सत्यम शिवम सुंदरम।
ईश्वर सत्य है, सत्य ही शिव है, शिव ही सुन्दर है।
श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग
नागेश्वर शब्द का अर्थ है, नागों के भगवान। अर्थात जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है कि नागेश्वर ज्योतिर्लिंग 'नागों की ईश्वर' या अर्थात भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग है। कहते हैं कि भगवाननन शिव के आदेशानुसार ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर पड़ा।
यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे
शास्त्रों में नागेश्वर धाम की उत्पत्ति की कथा सुनने की बड़ी महिमा बताई गई है। कहा जाता है कि जो शिव भक्त श्रद्धापूर्वक यह कथा सुनता है । वह सब पापों से मुक्ति पाकर, भगवान शिव के दिव्य शिवलोक को गमन करता है।
यह मंदिर विष और विष से संबंधित रोगों से मुक्ति पाने का केंद्र माना जाता है।
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने।
एतद् यः श्रृणुयान्नित्यं नागेशोद्भवमादरात्।
सर्वान् कामानियाद् धीमान् महापातकनाशनम्॥
यह गुजरात के द्वारका धाम से 17 किलोमीटर दूर स्थित बाहरी क्षेत्र में स्थित है।
रुद्र संहिता में इन भगवान को दारुकावने नागेशं कहा गया है। हमें भी नागेश्वर जी के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जब हम द्वारकाधीश जी की यात्रा यात्रा्रा पर थे।
कुछ लोगों का मानना है कि यह ज्योतिर्लिंग, उत्तराखण्ड में अल्मोड़ा के निकट जागेश्वर शिवलिंग ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है। कुछ का मानना है कि यह आंध्र प्रदेश के गुना जिले में स्थित है।
हम आपको बता दें कि द्वारकाधीश से ही बसे चलती है जो हमें आसपास के कुछ मंदिरों के दर्शन कराती हैं। जिनमें रुकमणी मंदिर गोपी तलाव, भेट द्वारिका के बाद नागेश्वर मंदिर हैं आप अगर द्वारिका जाते हैं तो इसे अवश्य देखें । परंतु बसें यहां कुछ ही समय के लिए रुकती हैं यदि आपको पूजा पाठ के लिए जाना है तो द्वारिका से सीधे नागेश्वर के लिए ऑटो भी कर सकते हैं । जो आपको आधा से 1 घंटे के भीतर आपको नागेश्वर मंदिर पहुंचा देगा।
दर्शन का समय
समय - Timings
6:00 AM - 12:30 PM,
5:00 PM - 9:30 PM
त्यौहार
यहां के प्रमुख त्यौहार है शिवरात्रि, श्रावण मास, गोलोक धाम उत्सव, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, सोमनाथ स्थापना दिवस आदि।
नागेश्वर शिवलिंग त्रि-मुखी रूद्राक्ष रूपी गोल काले पत्थर वाले के रूप में स्थापित है, शिवलिंग के साथ उनके पीछे देवी पार्वती की भी की मूर्ति भी स्थापित है वहां उनकी उपासना की जा सकती है।
मंदिर का पौराणिक महत्व माना जाता है कि भगवान कृष्ण भी रुद्राभिषेक द्वारा भगवान शिव की आराधना किया करते थे। और बाद में आदि गुरु शंकराचार्य ने कलिका पीठ पर अपने पश्चिमी मठ की स्थापना की।
श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग
उत्पत्ति पौराणिक कथा
दारूका नाम की एक प्रसिद्ध राक्षसी थी, उसने अपने तपस्या से माता पार्वती को बहुत खुश कर दर्शन प्राप्त किये तो माता पार्वती जी ने उससे वरदान मांगने के लिए कहा। इस पर दरूका ने अपने पति व अपने साथियों के साथ कहीं भी आने-जाने का वरदान प्राप्त कर लिया।
एक बार भी उड़ते हुए पश्चिमी समुद्र तट की तरफ से गुजरे तो उन्होंने देखा कि पश्चिम समुद्र तट के किनारे सोलह योजन विस्तार का एक वन है, वह वन सभी प्रकार की सुख संम्पदाओं भरपूर है।
जिसके कारण दारुक ने इस स्थान को अपना निवास स्थान बना लिया। इस प्रकार वह दारूका के साथ इस वन में निवास करने लगा।
एक तरफ जहां दारूका ने अपनी तपस्या के बल पर पार्वती जी से वरदान प्राप्त क्या वहीं दूसरी ओर उसका पति दरुक महान् बलशाली और शिव-द्रोही राक्षस था।
वह अपनी प्रवृत्ति के कारण वह यज्ञ आदि शुभ कर्मों को नष्ट कर, सन्त-महात्माओं का संहार कर प्रसिद्ध धर्मनाशक राक्षस बन बैठा। उसकी क्रूरता के कारण ही इस वन का नाम दारूक वन पड़ गया।
इसी समय में यहां सुप्रिय नमक वैश्य रहता था। वह एक बहुत बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी व भगवान् शिव का अनन्य भक्त था। वह अपने सारे कार्य वह भगवान् शिव को अर्पित कर मन, वचन, कर्म से वह पूर्णतः शिवार्चन में ही तल्लीन रहकर निरन्तर उनकी आराधना, पूजन और ध्यान में लगा रहता था।
दारुक नामक राक्षस शिव भक्तों से बहुत क्रुद्व रहता था। उसे भगवान् शिव की पूजा अच्छी नहीं लगती थी। इसलिए वह शिव भक्तों को हमेशा परेशाान करता रहता था।
वह निरन्तर सुप्रिय की पूजा-अर्चना में विघ्न पहुंचाने का प्रयत्न करता था। एक बार सुप्रिय नौका पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। उस दुष्ट राक्षस दारुक ने यह उपयुक्त अवसर पा उसकी नौका पर आक्रमण कर नौका में सवार सभी यात्रियों का अपहरण कर उन्हें अपनी राजधानी में ले जाकर कैद कर लिया।
सुप्रिय कारागार में भी अपने नित्यनियम के अनुसार भगवान् शिव की पूजा-आराधना में लगे रहे। बंदी गृह में रहकर भी परेशानियों को सहते हुए सुप्रिया अन्य बंदी यात्रियों को भी शिव भक्ति की प्रेरणा देने लगा।
दारुक ने जब अपने सेवकों से सुप्रिय के इस कृत्य के बारे में सुना। तो वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस कारागर में आ पहुँचा। उस समय सुप्रिय भगवान् शिव के चरणों में ध्यान लगाए थे।
दारूक ने अत्यन्त भीषण स्वर में उसे डाँटते हुए कहा- ‘अरे दुष्ट वैश्य! तू आँखें बंद कर इस समय यहाँ कौन- से उपद्रव और षड्यन्त्र करने की बातें सोच रहा है?’
उसके यह कहने पर भी धर्मात्मा शिवभक्त
सुप्रिय की समाधि भंग नहीं हुई। वे अपने ईस्ट के ध्यान में संलग्न रहे, इस पर दारुक क्रोध से पागल हो उठा।
उसने तत्काल अपने अनुचरों को सुप्रिय सहित सभी बंदियों को मार डालने का आदेश
दे दिया। इस आदेश पर भी सुप्रिय जरा भी विचलित और भयभीत नहीं हुआ।
वह एकाग्र मन से अपनी और अन्य बंदियों की मुक्ति के लिए भगवान् शिव से प्रार्थना करता रहा। उसे अपने आराध्य भगवान् शिवजी पर पूर्ण विश्वास था कि वे इस राक्षस का अंत अवश्य करेंगे।
अपने भक्तों को संकट में देख भगवान शंकर तत्क्षण उस कारागार में एक ऊंचे स्थान पर एक चमकते हुए ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए। उन्होंने सुप्रिय को दर्शन देकर उसे अपना पाशुपत-अस्त्र प्रदान किया। इसी पाशुपत-अस्त्र से राक्षस दारुक तथा उसके सहायक का वध करके सुप्रिय भगवान शिव के धाम को चला गया।
भगवान शिव की ध्यान मुद्रा में बनी यह बड़ी मनमोहक व अति विशाल प्रतिमा लगभग दो किलोमीटर की दुरी से ही दिखाई देने लगती है, यह मूर्ति 125 फीट ऊँची तथा 25 फीट चौड़ी है।
यहाँ के मंदिर परिसर में भगवान शिव की पद्मासन मुद्रा में मंदिर की चोटी जितनी ही ऊंची विशालकाय मूर्ति भी स्थित है। जो दूर से ही दिखाई दे जाती है और यहाँ का मुख्य आकर्षण है।
मूर्तियों के पास ही एक कबूतर घर भी बना हुआ है इस कारण इस मूर्ति के आसपास पक्षियों का झुण्ड मंडराते रहता है तथा भक्तगण यहाँ पक्षियों के लिए अन्न के दाने भी डालते देखे जा सकते हैं।
भगवान नागेश्वर की ज्योतिर्लिंग के दर्शन आपको ऊपर से ही करने होंगे और भी बिल्कुल मुफ्त है अंदर गर्भ ग्रह में जाने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों को होती है जो उनका रुद्राभिषेक करते हैं और रुद्राभिषेक के लिए एक फीस रखी गई है जो लगभग ₹250 हैं।
मंदिर के नियमों के अनुसार गर्भगृह में प्रवेश से पूर्व भक्त को अपने वस्त्र उतार कर धोती धारण करनी होती है। उसके बाद ही गर्भगृह में प्रवेश किया जा सकता है।
नागेश्वर मंदिर:
नागेश्वर के वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण, सूपर केसेट्स इंडस्ट्री के मालिक स्वर्गीय श्री गुलशन कुमार जी ने करवाया था। उन्होंने इस जीर्णोद्धार का कार्य 1996 में शुरू करवाया, तथा इस बीच उनकी हत्या हो जाने के कारण उनके परिवार ने इस मंदिर का कार्य पूर्ण करवाया। मंदिर निर्माण में लगभग 1.25 करोड़ की लागत आई जिसे गुलशन कुमार चेरिटेबल ट्रस्ट ने अदा किया।
मुख्य प्रवेश द्वार साधारण लेकिन सुन्दर है। मंदिर में एक सभाग्रह है, जहाँ पूजन सामग्री और धार्मिक पुस्तक है वह मूर्ति आदि की छोटी छोटी दुकानें लगी हुई हैं। सभामंड़प के आगे तलघर नुमा या बेसमेंट जैसे गर्भगृह में श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित है।
विशाल शिव
प्रतिमा
नागेश्वर
मंदिर.
गर्भगृह:
गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग स्थापित है जिसके ऊपर एक चांदी का आवरण चढ़ा रहता है। ज्योतिर्लिंग पर ही एक चांदी के पंचमुखी नाग की आकृति बनी हुई है। गर्भ ग्रह में ही ज्योतिर्लिंग के पीछे माता पार्वती की मूर्ति स्थापित है। गर्भगृह में पुरुष भक्त सिर्फ धोती पहन कर ही प्रवेश कर सकते हैं, वह भी तभी जब उन्हें अभिषेक करवाना है।
मंदिर समय सारणी:
मंदिर सुबह पांच बजे प्रातः आरती के साथ खुलता है, जबकि यह मंदिर आम जनता के लिए मंदिर छः बजे सुबह खुलता है । और दोपहर 12:00 बजे बंद हो जाता है।
उसके बाद मंदिर को भक्तों के लिए शाम चार बजे श्रृंगार दर्शन होता है तथा उसके बाद गर्भगृह में प्रवेश बंद हो जाता है. शयन आरती शाम सात बजे होती है तथा रात नौ बजे मंदिर बंद हो जाता है।
विभिन्न पूजाएँ:
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में मंदिर प्रबंधन समिति के द्वारा भक्तों की सुविधा के लिए रु. 101 से लेकर रु. 2101 के बीच विभिन्न प्रकार की पूजाएँ सशुल्क सम्पन्न कराई जाती हैं। भक्त अपनी पसंद के अनुसार पूजा चुन सकते हैं। जिन भक्तों को पूजन या अभिषेक करवाना होता है, उन्हें मंदिर के पूजा काउंटर पर शुल्क जमा करवाकर रसीद प्राप्त करनी होती है, तत्पश्चात मंदिर समिति भक्त के साथ एक पुरोहित को पूजा व अभिषेक के लिए भेजती है । जो भक्त को लेकर गर्भगृह में लेकर जाता है तथा तथा भक्तों के द्वारा दिए गए शुल्क के अनुसार पूजा करवाता है।
रहने की व्यवस्था तथा परिवहन:
हम आपको बता दें कि नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर ओखा तथा द्वारका के बीचोबीच वीरान एवं सुनसान जगह पर स्थित है। वीरान जगह पर स्थित होने की वजह से यहाँ ठहरने की कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है, अतः हम यात्रियों को सलाह देते हैं कि वे द्वारका या ओखा में ही ठहरें।
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