रामेशवरम यात्रा में 22 कूओं का स्नान

रामेशवरम यात्रा में 22 कूओं का स्नान





तीर्थम 

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अग्नि तीर्थम 
मंदिर के पूर्व द्वार के आगे समुद्र को ही कहते हैं।
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अगस्त्य  तीर्थम 
वापी समुद्र तट के निकट ही स्थित है।
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महालक्ष्मी तीर्थम 
1. महालक्ष्मी तीर्थम में स्नानोपरान्त धर्मराज इन्द्र ने दिग्विजय अभियान हेतु राजसूय यज्ञ कर शक्ति और वैभव प्राप्त किया। बाद में अप्सरा रम्भा से पाणिग्रहण भी किया था। यहां मोती का दान करना श्रेयस्कर माना गया है।
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सावित्री तीर्थम 
2. सावित्री, 3. सरस्वती और 4. गायत्री तीर्थों के नामकरण एक ही कूप में पृथक-पृथक स्वाद और ऊष्णता के आधार पर विभक्त जलराशि के कारण हुआ है। इस त्रिवेणी तीर्थ पर स्नान से ईष्ट सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। यहां हल्दी कुमकुम का दान करना उचित माना गया है। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के स्वयं ही सुन्दर स्त्री पर मोहित होने के कृत्य से विचलित शिव जी द्वारा ब्रह्मा का वध कर दिया। ब्रह्मा मृगशीर्ष नक्षत्र के रूप में स्थित होने से व्यथित उनकी तीनों पत्नियों ने गंधमादन पर्वत पर एक सरोवर का निर्माण कर अन्न जल त्यागकर, प्रतिदिन तीन बार स्नान व पंचाक्षर मंत्र का जाप करने से द्रवित शिवजी ने ब्रह्मा को पुर्नजीवित किया।
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सरस्वती तीर्थम 
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गायत्री  तीर्थम 
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सेतुमाधव तीर्थम 
5. सेतुमाधव तीर्थ अन्तिम प्राकारम् में छोटे सरोवर की भांति दिखता है। चन्द्रवंश के पांडया राजा पुण्यनिधि व रानी विद्यावती द्वारा महाविष्णु को तृप्त करने के लिए यज्ञ प्रारम्भ किया। उनकी परीक्षा लेने के लिए विष्णुजी ने महालक्ष्मी को भूलोक भेजा। लक्ष्मीजी ने उनके कन्या रूप में जन्म लिया। राजा रानी राजप्रसाद में कन्या का लालन-पालन करने लगे। एक दिन महाविष्णु पारंपरिक ब्राह्मण का वेष धरकर नंदनवन में खेल रही राजकन्या का हाथ पकड़ने को उद्यत हुए तो राजा ने ब्राह्मण की ध्रष्टता पर क्रोधित हो उसे जंजीरों से बंधवाकर रामेश्वरम मंदिर में कैद कर लिया। रात को स्वप्न में महाविष्णु द्वारा भक्ति की परीक्षा का रहस्योद्घाटन किया तो राजा आत्मग्लानि से भर जाते हैं। यहां विष्णु द्रोह, विष्णु शाप से मुक्ति व बैकुंठ की प्राप्ति होती है। यहां शाली ग्राम दान करना श्रेष्ठ माना गया
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ब्रम्हहत्ती विमोचन तीर्थम  
6. ब्रम्हहत्ती विमोचन तीर्थ द्वितीय परिक्रमा मार्ग में स्थित है। प्रभु राम ने ब्रम्ह हत्या दोष निवारण के लिए जिस तीर्थ की स्थापना की वह यही है। यहां दुष्ट ग्रहों के दोष से मुक्ति और बिल्ली शून्यदोष से छुटकारा मिलता है। यहां जमीन दान की मान्यता है, जो वर्तमान में असंभव कार्य है।
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नल, नलाड़ी तीर्थम 
सेतु माधव मंदिर के पास ही में  7. नल या नलाड़ी, 8. नील, 9. कवय (गवय), 10. कवाक्ष (गवाक्ष) और 11. गंधमादन तीर्थम्  में स्नानम् से पाप विमोचन और दीर्घ समय के लिए बल की प्राप्ति होती है। यहां हाथी व गाय का दान अत्युत्तम माना गया है।
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नील तीर्थम 
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कवय तीर्थम  
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कवाक्ष तीर्थम 
11
गन्धमादन  तीर्थम 
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चक्र तीर्थम 
ऋषि पुत्तिनायर गंधमादन पर्वत पर यज्ञरत् थे। भयाक्रान्त असुरों ने सामिष पदार्थो (मदिरा, रक्त इत्यादि) को आकाश से अग्नि कुण्ड में गिराकर यज्ञ भंग कर दिया। व्यथित ऋषि ने महाविष्णु से प्रार्थना की तो उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से राक्षसों का सर्वनाश कर दिया। ऋषि की अनुशंसा पर चक्र के एक भाग की इसी तीर्थ में स्थापना हुई है। यह तीर्थ 12. चक्र तीर्थम  कहलाया। यहां मूंगा दान की परंपरा है।
कुष्ठ रोग तथा विकलांगता से निवृत्ति इस तीर्थ में स्नान से ही संभव है। इस तीर्थ में भौतिक सत्ता को विगलित, रूपान्तरित, और प्रवाहमयी बनाने की अद्भुत शक्ति है।
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शंख  तीर्थम 
यहीं तपोनर शंकर के नामानुरूप जिस तीर्थ की स्थापना हुई है, वह 13. शंख तीर्थ है। यहां सर्व दोष निवारण होता है। शंख दान करना यहां फलदायक माना गया है।
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साद्यामृत तीर्थम 
मंदिर के अम्मन संन्निधि प्रक्षेत्र में 14. साद्यामृत तीर्थ  की कथा इन्द्र की सभा व अप्सरा उर्वशी से जुड़ी है। अप्सरा मित्रवर्ण गंधर्व के श्राप के कारण भूलोक में चक्रवर्ती राजा बुरूरनुर के नंदनवन में अवतरित हुई। राजा बुरूरनुर रूपश्री उवर्शी के सौंदर्य पर मोहित हो गये। उधर देवलोक में इंद्र ने विश्वासु नामक गंधर्व को उर्वशी की खोज में भेजा। उर्वशी उनके साथ देव लोक आ गई। उर्वशी के देवलोक गमन से चिन्तातुर राजा ने उर्वशी की खोज के लिए पुर्नागमन यज्ञ किया। जिसके फलस्वरूप उन्हें इन्द्र के प्रेक्षाग्रह में नृत्याचार्य तुम्बुरू महर्षि के निर्देशन में नृत्यरत् अप्सराओं के प्रदर्शन को देखने सुअवसर मिला। उर्वशी राजा बुरूरनुर को वहां पाकर नृत्य प्रदर्शन में त्रुटि कर बैठी। इससे कुपित ऋषि तुम्बुरू ने उन दोनों को श्राप दे दिया। चिंतित राजा ने देवेन्द्र से श्रापमुक्ति की याचना की। इस पर इन्द्र ने इस तीर्थ में स्नान और शास्त्रोक्त दान धर्म का उपदेश किया। इस तीर्थ में स्नान और शास्त्रोक्त दान धर्म के पश्चात् राजा बुरूरनुर और उर्वशी भूलोक में साथ रहने लगे।
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सक्कार तीर्थम  
ऐसा माना जाती है कि 15. सक्कार तीर्थ  में स्नान से त्रिकाल ज्ञान की प्राप्ति होती है।
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सर्व तीर्थम  
श्री रामनाथ स्वामी संन्निधि के समक्ष स्थित 16. सर्व तीर्थ के जल से स्नान किया जाता है। ऋषि सुदर्शना ने अपने अंधत्व और व्याधियों के निवारणार्थ यहां स्नान ध्यान किया था।
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गया तीर्थम 
17. गया, 18. गंगा और 19. यमुना तीर्थों  से स्नान हमें ईश्वरीय शक्ति से साक्षात्कार की अनुभूति कर पा रहे थे।
तपोनर महर्षि रायकवार के दोनों पांव नहीं थे। कष्ट मुक्ति और आत्मिक शांति के लिए चारों ओर अग्नि प्रज्जवलित कर, सूर्य को सामने रखकर उन्होंने गंधमादन पर्वत के नीचे कठिन तपस्या की। भगवान शिव ने उनके स्नान के लिए गया, गंगा और यमुना को एक साथ पृथ्वी लोक में अवतरित किया। भूमि फाड़ कर आये जल में स्नान से उन्हें शिवमोक्ष की प्राप्ति हुई। यहां स्वर्णदान, शहद, गन्ना, गुड़, वस्त्रादि दान का महत्व है। 
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गंगा तीर्थम 
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यमुना तीर्थम  
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सूर्य तीर्थम 
20. सूर्य और 21. चन्द्र तीर्थ की उत्पत्ती श्री रामचन्द्र जी द्वारा दिन और रात के आधिपति सूर्य और चन्द्र के सेतु माधव में वास करने की कामना से हुई है।  यह तीर्थ मंदिर के भीतरी प्रकारम् में  20. सूर्य और 21. चन्द्र तीर्थ  स्थित है। तीर्थ के जल से त्वचा संबंधी रोगों से निवृत्ति होती है। सूर्य और चन्द्र के तीर्थ में नवधान्य के दान का महात्म्य है।
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चन्द्र तीर्थम 
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कोटि तीर्थम 
श्री कृष्ण के कंस वध मातुलहत्या दोष से मुक्ति प्रदाता कोटि तीर्थम का जल भीतर और बाहर के सभी दोषों को पूर्णरूप से शुद्ध कर देता है। यह प्रथम प्राकारम् में स्थित है।



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