प्रयागराज आया, कहता है मेरे पास चार फल हैं, आप जो लेना चाहें ले लें। भरत जी ने चारों को इंकार कर दिया।
अर्थ नहीं चाहिए, देख लिया कि कैकेयी ने अर्थ के लिए अनर्थ कर दिया। गति नहीं चाहिए भगति चाहिए। काम नहीं चाहिए राम चाहिए। और जिस धर्म के लिए पिता जी ने राम जी का त्याग कर दिया, मुझे ऐसा धर्म भी नहीं चाहिए। मुझे तो रति चाहिए।
देखो, रति तो काम की पत्नी है, रति ही तो बंधन का कारण है, जब काम नहीं चाहिए तो रति का क्या करोगे? उसे राम जी के चरणों से लगा रखूँगा, तब बंधन नहीं रहेगा।
"जन्म जन्म रति राम पद यह वरदान न आन"
भरतजी ने गंगा यमुना की धारा में स्नान किया, कहते हैं इन श्वेत श्याम धाराओं में मुझे श्रीसीतारामजी के दर्शन होते हैं, पर सरस्वती में नहीं किया, कहते हैं इसी ने मंथरा की बुद्धि पलटी थी।
भरद्वाज जी मिले तो भरत जी आँख नहीं मिलाते। मुनि ने समझाया, भरत तुम्हारा कोई अपराध नहीं है, समय पर किसका बस है? सही बात है, हाथ में घड़ी तो है, पर समय हाथ में नहीं है।
उधर देवताओं में खलबली मची है, इन्द्र वृहस्पति जी से पूछता है, गुरु जी! यदि भरत एक बार कह दें कि अयोध्या लौट चलो, तो राम लौट जाएँगे?
-हाँ इन्द्र।
-ओह! तब तो बड़ी चिंता की बात है!
गुरु जी ने कहा डरो मत, राम जी लौटेंगे नहीं, क्योंकि भरत कहेंगे ही नहीं।
-जब कहने ही जा रहे हैं, तो कहेंगे क्यों नहीं?
गुरु जी ने कहा- इन्द्र! तुम भरत को समझते नहीं, भरत तो राम जी की परछाई हैं।
"मन थिर करहु देव डर नाहिं। भरतहिं जानि राम परछाहिं॥"
परछाई शरीर के ढंग से चलती है, शरीर को अपने ढंग से नहीं चलाती। वो चले तो ये चले, वो रुके तो ये रुके। कहती है तुम जैसे चाहो, मैं वैसे ही राजी हूँ। परछाई बन जाना ही भक्ति है, धन्य है वो जो परछाई बन सका। भरत जी राम जी के भाई भी हैं, राम जी की परछाई भी हैं।
Post a Comment
Post a Comment