प्रश्न:- पुरूषोत्तम मास, अधिक मास, अधिमास, मलमास किसे कहते हैं ?
उत्तर - भारत वर्श में पांच प्रकार के वर्श या कैलेंण्डर प्रचलित हैं। जिनमें सौर तथा चन्द्र कैलेंडर प्रमुख हैं। इनपर आधारित वर्शो को सौर वर्श या चन्द्रवर्श कहते हैं। इन्हीं सौर वर्ष और चांद्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। इसी को पुरूषोत्तम मास, अधिक मास या अधिमास या मलमास कहते हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2020 में दो अश्विन मास होंगे। इसकी विशेष बात यह रहेगी कि अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से साल के 365 दिन में ही यह तिथियां भी शामिल होंगी।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार हिंदू पंचांग के हिसाब से तीन वर्षों तक तिथियों का क्षय होता है। तिथियों का क्षय होते होते तीसरे वर्ष एक माह बन जाता है। इस वजह से हर तीसरे वर्ष में अधिकमास होता है। वास्तव में यह वह स्थिति है जिस चंद्रमास में सूर्य-संक्रांति नहीं पड़ती, उसी मास को ‘‘अधिक मास’’ की संज्ञा दे दी जाती है। इसके विपरीत जिस चंद्रमास में दो सूर्य संक्रांति का संक्रमण (समावेश) होता है। वह चन्द्रमास ‘‘क्षयमास’’ कहलाता है।
सौर-वर्ष का मान 365 दिन, 15 घड़ी, 22 पल और 57 विपल का होता है। इसके विपरीत जबकि चंद्रवर्ष 354 दिन, 22 घड़ी, 1 पल और 23 विपल का होता है। इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष (हर वर्श) 10 दिन, 53 घटी, 21 पल (अर्थात लगभग 11 दिन) का अन्तर पड़ता है। इस अन्तर में समानता लाने के लिए हर तीसरे वर्श के चंद्रवर्ष 12 मासों के स्थान पर 13 मास का हो जाता है।

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