|| ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी.! सकल ताड़ना के अधिकारी ||
जिसके तथ्यों को आप नहीं काट सकते।
श्रीरामचरितमानस मे, शूद्रों और नारी का अपमान कहीं भी नहीं किया गया है !
रामचरित्र मानस में 10902 चौपाइयां हैं। इसे 450 वर्ष पूर्व गोस्वामी तुलसीदास जी ने रचा था।
लेकिन कुछ लोग जो अपने आप को शूद्र कहते या मानते या सोचते हैं ऐसा उनका विश्वास है। वे गोस्वामी तुलसीदास द्वारा 450 वर्षों पूर्व रचित हिंदू महाग्रंथ 'श्रीरामचरितमानस' की कुल 10902 चौपाईयों में से आज तक मात्र 1 ही चौपाई पढ़ पाए हैं। यह चौपाई उस समय की है जब भगवान राम को श्रीलंका जाने के लिए समुद्र पार करना था। इसलिए रास्ता देने के लिए वे समुद्र देव से प्रार्थना करने लगे। जब तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र उनकी विनय मानने को तैयार नहीं हुआ तब श्री रामजी क्रोध क्रोध करके समंदर को सुखा डालने के लिए अपना धनुष बाण तैयार कर लेते हैं।
इस प्रकार भगवान श्री राम का मार्ग रोकने वाले समुद्र द्वारा भय वश किया गया अनुनय विनय का अंश है जो कि सुंदर कांड में 58 वें दोहे की छठी चौपाई है।
तब समुद्र भयभीत होकर भगवान राम से हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं। उसी के अंतर्गत यह चौपाई आती है। हम कह सकते हैं कि
"ढोल, गँवार, सूद्र, पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी!”
आपने सुना हो या नहीं सुना हो परंतु मैंने अक्सर लोगों को कहते सुना है कि मैं आंखों ही आंखों में 'ताड' लेता हूं।
धीरे-धीरे पता चला कि 'ताड़ने' का अर्थ 'प्रताड़ना' तो कतई नहीं है।
ताड़ना के हिंदी अर्थ
किसी लक्षण के बगै़र पहचानना, भांपना ताक झांक करना, देखना, समझना, बात की तह तक पहुंच जाना, तौलना, अनुमान लगाना, आंकना।
वास्तव में ताडने का अर्थ है 'किसी चीज के बारे में अधिक से अधिक जानकारी आ जाना या प्राप्त कर लेना कि उसे देखते ही उसके गुण और अवगुण समझ में आ जाए।'
वास्तव में ताड़ना का अर्थ यही है प्रताड़ना नहीं है जबकि प्रताड़ना का अर्थ है दंडित करना है जबकि 'ताड़ना' शब्द का एक अर्थ है 'जांचना' (अच्छे बुरे की पहचान करना) या ‘परखना’ (देख कर अच्छे बुरे की पहचान करना) या “भाँपना ” (अनुमान लगाकर अच्छे बुरे की पहचान करना)। यह तीनों ही एक दूसरे के पूरक हैं।
इसे एक उदाहरण से समझाइए जैसे कि वह उसकी नीयत को ताड़ गया था अर्थात वह समझ गया कि उसकी नियत में खराब है |
जैसा कि मैंने सबसे पहले बताया कि लोग अक्सर कहा करते हैं कि मैं आंखों ही आंखों में लोगों को ताड़ लेता हूं। इसका मतलब है कि वे व्यक्तियों के गुणों अवगुणों को देखने मात्र में अच्छे से पहचान लेते हैं।
चलिए अब आते हैं असली प्रश्न पर रामचरित्र मानस घर-घर में पढ़ी जाती है इसी कारण गोस्वामी तुलसीदास को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।
लगभग साढ़े चार सौ साल बाद अब आकर कुछ लोगों को गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हिंदू महाग्रंथ 'श्रीरामचरितमानस' की कुल 10902 चौपाईयों में से आज तक मात्र एक चौपाई पढ़ने में आ पाई है, जो उस समय लिखी गई जब हिंदी आज के जितनी परिष्कृत नहीं थी और अवधी भाषा नहीं बोली में लिखी गई। अवधी में आंचलिक भाषा में आज भी इस शब्द का प्रयोग बहुत आम हैं |
भगवान श्री राम का मार्ग रोकने वाले समुद्र द्वारा भय वश किया गया अनुनय का अंश है। जो सुंदरकांड में 58 वें दोहे की छठी चौपाई है और इस प्रकार है–
"ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी.!
सकल ताड़ना के अधिकारी”
अब कुछ विद्वान कहते हैं कि इस चौपाई के शब्दों में हेरफेर है परंतु मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि मेरे पास गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित राम चरित्र मानस है। जिसमें यह चौपाई शब्दशः ऐसी ही लिखी हुई है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि इस चौपाई में कहीं कोई गलती है क्योंकि इस प्रकाशन ने बहुत से धर्म ग्रंथों का प्रमाणिक प्रकाशन किया है।
चलिए सारी बातों से दिमाग हटाते हैं और फिर से इस चौपाई पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं और इसका अर्थ जो सही मायनों में है वह निकालने का प्रयास करते हैं। मुझे आशा है कि आपको यह अर्थ सबसे ज्यादा सही और सटीक लगेगा।
"ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी.!
सकल ताड़ना के अधिकारी”
चौपाई में ढोल, गँवार, शूद्र, पशु तथा नारी इन पाँच को “अधिकारी” माना है | किस चीज के “सकल ताड़ना” का। शब्द सकल का अर्थ है ‘पूर्ण या सम्पूर्ण या अच्छी तरह से या कंप्लीटली या एब्सोल्यूटली’ | जबकि ताड़ना शब्द का अर्थ है 'जांचना' (अच्छे बुरे की पहचान करना) ‘परखना’ (देख कर अच्छे बुरे की पहचान करना) या “भाँपना ” (अनुमान लगाकर अच्छे बुरे की पहचान करना)।
चूँकि चौपाई में मामला भगवान राम से जुड़ा है इसलिए आध्यात्मिक सन्दर्भ में ताड़ना का अर्थ देखने परखने या भाँपने से ही है न कि दंडित करने से ।
फिर भी इस चौपाई का अर्थ समझने से पहले हमें इससे पूर्व और बाद की कुछ चौपाईयों के बारे में भी जानना होगा। जब श्री राम अनुनय विनय करते हुए 3 दिन बीत गए तब श्री राम ने समुद्र के घमण्ड को तोड़ने के लिए कहा कि “हे लक्ष्मण ! भय बिन प्रीति नाहीं, लाओ अग्निबाण से इसे अभी सुखा देता हूँ।
लछिमन बान सरासन आनू ।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु।।
सठ सन बिनय कुटिल प्रीति।
सहज कृपन सन सुंदर नीति ।।
भावार्थ:- हे लक्ष्मण ! मेरे धनुष बाण लाओ मैं अभी इसी सागर को सुखाए देता हूं। हठी के साथ विनय, कुटी के साथ नीति
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥
भावार्थ:-इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्री रामजी क्रोध मैं भरकर बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती!॥57॥
इतना कहकर उन्होंने तीर का अनुसंधान शुरू किया तो समुद्र समुद्र के जीव त्राहि-त्राहि करने लगे तब समुद्र ब्राह्मण भेष में हाथ जोड़कर विनती करते हुए भगवान राम के सम्मुख प्रस्तुत हुआ।
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।
छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।
गगन समीर अनल जल धरनी।
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥1॥
भावार्थ:-समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर लिए और बोला, " हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी सब स्वभाव से ही जड़ है। हे नाथ ! जलधि होने के कारण मेरे सब अवगुणों को क्षमा कीजिए।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥2॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥2॥
भावार्थ:- ग्रंथों में ऐसा वर्णन मिलता है कि आप की आज्ञा से ही सृष्टि ने इन जड़ तत्वों की सृष्टि की है। जिसके लिए स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी मर्यादा (सीमा में रहने का गुण) में रहने में सुख पाता है॥2॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥3॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥3॥
भावार्थ:- हे प्रभु ! आपने अच्छा किया जो मुझे सीख (ज्ञान) दी, किंतु मर्यादा (सीमा में रहने का गुण) भी आपकी ही बनाई हुई है।
ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री ये सब परखने के अधिकारी हैं॥3॥
अर्थात हे प्रभु ! जड़ स्वभाव का होने के कारण मैं तो आपको नहीं पहचान पाया पर, हे प्रभु ! आप मुझ जड़ जलधि को पहचानने में कैसे भूल कर गए जो आपने मुझ पर तीर का संधान कर लिया।
[इसमें तुलसीदास जी ने 5 गुणों वाले पांच वर्गों का वर्णन किया है। जिनमें ढोल (निर्जीव पदार्थ), गंवार (बिल्कुल ही सीधा साधा या कम सोच समझ वाला), शूद्र (सेवा भाव रखने वाला), पशु (चौपाए) और नारी (स्त्री) । जिनसे जिन्हें जब भी व्यवहार में लाना हो या इनके साथ काम करना हो तो इनको अवश्य ही पूर्ण रूप से जांचना, परखना या भांँपना चाहिए।]
समुद्र ब्राम्हण के रूप में श्री राम के सामने खड़ा है | ब्राम्हण ज्ञान का रूप होता है परन्तु कई बार ज्ञान की पराकाष्ठा से उत्पन्न जड़ता के कारण ज्ञानी भी साधारण सी बात को ताड़ नहीं सकता है |
❌ ~*ढोल, गवार, शूद्र, पशु, नारी.!*~❌
*आज तक गलत प्रचारित किया गया है*
सारी बातें जानने के उपरांत अब हम आपको पांचो समूहों को किस तरीके से ताड़ना शब्द से जोड़ा गया है और उसका अर्थ जांचना, परखना या भाँपना कैसे हैं ? वह आपको बताते हैं।
हमें विश्वास है कि आपको हमारा यह तथ्य अकाट्य महसूस होगा।
ढोल, गवार, शुद्र, पशु और नारी शब्दों का उपयोग घर की चीजों के लिए नहीं किया गया है क्योंकि घर की इन चीजों के बारे में हर व्यक्ति को अच्छे से पता होता है। हमने यहां बाहर से अपने घर लाई जाने वाली या व्यवहार में लाई जाने वाली चीजों का वर्णन किया है। आइए अब व्यवहारिक रूप से इसी बारे में सोचते हैं।
ढोल: ढोल एक जड़ पदार्थ है जिसके लिए ताड़ना शब्द का अर्थ जांचना या परखना या भाँपना ही उचित है।
अब सोचिए कि आपको ढोल खरीदना है तो आप क्या करेंगे जो भी दुकानदार देगा उसे उठाकर तो नहीं ले आएंगे। यदि आपको ढोल के बारे में उचित जानकारी नहीं है तो आप किसी जानकार को अपने साथ लेकर जाएंगे और उससे जांच करवाएंगे कि यह ठीक से बजता भी है या नहीं।
इसी प्रकार यदि आप पड़ोसी से ढोल मांगने गए हैं तो भी उसे जांच परख कर ही लेकर आएंगे कहीं ऐसा तो नहीं कि वह फूटा हो और आपके सिर पड़ जाए।
मेरे विचार से तो ढोल खरीदना हो या पड़ोसी से मांग कर लाना हो तो हमें उसे अच्छे से जांच परख कर ही लाना पड़ेगा। अतः ढोल के लिए ताड़ना शब्द का अर्थ जांचना या परखना या भाँपना उचित ही है।
गंवार: गंवार, बिल्कुल ही सीधे साधे या कम सोच समझ वाले व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है। इनके लिए ताड़ना शब्द का अर्थ जांचना या परखना या भाँपना उचित है।
गंवार को अज्ञानी नहीं कहा जा सकता। आपने लोगों को कहते सुना होगा गांव का गवार इसका अर्थ यह नहीं कि गांव में सभी अज्ञानी होते हैं बस वह स्वभाव से बिल्कुल ही सीधे साधे या कम सोच समझ वाले होते हैं। इनमें चला कि नहीं होती।
अब मान लीजिए कि इनसे कुछ काम कराना है या इन्हें अपने व्यवहार में लाना है, तो अब इन्हें जांचना, परखना और भांँपना भी पड़ेगा कि यह हमारे दिए हुए काम के लिए उचित है भी या नहीं क्योंकि सभी काम सभी व्यक्तियों को नहीं आते।
इसका एक उदाहरण आप नौकरियों के विज्ञापन में पा सकते हैं । जिनमें कार्य विशेष के में दक्ष लोगों को ही नौकरी के लिए आमंत्रित किया जाता है। उनके लिए बाकी सब लोग गंवार हैं।
शूद्र: मैंने अनेक प्राचीन ग्रंथ पढ़े हैं जिनसे मुझे इसी बात का ज्ञान होता है कि शूद्र शब्द जाति का नही बल्कि वर्ण यह समूह का द्योतक है।
शूद्र, सेवा करने वाले लोगों के लिए प्रयुक्त होता है। सेवा करने वाले लोगों के लिए भी ताड़ना शब्द का अर्थ जांचना या परखना या भाँपना उचित है।
यह शूद्र वर्ग या वर्ण समाज का वह वर्ग था जिसने अपने कार्य विशेष को करने में दक्षता प्राप्त कर ली थी। जैसे जिन्हें वेद पठन-पठन और उसकी शिक्षा देने में रुचि थी। वह ब्राह्मण वर्ग में गिने गए। जिन्हें अस्त्र शस्त्र चलाने और युद्ध आदि करने में रुचि थी उन्हें क्षत्रिय वर्ग में रखा गया। जिन्हें व्यापार और वाणिज्य में रुचि थी उन्हें वे वैश्य वर्ग में शामिल हो गए। परंतु कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें इन तीनों में से किसी में भी रुचि नहीं थी किंतु वे अपने कार्य विशेष में निपुण थे और उनके कार्य समाज में सेवा भाव को दर्शाते थे इसलिए वे सेवक कहलाए। जिन्हें शूद्र नाम दिया गया।
सेवक नामक इस वर्ग में खेती के द्वारा अन्न पैदा करके लोग को दूसरे लोगों का पेट भरना वाले सेवकों किसान। मिट्टी के बर्तन आदि बनाने वाले को कुम्हार । लोहे के बर्तन आदि बनाने वाले को लोहार । लकड़ी के काम करने वाले को बढ़ाई । साफ सफाई कर्मी करने वाले को सफाई कर्मी आदि नाम दिए गए।
वर्तमान में भी सेवा करने वालों को अनेक वर्गों में बांटा जा सकता है जैसे वकील, डॉक्टर, अध्यापक, क्लर्क, ड्राइवर आदि नाम आते ही आपके समझ में आ जाता होगा कि यह किस व्यवसाय या वर्ग से जुड़े हुए हैं।
अगर इनके व्यवसाय वंशानुगत रहे तो हो सकता है कि निकट भविष्य में इनके ये व्यवसाय अपने एक विशेष वर्ग में न बदल जाए।
अतः हमें यह है समझ लेना चाहिए कि शुद्र जाति नही बल्कि एक वर्ण (वर्ग) है। जाति और वर्ण दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। किन्तु आज कल कुछ लोग इन दोनों को जान बूझ कर एक ही समझते हैं।
पशु: चौपायों को पशुओं की संज्ञा दी जाती है। इनमें भी वे उपयोगी पशु जिन्हें हम सामाजिक कार्यों में उपयोग में लाते हैं सामान्यत: पशु कहे जाते हैं। पशुओं को हिन्दू धर्म में प्राचीन काल से ही बहुत मूल्यवान माना गया है इसीलिए उन्हें "पशुधन" कहा जाता है।
पशुओं के लिए भी ताड़ना शब्द का अर्थ जांचना या परखना या भाँपना उचित है। यदि आप अपने व्यवहार के लिए किसी पशु को लाना चाहते हैं तो उसे अच्छी प्रकार जांच परख कर ही लेकर आएंगे आंख बंद करके नहीं।
यहां जंगली पशुओं की बात नहीं है फिर भी अगर हम चाहें तो ताड़ना शब्द का उपयोग जंगली पशुओं के लिए भी कर सकते हैं। हम उन्हें देखते जान जाते हैं कि कौन सा जंगली पशु हमारे लिए लाभदायक है और कौन सा हमें हानि पहुंचा सकता है। इसी को ताड़ना कहते हैं।
नारी: नारी अर्थात स्तरीय समाज के एक बड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है इसीलिए चौपाई के इस शब्द पर भी सर्वाधिक आपत्ति है। किंतु हम आपको फिर से बताना चाहेंगे कि यहां नारी के विषय में भी ताड़ना का अर्थ जांचना या परखना या भाँपना ही है।
अतः नारी स्त्री के लिए भी चौपाई के ताड़ना शब्द का अर्थ जांचना या परखना या भाँपना उचित है।
नारी समुद्र मंथन में निकली लक्ष्मी के समान पवित्र और आदरणीय है । हिन्दू धर्म में नारी को14 सर्वोत्तम रत्नों में से एक माना गया है।
मां, बहन, बुआ, बेटी के रूप में हम जिन स्त्रियों को देखते हैं। उनके व्यवहार से हम पूर्णतया परिचित व आदि होते हैं। जिसके कारण उनका कटु व्यवहार भी हमें नहीं अखरता, लेकिन यदि हम बाहर से किसी स्त्री को लेकर आएं तो हम उसे भी जांचने परखने में पीछे नहीं रहते क्योंकि कहा भी जाता है कि नारी अगर चाहे तो घर को स्वर्ग बना दें और चाहे तो नर्क। विवाह पूर्व लड़की को देखना आदि रस में इसी का एक हिस्सा है। इस रस्म में लोग लड़की के व्यवहार को जांचने परखने और उसे भाँपने के लिए जाते हैं। लड़की देखी और बात पक्की करने के लिए नहीं।
मुझे आशा है कि आपको इस सुंदर चौपाई का वास्तविक अर्थ समझ में आ गया होगा। यदि आ गया हो तो इसे अन्य लोगों तक भी पहुँचाने का प्रयास करें।
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सही मायने में अर्थ इस प्रकार हैं
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ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।। अर्थात: ढोल हो, गंवार हो, शुद्र (सेवक) हो या फिर नारी हो । इन सब के साथ व्यवहार रखने से पहले उन्हें अच्छी प्रकार से जांच परख और भाँप लेना चाहिए। अगर यह गलत निकले तो हमारे लिए हानिकारक ही होंगे।
इसीलिए इन सब को जांचने या तारने का अधिकारी माना गया है।
लेखक
ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
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