गिरिराज गोवर्धन – पवित्र गोवर्धन पर्वत की कहानी।

श्रीकृष्ण ने सबसे छोटी उंगली पर उठा लिया था गोवर्धन पर्वत। इस पर्वत की ऊंचाई हर दिन कम होती जा रही है। 

पवित्र गोवर्धन पर्वत की कहानी। 
* यह वही पर्वत है जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी एक उंगली पर उठा कर लोगों की रक्षा की थी। 

* कहते हैं कि यह रोज घटता है। इसके रोज घटने के पीछे भी एक रोचक कहानी है। कहा जाता है कि पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी रोज कम होता जा रहा है। अब इसकी ऊंचाई 179 मीटर हो गई है। 

* दो राज्यों में है यह पर्वत...
गोवर्धन पर्वत दो राज्यों के बीच उत्तर प्रदेश और राजस्थान
इस पर्वत की परिक्रमा कर लोग भगवान श्रीकृष्ण की अराधना करते हैं। इसकी परिक्रमा के दौरान 7 किमी का हिस्सा राजस्थान में आता है और बाकी के 14 किलोमीटर का हिस्सा उत्तर प्रदेश में आता है।

* कहते हैं कि यह रोज घटता है। इसके रोज घटने के पीछे भी एक रोचक कहानी है। कहा जाता है कि पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी रोज कम होता जा रहा है। अब इसकी ऊंचाई 179 मीटर हो गई है। 

क्यों दिया था ऋषि ने पर्वत को रोज कम होने का शाप
बेहद पुरानी मान्यता है कि गिरिराजजी की सुंदरता को देख पुलस्त्य ऋषि बेहद खुश हुए। उन्होंने इन्हें द्रोणांचल पर्वत से उठाया और अपने यहां ले जाने लगे।

उठाने से पहले गिरिराजजी ने कहा था कि आप मुझे जहां भी पहली बार रखेंगे मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगा। रास्ते में साधना के लिए ऋषि ने पर्वत को नीचे रख दिया।

ऋषि की लाख कोशिशों के बाद भी पर्वत हिला नहीं। इसके बाद गुस्से में ऋषि ने पर्वत को शाप दिया कि वह रोज कम होगा। माना जाता है कि उसी समय से गिरिराज जी वहां हैं और कम होते जा रहे हैं।

दूसरी मान्यता यह भी है कि जब राम सेतुबंध का कार्य चल रहा था तो हनुमानजी इस पर्वत को उत्तराखंड से ला रहे थे, लेकिन तभी देव वाणी हुई की सेतुबंध का कार्य पूरा हो गया है, यह सुनकर हनुमानजी इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दक्षिण की ओर पुन: लौट गए।

भगवान कृष्ण ने क्यों उठाया गोवर्धन पर्वत
मथुरा, गोकुल, वृंदावन आदि के लोगों को वह घनघोर बारिश से बचाने के लिए इस पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी एक उंगली से उठाया था। नगरवासियों ने इस पर्वत के नीचे इकट्ठा होकर अपनी जान बचाई। 

यह बारिश इंद्र ने करवाई थी। लोग इंद्र से डरते थे और डर के मारे सभी इंद्र की पूजा करते थे, तभी कृष्ण ने कहा था कि आप डरना छोड़ दे। इंद्र एक अहंकारी राजा है। अहंकारी की पूजा करना हमें शोभा नहीं देता।

परिक्रमा का महत्व
इस पर्वत की परिक्रमा का लोगों में महत्व है। वल्लभ संम्प्रदाय के वैष्णव मार्गी लोग तो इसकी परिक्रमा अवश्य ही करते हैं क्योंकि वल्लभ संप्रदाय में भगवान कृष्ण के उस स्वरूप की आराधना की जाती है जिसमें उन्होंने बाएं हाथ से गोवर्धन पर्वत उठा रखा है और उनका दायां हाथ कमर पर है।

इस पर्वत की परिक्रमा के लिए समूचे विश्व से कृष्ण भक्त, वैष्णवजन और वल्लभ संप्रदाय के लोग आते हैं। यह पूरी परिक्रमा 7 कोस अर्थात लगभग 21 किलोमीटर है।

परिक्रमा की शुरुआत वैष्णवजन जाति-पुरा से और सामान्यजन मानसी गंगा से करते हैं और पुन: वहीं पहुंच जाते हैं। पूंछरी का लौठा में दर्शन करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि यहां आने से इस बात की पुष्टि मानी जाती है कि आप यहां परिक्रमा करने आए हैं।
यह अर्जी लगाने जैसा है। पूंछरी का लौठा क्षेत्र राजस्थान में आता है। यहां पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र को वरदान दिया था कि तुम्हे कुछ नहीं होगा और हमेशा जीवित रहोगे। तभी से ऐसा माना जाता है कि यहां लौठाजी तपस्या में लीन है।

यहां से नाथद्वारा राजस्थान तक जाती है एक गुफा
वैष्णव समाज के लोग मानते हैं कि गिरिराज पर्वत के ऊपर गोविंदजी का मंदिर है। इसी श्रीनाथ जी का मंदिर भी कहा जाता है। कहते हैं कि भगवान कृष्ण यहां शयन करते हैं। उक्त मंदिर में उनका शयनकक्ष है। यहीं मंदिर में स्थित गुफा है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह राजस्थान स्थित श्रीनाथद्वारा तक जाती है।

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