03.07 अथ नवार्णविधिः

॥अथ नवार्णविधिः॥

इस प्रकार रात्रिसूक्त और देव्यथर्वशीर्ष का पाठ करने के पश्‍चात्  निम्नांकितरूपसे नवार्णमन्त्र के विनियोग, न्यास और ध्यान आदि करें।

॥विनियोगः॥

श्रीगणपतिर्जयति। 
"ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो
देवताः, ऐं बीजम्, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्,
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।"

इसे पढ़कर जल गिराये।
नीचे लिखे न्यासवाक्यों में से एक-एक का उच्चारण करके दाहिने हाथ की अँगुलियों से क्रमशः सिर, मुख, हृदय, गुदा, दोनों, चरण और नाभि - इन अंगों का स्पर्श करें।

॥ऋष्यादिन्यासः॥

ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः, शिरसि।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दोभ्यो नमः मुखे। महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः, हृदि। ऐं बीजाय नमः, गुह्ये। ह्रीं शक्तये नमः, पादयोः। क्लीं कीलकाय नमः, नाभौ।
"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे"- इस मूलमन्त्र से हाथों की शुद्धि करके करन्यास करें।

॥करन्यासः॥

करन्यास में हाथ की विभिन्न अँगुलियों, हथेलियों और हाथ के पृष्ठभाग में मन्त्रों का न्यास (स्थापन) किया जाता है; इसी प्रकार अंगन्यास में ह्रदयादि अंगों में मन्त्रों की स्थापना होती है। मन्त्रों को चेतन और मूर्तिमान् मानकर उन-उन अंगों का नाम लेकर उन मन्त्रमय देवताओं का ही स्पर्श और वन्दन किया जाता है, ऐसा करने से पाठ या जप करनेवाला स्वयं मन्त्रमय होकर मन्त्रदेवताओं द्वारा सर्वथा सुरक्षित हो जाता है। उसके बाहर-भीतर की शुद्धि होती है, दिव्य बल प्राप्त होता है और साधना निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण तथा परम लाभदायक होती है।

ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। 
(दोनों हाथों की तर्जनी अंगुलियों से दोनों अंगूठे का स्पर्श)

ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। 
(दोनों हाथों के अंगूठे से दोनों तर्जनी अंगुलियों का स्पर्श)

ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः।
(अंगूठा से मध्यमा अंगुली का स्पर्श)

ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः।
(अनामिका अंगुलियों का स्पर्श)

ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
(कनिष्ठिका अंगुलियों का स्पर्श)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
(हथेलियों और उस उनके पृष्ठ भागों का परस्पर स्पर्श)

॥हृदयादिन्यासः॥

इसमें दाहिने हाथ की पाँचों अँगुलियों से हृदय आदि अंगों का स्पर्श किया जाता है।

ॐ ऐं हृदयाय नमः।
(दाहिने हाथ की पांचों अंगुलियों से ह्रदय का स्पर्श)

ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा। (सिर का स्पर्श)

ॐ क्लीं शिखायै वषट्। (शिखा का स्पर्श)

ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम्।
(दाहिने हाथ की अंगुलियों से बाएं कंधे का और बाएं हाथ की अंगुलियों से दाहिने कंधे का एक साथ स्पर्श)

ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट्।
(दाहिने हाथ की अंगुलियों के अग्रभाग से दोनों नेत्रों और लल्ला टो के मध्य भाग का स्पर्श)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट्।
(यह वाक्य पढ़कर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से बाई ओर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिनी ओर से आगे की ओर ले जाएं और तर्जनी तथा मध्यमा अंगुलियों से बाएं हाथ की हथेली पर ताली बजाएं)।

॥अक्षरन्यासः॥

निम्नांकित वाक्यों को पढ़कर क्रमशः शिखा आदि का दाहिने हाथ की अँगुलियों से स्पर्श करें।

ॐ ऐं नमः, शिखायाम्।
ॐ ह्रीं नमः, दक्षिणनेत्रे।
ॐ क्लीं नमः, वामनेत्रे।
ॐ चां नमः, दक्षिणकर्णे।
ॐ मुं नमः, वामकर्णे।
ॐ डां नमः, दक्षिणनासापुटे।
ॐ यैं नमः, वामनासापुटे।
ॐ विं नमः, मुखे।
ॐ च्चें नमः, गुह्ये।

इस प्रकार न्यास करके मूलमन्त्र से आठ बार व्यापक (दोनों हाथों द्वारा सिर से लेकर पैर तक के सब अंगों का) स्पर्श करें, फिर प्रत्येक दिशा में चुटकी बजाते हुए न्यास करें-
॥दिङ्न्यासः॥
ॐ ऐं प्राच्यै नमः।
ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः।
ॐ ह्रीं दक्षिणायै नमः।
ॐ ह्रीं नैर्ऋत्यै नमः।
ॐ क्लीं प्रतीच्यै नमः।
ॐ क्लीं वायव्यै नमः।
ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नमः।
ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊर्ध्वायै नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः।

॥ध्यानम्॥
खड्‌गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्‍तुं मधुं कैटभम्॥१॥

ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥२॥

ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्‌खमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥३॥

फिर "ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः" इस मन्त्र से माला की पूजा करके प्रार्थना करें-

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणि।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्वमन्त्रार्थसाधिनि साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।

इसके बाद "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" इस मन्त्र का 108 बार जप करें और-
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्‍वरि॥
इस श्‍लोक को पढ़कर देवी के वामहस्तमें जप निवेदन करें।

॥सप्तशतीन्यासः॥

तदनन्तर सप्तशती के विनियोग, न्यास और ध्यान करने चाहिये। न्यास की प्रणाली पूर्ववत् है-

॥विनियोगः॥

प्रथमम-अध्यम्-उत्तरचरित्राणां ब्रह्म-विष्णु-रुद्रा ऋषयः, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्‍छन्दांसि, नन्दा-शाकम्भरी-भीमाः शक्तयः, रक्तदन्तिका-दुर्गा-भ्रामर्यो बीजानि, अग्नि-वायु-सूर्यास्तत्त्वानि,
ऋग्-यजुःसामवेदा ध्यानानि, सकल-कामना-सिद्धये
श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-देवता-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।

ॐ खड्‌गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा।
शङ्खिनी चापिनी बाण-भुशुण्डी-परिघ-आयुधा॥ अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टा-स्वनेन नः पाहि चाप-ज्यानिःस्वनेन च॥ तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे।
भ्रामणेना-आत्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्‍वरि॥ मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते।
यानि चात्यर्थ-घोराणि तै रक्षा-स्मांस्तथा भुवम्॥ अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ खड्ग-शूल-गदा-आदीनि यानि चास्त्राणि -तेऽम्बिके।
कर-पल्लव-सङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥ कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्व-शक्ति-समन्विते।
भये-भ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ करतल-करपृष्ठाभ्यां।

ॐ खड्‌गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी।
शंखिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा।
 - हृदयाय नमः।

ॐ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन च।
घंटास्वनेन न: पाहि चापज्यानि:स्वनेन च।
-शिरसे स्वाहा।

ॐ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे। 
भ्रामणेन आत्मशूलस्य उत्तरास्यां तथेश्वरी। - शिखायै वषट्।

ॐ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते।
यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम्॥ - कवचाय हुम्।

ॐ खड्‌गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणी तेऽम्बिके।
करपल्लवसङ्‌गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥ - नेत्रत्रयाय वौषट्।

ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ - अस्त्राय फट्।

॥ध्यानम्॥

ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्‍चक्रगदासिखेटविशिखांश्‍चापं गुणं तर्जनीं बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥

इसके बाद प्रथम चरित्र का विनियोग और ध्यान करके "मार्कण्डेय उवाच" से सप्तशती का पाठ आरम्भ करें। प्रत्येक चरित्र का विनियोग मूल सप्तशती के साथ ही दिया गया है तथा प्रत्येक अध्याय के आरम्भ में अर्थसहित ध्यान भी दे दिया गया है। पाठ प्रेमपूर्वक भगवती का ध्यान करते हुए करें। मीठा स्वर, अक्षरों का स्पष्ट उच्चारण, पदों का विभाग, उत्तम स्वर, धीरता, एक लय के साथ बोलना - ये सब पाठकों के गुण हैं।* जो पाठ करते समय रागपूर्वक गाता, उच्चारण में जल्दबाजी करता, सिर हिलाता, अपनी हाथ से लिखी हुई पुस्तक पर पाठ करता, अर्थ की जानकारी नहीं रखता और अधूरा ही मन्त्र कण्ठस्थ करता है, वह पाठ करनेवालों में अधम माना गया है।* जबतक अध्याय की पूर्ति न हो, तबतक बीच में पाठ बन्द न करें। यदि प्रमादवश अध्याय के बीच में पाठ का विराम हो जाय तो पुनः प्रति बार पूरे अध्याय का पाठ करें।

अज्ञानवश पुस्तक हाथ में लेकर पाठ करने का फल आधा ही होता है। स्तोत्र का पाठ मानसिक नहीं, वाचिक होना चाहिये। वाणी से उसका स्पष्ट उच्चारण ही उत्तम माना गया है।* बहुत जोर-जोर से बोलना तथा पाठ में उतावली करना वर्जित है। यत्नपूर्वक शुद्ध एवं स्थिरचित्तसे पाठ करना चाहिये। 

यदि पाठ कण्ठस्थ न हो तो पुस्तक से करें। अपने हाथ से लिखे हुए अथवा ब्राह्मणेतर पुरुष के लिखे हुए स्तोत्र का पाठ न करें। यदि एक सहस्र से अधिक श्‍लोकों का या मन्त्रों का ग्रन्थ हो तो पुस्तक देखकर ही पाठ करें; इससे कम श्‍लोक हों तो उन्हें कण्ठस्थ करके बिना पुस्तक के भी पाठ किया जा सकता है। अध्याय समाप्त होने पर "इति", "वध", "अध्याय" तथा "समाप्त" शब्दका उच्चारण नहीं करना चाहिये।
इसके स्थान पर इस प्रकार कहे 
'श्रीमार्कंडेय-पुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवी-माहात्म्ये प्रथम: ॐ तत्सत्।'

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