सास बहू का मंदिर

सास बहू का मंदिर

मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में ग्वालियर के किले में स्थित है सास बहू का मंदिर । यह किला जिस पहाड़ी पर स्थित है उसे गोपांचल पहाडी के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर लगभग 3 वर्ग किलोमीटर में फैला है और मध्यकालीन स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है।

गोपांचल पहाड़ के किनारे पर 6 मीनारों से जोड़कर 35  फीट ऊंची बहुत ही सुंदर इमारत बनाई गई। वैसे तो इस किले पर निर्माण आठवीं सदी में ही शुरू हो चुका था विभिन्न राजवंशों का इस पर अधिकार रहा और सभी ने अपने अपने समय पर नए नए भवनों का निर्माण कराया। राजा मानसिंह ने मानसिंह महल तथा अपनी प्रेयसी मृगनयनी के प्रति अमर प्रेम का प्रतीक गुजरी महल बनाया गया।

सास बहू का मंदिर एक नए हो कर दो मंदिरों का समूह है इसमें एक मंदिर बड़ा तथा दूसरा छोटा है। इन मंदिरों का निर्माण पूर्ण विकसित मंदिरों के रूप में हुआ है। जिसमें गर्भ गृह, अंतराल तथा महामंडप शामिल हैं। इसमें दो अर्थ मंडप भी हैं, जो उत्तर और दक्षिण दिशा में स्थित हैं।

परंतु सास बहू के मंदिर का इतिहास 11 वीं सदी के आसपास ठहरता है। पुरातत्व विद्वानों के अनुसार सास बहू का निर्माण कछवाहा या कच्छप वंश के राजा महिपाल ने 11 वीं सदी में कराया था । राजा महिपाल की रानी अनन्य विष्णु भक्त थी और उन्होंने पत्नी की इच्छा के अनुसार भगवान विष्णु के एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया था। जिसे वर्तमान में सास मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसे बनने में लगभग 20 वर्ष लगे थे और यह 1093 में बनकर तैयार हुआ था। 

कुछ पुरातत्व विद्वानों का कहना है कि यह भगवान विष्णु का मंदिर है । भगवान विष्णु को सहस्रबाहु भी कहते हैं। इसलिए इसका नाम सहस्रबाहु मंदिर था, जो बाद में भाषा विकृति के कारण सास बहू के मंदिर में बदल गया।

कालांतर में महिपाल के पुत्र का विवाह हुआ। उसकी पत्नी बहुत बड़ी शिव भक्त थी। उन्होंने भगवान विष्णु के मंदिर में आराधना करने से मना कर दिया तो उनके लिए दूसरे मंदिर का निर्माण कराया गया अतः यह मंदिर शिव मंदिर था । जिसमें बहु शिव आराधना करती थी क्योंकि यह मंदिर बहू के लिए बना था, इसलिए इसे बहू का मंदिर कहा जाने लगा।

यह कहानी या किवदंती आप पूरे ग्वालियर में और उसके आसपास के क्षेत्र में सुन सकते हैं। जैसे कि हमने बताया कि बड़ा मंदिर विष्णु मंदिर था, जिसे सहस्रबाहु मंदिर के नाम से जाना जाता था और सास बहू का अपभ्रंश सास बहू हो गया जो प्रचलित और इतना लोकप्रिय हो गया कि जनमानस में यह कहानी और मंदिर सास और बहू के लिए प्रसिद्ध हो गया।

दोनों मंदिर वास्तु कला में अत्यंत सुंदर है। इनकी बाहरी दीवारों पर बनी कलाकृतियां आज भी मनोहर लगती हैं। जबकि इस मंदिर की मूर्तियां भग्न अवस्था में है । सास का मंदिर अर्थात विष्णु मंदिर बड़ा है तथा 30 मीटर ऊंचे और 19 मीटर चौड़े चबूतरे पर खड़ा है । मंदिर का आकार चोकर है यह मंदिर 3 मंजिला है। ऊपर और तीन दिशाओं में तीन द्वार हैं चौथी दिशा एक कमरा बना कर बंद कर दी गई है। मंदिर की दीवारों पर सुंदर मूर्तियां विष्णु, शिव, सरस्वती आदि गणों की मूर्तियां हैं, जो तत्कालीन वैष्णव और शक्ति संप्रदाय की द्योतक है।

सास के मंदिर से ही बहू के मंदिर का बहुत ही सुंदर दृश्य देखने के लिए मिलता है। बहू मंदिर का चबूतरा छोटा है इसका मंडप 12 स्तंभों पर टिका है और मंदिर में जाने के लिए कई दरवाजे हैं । गर्भ गृह में विष्णु की मूर्ति है जिसमें एक और हाथ में वेद पकड़े ब्रह्मा और दूसरी ओर त्रिशूलधारी शिव हैं। सभी मूर्तियां खंडित आवस्था में होने के कारण अभी इन मंदिरों में पूजा नहीं होती।

मुस्लिम और मुगल आक्रमण के दौरान खासकर औरंगजेब के समय इन मंदिरों का बहुत नुकसान किया गया। इनका रूप बदल दिया गया और यहां मदरसा चलाया गया । सोलवीं सदी से 19वीं सदी तक यह मंदिर जीर्ण अवस्था में खड़े रहे । 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद ग्वालियर का किला अंग्रेजो के कब्जे में आ गया , और 1881 में दो अंग्रेज पुरातत्वविदो ने 12 वर्ष के अथक प्रयास में इसकी प्लास्टर निकालकर इसे इसका वर्तमान और असली रूप दिया । 

वर्तमान में इसकी देखरेख और पूरा रखरखाव की व्यवस्था पर्यटन विभाग करता है। इसे हम कुछ भी कहे सहस्रबाहु मंदिर कहें या सास बहू का मंदिर परंतु यह  हमारे लिए एक अमूल्य धरोहर है, जिसे हमें संजो कर रखना है । यह एक ओर जहां कला, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक महत्व का प्रतीक है। वहीं दूसरी ओर इनका नाम सास और बहू जैसे महत्वपूर्ण रिश्तो की मर्यादा को भी बताता है। 
https://youtu.be/-xCzjgPx05M

कुछ भी हो अगर आप ग्वालियर जाए तो सहस्रबाहु मंदिर अर्थात सास बहू के इस मंदिर को देखना नहीं भूले।
आपका 
ॐ जितेंद्र सिंह तोमर

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