मैं अल्कोहल बोल रहा हूं
जो था कभी संतों का देश
आज के उसी बेवड़ों के देश से बोल रहा हूं।
स्वागत करो मेरा, मैं अल्कोहल
बोल रहा हूं।
लॉक डाउन के चलते अर्थव्यवस्था जो जमीन दोज हो रही थी
उस जमीनदोज होती अर्थव्यवस्था में
मैं अमृत घोल रहा हूं।
स्वागत करो मेरा मैं अल्कोहल
बोल रहा हूं।
मुझे फिक्र नहीं कि मरे पीने वाला या उसका परिवार।
बस मेरे लिए तो हमेशा खुला रहे मैखाने का द्वार
आज मैं उसी मैखाने के द्वार से बोल रहा हूं।
स्वागत करो मेरा मैं अल्कोहल बोल रहा हूं।
मेरे बिना कोई राजा नहीं होता
और मेरे पीने के बाद कोई रंक नहीं होता
आज मैं सही बात सबके सामने खोल रहा हूं।
स्वागत करो मेरा मैं अल्कोहल बोल रहा हूं।
मेरी ताकत का तुम क्या अंदाजा लगाओगे ।
घी, खाते, दूध पीते और कसरत पेलते रह जाओगे।
क्योंकि मैं तो बस अपना एक पव्वा खोल रहा हूं
स्वागत करो करो मेरा मैं अल्कोहल
बोल रहा हूं।
थोड़ी सी संतों की आदत तो मुझ में भी आ गई है ।
संतो के देश में रहने की फितरत जो आ गई है ।
तुम लाख लडाओ धर्म के नाम पर ।
पर मैं अल्कोहल के नामों पर उन में प्यार बोलता जा रहा हूं।
स्वागत करो करो मेरा मैं अल्कोहल
बोल रहा हूं।
ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
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