कृष्ण जन्म भूमि
[कृष्ण जन्मभूमि मथुरा की शानदार वीडियो]
ग्रंथों के अनुसार, मथुरा में जिस जगह पर आज कृष्ण जन्मभूमि मंदिर है, वह कंस के शासनकाल में मल्लपुरा क्षेत्र के कटरा केशव देव में कंस का कारागार हुआ करता था। मल्लूपुरा वह स्थान था जहां पर मल युद्ध का अभ्यास किया जाता था। इसी कारागार में रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को कृष्ण का जन्म हुआ था। जन्म के समय सभी राक्षस हो गए और भग्गू वासुदेव ने भगवान को यमुना के पास गोकुल पहुंचा दिया जहां यशोदा जी के घर योग माया ने लड़की के रूप में जन्म लिया तो वह अपने पुत्र को वहां सुला आए तथा योग माया को अपने पास ले आए जिसे मारने के प्रयास में कंस को पता लगा कि कृष्ण जन्म ले चुका है और सुरक्षित है।
बाद में कृष्ण के हाथों ही राजा कंस समेत अनेक राक्षस मारे गए। ऐसी मान्यता हैं कि मथुरा कारगार, यानी कृष्ण जन्मस्थान पर पहले मंदिर का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र यानी प्रद्युम्न के बेटे अनिरुद्ध के पुत्र ही ने करवाया था।
400 ई. में सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन काल में दूसरी बार मंदिर बनवाया गया।
महमूद गजनवी ने सन् 1017 ई. में आक्रमण कर इसे लूटा और मंदिर को ध्वस्त कर दिया। तब ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने इसी स्थान पर पुणे निर्माण करवाया।
सन् 1669 में इस मंदिर औरंगजेब ने इसे तुड़वा दिया और इसके एक भाग पर ईदगाह का निर्माण करा दिया। इसकी नीचे के भाग में आज भी गर्भ गृह को देखा जा सकता है।
उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला द्वारा यहां मंदिर के गर्भ गृह का पुनर्रुद्धार और निर्माण कार्य शुरू कराया गया। जो फरवरी 1982 में पूरा हुआ। अब यहां मंदिर और ईदगाह दोनों हैं।


उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला द्वारा हुआ पुनर्रुद्धार कार्य
कृष्ण जन्मभूमि मंदिर की व्यवस्था अब जन्मभूमि ट्रस्ट के हाथों में है। इस ट्रस्ट की स्थापना 1951 में हुई थी। मंदिर प्रबंधन से जुड़े एक पदाधिकारी ने बताया कि मंदिर-मस्जिद का पूरा इलाका कई स्तरीय सुरक्षा घेरे के अंदर पड़ता है। यह जगह मथुरा के बीचों-बीच है। मंदिर के ट्रस्ट निर्माण में जुगल किशोर बिड़ला की भी अहम भूमिका रही। जब जन्मस्थान वाले मंदिर का पुनर्रुद्धार कार्य हुआ तो भागवत भवन यहां का प्रमुख आकर्षण बनकर उभरा।
जन्मभूमि से जुड़े 5 मंदिर विश्व प्रसिद्ध
अब यहां पांच मंदिर हैं, जिनमें राधा-कृष्ण का मंदिर मुख्य है। मथुरा का अन्य आकर्षण असिकुंडा बाजार स्थित ठाकुर द्वारिकाधीश महाराज का मंदिर है। यहां वल्लभ कुल की पूजा-पद्धति से ठाकुरजी की अष्टयाम सेवा-पूजा होती है। देश के सबसे बड़े व अत्यंत मूल्यवान हिंडोले द्वारिकाधीश मंदिर के ही हैं, जो कि सोने व चांदी के हैं। यहां श्रावण माह में सजने वाली लाल गुलाबी, काली व लहरिया आदि घटाएं विश्व प्रसिद्ध हैं।

मथुरा में यमुना पर हैं 25 प्राचीन घाट
ब्रजभूमि पर्यटन से जुड़ी पुस्तक के अनुसार, मथुरा में यमुना के प्राचीन घाटों की कुल संख्या 25 है। उन्हीं सब के बीच स्थित है- विश्राम घाट। जहां प्रात: व सांय यमुनाजी की आरती उतारी जाती है। यहां पर यमुना महारानी व उनके भाई यमराज का मंदिर भी मौजूद है। विश्राम के घाट के सामने ही यमुना पार महर्षि दुर्वासा का आश्रम है।

ये हैं शहर के अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थल
जन्मभूमि मंदिर के अलावा मथुरा में भूतेश्वर महादेव, ध्रुव टीला, कंस किला, अम्बरीथ टीला, कंस वध स्थल, पिप्लेश्वर महादेव, बटुक भैरव, कंस का अखाड़ा, पोतरा कुंड, गोकर्ण महादेव, बल्लभद्र कुंड, महाविद्या देवी मंदिर आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।
कैसे और कब पहुंचें दर्शन करने के लिए
मथुरा आने के लिए देशभर के शहरों से सीधी ट्रेन चलती हैं। यहां वृंदावन में हेलीपैड भी है, जहां हेलीकॉप्टर से पहुंचा जा सकता है। नजदीकी एयरपोर्ट आगरा का हवाई अड्डा है। आगरा यहां से करीब 60 किमी की दूरी पर है। हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश और राजस्थान से मथुरा के लिए सीधी बसें भी चलती हैं।
मथुरा में एंट्री लेने के बाद श्रद्धालुओं को जन्मभूमि क्षेत्र पहुंचने के लिए डीग मार्ग स्थित डीग गेट चौराहा जाना होगा। वह पूरा इलाका ही श्रीकृष्ण जन्मस्थान के रूप में चर्चित है। बीच में मंदिर और मस्जिद हैं। कुछ ही दूरी पर विशाल पोतरा कुंड भी है।

दिन और मंदिर खुलने का समय
दिन समय
सोमवार
5:00 am - 12:00 pm
4:00 pm - 9:30 pm
मंगलवार
5:00 am - 12:00 pm
4:00 pm - 9:30 pm
बुधवार
5:00 am - 12:00 pm
4:00 pm - 9:30 pm
गुरुवार
5:00 am - 12:00 pm
4:00 pm - 9:30 pm
शुक्रवार
5:00 am - 12:00 pm
4:00 pm - 9:30 pm
शनिवार
5:00 am - 12:00 pm
4:00 pm - 9:30 pm
रविवार
5:00 am - 12:00 pm
4:00 pm - 9:30 pm

दर्शनावधि, आरती की टाइमिंग
गर्मियों में
सुबह
5:00 am to 12:00 pm
दोपहर बाद
4:00 pm to 9:30 pm
सर्दियों में
5:30 am to 12:00 pm
दोपहर बाद
3:00 pm to 8:30 pm
मंगल आरती 5:30 am
माखन भोग 8:00 am
संध्या आरती 6:00 pm
कृष्ण जन्म भूमि मथुरा का एक प्रमुख धार्मिक स्थान है जहाँ हिंदू धर्म के अनुयायी कृष्ण भगवान का जन्म स्थान मानते हैं।
वर्तमान ही नहीं पूरा ग्रंथों में भी मथुरा को भगवान श्री कृष्ण का जन्म स्थान बताया गया है तो फिर यह है विवाद का विषय क्यों है यह समझ से परे की बात है। फिर भी यह स्थान विवादों में भी घिरा हुआ है क्योंकि कृष्ण जन्म भूमि यदि हिंदुओं के लिए धार्मिक स्थल है तो इससे लगी हुई जामा मस्जिद मुसलमानों के लिये धार्मिक स्थल है।
आज हम सभी जानते हैं कि भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि का न केवल राष्द्रीय स्तर पर महत्व है बल्कि वैश्विक स्तर पर जनपद मथुरा भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान के रूप में ही जाना जाता है।
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी की प्रेरणा से आज वर्तमान में यह एक भव्य आकर्षक मन्दिर के रूप में स्थापित है।
पर्यटन की दृष्टि से विदेशों से भी बहुत बड़ी संख्या में नागरिक श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण को आराध्य के रूप में मानते हुए प्रतिदिन दर्शनार्थ के लिए आते हैं।
इतिहास
प्रथम बार कृष्ण जन्मभूमि पर कोई निर्माण अर्जुनायन शासक अरलिक वसु ने तोरण द्वार के रूप में करवाया था लेकिन यहां प्रथम मंदिर का निर्माण यदुवंशी राजा ब्रजनाम ने 80 वर्ष ईसा पूर्व में कराया था।
कालक्रम (हूण, कुषाण हमलों) में इस मंदिर के ध्वस्त होने के बाद गुप्तकाल के सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने सन् 400 ई० में दूसरे वृहद् मंदिर का निर्माण करवाया।
परंतु इस मंदिर को महमूद गजनवी ने ध्वस्त कर दिया। तत्पश्चात महाराज विजयपाल देव तोमर के शासन काल में हिन्दू जाट शासक जाजन सिंह ने तीसरे मंदिर का निर्माण करवाया।
यह मथुरा क्षेत्र में मगोर्रा के सामंत शासक थे इनका राज्य नील के व्यापार के लिए जाना जाता था।
शासक जाजन सिंह तोमर (कुंतल) ने 1150 ईस्वी में करवाया। इस जाजन सिंह को जण्ण और जज्ज नाम से भी सम्बोधित किया गया है। इनके वंशज आज जाजन पट्टी, नगला झींगा, नगला कटैलिया में निवास करते है।
खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से भी जाजन सिंह (जज्ज) के मंदिर बनाने का पता चलता है। शिलालेख के अनुसार मंदिर के व्यय के लिए दो मकान, छः दुकान और एक वाटिका भी दान दी गई दिल्ली के राजा के परामर्श से 14 व्यक्तियों का एक समूह बनाया गया जिसके प्रधान जाजन सिंह थे।
यह मंदिर भी 16 वीं सदी में सिकंदर लोधी द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। 1618 ई० में ओरछा के बुन्देला राजा वीरसिंह जूदेव ने विशाल मन्दिर का निर्माण जन्म भूमि कराया यह मंदिर इतना विशाल था कि आगरा से दिखाई देता था।
इस मंदिर को भी मुगल शासक औरंगजेब ने सन् 1669 में नष्ट कर दिया। इस मंदिर को वीर गौकुला जाट ने नहीं गिराने दिया व उनके बलिदान के बाद ही इसे गिराया जा सका फिर जाटों ने मुगलो की राजधानी आगरा पर आक्रमण कर दिया था।
फिर पुनः इसका निर्माण यहां के जाट शासक महाराजा सूरजमल ने करवाया जिसका विस्तार महाराजा जवाहर सिंह ने किया।
बिड़ला द्वारा 21 फरवरी 1951 को कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना करने के साथ ही यह मंदिर ट्रस्ट के अधीन चला गया जबकि इससे पहले इसकी जिम्मेदारी भरतपुर नरेशों के पास थी।
क़ानूनी मुकद्दमों में जीतने के बाद यहां गर्भ गृह और भव्य भागवत भवन के पुनर्रुद्धार और निर्माण कार्य आरंभ हुआ, जो फरवरी 1982 में पूरा हुआ।
मंदिर
भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी इहलौकिक लीला संवरण की। उधर युधिष्ठिर महाराज ने परीक्षित को हस्तिनापुर का राज्य सौंपकर श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ को मथुरा मंडल के राज्य सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया। चारों भाइयों सहित युधिष्ठिर स्वयं महाप्रस्थान कर गये। महाराज वज्रनाभ ने महाराज परीक्षित और महर्षि शांडिल्य के सहयोग से मथुरा मंडल की पुन: स्थापना करके उसकी सांस्कृतिक छवि का पुनरूद्वार किया। वज्रनाभ द्वारा जहाँ अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया गया, बहीं भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की जन्मस्थली का भी महत्व स्थापित किया। यह कंस का कारागार था, जहाँ वासुदेव कृष्ण ने भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात अवतार ग्रहण किया था। आज यह कटरा केशवदेव के नाम से प्रसिद्व है।
यह कारागार केशवदेव के मन्दिर के रूप में परिणत हुआ। इसी के आसपास मथुरा पुरी सुशोभित हुई। यहाँ कालक्रम में अनेकानेक गगनचुम्बी भव्य मन्दिरों का निर्माण हुआ। इनमें से कुछ तो समय के साथ नष्ट हो गये और कुछ को विधर्मियों ने नष्ट कर दिया।
प्रथम मन्दिर
ईसवी सन् से पूर्ववर्ती 80-57 के महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिला लेख से ज्ञात होता है कि किसी वसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर एक मंदिर तोरण द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था। यह शिलालेख ब्राह्मी लिपि में है।
द्वितीय मन्दिर
दूसरा मन्दिर विक्रमादित्य के काल में सन् 800 ई॰ के लगभग बनवाया गया था। संस्कृति और कला की दृष्टि से उस समय मथुरा नगरी बड़े उत्कर्ष पर थी। हिन्दू धर्म के साथ बौद्ध और जैन धर्म भी उन्नति पर थे। श्रीकृष्ण जन्मस्थान के संमीप ही जैनियों और बौद्धों के विहार और मन्दिर बने थे।
यह मन्दिर सन 1017-18 ई॰ में महमूद ग़ज़नवी के कोप का भाजन बना। इस भव्य सांस्कृतिक नगरी की सुरक्षा की कोई उचित व्यवस्था न होने से महमूद ने इसे ख़ूब लूटा। भगवान केशवदेव का मन्दिर भी तोड़ डाला गया।
तृतीय मन्दिर
महाराज विजयपाल देव तोमर के शासन काल में जाट शासक जज्ज (जाजन सिंह) ने तीसरे मंदिर का निर्माण करवाया। यह मथुरा क्षेत्र में मगोर्रा के सामंत शासक थे इनका राज्य नील के व्यापार के लिए जाना जाता था। जाजन सिंह तोमर (कुंतल) ने 1150 ईस्वी में करवाया। इस जाजन सिंह को जण्ण और जज्ज नाम से भी सम्बोधित किया गया है। इनके वंशज आज जाजन पट्टी, नगला झींगा, नगला कटैलिया में निवास करते है।
खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से भी जाजन सिंह (जज्ज) के मंदिर बनाने का पता चलता है। शिलालेख के अनुसार मंदिर के व्यय के लिए दो मकान, छः दुकान और एक वाटिका भी दान दी गई दिल्ली के राजा के परामर्श से 14 व्यक्तियों का एक समूह बनाया गया जिसके प्रधान जाजन सिंह थे। इस मंदिर को 16 वी शताब्दी के प्रारम्भ में सिकंदर लोदी के शासन काल में नष्ट कर डाला गया था।
चतुर्थ मन्दिर
मुग़ल बादशाह जहांगीर के शासन काल में श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर पुन: एक नया विशाल मन्दिर निर्माण कराया गया। ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जूदेव बुन्देला द्वारा इसकी ऊँचाई 250 फीट रखी गई थी। ऐसा बताया जाता है कि यह आगरा से भी दिखाई देता था। उस समय इस निर्माण की लागत 33 लाख रुपये आई थी। इस मन्दिर के चारों ओर एक ऊँची दीवार का परकोटा बनवाया गया था, जिसके अवशेष अब तक विद्यमान हैं। दक्षिण पश्चिम के एक कोने में कुआँ भी बनवाया गया था जिस का पानी 60 फीट ऊँचा उठाकर मन्दिर के प्रागण में फब्बारे चलाने के काम आता था। यह कुआँ और उसका बुर्ज आज तक विद्यमान है। सन 1669 ई॰ में पुन: यह मन्दिर नष्ट कर दिया गया और इसकी भवन सामग्री से ईदगाह बनवा दी गई जो आज विद्यमान है।
ईदगाह (श्रीकृष्ण जन्मस्थान)
जिस जगह पर आज कृष्ण जन्मस्थान है, वह पांच हजार साल पहले मल्लपुरा क्षेत्र के कटरा केशव देव में राजा कंस का कारागार हुआ करता था। इसी कारागार में रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को भगवान कृष्ण ने जन्म लिया था।
-इतिहासकार डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने कटरा केशवदेव को ही कृष्ण जन्मभूमि माना है। विभिन्न अध्ययनों और साक्ष्यों के आधार पर मथुरा के राजनीतिक संग्रहालय के दूसरे कृष्णदत्त वाजपेयी ने भी स्वीकारा कि कटरा केशवदेव ही कृष्ण की असली जन्मभूमि है।
इतिहासकारों के अनुसार, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा बनवाए गए इस भव्य मंदिर पर महमूद गजनवी ने सन 1017 ई. में आक्रमण कर इसे लूटने के बाद तोड़ दिया था।
कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने बनवाया था पहला मंदिर
- जनमान्यता के अनुसार, कारागार के पास सबसे पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने अपने कुलदेवता की स्मृति में एक मंदिर बनवाया था।
- आम लोगों का मानना है कि यहां से मिले शिलालेखों पर ब्राहम्मी-लिपि में लिखा हुआ है। इससे यह पता चलता है कि यहां शोडास के राज्य काल में वसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक मंदिर, उसके तोरण-द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था।
विक्रमादित्य ने बनवाया था दूसरा बड़ा मंदिर
- इतिहासकारों का मानना है कि सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में दूसरा मंदिर 400 ईसवी में बनवाया गया था। यह भव्य मंदिर था।
- उस समय मथुरा संस्कृति और कला के बड़े केंद्र के रूप में स्थापित हुआ था। इस दौरान यहां हिन्दू धर्म के साथ-साथ बौद्ध और जैन धर्म का भी विकास हुआ था।
आस-पास बौद्ध आस्था का भी केंद्र बना
- इस दौरान मथुरा के आसपास बौद्धों और जैनियों के भी विहार और मंदिर भी बने।
- इन निर्माणों के प्राप्त अवशेषों से यह पता चलता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्मस्थान उस समय बौद्धों और जैनियों के लिए भी आस्था का केंद्र रहा था।
विजयपाल देव के शासनकाल में बना तीसरा बड़ा मंदिर, सिकंदर लोदी ने तुड़वाया
- खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से पता चलता है कि 1150 ईस्वी में राजा विजयपाल देव के शासनकाल के दौरान जाट शासक जाजनसिंह (जज्ज) ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक नया मंदिर बनवाया था। इनके नाम पर जाजन पट्टी रेलवे स्टेशन है।
- उसने विशाल और भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर को 16वीं शताब्दी के शुरुआत में सिकंदर लोदी के शासन काल में नष्ट कर डाला गया था।
जहांगीर के शासनकाल में चौथी बार बना मंदिर, औरंगजेब ने तुड़वाया
- इसके लगभग 125 वर्षों बाद जहांगीर के शासनकाल के दौरान ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने इसी स्थान पर चौथी बार मंदिर बनवाया।
- कहा जाता है कि इस मंदिर की भव्यता से चिढ़कर औरंगजेब ने सन 1669 में इसे तुड़वा दिया और इसके एक भाग पर ईदगाह का निर्माण करा दिया।
- यहां प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि इस मंदिर के चारों ओर एक ऊंची दीवार का परकोटा मौजूद था। मंदिर के दक्षिण पश्चिम कोने में एक कुआं भी बनवाया गया था।
- इस कुएं से पानी 60 फीट की ऊंचाई तक ले जाकर मंदिर के प्रांगण में बने फव्वारे को चलाया जाता था। इस स्थान पर उस कुएं और बुर्ज के अवशेष अभी तक मौजूद है।
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