1.0 सूर्य देव और उनकी गतियाँ
सूर्य देवता : - सूरज को मूल अण्ड (चेतना शून्य अंण्ड) में विराजमान होने
के कारण इन्हे मार्तण्ड़ भी कहा जाता है। सूर्य देवता मनुष्य, पशु, रेंगने वाले जीव
जन्तु वृक्ष लता आदि जितने भर भी प्राणि हैं। उनका आत्मा है। इस प्रकार हम कह सकते
हैं कि इन सबका जीवन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सूर्य देव की कृपा पर ही
निर्भर है।
आप जानतें कि इन्हे नेत्रेन्द्रियों का स्वामी कहा जाता है। यह एक अविरल
सत्य है कि सूर्य नेत्र (आँखों) का स्वामी है। यदि सूरज न होता तो प्राणी अंधे
होते। अगर विश्व में कहीं भी सूरज अर्थात रोशनी है तो वहाँ नेत्र वाले प्राणी
होंगें। जैसे हम पृथ्वी पर हैं। इसी कारण इन्हे नेत्रेन्द्रियों का स्वामी कहा
जाता है।
सूर्यदेव अंतरिक्ष में विराजते हैं। उत्तरायण होने पर गति मंद पड़ जाती इस
कारण ऋषियों ने इस स्थान को उच्च माना है। उनका मानना है कि उत्तरायण में उनका
स्थान बहुत ऊँचा है। इस स्थान पर आने पर दिन बडे होने लगते है।
जब सूर्यदेव दक्षिणयन मार्ग पर चलते हैं। तब उनकी गति में तीव्रता आ जाती
है। इनका यह स्थान नीचा माना जाता है। इस स्थान पर आने पर दिन छोटे होने लगते हैं।
सूर्यदेव का तीसरा स्थान विषुव कहलाता है। इस स्थान पर उनकी गति में समानता
होती है। इस स्थान पर आने पर दिन रात में विशेष अंतर नहीं होता। यह समय मेष व तुला
राशि का है। जब ये वृषादि पांच राशियों तो दिनमान में वृद्धि होती जाती है तथा
रात्रिमान छोटा होने लगता है। जब वृश्चिक आदि पांच राशियों में चलते हैं तो दिनमान
व रात्रिमान में परिवर्तन इसके विपरीत होता है।
सूर्य देव की तीव्र,
मन्द आदि तीन प्रकार की गतियाँ हैं।
01. जारग्दव (मध्यमार्ग में)
02. ऐरावत गति (उत्तरायण मार्ग पर)
03. वैश्वानर गति (दक्षिणयन मार्ग
पर)
इन प्रत्येक स्थानों पर तीन वीथियाँ हैं। जिनका मार्ग नक्षत्रों के आधार पर
व्यक्त किया गया है। जो निम्न सारणी से स्पश्ट हो जायेगीं।
नक्षत्र
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वीथी का नाम
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मार्ग
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अश्विनी-भरणी-आद्रा
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नाग वीथी
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उत्तरायण
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रोहणि-मृगशिरा-आद्रा
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गजीवथी
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पुष्य-पुर्नवसु-अष्लेशा
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ऐरवती वीथी
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मघा-पूर्वी फाल्गुनी-उत्तरफाल्गुनी
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आर्षभी वीथी
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मध्यमार्ग
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हस्त-चित्रा-स्वाती
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गौ वीथी
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विशाखा-अनुराधा-ज्येष्ठा
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जारद्गवी वीथी
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मूल-पूर्वाषाढ़-उत्तराषाढ़
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अज वीथी
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दक्षिणायण
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हस्त-चित्रा-स्वाती
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मृग वीथी
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पूर्वाभाद्रपद-उत्तरभाद्रपद-रेवती
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वेश्वनरी वीथी।
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जब सूर्य का रथ उत्तरायण मार्ग
पर होता है तो ध्रुव रथ के दोंनों पहियों को पवन रूपी पाश में बाँधकर खींचते हैं।
इस गति को आरोहण गति कहते हैं क्योंकि यह ध्रुव की ओर बढ़ता है। (अर्थात बढ़ता
प्रतीत होती है।) इस समय आरोहरण करने अर्थात चढ़ाव के कारण गतिमन्द हो जाती है।
परिणाम स्वरूप दिन बढ़ने लगते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं। इस समय सूर्य देव
का रथ सूर्य मंडल के भीतर की ओर गति करता है। इसे सौम्यान का क्रम बताया गया है।
इस समय का रथ मंडल के भीतर की ओर गति करता हुआ दिखाई देता है।
जब सूर्यदेव दक्षिणयन मार्ग पर पाश द्वारा खींचा जाता है तो उसे अवरोहण गति
कहते हैं। इस समय गति मंडल से बाहर की ओर होती है। इस कारण रथ सूर्य मंडल से बाहर
को आता हुआ दिखाई देता है। अवरोहण के कारण इनकी गति में तीव्रता आ जाती है। उतरने
के कारण सूर्य देव की चाल बहुत तेज होती है। इस समय दिन मान में कमी तथा रात्रिमान
में वृद्धि होती है। इस कारण सूर्य देव के रथ के इस स्थान पर आने पर दिन छोटे होने
लगते हैं। इनका यह स्थान नीचा माना जाता है।
विषुव मार्ग पर सूर्य देव का पाश किसी भी और नहीं खींचा जाता इसलिए इनकी
गति सम रहती है। इस समय सूर्य देव का स्थान मंडल के भीतर माना जाता है। इसकारण
दिनरात के मान में ज्यादा अंतर नहीं आता। इस प्रकार सूर्यदेव का तीसरा यह स्थान विषुव
कहलाता है। इस स्थान पर उनकी गति में समानता होती है। इस स्थान पर आने पर दिन रात
में विशेष अंतर नहीं होता।
यह समय मेष व तुला राशि का है। जब ये वृषदि पांच राशियों तो दिनमान में
वृद्धि होती जाती है तथा रात्रिमान छोटा होने लगता है। जब वृश्चिक आदि पांच राशियों
में चलते हैं तो दिनमान व रात्रिमान में परिवर्तन इसके विपरीत होता है।
इस प्रकार ध्रुव की आज्ञा से पवन और पाष दोनों मिलकर सूर्य के रथ को खींचते
हैं। तो वे आगे नहीं जा पाते तथा भीतर के मंडलों में ही चक्कर लगाते रहते हैं। जब
ध्रुव इन्हे पाश से मुक्त कर देता है तो बाहर के मंडलों की ओर गति करने लगते हैं।
यहाँ हमें यह समझ लेना चाहिए कि पाष गुरूत्वाकषर्ण हैं तो पवन आकाशीय गति है।
सूर्य इन्द्र की पुरी अर्थात देवधानी में उदय होते हैं। संयमनी में पहुँचने
पर दोपहर तथा निम्न लोचनी में सायं तथा विभावरी पुरी में आधी रात होती है। इस प्रकार उपराक्त जानकारी से पता चलता है कि देवधानी पुरी पूरब दिशा में दिशा
में, वरूणपुरी पश्चिम दिशा में स्थित है। सूर्य का रथ
सुमेरू को बाएं करके चलता है परंतु प्रवह वायु की प्रेरणा से वह दक्षिण की ओर मुड़
जाता है। संपूर्ण द्वीप व वर्ष सुमेरूगिरि के उत्तर में हैं। जहाँ सूर्य का उदय
दिखाई देता है। सूर्य को ही समय तथा मार्ग का प्रदर्शक माना गया है। इन्द्रपुरी से
संयमनी पुरी तक का 12 लाख 75 हजार योजन का
मार्ग सूर्य को केवल 15 घड़ी में पूरा करना पडता है।
सूर्य को काल-चक्रात्मा एवं द्युमणि कहते हैं। इसके भ्रमण से समय का
जानकारी होती है। सूर्य को त्रयीमया भी कहा जाता है। इनका रथ एक मुहुर्त में 34,00,800
योजन का चक्कर काटता है। प्रवह नाम की वायु सूर्य देव के रथ के चक्के को सदा घुमाया करती है। सूर्य
देव के रथ का एक चक्का एक संवत्सर रूप है। विद्वानों का कहना है कि इसके बारह अरे, तीन धुरी तथा छः अवनियों से संपन्न है।
इस धुरी का एक शिरा सुमेरू पर्वत के शिखर पर तथा दूसरा मानसोत्तर पर्वत पर
है। सूर्य के रथ का पहिया इस प्रकार चक्कर काटता है मानों तेल पैरने का यन्त्र
चक्कर काट रहा है। इसकी तीसरी धुरी चार गुने परिमाण में है तथा ध्रुवलोक तक जाती
है। और तेल पैरने के यंत्र की तरह घूमती रहती है।
सूर्य के बैठने का स्थान 36 लाख योजन लम्बा तथा 9 लाख योजन चौडा है। यह
सूर्य के रथ का परिमाण है। अरूण इस रथ के सारथी हैं और गरूड़ इनके बड़े भाई हैं। ये नौ करोड़ 50 लाख योजन पृथ्वी में नित्य भ्रमण करते हैं। प्रतिक्षण दो
हजार योजन पार कर जाना इनकी गति का नियम है। सूर्य देव की गति पृथ्वी लोक तथा द्युलोक
के मध्य भाग में है।


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