प्रकृति की नब्ज बताती भारतीय कालगणना

डॉ राम अचल
लेखक आयुर्वेद चिकित्सक तथा विश्व आयुर्वेद काँग्रेस के सदस्य हैं।


नववर्ष कालगणना का वार्षिक शुभारम्भ होता है, पूरी दुनिया में 96 तरह की कालगणना प्रचलित है, केवल भारत में ही 36 प्रकार की कालगणना रही है, जिसमें 24 पद्धतियाँ अब विलुप्त हो चुकी है परन्तु 12 कालगणना विधियाँ आज भी प्रचलित है। इस तरह दुनियाँ में 96 दिन नववर्ष होता है तथा भारत में 12 दिन नववर्ष मनाया जाता है। भारतीय कालगणना में स्वयंभुव मनु संवत्सर, सप्तर्षि संवत्, गुप्त संवत्, युधिष्ठिर संवत्, कृष्ण संवत्, ध्रुव संवत्, क्रोंच संवत्, कश्यप संवत्, कार्तिकेय संवत्, वैवस्वत मनु संवत्, वैवस्वत यम संवत्, इक्ष्वाकु संवत्, परशुराम संवत्, जयाभ्युदय संवत्, लौकिक ध्रुव संवत्, भटाब्द संवत् (आर्यभट), जैन शक संवत्, शिशुनाग संवत्, नंद शक्, क्षुद्रक संवत्, चाहमान शक, श्रीहर्ष शक, शालिवाहन शक, कल्चुरी या चेदी शक, वल्भिभंग संवत, फसली संवत्, सरहुल संवत् के अनुसार नववर्ष मनाया जाते हंै। उत्तर भारत में विक्रम और शक संवत् विशेष प्रचलित है जो चैत्र मास से आरम्भ होता है।

कालगणना का मौलिक उद्देश्य प्रकृति के अनुसार जीवनशैली और काम-काज को व्यवस्थित करना होता है। प्रकृति के बदलावों, मौसम, ऋतुओं, ठंडी, गर्मी, बरसात से मानव जीवनशैली और काम-काज प्रभावित होता है। इसलिए मानव जीवन को समायोजित और प्रबंधित करने के लिए कालगणना की शुरुआत हुई। आज दुनिया में ईस्वी कलैण्डर सर्वाधिक प्रचलित और मान्य है, जिससे राजकीय और दैनिक काम-काज किए जाते है। प्रकृति के परिवर्तनों को जानने के लिए अन्य उपायों के साथ-साथ और तकनीक की आवश्यकता पड़ती है। परन्तु भारतीय मनीषीयों ने कालगणना की ऐसी पद्धति का विकास किया, जिससे दैनिक कामकाज के अलावा प्रकृति में होने वाले समस्त परिवर्तनों को सूक्ष्मता पहचान करना संभव रहा है। इसे कृत-विक्रम और शक संवत् के नाम से जाता है। इसकी चर्चा करने से पहले भारत में प्रचलित कालगणना का कुछ पाश्चात्य विधियों का संक्षिप्त परिचय जानना आवश्यक लगता है। कालगणना की सभी विधियाँ सूर्य-पृथ्वी-चन्द्र की गति पर आधारित होती हैं।

ग्रेगोरियन कलैण्डर
इसे सामान्यत: ईस्वी सन् के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह वैश्विक कलैण्डर के रूप में मान्य है। इसका आधार चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा और सूर्य पर केन्द्रित है। इसके पहले यह जूलियन कलैण्डर के नाम से जाना जाता था। इसकी त्रुटियों को पोप ग्रेगोरी अष्टम ने सुधार कर व्यावहारिक बनाया, इसलिए इसे ग्रेगोरियन कलैंडर कहा जाता है। इसकी गणना ईसा मसीह के जन्म को मध्य बिन्दु मानकर की जाती है। जन्म के पहले के समय को ईसा पूर्व तथा बाद के समय को ईस्वी सन् कहते हैं। हिजरी कलैण्डर इस्लामिक कालगणना है। इस कलैण्डर में पृथ्वी की सूर्य परिक्रमा पथ की गणना न किये जाने के कारण हिजरी वर्ष, विक्रम और ईस्वी वर्ष से 11 दिन कम होता है। इसके महीने प्रत्येक वर्ष 10-11 दिन पीछे खिसक जाते है, इसलिए हिजरी के महीने मौसम के अनुसार स्थिर नहीं होते है।

भारतीय गणराज्य के गठन के पश्चात भारतीय पर्व-त्यौहारों के निर्धारण में ईस्वी सन् से समस्या होने लगी, इसलिए भारतीय कलैण्डर की आवश्यकता महसूस हुई। भारत में प्रचलित अनेक कलैण्डरों में ईस्वी के समानान्तर शक संवत् को माना गया जिसे अधिक स्पष्ट और प्रायोगिक बनाने के लिए प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. मेघनाद साहा की अध्यक्षता में ज्योतिर्विदों-वैज्ञानिकों की एक समिति गठित की गई। इसके द्वारा संशोधित शक संवत् पंचांग तैयार किया गया, जिसे सरकार द्वारा 21 मार्च 1957 को राष्ट्रीय शक संवत्-पंचांग घोषित किया गया। इनके महीनों का नाम चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण आदि विक्रम संवत् के ही अनुसार रखा गया है।

शक और विक्रम संवत् का नववर्ष
शक संवत् के बाद और विक्रम संवत् की चर्चा के पहले दोनों संवतों के आरम्भ होने के दिन के संबंध में चर्चा करनी आवश्यक है, क्योकि इसके विषय में आम लोगों के साथ ही विद्वानों में भी भ्रम है। जैसा कि शक संवत् के प्रसंग में विवरण दिया गया है कि शक संवत् की शुरुआत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होती है, जबकि शक संवत् से 135 वर्ष पहले शुरू होने वाले कृत या विक्रम संवत् की गणना चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से ही की जाती है। लोक परम्परा भी यही रही है। इस दिन को होली, फगुआ, मदनोत्सव, फाग आदि के रूप में मनाने का प्राचीन परम्परा रही है। शक और विक्रम संवत् के प्रचलन से पहले प्राचीन शैवागम ग्रंथ वर्षक्रिया कौमुदी में मदनोत्सव से नये वर्ष की शुरुआत करने का संकेत मिलता है। इस प्रकार लोक मानस और शास्त्र-ज्योतिष गणना के अनुसार कृत या विक्रम संवत् का नववर्ष होली का पर्व ही है। इसकी परम्परा आज भी जारी है पर विविध पौराणिक कथाओं के प्रसारित होने के कारण उसके अर्थ बदल गये है। इधर कुछ वर्षो में जनसंचार माध्यमो का प्रसार के कारण यह वैज्ञानिक तथ्य बिल्कुल ही खो चुका है, जबकि भोजपुरी क्षेत्र के गाँवो में आज भी नये वर्ष के रूप में कमोबेस यह परम्परा जारी है। लोग अब भी यह कहते मिल जाते कि फागुन बीत गया, साल का पहला दिन फगुआ भी खुशी के साथ बीत जाये तो बहुत बड़ी बात है।
उपरोक्त वर्णित सभी कलैंडर राज-काज के लिए सुविधाजनक है, परन्तु विक्रम कलैण्डर प्रकृति के क्षण-क्षण बदलते स्वभाव का मापन करने में सक्षम है। इसकी रचना इस तरह की गयी है कि यह वैद्य की तरह प्रकृति की नब्ज की पहचान करता है। इसकी विशेषता यह है कि पर्वो के अतिरिक्त खेती-किसानी, वर्षा, ठंडी, गर्मी, आँधी-तूफान, सूखा, बाढ़, मौसम, ऋतुओं, जलवायु आदि सभी का संकेत भी इससे मिलता है, जिन्हें जानने के लिए आज भारी-भरकम यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। ज्योर्तिग्रंथो के अनुसार विक्रम संवत् को उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य ने 57 ई.पू. में आरम्भ किया था। आधुनिक इतिहासकार विक्रम संवत में सौर वर्ष के साथ ही चन्द्र वर्ष की गणना को भी शामिल किया जाता है, यही इसे ईस्वी कलैंडर से अलग करता है।

भूमण्डलीय प्रकृति के मापन के लिए विक्रम संवत् सर्वाधिक उपयुक्त है। विक्रम संवत् की कालगणना प्राकृतिक घटनाओं के व्यवहार का मापक पैमाना है, जिसकी गणना विधि सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र, राशि(तारामण्डल) के गति पर आधारित है। इसमे सौर वर्ष तथा चन्द्र वर्ष के रूप में एक साथ दो वर्षों की गणना की जाती है, जिन्हे समायोजित-विश्लेषित करके शीत-ताप-जलवायु के परिवर्तनों की अनुमान किया जाता है। इससे वर्ष, मौसम, ऋतु, माह, पक्ष, सप्ताह, दिन, घटी, पल, सूर्योदय, सूर्यास्त की गणना और वर्ष, शीत, ताप, वर्षा, ग्रहण, आँधी, तूफान, बाढ़, सूखा आदि का ठीक-ठीक अनुमान लगाना संभव होता है। प्रकृति में होने वाले बदलावों की सूक्ष्मता से पहचान करने के लिए सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी की गति को तारों, तारासमूहों (राशियों) के माध्यम से चिह्नित किया गया है। नक्षत्रों का संबंध चन्द्रमा की गति से है, राशियों का सूर्य से है। पृथ्वी का पर्यावरण और शीत-ताप-वर्षा के समय का निर्धारण पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा की गति और स्थिति पर ही निर्भर करती है। इसलिए सौर वर्ष के साथ-साथ चांद्र वर्षों की गणना आवश्यक है। वस्तुत: कैलेंडर बनाने का मूल उद्देश्य भी यही रहा है। इसलिए विश्व में लगभग सभी सभ्यताओं के इतिहास में चांद्र वर्षों की गणना मिलती है।

वेदांग ज्योतिष विधि से एक चान्द्र मास शुक्ल पक्षके पहले दिन यानी प्रतिपदा से शुरू होकर अमावस्या को पूरा होता है। इसके विपरीत सूर्य सिद्धांत ज्योतिष पद्धति से एक चान्द्र मास की गणना कृष्ण पक्ष के पहले दिन से शुरू होकर पूर्णिमा को पूरी होती है। शक संवत् में वेदांग ज्योतिष के अनुसार मास और वर्ष शुरू होता है, इसलिए नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। कृत या विक्रम संवत् में सूर्य सिद्धान्त माना जाता है, इसलिए इसका नववर्ष चैत्र कृष्ण पक्ष से शुरू होता है। पृथ्वी की परिक्रमा करने में चन्द्रमा को 29.53 दिन का समय लगता है। सूर्य की परिक्रमा में 354.37 दिन का समय लगता है। सूर्य के परिपथ को पृथ्वी से विभाजित करने पर 12 चान्द्र मास होते हैं। इस तरह 12 चान्द्र मासों का एक चान्द्र वर्ष होता है। चान्द्र वर्ष की अवधि लगभग 29.53 x 12 = 354.37 दिन होती है। चान्द्र वर्ष की गणना हिजरी कलैण्डर, स्कॉटलैण्ड और चीन में भी की जाती है।

क्यों जरूरी है चान्द्र वर्ष

सौर और चांद्र वर्षों का समायोजन विज्ञान की दृष्टि से भी आवश्यक है। ताप यानी अग्नि का कारक सूर्य तथा शीत यानी जल का कारक चन्द्रमा है। ताप और शीत के संयोग से वायु की उत्पत्ति होती है। पृथ्वी पर जीवन का कारण अग्नि-जल-वायु का योग है। यही तत्व मानव शरीर के कारक भी है। इसीलिए कहा गया है ‘यत्पिण्डे तद्ब्रह्माण्डे’ अर्थात जो शरीर यानी पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है। चन्द्रमा के पृथ्वी, पृथ्वी के सूर्य की परिक्रमा के कारण पृथ्वी पर भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न कोणों से भिन्न-भिन्न प्रभाव वाली सूर्य-चन्द्र की किरणें पड़ती है। सूर्य का ताप और चन्द्र का शीत विविध अनुपात में पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों में विविध अनुपात में पड़ता पड़ता है। इसी कारण पृथ्वी के विभिन्न हिस्सो में विविध रूप-रंग, अकार-प्रकार के जीव-जन्तु, वनस्पतियाँ और मानव की उत्पत्ति हुई है। इसी के आधार पर मानव की जीवनशैली विकसित होती है जिसे विविध संस्कृतियों के नाम से जाना जाता है। इसे स्पष्ट करते हुए कह सकते है कि प्रकृति के सीमांकन और नामांकन को संस्कृति कहते है। यही कारण है कि विक्रम कलैण्डर की गणना से महीनों और ऋतुओं के मौसम का अध्ययन-अनुमान संभव है। प्रत्येक माह, दिन और पल-क्षण के तापक्रम और नमी को समझने के लिए चन्द्रमा के नक्षत्रों से गुजरने की स्थिति का अध्ययन किया जाता है।

पृथ्वी पर मौसम परिवर्तन, ऋतुएं, पक्ष, सप्ताह, दिन-रात, शीत-ताप का निर्धारण चन्द्रमा की गति एवं स्थिति की गणना से किया जाता है, क्योंकि पृथ्वी के वातावरणीय परिवर्तनों का कारक उसका उपग्रह चन्द्रमा है, इसलिए चन्द्रमा की गति को केन्द्रित कर चान्द्र वर्ष निर्धारण किया गया है। विक्रम संवत् की गणना से वर्षा-सूखा, बाढ़ आदि का अनुमान भी लगाया जाता है। इसका संकेत नक्षत्रो से प्राप्त किया जाता है। इसको निश्चित करने के लिए एक लम्बा समय लगा होगा। उदाहरण के लिए, वर्षा का अनुमान दिया जा रहा है। आद्र्रा से 10 नक्षत्र स्त्रीलिंग मानी जाती है, विशाखा से तीन नक्षत्र नपुंसक माने जाते है। मूल से 14 नक्षत्र पुलिंग माने जाते है। यदि स्त्री-पुरुष नक्षत्र में पृथ्वी, सूर्य-चन्द्र की गति हो तो अधिक वर्षा, स्त्री-नपुंसक में हो तो कम वर्षा, स्त्री-स्त्री में हो तो केवल बादल, पुरुष-पुरुष नक्षत्र में हो तो सूखा का संकेत मिलता है। ऐसा वास्तव में होता हुआ देखा जाता है।

पृथ्वी और चन्द्रमा के परिक्रमण मार्ग में तारासमूह मील के पत्थर की तरह होते हैं, जिन्हे नक्षत्र कहा गया है। आकाश मण्डल में ज्ञात 88 नक्षत्र हैं, परन्तु चन्द्रमा केवल 27 नक्षत्रों से ही गुजरता है। नक्षत्रों को चन्द्रमा की पत्नियाँ कहा गया है, जिन्हें कृत्तिका, रोहिणी, मृगशीर्ष, आद्र्रा, पुनर्वसू, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्तचित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, अभिजित, श्रवण, घनिष्ठा, शतिषा, पूर्वा भाद्रपदा, उत्तरा भाद्रपदा, रेवती, अश्विनी, भरिणी नाम दिया गया है। पृथ्वी, चन्द्र या कोई अन्य ग्रह किस समय कहाँ है यह नक्षत्रों के माध्यम से ही जाना जाता है। चन्द्रमा को सूर्य परिक्रमण मार्ग पर 27 नक्षत्रों से गुजरने में 27.3 से 28 दिन का समय लगता है। पृथ्वी को अपने अक्ष पर घूमने में भी 27.3 से 28 दिन का ही समय लगता है। परन्तु अब आधुनिक खगोलीय अध्ययन में यह पाया गया है कि सूर्य-चन्द्र के ज्यामितीय योग के कारण पृथ्वी की परिक्रमा करने में चन्द्रमा को 29.5 दिन यानी 709 घंटे लगते हैं। इसलिए अभिजित नाम से एक आभासी नक्षत्र जोड़कर इस गणना त्रुटि का सुधार किया गया है।

चन्द्रमा द्वारा सूर्य परिक्रमण पथ पर एक नक्षत्र से गुजरने का समय ही एक दिन (तिथि) कहलाता है। चन्द्रमा की अस्थिर गति के कारण यह समय प्रत्येक नक्षत्र में हमेशा एक समान नहीं होता है। एक नक्षत्र से गुजरने में 19 से 24 घंटे का समय लगता है। इसलिए एक दिन का मान 19 से 24 घंटे तक हो सकता है। कभी-कभी एक नक्षत्र पार करने में 2 दिन का भी समय लग जाता है या एक ही दिन में दो नक्षत्रों को पार कर जाता है। इसलिए गणना में दिनो (तिथियाँ) की क्षय-वृद्धि होती रहतीहै इसके बावजूद 27 से 30 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा अर्थात महीना पूरा हो जाता है। महीने की वास्तविक गणना को नक्षत्र मास भी कहते है। सौरवर्ष और चन्द्रवर्ष में 11 दिन 3 घंटे 48 मिनट का अन्तर होता है। यह अन्तर बढ़ते-बढ़ते तीसरे साल ऐसा होता है कि दो अमावस्या के बाद पूर्णिमा तो होती है पर संक्रान्ति नहीं होती है अर्थात् सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी किसी राशि में प्रवेश नहीं करती है, इस एक चान्द्रमास को चान्द्रवर्ष के 12 महीनों की गणना से बाहर कर दिया जाता है। इसे अधिमास या मलमास यानी गणनात्मक अशुद्धि मास कहा जाता है।

शक और विक्रम संवतों के संदर्भ में एक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि यह एक दिन या किसी एक शासक के काल में नहीं बनाया गया। कालगणना की प्रक्रिया अनादिकाल से चली आ रही है। आम लोग प्रचीन काल में वनस्पतियों के प्राकृतिक रूप से उगने, फूलने, फलने के आधार पर समय की पहचान किया करते थे। आज भी झारखण्ड, मध्य भारत के जनजातीय समुदाय में मार्च माह में ही सरहुल के पेड़ में फूल आने पर सरहुल नामक नववर्ष पर्व मनाया जाता है। कालान्तर में प्रकृति के चिह्नो को पहचान कर प्रबुद्ध विद्वानो में गणना करने का प्रयास किया, जो विभिन्न कालखण्डो में प्रचलित रहे, जिसमे क्रमिक सुधार कर नये कलैण्डरो, संवतो की रचना संभव हुई। पूर्व प्रचलित सप्तर्षि, कलि आदि पंचांगो के आधार पर विक्रम संवत् की रचना की गयी है। इसके पूर्व सौर तथा चन्द्र कलैण्डर की अलग-अलग गणना की जाती थी। इसीलिए आज भी बहुत सारे क्षेत्रो में नववर्ष का पर्व सौर संवत् के अनुसार वैशाखी को ही मनाया जाता है। विक्रम काल में सौर और चन्द्र वर्ष को एक साथ समायोजित कर कृतसंवत की रचना की गयी जो आगे चल कर विक्रम संवत् के रूप में जाना गया। वर्तमान में विक्रम संवत्, शक संवत्, सप्तर्षि संवत्, कलि संवत् आदि सभी विक्रम संवत् में समाहित हो चुके है।

इस प्रकार विक्रम कलैण्डर मात्र दैनिक काम काज ही नहीं प्राकृतिक आपदाओं, कृषिकार्य, व्यापार, यात्रा, मौसम-ऋतुओं के अनुसार आहार-व्यवहार, जीवनशैली आदि के संचालन के लिए लम्बे समय के अनुभवों को संजोते हुए निर्मित किया गया है। इसलिए यह पृथ्वी की नब्ज समझने में सक्षम तथा पृथ्वी के संरक्षण में सहायक है, जो सदियों से भारतीय जन-जीवन में रचा-बसा और अपनी प्रासंगिकता बनाये हुए है।



नवरात्रों का वैज्ञानिक महत्त्व

डॉ. ओमप्रकाश पांडेय
लेखक प्रसिद्ध अंतरिक्षविज्ञानी हैं।


भारतीय अवधारणा में हिरण्यगर्भ जिसे पाश्चात्य विज्ञान बिग बैंग के रूप में देखता है, से अस्तित्व में आए इस दृष्यादृष्य जगत के सभी प्रपंच चाहे वह जड़ हों या चेतन, सभी निर्विवाद रूप से शक्ति के ही परिणाम हैं। हम सभी का श्वांस-प्रश्वांस प्रणाली, रक्त संचार, हृदय की धड़कन, नाड़ी गति, शरीर संचालन, सोचना समझना, सभी कुछ शक्ति के द्वारा ही संभव होता है। जो कुछ भी पदार्थ के रूप में हैं, उनके साथ-साथ हम सभी पंचतत्वों यानी क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा से बने हैं। उदाहरण के लिए जल में द्रव यानी गीला करने की शक्ति है, अग्नि में दाह यानी जलाने की शक्ति है, वायु में स्पर्श की शक्ति है, मिट्टी में गंध की शक्ति है और आकाश में शब्द की शक्ति है। प्रकाश और ध्वनि में तरंग की शक्ति है। सृष्टि में सृजन की शक्ति है और प्रलय में विसर्जन की शक्ति है। प्राण में जीवन शक्ति है।

आईंस्टीन का इनर्जी-मैटर समीकरण ई = एमसी2 के अनुसार भी संसार के सभी द्रव्य ऊर्जा की संहति के ही परिणाम हैं। यहाँ तक कि पदार्थों का स्वरूप परिवर्तन भी ऊर्जा की विभिन्न गत्यात्मकता से ही संभव होता है। इन सभी क्रियाओं से ऊर्जा न तो खर्च होती है और न ही उसका ह्रास होता है, वह सदैव विद्यमान रहती है। यह सनातन है, यह अक्षत है। इसे न तो पैदा किया जा सकता है और न ही समाप्त किया जा सकता है। हमें जो जड़ प्रतीत होता है, वह भी ऊर्जा के प्रभाव से अपने नाभी की परिधि में विविध वेग से गतिमान है। इन अणुओं का स्वरूप भी प्लाज्मा, क्वाट्र्ज, पार्टिकल्स यानी कणों के गतिक्रम के अनुरूप ही अस्तित्व में आते हैं। यानी गत्यात्मकताओं के इन्हीं आधारों पर ही अणु-परमाणु आदि सूक्ष्म तत्व आपसी संयोजन करके सूर्य, चंद्र तथा पृथिवी जैसे विशाल पिंडों में परिवर्तित होकर आकाश में विचरण करने लगते हैं। ब्रह्मांड में सभी कुछ गतिमान है, स्थिर कुछ भी नहीं। अनंत ब्रह्मांडों वाली ये श्रृंखलाएं प्रकृति के प्रगट स्वरूप के चार प्रतिशत के क्षेत्र में हैं, 76 प्रतिशत क्षेत्र डार्क इनर्जी का है और 21 प्रतिशत क्षेत्र डार्क मैटर का है।
इसे ऋग्वेद में कहा गया है आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मत्र्यण्च। हिरण्यय़ेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन।। यह नक्षत्रों से परिपूर्ण ब्रह्मांड की ये अनंत श्रृंखलाएं किसी बल विशेष के प्रभाव से ही निरंतर गतिशील बनी हुई हैं। यह सर्वविदित है कि किसी भी प्रकार की गतिशीलता के लिए एक स्थिर आधार की आवश्यकता होती है। हम यदि चल पाते हैं तो इसलिए कि हमारी तुलना में पृथिवी स्थिर है। इसी प्रकार सृष्टि की गतिशीलता जिस आधार पर क्रियाशील है, उसे ही ऋषियों ने निष्कलंक, निष्क्रिय, शांत, निरंजन, निगूढ़ कहा है। इस अपरिमेय निरंजन निगूढ़ सत्ता में चेतना के प्रभाव से कामना का भाव जागृत होता है, तब उसे साकार करने के लिए मातृत्व गुणों से परिपूर्ण चिन्मयी शक्ति का प्राकट्य होता है। इस तरह आदि शक्ति के तीन स्वरूपों ज्ञान शक्ति, इच्छा शक्ति और क्रिया शक्ति के उपक्रमों से प्रकृति के सत्व, रज और तम तीन गुणों की उत्पत्ति होती है। इन्हें ही उनकी आभा के अनुसार श्वेत, रक्तिम और कृष्ण कहा गया है।

अतिशय शुद्धता की स्थिति में कोई भी निर्माण नहीं हो सकता। जैसे कि 24 कैरेट शुद्ध सोने से आभूषण नहीं बनता, इसके लिए उसमें तांबा या चांदी का मिश्रण करना होता है। इसी प्रकार साम्यावस्था में प्रकृति से सृष्टि से संभव नहीं है। उसकी साम्यावस्था को भंग होकर आपसी मिश्रणों के परिणामस्वरूप उत्पन्न विकृतियों से ही सृष्टि की आकृतियां बनने लगती हैं। इसको ही सांख्य में कहा है – रागविराग योग: सृष्टि। प्रकृति, विकृति और आकृति ये तीन का क्रम होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आदि शक्ति के तीनों रूपों, उनके तीनों गुणों और तीन क्रियात्मक वेगों के परस्पर संघात से समस्त सृष्टि होती है। तीन का तीन में संघात होने से नौ का यौगिक बन जाता है। यही सृष्टि का पहला गर्भ होता है। पदार्थों में निविष्ट इन गुणों को आज का विज्ञान न्यूट्रल, पॉजिटिव और निगेटिव गुणों के रूप में व्याख्यायित करता है। इन गुणों का आपसी गुणों के समिश्रण से उत्पन्न बल के कारण इषत्, स्पंदन तथा चलन नामक तीन प्रारंभिक स्वर उभरते हैं। ये गति के तीन रूप हैं। आधुनिक विज्ञान इन्हें ही, इक्वीलीबिरियम यानी संतुलन, पोटेंशियल यानी स्थिज और काइनेटिक यानी गतिज के नाम से गति या ऊर्जा के तीन मूल स्तरों के रूप में परिभाषित करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आदि शक्ति के तीन रूप, तीन गुण और उनकी तीन क्रियात्मक वेग, इन सभी का योग नौ होता है।

जैसा कि हम देखते और जानते हैं कि जैविक सृष्टि का जन्म मादा के ही कोख से होता है। अत: मूल प्रकृति और उससे प्रसूत त्रिगुणात्मक आधारों जिसके कारण सृष्टि अस्तित्व में आती है, को हमारे मनीषियों ने नारी के रूप में ही स्वीकार किया। इसलिए पौराणिक आख्यानों में शक्ति के क्रियात्मक मूल स्वरूपों को ही सरस्वती, लक्ष्मी और दूर्गा के मानवीय रूपों के माध्यम से उनके गुणों और क्रिया सहित व्यक्त करने का प्रयास किया। हम तीन देवों की भी कल्पना करते हैं – ब्रह्मा विष्णु और महेश जोकि सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। लेकिन ये तीनों आधार हैं आधेय नहीं। ये शक्तिमान हैं। इनमें से वह शक्ति निकल जाए तो वे कभी विशिष्ट कामों के पालन में असमर्थ हो जाते हैं। शक्ति ही इनमें व्याप्त देवत्व का आधार है। इसलिए देवताओं की आरतियों के अंत में लिखा होता है – जो कोई नर गावे। कहीं भी नारी नहीं लिखा, क्योंकि नारी देवताओं की स्तुति कैसे करेगी, वह तो स्वयं वंदनीया है, देवताओं की भी स्तुत्य है।

समाज के सभी जैवसंबंध स्त्रियों पर ही टिका है। रिश्तों का सारा फैलाव, घर-परिवार की सारी संकल्पना स्त्रियों के कारण ही अस्तित्व में आती है। लेकिन पश्चिम की मानसिकता के भ्रमजाल के कारण स्वयं को केवल आधी आबादी मानने लगी हैं और पुरुषों से प्रतिद्वन्द्विता के चक्कर में पड़ गई हैं। नारी की पुरुष से प्रतिद्वन्द्विता कैसे संभव है, वह तो पुरुष को जन्म देती हैं। वह आधी आबादी नहीं है, वह तो इस समस्त आबादी की जन्मदात्री है। इसलिए माता होना नारी की सार्थकता है और माँ कहलाना उसका सर्वोच्च संबोधन है। बंगाल में हम छोटी-छोटी बच्चियों को भी माँ कह कर बुलाते हैं। हरेक संबंध में माँ लगा कर संबोधित करते हैं, जैसे पीसीमाँ, मासीमाँ, बऊमाँ आदि। इसलिए ऋग्वेद में यह निर्देश पाया जाता है कि श्वसुर बहु को आशीर्वाद दे कि वह दस पुत्रों की माता बने और पति तुम्हारा ग्यारहवाँ पुत्र हो जाए। यह वास्तविकता भी है। विवाह नया हो तो बात अलग होती है, परंतु संतानों के जन्म के बाद स्त्री का ध्यान पति की बजाय संतानों की ओर अधिक होता है और जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, स्त्री संतान की भांति ही पति की भी वात्सल्यजनित चिंता करने लगती है।

आदिशक्ति को जगज्जननी क्यों कहा गया, इसे हम ईशावास्योपनिषद के एक मंत्र से मिलता है। पहले मैं यह बता दूँ कि चूंकि वैदिक संकल्पना में ईश्वर अकल्पनीय, निराकार, निगूढ़ है, इसलिए उसकी कोई मूर्ति नहीं हो सकती, उसका आकार नहीं हो सकता। यदि कोई आकार होगा भी तो वह मनुष्य के समझ से परे होगा। हम मन, बुद्धि, कल्पना और ज्ञान के आधार पर सोचते हैं। परंतु ईश्वर तो इन सब से परे है। इसलिए हम उसकी आकृति नहीं गढ़ सकते। यजुर्वेद कहता है कि न तस्य प्रतिमा अस्ति। यह हमारी भारतीय परंपरा में बौद्धों के काल से पूर्व तक जीवंत रहा है। उससे पहले तक हम केवल शिवलिंग, शालीग्राम और पिंडी का पूजन करते थे। देवी के लिए पिंडी, क्योंकि वह गर्भ का स्वरूप है, विष्णु के लिए शालीग्राम, क्योंकि वह आकाशगंगा का स्वरूप है और शिव के लिंग, क्योंकि शिव अग्निसोमात्मक है तो दीपक के लौ के भांति लिंग। दीपक में लौ अग्नि है और तेल सोम। बुद्ध के बाद बौद्धों के तर्ज पर मूर्तियां गढ़ी गईं।

ईशावास्योपनिषद में कहा है पूर्णमिद:…।
 इसका अर्थ है कि वह भी पूर्ण है और यह जगत् भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है और फिर भी पूर्ण शेष बच जाता है। पूर्ण से पूर्ण निकल जाए, फिर भी पूर्ण शेष बचे, वही ईश्वर है। यदि नौ पूर्णांक में से नौ पूर्णांक निकल जाए तो शून्य बचना चाहिए, परंतु ऋषि कहता है कि उसमें शून्य नहीं, नौ ही बचेगा। यह एक विशेष घटना है। यह भौतिक स्तर पर संसार में कहीं नहीं घटती है, इसका केवल एक अपवाद है। एक स्त्री गर्भ धारण करती है, संतान को जन्म देती है। जन्म लेने वाली संतान पूर्ण होती है और माँ भी पूर्ण शेष रहती है। इसलिए माँ ईश्वर का ही रूप है। संसार की सभी मादाएं ईश्वर का ही स्वरूप हैं। इसलिए हमने प्रकृति की कारणस्वरूपा त्रयात्मक शक्ति और फिर उसके त्रिगुणात्मक प्रभाव से उत्पन्न प्राकृतिक शक्ति के नौ स्वरूपों को जगज्जननी के श्रद्धात्मक भावों में ही अंगीकार किया। फिर दुर्गा के नौ स्वरूपों में प्रकृति के त्रिगुणात्मक शक्ति को देखा। वे हैं – शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। ये नौ दुर्गाएं काल और समय के आयाम में नहीं हैं, उससे परे हैं। ये दिव्य शक्तियां हैं, काल और समय के परे हैं। इनका जो विकार निकलता है, वही काल और समय के आयाम में प्रवेश करता है और ऊर्जा का रूप ले लेता है।

इस प्रकार ये नौ दूर्गा, उनके नौ प्रकार और उनके प्रकार की ही काल और समय में नौ ऊर्जाएं हैं। ऊर्जाएं भी नौ ही हैं क्योंकि यह उनका ही विकार है। यह तो भौतिक ऊर्जाओं की बात हुई, अब इन भौतिक ऊर्जाओं के आधार पर सृष्टि की जो आकृति बनती है, वह भी नौ प्रकार की ही है। पहला है, प्लाज्मा, दूसरा है क्वार्क, तीसरा है एंटीक्वार्क, चौथा है पार्टिकल, पाँचवां है एंटी पार्टिकल, छठा है एटम, सातवाँ है मालुक्यूल्स, आठवाँ है मास और उनसे नौवें प्रकार में नाना प्रकार के ग्रह-नक्षत्र। यदि हम जैविक सृष्टि की बात करें तो वहाँ भी नौ प्रकार ही हैं। छह प्रकार के उद्भिज हैं – औषधि, वनस्पति, लता, त्वक्सार, विरुद् और द्रमुक, सातवाँ स्वेदज, आठवाँ अंडज और नौवां जरायुज जिससे मानव पैदा होते हैं। ये नौ प्रकार की सृष्टि होती है।
पृथिवी का स्वरूप भी नौ प्रकार का ही है। पहले यह जल रूप में थी, फिर फेन बनी, फिर कीचड़ (मृद) बना। और सूखने पर शुष्क बनी। फिर पयुष यानी ऊसर बनी। फिर सिक्ता यानी रेत बनी, फिर शर्करा यानी कंकड़ बनी, फिर अश्मा यानी पत्थर बनी और फिर लौह आदि धातु बने। फिर नौवें स्तर पर वनस्पति बनी। इसी प्रकार स्त्री की अवस्थाएं, उनके स्वभाव, नौ गुण, सभी कुछ नौ ही हैं।

इसी प्रकार सभी महत्वपूर्ण संख्याएं भी नौ या उसके गुणक ही हैं। पूर्ण वृत्त 360 अंश और अर्धवृत्त 180 अंश का होता है। नक्षत्र 27 हैं, हरेक के चार चरण हैं, तो कुल चरण 108 होते हैं। कलियुग 432000 वर्ष, इसी क्रम में द्वापर, त्रेता और सत्युग हैं। ये सभी नौ के ही गुणक हैं। चतुर्युगी, कल्प और ब्रह्मा की आयु भी नौ का ही गुणक है। सृष्टि का पूरा काल भी नौ का ही गुणक है। मानव मन में भाव नौ हैं, रस नौ हैं, भक्ति भी नवधा है, रत्न भी नौ हैं, धान्य भी नौ हैं, रंग भी नौ हैं, निधियां भी नौ हैं। इसप्रकार नौ की संख्या का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व है। इसलिए नौ दिनों के नवरात्र मनाने की परंपरा हमारे पूर्वज ऋषियों ने बनायी।

नवरात्र में नया धान्य आता है। सामान्यत: वर्ष में 40 नवरात्र होते हैं, परंतु मुख्य फसलें दो हैं रबी और खरीफ, इसलिए दो नवरात्र महत्वपूर्ण हैं – चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र। एक में गेंहू कट कर आता है और एक में चावल कट कर आता है। नये धान्य में ऊष्मा काफी अधिक होती है क्योंकि उसमें धरती की गरमी होती है। इसलिए उस नवधान्य को खाने से पचाना कठिन होता है। इसलिए नौ दिन व्रत रह कर अपनी जठराग्नि अधिक तेज किया जाता है। तब उस धान्य को पचाना सरल हो जाता है। इसमें भी शारदीय नवरात्र अधिक महत्वपूर्ण है। शारदीय नवरात्र से पहले ही गुरू पूर्णिमा, रक्षा बंधन आदि सभी महत्वपूर्ण त्यौहार पड़ते हैं। वर्षा के चौमासे के बाद फिर से गतिविधियां प्रारंभ की जाती हैं, इसलिए शारदीय नवरात्र में शक्ति की आराधना की जाती है।



शैलपुत्री

शैल यानी पहाड़। पहाड़ घनता का प्रतीक है। शैलपुत्री का विकार घनता का ही होगा और वह जब काल और समय में प्रवेश करेगी तो जो ऊर्जा बनती है, वह ऊर्जा होती है स्थिज ऊर्जा।



ब्रह्मचारिणी
ब्रह्मचारिणी यानी ब्रह्मांड में विचरण करने वाली। विचरण से विकास होता है। उसका जो विकार निकलेगा, वह विकासन का विकार होगा और वह सृष्टि में प्रविष्ट होने पर वह गतिज ऊर्जा में परिवर्तित होती है।



चंद्रघंटा
घंटा यानी ध्वनि और ध्वनि यानी प्रसारण। उसका विकार प्रसारण का विकार होगा और वह काल और समय में प्रविष्ट होने पर ध्वनि ऊर्जा बनती है।



कुष्मांडा
कुष्मांडा यानी सीताफल। उसका स्वरूप गर्भ जैसा है और उसका विकार गर्भ का विकार होगा। उससे गर्भ का ही निर्माण होगा। वह जब काल और समय में प्रवेश करेगा, उसे हम नाभीकीय ऊर्जा के नाम से जानते हैं।



स्कंदमाता
स्कंदमाता माँ है और कार्तिकेय रूपी संतान को गोद लिए है। वह वात्सल्य का प्रतीक है। उसका विकार वात्सल्य रूपी आकर्षण का विकार होगा। वह आकर्षण का विकार काल और समय में प्रवेश करने पर चुंबकीय ऊर्जा बनती है।



कात्यायिनी
कणों के निर्माण के बाद उनके आकर्षण से संकोचन प्रारंभ होता है। इसलिए कात्यायिनी का विकार संकोचन का विकार होता है। वह जब काल और समय में प्रवेश करेगी तो आण्विक ऊर्जा बनती है।



कालरात्रि
अणुओं से कणों का निर्माण होता है। बहुत सारे कण एकत्र हों तो धूल यानी रज का निर्माण होता है। धूल से अंधेरा हो जाता है। इसलिए वह कालरात्रि है। इसका विकार है विकल्पन का वह जब समय और काल के आयाम में प्रवेश करता है तो उससे ताप ऊर्जा कहते हैं।



महागौरी
कणों के जो बादल बनते हैं, उनका एकीकरण होता है। उस एकीकरण से आकाशगंगा का निर्माण होता है। आकाशगंगाओं के निर्माण होने पर नाना प्रकार के तारे, नाना प्रकार के सूर्य प्रकट हो जाते हैं। इससे ब्रह्मांड में एक प्रकाश फैल जाता है। इसलिए उसे महागौरी कहते हैं। महागौरी का विकार ज्योति है और वह जब काल और समय में प्रवेश करेगी तो उससे विद्युतीय ऊर्जा का निर्माण होगा।


सिद्धिदात्री
आकाशगंगा के निर्माण के बाद जब यह पृथिवी आदि सभी पिंड बन जाएंगे तो इसमें रासायनिक प्रक्रिया होने लगती है जिससे जीव की उत्पत्ति होने लगती है। साथ ही रासायनिक प्रक्रियाओं के कारण हाइड्रोजन, आक्सीजन आदि बनते हैं और अंतरिक्ष में फार्मल्डीहाइड के बादल बनने लगते हैं जिनसे जीवन की उत्पत्ति होती है। चूंकि ये रासायनिक प्रक्रियाएं होती हैं और उनसे जीवन बनता है इसलिए नौवीं दूर्गा को सिद्धिदात्री कहा जाता है। यानी सृष्टि निर्माण की सारी प्रक्रियाओं की सिद्धि के रूप में प्रकट होने वाली। उसका विकार पुष्टि और पूर्णता का होगा और उससे रासायनिक ऊर्जा का निर्माण होगााा


बड़ी चमत्कारी है हमारी जैविक घड़ी

पूनम नेगी
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।

कभी सोचा है कि क्यों रात को एक तय समय पर पलकें झपकने लगती हैं और सुबह एक तय समय पर खुद व खुद हमारी आंखें खुल जाती हैं। हम ही नहीं पशु-पक्षियों और वृक्ष-वनस्पतियों का जीवनक्रम भी एक सुनिश्चित प्राकृतिक लय के अनुरूप ही चलता है। यह चमत्कार होता है एक ‘जैविक घड़ी’ की वजह से; जो संपूर्ण धरती के पेड़-पौधों, प्राणी जगत और मनुष्यों पर लागू होती है। भले ही यह हमें अपने चर्मचक्षुओं से दिखायी नहीं देती किंतु सृष्टि का समूचा जीव-जगत इसी घड़ी अनुसार ही कार्य करता है।
इस ‘जैविक घड़ी’ का समय चक्र सूर्य के उदयकाल से सूर्यास्त तक और फिर सूर्यास्त के बाद से सूर्योदय तक निरन्तर बिना रुके चलता रहता है। वाह्य प्रकृति में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों की समय-सारिणी के अनुरूप ही यह आंतरिक ‘जैविक घड़ी’ शरीर के विभिन्न क्रियाकलापों का संचालन करती है। रात को एक तय समय पर नींद आना और सुबह खुद व खुद आंखें खुल जाना इसी ‘जैविक घड़ी’ की निर्धारित कार्यप्रणाली के कारण होता है। हम मनुष्य ही नहीं; पशु-पक्षियों और वृक्ष-वनस्पतियों का जीवनक्रम भी इसी सुनिश्चित प्राकृतिक लय के अनुरूप चलता है। पेड़-पौधों में निश्चित समय पर फूल एवं फल लगना, बसंत के समय पतझड़ में पुरानी पत्तियों का गिरना, पौधों का नई कोंपलें धारण करना, समय पर ही बीज का अंकुरण होना- ये सब जैविक घड़ी की सक्रियता का ही परिणाम हैं।
विज्ञान इस बात को साबित कर चुका है कि इंसानों की तरह अन्य जीव-जंतु तथा पेड़-पौधे भी रात और दिन पहचानते हैं। इस जैविक घड़ी के मुताबिक अलग अलग मौसम और दिन-रात के अनुसार शरीर को समयानुसार निद्रा, जागरण और पोषण की जरूरत होती है।
भारतीयों को गौरवान्वित होना चाहिए कि ‘जैविक घड़ी’ के बाइलोजिकल रिदम के लिए निर्धारित जीन व इसकी कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण शोध के लिए वर्ष 2017 का नोबल पुरस्कार भौतिकी के तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों- जेफ्री सी. हॉल, माइकल रोसबॉश और माइकल वी. यंग को दिया गया है। क्योंकि जैविक घड़ी के मुताबिक दिनचर्या का निर्धारण हमारे वैदिक ऋषि सदियों पहले ही कर चुके थे। उन्होंने तो घड़ी के आविष्कार के बहुत पहले ही सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों एवं नक्षत्रों की गतिविधियों द्वारा समय का हिसाब-किताब रखने का एक अनूठा विज्ञान भी विकसित कर लिया था। भारतीय ऋषियों ने मानव सभ्यता के विकास के आरम्भिक काल में ही प्रकृति की इस लय के महत्व को समझ प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करने वाली दिनचर्या और जीवनशैली विकसित कर ली थी। उन्होंने समय को भूत, भविष्य एवं वर्तमान, दिन-रात, प्रात:काल, मध्यकाल, संध्याकाल, क्षण, प्रहर आदि विभिन्न भागों में बांटकर 24 घंटे की समूची दिनचर्या को धार्मिक परंपराओं से जोड़कर सोने-जागने, खाने-पीने, काम-आराम, मनोरंजन आदि सभी क्रियाकलापों को निर्धारित समय पर करने की बात पर बल दिया था।
इस घड़ी को दुरुस्त रखने के लिए उन्होंने रात्रि के अंतिम प्रहर यानी ‘ब्रह्म मुहूर्त’ पर जागरण का विशेष महत्व बताया था। उनके अनुसार इस काल में शैया त्याग देने से उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। इस निर्धारण के पीछे उनकी जो वैज्ञानिक सोच निहित थी, उसकी पुष्टि आज के वैज्ञानिक नतीजों से भी हो चुकी है कि ब्रह्म मुहुर्त में वायुमंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु) की मात्रा सबसे अधिक 41 प्रतिशत होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है तथा शुद्ध वायु मिलने से मन, मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है। भारतीय आयुर्वेद आचार्यों का कहना है कि ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।
गौरतलब हो कि हमारे पुरातन ऋषियों और आयुर्वेदाचार्यों ने युगों पूर्व निर्धारित समय पर सोने-जागने एवं आहार-विहार के जो नियम-उपनियम बनाये थे; उपरोक्त नोबेल विजेता विज्ञानियों ने अपनी लम्बी शोधों के दौरान शरीर के बॉडी क्लॉक (जैविक घड़ी) के काम करने के तरीके को समझने का प्रयास कर हमारे पुरातन ऋषि मत का समर्थन किया है।

अंगों की सक्रियता और जैविक घड़ी कुछ रोचक तथ्य
दिलचस्प होगा कि वैदिक आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत की संहिता में हमारी ‘जैविक घड़ी’ की सक्रियता से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी जो दुर्लभ जानकारियां मिलती हैं; उन्हीं की पुष्टि यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्र्जि के भारतीय मूल के युवा वैज्ञानिक अभिषेक रेड्डी ने बीते दिनों अपनी शोधों में की है। अभिषेक रेड्डी ने अपनी शोधों में पाया कि कि मनुष्य में ‘जैविक घड़ी’ का मूल स्थान उसका मस्तिष्क है। मस्तिष्क ही हमें जगाता और सुलाता है। आइए जानते हैं कि ‘जैविक घड़ी’ की कार्यप्रणाली से तमाम ज्ञानवर्धक जानकारियां-
1. सुबह 3 से 5 बजे के बीच फेफड़े सर्वाधिक क्रियाशील रहते हैं। जो इस काल में उठकर गुनगुना पानी पीकर थोड़ा खुली हवा में घूमते या प्राणायाम करते हैं तो उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है, क्योंकि इस दौरान उन्हें शुद्ध और ताजी वायु मिलती है। हिन्दू धर्म में इस इस अमृत बेला को ध्यान और प्रार्थना को सबसे उत्तम माना गया है।
2. सुबह 5 से 7 बजे के बीच बड़ी आंत क्रियाशील रहती है। अत: इस बीच मल त्यागने का समय होता है। जो व्यक्ति इस वक्त सोते रहते हैं और मल त्याग नहीं करते उनकी आंतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती है। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।
3. सुबह 7 से 9 बजे आमाशय की क्रियाशीलता और 9 से 11 तक अग्नाशय एवं प्लीहा क्रियाशील रहते हैं। इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। अत: करीब 9 से 11 बजे का समय सुबह के जलपान और नाश्ते के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है। इस समय अल्पकालिक स्मृति सर्वोच्च स्थिति में होती है तथा एकाग्रता व विचारशक्ति भी उत्तम होती है। इसीलिए इस समय शरीर की क्रियाशीलता सबसे अधिक होती है।
4. दोपहर 11 से 1 बजे के बीच के समय में ऊर्जा का प्रवाह ह्दय में प्रवाहित होता है इसीलिए दोपहर 12 बजे के आसपास सभी प्राथमिक, उचित और मांगलिक कार्य निपटा लेने चाहिए। भारतीय संस्कृति में इस समय दया, प्रेम आदि जैसी भावनाएं एवं संवेदनाओं को विकसित करने के लिए मध्याह्न-संध्या करने का विधान बनाया गया है।
5. दोपहर 1 से 3 के बजे के बीच छोटी आंत सक्रिय होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आंत की ओर ढकेलना होता है। इस समय पर्याप्त मात्रा में पानी पीने का सुझाव दिया गया है। ऐसा करने से त्याज्य पदार्थ को आगे बड़ी आंत में जाने में सहायता मिलती है। यदि इस समय आप भोजन करते या सोते हैं तो पोषक आहार रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होगा और इससे शरीर रोगी और दुर्बल बन जाएगा।
6. दोपहर 3 से 5 बजे के बीच मूत्राशय की सक्रियता का काल रहता है। मूत्र का संग्रहण करना मूत्राशय का कार्य है। 2-4 घंटे पहले पीया गया जल मूत्र में बदल जाता है इसलिए इस समय मूत्रत्याग की इच्छा होती है।
7. शाम 5 से 7 बजे के बीच सुबह लिए गए भोजन की पाचन क्रिया पूर्ण हो जाती है अत: इस काल में हल्का भोजन करना चाहिए। शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल में) भोजन न करें। जैन मतावलंबी इस नियम का अभी भी पालन करते हैं और जो हिन्दू जानकार हैं वे भी इसी नियम से चलते हैं।
8. सुबह भोजन के 2 घंटे पहले तथा शाम को भोजन के 3 घंटे बाद दूध पी सकते हैं।
9. रात्रि 7 से 9 बजे के बीच गुर्दे सक्रिय रहते हैं। इसके अलावा इस समय मस्तिष्क विशेष सक्रिय रहता है। अत: प्रात:काल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रहता है।
10. रात्रि 9 से 11 बजे के बीच रक्तवाहिकायों और धमनियों की सक्रियता रहती है और इस समय ऊर्जा का प्रवाह रीढ़ की हड्डी में रहता है। इस समय पीठ के बल या बाईं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक शांति देने वाली होती है। रात्रि 9 बजे पश्चात पाचन संस्थान के अवयव विश्रांति प्राप्त करते हैं अत: यदि इस समय भोजन किया जाए तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहकर सड़ जाता है। उसके सडऩे से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं, जो अम्ल (एसिड) के साथ आंतों में जाम रोग उत्पन्न करते हैं इसलिए इस समय भोजन करना हानिकारक होता है
11. रात्रि 11 से 1 बजे के बीच पित्ताशय, यकृत सक्रिय होता है। पित्त का संग्रहण पित्ताशय का मुख्य कार्य है। इस समय यदि आप जाग्रत रहते हैं तो पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है जिससे अनिद्रा, सिरदर्द आदि पित्त-विकार तथा नेत्ररोग उत्पन्न होते हैं। रात्रि को 12 बजने के बाद दिन में किए गए भोजन द्वारा शरीर की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के बदले में नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। इस समय जागते रहने से बुढ़ापा जल्दी आता है।
12. रात्रि 1 से 3 बजे के बीच यकृत अर्थात लिवर ज्यादा क्रियाशील होता है। अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यकृत का कार्य है। इस समय शरीर को गहरी नींद की जरूरत होती है। इसकी पूर्ति न होने पर पाचन तंत्र बिगड़ जाता है। जिस समय शरीर नींद के वश में होकर निष्क्रिय रहता है उस समय जागते रहते से दृष्टि मंद होकर भ्रमित रहती है इसीलिए ऐसे समय में ही अधिकतर सड़क दुर्घटनाएं होती हैं।


श्राद्ध और पितृपक्ष का वैज्ञानिक महत्व

डॉ. ओमप्रकाश पांडे
लेखक अंतरिक्ष विज्ञानी हैं।
श्राद्ध कर्म श्रद्धा का विषय है। यह पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा प्रकट करने का माध्यम है। श्राद्ध आत्मा के गमन जिसे संस्कृत में प्रैति कहते हैं, से जुड़ा हुआ है। प्रैति ही बाद में बोलचाल में प्रेत बन गया। यह कोई भूत-प्रेत वाली बात नहीं है। शरीर में आत्मा के अतिरिक्त मन और प्राण हैं। आत्मा तो कहीं नहीं जाती, वह तो सर्वव्यापक है, उसे छोड़ दें तो शरीर से जब मन को निकलना होता है, तो मन प्राण के साथ निकलता है। प्राण मन को लेकर निकलता है। प्राण जब निकल जाता है तो शरीर को जीवात्मा को मोह रहता है। इसके कारण वह शरीर के इर्द-गिर्द ही घूमता है, कहीं जाता नहीं। शरीर को जब नष्ट किया जाता है, उस समय प्राण मन को लेकर चलता है। मन कहाँ से आता है? कहा गया है चंद्रमा मनस: लीयते यानी मन चंद्रमा से आता है। यह भी कहा है कि चंद्रमा मनसो जात: यानी मन ही चंद्रमा का कारक है। इसलिए जब मन खराब होता है या फिर पागलपन चढ़ता है तो उसे अंग्रेजी में ल्यूनैटिक कहते हैं। ल्यूनार का अर्थ चंद्रमा होता है और इससे ही ल्यूनैटिक शब्द बना है। मन का जुड़ाव चंद्रमा से है। इसलिए हृदयाघात जैसी समस्याएं पूर्णिमा के दिन अधिक होती हैं।
चंद्रमा वनस्पति का भी कारक है। रात को चंद्रमा के कारण वनस्पतियों की वृद्धि अधिक होती है। इसलिए रात को ही पौधे अधिक बढ़ते हैं। दिन में वे सूर्य से प्रकाश संश्लेषण के द्वारा भोजन लेते हैं और रात चंद्रमा की किरणों से बढ़ते हैं। वह अन्न जब हम खाते हैं, उससे रस बनता है। रस से अशिक्त यानी रक्त बनता है। रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से मज्जा और मज्जा के बाद अस्थि बनती है। अस्थि के बाद वीर्य बनता है। वीर्य से ओज बनता है। ओज से मन बनता है। इस प्रकार चंद्रमा से मन बनता है। इसलिए कहा गया कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन। मन जब जाएगा तो उसकी यात्रा चंद्रमा तक की होगी। दाह संस्कार के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होगा, मन उसी ओर अग्रसर होगा। प्राण मन को उस ओर ले जाएगा। चूंकि 27 दिनों के अपने चक्र में चंद्रमा 27 नक्षत्र में घूमता है, इसलिए चंद्रमा घूम कर अ_ाइसवें दिन फिर से उसी नक्षत्र में आ जाता है। मन की यह 28 दिन की यात्रा होती है। इन 28 दिनों तक मन की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए श्राद्धों की व्यवस्था की गई है।
चंद्रमा सोम का कारक है। इसलिए उसे सोम भी कहते हैं। सोम सबसे अधिक चावल में होता है। धान हमेशा पानी में डूबा रहता है। सोम तरल होता है। इसलिए चावल के आटे का पिंड बनाते हैं। तिल और जौ भी इसमें मिलाते हैं। इसमें पानी मिलाते हैं, घी भी मिलाते हैं। इसलिए इसमें और भी अधिक सोमत्व आ जाता है। हथेली में अंगूठे और तर्जनी के मध्य में नीचे का उभरा हुआ स्थान है, वह शुक्र का होता है। शुक्र से ही हम जन्म लेते हैं और हम शुक्र ही हैं, इसलिए वहाँ कुश रखा जाता है। कुश ऊर्जा का कुचालक होता है। श्राद्ध करने वाला इस कुश रखे हाथों से इस पिंड को लेकर सूंघता है। चूंकि उसका और उसके पितर का शुक्र जुड़ा होता है, इसलिए वह उसे श्रद्धाभाव से उसे आकाश की ओर देख कर पितरों के गमन की दिशा में उन्हें मानसिक रूप से उन्हें समर्पित करता है और पिंड को जमीन पर गिरा देता है। इससे पितर फिर से ऊर्जावान हो जाते हैं और वे 28 दिन की यात्रा करते हैं। इस प्रकार चंद्रमा के तेरह महीनों में श्येन पक्षी की गति से वह चंद्रमा तक पहुँचता है। यह पूरा एक वर्ष हो जाता है। इसके प्रतीक के रूप में हम तेरहवीं करते हैं। गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था करते हैं। इसलिए हर 28वें दिन पिंडदान किया जाता है। उसके बाद हमारा कोई अधिकार नहीं। चंद्रमा में जाते ही मन का विखंडन हो जाएगा।
पिंडदान कराते समय पंडित लोग केवल तीन ही पितरों को याद करवाते हैं। वास्तव में सात पितरों को स्मरण करना चाहिए। हर चीज सात हैं। सात ही रस हैं, सात ही धातुएं हैं, सूर्य की किरणें भी सात हैं। इसीलिए सात जन्मों की बात कही गई है। पितर भी सात हैं। सहो मात्रा 56 होती हैं। कैसे? इसे समझें। व्यक्ति, उसका पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्ध पितामह, अतिवृद्ध पितामह और सबसे बड़े वृद्धातिवृद्ध पितामह, ये सात पीढियां होती हैं। इनमें से वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश, अतिवृद्ध पितामह का तीन अंश, वृद्ध पितामह का छह अंश, प्रपितामह का दस अंश, पितामह का पंद्रह अंश और पिता का इक्कीस अंश व्यक्ति को मिलता है। इसमें उसका स्वयं का अर्जित 28 अंश मिला दिया जाए तो 56 सहो मात्रा हो जाती है। जैसे ही हमें पुत्र होता है, वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश उसे चला जाता है और उनकी मुक्ति हो जाती है। इससे अतिवृद्ध पितामह अब वृद्धातिवृद्ध पितामह हो जाएगा। पुत्र के पैदा होते ही सातवें पीढ़ी का एक व्यक्ति मुक्त हो गया। इसीलिए सात पीढिय़ों के संबंधों की बात होती है।
अब यह समझें कि 15 दिनों का पितृपक्ष हम क्यों मनाते हैं। यह तो हमने जान लिया है कि पितरों का संबंध चंद्रमा से है। चंद्रमा की पृथिवी से दूरी 385000 कि.मी. की दूरी पर है। हम जिस समय पितृपक्ष मनाते हैं, यानी कि आश्विन महीने के पितृपक्ष में, उस समय पंद्रह दिनों तक चंद्रमा पृथिवी के सर्वाधिक निकट यानी कि लगभग 381000 कि.मी. पर ही रहता है। उसका परिक्रमापथ ही ऐसा है कि वह इस समय पृथिवी के सर्वाधिक निकट होता है। इसलिए कहा जाता है कि पितर हमारे निकट आ जाते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कहा है विभु: उध्र्वभागे पितरो वसन्ति यानी विभु अर्थात् चंद्रमा के दूसरे हिस्से में पितरों का निवास है। चंद्रमा का एक पक्ष हमारे सामने होता है जिसे हम देखते हैं। परंतु चंद्रमा का दूसरा पक्ष हम कभी देख नहीं पाते। इस समय चंद्रमा दक्षिण दिशा में होता है। दक्षिण दिशा को यम का घर माना गया है। आज हम यदि आकाश को देखें तो दक्षिण दिशा में दो बड़े सूर्य हैं जिनसे विकिरण निकलता रहता है। हमारे ऋषियों ने उसे श्वान प्राण से चिह्नित किया है। शास्त्रों में इनका उल्लेख लघु श्वान और वृहद श्वान के नाम से हैं। इसे आज केनिस माइनर और केनिस मेजर के नाम से पहचाना जाता है। इसका उल्लेख अथर्ववेद में भी आता है। वहाँ कहा है श्यामश्च त्वा न सबलश्च प्रेषितौ यमश्च यौ पथिरक्षु श्वान। अथर्ववेद 8/1/19 के इस मंत्र में इन्हीं दोनों सूर्यों की चर्चा की गई है। श्राद्ध में हम एक प्रकार से उसे ही हवि देते हैं कि पितरों को उनके विकिरणों से कष्ट न हो।
इस प्रकार से देखा जाए तो पितृपक्ष और श्राद्ध में हम न केवल अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं, बल्कि पूरा खगोलशास्त्र भी समझ ले रहे हैं। श्रद्धा और विज्ञान का यह एक अद्भुत मेल है, जो हमारे ऋषियों द्वारा बनाया गया है। आज समाज के कई वर्ग श्राद्ध के इस वैज्ञानिक पक्ष को न जानने के कारण इसे ठीक से नहीं करते। कुछ लोग तीन दिन में और कुछ लोग चार दिन में ही सारी प्रक्रियाएं पूरी कर डालते हैं। यह न केवल अशास्त्रीय है, बल्कि हमारे पितरों के लिए अपमानजनक भी है। जिन पितरों के कारण हमारा अस्तित्व है, उनके निर्विघ्न परलोक यात्रा की हम व्यवस्था न करें, यह हमारी कृतघ्नता ही कहलाएगी।
पितर का अर्थ होता है पालन या रक्षण करने वाला। पितर शब्द पा रक्षणे धातु से बना है। इसका अर्थ होता है पालन और रक्षण करने वाला। एकवचन में इसका प्रयोग करने से इसका अर्थ जन्म देने वाला पिता होता है और बहुवचन में प्रयोग करने से पितर यानी सभी पूर्वज होता है। इसलिए पितर पक्ष का अर्थ यही है कि हम सभी सातों पितरों का स्मरण करें। इसलिए इसमें सात पिंडों की व्यवस्था की जाती है। इन पिंडों को बाद में मिला दिया जाता है। ये पिंड भी पितरों की वृद्धावस्था के अनुसार क्रमश: घटते आकार में बनाए जाते थे। लेकिन आज इस पर ध्यान नहीं दिया जाता।
(वार्ताधारित)



सृष्टि का रहस्य जानते थे भारतीय

डॉ. ओमप्रकाश पांडे
लेखक अंतरिक्षविज्ञानी हैं।

सृष्टि विज्ञान के दो पहलू हैं। पहला पहलू है कि सृष्टि क्या है? आधुनिक विज्ञान यह मानता है कि आज से 13.7 अरब वर्ष पहले बिग बैंग यानी कि महाविस्फोट हुआ था। उसके बाद जब भौतिकी की रचना हुई, अर्थात्, पदार्थ में लंबाई, चौड़ाई और गोलाई आई, वहाँ से विज्ञान की शुरुआत हुई। उससे पहले क्या हुआ, इस पर विज्ञान मौन है। क्योंकि भौतिकी की यह सीमा है। क्वांटम सिद्धांत के आधार पर अवश्य आगे का जानने के कुछ प्रयास हुए, परंतु उसमें कुछ खास सफलता नहीं मिली। उससे जो कुछ निकाला गया, वह सारी बातें हमारे शास्त्रों में पहले से है। परंतु सृष्टि रहस्य को समझने से पहले हम यह जान लें कि यह ब्रह्मांड कैसा है, उसे हम किस तरह से देखते हैं और भारतीय विधा में उसे किस प्रकार से देखा गया। पहले इसका एक विवरण यहाँ प्रस्तुत है।
भगवद्गीता में दो प्रकार के जगत की बात कही गई है – क्षर और अक्षर जगत। क्षर जगत में यह संपूर्ण ब्रह्मांड आता है और इसकी विविधता में सन्निहित एकत्व को अक्षर ब्रह्म कहा गया है। अभी हम इसी क्षर जगत के विज्ञान यानी कि ब्रह्मांड का चित्र यहाँ रखूंगा। साथ ही इस ब्रह्मांड का जो चित्र आज के आधुनिकतम यंत्रों से देखा गया, वह भी प्रस्तुत किया जाएगा।
सबसे पहले मनुष्यों के मन में प्रश्न उठा कि हम कौन हैं, कहाँ से आए, हमें बनाने वाला कौन है और ये सारी चीजें कब तक रहेंगी। इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने का उन्होंने प्रयास किया तो ज्ञान की दो विधाएं प्रारंभ हुई। एक को हम दर्शन कहते हैं और दूसरे को विज्ञान कहते हैं। जिस समय मिश्र में शरीर को सुरक्षित रखने के लिए पिरामिडों का निर्माण किया जा रहा था, उस समय भारत ज्ञान में रमा हुआ था और शरीर से ऊपर उठ कर अध्यात्म तथा आत्मा को जानने का प्रयास कर रहा था। उसने पिरामिड तो नहीं बनाया, परंतु आत्मा को जानने का प्रयास किया। कई बार यह प्रश्न लोग पूछते हैं और यह प्रश्न मुझसे भी विदेशों में कई विज्ञानियों ने पूछा कि आज तो इतने विकसित दूरबीन जैसे यंत्र हैं जिससे हम आज ब्रह्मांड को देख रहे हैं, प्राचीन काल में तो ये यंत्र नहीं थे, फिर उन्होंने ब्रह्मांड को कैसे देखा?
इसको समझने के लिए मैं एक उदाहरण देना चाहूँगा। आप जल की एक बूंद को लें उसे कन्याकुमारी के समुद्र तट पर ले जाकर पूछें कि तुम कहाँ हो तो वह उत्तर देगी वह कन्याकुमारी के तट पर है। परंतु जैसे ही उस बूंद को समुद्र में मिला देंगे, उसी क्षण वह समुद्र हो जाएगी, तो वह बूंद केवल हिंद महासागर नहीं होगी, वह उसी क्षण अटलांटिक महासागर, प्रशांत महासागर, पीला सागर, लाल सागर सभी कुछ हो जाएगी क्योंकि पृथिवी का तीन चौथाई हिस्सा जलमय है, तो फिर वह पूरे विश्व की खबर आपको देगी। ठीक इसी प्रकार हमारे ऋषियों ने समाधि अवस्था में जाकर अपनी व्यक्तिगत मेधा को ब्रह्मांडीय मेधा के साथ एकाकार कर दिया। इससे उन्हें ब्रह्मांड की सारी चीजें स्पष्ट हो गईं और उसे उन्होंने श्रुति परंपरा में डाल दिया। उसे ही बाद में लेखनीबद्ध किया। इसलिए इसे दर्शन कहा गया। इसे वह देखता है। कहा भी गया है ऋषयो मंत्रद्रष्टार:। ऋषि मंत्रों को देखते हैं। देख कर साक्षात्कार किया। इसलिए उन्होंने वेद-वेदांग, षड दर्शन, ब्राह्मण, आरण्यक आदि ग्रंथों की रचनाएं कीं। भारत के ज्ञान का प्रकाश पूरी दुनिया में फैला। यहाँ तक कि वह चीन की दिवाल को पार करके वहाँ तक भी पहुँचा।
हमारे यहाँ अंकविद्या की बात होती है। ज्योतिष का अर्थ केवल फलित ज्योतिष नहीं है। ज्योतिष का अर्थ है नक्षत्र विद्या। अंकगणित के बारे में हमें यह बताया गया कि शून्य की खोज आर्यभट ने की। परंतु यजुर्वेद के एक मंत्र 17/2 में एक से लेकर एक पर घात सत्ताइस शून्य तक का वर्णन है। साफ है कि शून्य का ज्ञान आर्यभट के पहले से ही यजुर्वेद के काल से हमारे यहाँ रहा है। यहीं से यह अंक विद्या अरब और वहाँ से यूरोप पहुँची। इसलिए इसे वहाँ अरबी न्यूमेरल्स कहा जाता है। दुर्भाग्य से अपने यहाँ भी इसे अरबी न्यूमेरल्स ही कहा जाता है।
जब इटली में पीसा की मीनार बनाई जा रही थी, भारत वेधशालाओं का निर्माण कर रहा था। उज्जैन, जयपुर में और दिल्ली में वेधशालाएं बनाई गई थीं। पश्चिम में वर्ष 1609 में गैलिलियो ने दूरबीन बनाया था। वहाँ से यह आगे बढ़ता गया। इन दूरबीनों से देखने के बाद विज्ञानियों को यह समझ आया कि पृथिवी पर स्थित दूरबीन से हम देखें तो हम अपनी आकाशगंगा का एक हिस्सा भर ही देख सकते हैं। इससे अधिक देखने के लिए आकाश में दूरबीनें स्थापित करनी होंगी। नासा ने धरती से 486 कि.मी. की ऊँचाई पर हब्बल टेलिस्कोप स्थापित किया। फिर एक टेलीस्कोप चंद्राएक्सरे 7000 कि.मी. की ऊँचाई पर और स्पिट्जर को धरती से 18 हजार कि.मी. की ऊँचाई पर स्थापित किया गया। इसके बाद और भी कई टेलिस्कोप अंतरिक्ष में स्थापित की गईँ ताकि हम ब्रह्मांड को देख सकें। अंतरिक्ष मे एक स्टेशन स्थापित किया गया है जो 7.66 कि.मी.प्रति सेकेंड की गति से चल रहा है। उस स्टेशन पर रहने वाले व्यक्ति के लिए चौबीस घंटे में सोलह दिन-रात होते हैं।
हमें बताया जाता है कि आर्यभट ने सबसे पहले कहा कि पृथिवी गोल है और हमें तो बचपन में यह पढ़ाया गया था कि कॉपरनिकस ने सबसे पहले कहा कि पृथिवी गोल है। उसके साथ ईसाइयों ने बड़ा ही अमानवीय व्यवहार किया, क्योंकि बाइबिल के जेनेसिस के अध्याय में लिखा है कि पृथिवी चपटी है। हमारे अंदर जब कुछ जागरुकता आई तो हम कॉपरनिकस से छोड़ा पीछे गए और कहा कि आर्यभट ने हमें बताया कि पृथिवी गोल है। परंतु ऋग्वेद 1/33/8 में कहा है चक्राणास: परिणहं पृथिव्या। यानी पृथिवी चक्र के जैसी गोल है। पृथिवी से जुड़ा जो भी विषय हम पढ़ते हैं, वह विषय है भूगोल। यह नाम ही बताता है कि पृथिवी गोल है।
फिर हमें वैदिक ऋषियों ने बताया कि माता भूमि: पुत्रोस्हं पृथिव्या:। यानी हम पृथिवी की संतानें हैं, वह हमारी माँ है। माता कैसे हैं? माँ के गर्भ में हम एक झिल्ली में होते हैं, ताकि माता के शरीर के अंदर के बैक्टीरिया को नुकसान नहीं पहुँचा पाता। माँ के गर्भ में ही इस झिल्ली से ही हमें सुरक्षित रखा गया है। तभी हम जन्म ले पाते हैं। ठीक इसी प्रकार पृथिवी भी एक झिल्ली में सुरक्षित है। इसे हम ओजोन परत कहते हैं। यह परत हमें सूर्य के हानिकारक विकिरणों से सुरक्षित रखती है। नासा ने इसका चित्र लिया है। उससे पता चलता है कि यह सुनहरे रंग का दिखता है। ऋग्वेद में इसका उल्लेख पाया जाता है। वहाँ कहा गया है कि वह परत हिरण्य के रंग का अर्थात् सुनहरा है। इतनी सूक्ष्मता से ऋग्वेद इसका वर्णन करता है।
आज हम जानते हैं कि पृथिवी पश्चिम से पूरब की ओर घूम रही है। इसलिए सूर्योदय हमेशा पूरब में होता है। इस बात को ऋग्वेद (7/992) का ऋषि कहता है कि बूढ़ी औरत की तरह झुकी हुई पृथिवी पूरब की ओर जा रही है। ऋग्वेद हमें यह भी बताता है कि पृथिवी अपने अक्ष पर झुकी हुई है। आज आधुनिक विज्ञान भी बताता है कि पृथिवी अपने अक्ष पर 23.44 डिग्री पर झुकी हुई है। इसके अलावा एक घूमते हुए लट्टू में जो एक लहर सी आती है, उसी प्रकार पृथिवी के घूर्णन में भी एक लहर आती है। इसके कारण पृथिवी की एक और गति बनती है। इस चक्र को पूरा करने में पृथिवी को छब्बीस हजार वर्ष लगते हैं। भास्कराचार्य ने इसे भचक्र सम्पात कहा है और इसकी कालावधि 25812 वर्ष निकाली थी। यह आज की गणना के लगभग बराबर ही है। इस गति के कारण पृथिवी का उत्तरी ध्रुव तेरह हजार वर्षों तक सूर्य के सामने और तेरह हजार वर्षों तक सूर्य के विपरीत में होता है। जब यह सूर्य के विपरीत में होता है तो बर्फ युग होता है और जब यह सूर्य के सामने होगा तो यहाँ ताप बढ़ा जाएगा जिससे बर्फ पिघलने लगेगी। इसके लिए आधुनिक विज्ञानियों ने पिछले 161 हजार वर्षों के उत्तरी ध्रुव में होने वाले तापमान में परिवर्तन की एक तालिका बनाई है। इससे भी यह बात साबित हो जाती है।
अब हम आज जानते हैं कि पृथिवी सूर्य की परिक्रमा करती है। इसके बारे में भी ऋग्वेद का एक मंत्र 10/149/1 हमें बताता है कि सविता यानी कि सूर्य एक यंत्र की भांति पृथिवी को अपने चारों ओर घुमा रहा है। पृथिवी की गति 29.78 कि.मी. प्रति सेकेंड की गति से घूम रही है। यह अपना परिक्रमा पथ 365 दिन छह घंटे बाईस मिनट में पूरा करती है। सूर्य पृथिवी को कैसे घुमा रहा है? यंत्र की भांति गुरुत्व के बल से। गुरुत्व की अगर बात की जाए तो सभी को यही पढ़ाया जाता है कि गुरुत्व का सिद्धांत आइजैक न्यूटन ने दिया। कहा जाता है कि उसने बगीचे में सेब को गिरते देख कर यह सिद्धांत दिया। अब आप वैशेषिक दर्शन का यह सूत्र देखें – अपां संयोगे अभावे गुरुत्वात् पतनम्। इसका साफ अर्थ है कि गुरुत्व के कारण गिर जाएगा। प्रश्न उठता है कि कणाद पहले हुए कि न्यूटन? कणाद तो काफी पहले हुए हैं। दूसरी बात यह है कि आज से सात वर्ष पहले लंदन के टाइम्स पत्रिका में एक खबर छपी थी कि न्यूटन के व्यक्तिगत पुस्तकालय में आर्यभटीय ग्रंथ मिला। इसमें आर्यभट की इस पुस्तक के उस पृष्ठ को चिह्नित किया हुआ था, जिसे संभवत: न्यूटन ने ही किया होगा, जिसमें आर्यभट के मुजफ्फरपुर में लीची को नीचे गिरते देखने और गुरुत्व के सिद्धांत की व्याख्या किए जाने की चर्चा है। इसका उल्लेख करके टाइम्स का संवाददाता लिखता है कि संभव है कि न्यूटन ने आर्यभट के इस उदाहरण की चोरी कर ली हो और लीची की जगह सेब देखने की बात कह दी।
पृथिवी का परिक्रमा पथ बारह भागों में बाँटा गया है। इसे ही हम बारह राशियां कहते हैं। इसे कहा जाता है कि यह सारी जानकारी हमने बेबिलोनिया तथा ग्रीस से ली। ऋग्वेद के 1/164/48वें मंत्र में कहा है बारह राशियों की चर्चा पाई जाती है। ऋग्वेद तो ग्रीस के इतिहास से काफी पुराना है। ऐसे में राशियों का सिद्धांत भारत का अपना सिद्धांत साबित होता है। इसे कहीं बाहर से नहीं लिया गया।
आज के विज्ञान ने पता लगाया है कि पृथिवी सूर्य के चारो ओर एक झूले की तरह घूम रही है। उसका परिक्रमा पथ स्थिर नहीं है। वह सूर्य की ओर दोलन करता है। इसका कालखंड एक लाख से लेकर चार लाख वर्षों का है। इस दोलन में पृथिवी कभी सूर्य के नजदीक चली जाती है और कभी सूर्य से एकदम दूर। इससे भी पृथिवी के वायुमंडल में बदलाव आता है।
हमने एक पैराणिक कथा सुनी होगी अगस्त्य द्वारा समुद्र को पी लेने की। यह कहानी भी वास्तव में अंतरिक्ष के अगस्त्य तारे से जुड़ी हुई है। अगस्त्य ऋषि द्वारा खोजे जाने के कारण इस तारे का नाम अगस्त्य तारा पड़ा। अंतरिक्ष के पिंडो के नाम ऐसे ही उनके खोजकर्ताओं के नाम पर या किसी महान हस्ती के नाम पर रखे जाते हैं। बुध नाम के ऋषि ने बुध ग्रह को खोजा। इसी प्रकार शुक्र ऋषि ने शुक्र का और वृहस्पति ऋषि ने वृहस्पति की खोज की थी। यह अगस्त्य तारा हमारे सूर्य से सौ गुणा बड़ा है। अगस्त्य तारा दक्षिण में उगता है। यह मई में अस्त हो जाता है। यह तब उदय होता है जब सूर्य दक्षिणायण होते हैं। तो एक तो सूर्य की सारी उष्मा दक्षिण की ओर जा रही है, दूसरी ओर अगस्त्य की उष्मा भी आ रही है। दोनों की संयुक्त उष्मा पृथिवी के दक्षिण में पड़ती है। हम जानते हैं कि सारे समुद्र दक्षिण में ही हैं। उन दोनों की उष्मा के कारण समुद्र से वाष्पीकरण होने लगता है। सूर्य जनवरी में उत्तरायण हो जाते हैं, परंतु अगस्त्य तारा मई तक रहता है, तब तक वाष्पीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है। इसे ही अगस्त्य का समुद्र पीना कहा जाता है। यह एक पर्यावरणीय घटना है। जैसे ही अगस्त्य तारा अस्त होता है, वाष्पीकरण की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है।
वराहमीहिर के सिद्धांत के अनुसार साढ़े छह महीने में मेघ गर्भधारण कर लेता है। इसलिए अगस्त्य के अस्त होते हैं मई के अंतिम सप्ताह से मानसून केरल से शुरू हो जाता है और जून के अंतिम सप्ताह में उत्तर भारत में आ जाता है। कालीदास के मेघदूत को अगर हम पढ़ें तो उसमें हमें मानसून का यह पूरा चक्र मिल जाएगा।
प्रकाश की गति के बारे में ऋग्वेद 1/50/9 में कहा गया है तरणिर्वश्वदर्शतो ज्योतिकृदसि सूर्य विश्वमाभासिरोचन। इसकी व्याख्या में सायणाचार्य ने लिखा है कि आधे निमिष में प्रकाश 2202 योजन यानी कि 186 हजार मील की दूरी तय करता है। आधुनिक गणना से भी यही गति प्राप्त होती है। यह बात संस्कृत के विद्वानों को तो पता है और वे इसे कहते भी हैं। इसको ही आगे बढ़ाते हुए ऋग्वेद 3/53/8 में कहा गया है त्रिर्यत् दिव: परिमुहुर्तम् आ अगात् स्वै:। अर्थात् एक मुहुर्त में सूर्य का प्रकाश तीन बार पृथिवी पर आ जाता है। एक मुहुर्त में 24.5 मिनट होते हैं। इस गणना से सूर्य का प्रकाश पृथिवी पर 8.17 मिनट में पहुंचता है। आधुनिक विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है। वह सूर्य के प्रकाश के पृथिवी तक पहुंचने का समय 8.19 मिनट बताता है। इससे हम सूर्य से पृथिवी की दूरी की भी गणना कर सकते थे। ऋग्वेद की इस गणना की बात कोई नहीं करता। सायण तो नौवीं शताब्दी में हुए हैं। ऋग्वेद तो काफी पुराना ग्रंथ है।
अपने शास्त्रों में पृथिवी को अग्निगर्भा यानी कि अग्नि के गर्भ से उत्पन्न कहा गया है। आधुनिक विज्ञान ने आज से साढ़े चार अरब वर्ष पहले की पृथिवी का जो चित्र बनाया है, उससे यह सही साबित होता है। आधुनिक विज्ञान कहता है कि उस समय पृथिवी एक हॉट बॉल यानी कि आग का गोला थी। धीरे-धीरे वह ठंडी हुई। महाभारत में भीष्म पृथिवी की गोलाई को बारह हजार कोस यानी कि चौबीस हजार मील बताते हैं। इसको किलोमीटर में बदलें तो यह अठतीस हजार छह सौ चौबीस कि.मी. आता है। आज का विज्ञान भी पृथिवी की परिधि को चालीस हजार कि.मी. ही मानता है। यह लगभग समान ही है। वैदिक ज्योतिष में पृथिवी का भार भी मापा गया है और 1600 शंख मन बताया गया है। इसे यदि हम किलोग्राम में बदलें तो आधुनिक गणना के अनुसार निकाले गए मान 6 गुणा 1024 के निकट ही आता है।
सौर मंडल को अगर हम देखें तो अपने यहाँ पुराणों में बहुत सारी कथाएं ऐसी मिलेंगी जो आपत्तिजनक प्रतीत होती हैं। जैसे कि एक कथा वृहस्पति की पत्नी और चंद्रमा के जार से बुध की उत्पत्ति होने की है। वास्तव में ऐसी कथाएं अंतरिक्ष जगत की हैं। यह कथा वृहस्पति के विभिन्न नक्षत्रों में भ्रमण करने और चंद्रमा के उसके घर में प्रवेश करने के ज्योतिषीय घटना की है। ऐसी कथाओं को बनाने का उद्देश्य इतना भर ही था कि यदि ज्योतिषीय ज्ञान कभी लुप्त भी हो तो इन्हें डिकोड करके उसे फिर से समझा जा सकेगा। इसी प्रकार आज हम देखते हैं कि शनि की काफी महिमा मानी जाती है। वास्तव में देखा जाए तो हमारे सौर मंडल में शनि का विशेष महत्व है भी। शनि और सूर्य के बीच में क्षुद्र ग्रहों की एक विशाल पट्टी है। इन्हें शनि अपनी ओर खींचता रहता है। यदि शनि इन्हें अपनी ओर नहीं खींचता तो ये सूर्य की खिंच जाते। ऐसे में क्षुद्र ग्रहों के पृथिवी से टकराने की काफी अधिक आशंका होती। लगभग प्रतिदिन कोई न कोई क्षुद्र ग्रह पृथिवी से टकराता रहता और फिर यहाँ जीवन संभव ही नहीं होता। इसलिए भी भारतीयों ने शनि को इतना महत्वपूर्ण माना।
सौर मंडल के अलग-अलग ग्रहों का परिक्रमा पथ अलग-अलग है और इस कारण उनके एक वर्ष का मान भी अलग-अलग हैं। जैसे वरूण यानी कि नेपच्यून ग्रह का एक वर्ष पृथिवी के 164 वर्ष का है। यानी यदि आप नेपच्यून पर एक वर्ष बिता कर लौटेंगे तो पृथिवी पर 164 वर्ष बीत चुके होंगे। इसको समझाने के लिए भी पुराणों में रेवती की एक कथा आती है। इस कथा में रेवती के विवाह के लिए चिंतित उसके पिता उसे लेकर ब्रह्मलोक चले जाते हैं। वहाँ वे ब्रह्मा से रेवती के लिए योग्य वर के बारे में पूछते हैं। ब्रह्मा कहते हैं कि शीघ्रता से वापस पृथिवी पर जाओ अन्यथा वहाँ वर नहीं मिल पाएगा। वे सतयुग में पृथिवी से गए थे और लौटे तो यहाँ द्वापर युग का अंत चल रहा था। फिर उन्होंने रेवती की शादी बलराम से की। इस प्रकार ब्रह्मांड में भिन्न-भिन्न संदर्भों में भिन्न-भिन्न वर्ष होते हैं।
आज हम यह जानते हैं कि चंद्रमा सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होता है। यह बात यजुर्वेद 18/40 का ऋषि भी कहता है। वहाँ कहा गया है – सूर्य रश्मि: चन्द्र्मसं प्रति दीप्यते। सूर्य की रश्मि से चंद्रमा प्रकाशमान है। भारतीय मासों के नाम चंद्रमा के अनुसार ही तय किए गए हैं। चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसके नाम पर ही उस मास का नाम होता है। चित्रा नक्षत्र में चंद्रमा हो तो वह चैत्र मास कहलाता है, विशाखा में हो तो वैशाख, ज्येष्ठा में हो तो ज्येष्ठ कहलाएगा। इस प्रकार भारतीय कालगणना पूरी तरह विज्ञान पर आधारित है।


भारतीय गणित = अमूल्य धरोहर

कुमार गंधर्व मिश्रा
लेखक गणित के शोधार्थी हैं।
ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि सभ्यताओं के विकास और विस्तार में गणित ने भी अमूर्त रूप से भूमिका निभाई है, वास्तव में किसी सभ्यता के विकास का अंदाजा वहां पर पनपी गणितीय संस्कृति से भी लगाया जा सकता है।
लगभग 3000 ई. पू. की सिंधु घाटी सभ्यता कुछ ऐसा ही दर्शाती है। सिंधु घाटी सभ्यता अपने व्यवस्थित नगरों व संरचना के लिए जानी जाती है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के स्थलों पर खुदाई ने वहाँ उपयोग किए जाने वाले मूलभूत गणित से पर्दा उठाया। उस समय का गणित काफी व्यवाहरिक था। वजन और लम्बाई नापने के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले तराजू और अनेक यन्त्र खुदाई में निकले। भवनों के निर्माण हेतु प्रयोग की जाने वाली ईंटें तो कमाल की थीं। इन ईंटों की लम्बाई, चौड़ाई और उंचाई 4, 2 और 1 के अनुपात में थीं। वजन के तराजू भी अलग अलग आकारों के थे, जैसे- घनाकार, बेलनाकार, शंकुाकार इत्यादि, जो उस काल के ज्यामितीय ज्ञान को दर्शाते हैं। इतना ही नहीं, इन वजनों के अनुपात का मानकीकरण भी था। जैसे, 1/16, 1/8, 1/4, 1/2, 1, 2, 3। रेखा मापक यानी स्केल भी बराबर-बराबर दूरियों पर चिन्हित था।
उस समय के स्नानागार, शहर की ज्यामितीय व्यवस्था, नक्काशियों व मुहरों में वृत्ताकार आकारों का उपयोग इत्यादि उनकी विद्वता झलकाती है। आधुनिक गणना के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता के साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप में गणितीय संस्कृति की शुरुआत हो चुकी थी। गणितीय और वैज्ञानिक विद्वता की झलक वैदिक सभ्यता में भी देखने को मिलती है। लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व संस्कृत व्याकारण के अधिष्ठाता पाणिनि जो मूल रूप से भाषाविज्ञानी थे उन्होंने अपने ग्रंथ में शून्य की धारणा को भी रखा। यहाँ पर शून्य की धारणा का आशय अनुपस्थिति से था। अब से लगभग तेईस सौ वर्ष पूर्व छंदशास्त्री पिंगल ने शब्दांशो के क्रमांतरण और संयोजन पर कार्य किया। उन्होंने अक्षरों को गुरु और लघु की श्रेणियों में बाँटा और उनके क्रम और संयोजन से नए छंद आविष्कृत किये और इसी सम्बंध में मेरु प्रशस्त्र की खोज की, जिसे आज ‘पास्कल्स ट्राएंगलÓ के नाम से जाना जाता है। हल्युध ने 200 ई. में इस पर प्रकाश डाला और इस सन्दर्भ में उन्होंने द्विपद प्रमेय का भी उल्लेख किया। इस प्रकार गणित के क्षेत्र में भारत के कई महत्वपूर्ण योगदान हैं। आईये देखते हैं, गणित के विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय गणितज्ञों ने किस प्रकार योगदान दिया है।
ज्यामिति
भारत की उच्च स्तरीय ज्यामिति वैदिक अनुष्ठानो के ग्रंथो से ही झलकती है। ज्यामिति का उद्भव यज्ञ की वेदी का निर्माण करने के सन्दर्भ में हुआ था। इस तरह का सबसे प्राचीनतम अभिलेख बौधायन का शुल्बसूत्र माना जाता है। यज्ञ के लिए वेदियों के निर्माण का वर्णन करते ये शुल्बसूत्र ज्यामितीय रचनाओं पर आधारित हैं। ‘शुल्बÓ का अर्थ है नापना या नापने की क्रिया। ये शुल्बसूत्र अपने लेखकों के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। इनमे प्रमुख हैं- बौधायन का शुल्बसूत्र, आपस्तम्ब का शुल्बसूत्र, कात्यायन का शुल्बसूत्र और मानव का शुल्बसूत्र। पाश्चात्य इतिहासकारों के अनुसार इन शुल्बसूत्रों का रचना काल 1200 से 800 ई. पू. माना गया है। शुल्बसूत्र उस काल में भारतीयों की क्षेत्रफल और माप की गहरी समझ और निपुणता को दर्शाते हैं। अपने एक सूत्र में बौधायन ने विकर्ण के वर्ग के नियम बताये हैं –
‘दीर्घचतुरस्त्रस्याक्ष्णया रज्जु: पाश्र्वमानी तिर्यङ्मानी च यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति’
अर्थात् एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इक्कठा बनाता है जितना कि उसकी लंबाई और चौड़ाई अलग अलग बनाती है। आज के दिनों में दुनिया इसे पाइथागोरस के प्रमेय के रूप में जानती है। साफ है कि भारतीय गणितज्ञ इस अवधारणा से पाइथागोरस के पहले से ही परिचित थे।
इन शुल्बसूत्रों से विभिन्न ज्यामितीय सरंचनाओं की निर्माण विधि का पता चलता है, जैसे दो वर्गों के जोडऩे या घटाने पर किसी खास क्षेत्रफल के नये वर्ग का निर्माण होना, किसी आयत को समान क्षेत्रफल के वर्ग में परिवर्तित करना, किसी वृत्त को लगभग-लगभग समान क्षेत्रफल के वर्ग में तब्दील करना और इसका उल्टा करना, ज्यामितीय तरीके से वर्गमूल ज्ञात करना और सबसे महत्वपूर्ण था श्रीयंत्र का निर्माण करना। श्रीयंत्र अपने आप में ही बेहद जटिल ज्यामितीय रचना है।
श्रीयंत्र जैसी रचना उच्च स्तरीय गणित को दर्शाती है। इस तरह की रचनाओं में कई लकीरों एवं गोलाकार चापों के समूह को एक साथ इतने सूक्ष्म तरीके से उकेरना कोई साधारण घटना नहीं है। रूसी शोधार्थी कुलैचेव (श्रीयंत्र पर इनका पत्र इंडियन जर्नल ऑफ़ हिस्ट्री ऑफ साइंस ने 1984 में प्रकाशित किया था) के अनुसार इस तरह की सूक्ष्म गणना करना नए जमाने के कम्पयूटरों की क्षमता से भी बाहर है। उनके अनुसार श्रीयंत्र के केंद्र में बने ज्यामितीय रचना (14 कोण का वह बहुभुज जो 9 त्रिभुजों के प्रतिच्छेदन से निर्मित हुआ है।), इतनी उत्तम बनी हुई है कि हस्तनिर्मित लगता ही नहीं है, चूँकि इसके लिए कई प्रतिच्छेदित बिन्दुओं का सुपर-पोजीशन करने की आवश्यकता है।

ब्रह्मगुप्त (598 ई. ) का ब्राह्म स्फुट सिद्धांत

ब्राह्म स्फुट सिद्धांत (628 ई.) के 24 अध्याय और 1022 श्लोकों में ब्रह्मगुप्त ने ज्योतिष और गणित से सम्बंधित जानकारी दी है। इस ग्रन्थ के 12 वेंअध्याय, गणिताध्याय में क्षेत्र व्यवहार (त्रिभुज, चतुर्भुज आदि के क्षेत्रफल), छाया व्यवहार (दीप स्तम्भ और उसकी छाया से सम्बंधित प्रश्न) का भी वर्णन किया है। ब्रह्मगुप्त ने चक्रीय चतुर्भुज के गुणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल और विकर्णो को प्राप्त करने के लिए सूत्र दिए।
‘भुजयोगार्धचृतष्टयभुजोनघातात् पदं सूक्ष्मम्’
यदि किसी चक्रीय चतुर्भुज के बाजुओं की लम्बाई ए, बी, सी और डी है, दोनो विकर्णो की लम्बाई डी1, डी2 है और अर्ध परिधि है एस है तो
पश्चिम में यह सूत्र डब्लू स्नेल ने वर्ष 1619 में प्राप्त किया था। अगर किसी एक बाजु को हटा दिया जाये या डी को सी से मिला दिया जाये ताकि सी = 0 हो जाये तो क्षेत्रफल का सूत्र हेरोन के सूत्र (त्रिभुज का क्षेत्रफल ज्ञात करने के लिए) के बराबर हो जायेगा। 1530 ई. में इस तरह के सूत्रों का सुस्पष्ट प्रमाण ज्येष्ठदेव (केरल के गणित विद्यालय) द्वारा रचित युक्तिभाषा में पाया जाता है। अत: अगर हजारों वर्षों तक चक्रीय चतुर्भुज के विकर्णो का सूत्र दुनिया के किसी दूसरे कोने में नहीं ज्ञात था तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण घटना/विषय है।

त्रिकोणमिति

यह कहना गलत नहीं होगा कि त्रिकोणमिति के अध्ययन ने बीजगणित और ज्यामिति को एक साथ जोड़ा। 300 ई. के दौरान सूर्य सिद्धांत में त्रिकोणमिति का वर्णन मिलता है। सभ्यताओं के शुरुआत से ही मनुष्य में खगोलीय पिंडो (ग्रहों, तारों, चद्रमा और सूर्य) की गति और चाल को लेकर उत्सुकता रही। इन खगोलीय पिंडो की गति के रूप को जानने के क्रम में ही भारत और ग्रीस (यूनान) में त्रिकोणमिति का उद्भव हुआ। भारत में खगोलशास्त्र और त्रिकोणमिति शुरू से ही एक दूसरे के अभिन्न अंग रहे। इस तरह की गणना का उपयोग त्योहार, मुहर्त, फसल- कटाई आदि का उपयुक्त समय व दिन ज्ञात करने के लिए किया जाता था।
त्रिकोणमिति पर भारतीयों और ग्रीकों के दृष्टिकोण में अंतर रहा। ग्रीक त्रिकोणमिति वृत्त के जीवा और उनके कोणों के संबंधों पर आधारित थी। भारतीय त्रिकोणमिति ‘ज्याया जीवाÓ (आज की भाषा में) पर आधारित थी। निश्चित तौर पर भारतीयों की विधि को पूरे संसार में स्वीकारा गया क्योंकि गणना करने के लिए यह काफी सरल है।
इसी प्रकार भारतीयों द्वारा समकोण त्रिभुजों का उपयोग कर तीन आयामी प्रक्षेपण से गोलीय त्रिकोणमिति या स्फेरिकल त्रिकोणमिति का अध्ययन भी काफी सराहा जाता है। त्रिकोणमिति से जुड़े अध्ययन आर्यभट के आर्यभटीय (जन्म 476 ई.) में मिलते हैं। उसके पश्चात् वराहमिहिर (जन्म 505 ई.) के पञ्चसिद्धान्तिका (575 ई. ) में और ब्रह्मगुप्त के ब्राह्म स्फुट सिद्धांत में भी मिलते हैं। आर्यभटीय की रचना आर्यभट ने 499 ई. में की थी।

साइन, कोसाइन का भारतीय सम्बन्ध

इसमें कोई दोराय नहीं है कि यूरोप में भारतीय गणित के बहुत सारे पहलुओं का प्रचार-प्रसार अरबवासियों ने किया। भारतीय ग्रन्थ जब अरब पहुंचे तो अरबी अनुवादकों को एक भारतीय शब्द ‘जीवा’ से कठिनाई हुई। अरबी लिपि में इ, उ जैसे स्वर-अक्षर नहीं है। इस वजह से अरबी अनुवादकों ने ‘जीवा’ को जब बनाकर अपना लिया। जब ये अनुवादित ग्रन्थ यूरोप पहुंचे तो यूरोपीय अनुवादकों ने जब शब्द को जेब की तरह समझा। जेब शब्द यानि कि कमीज में कुछ रखने के लिए कोई खास जगह। उस समय अरबी लोगों की कुरते की जेब छाती के पास रहती थी। लैटिन भाषा में छाती को ‘सिनुस’ कहा गया। इसी ‘सिनुस’ शब्द से ‘साइन’ शब्द प्रचलन में आया। इसी तरह ‘कोज्या’ ‘कोसाइन’ बना।
अधिकांश अभिलेखों में वृत्त का चतुर्थ खंड 24 बराबर हिस्सों में बाँटा गया है। इसी तरह देखा गया कि आर्यभट ने 3ए45′ के अंतर पर ज्यासारणियाँ विकसित कीं।
वृत्त के चौथाई हिस्से को 24 से भी अधिक हिस्सों में बांटने और उनका मान ज्ञात करने की विधि भास्कराचार्य (जन्म 1114 ई. ) अर्थात् भास्कर द्वितीय द्वारा रचित सिद्धांतशिरोमणि (1150 ई. ) के ज्योतपत्ती में वर्णित है। भास्कर द्वितीय दो कोणों के मान के अंतर का ज्या यानि साइन ज्ञात करने की विधि बतलाते हैं। ‘जीवे॒ परस्पर न्या॒यÓ में तो भास्कर 1ए के अंतर पर साइन (ज्या) ज्ञात करने का सूत्र देते हैं।
ब्रह्मगुप्त ने अपने खंडखाद्यक: में ज्या (साइन) और कोज्या (कोसाइन) के फलन (फंक्शन) के सम्बंध में द्वितीय कोटि प्रक्षेपण का प्रयोग किया है। आधुनिक भाषा में हम इसे सेकेंड आर्डर इंटरपोलेशन कहते हैं। अत: हम देखते हैं कि किस प्रकार हमारे गणितज्ञों ने त्रिकोणमिती से जुड़े कई पहलुओं को उजागर किया जिनका प्रयोग आज भी होता है। ऐसे और भी कई उदाहरण और उपपत्तियां भरे पड़े हैं। दिल्ली, राजस्थान और अन्य स्थानों पर जंतर मंतर का निर्माण भी भारत में त्रिकोणमिति के वैभव को दर्शाता है। जंतर मंतर पर विभिन्न यन्त्र निर्मित किये गए जो त्रिकोणमिति के सिद्धांतो पर ही आधारित है। भारत के सदियों पुराने त्रिकोणमिति और खगोलशास्त्र के विज्ञान को 1975 में सम्मान मिला जब अंतरिक्ष में भारत ने अपना पहला उपग्रह आर्यभट को समर्पित किया।

अंकगणित

प्रख्यात गणितज्ञ लाप्लैस ने कहा थारू ‘किसी भी संख्या को सिर्फ दस संकेतों (हर संकेत का अपना मान और स्थान है) के एक समुच्चय से व्यक्त कर देने की इतनी सरल भारतीय प्रणाली को शायद ही उतनी सराहना मिलती है, जितनी मिलनी चाहिए। इसकी सरलता इसमें है कि इसने गणना और अंकगणित को सार्थक आविष्कारों में सबसे आगे रखा। इसकी महत्ता तब समझ आती है जब यह एहसास होता है कि प्राचीनकाल के दो महान मानव आर्कीमिडिज और अपोलोनियस भी इसे ढूंढ नहीं पाए।’
दश संकेतो का प्रयोग कर दश स्थानों को मान देने की प्रणाली भारतीयों की देन है। भारतीय अंको के उद्भव का अनुमान ब्राह्मी लिपि से लगाया जाता है, जो कि 300 ई. की अशोक स्तंभों के शिलालेखों पे देखा जा सकता है। आज उपयोग किया जा रहा शून्य का चिन्ह भारत की ही देन है, बक्षाली पांडुलिपि और ग्वालियर के एक मंदिर की दीवालों पे उभरे (876 ई.) शून्य के चिन्ह इस बात के प्रमाण हैं। ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय द्वारा बक्षाली पांडुलिपि पर आये 2017 में हाल के शोध के प्रमाण इन्हें और भी 100 वर्ष पुराना मानते हैं यानि कि तीसरी और चौथी शताब्दी के बीच ।
बक्षाली पांडुलिपि और ग्वालियर के मंदिर की दीवालों पर उभरे गोलाकार चिह्न ही आज के शून्य के चिह्न हैं। भारत के अलावा और भी कई सभ्यताओं जैसे माया, बेबीलोनियन में शून्य का ‘स्थानधारक’ की तरह उपयोग देखने को मिलता है, पर जो खास बात भारत को अलग करती है वो है शून्य का संख्या की तरह उपयोग। अर्थात शून्य को मान की अवधारणा देना। इस प्रकार 1 से लेकर 9 तक (और शून्य 0 को लेते हुए ) का सहारा लेते हुए हर प्राकृतिक संख्या को एक बहुपद की तरह दर्शाना काफी आसान हो जाता है।
इस बहुपदीय सरंचना से अंकगणितीय संक्रियाएँ करना जैसे, जोड़, घटाव, गुणा, भाग, वर्गमूल ज्ञात करना काफी आसान होजाता है। ब्रह्मगुप्त ने ब्राह्म स्फुट सिद्धांत में ऋणात्मक संख्याओं का उपयोग किया है। इसी प्रकार भास्कर ने अपनी ‘लीलावतीÓ में ऋणात्मक संख्याओं को अंक रेखा पर बायीं दिशा में दर्शाया है। भारतीय अंक पद्धति ने गणना को काफी सरल बना दिया जिससे व्यापार, विज्ञान, आर्थिक गतिविधि को काफी बल मिला और सभ्यताओं का विकास भी हुआ।

बीजगणित

अज्ञात राशियों के साथ गणना करने की अवधारणा ही बीजगणित जन्म देती है। पृथदुक स्वामी (830 – 890 ई.) ने इसे बीजगणित का नाम दिया। ब्राह्म स्फुट सिद्धांत में ऋणात्मक व घनात्मक अवधारणा संबंधी नियम भरे पड़े थे । इन्ही नियमो ने बीजगणित में मूलभूत नियम की भूमिका निभायी। शुल्बसूत्रों और बक्षाली की पांडुलिपि में भी बीजगणित का कुछ स्वरुप दिखाई देता है। भारत में आर्यभट के समय से बीजगणित एक स्वतंत्र शाखा के रूप में देखा जा सकता है। आर्यभट ने आर्यभटीय की रचना की। इस ग्रंथ में कुल 121 श्लोक हैं जो चार अध्यायों में विभाजित हैं – गीतिकापाद – 13 श्लोक, गणितपाद – 33 श्लोक, कालक्रियापाद – 25 श्लोक, गोलपाद – 50 श्लोक। इनमें गणितपाद में आर्यभट ने अंकगणित एवं बीजगणित पर प्रकाश डाला है।
आर्यभट अज्ञात राशियों के लिए ‘गुलिका’ शब्द का प्रयोग करते हैं। आर्यभट ने श्रेणी के पदों के योग के भी सूत्र दिए हैं। उन्होंने अनिर्धार्य समीकरण (कुट्टकार विधि) भी हल किये। आज इस तरह के समीकरणों को हल करने का श्रेय डायोफेंटस को मिलता है। भास्कराचार्य ने भी लीलावती में श्रेणी और समीकरण संबंधित अनेक सूत्र दिए हैं। कई उदाहरण तो आज की नंबर थ्योरी की नींव डालते हैं।
ब्रह्मगुप्त एक महान गणितज्ञ थे। उन्होंने ब्राह्म स्फुट सिद्धांत को 24 अध्यायों में रचा। इस ग्रंथ का 12 वां (गणिताध्याय) और 18 वां अध्याय (कुट्टकाध्याय ) गणित से सम्बंधित है। 103 श्लोकों से भरा यह कुट्टकाध्याय बीजगणित पर केन्द्रित है। चक्रीय चतुर्भुज और उसके विकर्णो के बारे में तो हम चर्चा कर ही चुके है। ब्रह्मगुप्त के सबसे महत्पूर्ण योगदानों में से एक है एक खास तरह के द्विघातीय समीकरण का हल विशेषकर पेल समीकरण का हल।
आज इस समीकरण को पेल समीकरण के नाम से जाना जाता है, यद्यपि पेल का जन्म इसके 1000 वर्ष बाद हुआ था और उनका इस समीकरण से कोई लेना देना नहीं था। ब्रह्मगुप्त की प्रमेयिका द्विचर सरंचना के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हुई। इस विधि का प्रयोग उपरोक्त समीकरण के हल ज्ञात करने के लिए ज्येष्ठदेव और भास्कराचार्य द्वारा खूब किया गया जो कि ‘चक्रावल विधि’ के नाम से प्रचलित हुआ। ब्रह्मगुप्त द्वारा दिए गए विधि का प्रयोग गणित के राजकुमार कहे जाने वाले ‘गॉस’ ने भी खूब किया।
द्विघात समीकरण के सन्दर्भ में श्रीधराचार्य (जन्म 8वीं शताब्दी) का सूत्र सदाबहार है। भास्कराचार्य ने वर्ग समीकरणों के हल के लिए श्रीधराचार्य के नियम को उधृत किया है। महावीराचार्य (9 वीं शताब्दी) ने गणित सार-संग्रह की रचना की। बीजगणित से सम्बंधित अनेक उदाहरणों में उनका प्रकृति प्रेम उजागर होता है। जैसे, पक्षी, पर्वत, फूलों और उनकी संख्या पर आधारित पहेलियाँ देना। महावीर ने अपनी पहेलियों द्वारा उच्च घातांको वाले समीकरण, प्रतिस्थापन विधि की भी व्याख्या की है। जैसे, ‘हाथियों के झुण्ड में से, उनकी संख्या के 2/3 भाग के वर्गमूल का 9 गुना प्रमाण और शेष भाग के 3/5 भाग के वर्ग मूल का 6 गुना प्रमाण और अंत में शेष 24 हाथी वन में ऐसे देखे गए जिनके विशाल गंड मंडल से मद झर रहा था। हाथियों की संख्या ज्ञात करो।’
अपनी बीजगणितीय क्षमता का उदाहरण देते हुए महावीर ने समकोण त्रिभुज के निर्माण के नियम दिए है। भास्कराचार्य ने 1150 ई. में सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ की रचना की। सिद्धांत शिरोमणि के चार भाग हैं – लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय, और ग्रह-गणित। इन सबमें लीलावती भास्कर की सबसे लोकप्रिय रचना साबित हुई। लीलावती में भास्कर ने गणितीय प्रश्नों को काव्यात्मक शैली में प्रयोग किया है। विभिन्न अलंकारों का सुंदर प्रयोग इसे और भी पठनीय बनाता है। भास्कराचार्य ने तीन और चार घाट वाले समीकरणों पे भी प्रकाश डाला है। बीजगणित के वर्गप्रकृति नामक अध्याय में भास्कराचार्य ने ब्रह्मगुप्त से सम्बंधित विधियों के उदाहरण दिए हैं, जिनमें अनंत हल प्राप्त किये जा सकते हैं। भास्कराचार्य का चक्रवाल विधि काफी प्रसिद्ध हुआ। प्रसिद्ध गणितज्ञ आंद्रे वाइल्स ने भी इस विधि को प्राप्त करना काफी असाधारण बतलाया है।

अन्य महत्वपूर्ण योगदान

प्रसिद्ध जैन गणितज्ञ महावीराचार्य ने क्रमांतरण और संयोजन की विधियों पर भी कार्य किया । श्रेणियों पर भी महावीर ने काम किया। लघुत्तम समापवत्र्य की अवधारणा भी महावीर के गणित सार संग्रह में मिलती है। पूर्ववर्ती गणितज्ञों की अपेक्षा में आर्यभट ने पाई का मान दशमलव के बाद चार अंको तक ज्ञात किया।
केरल के गणित विद्यालयों ने भारतीय गणित को और भी उंचाई तक पहुँचाया। इन गणित विद्यालयों ने माधव जैसे गणितज्ञ के कार्य को उजागर किया। माधव यानी माधवाचार्य (1340 ई. 1425 ई.) ने कलन (कैलकुलस), त्रिकोणमिति और अनंत श्रेणी के विस्तार में अतुलनीय योगदान दिये। ज्येष्ठदेव की युक्तिभाषा, नीलकंठ सोमयाजी के तंत्र समग्रह, पुटूमन सोमयाजी के कर्ण पद्धति में माधव के कार्य का उल्लेख मिलता है। माधव ने गणित को त्रिकोणमिति से सम्बंधित कई विस्तार दिए। उनकी कई श्रेणियों का प्रयोग विभिन्न कोणों के ज्या (साइन) और कोज्या (कोसाइन) का मान ज्ञात करने के लिए किया जाता था, जो कि बिल्कुल सटीक परिणाम देतीं। इस तरह का पैनापन यूरोप में नहीं आया था। समीकरण ख को आज ग्रेगरी श्रेणी से जाना जाता है, जबकी माधव ने ग्रेगरी से 300 वर्ष पहले ही ऐसे समीकरणों को दुनिया के सामने लाया था। माधव ने इस सुंदर सूत्र की भी खोज की – यह सूत्र प्रसिद्ध गणितज्ञ लेबनीज ने भी बाद में खोजा। युक्तिभासा में माधव के कार्य को लेकर पता चलता है कि समाकलन की अवधारणा योग या संकलन-फल की सीमा (लिमिट) से सम्बंधित थी, जो आज के आधुनिक अवकलन विधि (विस्तार और पदों का एक एक कर अवकलन करना) से मेल खाती है। माधव के गणितीय कार्य यह दर्शाते हैं कि न्यूटन और लेबनिज से तीन शताब्दी पहले ही भारत कलन और गणितीय विश्लेषण में गहराई और परिपक्वत्ता हासिल कर चुका था।

आधुनिक भारतीय गणितज्ञ

उन्नीसवीं सदी के अंत में भारत के महान गणित सितारे का जन्म हुआ – श्रीनिवास रामानुजन (1887-1920 ई.)। रामानुजन का जीवन और उनका संघर्ष किसी से छुपा हुआ नहीं है। रामानुजम का महान गणितज्ञ हार्डी के नाम पत्र जिसमें उनके 120 प्रमेयों का भी उल्लेख था, ने हार्डी को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने रामानुजन को तुरंत ही इंग्लैंड बुलवा लिया। रामानुजन ने हार्डी के साथ अपनी गणितीय प्रतिभा को और भी निखारा। नंबर थ्योरी में अतुलनीय योगदान के लिए रामानुजन को रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन का फेलो (अध्येता) चुना गया। पहली बार कोई भारतीय रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन का सदस्य चुना गया था। रामानुजन के खास परिणामो में रामानुजन- रोजर्स फंक्शन हैं।
रामानुजन की एक श्रेणी है जिसका अभिसरण (कन्वर्जेंस) बहुत ही तेज गति से होता है। इसका उपयोग मशीन कंप्यूटिंग द्वारा कई अरब अंको तक पाई का मान निकालने के लिए किया गया। रामानुजन का टाउ फलन भी काफी चर्चित रहा। रामानुजन ने नंबर थ्योरी, गणितीय विश्लेष्ण, हाईपर जियोमेट्रिक श्रेणी, गामा फलन/फंक्शन, माड्यूलर फॉर्म आदि पे काफी काम किया। उनके खोये हुए महत्वपूर्ण पत्रों में उल्लिखित प्रमेयों की संख्या 4000 बतायी गई है। नंबर थ्योरी में ‘पार्टीसंसÓ (किसी घनात्मक पूर्णांक को अन्य घनात्मक पूर्णांक के योग की तरह दर्शाना) पर उनके कार्य ने भी काफी गणितज्ञों को आकर्षित किया।
रामानुजन की उपलब्धियों को आगे बढ़ाते हुए हरीश चंद्र 1973 में रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लन्दनÓ के अध्येता चुने गए। इनके बाद एम. एस. नरसिम्हा (1988), सी. सेशाद्री (1988), श्रीनिवास वर्धन (1998) और एम. एस. रघुनाथन (2000) को भी गणित में योगदान के लिए रॉयल सोसाइटी का अध्येता चुना गया। प्रख्यात सांख्यिकीविद सी. आर. राव को भी सांख्यिकी में योगदान के लिए रॉयल सोसाइटी का अध्येता चुना गया। आधुनिक काल में इनके अलावा और भी गणितज्ञ हुए हैं, जिन्होंने गणित में अपने योगदान का लोहा मनवाया और कई प्रसिद्ध सोसाइटी के अध्येता बने और पुरस्कृत भी हुए। गणित के क्षेत्र में भारत की धमक और चमक भी बढ़ी है। वर्ष 2010 में भारत में आयोजित हुई आई. सी. एम. गणितज्ञों का अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन इस बात का प्रमाण है। 100 वर्षों के इतिहास में पहली बार इस तरह के सम्मलेन का आयोजन भारत में हुआ था। आई. सी. एम. में एक वक्ता के लिए चयन होना बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है और 1970 से हर बार किसी न किसी भारतीय गणितज्ञ (जो भारत में ही रह कर शोध कर रहे हैं) को एक वक्ता के तौर पर हमेशा आमंत्रित किया गया है। यह सौभाग्य बहुत सारे यूरोपीय और चीन जैसे देशों को भी प्राप्त नहीं हो पाया है।
गणित का नोबेल पुरस्कार माने जाने वाला फील्ड्स मेडल पुरस्कार वर्ष 2014 में भारतीय मूल के अमरीकी गणितज्ञ मंजूल भार्गव को प्रदान किया गया। मंजूल भार्गव का भारतीय शास्त्रीय संगीत से बचपन से काफी लगाव रहा है। वे अपने व्याख्यानों के दौरान गणित और संगीत के संबंधो को भी दर्शाते हैं। वे महान तबला वादक उस्ताद जाकिर खान के शिष्य हैं। भार्गव बताते हैं कि जब वह बचपन में छुट्टियों में भारत आते तो उन्हें किस्से-कहानियाँ, संस्कृत श्लोक, संगीत सुनने का काफी अवसर मिलता था। इनसे वे काफी प्रभावित हुए और उनके अध्ययन में भी इन सांस्कृतिक जड़ों का प्रभाव पड़ा। उनका भाषा विज्ञान में भी शोध पत्र है। अपने व्याख्यानों में मंजूल भार्गव भी प्राचीन भारतीय गणितज्ञों के योगदान पर अक्सर प्रकाश डाला करते हैं।
इस प्रकार भारतीय गणितज्ञों का योगदान अतुलनीय है और सचमुच उनके कार्य हमारे समाज,देश और पूरे विश्व के लिए एक धरोहर की तरह हैं जिन पर हम गर्व कर सकते हैं।