Bet Dwarka Temple, Gujrat, श्री बेट द्वारकाधीश मंदिर, गुजरात

Bet Dwarka Temple, Gujrat, 
श्री बेट द्वारकाधीश मंदिर, गुजरात

बेट द्वारका:



बेट द्वारका,  द्वारका के मुख्य शहर से लगलग 30 किमी दूर स्थित एक छोटा सा द्वीप है। बेट द्वारका समुद्र के कुछ किलोमीटर अन्दर एक छोटे से द्वीप (Island) पर स्थित है जहाँ पहुँचने के लिए ओखा के समुद्री घाट फेरी से से छोटे जहाज या या स्टीमर युक्त नाव की सहायता से जाना पड़ता है। फेरी से बेट द्वारका पहुँचने में लगभग आधे घंटे का समय लगता है।


इन स्त्री मारो अर्थात नौकाओं के चालक से ऊपर तक भरने का प्रयास करते हैं उनका प्रयास रहता है कि उसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को बैठाया जा सके इस पर लोगों को मिटाने के लिए कोई निश्चित नियम नहीं है इसका प्रत्येक यात्री के आने का और जाने का शुल्क अलग अलग ₹20 का होता है। कभी-कभी तो ऐसा एहसास होता है कि यदि नाव नहीं भरी तो वह उसे लेकर नहीं जाएंगे।


जहां अनंत  गहराई तक फैले समुद्र तथा  दूर-दूर तक फैले हुए समुद्र को देखकर जहां भय का अनुभव होता है। वही समुद्र की लहरों और उनके बीच खेलती हुई मछलियों, कछुओं और पक्षियों आदि को देखकर बहुत ही सुखद एहसास का अनुभव होता है।

दाने की लालच में पक्षियों के झुंड नाव या स्टीमरों के ऊपर उड़ते हुए देखे जाते हैं । कभी-कभी तो ऐसा महसूस होता है कि यह पक्षी अभी पकड़ में आ जाएंगे या हम उन्हें छू लेंगे। लेकिन वह इतने चालाकी से बच निकलते हैं कि हम सोच भी नहीं सकते।  बहुत से पक्षी तो दानों को सागर में गिरने ही नहीं देते वे उन्हें हवा में ही अर्थात आकाश में ही लपक लेते हैं। यह नजारा बहुत ही रोमांचित करने वाला होता है। यह 20 से 30 मिनट का समय कैसे कट जाता है पता ही नहीं चलता।


वैसे तो दाना बेचने वाले इन नाव पर भी आपको मिल जाएंगे। लेकिन अगर हो सके तो आप दानों को नौका पर चढ़ने से पहले ही खरीद लें क्योंकि इन समुद्री पक्षियों की जल अटखेलिया आपका इस प्रकार मनोरंजन करेंगी कि आप कब बेट द्वारिका पहुंच गए आपको पता ही नहीं चलेगा।

उत्तरी भारत में रहने वाले हम लोगों को दक्षिण दिशा के भगवान श्री कृष्ण से संबंधित प्रसिद्ध तीर्थ स्थल पेट द्वारिका में चरण रखने का सुखद एहसास प्राप्त होने वाला था इसलिए हमारे रोमांच की कोई सीमा नहीं थी।

गुजराती भाषा में इसे बेट द्वारिका कहते हैं। बेट शब्द का अर्थ हम लोग भेट से लगाते हैं, अर्थात भेट द्वारिका वास्तव में  वही असली द्वारिका है। जो समुद्र देव ने भगवान कृष्ण को भेज दी थी इसलिए इसको भेट द्वारिका कहा गया और इसी स्थान पर कृष्ण के प्रिय किंतु दरिद्र मित्र सुदामा ने उनसे भेंट की थी और उन्हें चावल भेट में दिए थे इसलिए भी इस स्थान को भेट द्वारिका के नाम से जाना जाता है। क्योंकि वह भेज आज भी संस्मरण में और किंवदंतियों में प्रचलित है। जो भी दर्शन आरती या तीर्थ आरती यहां जाते हैं वह तीन मुट्ठी चावल अवश्य लेकर जाते हैं ताकि भगवान कृष्ण को भेज दे सकें।



श्री केशवराय जी मंदिर बेट द्वारका में भगवान कृष्ण का मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर वल्लभाचार्य द्वारा लगभग 500 वर्षों पहले स्थापित किया गया था।माना जाता है कि द्वारका में अपने सत्तारूढ़ वर्षों के दौरान बेट द्वारका भगवान कृष्ण की वास्तविक आवासीय जगह थीं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बेब द्वारिका के श्री कृष्णा मंदिर में कोई शिखर नहीं है इसकी छत अन्य घरों की तरह सपाट हैं इसका मुख्य कारण यह बताया जाता है कि यह मंदिर न होकर वास्तव में श्रीकृष्ण का निवास स्थान था। वह अपने परिवार के संग यहां विराजते थे। इस मंदिर में भगवान कृष्ण के साथ-साथ उनके परिवार के सदस्यों की भी मंदिर है।

सुदामा कृष्ण की मित्रता लोगों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। निर्धन ब्राह्मण पुत्र सुदामा अवंतिका या उज्जैन स्थित गुरु संदीपनी जी के आश्रम में बाल कृष्ण के सहपाठी थे। एक बार सुदामा और कृष्ण जंगल में लकड़ियां एकत्रित करने के लिए गए किंतु मौसम खराब होने के कारण उन्हें लकड़ियां नहीं मिली, तब एक पेड़ पर कृष्ण को लकड़ियां दिखाई दी । इसी बीच सुदामा को बहुत तेज भूख लगने लगी। गुरु माता ने दोनों बच्चों को खाने के लिए एक एक मुट्ठी अर्थात दो मुट्ठी चावल दिए लेकिन सुदामा ने पहली बार में एक मुट्ठी खाई कि खा लेता हूं कि कृष्ण को पता नहीं चलेगा फिर उन्होंने उसका आधा दूसरी मुट्ठी में खा लिया और बचा हुआ तीसरा भाग तीसरी बारी में खा लिया लेकिन भूख थी कि वह शांत होने का ही नाम नहीं ले रही थी। इस प्रकार सुदामा जी ने गुरु माता दो दो मुट्ठी कच्चे चावल वे एक-एक कर तीन मुट्ठी में खा गए। कहते हैं कि वही तीन मुट्ठी चावल भेट  लेकर अनजाने में ही वे भगवान कृष्ण का भार उतार पाए थे। जो उन्होंने द्वारिका में उन्हें दिया था।

द्वारिका के राजा को कच्चे चावलों की भेंट देते हुए सुदामा जी को बहुत संकोच हो रहा था भगवान कृष्ण जानते थे कि अब उनके अच्छे दिन आने वाले हैं इसलिए उन्होंने सुदामा द्वारा लाए हुए चावलों का एक-एक कर दो मुट्ठी भोग लगा लिया। जैसे ही वे तीसरी मुट्ठी खाने लगे और रुक्मणी ने आकर उन्हें उन्हें आकर रुक्मणी ने रोक लिया और कहा कि इस पर हमारा भी कुछ हक बनता है इस प्रकार कहा जाता है कि उन्होंने दो मुट्ठी चावल में सुदामा को 2 लोगों का पुण्य फल दे दिया जिसके कारण कालांतर में वे धन-धान्य से परिपूर्ण हो गए।

शंखोधार तीर्थ

शंख समुद्र देव के पुत्र थे लेकिन पाताल के असुरों के साथ दोस्ती के कारण उनका व्यवहारी भी उन्हीं के जैसा हो गया और वह शंखासुर के नाम से प्रसिद्ध हुए अपने गुरु संदीपनी के पुत्र को बचाने के लिए कृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक संघ के भीतर निवास करने वाले शंखासुर का वध कियाअर्थात उन्होंने या संघ नामक असुर का उद्धार किया था इसलिए इस नाम का इस स्थान का नाम संघ को धार तीर्थ हो गया दीप द्वारिका में भेटघाट के लगभग 1 किलोमीटर दूर शंख सरोवर नामक पवित्र जलाशय है कहा जाता है कि इसी स्थान पर भगवान श्री कृष्ण ने शंखासुर का वध किया था। कुछ लोगों का मानना है कि इस दीप का आकार शंख के आकार का है, इसलिए इसका नाम शंखोधर दीप है। यदि हम गूगल मानचित्र में देखें तो यह (बेट द्वारका) एक लंबे सी शंख के रूप में दिखाई देता है।

कहा जाता है कि कृष्ण की 16008 रानियां थी। जिनमें से 16000 वे राजकुमारियां थी जिन्हें नरकासुर ने अपहरण करके बंदी बना लिया था और जब भगवान कृष्ण ने नरकासुर का अंत करके उन्हें मुक्ति दिलाई तो उनकी विनती पर भगवान कृष्ण का पानी ग्रहण कर उनका उद्धार किया और उनसे सबसे विवाह किया। तभी से भगवान श्री कृष्ण का एक और नाम नर कान तक भी पड़ा। कहा जाता है कि उन्होंने इन राजकुमारियां को इसी स्थान पर बसाया था जबकि वास्तव में वे गोमती द्वारिका से अपना राज का चलाते थे।

वहां के एक भक्त ने बताया कि इस मंदिर में अपने अंतिम क्षणों में चित्तौड़गढ़ की रानी मीराबाई भी आई थी। मीराबाई भगवान कृष्ण गायन में बहुत अधिक प्रसिद्धि पा चुकी थी। इस कारण जब वे यहां आईं तो उन्होंने मंदिर में श्रीकृष्ण को भोग लगाने की इच्छा व्यक्त की। पंडितों ने यह स्वीकृति उन्हें दे दी, कहते हैं कि वे मंदिर में अंदर तो गई लेकिन बाहर नहीं आई अर्थात इसी मंदिर में विलीन हो गई और कभी बाहर नहीं आई । उनके वस्त्र बाद में प्रेम की प्रतीक मानकर भगवान कृष्ण की प्रतिमा को अर्पित कर दिए गए। आप माने या ना माने लेकिन वे लोग इस कथा को बहुत श्रद्धा के साथ सुनाते हैं।

यहां स्थापित श्री कृष्ण की है प्रतिमा रुकमणी देवी द्वारा बनाई गई प्रतिमा है जो उन्होंने 5000 वर्ष पूर्व तथा भगवान कृष्ण को बिना देखे बनाई थी।

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