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किसे
मिला
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01
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विष
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कालकूट
(हलाहल विश)
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इस
विष का पान करके सदाशिव ने जीवों की रक्षा की।
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02
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धनुश
|
शारंग
धनुश
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विष्णु
जी को
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03
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वाजि
(घोड़ा)
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सप्तमुखी
अश्व (उच्चेश्रवा घोड़ा)
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दैत्यराज
को
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04
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रम्भा
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रम्भादि
अपसराएं
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इन्द्र
को
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05
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गजराज
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ऐरावत
हाथी (चार दांत व चार सूंड वाला सफेद हाथी।)
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इन्द्र
को
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06
|
धेनु
|
कामधोनु
(इच्छाधारी गाय)
|
इन्द्र
को
|
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07
|
शशि
|
चन्द्रमां
|
आकाश
में (बाद में सदाशिव के सिर पर विराजित हुआ।)
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08
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वारूणि
|
मदिरा
|
दैत्यों
को
|
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09
|
कल्पद्रुम
|
पारिजात
नामक कल्पवृक्ष
|
इन्द्र
को
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|
10
|
मणि
|
कोस्तुम्भ
मणि
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विष्णु
जी को
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|
11
|
श्री
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लक्ष्मी
जी
|
विष्णु
जी को
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12
|
शंख
|
शंख
|
विष्णु
जी को
|
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13
|
धनवंतरि
|
वैद्यशिरोमणि
धनवंतरी
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देवों
के पास
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14
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अमिय
|
अमृत
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देव-दानवों
में वितरण
|
जयंत बारह देव दिनों तक भागता रहा। (एक देव-दिन मानव के एक वर्ष के बराबर
होता है।) इस दौरान बारह स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें छलक कर गिर गईं। इनमें से
चार स्थल धरती पर तथा आठ स्थल देवलोक में हैं। चूंकि एक देव दिन मानव के एक वर्श
के बराबर होता है। इसलिए बारह देववर्षों में एक महाकुम्भ पडता है। पृथ्वी पर इन
चारों स्थानों पर लगभग प्रत्येक तीन वर्ष के अन्तराल से कुम्भ का आयोजन होता है।
इसी अमृत की चाह में असंख्य लोग इन चार स्थान प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन तथा नाशिक
स्थ्लों की ओर खिंचे चले आते हैं। गंगा, क्षिप्रा, गोदावरी और संगम (प्रयाग) के तटों पर सम्पन्न होने
वाले पर्वो ने पूरे भारत को एक सामाजिक तथा भौगोलिक एकता प्रदान कर इसे प्रगाढ़
बनाया है।
सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण
जब अमृत के लिए छीना झपटी हो
रही थी। तब विष्णु जी ने मोहनी का रूप धारण करके, अमृत देवताओं में तथा मदिरा को
दैत्यों में बांटने लगे। विष्णु की इस चालाकी को राहु नामक दैत्य भाँप गया। वह देव
रूप धारण करके देवों के बीच आ बैठा। वह भी अमृत पान कर गया। सूर्य व चंद्रमा ने उसे
देख लिया और सूर्य व चंद्रमा ने उसकी पोल खोल दी। विष्णु ने अपने सुदर्शन से उस पर
वार किया। सुदर्शन ने उसका सिर धड से अलग कर दिया, परंतु वह तो अमृत पान करके अमर
हो चुका था। वह राक्षस दो हिस्से हो जाने के बाद भी जीवित रह गया। उसका सिर वाला
हिस्सा राहु तो धड़ वाला हिस्सा केतु कहलाया। भगवान ने अपनी शक्ति से दोनों को आकाश
में स्थापित कर दिया। ये दोनो राक्षस वैरभाव से अमावस्या के दिन सूर्य पर तथा पूर्णिमा
के दिन चन्द्रमा पर आक्रमण कर उसे ग्रसने का प्रयास करते हैं। तभी ग्रहण होता है।





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