राम मंदिर से जुड़ी खबरें

1. चांदी के राम मंदिर और श्री राम-सीता के सिक्कों की जबर्दस्त डिमांड
नवभारत टाइम्स 14 जनवरी 2024
■ नई दिल्ली : 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर दिल्ली के बाजार पूरी तरह से सज गए हैं। व्यापारियों के साथ साथ लोगों में भी भारी उत्साह देखने को मिल रहा है। जूलरी मार्केट में चांदी से बने श्री राम के सिक्के और राम मंदिर की मूर्ति की खूब डिमांड है। सबसे ज्यादा डिमांड उत्तर प्रदेश से आ रही है। व्यापारियों का कहना है कि 25 हजार से लेकर 2 लाख रुपये तक की मूर्ति तैयार की गई है। खास बात यह है कि 22 जनवरी को जूलर सोने-चांदी की खरीद पर लोगों

को छूट देने का दावा कर रहे हैं। प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम ने दिल्ली के व्यापार को रफ्तार दी है। इन दिनों राम मंदिर, श्री राम टीशर्ट, टोपी, दीये, मोमबत्ती का कारोबार हाई है। 22 जनवरी से पहले बाजारों में अलग अलग कार्यक्रम करने की रणनीति तैयार की जा रही है। सरोजिनी नगर मार्केट में 11 हजार दीये जलाए जाएंगे। यहां एक व्यापारी 101 किलो का लड्डू भी बनवा रहे हैं। चार अलग अलग भंडारा भी लगाया जाएगा। वहीं, खान मार्केट को अभी से अयोध्या की तर्ज पर सजा दिया गया है। व्यापारी संजीव मेहरा का कहना है कि 21 जनवरी को मार्केट में कीर्तन किया जाएगा। रथ यात्रा निकाली जाएगी। साथ ही 22 जनवरी को बाजार में खरीदारी करने वाले ग्राहकों को विशेष छूट देने पर भी विचार किया जा रहा है। चांदनी चौक के कूचा महाजनी के योगेश सिंघल ने बताया कि राम मंदिर, राम दरबार और राम-सीता की मूर्ति चांदी से बनाई जा रही है। इनकी खूब डिमांड आ रही है। इसकी कीमत 25 हजार से 2 लाख रुपये तक है। वहीं, दरीबा मार्केट के कारोबारी तरुण गुप्ता ने बताया कि चांदी श्री राम सीता के सिक्कों की भी खूब डिमांड आ रही है। 10 ग्राम चांदी के सिक्कों की कीमत 850 रुपये है। वहीं, चांदी से बने राम मंदिर की डिमांड काफी ज्यादा है।

यहां भी तैयारियां जारी

कश्मीरी गेट में भंडारा होगा। कमला नगर में लड़ियां लग गई हैं। खान मार्केट में भगवा झंडे लग चुके हैं। लक्ष्मी नगर में सुंदरकांड पाठ होगा। दरीबा कलां में दिवाली की तरह लाइटिंग होगी। जूलर्स डिस्काउंट देंगे। यहां राम कॉन्सर्ट भी होगा। भंडारा भी होगा। भागीरथ पैलेस में लड्डू के डिब्बे बाटे जाएंगे। नया बाजार में लाइटिंग की व्यवस्था की जा रही है। सरोजिनी नगर मार्केट में 21 हजार दीये जलाए जाएंगे। लाजपत नगर बाजार में भगवा गुब्बारे और झंडे लगाए जाएंगे, सुंदरकांड का पाठ होगा। रोहिणी में खास इंतजाम हो रहे हैं। नेहरू प्लेस के दुकानदार भी दिवाली मनाएंगे। चांदनी चौक और सदर बाजार में 22 जनवरी को विशेष सजावट की जाएगी और शोभायात्रा निकाली जाएगी।

2. काले राम के दर्शन बिना अधूरा है अयोध्या दर्शन
नवभारत टाइम्स 14 जनवरी 2024

यूं तो मान्यता है कि प्रभु श्रीराम श्यामल वर्ण के थे। हालांकि अयोध्या में एक मंदिर है, जिसमें प्रभु श्रीराम श्यामल वर्ण के नहीं बल्कि काले रंग के हैं। मान्यता है कि उनके दर्शन के बिना अयोध्या में किया गया दर्शन अधूरा है। 

कहते हैं कि साल 1748 में महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण सरयू के किनारे तपस्या कर रहे थे। उसी दरम्यान जब वह एक दिन स्नान के लिए सरयू में गए तो उन्हें नदी से एक मूर्ति मिली। मूर्ति प्रभु राम की थी लेकिन वह काले रंग की थी। उसे उन्होंने काले राम कहा। इस मूर्ति को नागेश्वर नाथ मंदिर के ठीक पीछे स्थापित किया गया। यह मंदिर काले राम का कहा जाता था। 

अयोध्या के सात प्रमुख स्थानों में काले राम मंदिर भी शामिल है। इसका विशेष महत्व है। राम की पैड़ी के पास स्थित कालेराम मंदिर के बारे में कहा जाता है कि तकरीबन दो हजार साल पहले राजा विक्रमादित्य ने इसकी पुनर्स्थापना करके इसके मंदिर का स्वरूप दिया था। हालांकि जब बाबर के आदेश पर अयोध्या में आक्रमण हुआ, तब उस समय के संत ने मूर्ति निकाल कर उसे सरयू में प्रवाहित कर दिया। 

कहते हैं कि वह विग्रह सरयू में 200 साल से ज्यादा वक्त तक पड़ा रहा। जब मराठी ब्राह्मण को वह मूर्ति मिली तो उसे फिर से मंदिर में स्थापित किया गया। सरयू में प्रवाहित किए जाने से पहले तकरीबन डेढ़ हजार साल तक लोग इस मूर्ति की पूजा करते थे। मंदिर में सुबह की आरती 6:30 बजे जबकि शयन आरती रात 8:30 बजे होती है। मंदिर के कपाट गर्मियों में सुबह 4:30 बजे जबकि सर्दियों में 5 बजे खुलते हैं। 

3. धर्म का बंटवारा नहीं, संस्कृति की मैट्रिक्स
वाल्मीकि और तुलसी के राम पूर्ण वा है। वह समस्त मानव गुणों को उसके चरम तक खुद में समाहित करने वाले हैं।
है। हालांकि लोक के राम अपूर्ण हैं। लेकिन वही राम लोगों को पसंद हैं। वह धर्म के बंटवारे का प्रतीक नहीं हैं। बल्कि इससे अलग वह संस्कृति की मैट्रिक्स के उस हिस्से में रचे-बसे हैं, जिनसे हर कोई अपना रिश्ता तलाशता है। इंडोनेशिया सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाला राष्ट्र है। बावजूद इसके यहां राम और राम के प्रतीक उसी संस्कृति में इतनी पैठ रखते हैं कि वे राम को खुद से कभी अलग नहीं कर सके। यूं तो मूल रूप से रामायण की कहानी एक जैसी ही है, लेकिन बात इंडोनेशिया की काकवीन रामायण की करें तो इसमें काफी फर्क भी दिखते हैं। तुलसीदास की सीता कोमल, सुंदर, सहनशील और रूपवती है, जबकि काकवीन रामायण की सीता सुंदर तो हैं लेकिन वह साहसी भी हैं और शक्ति की प्रतीक भी। वह लंका में राम का केवल इंतजार ही नहीं करतीं बल्कि वह असुरों से लड़ती भी हैं। लोक की स्वीकार्यता उसकी अपनी कल्पनाओं से उपजती है और उसी में रचती-बसती चली जाती है। ऐसा ही इंडोनेशिया में भी दिखता है। रामायणों और रामलीलाओं में स्वदेशी देवताओं को भी दिखाया जाता है, जोकि राम की मदद करते हैं। बाली में तो गली और चौराहों पर राम और रामायणकालीन चरित्रों की मूर्तियां चौराहों पर दिख जाना आम है। मुस्लिम बहुल आबादी के बावजूद राम न केवल रामलीलाओं में यहां दिखते हैं बल्कि यहां के लोकनृत्य, कठपुतली नृत्य आदि में भी वह रचे-बसे है।



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