पुरुषोत्तम मास !!★
धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष में एक बार पुरुषोत्तम मास आता है। इसे अधिक मास भी कहते है। पहले हम ये जान लेते है की पुरुषोत्तम मास है क्या ?
ज्योतिष् शास्त्र के अनुसार जिस मास में अमावस्या से अमावस्या के बीच में कोई संक्रांति न पड़े उसे अधिक मास कहते है। संक्रांति का अर्थ सूर्य का राशि परिवर्तन से है। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को ही संक्रांति कहते है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार एक सौर वर्ष 365 दिन 6 घंटे 11 मिनट का होता है तथा एक चंद्र वर्ष 354 दिन 9 घंटे का माना जाता है।
सौर वर्ष और चंद्र वर्ष की गणना को बराबर करने के लिए अधिक मास की उत्पत्ति हुई।
पुरुषोत्तम मास में पूजा पाठ का विशेष महत्व है।
जो जातक पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से उपवास, पूजा पाठ दान कर्म करता है। उसे पुण्य की प्राप्ति एवं कष्टों से मुक्ति मिलती है।
इस वर्ष 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक सूर्य
संक्रांति न होने के कारण अश्विन अधिक मास बनता है।
शास्त्रों के अनुसार मास प्रारंभ के समय भगवान विष्णु की आराधना लाल चंदन,लाल फूल और अक्षत सहित पूजन करना चाहिए।
भगवान को घी,गुड और गेहूं के आटे से मीठे पूवे बना कर कास्य पात्र में फल फूल दक्षिणा वस्त्र के
साथ भोग लगा कर दान करना चाहिए।
धर्म ग्रंथों के अनुसार अधिक मास में शुभ कार्यों को वर्जित कहा गया है। जैसे नामकरण,गृह प्रवेश,जनेऊ संस्कार, मुंडन,विवाह,नव वधू प्रवेश,गाड़ी खरीदना, नीव पूजन आदि।
इस माह में तामसिक भोजन से भी बचना चाहिए जैसे मास मदिरा,लहसुन प्याज़ आदि।
इस मास में किए जाने वाले कार्य है वार्षिक श्राद्ध,मृत्यु तुल्य कष्ट से मुक्ति पाने के लिए रुद्राभिषेक,गर्भधान संस्कार, दान जप,पुंसवन संस्कार व सीमांत संस्कार हो सकता है।
इस मास में पुरुषोत्तम मास में भूमि पर शयन करना चाहिए,सादा और सात्विक भोजन करना चाहिएं।
भागवत पुराण के 6 स्कंध में 15 अध्याय है।
पहले पांच अध्याय में हिरण्यकश्यप की कथा आती है।
उसने एक बार ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर के उनसे ऐसा वरदान मांगा की आप की बनाई गई सृष्टि के किसी महीने में न मरू,ऊपर मरू न नीचे मरू,बाहर मरू न अंदर मरु। ब्रह्मा जी ने खुश हो कर तथास्तु कह दिया।
उसी हिरण्यकशयप को मारने के लिएं एवं भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए,नरसिंह अवतार ले कर इस अधिक मास में ही दुष्ट को संहार कर अधर्म का नाश किया था।
एक प्रसंग ऐसा भी मिलता है की एक बार अधिक मास क्षीर सागर में भगवान विष्णु के पास जा कर प्रार्थना की कि भगवान अगर मैं इतना ही बुरा हूं तो मुझे बनाया ही क्यों ?
क्योंकि हर नक्षत्र,हर दिन,हर ग्रह का कोई न कोई स्वामी है परंतु मेरा कोई स्वामी न होने के कारण कोई भी इस मास में शुभ कार्य नही करता।
तब भगवान ने वरदान दिया की आज से तुम मेरे नाम ए जाने जाओगे अर्थात पुरुषोत्तम के नाम से तथा इस माह मे मेरी भक्ति करने वालों को असंख्य पुण्य की प्राप्ति होगी और भव सागर से मुक्ति पाएगा।
"मलमास" ,,,
हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक तीन वर्ष पर आने वाला अधिक मास ! इस वर्ष मलमास 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक है । अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 12 महीने होते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि हिंदुओं की मान्यता के अनुसार प्रत्येक
तीन साल में एक साल 13 महीनों का होता है ?
आपको यकीन भले न हो, लेकिन यह सच है।चलिए हम आपको बताते हैं इससे जुड़ी सच्चाई।
हर तीसरे साल जो तेरहवां महीना आता है,उस महीने को मलमास कहा जाता है।
अंग्रेजी में इस माह का जिक्र नहीं है, लेकिन हिंदुओं की मान्यता के अनुसार एक माह मलमास का होता है।
पौराणिक भारतीय ग्रंथ वायु पुराण के अनुसार मगध सम्राट बसु द्वारा बिहार के राजगीर में 'वाजपेयी यज्ञ' कराया गया था। उस यज्ञ में राजा बसु के पितामह ब्रह्मा सहित सभी देवी-देवता राजगीर पधारे थे। यज्ञ में पवित्र नदियों और तीर्थों के जल की जरूरत पड़ी थी।
कहा जाता है कि ब्रह्मा के आह्वान पर ही अग्निकुंड से विभिन्न तीर्थों का जल प्रकट हुआ था। उस यज्ञ का अग्निकुंड ही आज का ब्रह्मकुंड (राजगीर,बिहार) है। उस यज्ञ में बड़ी संख्या में ऋषि-महर्षि भी आए थे।
पुरुषोत्तम मास,सर्वोत्तम मास में यहां अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति की महिमा है। किंवदंती है कि भगवान ब्रह्मा से राजा हिरण्यकश्यपु ने वरदान मांगा था कि रात-दिन, सुबह-शाम और उनके द्वारा बनाए गए बारह मास में से किसी भी मास में उसकी मौत न हो।
इस वरदान को देने के बाद जब ब्रह्मा को अपनी भूल का अहसास हुआ, तब वे भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने विचारोपरांत हिरण्यकश्यपु के अंत के लिए तेरहवें महीने का निर्माण किया।
धार्मिक मान्यता है कि इस अतिरिक्त एक महीने को मलमास या अधिक मास कहा जाता है। वायु पुराण एवं अग्नि पुराण के अनुसार इस अवधि में सभी देवी-देवता यहां आकर वास करते हैं।
इसी अधिक मास में मगध की पौराणिक नगरी राजगीर में प्रत्येक ढाई से तीन साल पर विराट मलमास मेला लगता है। इस माह में लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों प्राची, सरस्वती और वैतरणी के अलावागर्म जलकुंडों, ब्रह्मकुंड, सप्तधारा, न्यासकुंड,मार्कंडेय कुंड, गंगा-यमुना कुंड, काशीधारा कुंड, अनंतऋषि कुंड, सूर्य-कुंड, राम-लक्ष्मण कुंड, सीता कुंड, गौरी कुंड और नानक कुंड में स्नान कर भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर में आराधना करते हैं।
वर्ष भर इन कुंडों में निरंतर उष्ण जल गिरता रहता है, इस जल का श्रोत अज्ञात है। राजगीर में इस अवसर पर भव्य मेला भी लगता है। राजगीर में मलमास के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में दिखती है गंगा-यमुना संस्कृति की झलक।
मोक्ष की कामना और पितरों के उद्धार के लिए जुटते हैं श्रद्धालु। इस माह विष्णु पुराण ज्ञान यज्ञ का आयोजन करके सत्,चित व आनंद की प्राप्ति की जा सकती है।
कैसे पहुंचें राजगीर:-
सड़क परिवहन द्वारा राजगीर जाने के लिए पटना, गया, दिल्ली से बस सेवाउपलब्ध है।
सोलह मई , तेरह जून बसंत l
एक सहस नौ दो गुना , पूजन करते संत ll
अधिकमास त्रय वर्ष में ,अधि पुरुषोत्तम ध्यान l
शिवमंदिर अनुपम छटा, उज्ज्वल, शुचि गुणज्ञानll
अधिकमास त्रय वर्ष भवानी ,
हरिपूजन करते गुरु ज्ञानी l
सूर्य चंद्र गति मकर विहीना ,
विद्वत कह मलमास प्रवीना ll
शुभ करनी वर्जित यहि मासा ,
मंगल कार्य निषिद्ध बिलासा l
प्रातकाल उठि हरि हर पूजा ,
अधिकमास सम पुण्य न दूजा ll
पुरुषोत्तम मास तीन साल में एक बार आता है। इसे स्वयं भगवान ने अपने नाम से जोड़ा था। यह मास धर्म और पुण्य कार्य करने के लिए सर्वोत्तम होता है क्योंकि इस माह में पूजन-पाठ करने से अधिक पुण्य मिलता है। इस माह में श्राद्ध, स्नान और दान से कल्याण होता है।
अधिक मास में किए विधि-विधान के साथ जाने वाले धर्म-कर्म से करोड़ गुना फल मिलता है। पितरों की कृपा प्राप्ति के लिए इस मास में पुण्य कर्म करना चाहिए।
इस संसार में मनुष्य माया से मुक्ति पाने के लिए जीवन भर भटकता रहता है पर उसे मुक्ति नहीं मिलती। जिस क्षण श्रीमद्भागवत व भगवान श्रीकृष्ण, भगवान विष्णु के प्रति उसके मन में भाव जागता है, उसी क्षण माया से मुक्ति मिल जाती है। भगवान की भक्ति में लीन होकर प्राणी पापों से मुक्ति पाकर अपना लोक और परलोक दोनों सुधार लेता है।
विष्णु की उपासना
पुरुषोत्तम मास में विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ और गणपति अथर्वशीर्ष मनुष्य को पुण्य की ओर ले जाते हैं। भागवत कथा व पुरुषोत्तम मास का संयोग भी अपने आप में बहुत दुर्लभ है। कहते हैं कि स्वर्ग में सब कुछ मिल सकता है, पर भागवत कथा नहीं। भगवान मिल जाएंगे, लेकिन भगवान की कथा नहीं। अधिक मास अर्थात पुरुषोत्तम मास भगवान विष्णु ने मानव के पुण्य के लिए ही बनाया है।
पुराणों में उल्लेख है कि जब हिरण्य कश्यप को वरदान मिला कि वह साल के बारह माह में कभी न मरे तो भगवान ने मलमास की रचना की। जिसके बाद ही नृसिंह अवतार लेकर भगवान ने उसका वध किया। इस माह में भगवान विष्णु के नाम का जाप करना ही हितकर होता है। इस जाप से ही पापों से मुक्ति मिलती है।
पुरुषोत्तम मास की उत्पत्ति
~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रत्येक राशि, नक्षत्र, करण व चैत्रादि बारह मासों के सभी के स्वामी है, परन्तु मलमास का कोई स्वामी नही है. इसलिए देव कार्य, शुभ कार्य एवं पितृ कार्य इस मास में वर्जित माने गये है.
इससे दुखी होकर स्वयं मलमास(अधिक मास) बहुत नाराज व उदास रहता था, इसी कारण सभी ओर उसकी निंदा होने लगी. मलमास को सभी ने असहाय, निन्दक, अपूज्य तथा संक्रांति से वर्जित कहकर लज्जित किया।
अत: लोक-भत्र्सना से चिन्तातुर होकर अपार दु:ख समुद्र में मग्न हो गया. वह कान्तिहीन, दु:खों से युक्त, निंदा से दु:खी होकर मल मास भगवान विष्णु के पास वैकुण्ठ लोक में पहुंचा, और मलमास बोला - हे नाथ, हे कृपानिधे! मेरा नाम मलमास है. मैं सभी से तिरस्कृत होकर यहां आया हूं. सभी ने मुझे शुभ-कर्म वर्जित, अनाथ और सदैव घृणा-दृष्टि से देखा है. संसार में सभी क्षण, लव, मुहूर्त, पक्ष, मास, अहोरात्र आदि अपने-अपने अधिपतियों के अधिकारों से सदैव निर्भय रहकर आनन्द मनाया करते हैं.
मैं ऐसा अभागा हूं जिसका न कोई नाम है, न स्वामी, न धर्म तथा न ही कोई आश्रम है, इसलिए हे स्वामी, मैं अब मरना चाहता हूं.’ ऐसा कहकर वह शान्त हो गया।
तब भगवान विष्णु मलमास को लेकर गोलोक धाम गए. वहां भगवान श्रीकृष्ण मोरपंख का मुकुट व वैजयंती माला धारण कर स्वर्णजडि़त आसन पर बैठे थे। गोपियों से घिरे हुए थे।
भगवान विष्णु ने मलमास को श्रीकृष्ण के चरणों में नतमस्तक करवाया व कहा - कि यह मलमास वेद-शास्त्र के अनुसार पुण्य कर्मों के लिए अयोग्य माना गया है इसीलिए सभी इसकी निंदा करते हैं।
तब श्रीकृष्ण ने कहा - हे हरि! आप इसका हाथ पकड़कर यहां लाए हो. जिसे आपने स्वीकार किया उसे मैंने भी स्वीकार कर लिया है।
इसे मैं अपने ही समान करूंगा तथा गुण, कीर्ति, ऐश्वर्य, पराक्रम, भक्तों को वरदान आदि मेरे समान सभी गुण इसमें होंगे, मेरे अन्दर जितने भी सदॄगुण है, उन सभी को मैं मलमास में तुम्हे सौंप रहा हूँ मैं इसे अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ देता हूं और यह इसी नाम से विख्यात होगा। यह मेरे समान ही सभी मासों का स्वामी होगा कि अब से कोई भी मलमास की निंदा नहीं करेगा मैं इस मास का स्वामी बन गया हूं।
जिस परमधाम गोलोक को पाने के लिए ऋषि तपस्या करते हैं वही दुर्लभ पद पुरुषोत्तम मास में स्नान, पूजन, अनुष्ठान व दान करने वाले को सरलता से प्राप्त हो जाएंगे.इस प्रकार मल मास पुरुषोत्तम मास के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यह मेरे समान ही सभी मासों का स्वामी होगा अब यह जगत को पूज्य व नमस्कार करने योग्य होगा।
यह इसे पूजने वालों के दु:ख-दरिद्रता का नाश करेगा यह मेरे समान ही मनुष्यों को मोक्ष प्रदान करेगा जो कोई इच्छा रहित या इच्छा वाला इसे पूजेगा वह अपने किए कर्मों को भस्म करके नि:संशय मुझ को प्राप्त होगा।
सब साधनों में श्रेष्ठ तथा सब काम व अर्थ का देने वाला यह पुरुषोत्तम मास स्वाध्याय योग्य होगा इस मास में किया गया पुण्य कोटि गुणा होगा जो भी मनुष्य मेरे प्रिय मलमास का तिरस्कार करेंगे और जो धर्म का आचरण नहीं करेंगे, वे सदैव नरक के गामी होंगे अत: इस मास में स्नान, दान, पूजा आदि का विशेष महत्व होगा।
इसलिए हे रमापते! आप पुरुषोत्तम मास को लेकर बैकुण्ठ को जाओ। इस प्रकार बैकुण्ठ में स्थित होकर वह अत्यन्त आनन्द करने लगा तथा भगवान के साथ विभिन्न क्रीड़ाओं में मग्न हो गया।
इस प्रकार श्रीकृष्ण ने मन से प्रसन्न होकर मलमास को बारह मासों में श्रेष्ठ बना दिया तथा वह सभी का पूजनीय बन गया अत: श्रीकृष्ण से वर पाकर इस भूतल पर वह पुरुषोत्तम नाम से विख्यात हुआ।
।। जय पुरुषोत्तम भगवान जय श्री कृष्ण ।।

Post a Comment
Post a Comment