हरित गृह प्रभाव यि ग्रीनहाउस इफेक्ट

प्रश्न 84 : हरित गृह प्रभाव को समझाइये।

उत्तर- सुख-सुविधा भोगने के लालच में जैसे-जैसे मानव प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करके नये-नये पदार्थ प्रकृति में मुक्त करता जाता है, या प्रकृति से उपयोग करके उन्हें नष्ट करता जाता है। इस प्रकार प्रकृति क्षत-विक्षत होती जाती है। वर्तमान में स्थिति यह हो गई है कि मनुष्य के कार्यकलाप स्वयं उसके अस्तित्व के लिए ही खतरा बन गये हैं। उन्हीं में से एक क्रियाकलाप के कारण पैदा होता है ग्रीन हाउस प्रभाव। आइए जानने का प्रयास करते हैं कि ग्रीन हाउस प्रभाव क्या होता है।

हरित गृह प्रभाव (Green House Effect) - ग्रीन हाउस काँच के आवरण वाला पारदर्शी घर होता है। सर्दियों के दिनों में पौधों को ठंड से बचाये रखने के लिए इन घरों का सहारा लिया जाता है। चूंकि ग्रीनहाउस सूरज की गर्मी को अपने अंदर रंग लेते हैं और उसे बाहर नहीं जाने देते, इसलिए इन घरों को ग्रीन हाउस कहते हैं।

कहा जा रहा है कि ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण पृथ्वी गरम हो रही है। इस ग्रीन हाउस प्रभाव का यह नाम स्वीडिश रसायनविद स्वांते अरीदमियस ने 1893 में दिया था। उसने सिद्धांत रखा था कि  जीवाश्म ईंधन ओ अर्थात फॉसिल फ्यूल्स के जलाने से वायुमण्डल में कार्बन-डाई-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ जोयगी और पृथ्वी गरम होने लगेगी। धरती के गर्म होने को ग्रीन हाउस प्रभाव नाम दिया गया।

करोड़ों वर्षों के इसी ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण पृथ्वी पर जीवन पनपा है। जब किसी काँच के बने ग्रीनहाउस में सूर्य की किरणें प्रवेश करती हैं और उसे गरम कर देती हैं। तो काँच की दीवारें इस गरमी को बाहर जाने से रोकती हैं, उसे ठण्डी हवाओं को उसमें प्रवेश करने से रोकती हैं। परिणामस्वरूप ग्रीन हाउस का तापमान बढ़ जाता है। ठीक इसी प्रकार ग्रीन हाउस हमारे ग्रह पृथ्वी को अंतरिक्ष के बहुत ठण्डे तापमान की अपेक्षा गरम रखता है। जो पृथ्वी पर जीवन पर पनपने में सहायक हुआ।

ग्रीन हाउस गैसों में सूर्य की गरमी सोखने की क्षमता होती है। ग्रीन हाउस गैसों के द्वारा सोखी गई, यही गरमी निचले वायुमण्डल में काफी समय तक रहती है जिससे पृथ्वी, वनस्पति, नदियों, झीलों व समुद्रों से पानी को वाष्प बनने में सहायता मिलती है। यही वाष्प वायुमण्डल की ठण्डी ऊँचाइयों पहुुंँचती है, तो इससे बादल बनते हैं और बादलों से वर्षा होती है।


पिछले नौ सालों में पृथ्वी के औसत तापमान में 0.5°C की वृद्धि हो चुकी है और इस मामूली सी वृद्धि से ग्लेशियर और ध्रुवों से बर्फ पिघलने की दर में आंशिक तेजी आई जिससे सागरों का तल 10 सेंमी. ऊपर उठ गया है। अगर यह तापमान इस तरह बढ़ता रहा तो हर दस वर्ष में तापमान में औसतन 0.3°C की वृद्धि होगी और इसके फलस्वरूप सागरों के तल में औसतन 6 cm. की बढ़ोतरी हो जायेगी। इस दर से बढ़ते-बढ़ते तापमान 4.5°C ऊपर चढ़ जायेगा तो पृथ्वी की जलवायु में ऐसे दीर्घकालिक परिवर्तन हो जायेंगे कि फिर पृथ्वी को पुराने स्वरूप में लाना मनुष्य के वश से बाहर हो जायेगा। फिर जलवायु परिवर्तन कहीं समुद्री बाढ़, कहीं तूफान, कहीं सूखा, कहीं आग तो कहीं महामारी के रूप में अपना रौद्र रूप दिखायेगी।


वायुमण्डल, सागरों व जीव जगत् में CO2 विशाल भण्डारों में विभिन्न रूप में उपस्थित है और इनके बीच में गैस का प्राकृतिक तौर पर आदानप्रदान होता रहता है। हर वर्ष 110 अरब टन CO2 पृथ्वी पर होने वाली जैविक प्रतिक्रियायों द्वारा वायुमण्डल में पहुँचती है। इसका बहुत बड़ा भाग पेड़-पौधों द्वारा अपने लिए भोजन बनाने में प्रकाश संश्लेषण,क्रिया में ग्रहण कर लिया जाता है। सागर भी वायुमण्डल की CO2 सोखते हैं और कुछ भाग वापस लौटा देते हैं । इस प्रकार कार्बन का यह चक्र प्राकृतिक तौर पर चलता रहता है। लेकिन मनुष्य की हरकतों से वायुमण्डल का संतुलन बिगड़ गया है और गैस का जमाव तेजी से बढ़ता जा रहा है।


कार्बन-डाई-ऑक्साइड के अलावा जल वाष्पन, नाइट्रस ऑक्साइड मीथेन, क्लोरोफ्लोरोकार्बन (Chlorofloro Carbon C.F.C.) और ओजोन अन्य गैसें हैं। इसमें वायुमण्डल में सर्वाधिक झोंके जाने के कारण कार्बन-डाइ-ऑक्साइड पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने के लिये सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। उसके कारण 55% तापमान की वृद्धि होती है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार उद्योगों, मोटरवाहनों, घरेलू इस्तेमाल की ऊर्जा के इंतजाम के लिए जलाये गये कोयला व पैट्रोल आदि जीवाश्म ईंधनों से हर वर्ष 5.7 अरब टन CO2 वायुमण्डल में पहुँच रही है। इसके अलावा हर वर्ष 2 अरब टन से भी ज्यादा CO2 धरती के फेफड़े कहे जाने वाले उष्ण कटिबंधीय जंगलों के विनाश से और (खेती के लिए आग जलाकर साफ किया गया है।) वायुमण्डल में पहुँच रही है।


खेतों में नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग से और नाइट्रोजन ईंधनों के जलने के कारण एवं अन्य स्रोतों के नाइलोन उद्योगों द्वारा नाइट्रस ऑक्साइड छोड़े जाने के कारण यह गैस प्रत्येक वर्ष 0.257 की दर से बढ़ रही है। इस समय वायुमण्डल में इसकी मात्रा लगभग 0.21 भाग प्रति दस लाख भाग है जो एक चिन्ता का विषय है।

क्लोरोफ्लोरो कार्बन (C.FC.) यह मनुष्यों द्वारा ईजाद की गयी है। यह प्राकृतिक तौर पर नहीं पाई जाती है। ये यौगिक एयरकंडीशनरों तथा रेफ्रीजरेटरों में प्रशीतक (coolant) एवं छिड़काव यंत्रों (Propalant) में फोमों को फैलाने और इलेक्ट्रॉनिक घटकों की सफाई, आग बुझाने के आधुनिक यंत्रों या कह सकते हैं कि झाग युक्त पदार्थ तथा इंसुलेशन सामग्री उत्पादन तथा एयरोसोल में प्रयोग होते हैं, इनसे 24% तापमान वृद्धि होती है।

मीथेन गैस धान के खेतों, नम भूमि, दलदल (यानी मार्श गैस), सागरों, ताजे पानी, खनन कार्य, गैस वैल्डिंग, जैविक पदार्थों के सड़ने आदि से उत्पन्न होती है। इसके अतिरिक्त कई पशु-गाय, बकरी, भैंस, सूअर, ऊँट एवं लकड़ी खाने वाले कीट जैसे दीमक को मीथेन छोड़ने के लिये जिम्मेदार माना गया है। इस समय पूरी दुनिया में लगभग 552.5 करोड़ टन मीथेन धान के खेतों से उत्पन्न होती है। उन्नीसवीं सदी के शुरुआत के साथ से वायुमण्डल में मीथेन की मात्रा बढ़ रही है। पिछले कुछ दशकों में यह 0.3% की वार्षिक दर से बढ़ रही है।

समताप मण्डल की ओजोन तो पराबैंगनी विकिरण को सोखकर धरती के जीव-जन्तुओं की रक्षा करती है लेकिन निचले वायुमण्डल में इसका प्रभाव गर्मी बढ़ाने का काम करता है। यह गैसें प्राकृतिक तौर पर निचले वायुमण्डल में बहुत कम मात्रा में उपस्थित रहती हैं। लेकिन नाइट्रोजन के ऑक्साइडो मीथेन, हाइड्रोकार्बन और अन्य कार्बनिक यौगिकों के आपसी क्रिया से यह गैस बनती है।

ग्रीन हाउस गैसें वायुमण्डल में कई दशकों और यहाँ तक कि शताब्दियों तक रहती हैं। इस कारण यदि हम कल ही ग्रीन हाउस गैसों की निकासी बंद कर दें, पृथ्वी फिर से गर्म होती रहेगी और जलवायु कम से कम शताब्दी तक बदलती रहेगी।


प्रश्न 27 : प्रमुख हरित ग्रह गैसों का वर्णन कीजिये।

उत्तर– प्रमुख हरित गृह गैसे– काँच के घर या हरित गृह में कोई ऐसी गैस नहीं पाई जाती है जो प्राकृतिक पर्यावरण में न हो परन्तु पृथ्वी के वातावरण में पाई जाने वाली उन गैसों को ही, जो हरितगृह प्रभाव को उत्पन्न करती है, हरित गृह गैस कहते हैं। इन गैसों की सूची निम्न प्रकार है 1. कार्बनडाइऑक्साइड, 2. जलवाष्प, 3. ओजोन, 4. मीथेन 5. नाइट्रस ऑक्साइड, 6. क्लोरोफ्लोरो कार्बन।

यह हरित गृह गैसें, जिनमें कार्बन डाइऑक्साइड तथा मीथेन शामिल हैं, सूर्य की गर्मी को वातावरण में रोककर चूँकि धरती से वापसे अंतरिक्ष में लौट जाने से रोकती हैं, वे ही एक तरह से धरती की सतह को गर्म करती हैं।



CO2— समस्त ग्रीन हाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता वायुमण्डल में सर्वाधिक (350 ppm से अधिक) है। सन् 1980 में यह स्तर 280-290 पी.पी.एम. था, जो बढ़कर सन् 1988 में 350 पी.पी.एम. पहुँचा तथा आशंका है कि सन् 2050 तक 500-700 पी.पी.एम. तक बढ़ सकता है।

मीथेन- मीथेन भी एक महत्त्वपूर्ण ग्रीन हाउस गैस है। वायुमण्डल में इसका उत्सर्जन कई क्रियाओं तथा विभिन्न स्त्रोतों से होता है। यह मुख्यतया कार्बनिक पदार्थों की ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में सड़ने, उनके जलने, दलदली तथा जलमग्न धान के खेतों के अलावा दीमक और जुगाली करने वाले पशुओं के मुँह से निकलती रहती है और वायुमण्डल में मिल जाती है। वायुमण्डल में इसकी प्रतिवर्ष 1% की दर से वृद्धि हो रही है। इसकी ऊष्मायन क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 36 गुना ज्यादा है और सम्पूर्ण ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव में मीथेन का योगदान कुल 20 प्रतिशत है।

नाइट्रस ऑक्साइड- नाइट्रस ऑक्साइड अवरक्त (इन्फ्रारेड) प्रकाश किरणों को शोषित करके वायुमण्डल को गर्म करती है। यह गैस मुख्यतया भूमि में नाइट्रोजनीय कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों और उर्वरकों के नाइट्रिफिकेशन के दौरान बीच में बनने वाली गैस है, जो वायुमण्डल में निकलती रहती है। धान के जलमग्न खेतों के सूखने तथा पुनः भरते-सूखते रहने से अमोनिया का नाइट्रेट तथा नाइट्रेट का नाइट्रस ऑक्साइड में परिवर्तित होना एक प्रक्रिया है, जिसे डिनाइट्रीफिकेशन, अमोनिफिकेशन तथा नाइट्रिफिकेशन कहते हैं। जमीन से जब नाइट्रोजन का उत्सर्जन नाइट्रस ऑक्साइड के रूप में होता है, तो इसे डिनाइट्रीफिकेशन कहा जाता है, जो मुख्यतया सूखे धान के खेतों में पानी भरने के दौरान निकलती है। इस गैस की सीन्द्रता वायुमण्डल में बहुत कम होती है, परन्तु इसकी गर्माहट क्षमता मिथेन से भी अधिक है और ग्रीन हाउस प्रभाव में इसका योगदान करीब 5 प्रतिशत है।

O3– ओजोन, वाहनों द्वारा निकले नाइट्रस ऑक्साइड गैसों के ऑक्सीकरण द्वारा उत्पन्न होता है। यह गैस भी वायुमण्डलीय ऊष्मायन में सक्रिय भूमिका निभाती है, इसका योगदान लगभग 9 प्रतिशत है। इसकी ऊष्मायन क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड से करीब 430 गुना अधिक है।

CFC- क्लोरीन, फ्लोरीन और कार्बन के परमाणुओं के संयोग से बना क्लोरो फ्लोरो-कार्बन और धरती का तापमान बढ़ाने में इसका 20 फीसदी का योगदान है।


प्रश्न 34 : ओजोन परत में क्षय के कारण पर टिप्पणियाँ लिखिये-

उत्तर- ओजोन परत के क्षय के मुख्य कारक निम्न हैं-

1. क्लोरोफ्लोरो कार्बन (C.F.C.)- ओजोन परत के क्षय का मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन, ब्रोमीन के यौगिक एवं नाइट्रोजन और सल्फर के ऑक्साइड़ है। C.F.C. रंगहीन, गंधहीन, विषहीन, अग्निरोधी, निष्क्रिय, लम्बे समय तक स्थायी रहने वाला एवं सस्ता पदार्थ है। सन् 1974 में अमरीकी वैज्ञानिक एफ. शेरवुड रॉलैण्ड ने यह स्पष्ट कर दिया कि ध्रुवों पर ओजोन परत में छेद होने के लिए मुख्यतया C.E.C. जिम्मेदार है। परन्तु जिस अक्रियशीलता की वजह से ये पदार्थ औद्योगिक दृष्टि से इतने उपयोगी होते हैं, उसी अक्रियता की वजह से ही ये पृथ्वी के वायुमण्डल में लम्बे समय तक टिके भी रहते हैं। सीएफसी वास्तव में एक किस्म के पदार्थों का सामान्य नाम है। ओजोन क्षति की दृष्टि से इसके अहम पदार्थ हैं- सीएफसी-11, सीएफसी-12, सीएफसी-13 और कार्बन टेट्राक्लोराइड हैं।

2. अन्य क्लोरीनीकृत रसायन (Other Chlorinated Chemicals)- कार्बन-टेट्राक्लोरोइड एवं क्लोरोफॉर्म जैसे रसायन भी समतापमण्डल में क्लोरीन की वृद्धि करते हैं। इन यौगिकों की यह विशेषता है कि ये 100 वर्षों से अधिक समय तक अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं। हवा से भी हल्के होने के कारण ये ऊपर उठते चले जाते हैं और समतापमण्डल में पहुँच कर पराबैंगनी किरणों की मदद से क्लोरीन तथा ब्रोमीन के स्वतन्त्र परमाणु उत्पन्न करते हैं। ये स्वतन्त्र परमाणु ओजोन को तोड़ने का चक्र आरम्भ कर देते हैं। O.F.C. से मुक्त हुआ क्लोरीन का एक परमाणु ओजोन के 10,000 अणुओं को तोड़ने की क्षमता रखता है।


वायुमण्डल में ओजोन परत के नष्ट होने के मुख्य कारणों में सी.एफ.सी. रसायन के प्रयोग के अलावा अन्य कई कारणों को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है जो निम्न हैं-

(i) वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई- ओजोन परत को क्षय पहुँचाने में वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई भी एक महत्त्वपूर्ण कारण है। वृक्षों की कटाई से पर्यावरण में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने लगती है जिससे ओजोन गैस के अणुओं का निर्माण कम हो जाता है।

(ii) नाइट्रोजन एवं क्लोरीन के ऑक्साइड- वायुमण्डल में विद्यमान नाइट्रोजन एवं क्लोरीन के ऑक्साइड्स भी एक कारण हैं, जो कि विभिन्न स्रोतों से वायुमण्डल में प्रवेश कर जाते हैं। नाइट्रोजन के 5 ऑक्साइड होते हैं। इनमें से नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) का स्रोत मुख्यतः समुद्र, जीवाश्म ईंधनों का जलना, उर्वरक युक्त खेत व जंगल आदि हैं। नाइट्रस ऑक्साइड ट्रोपोस्फीयर में से ऊपर स्ट्रैटोस्फीयर तक पहुँचकर नाइट्रिक ऑक्साइड में, बदल जाती है। नाइट्रिक ऑक्साइड ओजोन से क्रिया करती है और ओजोन की क्षति होती है। नाइट्रिक ऑक्साइड अत्यन्त घातक गैस है, क्योंकि यह भी फ्रियान-11 एवं 12 के ही समान ओजोन अणुओं को ऑक्सीजन में परिवर्तित कर देती है।

(iii) धुएँ से- छुटजेन ने कटिबंधों में बायोमास के जलाए जाने और वायुमण्डल में ओजोन की मात्रा के बीच संबंध प्रतिपादित किया। ऐसा माना जाता है कि विमानों, वाहनों, कारखानों आदि से निकलने वाले धुएँ से भी विभिन्न प्रकृति वाले रसायन वायुमण्डल में प्रवेश पा रहे हैं और ओजोन परत को नष्ट कर रहे हैं।

(अ) उदाहरणार्थ- 12-15 किलोमीटर की ऊँचाई पर तेज गति से उड़ने वाले जेट विमानों का धुआँ, एक अनुमान के अनुसार ओजोन परत को सन् 2000 तक 10 प्रतिशत और अधिक क्षतिग्रस्त कर देगा।

(ब) भविष्य में होने वाला कोई भी नाभिकीय विस्फोट (nuclear explosion), क्षोभमण्डल (troposphere) की ऊपरी सीमा में पंक्चर कर सकता है जिससे ओजोन क्षय करने वाले पदार्थ समतापमण्डल में निर्विघ्न प्रवेश कर सकेंगे।

(स) इसके अलावा अन्तरिक्ष यानों का जला ईंधन भी नाइट्रोजन के ऑक्साइड उत्पन्न करता है जो ओजोन को नष्ट करते हैं।

(द) प्रकृति में होने वाली घटनाओं को भी ओजोन परत को नष्ट करने का कारण पाया गया है। हाल ही में ज्वालामुखियों के एक साथ सक्रिय हो जाने से वायुमण्डल में सल्फर के ऑक्साइड आदि की मात्रा बढ़ने का अन्देशा है। कुछ रूसी वैज्ञानिक इसका कारण मैक्सिको के एल-चिम्पोन ज्वालामुखी का प्रबल विस्फोट मानते हैं। इससे ओजोन परत पर प्रभाव पड़ेगा, ऐसा अनुमान है।

(य) मोटर-गाड़ियों से निकलने वाला धुआँ, कल-कारखानों वे बिजलीघरों से निकलने वाले धुएँ से कहीं अधिक खतरनाक साबित हुआ है, क्योंकि इसमें कार्बन-मोनो-आक्साइड के अलावा, सल्फर-डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन, सीसा (lead) आदि होते हैं जो ओजोन परत को क्षति पहुँचाते हैं।

प्रश्न 104 : निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए- (i) ओजोन क्षय के दुष्प्रभाव (ii) अन्तरिक्ष में मानव बस्तियाँ

उत्तर- (i) ओजोन क्षय के दुष्प्रभाव- ओजोन क्षय के दुष्प्रभाव निम्न हैं-

(A) शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव- सूर्य की किरणों के साथ-साथ आने वाली घातक पराबैंगनी किरणों की ओजोन परत अवशोषित कर लेती है। यदि कुछ पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुँच जाती हैं तो वह जीवों तथा वनस्पति जगत के लिए निम्नलिखित रूप से हानिकारक सिद्ध होती है-



(1) त्वचा के क्षतिग्रस्त होने से कई प्रकार के चर्म कैन्सर हो जाते हैं। मिलिग्रैण्ड नामक चर्म कैंसर के रोगियों में से 40% से अधिक की अत्यन्त कष्टप्रद मृत्यु हो जाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यावरण सुरक्षा अभिकरण का अनुमान है कि ओजोन की मात्र 1% की कमी से कैंसर के रोगियों में 20 लाख की वार्षिक वृद्धि हो जाएगी।


(2) इनके प्रभाव से मनुष्यों की त्वचा की ऊपरी सतह की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। क्षतिग्रस्त कोशिकाओं से हिस्टैमिन नामक रसायन का स्राव होने लगता है। हिस्टैमिन नामक रसायन के निकल जाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और ब्रॉन्काइटिस, निमोनिया, अल्सर आदि रोग हो जाते हैं।


(3) पराबैंगनी किरणों (Ultraviolet-rays) का प्रभाव आँखों के लिए भी घातक सिद्ध हुआ है। आँखों में सूजन और घाव होना तथा मोतियाबिन्द जैसी बीमारियों में वृद्धि का कारण भी इन किरणों का पृथ्वी पर आना ही माना जा रहा है। ऐसा अनुमान है कि ओजोन की मात्रा में 1% की कमी से आँख के रोगियों में 25 लाख की वार्षिक वृद्धि होगी।


(4) सूक्ष्म जीवों तथा वनस्पति जगत पर भी पर पराबैंगनी किरणों का बुरा असर पड़ता है। इनके पृथ्वी पर आने से सम्पूर्ण समुद्री खाद्य श्रृंखला गड़बड़ा सकती है क्योंकि इनके प्रभाव से सूक्ष्म स्वतंत्रजीवी शैवाल (फाइटोप्लैंक्टन) जो समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार हैं, नष्ट हो जाते हैं। यदि ये शैवाल नष्ट होंगे तो इन पर निर्भर रहने वाले छोटे-छोटे समुद्री जीव भी मर जाएंगे, फिर क्रमशः मछलियाँ, समुद्री पक्षी, सील, व्हेल और अन्त में मानव भी प्रभावित होगा जो इस खाद्य श्रृंखला की अन्तिम कड़ी है।

(B) वायुमण्डल पर पड़ने वाले प्रभाव :

(1) CO2 की मात्रा में वृद्धि- वर्तमान में पृथ्वी का वायुमण्डल कार्बन डाइऑक्साइड की अतिभारिता (overweight) को झेल रहा है। पौधों द्वारा जितनी कार्बन डाइऑक्साइड स्वांगीकृत की जा सकती है उससे अधिक मात्रा उद्योग एवं मौटर वाहनों द्वारा विसर्जित की जा रही है। फलस्वरूप वायुमण्डल में इस गैस की मात्रा में 2 प्रतिशत की दर से प्रतिवर्ष वृद्धि हो रही है। यह गैस भारी होने के कारण पृथ्वी के धरातल के समीप ही एक परत के रूप में स्थिर हो जाती है। कार्बन डाइऑक्साइड की यह परत पृथ्वी से आकाश की ओर लौटने वाले ऊष्मीय विकिरणों को परावर्तित कर देती है और तापवृद्धि का कारण बनती है।

तापमान की इस वृद्धि के फलस्वरूप दक्षिण-मध्य यूरेशिया एवं उत्तरी अमेरीका की वायु की शुष्कता में वृद्धि हुई है और कहीं-कहीं तीव्र धूल भरी आँधियाँ चलती हैं।


वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है यदि पृथ्वी का ताप वर्तमान ताप से 3.6°C बढ़ जाए तो अंटार्कटिका और आर्कटिका ध्रुवों के विशाल हिमखण्ड पिघल जाएँगे और समुद्र की सतह 100 मीटर ऊँची हो जाने की सम्भावना है जिसके कारण समस्त पृथ्वी के जलमग्न हो जाने की सम्भावना है।

(2) जलवायु पर प्रभाव (Effects on Climate)- वायु प्रदूषण अपने व्यापक रूप में विश्व जलवायु पर भी अपना प्रभाव डालता है। यह सामान्य अनुभव है कि पिछले कुछ वर्षों में जलवायु में परिवर्तन आया है। पहले जिन स्थानों का जलवायु ठण्डा माना जाता था, वे वर्तमान में गर्म हो गये हैं।


इसी प्रकार गर्म स्थानों का जलवायु पहले की अपेक्षा कुछ ठण्डा हो गया है। वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है कि पृथ्वी का ताप वर्तमान ताप से 3.6°C बढ़ जाए तो अंटार्कटिका और आर्कटिका ध्रुवों के विशाल हिमखण्ड पिघल जाएँगे और समुद्र की सतह 100 मीटर ऊँची हो जायेगी। फलस्वरूप सारी पृथ्वी जलमग्न हो जायेगी।

(3) मौसम पर प्रभाव (Effects on Weather)– वायुमण्डल में धूल के कणों की मात्रा लगातार बढ़ रही है, जिससे पिछले 25 वर्षों में वायुमण्डल के तापमान में 0.2°C की कमी आई है। तापमान की कमी की अवधि में यूरोपीय देशों में भीषण वर्षा हुई। उत्तरी अंध-महासागर में बर्फ की मोटी तह जम गयी थी। शनै-शनैः यूरोप में गर्मी के मौसम में वहाँ का तापमान बढ़ रहा है। इसके साथ-साथ ऊष्ण कटिबंधीय देशों में मौसम (वर्षा आदि) का स्थानान्तरण हो रहा है।


शहरी क्षेत्रों में दैनिक तापक्रम ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक देखा गया है। इसका कारण निश्चित ही वहाँ की वायु में प्रदूषकों की उपस्थिति के कारण ताप का परावर्तन ही है। इसके अतिरिक्त शहरी क्षेत्रों में कंकरीट तथा सीमेंट के बने भवनों तथा तारकोल की सड़कों द्वारा ताप को संग्रहीत करने तथा बाद में तापीय विकिरण के रूप में विसरित करने के कारण भी तापमान में वृद्धि होती है तथा स्थानीय तापक्रम धीरे-धीरे नीचे गिरता है।

(ii) अन्तरिक्ष में मानव बस्तियाँ-

मनुष्य की अन्तरिक्ष यात्राएँ 1960 के दशक में प्रारम्भ हुईं। लगभग इसी समय अन्तरिक्ष की बसावट (Space Colonization) की कल्पना भी की गई जिसके प्रणेता गेरॉर्ड नील (Garord Kitchen O'Niel) हैं। अन्तरिक्ष के अन्तरिक्ष चन्द्रमा व मंगल पर बसावट (Moon and Mars Colonization) की भी योजनाएं बनाई गईं। इन योजनों में यह अनुमान लगाए गए कि अन्तरिक्ष, चन्द्रमा या मंगल पर कैसी परिस्थितियाँ हैं, वहाँ जीवन बनाए रखने के लिए क्या प्रयास करने होंगे तथा यह सब कैसे व कितनी कीमत से किया जा सकता है। इसमें आने वाली समस्याएँ क्या होंगी तथा इस सबका क्या लाभ है?

अन्तरिक्ष में बस्तियाँ बनाने का आखिर प्रयोजन क्या हो सकता है? मनुष्य बहुत-से कार्य उत्सुकतावश करता है परन्तु उसकी नैसर्गिक प्रकृति ही चुनौतियों को खोजने और उन पर विजय पाने की रही है।


मनुष्य ने अन्तरिक्ष में बस्तियाँ बनाने का स्वप्न भी संभवतः इन्हीं कारणों से देखा, परन्तु फिर भी उसे इसके पीछे कुछ संभावित लाभ दिखाई दिये

1. मानव जाति की रक्षा (To Save Human Species)– एक अतिरेक कल्पना के अनुसार यदि कभी किसी प्राकृतिक आपदा के कारण या मानव द्वारा जनित प्रदूषण के कारण पृथ्वी पर जीवन असंभव हो जाए तो ऐसी अन्तरिक्ष बस्तियाँ मानव जाति की रक्षा करेंगी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 150 से 200 व्यक्तियों की बस्ती बिना अन्तः प्रजनन से उत्पन्न समस्याओं के 2000 वर्ष तक जीवन क्षम रह सकती है। एक अनुमान यह भी है कि मात्र दो स्त्रियाँ ही ऐसी बस्ती की शुरुआत कर सकती हैं अगर मानव भ्रूण या शुक्राणु बैंक की सहूलियत उपलब्ध हों।

2. जीवन का फैलाव (To Spread Life)– मानव जहाँ तक अन्तरिक्ष की खोज कर पाया है वहाँ तक उसे विकसित जीवन के कोई चिह्न नहीं मिले हैं। अन्तरिक्ष की बनावट के पीछे एक उद्देश्य जीवन का विस्तार पृथ्वी के बाहर तक करना हो सकता है।

3. आर्थिक लाभ हेतु- वैज्ञानिक मानते हैं कि अन्तरिक्ष ग्रहों या उपग्रहों में बनाई गई मानव बस्तियों में महत्त्वपूर्ण शोध कार्य किया जा सकता है तथा कुछ ऐसे पदार्थ या तकनीकें खोजी और पृथ्वी पर उपलब्ध कराई जा सकती हैं जिनकी पृथ्वी पर आवश्यकता है तथा कमी भी है। इन पदार्थों में महत्त्वपूर्ण खनिज, रेडियोधर्मी पदार्थ आदि शामिल हो सकते हैं। जिनका दोहन अन्य आकाशीय पिण्डों से किया जा सकता है।

पृथ्वी पर संसाधन सीमित मात्रा में हैं तथा जिस गति से इनका दोहन हो रहा है उससे ये आने वाले वर्षों में विरल या समाप्त हो सकते हैं। पृथ्वी पर ऊर्जा का भी गहन संकट है तथा इसकी माँग दिनों-दिन बढ़ रही है। अन्तरिक्ष में बनाए गए केन्द्रों से और ऊर्जा का दोहन कर उसे पृथ्वी तक भेजने के क्षेत्र में तो वैज्ञानिक विशेष संभावना देख रहे हैं। सौर ऊर्जा पृथ्वी पर भी उपलब्ध है, परन्तु पृथ्वी के वायुमण्डल, बादलों, वर्षा आदि घटनाओं के कारण इसकी तीव्रता व निरन्तर उपलब्धता कम होती जा रही है। अन्तरिक्ष में वायुमण्डल के अभाव के कारण यह समस्या नहीं है। इस आर्थिक युग में लोग अन्तरिक्ष यात्रा को भविष्य में पर्यटन के लिए खोलने की कल्पना करने लगे हैं जिसके माध्यम से शोध संस्थान अमीर लोगों को अन्तरिक्ष की सैर कराकर (Space tourism) अपने कार्यक्रमों के लिए धन इकट्ठा कर सकें या निजी कम्पनियाँ लाभ कमा सकें। अब तक जिन देशों में अन्तरिक्ष के लिए मानव युक्त उड़ानें भेजी हैं उनका उद्देश्य पूर्णतः वैज्ञानिक रहा है तथा अन्तरिक्ष यात्रियों से इस कार्य के लिए कोई धनराशि नहीं ली गई है। डेनिस टीटो नामक एक धनपति अपना खर्च देकर अन्तरिक्ष में जाने वाले पहले व्यक्ति बने। उन्होंने 10 दिनों की अन्तरिक्ष यात्रा के लिए 20 मिलियन डॉलर (लगभग 1,000,000,000 रु. यानी एक अरब रु.) खर्च किए।

चन्द्रमा की बसावट (Moon Colonization)– अन्तरिक्ष में अथवा पृथ्वी के बाहर बसावट करने की योजनाओं में चन्द्रमा की बसावट मनुष्य का एक बड़ा स्वप्न रहा है। चन्द्रमा अन्तरिक्ष बसावट का पहला लक्ष्य इसलिए है, क्योंकि यह पृथ्वी का निकटतम आकाशीय पिण्ड है। चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी से छः गुना कम है तथा इसी कारण चन्द्रमा पर कोई वातावरण (atmosphere) नहीं है। चन्द्रमा पर मानव को बसाने की दिशा में न तो कोई प्रयास किए गए हैं न ही निकट भविष्य में ऐसा कुछ करने की योजना है फिर भी वैज्ञानिक इस कार्य को एक चुनौती मानते हैं। तथा इसे हल करने के ऐसे प्रस्ताव तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं जिसे आवश्यकता पड़ने पर परखा जा सके। मंगल पर बस्तियाँ (Mars Colonization)–चन्द्रमा की तरह ही मंगल पर मानव बस्तियाँ बनाने की योजना बनाई जा रही हैं। मंगल पर हल्का वातावरण भी है तथा इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति चन्द्रमा की तुलना में दोगुनी है। मंगल के वायुमण्डल में CO2 गैस है तथा यहाँ का तापमान भी प्रतिकूल नहीं है। मंगल ग्रह पर जल की उपस्थिति के पर्याप्त संकेत मिले हैं।

प्रश्न 129 : मधुमक्खी के आर्थिक महत्त्व की व्याख्या कीजिये।

उत्तर- मधुमक्खी का आर्थिक महत्त्व- मधुमक्खी पालन के मुख्य उत्पाद मधु एवं मधुमक्खी मोम है जो अनेक कार्यों में काम में लिए जाते हैं।

(1) मधु के उपयोग (Uses of honey) : मधु मनुष्य के द्वारा प्राकृतिक मीठे के रूप में रोटी और मिठाई एवं केन्डी (candy) बनाने में प्रयोग किया जाता है। मधुमेह (diabetes) के रोगियों के लिए मुख्य भोजन माना जाता है। कठिन शारीरिक व्यायाम करने वाले मनुष्यों के लिए यह एक लाभदायक भोज्य पदार्थ है। मधु का उपयोग आयुर्वेदिक एवं यूनानी पद्धतियों में खाँसी की रोकथाम, सर्दी, बुखार, रक्तक्षीणता (anaemia) एवं रक्त शुद्धिकरण (blood purification) आदि में किया जाता है। इसका सेवन कुपोषण से होने वाले हृदय रोगों, अपाचन, मधुमेह आदि में भी किया जाता है। इसके अलावा यह भी ज्ञात हुआ है कि मधु के उपयोग से टायफॉइड के जीवाणु 48 घंटों में, ब्रोंकिया निमोनिया के 4 दिन में तथा आन्त्रशोथ के जीवाणु 50 घंटों में नष्ट हो सकते हैं।


(2) मधुमक्खी का मोम (Bees-wax) : मधुमक्खी-मोम एक अवशिष्ट (bee-product) परन्तु लाभदायक पदार्थ है जो मधुमक्खीपालन से प्राप्त किया जाता है। मोम श्रृंगार के समान अर्थात् कांतिवर्द्धक वस्तुओं के बनाने के उद्योगों में आधार पदार्थ (base substance) के रूप में प्रयोग होता है। मधुमक्खी के मोम का उपयोग कान्तिवर्द्धक वस्तुओं के अतिरिक्त कोल्ड-क्रीम, शेविंग-क्रीम, मोमबत्तियाँ (candles), पॉलिश, कार्बन-पेपर आदि पदार्थों के निर्माण में भी किया जाता है।

(3) कृषि में योगदान (Contribution in agriculture) : मधुमक्खियाँ कृषि के लिए परागण (pollination) में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। जहाँ मधुमक्खियों की संख्या अधिक होती है, वहाँ पर नये-नये फलों की खेती अत्यधिक होती है। केवल मधुमक्खियाँ ही ऐसे परागण-कीट (pollen insect) हैं जो मनुष्य द्वारा नियन्त्रित हो सकती हैं और इसलिए कृषि में इनको बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।


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