समुद्र मंथन सवाल जवाब

समुद्र मंथन कब कहाँ और किस लिए किया गया था?

समुद्र मंथन आज से 27हजार साल पहले हिंद महासागर में किया गया था। इसमें निकला अमृत गढ़वाल के श्री नगर नामक शहर में पिया गया था। इसमें शामिल कुछ देवता पश्चिम के शोध के आधार पर सुदूर अंतरिक्ष में मृगशिरा तारामंडल से आऐ थे जिनका शरीर का औसत वजन 5लाख किलो और लंबाई 100फुट का अनुमान है।मरणोपरांत सभी कर्मकांड इसी घटना से जुड़े है। और मृत्यु उपरांत आत्मा भी उसी तारामंडल स्थिति ब्रह्मलोक में यात्रा करती है जंहा से य़े असाधारणदेवता और दैत्य तब आऐ थे।


समुद्र मंथन कब कहाँ और किस लिए क्या गया था?

समुद्र मन्थन एक प्रसिद्ध हिन्दू धर्म पौराणिक कथा है। यह कथा भागवत पुराण , महाभारत तथा विश्णु पुराण में आती है।

यह वह समय था जबकि देवता लोग धरती पर रहते थे। धरती पर वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। काम था धरती का निर्माण करना। धरती को रहने लायक बनाना और धरती पर मानव सहित अन्बादी का विस्तार करना।

देवताओं के साथ उनके ही भाई बंधु दैत्य भी रहते थे। तब यह धरती एक द्वीप की ही थी अर्थात धरती का एक ही हिस्सा जल से बाहर निकला हुआ था। यह भी बहुत छोटा-सा हिस्सा था। इसके बीचोबीच था मेरू पर्वत।

धरती के विस्तार और इस पर विविध प्रकार के जीवन निर्माण के लिए देवताओं के भी देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने लीला रची और उन्होंने देव तथा उनके भाई असुरों की शक्ति का उपयोग कर समुद्र मंथन कराया। समुद्र मंथन कराने के लिए पहले कारण निर्मित किया गया।

दुर्वासा ऋषि ने अपना अपमान होने के कारण देवराज इन्द्र को ‘श्री’ (लक्ष्मी) से हीन हो जाने का शाप दे दिया। भगवान विष्णु ने इंद्र को शाप मुक्ति के लिए असुरों के साथ 'समुद्र मंथन' के लिए कहा और दैत्यों को अमृत का लालच दिया। इस तरह हुआ समुद्र मंथन। यह समुद्र था क्षीर सागर जिसे आज हिन्द महासागर कहते हैं। जब देवताओं तथा असुरों ने समुद्र मंथन आरंभ किया, तब भगवान विष्णु ने कच्छप बनकर मंथन में भाग लिया। वे समुद्र के बीचोबीच में वे स्थिर रहे और उनके ऊपर रखा गया मदरांचल पर्वत। फिर वासुकी नाग को रस्सी बानाकर एक ओर से देवता और दूसरी ओर से दैत्यों ने समुद्र का मंथन करना शुरू कर दिया।

1. हलाहल (विष) : समुद्र का मंथन करने पर सबसे पहले पहले जल का हलाहल (कालकूट) विष निकला जिसकी ज्वाला बहुत तीव्र थी। हलाहल विष की ज्वाला से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर की प्रार्थना की।

शंकर ने उस विष को हथेली पर रखकर पी लिया, किंतु उसे कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया तथा उस विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया इसीलिए महादेवजी को 'नीलकंठ' कहा जाने लगा। हथेली से पीते समय कुछ विष धरती पर गिर गया था जिसका अंश आज भी हम सांप, बिच्छू और जहरीले कीड़ों में देखते हैं।

2. कामधेनु : विष के बाद मथे जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े जोर की आवाज उत्पन्न हुई। देव और असुरों ने जब सिर उठाकर देखा तो पता चला कि यह साक्षात सुरभि कामधेनु गाय थी। इस गाय को काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंग की सैकड़ों गौएं घेरे हुई थीं।

गाय को हिन्दू धर्म में पवित्र पशु माना जाता है। गाय मनुष्य जाति के जीवन को चलाने के लिए महत्वपूर्ण पशु है। गाय को कामधेनु कहा गया है। कामधेनु सबका पालन करने वाली है। उस काल में गाय को धेनु कहा जाता था।

ऐसा कहना है कि समुद्र मंथन के समय क्षीरसागर से पांच गाये उत्पन्न हुई – नंदा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला और बहुला।

3. उच्चैःश्रवा घोड़ा : घोड़े तो कई हुए लेकिन श्वेत रंग का उच्चैःश्रवा घोड़ा सबसे तेज और उड़ने वाला घोड़ा माना जाता था। अब इसकी कोई भी प्रजाति धरती पर नहीं बची। यह इंद्र के पास था। उच्चै:श्रवा का पोषण अमृत से होता है। यह अश्वों का राजा है। उच्चै:श्रवा के कई अर्थ हैं, जैसे जिसका यश ऊंचा हो, जिसके कान ऊंचे हों अथवा जो ऊंचा सुनता हो।

4. ऐरावत हाथी : हाथी तो सभी अच्‍छे और सुंदर नजर आते हैं लेकिन सफेद हाथी को देखना अद्भुत है। ऐरावत सफेद हाथियों का राजा था। 'इरा' का अर्थ जल है, अत: 'इरावत' (समुद्र) से उत्पन्न हाथी को 'ऐरावत' नाम दिया गया है।

यह हाथी देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान निकली 14 मूल्यवान वस्तुओं में से एक था। मंथन से प्राप्त रत्नों के बंटवारे के समय ऐरावत को इन्द्र को दे दिया गया था। चार दांतों वाला सफेद हाथी मिलना अब मुश्किल है।

5. कौस्तुभ मणि : मंथन के दौरान पांचवां रत्न था कौस्तुभ मणि। कौस्तुभ मणि को भगवान विष्णु धारण करते हैं। महाभारत में उल्लेख है कि कालिय नाग को श्रीकृष्ण ने गरूड़ के त्रास से मुक्त किया था। उस समय कालिय नाग ने अपने मस्तक से उतारकर श्रीकृष्ण को कौस्तुभ मणि दे दी थी।

यह एक चमत्कारिक मणि है। माना जाता है कि इच्छाधारी नागों के पास ही होती है। अब यह मणि बची है या फिर समुद्र की किसी अतल गहराइयों में कहीं दबी पड़ी होगी। हो सकता है कि धरती की किसी गुफा में दफन हो यह मणि।

6. कल्पद्रुम : यह दुनिया का पहला वृक्ष माना जा सकता है, जो समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुआ। कुछ लोग इसे संस्कृत भाषा की उत्पत्ति से जोड़ते हैं और कुछ लोग मानते हैं कि इसे ही कल्पवृक्ष कहते हैं। जबकि कुछ का कहना है कि पारिजात को कल्पवृक्ष कहा जाता है।

यह स्पष्ट नहीं है कि कल्पद्रुम आखिर क्या है? ज्योतिषियों के अनुसार कल्पद्रुप एक प्रकार का योग होता है।

पारिजात वृक्ष : समुद्र मंथन के दौरान कल्पवृक्ष के अलावा पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति भी हुई थी। 'पारिजात' या 'हरसिंगार' उन प्रमुख वृक्षों में से एक है जिसके फूल ईश्वर की आराधना में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के पुष्प प्रिय हैं। यह माना जाता है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है।

पारिजात वृक्ष में कई औषधीय गुण होते हैं। हिन्दू धर्म में कल्पवृक्ष के बाद पारिजात को महत्व दिया गया है। इसके बाद बरगद, पीपल और नीम का महत्व है।

7. अप्सरा रंभा : समुद्र मंथन के दौरान एक सुंदर अप्सरा प्रकट हुई जिसे रंभा कहा गया। पुराणों में रंभा का चित्रण एक प्रसिद्ध अप्सरा के रूप में माना जाता है, जो कि कुबेर की सभा में थी। रंभा कुबेर के पुत्र नलकुबर के साथ पत्नी की तरह रहती थी। ऋषि कश्यप और प्राधा की पुत्री का नाम भी रंभा था। महाभारत में इसे तुरुंब नाम के गंधर्व की पत्नी बताया गया है।

समुद्र मंथन के दौरान इन्द्र ने देवताओं से रंभा को अपनी राजसभा के लिए प्राप्त किया था। विश्वामित्र की घोर तपस्या से विचलित होकर इंद्र ने रंभा को बुलाकर विश्वामित्र का तप भंग करने के लिए भेजा था। अप्सरा को गंधर्वलोक का वासी माना जाता है। कुछ लोग इन्हें परी कहते हैं।

8. श्री  अथवा लक्ष्मी : समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मी की उत्पत्ति भी हुई। लक्ष्मी अर्थात श्री और समृद्धि की उत्पत्ति। कुछ लोग इसे सोने (गोल्ड) से जोड़ते हैं। माना जाता है कि जिस भी घर में स्त्री का सम्मान होता है, वहां समृद्धि कायम रहती है।

दूसरी लक्ष्मी : महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति के गर्भ से एक त्रिलोक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम लक्ष्मी था और जिसने भगवान विष्णु से विवाह किया।

9. वारुणी (मदिरा) : वारुणी नाम से एक शराब होती थी। वारुणी नाम से एक पर्व भी होता है और वारुणी नाम से एक खगोलीय योग भी। समुद्र मंथन के दौरान जिस मदिरा की उत्पत्ति हुई उसका नाम वारुणी रखा गया। वरुण का अर्थ जल। एक स्त्री के जल से उत्प‍न्न होने के कारण उसे वारुणी कहा गया। वरुण नाम के एक देवता हैं, जो असुरों की तरफ थे। असुरों ने वारुणी को लिया।

वरुण की पत्नी को भी वरुणी कहते हैं। कदंब के फलों से बनाई जाने वाली मदिरा को भी वारुणी कहते हैं।

10. चन्द्रमा : ब्राह्मणों-क्षत्रियों के कई गोत्र होते हैं उनमें चंद्र से जुड़े कुछ गोत्र नाम हैं, जैसे चंद्रवंशी। पौराणिक संदर्भों के अनुसार चंद्रमा को तपस्वी अत्रि और अनुसूया की संतान बताया गया है जिसका नाम 'सोम' है। दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियां थीं जिनके नाम पर 27 नक्षत्रों के नाम पड़े हैं। ये सब चन्द्रमा को ब्याही गईं।

आज आसमान में हम जो चंद्रमा देखते हैं वह समुद्र मंथन के दौरान उत्पन्न हुआ था। इस चंद्रमा का चंद्रवंशियों के चंद्रमा से क्या संबंध है, यह शोध का विषय हो सकता है। पुराणों अनुसार चंद्रमा की उत्पत्ति धरती से हुई है।


12. शंख : शंख तो कई पाए जाते हैं लेकिन पांचजञ्य शंख मिलना मुश्किल है। समुद्र मंथन के दौरान इस शंख की उत्पत्ति हुई थी। 14 रत्नों में से एक पांचजञ्य शंख को माना गया है। शंख को ‍विजय, समृद्धि, सुख, शांति, यश, कीर्ति और लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि शंख नाद का प्रतीक है। शंख ध्वनि शुभ मानी गई है।

13. धन्वंतरि वैद्य : देवता एवं दैत्यों के सम्मिलित प्रयास के शांत हो जाने पर समुद्र में स्वयं ही मंथन चल रहा था जिसके चलते भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत का स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए। विद्वान कहते हैं कि इस दौरान दरअसल कई प्रकार की औषधियां उत्पन्न हुईं और उसके बाद अमृत निकला।

14. अमृत : 'अमृत' का शाब्दिक अर्थ 'अमरता' है। निश्चित ही एक ऐसे पेय पदार्थ या रसायन रहा होगा जिसको पीने से व्यक्ति हजारों वर्ष तक जीने की क्षमता हासिल कर लेता होगा। यही कारण है कि बहुत से ऋषि रामायण काल में भी पाए जाते हैं और महाभारत काल में भी। समुद्र मंथन के अंत में अमृत का कलश निकला था। अमृत के नाम पर ही चरणामृत और पंचामृत का प्रचलन हुआ।



समुद्र मंथन किस स्थान पर हुआ था ?

यदि स्थूल दृष्टि से देखें तो शायद अरब सागर में कहीं। लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी घटना के सही स्थान का पता करने हेतु उस समय की भौगौलिक स्थिति का पता होना भी जरूरी है। ग्रंथों में गहरे घुसेंगे तो पता चलेगा कि बिहार, बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा आदि समुद्र मंथन के समय जलमग्न थे। उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से भी उस समय जलमग्न ही थे ।

समुद्रमंथन का समय भागीरथी के प्रादुर्भाव से भी बहुत पहले का है। उस समय हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बहुत थोड़ी ही भूमि का निर्माण कर पाई थी। नदियाँ ही भूमि का निर्माण करती हैं। इस राष्ट्र के पिता पर्वत हैं तो माताएँ नदियाँ। अभी भी सबसे प्रसिद्ध डेल्टा सुंदरवन इसी निर्माण का प्रमाण है।

कहा गया है कि जब समुद्रमंथन की बात उठी तो मंदार पर्वत की मथानी तो बना ली गई, कूर्मावतार ने आधार भी दे दिया, लेकिन मथानी की रस्सी कहाँ से लाएँ। उस समय सर्वसम्मति बनी कि हिमालय की कंदराओं में आराम कर रहे नागराज वासुकि से ही यह काम करवाया जा सकता है। उनसे बड़ी रस्सी जैसी कोई वस्तु तीनों लोकों और चौदहों भुवनों में नहीं हैं।

अब समस्या थी कि उन्हें लाए कौन?

इतने बड़े थे कि लहराते हुए रेंगते हुए चलते तो टकराने लगते। इसलिये अधिकतर समय आराम ही करते थे। इस पर कैलाशपति उठे और वासुकि को अपनी कलाई में लपेट कर चल दिये। नागराज की डिलीवरी करके भोले एक स्थान पर बैठ गए। भोलेनाथ नागराज को पहुँचाने के बाद जिस स्थान पर बैठे थे, वह स्थान है वासुकीनाथ धाम, जो देवघर से 40 किलोमीटर की दूरी पर है।

जिस स्थान पर नागराज का उपचार करने व विष ग्रहण करने के बाद बैठे थे, वह स्थान है वैद्यनाथ धाम, देवघर में। चाँद का वह टुकड़ा जो उनके सर पर लगाया गया था, आज भी लगा है और उससे निरंतर जल टपकता रहता है। वह टुकड़ा भोलेनाथ के ठीक ऊपर वैद्यनाथ धाम मंदिर के शिखर के नीचे लगा है। नाम है - चंद्रकांत मणि...

जब मंथन प्रारम्भ हुआ तो नागराज को पीड़ा होने लगी। इधर से देवता खींचें, उधर से असुर खींचें, बीच में मंदराचल चुभे। क्षुब्ध होकर नागराज ने फुफकारना शुरू कर दिया। अब सोचिये कि जिस नाग को एक पर्वत के चारों तरफ लपेट दिया गया, वह कितना बड़ा होगा। नागराज के फुफकारने से सारी सृष्टि में जहर फैलने लगा। हाहाकार मच गया।

एक तरफ तो देवता और असुर भाग खड़े हुए और दूसरी तरफ नागराज निढाल होकर फुफकारते रह गए।

अब करें तो करें क्या?

देवताओं की मीटिंग बिठाई गई। प्रश्न उठा कि इस हलाहल को कौन पियेगा?

विष्णु भगवान ने भोले बाबा के चरण धर लिये कि बाबा आप ही पी सकते हैं।

जो भोले होते हैं, उनके हिस्से ही जहर आता है। बाबा उठे और पहले जहर पिया और फिर वासुकि का उपचार किया। तब तक तो धन्वंतरि पैदा भी नहीं हुए थे। उनसे भी पुराने वैद्य हैं वैद्यनाथ, जो वैद्यनाथ धाम, देवघर, झारखंड में स्थापित हैं।

बाबा ने हलाहल पी तो लिया, लेकिन उसका ताप असह्य हो गया। वहीँ एक स्थान देखकर बैठ गए। मंथन शुरू हो गया। मंथन से निकले चन्द्रमा के एक टुकड़े को तोड़ कर निकाला गया और उसे भगवान के सर के ठीक ऊपर स्थापित किया गया। उस टुकड़े से निरंतर शीतल जल महादेव के सर पर गिरता रहता है।

यह क्षेत्र कहाँ है जहाँ मंथन हुआ था?

बिहार के बाँका जिले में स्थित मंदार पर्वत के आसपास का क्षेत्र ही मंथन का स्थान है। आज भी झारखण्ड, बंगाल, उड़ीसा और बिहार की भूमि में खनिजों का प्रचुर भण्डार है। सबका केंद्र मंदार पर्वत ही है। मंदार में अब भी समुद्र मंथन से निकली निधियाँ छिपी हुई हैं।

भोलेनाथ नागराज को पहुँचाने के बाद जिस स्थान पर बैठे थे, वह स्थान है वासुकीनाथ धाम, जो देवघर से 40 किलोमीटर की दूरी पर है।

जिस स्थान पर नागराज का उपचार करने व विष ग्रहण करने के बाद बैठे थे, वह स्थान है वैद्यनाथ धाम, देवघर में। चाँद का वह टुकड़ा जो उनके सर पर लगाया गया था, आज भी लगा है और उससे निरंतर जल टपकता रहता है। वह टुकड़ा भोलेनाथ के ठीक ऊपर वैद्यनाथ धाम मंदिर के शिखर के नीचे लगा है। नाम है - चंद्रकांत मणि...

स्रोत: हेरबनीज़

ये बड़ा ही सुंदर प्रश्न पूछा है आप ने.

प्रसंग:

भगवान कर्तिक्ये के देव सेनापति बनने के बाद भगवान इंद्र चिंतित हो गये की कहीं महादेव उन्हें देवराज ना बना दें | उनकी इस चिंता ने उन्हें आशंकित और अभिमानी बना दिया | उनके इस अभिमान को तोड़ने के लिए नारद जी ने एक उपाए सोचा| एक बार देवासुर संग्राम के बाद सभी देवता शिव जी से मिलने के लिए कैलाश गये |

वहाँ ऋषि दुरवासा भी आए उनके आने पर महादेव ने नारद जी को एक मन्दार के पुष्पुओं की माला दी | कैलाश से लोटते समये वो माला नारद जी ने देवराज इंद्र को दे दिया |

जिसे खुद को शिव से भी महान समझने वाले इंद्र ने अपने वाहन ऐरवत के उपर रख दिया जिसे ऐरवत ने नीचे गिरा कर पैरों से कुचल दिया |

शिव के उपहार इस प्रकार अवहेलना देख ऋषि दुरवासा क्रोधित हो गये और इंद्र को शाप दिया की पुरी पृथ्वी श्रीहीन हो जाएगी |

उनके इस शाप से सारा वैभव समुंद्र में चला गया | श्रीहीन हुए देवता ब्रह्मा जी के पास गये और उपाए की याचना करने लगे |

तब ब्रह्मा ने कहा इसका उपाए तो श्री हरी विष्णु ही बता सकते है | सभी देवता उनके पास आए उन्होने उन्हें शिव के पास जाने को कहा | शिव ने कहा इसका एक ही उपाए है देव और दानव को मिल कर सागर मंथन करना होगा जिससे सारा अश्वर्य बाहर आएगा |

स्रोत: हेरबनीज़

समुद्रा मंथन:

उस समाए दानवों के राजा बलि थे | शिव के आदेश पर इंद्र दानव राज बलि के पास सहायता के लिए गये |

बलि शिव भक्त थे अतः उन्होने न चाहते हुए भी इंद्र के आग्रह पर शिव आज्ञा मान कर मंथन को तैयार हुए |

अब प्रशन ये हुआ की इतने बड़े समुंद्र को मथने के लिए मथनि कहाँ से आए |

तब शिव ने मन्दार पर्वत को मथनि और नाग राज वाशुकी जो की शिव के कंठ में वास करते है को रस्सी बनाने को कहा |

देवताओं ने छल से दानवों को वाशुकी के मुख का भाग पकड़ने पर विवश कर दिया और मंथन आरंभ हुआ | पर मन्दार समुंद्र में डूबते चले जा रहे थे और पृथ्वी उनका भार सहन नही कर पा रही थी |

स्रोत: विकिपीडिया

तब श्रीहरी विष्णु ने कुर्मा अवतार लेकर मन्दार का भार का सहा और मंथन आरंभ हुआ |

मंथन से प्राप्ति:

काफ़ी परिश्रम के बाद मंथन से सबसे पहले हलाहल यानी विष निकला जिसने समस्त संसार के जीवन् को नष्ट करना आरंभ कर दिया|

स्रोत: लाइफ ओके

तब देवताओं और दानवों के अनुरोध पर शिव ने जगत के कल्याण के लिए हलाहल को पी लिया जिसे माता पार्वती के अपने प्रभाव से शिव के कंठ में रोक दिया जिससे महादेव नीलकंठ कह्लाए | परंतु विषपान के समाए विष की कुछ बूंदे सागर में जा गिरी जिससे काल यानी कलयुग का जन्म हुआ |

उसके बाद लक्ष्मी आई जीने विष्णु को समर्पित किया गया

उसके बाद अप्सरा रंभा, मेनका आदि आई जीने स्वर्ग को दिया गया

वारुणी: दानवों को मिली

कामधेनु: ब्रम्‍हा देव को मिली

परिजात: इंद्रालोक को मिला

शरंग: विष्णु को अर्पित की गई

चंद्र देव: शिव को अर्पित किए गये

पांचजनया शंख: विष्णु को अर्पित किया गया

ज्येष्ठा:

वरुण: इंद्रा लोक गये

कल्पवृक्ष: स्वर्ग लोक को मिला

निद्रा: दानवों को मिली

और सबसे अंत मे धन्वंतरि अमृत कलश लेकर आए | जिसके लिए देव और दानव दोनो लड़ने लगे |

तब भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार लेकर अमृत का आन देवताओं को करवाया | परंतु राहु ने देव रूप धारण कर अमृत पान किया |

परंतु चंद्र और सूर्या देव ने उन्हें पाचन लिए जिसकी वजह से विष्णु ने राहु का गला काट दिया परंतु अमृत के प्रभाव से उसकी मृत्यु नहीं हुई , उसका सर राहु कहलाया और धड़ केतु | तब राहु न्याय के लिए भगवान शिव के पास गये तब उन्होंने राहु को चंद्र और सूर्य को ग्रहण लगाने का आदेश दिया.

हिंदू धर्म में बहुत सारी देवताओं और असुरों के युद्ध की कथाएं प्रचलित हैं। मगर, सबसे ज्यादा जिस कथा के बारे में लोग जानते हैं वह है ‘समुद्र मंथन’। समुद्र मंथन पहला ऐसा काम था जिसे देवताओं और असुरों ने मिलकर किया था। इससे पहले असुरों को देवताओं से हमेश लड़ते हुए ही देखा गया था। अधिकांश लोगों को यही पता है कि समुद्र मंथन पृथ्वी के निर्माण के लिए हुआ था। मगर, विष्णु पुराण में समुद्र मंथन की कुछ और ही कथा छुपी हुई है। समुद्र मंथन का कारण था देवी लक्ष्मी की खोज। जी हां, देवी लक्ष्मी के क्षीर सागर में विलुप होने के बाद जब उनकी तलाश की गई तब हुआ था समुद्र मंथन। आइए जानते हैं इस दिव्य घटना के बारे में।

कथा के अनुसार जब बृह्मा जी ने भगवान विष्णु से पृथ्वी के निर्माण के विषय में बात की तब एक बार फिर भगवान विषणु और देवी लक्ष्मी को एक दूसरे से बिछड़ना पड़ा। उस वक्त देवी लक्ष्मी नाराज हो कर क्षीर सागर की गहराइयों में समाहित हो गई। वहीं भगवान विषणु पृथ्वी लोक को बसाने के बारे में विचार करने लगे। तब पृथ्वी के लगभग पूरे हिस्से में पानी ही पानी था।

ऐसे में उसे बसाने के लिए बहुत सारी वस्तुओं की जरूरत थी। यह वस्तुएं क्षीर सागर में छुपे हुए थे। तब भगवान विष्णु ने तय किया कि वह समुद्र का मंथन कराएंगे। मगर, इस मंथन के लिए न तो देवता गण तैयार थे और नहीं वह इसे अकेले कर पाने में समर्थ थे। वहीं दूसरी तरफ देवी लक्ष्मी के रुष्ट होने से पूरे बृह्मांड में सभी देवता और असुर श्रीहीन हो गए थे। सभी चाहते थे कि देवी लक्ष्मी वापिस आ जाएं।

भगवान विष्णु ने तब देवताओं को श्री का लोभ और असुरों को अमृत का लोभ दे कर समुद्र मंथन के लिए तैयार किया था। इसके बावजूद समुद्र को मथना आसान नहीं था। तब भगवान विष्णु ने अपनी माया से मंदार पर्वत को समुद्र के बीचो बीच ला खड़ा किया। इसके बाद मंदार पर्वत से समुद्र को मथने के लिए एक मजबूत रस्सी की जरूरत थी। तब भगवान विष्णु ने भगवान शिव से उनके गले में वास करने वाले नाग वासुकी को समुद्र मंथन के लिए देने के लिए आग्रह किया। इसके बाद बारी आई कि वासुकी के मुंह का हिस्सा कौन पकड़गा और पूछ का हिस्सा कौन पकड़ेगा। वासुकी के मुंह से जैहरीली हवा निकलती थी मगर वह हिस्सा मजबूत था। वहीं पूंछ का हिस्सा कमजोर था। तब असुरों ने तय किया कि वह मजबूत भाग को पकड़ेंगे। हालाकि यह भगवान विषणु की एक चाल थी।

इसके बाद बारी आई कि मंदार पर्वत के भार को कौन उठाएगा। तब भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण किया और अपनी पीठ पर मंदार पर्वत को रख लिया। तब कई वर्षों तक समुद्र मंथन का काम चलता रहा। तब जाकर सबसे पहले मंथन से हलाहल निकला। इसे भगवान शिव ने पी लिया। तब ही से उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा। इसके बाद कामधेनू गाय, उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभमणि हीरा, कल्पवृष पेड़ और ऐसे 13 रत्न निकले। सबसे आखिर में देवी लक्ष्मी समुद्र मंथन से निकलीं। जैसे ही देवी लक्षमी समुद्र से बाहर आईं सभी देवताओं के गहने और धन वापिस आ गया।

  • सही, सटीक बात यह है कि समुद्रमंथन आज 2022 से करीब 15 करोड़, 5 लाख 122 साल पहले हुआ था।
  • अगर भारत के धर्मशास्त्र, ग्रन्थ-पुराण पढ़ें, तो ज्ञान तो बढ़ेगा ही साथ में डिप्रेशन मिटेगा और हम अपने पूर्वज ऋषि-गुरुओं के बारे में जान सकेंगे।
  • सन् २००२ से करीब १५ करोड, , लाख, ३३ हजार, एक सौ बाइस वर्ष पहले चाक्षुष मन्वन्तर में समुद्र मंथन किया गया था।
  • पुराणों के अनुसार इस समय वर्तमान में वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है।
  • काल की गति निराली है… शक, सम्वत्, सन्, माह, तिथि और दिन का सबका एक निश्चित समय होता है। इसी प्रकार एक निश्चित समय को मन्वन्तर कहते हैं।
  • पुराणों की माने, तो एक मन्वन्तर का समय ३० करोड़, ८५ लाख, ७१ हजार, ४२८ वर्ष का होता है।
  • जिस दिव्य पुरुष का जिस मन्वन्तर में शासन चलता है, उसी दिव्य पुरुष के नाम से उस। मन्वन्तर का नाम रखा गया। जैसे चौबीस घण्टे का एक रात-दिन होता, जिसे दिन ही कहा जाता है और उनके नाम हैं रविवार, सोमवार -आदि हैं। -
  • इस क्रम में चाक्षुष मन्वन्तर छठा मन्वन्तर है। इसके पश्चात वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर प्रारम्भ हो गया। इस वैवस्वत मन्वन्तर की सत्ताइस चतुर्युगी बीत गई और अब इस समय अट्ठाइसवीं चतुर्युगी के कलियुग का यह प्रथम चरण चल रहा है।
  • सन् २००२ तक कलयुग के ५१२२ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। प्रायः महत्त्वपूणज्ञ घटनाएँ, युद्ध, महामारी, मारा मारी, सत्ता परिवर्तन आदि युग या मन्वन्तर के अंतिम युगी में होता है।

बहुत अच्छा प्रश्न है और उसका तार्किक उत्तर भी पढ़ लीजिए,पसंद आये तो अपवोट,शेयर व फॉलो भी कर सकते है ।

समुद्र का मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को समुद्र के बीच में खड़ा करना पड़ा होगा और वो स्थान समुद्र के बीच में ही हो सकता ताकि दोनों तरफ जमीन पर खड़ा होकर मंथन किया जा सके,समुद्र का बीच तो दक्षिण ध्रुव के अलावा दूसरी कोई जगह है नहीं।

दक्षिणी ध्रुव पर समुद्र के बीच मंदराचल पर्वत को टेक कर बासुकी नामक नाग को 4–5 बार उसके चारों तरफ लपेट कर नाग की पुंछ भारत भूमि पर कन्या कुमारी के तट पर देवताओं ने पकड़ी और दूसरी तरफ बासुकी नाग का मुंह दक्षिणी अमेरिका के तट पर असुरों ने पकड़ कर समुद्र का मंथन/बिलोया होगा जिसके बाद 14 रत्न उसमें से निकले ।

अब हमारे समझ में आ रहा है कि यह सब करने के लिए कन्या कुमारी के तट से दक्षिणी अमेरिका तक लंबा बासुकी नाग की लंबाई कम से कम 20 हजार किलोमीटर तो होनी ही चाहिये वरना इतनी लंबाई व मंदराचल पर्वत के 4–5 लपेटे के बिना मंथन संभव नहीं था ।

अब तक इस पृथ्वी पर जितने भी पुराणिक अवशेष प्राप्त हुवे है उनमें उस 20,000 किलोमीटर लंबे नाग(बासुकी)के अवशेष अभी तक प्राप्त नही हुवे है न ही किसी जीव विज्ञानी को ज्ञात है कि बासुकी नामक नाग की लंबाई बीस हजार किलोमीटर होती थी।

अतः समुद्र में से निकले 14 वस्तुएं यथा :चंद्रमा,(तनिक विचार करें कि चंद्रमा समुद्र में छिपा पड़ा था जिसको मंथन करके निकाला गया)वैद्य धन्वंतरि,4 दांत वाला ऐरावत हाथी,घोड़ा, गाय(कामधेनु)लक्ष्मी,अप्सरा,अमृत,शराब,

कल्पवृक्ष, जहर आदि -आदिके बारे में आप अपना अंदाज लगा लीजिये ,ज्यादा लिखना मुनासिब नही या पाठक की बुद्धि पर शक करना ठीक नहीं ।

कुल मिलाकर यह पूरी कपोल कल्पित कथा है इससे ज्यादा कुछ नहीं ऐसी गटनाओं का जिक्र भी करने से आज की दुनिया में हम हंसी के पात्र बनते है आइये ऐसे ग्रन्थों को जनमानस के विचारों से हटायें।

अब आप ही तय करें कि समुद्र मंथन कहाँ हुवा होगा या हुवा या हुवा ही नहीं।


बिहार के बेगुसराय जिले में स्थित सिमरियाधाम को कुंभ की आदिस्थली कहा जाता है। इस वर्ष कार्तिक मास में यहां महाकुंभ का आयोजन होने जा रहा है। आज अधिकतर लोग यही जानते हैं कि कुंभ सिर्फ हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में ही लगता है। लेकिन, प्राचीन काल में भारत में 12 स्थानों पर कुंभ लगता था। यह सत्य है कि बीच के कालखंड में सिमरिया में महाकुंभ की कड़ी टूट गई, लेकिन कुंभ के अवशेष के रूप में यहां कल्पवास की परंपरा बनी रही। 2011 में यहां अर्धकुंभ का भी आयोजन हुआ था।

जनसामान्य के मन में कुंभ के स्मरण मात्र से ही एक ऐसे क्षेत्र का बोध होता है, जहां अविरल जनसमूह की उपस्थिति होती है और उपस्थित जनों का एकमात्र ध्येय होता है, वहां उपलब्ध पवित्र नदी में स्नान कर अमृत तत्व की प्राप्ति करना व पुण्य का भागी होना। वर्तमान में हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयाग में प्रत्येक छह साल में अर्धकुंभ और 12 साल में महाकुंभ का आयोजन हो रहा है। लेकिन पुरातन काल में 12 स्थानों पर कुंभ का आयोजन होता था, जिसका उल्लेख रुद्रयामल तंत्र आदि धर्मग्रंथों में मिलता है। प्राचीन परंपरा के अनुसार हरिद्वार व उज्जैन में बैशाख में, बद्रीनाथ में ज्येष्ठ में, जगन्नाथपुरी में आषाढ़ में, द्वारका में सावन में, नासिक में भाद्रपद में, रामेश्वरम में आश्विन में, सिमरिया धाम में कार्तिक में, कुरुक्षेत्र में अग्रहायण में, गंगासागर में पौष में, प्रयाग में माघ में, कुंभकोणम में फाल्गुन में और ब्रह्मपुत्र में चैत्र माह में कुंभ योग का आयोजन होता था। आठ स्थल धीरे-धीरे कुंभ आयोजन से वंचित होते गए। इन आठ स्थलों में सिमरियाधाम भी एक है। आदि कुंभ स्थली का वर्णन रामायण में भी आता है।

बाल कांड (45/14/39) के अनुसार, जनकपुर जाने के क्रम में भगवान श्रीराम का पथ प्रदर्शन करते हुए गुरु विश्वामित्र ने कहा - यही वह देश है, जहां पूर्व काल में समुद्र मंथन किया गया था। यहां आसपास के इलाके में समुद्र मंथन में सहायक सामग्रियों, जैसे- मंदराचल पर्वत, वासुकी नाग, विषपाई, भगवान शिव (नीलकंठ), कच्छप सिंधु, सागरमाथा आदि मौजूद हैं।

प्रिय मित्र बता दो देगें ।क्या आपके समझ आ जाएगा। क्या आपकी समझ आत्मसात करने योग्य है यह भेद ज्ञान का रहस्य।

तो समझो मित्र हम मदद करते हैं। समुद्र मथंन वह स्थान है जो ना कभी खत्म हुआ है ना होगा जबतक समुद्र मथंन करके वह अमृत नहीं पियेगा। क्या देवता क्या राक्षस क्या आम जीव। उस पर सबका बराबर हक है। उस निकले अमृत को कोई भी छल बल शाम दण्ड से छिन्न नहीं सकता। जो छिन्न लिया जाए वह अमृत नहीं है। अमृत का मतलब ही अजर अमर अविनाशी है अर्थात इश्वर अवस्था बन जाना।

अब विचार करो धर्मग्रंथों का ज्ञान पवित्र व सत्य क्यों है असत्य होते हुए भी। अर्थात अधुरा है। पाचं तत्वों से बना समुद्र सत है। लेकिन जो अमृत भी तत्व बनकर निकले वह असत्य है अर्थात कोड रुप में। ऊसका भेद निकालकर प्राप्त करना होगा।

यानी जीव की भ्रमित अवस्था समझो अर्थात जो दृश्य दिखाया जा रहा है वह भ्रम के शिवाय कुछ नहीं है सिर्फ तत्वों के शिवाय। जो जीव शक्ति के द्वारा दिखाया अनुभव कराया जा रहा है। ओर जीव शरीरों में अर्थात तत्वों में विराजमान है। मतलब साफ है वो अमृत, जीव है नकल रुप में शुद्ध चेतन की परछाईं। इसलिये तत्वों से निकला अमृत भी भ्रम अर्थात नकली है।

जो असल की नकल प्रतित हो रहा है जिसमें आप भ्रमित बने हुए हैं असली मानकर इसी तरह। समझो मित्र। वो भवसागर अर्थात समुद्र आपके शरीर में मन है। मन ही चित्रगुप्त है जो पल में कोई भी मनपसंद चित्र अकिंत करता है। यही आपका सब हिसाब रखता है। जहाँ से सब ज्ञान अज्ञान उपजता है। ये मन कोई ओर नहीं बल्कि आकाश तत्व है। इसलिये कोई भी बोली आवाज, तत्वों की आवाज कभी खत्म नहीं होती। जब चाहे आप खोज व ध्यान विधि से सुन सकते हैं। इसी प्रकार दृश्य। इसलिये समय अतंराल में बार बार सामने आता है। अर्थात दुनिया गोल है। ऐसा कोई भी तत्व नही है जिसमें चेतन जीव का वास ना हो। इसलिये तत्वों को शरीर कहा जाता है। यही तत्व कण-कण है। अर्थात जीव का शरीर । नाशवान व बदलने वाले यही कारण है। आप अज्ञान में कण-कण को ईश्वर मान रहे हैं। इससे ज्यादा फुटेभाग क्या होगै आपके। सामने समुद्र होते हुए भी आप प्यासे मर रहे हैं आ जा रहे हैं बार बार।

यदी अपने मन अर्थात समुद्र को मथकर वह अमृत निकालने की विधि जान ली ओर भेद जानकर पिया जाए तो आपको वह परम इश्वर अवस्था प्राप्त हो सकती है। जिसको पाने के लिए देव रासक्ष गन्धर्व ऋषि गण तपस्वी योगी ध्यानी अजपा निरकारीं आदी तरसते है तरसते थे। परन्तु अहकांर में उनको प्राप्त नहीं हुई। क्योंकि वो खुद गुरु बन बैठै समुद्र मथंन का। इसलिये उनको नकली अमृत प्राप्त हुआ अर्थात ये मन ब्रह्म या शुन्य कहो जड़ कहो रा शरीर कहो। सब कुछ ब्रह्म ही है अर्थात असत्य मिथ्या ।

आज भी हर जीव शरीर मथंन करने में लगा हुआ है एक दुसरे से मदद लेकर करके गुलाम बनाकर बनके। परन्तु नकली अमृत निकल रहा है पि रहा है जीव। इसलिये जीव अजर अमर अविनाशी होते भी भटक रहा है विपत्ति का शिकार बना है। अजर अमर अविनाशी तो है जीव,, वो इश्वर परम अवस्था तब प्राप्त होगी जब जीव समुद मथंन करके अमृत निकालकर पि लेगा। जो स्थान जीव के पास ही है। कहीं भटकने की जरुरत नहीं है आपको। मै एकदम बेबाक सत्य आपके सामने रखता हूं। समझना जानना पहचाना आपने ही होगा मित्र। मेरे सभी लेख एक दुसरे से कनैकैटिड है। ताकि आप सम्पूर्ण सत्य रहस्य समझ सको । एक सवाल का उतर समझकर इग्नोर ना करे। आपके भले के लिए समर्पित है सब। अपना पुर्ण विवेक जगाकर अपने अपने पवित्र ग्रन्थों से निकला सार से मिलान भी कर सकते हैं आप यदी आपमे ऐसी अचुक क्षमता हो तो। इतने छोटे उतर में इतना विशाल विस्तार करना कोई मामूली बात नहीं समझें। जो समस्त जगत के पवित्र ग्रन्थों का सत्य सार हो मित्र। आशा है कि आपको समुद्र का मथनं का भेद समझ आ गया होगा। जो भिन्न-भिन्न नामो उदाहरणों दृश्यों कहानियों में प्रत्येक धर्म में मौजुद है। नमस्कार सत बन्दगी जी


समुद्र मंथन क्यों किया गया और उससे क्या प्राप्त हुआ?

चित्र स्रोत: गूगल

वास्तव में समुद्र मंथन महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण करना पड़ा था।

एक बार ऋषि दुर्वासा वन में भ्रमण करने को निकले। अचानक उन्हें एक बहुत तेज व अनोखी सुगंध का अनुभव हुआ। वो सुगंध इतनी अच्छी थी कि दुर्वासा स्वयं को रोक नहीं पाए एवं सुगंध की दिशा में बढ़ने लगे। थोड़ी दूर चलने के पश्चात उन्होंने देखा कि एक बहुत रूपवती नारी वहीं सरोवर के तट पर बैठी हुई है। उसके गले में एक अद्भभुत पुष्प हार था जो प्रकाश की भांति जगमगा रहा था और ये मनभावन सुगंध उसी हार से निकल रही थी।

दुर्वासा ने विस्मित स्वर में पूछा कि "हे देवी आप कौन है और इस घने वन में एकाकी क्या कर रही हैं?" इसपर उस कन्या ने उन्हें


वास्तव में समुद्र मंथन महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण करना पड़ा था।

एक बार ऋषि दुर्वासा वन में भ्रमण करने को निकले। अचानक उन्हें एक बहुत तेज व अनोखी सुगंध का अनुभव हुआ। वो सुगंध इतनी अच्छी थी कि दुर्वासा स्वयं को रोक नहीं पाए एवं सुगंध की दिशा में बढ़ने लगे। थोड़ी दूर चलने के पश्चात उन्होंने देखा कि एक बहुत रूपवती नारी वहीं सरोवर के तट पर बैठी हुई है। उसके गले में एक अद्भभुत पुष्प हार था जो प्रकाश की भांति जगमगा रहा था और ये मनभावन सुगंध उसी हार से निकल रही थी।

दुर्वासा ने विस्मित स्वर में पूछा कि "हे देवी आप कौन है और इस घने वन में एकाकी क्या कर रही हैं?" इसपर उस कन्या ने उन्हें बताया कि उनका नाम विद्याधरी है और वे वायु की देवी हैं। दुर्वासा ने उनका अभिवादन किया और अपना परिचय देते हुए कहा कि "आपने ये जो पुष्पों की माला पहनी है वो अत्यंत दुर्लभ प्रतीत होती है। इतनी मनभावन सुगंध और इतना तेज प्रकाश तो पृथ्वी के किसी पुष्प में होना असंभव है। आपको ये पुष्पों की माला कहाँ से प्राप्त हुई?"

उनके इस प्रश्न पर उस देवी ने कहा कि "आपका कथन सत्य है। ये साधारण पुष्प नहीं अपितु अति दुर्लभ पारिजात के पुष्पों की माला है जो केवल स्वर्ग लोक में ही मिलते हैं। मेरी सेवा से प्रसन्न होकर स्वयं पवनदेव ने मुझे ये अद्वितीय हार उपहार स्वरुप दिया है।" उस हार के बारे में जानने के पश्चात दुर्वासा ने उसे प्राप्त करने की इच्छा जताई जिसपर विद्याधरी सहर्ष उन्हें वो हार उपहार स्वरुप प्रदान कर अपने लोक लौट गयी।

कुछ समय पश्चात दुर्वासा अपने पिता एवं सप्तर्षियों से मिलने स्वर्गलोक गए जहाँ उन्हें देवराज के दर्शन हुए। ये सोच कर कि पारिजात पुष्पों का वो हार पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है, दुर्वासा ने वो हार देवराज को उपहार स्वरुप दे दिया। उन्होंने सोचा कि इस अद्वितीय हार को पा कर इंद्रदेव प्रसन्न होंगे किन्तु देवराज ने उस उपहार का उपहास करना प्रारम्भ कर दिया।

उन्होंने कहा कि "हे महर्षि। आप पृथ्वी के वासी हैं इसी कारण कदाचित आपको ये हार अद्भभुत प्रतीत हो रहा है किन्तु ये तो स्वर्ग लोक है और इस प्रकार के असंख्य पुष्प हमारे पारिजात उपवन में हैं। इसका मैं क्या करूँगा? किन्तु अब आपने मुझे उपहार स्वरुप दे ही दिया है तो मैं ये पारिजात माला ऐरावत को ही भेंट कर देता हूँ।" ये कहकर इंद्र ने वो माला ऐरावत के मस्तक पर रख दी। इस प्रकार माला रखे जानें और उसकी तीव्र गंध से ऐरावत को बड़ी असुविधा हुई और उस मादक गंध के मद में आकर ऐरावत ने उस माला को क्षत-विक्षत कर दिया।

अपने ही द्वारा दिए गए उपहार का स्वयं अपने ही सामने इस प्रकार अपमान होता देख कर दुर्वासा को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने क्रोधित स्वर में इंद्र से कहा "हे इंद्र! आपने अपनी सम्पदा और ऐश्वर्य के मद में मेरे द्वारा दिए गए उपहार का ऐसा अपमान किया। आप ये भी भूल गए कि उपहार का मूल्य नहीं देखा जाता और वो हमेशा अमूल्य ही होता है। मैं आपको श्राप देता हूँ कि जिस ऐश्वर्य के अभिमान में आपने मेरा इतना अपमान किया वो आपसे सदा के लिए छिन जाएगा और आपके द्वारा शासित तीनों लोक श्रीहीन हो जाएंगे।"

इस प्रकार के श्राप को पाकर इंद्र बड़े भयभीत हुए और उन्होंने बार बार दुर्वासा से क्षमा याचना की किन्तु क्रोधित दुर्वासा ने उन्हें क्षमा नहीं किया एवं स्वर्ग लोक से प्रस्थान कर गए। उनके जाते ही इंद्र एवं अन्य देवता अपनी सारी सम्पदा खो कर श्रीहीन हो गए। जैसे ही शुक्राचार्य को ये समाचार मिला, उन्होंने दैत्यों को स्वर्ग लोक पर आक्रमण करने को कहा। दैत्यराज बलि के नेतृत्व में उन्होंने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर देवराज इंद्र को उनके पद से च्युत कर दिया। विवश हो इंद्र को अन्य देवों के साथ प्राण बचाने के लिए छुपना पड़ा।

स्वर्ग लोक से निकले जाने के पश्चात देवराज परमपिता ब्रह्मा के पास पहुँचे और उन्हें अपनी रक्षा करने को कहा। ब्रह्मदेव ने इंद्र से कहा कि तुमने स्वयं अपने अहंकार के कारण अपनी सम्पदा को खोया है अतः अब तुम्हे अपने सामर्थ्य से उसे पुनः प्राप्त करना होगा। इसपर इंद्र ने अपनी संपत्ति को पुनः प्राप्त करने का उपाय पूछा तब ब्रह्मदेव ने नारायण के साथ परामर्श कर देवों और दानवों को समुद्र मंथन करने का सुझाव दिया जिससे उन्हें उनकी संपत्ति पुनः प्राप्त हो सके।

तब देवों और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया जिससे कुल 84 रत्न निकले। इनमें से 14 महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ये हैं:

  1. हलाहल - भगवान शंकर द्वारा पान किया गया
  2. ऐरावत - देवराज इंद्र को प्राप्त
  3. कामधेनु गाय - परमपिता ब्रह्मा को प्राप्त जो उन्होंने ऋषियों को दे दी
  4. उच्चैश्रवा अश्व - दैत्यराज बलि को प्राप्त
  5. कौस्तभ मणि - भगवान विष्णु को प्राप्त
  6. कल्पवृक्ष - देवों को प्राप्त
  7. रम्भा के नेतृत्व में अन्य अप्सराएं - देवताओं को प्राप्त
  8. माता लक्ष्मी - भगवान विष्णु के साथ विवाह हुआ
  9. वारुणी मदिरा - दैत्यों को प्राप्त
  10. चन्द्रमा - देवताओं में से एक, महादेव के मस्तक पर सुशोभित हुए
  11. श्राङ्ग धनुष - नारायण को प्राप्त हुआ
  12. शंख - भगवान विष्णु को प्राप्त
  13. धन्वन्तरि - देवताओं के वैद्य
  14. अमृत - देव धन्वन्तरि ही अमृत लेकर निकले थे। दोनों पक्षों ने उसे पाना चाहा किन्तु अंत में वो देवताओं को मिला।

बदलाव 1: एक मित्र ने बड़ा अच्छा प्रश्न पूछा है कि जब ऐरावत समुद्र मंथन से निकला तो पहले ऐरावत देवराज इंद्र के पास कैसे था? इसका उत्तर पुराणों में है जहाँ कहा गया है कि श्राप के कारण ऐसी चीजें, जो ऐश्वर्य से संबंधित थी उनका लोप हो गया। बहुत काल तक वे लुप्त ही रही और फिर समुद्र मंथन से नए रत्नों के साथ उनका पुनः प्रादुर्भाव हुआ। 84 रत्नों में से पुनः प्राप्त होने वालों में मुख्य है - माता लक्ष्मी, ऐरावत, कल्पवृक्ष, पारिजात, अप्सराएं, गंधर्व, श्राङ्ग इत्यादि। इसिलए माता लक्ष्मी को समुद्र से जन्मा भी माना गया है और महर्षि भृगु की पुत्री भी माना गया है। उसी प्रकार श्राङ्ग को भी समुद्र मंथन से उत्पन्न माना गया है और ब्रह्माजी द्वारा उसकी रचना का भी वर्णन है जब नारायण और महादेव में श्राङ्ग और पिनाक से युद्ध हुआ था। आशा है अब कोई दुविधा नही होगी।

अमृत पाना हो, तो मंथन करना पड़ेगा। कोई भी वांछित वस्तु अनायास नहीं प्राप्त होती है। धैर्य-पूर्वक परिश्रम करना पड़ता है।

जिन ढ़ूंढा तिन पांइयां, गहरे पानी पैठ !

समुद्र-मंथन एक पौराणिक घटना है, एक प्रतीक है, सीख है। देवासुर संग्राम एक सतत् प्रक्रिया रही है। कभी एक का पलड़ा भारी, कभी दूसरे का।

इसे धरती की ऊर्वरता से जोड़कर भी देखा जाता है। फसल की कटाई के बाद खेतों में स्वतः उगने वाले खर-पतवारों और फिर नये फसल के लिए खेतों की जुताई के पूर्व, उन्हें काट कर, बीन कर दूर करने के संदर्भ में भी इसे समझा जा सकता है। असुर, धरती के नीचे की संपदा के स्वामी माने जाते हैं, देवता धरती से ऊपर की।

एक बार दुर्वासा मुनि इंद्र से मिलने गए और उन्हें एक सुगंधित फूलों की माला प्रदान की। इन्द्र ने उसे अधिक महत्व नहीं दिया और अपने हाथी, ऐरावत के सुंढ में डाल दिया। हाथी ने उसे नीचे डालकर, पैरों से कुचल दिया।

क्रुद्ध होकर दुर्वासा ने इंद्र को शाप दे दिया और इंद्र श्री-हीन हो गए। अमरावती से लक्ष्मी चली गईं। देवता भाग्य-हीन एवं शक्तिहीन-से हो गए।

असुरों का पलड़ा भारी हो गया। बलि ने देवताओं को पराजित कर दिया और इन्द्र लोक पर दावेदारी कर दी।

हताश देवता-गण, विष्णु के पास गए। उन्होंने बताया कि लक्ष्मी रूठ कर सागर में विलीन हो गई हैं। उन्हें वापस लाने के लिए क्षीर-सागर, जो अनंत संभावनाओं का प्रतीक है, उसे भली-भांति मथना होगा।

यह अकेले संभव नहीं है। अतः बुद्धिमानी इसी में है कि इस कार्य में असुरों का भी सहयोग लिया जाए। असुरों को समझा-बुझाकर राजी किया गया। प्राप्त अनमोल रत्नों को आपस में बाँट लेने पर सहमति हुई।

अब सामान जुटाए गए। मंदार पर्वत को मथनी बना कर क्षीर-सागर लाया गया। शिव के गले में पड़े नागराज वासुकी को रस्सी बनाकर पर्वत के चारों ओर लपेट दिया गया। देवताओं ने पूँछ की ओर पकड़ा, असुरों को नागराज के सर या फण का हिस्सा पकड़ाया गया। इसे बल और प्रतिबल के रूप में देखा जा सकता है।

मथने की प्रक्रिया आरंभ हुई, तो मंदार पर्वत समुद्र में डूबने लगा। विष्णु ने झट से कूर्मावतार लिया। कछुआ बनके समुद्र के तले में बैठ गए और मंदराचल को अपनी पीठ पर धारण कर स्थायित्व प्रदान किया।

सबसे पहले कालकूट या हलाहल नामक भयंकर विष निकला, जिसके प्रभाव से देवता- असुर सभी त्रस्त हो गये। पर्यावरण का संकट उत्पन्न हो गया, अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह उठ गया। सबों ने शिव से इसे ग्रहण कर संकट से उबारने का अनुरोध किया। शिव ने उसे अपने कंठ धारण कर लिया और नीलकंठ कहलाये।

मान सहित विष खाइके संभू भये जगदीस…।

सबसे अंत में अमृत निकला। परिश्रम का फल अंततः मिलता ही है।

अमृत के बँटवारे को लेकर विवाद अवश्यंभावी था। देवता, असुरों को इससे वंचित करना चाहते थे।

विष्णु ने मोहिनी-रूप धारण कर, असुरों को भरमाया और चुपके से देवताओं में अमृत बाँट दिया।

एक असुर ने भांपते हुए, देवताओं की पंक्ति में छुपकर अमृत पीने का प्रयास किया। सूर्य और चंद्रमा ने देख लिया और शोर मचाया। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया।

सिर और धड़ अलग होकर भी राहु-केतु के रूप में जीवित रहे। चंद्र-ग्रहण और सूर्य-ग्रहण की घटनाओं को राहु के द्वारा, उनके ग्रसित होने के रूप में देखा जाता है।

सागर-मंथन से कहीं नौ और कहीं चौदह रत्नों के निकलने की बात कही गई है। वे रत्न क्रमशः शक्ति, आनंद, समृद्धि एवं पर्यावरण से संबंधित थे।

क) शक्ति से संबंधित——

१. उच्चैश्रवा घोड़ा, जो उड़ सकता था—असुरों को मिला,

२. पांचजन्य शंख—विष्णु,

३. सारंग धनुष—"

४. श्वेत हाथी, ऐरावत—इंंद्र,

ख) आनंद-संबंधित——

१. अप्सरा रम्भा—इंंद्र के दरबार,

२. वैजयंती पुष्पों की माला—विष्णु,

३. वारुणी, मादक पेय—असुर,

४. कामदेव, प्रेम के देवता,

५. धन्वंतरि, स्वास्थ्य के देवता,

६. अमृत—दीर्घायु एवं अमर बनाने का पेय,

ग) समृद्धि—संबंधित——

१. इच्छा पूरी करनेवाली गाय, कामधेनु——ऋषियों को,

२. कामना पूरी करनेवाला वृक्ष, कल्प-वृक्ष—पारिजात—स्वर्ग,

३. सपनों को साकार करनेवाली मणि, चिंतामणि-कौस्तुभ—विष्णु,

४. अक्षय-पात्र—सूर्य,

५. धन की देवी, लक्ष्मी—विष्णु को वरण किया,

घ) पर्यावरण-संबंधी——

१. विष, हलाहल—शिव ने पान किया।

उपर्युक्त प्रसंग भागवत-पुराण एवं विष्णु-पुराण में वर्णित है।


समुद्र मंथन क्यों हुआ था?

समुद्र मंथन को एक ऐतिहासिक तथ्य की भांति नहीं बल्कि पौराणिक सत्य समझिए। यह घटना किसी एक खास दिन नहीं घटी थी, बल्कि प्रतिदिन हम सबके जीवन में घटती है।

हमारा हृदय ही भावनाओं का वह सागर है जिसमें सद्भावनाओं का अमृत और दुर्भावनाओं का विष घुला हुआ है। हर व्यक्ति को मंथन करके जहर अलग करना होता है।

हमारे भीतर प्रकृति ने प्रेम भावना के संग घृणा भी दी है। क्रोध है तो करुणा भी है। मित्रता और शत्रुता दोनों मौजूद हैं।

जिस व्यक्ति ने जहर को हटा दिया और अमृत को बचा लिया उसका जीवन स्वर्ग हो जाता है। जिस व्यक्ति ने इसका विपरीत किया उसकी जिंदगी नरक हो जाती है।

दुर्वासा मुनि के शाप से इंद्र की धनसंपति नाश होने पर देवो और दानवो ने मिलकर मंदार पर्वत का रवैया बनाया और शेषनाग का नैतरा बनाकर समुद्र मंथन किया गया था उसमे से 14 रत्न मिले थे


समुद्र मंथन दो राज्यों में हुआ माना जाता है: बिहार और गुजरात।

  • बिहार में बांका जिले के बौंसी में स्थित मंदार पर्वत को समुद्र मंथन के लिए मथानी के रूप में इस्तेमाल किया गया था। इस पर्वत पर आज भी समुद्र मंथन के प्रतीक कई प्राचीन मंदिर और स्मारक मौजूद हैं।
  • गुजरात में सूरत जिले के पिंजरात गांव के पास समुद्र में एक मंदराचल पर्वत होने का दावा किया गया है। इस पर्वत को भी समुद्र मंथन के लिए मथानी के रूप में इस्तेमाल किया गया था।

इन दोनों पर्वतों का निर्माण एक ही तरह के ग्रेनाइट पत्थर से हुआ है। इस तरह ये दोनों पर्वत एक ही हैं।

अधिकतर लोग यह मानते हैं कि समुद्र मंथन बिहार के बांका जिले के बौंसी में स्थित मंदार पर्वत पर हुआ था।


समुद्र मंथन किस समुद्र में हुआ था?

“ मन “ समुद्र से भी गहरा है, इसकी लहरें किसी भी समुद्र या सागर से ज्यादा प्रभावशाली है। आपके विचारों ,आपके चिंतन प्रक्रिया के कारण ही नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक ऊर्जा छन कर बाहर आते हैं , माणिक, मोती विचारों के यही से शुरू होते हैं।

आपका शरीर ही ब्राह्मण्ड की एक इकाई है। 75% पानी यहां भी है 74% पानी धरती पर भी है। धरती भी पैदा करती है , औरत भी पैदा करती है ।

कहानी के माध्यम से बताया गया है कि शारीरिक धरातल पर होने वाले कार्य भी समुद्र मंथन से कम नहीं है।

समुद्र मंथन की घटना में छिपे हैं कई महान रहस्य और मिलने वाले चौदह रत्नो का वर्णन

समुद्र मंथन – हिन्दूधर्म की पौराणिक कथाओं में वैसे तो कई कथाएँ प्रचलित हैं…

लेकिन देवता और दानवों द्वारा कियें गया समुद्र मंथन की कहानी सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं.

कहा जाता हैं कि मंदार पर्वत को शेषनाग से बांधकर समुद्र का मंथन किया गया था और उस मंथन में समुद्र से ऐसी कई चीज़े प्राप्त हुई थी, जो बहुत अमूल्य थी. मंथन से प्राप्त चीजों में से एक चीज़ अमृत भी थी, जिसे लेकर देवताओं और असुरों में देवासुर युद्ध हुआ था और भगवान विष्णु की मदद से देवता इस युद्ध में अमृत को पाकर विजय प्राप्त कर पाए थे.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि समुद्र का मंथन करने की बात देवतों के मन में आई कैसी थी? इस पुरे वाकये के पीछे एक रोचक कहानी हैं जिसे आज हम आपको बतायेंगे.

विष्णु पुराण की एक कथा के अनुसार एक बार देवराज इन्द्र अपनी किसी यात्रा से बैकुंठ लोक वापस लौट रहे थे और उसी समय दुर्वासा ऋषि बैकुंठ लोक से बाहर जा रहे थे. दुर्वासा ऋषि ने ऐरावत हाथी में बैठे इन्द्रदेव को देखा तो उन्हें भ्रम हुआ कि हाथी में बैठा व्यक्ति त्रिलोकपति भगवान् विष्णु हैं. अपने इस भ्रम को सही समझ कर दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र को फूलों की एक माला भेंट की लेकिन अपने मद और वैभव में डूबे देवराज इन्द्र वह माला अपने हाथी ऐरावत के सिर पर फेंक दी और ऐरावत हाथी ने भी अपना सिर झटक कर उस माला को ज़मीन पर गिरा दिया जिससे वह माला ऐरावत के पैरों तले कुचल गयी.

दुर्वासा ऋषि ने जब इन्द्र की इस हरकत को यह देखा तो क्रोधित हो गए. उन्होंने ने इन्द्र द्वारा किये गए इस व्यवहार से खुद का अपमान तो समझा ही साथ ही इसे देवी लक्ष्मी का भी अपमान समझा.

इन्द्र द्वारा किये गए इस अपमान के बाद दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र की श्रीहीन होने का श्राप दे डाला. ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के कुछ ही समय बाद इन्द्र का सारा वैभव समुद्र में गिर गया और दैत्यों से युद्ध हारने पर उनका स्वर्ग से अधिकार छीन लिया गया.

समुद्र मंथन (संस्कृत: समुद्रमंथन 'समुद्र का मंथन') हिंदू पौराणिक कथाओं के सबसे प्रसिद्ध प्रकरणों में से एक है। समुद्र मंथन अमृता की उत्पत्ति की व्याख्या करता है।

स्वर्ग के राजा, हाथी पर सवार होते हुए, ऋषि दुर्वासा के पास आए, जिन्होंने उन्हें एक अप्सरा द्वारा दी गई एक विशेष माला की पेशकश की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया और इसे सूंड पर रख दिया (कभी-कभी कुछ शास्त्रों में हाथी के दांत या सिर) ) ऐरावत (उनका वाहन) की एक परीक्षा के रूप में यह साबित करने के लिए कि वह एक अहंकारी देवता नहीं थे।

फूलों में तेज गंध थी जिसने कुछ मधुमक्खियों को आकर्षित किया।मधुमक्खियों से नाराज हाथी ने माला को जमीन पर फेंक दिया। इसने ऋषि को क्रोधित कर दिया क्योंकि माला श्री (भाग्य) का निवास था और इसे प्रसाद या धार्मिक भेंट के रूप में माना जाना था। दुर्वासा ने इंद्र और सभी देवताओं को सभी शक्ति, ऊर्जा और भाग्य से रहित होने का शाप दिया।

इस घटना के बाद की लड़ाइयों में, देवों की हार हुई और बाली के नेतृत्व में असुरों ने ब्रह्मांड पर नियंत्रण हासिल कर लिया। देवताओं ने भगवान विष्णु की मदद मांगी, जिन्होंने उन्हें असुरों के साथ कूटनीतिक तरीके से व्यवहार करने की सलाह दी। देवताओं ने अमरता के अमृत के लिए संयुक्त रूप से समुद्र मंथन करने और इसे आपस में बांटने के लिए असुरों के साथ गठबंधन किया। हालांकि, विष्णु ने देवताओं से कहा कि वह अमृत प्राप्त करने के लिए अकेले उनकी व्यवस्था करेंगे।

दूध के सागर का मंथन एक व्यापक प्रक्रिया थी: मंदरा पर्वत को मंथन की छड़ के रूप में इस्तेमाल किया गया था और वासुकी, एक नागराज जो शिव के गले में रहता है, मंथन की रस्सी बन गया।

समुद्र मंथन प्रक्रिया ने दूध के महासागर से कई चीजें जारी कीं। उनमें से एक घातक जहर था जिसे हलाहला के नाम से जाना जाता था। हालांकि, कहानी के कुछ अन्य रूपों में, राक्षसों और देवताओं के मंथन के रूप में नाग राजा के मुंह से जहर निकल गया। इसने देवताओं और राक्षसों को भयभीत कर दिया क्योंकि जहर इतना शक्तिशाली था कि वह पूरी सृष्टि को नष्ट कर सकता था। भिन्नता में, भगवान इंद्र जानते थे कि वासुकी मुड़ने और खींचने पर जहरीली लपटों को उल्टी कर देगा, और इसलिए देवताओं को बिना कारण बताए सांप की पूंछ के छोर को पकड़ने की सलाह दी। सबसे पहले, देवताओं ने सांप के सिर के सिरे को पकड़ रखा था, जबकि असुरों ने पूंछ के सिरे को पकड़ रखा था। इससे असुर क्रोधित हो गए, क्योंकि जानवर का निचला हिस्सा सिर के हिस्से की तुलना में अशुद्ध या कम शुद्ध होता है। उन्होंने सांप के सिर के किनारे को पकड़ने पर जोर दिया। भगवान इंद्र को आभास था कि उनका उल्टा मनोविज्ञान काम करेगा। असुरों ने सांप का सिर पकड़ने की मांग की, जबकि देवों ने भगवान इंद्र से सलाह लेकर उसकी पूंछ को पकड़ने के लिए सहमति व्यक्त की। जब पहाड़ को समुद्र में रखा गया, तो वह डूबने लगा। विष्णु, कूर्म (जलाया हुआ कछुआ) के रूप में, उनके बचाव में आए और अपने खोल पर पहाड़ का समर्थन किया। वासुकी द्वारा उत्सर्जित धुएँ से असुरों को विष दिया गया। इसके बावजूद, देवों और असुरों ने बारी-बारी से सर्प के शरीर पर आगे-पीछे खींचे, जिससे पर्वत घूम गया, जिससे समुद्र मंथन हुआ।

तब देवता सुरक्षा के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। शिव ने तीनों लोकों की रक्षा के लिए जहर का सेवन किया और इस प्रक्रिया में उनके गले को नीला रंग दिया, जिसे अब से नीलकंठ (नीला गले वाला; "नीला" = "नीला", "कांथा" = "गला") कहा जाता है।

समुद्र मंथन, जो कि हिंदू पौराणिक कथाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, केवल देवताओं और असुरों की लड़ाई नहीं है। यह एक गहरी प्रतीकात्मकता के साथ एक घटना है, जो मानव मन की गहराइयों और चेतना के स्तर को दर्शाती है।

इस कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया, जिसमें अमृत, अर्थात् अमरता का रस, प्राप्त करने के लिए प्रयास किया गया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह केवल एक कथा नहीं है? इसके पीछे कई गहरे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक संदेश हैं।

समुद्र मंथन के दौरान उत्पन्न होने वाले रत्न, जैसे कि अमृत, एक रहस्य को छिपाते हैं। ये रत्न न केवल भौतिक धन के प्रतीक हैं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में छिपी शक्तियों को जगाने का भी प्रतीक हैं। इस प्रक्रिया को समझने से हमें अपने अस्तित्व, योग और आध्यात्मिक यात्रा के बारे में ज्ञान मिलता है।

समुद्र मंथन की यह महाकथा विज्ञान और पौराणिकता के बीच एक अद्वितीय संबंध स्थापित करती है। यह एक संकेत है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में सिर्फ धार्मिकता नहीं, बल्कि जीवन के गहरे रहस्यों का भी ज्ञान है।

इस विषय पर अधिक जानने के लिए, आप हमारे नवीनतम वीडियो को देख सकते हैं, जिसमें हम समुद्र मंथन के विभिन्न पहलुओं, उसकी प्रतीकात्मकता और उसके पीछे छिपे विज्ञान की चर्चा करेंगे।

समुद्र मंथन, जिसे हिन्दी में "समुद्र चुराई" भी कहा जाता है, हिन्दू पौराणिक कथाओं में वर्णित है और इसका संबंध हिन्दू धर्म के एक प्रमुख कथासंदर्भ से है, जिसमें देवों और आसुरों के बीच अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र का मंथन किया गया था।

समुद्र मंथन भगवान धन्वंतरि के द्वारा अमृत कलश के प्रकट होने के परिणामस्वरूप सम्पूर्ण जगत के लिए महत्वपूर्ण हुआ था। यह कथा हिन्दू पौराणिक साहित्य में विभिन्न रूपों में मिलती है, जैसे कि भागवत पुराण, महाभारत, और विष्णु पुराण में।

समुद्र मंथन का विवरण हिमालय पर्वत के पास स्थित समुद्र (समुद्र मंथन के लिए मिलांब) में हुआ था, जो आजकल भारत और नेपाल के सीमा क्षेत्र में स्थित है।


समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों का रहस्य और उनके पीछे छिपे अर्थ

समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों का रहस्य :-

दोस्तों भारतीय पंचांग के अनुसार हर साल कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी त्रयोदशी का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार भगवान धनवंतरी इसी दिन समुंद्र मंथन से प्रकट हुए थे। इसीलिए इस दिन भगवान धन्वंतरि का विशेष पूजा अर्चना की जाती है। दोस्तों समुंद्र मंथन से भगवान धनवंतरी के अलावा और भी 14 रत्नों की उत्पत्ति हुई थी। आज हम आपको अपने इस पोस्ट में समुद्र मंथन की पूरी कथा और साथ ही साथ उससे से निकले 14 रत्नों के बारे में भी बताएंगे और उस में छुपे लाइफ मैनेजमेंट सूत्रों के बारे में भी बताएंगे।

समुंद्र मंथन की कथा :-

दोस्तों हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण स्वर्ग और उसमें रहने वाले सारे देवता श्रीहीन हो गए थे अर्थात ऐश्वर्य,धन,वैभव आदि से हिन हो गए थे। तब स्वर्ग के सारे देवताओं में खलबली मच गई और वह इस समस्या को सुलझाने के लिए भगवान श्री हरि विष्णु जी के पास गए। तब भगवान श्री हरि विष्णु जी ने स्वर्ग के सारे देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का उपाय बताया। और उन्होंने यह भी बताया कि समुद्र मंथन से अमृत निकलेगा जिसे पीकर तुम सब अमर हो जाओगे ।यह बात स्वर्ग के देवताओं ने जाकर असुरों के राजा बलि को बताई तो असुरों के राजा बलि ने समुंद्र मंथन से निकलने वाले अमृत की बात सुनकर वह भी देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गया। तब स्वर्ग के देवता और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन करना प्रारंभ किया। वासुकि नाग को डोरी बनाई गई और मंदराचल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथने का काम शुरू हुआ। दोस्तों समुंद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा,ऐरावत हाथी,माता लक्ष्मी सहित 14 रत्न निकले।

क्या शिक्षा मिली

दोस्तो लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से समुंद्र मंथन को देखा जाए तो हम सब पाएंगे कि सीधे सीधे किसी भी इंसान को अमृत (परमात्मा) की प्राप्ति नहीं होती। उसके लिए सबसे पहले हम सब को अपने मन के विकारों को दूर करना पड़ता है। और अपनी इंद्रियों को अपने नियंत्रण में रखना पड़ता है दोस्तों समुद्र मंथन में 14 अर्थात अंतिम नंबर पर अमृत निकला था। दोस्तों इसका अर्थ है:- पांच कमेन्द्रियां,पांच जनेन्द्रियां तथा अन्य 4 हैं:-मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार। दोस्तों हम सब को इन सभी पर नियंत्रण करने के बाद में ही परमात्मा रुपी अमृत की प्राप्ति होती है।

1 कालकूट विष

दोस्तों समुंद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट नाम का विष निकला था। विष को देखकर सारे देवता और असुर काफी डर गए थे। तब संसार की रक्षा करने हेतु भगवान शिव ने उस भयंकर कालकूट विष को ग्रहण कर लिया। इसका अर्थ है की अमृत (परमात्मा) हर इंसान के मन में ही स्थित होते हैं। अगर हम सबको परमात्मा रुपी अमृत की इच्छा है। तो सबसे पहले हम सबको अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम सब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले हमारे अंदर से बुरे विचार अर्थात विष ही बाहर निकलेगा। हम सभी को इन सभी बुरे विचारों को अपने परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इस से मुक्त हो जाना चाहिए।

2 कामधेनु

समुंद्र मंथन करने में दूसरे नंबर पर निकली कामधेनु गौ। वह अग्निहोत्र यज्ञ की सामग्री उत्पन्न करने वाली गाय थी। इसलिए कामधेनु गांव को ब्रह्मवादी ऋषि मुनियों ने उसे ग्रहण कर लिया। दोस्तों कामधेनु प्रतीक है मन की निर्मलता का। क्योंकि किसी भी इंसान के अंदर से बुरे विचार निकल जाने पर उसका मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में उस इंसान को ईश्वर परमात्मा तक पहुंचना और भी आसान हो जाता है।

3 उच्चैश्रवा घोड़ा

समुंद्र मंथन के दौरान तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला। जिसका रंग सफेद था। इस घोड़े को असुरों के राजा बलि ने ग्रहण किया। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखें तो उच्चैश्रवा घोड़ा मन की गति का प्रतीक है। दोस्तों दुनिया में मन की गति को ही सबसे अधिक मानी गई है। अगर आप अमृत रूपी परमात्मा की प्राप्ति चाहते हैं तो आपको अपनी मन की गति पर विराम लगाना होगा। तभी आपको परमात्मा की प्राप्ति संभव हो पाएगी।

4 ऐरावत हाथी

समुंद्र मंथन के क्रम में चौथ के नंबर पर ऐरावत हाथी निकला था। ऐरावत हाथी के 4 बड़े बड़े दाग थे। जिसकी चमक कैलाश पर्वत से भी अधिक थी। ऐरावत हाथी को देवराज इंद्र ने अपने पास रख लिया। दोस्तों एरावत हाथी प्रतीक है बुद्धि का। और उसके चार दांत लोभ,मोह,वासना और क्रोध का प्रतिनिधित्व करते हैं। दोस्तों शुद्ध व निर्मल बुद्धि से ही हम सब इन विकारों पर काबू रख सकते हैं। और भगवान की प्राप्ति कर सकते है।

5 कौस्तुभ मणि

समुंद्र मंथन के पांचवें क्रम में कौस्तुभ मणि निकला था। जिसे भगवान श्री हरि विष्णु ने अपने हृदय पर धारण कर लिया। दोस्तों कौस्तुभ मणि प्रतीक है भक्ति का। जब आप के मन से सारे विकार निकल जाएंगे तब आपके मन में भक्ति ही शेष रह जाएगी। यहीं भक्ति हम सबके भगवान अर्थात परमात्मा ग्रहण करेंगे। Samundra Manthan Full Story

6 कल्पवृक्ष

समुंद्र मंथन के छठे के क्रम में निकला था दोस्तों सारी इच्छाओं को पूरा करने वाला कल्पवृक्ष। जिसे स्वर्ग के देवताओं ने मिलकर स्वर्ग में स्थापित कर दिया। दोस्तों कल्पवृक्ष प्रतीक है हम सबकी इच्छाओं का। कल्पवृक्ष से जुड़ा लाइफ मैनेजमेंट का सूत्र कहता है- अगर आप अपने जीवन में परमात्मा रूपी अमृत को प्राप्त करना चाहते हैं,तो आप अपनी सभी इच्छाओं का त्याग कर दीजिये। अगर मन मे इच्छाएं होगी तो आप परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकते।

7 रंभा अप्सरा

समुंद्र मंथन के सातवे क्रम में रंभा नाम की अप्सरा निकली थी जो बहुत ही सुंदर थी। वह सुंदर वस्त्र और आभूषण पहने हुए थी। उसकी चाल मन को लुभाने वाली थी। रंभा अप्सरा को भी देवताओं ने अपने पास ही रख लिया। दोस्तों अप्सरा प्रतीक है इंसान के मन में छुपी वासना का। जब कभी भी हमसब किसी विशेष काम में लगे होते हैं। तब हम सबके अंदर वासना आकर हम सबका मन विचलित करने का प्रयास करती है। उस स्थिति में हम सब को अपने मन के पर नियंत्रण होना बहुत जरूरी है।

8 देवी लक्ष्मी

समुंद्र मंथन के आठवें स्थान पर निकली थी देवी लक्ष्मी। देवी लक्ष्मी को देखते ही असुर देवता और ऋषि मुनि सभी चाहते थे कि लक्ष्मी उन्हें मिल जाएं। लेकिन देवी लक्ष्मी ने भगवान श्री हरि विष्णु को पति रूप में स्वीकार कर लिया। दोस्तो लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो लक्ष्मी प्रतीक हैं धन,वैभव, ऐश्वर्य व अन्य संसारिक सुखों का।जब हम सब परमात्मा रुपी अमृत को प्राप्त करना चाहते हैं। तो सांसारिक सुख भी हमें अपनी ओर खींचते हैं।लेकिन हम सब को उस ओर ध्यान ना देकर केवल परमात्मा की भक्ति में ही ध्यान लगाना चाहिए,तभी हम सबको अमृत (परमात्मा) प्राप्त हो सकते हैं

9 वारुणी देवी

समुद्र मंथन के नौवें क्रम में निकली थी वारुणी देवी। सभी देवताओं की अनुमति से इसे असुरों ने ले लिया। दोस्तों वारुणी का अर्थ होता है मदिरा यानी नशा। यह भी एक बुराई है। दोस्तों इंसान में नशा कैसा भी हो संसार और समाज के लिए वह बुरा ही होता है। अगर हम सबको परमात्मा को पाना है तो हम सब को सबसे पहले नशा छोड़ना होगा। तभी हम सबको परमात्मा की प्राप्ति अर्थात उनसे साक्षत्कार संभव हो सकता है

10 चंद्रमा

समुद्र मंथन के दसवें क्रम में चंद्रमा निकला। जिसे भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया। दोस्तों चंद्रमा का प्रतीक है- शीतलता का। जब हम सबके मन से बुरे विचार,लालच,वासना,नशा आदि से मुक्त हो जाएगा। तब हम सबका मन चंद्रमा की तरह शीतल हो जाएगा। परमात्मा को पाने के लिए हम सब के पास ऐसे ही मन की आवश्यकता है। ऐसे ही मन वाले भक्तों को परमात्मा रुपी अमृत प्राप्त होता है। Samundra Manthan Full Story

11 पारिजात वृक्ष

समुंद्र मंथन के 11वें क्रम में पारिजात वृक्ष निकला। पारिजात वृक्ष की विशेषता थी की इसे छूने से ही शरीर की सारी थकान मिट जाती थी।पारिजात वृक्ष को भी देवताओं ने अपने पास ही रख लिया। समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष निकालने का अर्थ है:-किसी भी मनुष्य को सफलता प्राप्त होने से पहले मिलने वाली शांति की है। जब हम परमात्मा के निकट पहुंचते हैं,तो हमारी थकान मिट जाती है। और हम सबके मन में शांति का एहसास होता है।

12 पांचजन्य शंख

दोस्तों समुंद्र मंथन से बारहवीं क्रम में पांचजन्य शंख निकला था। इस शंख को भगवान श्री हरि विष्णु ने ग्रहण किया। दोस्तों शंख को विजय का प्रतीक माना गया है। इसके साथ ही शंख की ध्वनि बहुत ही ज्यादा शुभ मानी गई है। हमारे पुराण कहते हैं कि जब हम सब परमात्मा रुपी अमृत से एक कदम की दूरी पर होते हैं, तो मन का खालीपन ईश्वरीय नाद( भक्ति) स्वर से भर जाता है। और ऐसी स्थिति में जाकर हम सबको परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

13 व 14 भगवान धन्वंतरि व अमृत कलश

दोस्तों समुंद्र मंथन से सबसे अंत में भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर निकले थे। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टिकोण से कहा जाए- तो भगवान धनवंतरी प्रतीक हैं निरोगी तन व निर्मल मन का। दोस्तों जब हमसब का तन निरोग और मन निर्मल होगा। तभी हम सबको परमात्मा की प्राप्ति होगी।

समुंद्र मंथन में 14 नंबर पर अर्थात सबसे अंतिम में अमृत निकला था। इसका अर्थ यह है कि पांच कर्मेंद्रियां, पांच जननेन्द्रियां तथा अन्य चार हैं:- मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार। अगर हम इन सभी पर नियंत्रण करने में कामयाब रहे। तभी हम सबको अपने जीवन में परमात्मा की प्राप्ति हो पाएगी।


समुद्र मंथन क्यों किया गया था?

समुद्र मंथन इसलिए किया गया ।

1 जिसे देवताओं और असुरों ने मिलकर किया था।

2 असुर और देवता हमेशा लड़ते हुए ही देखा गया था।

3 समुद्र मंथन का कारण था देवी लक्ष्मी की खोज करना ।

4 देवी लक्ष्मी सागर में विलुप होने के बाद उनकी तलाश के लिए हुआ था समुद्र मंथन ।


अगर आप भी समझते हैं कि पौराणिक कथा केवल कल्पना होती है तो कम से कम समुद्र मंथन के साथ ऐसा नहीं. वैज्ञानिक प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि सचमुच समुद्र मंथन हुआ था. अगर आपको यकीन ना हो तो इसे पढ़ें. समुद्रमंथन देवताओं और दानवों के बीच हुआ था जिसमें देवताओं और दानवों ने वासुकि नाग को मन्दराचल पर्वत के चारो और लपेटकर समुद्र मंथन किया था.दक्षिण गुजरात के समुद्र में समुद्रमंथन वाला वही पर्वत मिला है. वैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर इसकी पुष्टि भी की जा चुकी है. पिंजरत गांव के समुद्र में मिला पर्वत बिहार के भागलपुर में विराजित मूल मांधार शिखर जैसा ही है. गुजरात-बिहार का पर्वत एक जैसा ही है. दोनों ही पर्वत में ग्रेनाइट– की बहुलता है. इस पर्वत के बीचों-बीच नाग आकृति भी मिली है.


समुद्रमंथन क्यों हुआ था ?

समुद्र मंथन हो नहीं सकता अतः हुआ भी नहीं । जो कार्य हुआ ही नहीं उसके लिए ‌"क्यों हुआ?" जैसा प्रश्न निर्रथक है । इसलिए उसका उत्तर भी नहीं हो सकता । यह सब काल्पनिक है ।


कन्या, नही अप्सरा।

अप्सरा अप धातु जिसका अर्थ जल होता है से बना है, सर सरकने वाला, यहाँ अप से संयुक्त हो कर तैरने वाला या वाली। तो अप्सरा वह प्राणी है जो जल मे तैरे। मानवी अथवा कन्या धरातल पर रहती है, जल मे नही अत: वह मानवी तो नही थी। nymph कह सकते है पर ज्यादा संभावना तो यही है कि वह अलग अलग तत्व थे, जिन्हे अलग अलग अधिकारीयों द्वारा अधिकार मे ले लिया गया। जिनमे इन्द्र, विष्णु आदि प्रमुख थे।

ऐरावत भी निकला था जोकि हाथी नही था। चंद्रमा, वृक्ष और गाय भी निकली थी।

आप स्वयं सोचों सागर तल मे कन्यायें क्या चोर सिपाही खेल रही थी, कि हाथी, ऐरावत, गन्ने चबा रहा था।

पुराणों की अपनी शैली है, पहले शैली समझो फिर प्रसंग और संदर्भ उसके बाद शब्द पकड़ो।

सागर नाम का एक राजा भी हुआ है, जो सगर का पुत्र था। मंथन का अर्थ सम्पूर्ण विप्लव भी होता है।

थोड़ा समय लगाओ, पाणनीय व्याकरण पढ़ो। थोड़ा अपना दिमाग लगाओ थोड़ा गुरु का दिमाग खाओ। तभी समझ पड़ेगा यथार्थ।

समुद्र मंथन क्यों किया गया था?

दुर्वासा ऋषि के श्राप के फलस्वरूप इंद्र ने सारी सत्ता को खो दी थी उस पर राजा बलि का राज हो गया था राज्य को वापस पाने के लिए इंद्र श्री हरि विष्णु के पास जाते हैं और वह उन्हें यहां मार्ग बताते हैं कि समंदर में बहुत से ऐसे रत्न के साथ अमृत भी छिपा है जिसे तुम देवता उस अमृत का पान करके अमर हो जाओगे और असुरों की शक्तियां तुम पर निष्फल रहेगी इससे तुम खोया हुआ राज्य वापस पा लोगो राजा बलि के पास यह संदेश पहुंचाया गया की इस समुद्र में अमृत है जिससे कि कोई भी प्राणी अमर हो सकता है और देवता उसके पाने के पीछे अनन्त दोनों में अमृत की लालसा समुद्र मंथन करते है।


अनुरोध के लिए धन्यवाद। एक बार की बात है ऋषि दुर्वासा जो अपने अतिशय क्रोध और शाप के लिए विख्यात थे; वैकुंठ लोक को जा रहे थे। ठीक उसी समय देवराज इन्द्र भी वैकुंठलोक से वापस लौट रहे थे अपने हाथी ऐरावत पर बैठ कर। ऋषि दुर्वासा ने उन्हें देखकर श्रद्धापूर्वक अपने गले में पड़ी वैजयंती फूलों की माला को उन्हें भेंट की। इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और माला अपने हाथी के मस्तक पर रख दी। ऐरावत ने उस माला को अपने सूंड़ ने लिया और तीक्ष्ण गंध की वजह से नीचे फेंक दिया। यह देखकर ऋषि दुर्वासा के क्रोध की सीमा ना रही। उन्होंने देवराज इंद्र से कहा कि स्वर्ग के ऐश्वर्य ने तेरे मति भ्रष्ट कर दी है, तुझे अभिमानी बना दिया है, मैं तुझे श्राप देता हूं स्वर्ग का सारा ऐश्वर्या क्षीण हो जाएगा सारा स्वर्ग लोक श्री हीन हो जाएगा। इसी श्राप की वजह से स्वर्ग से पारिजात, कामधेनु , कल्पवृक्ष, ऐरावत इत्यादि बहुमूल्य रत्न और देवी लक्ष्मी(श्री) का क्षीरसागर में लोप हो गया और देवता शक्तिहीन हो गए फल स्वरुप राक्षसों ने स्वर्ग लोक पर अधिकार जमा लिया। तुम सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गया और उनसे उपाय पूछा। तब भगवान विष्णु ने उन्हें राक्षसों की सहायता से समुद्र मंथन का सुझाव दिया जिससे बहुमूल्य रत्नों की प्राप्ति होगी और अमृत की भी जिसके सेवन से देवता पुनः शक्तिशाली हो जाएंगे और स्वर्ग लोक पर अपना आधिपत्य स्थापित कर पाएंगे।


समुद्र मंथन कौन से राज्य में हुआ था?

पर्वत बिहार के बांका जिले में है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इस पर्वत को मथनी बनाकर समुद्र मंथन किया गया था. तो वहीं सूरत जिले के पिंजरात गांव के पास समुद्र में मंदराचल पर्वत होने का दावा किया था. जिसके बारे में कहा गया है कि इसी पर्वत को मथनी बनाकर समुद्र मंथन किया गया था.


समुद्र मंथन का क्या अभिप्राय था? तथा इसके पीछे क्या दर्शन है?

समुद्र मंथन का अगर सांकेतिक या दार्शनिक अर्थ आप कई निकाल सकते है हर व्यक्ति अपनी मानसिकता के अनुसार इसका अभिप्राय निकलेगा।

जैसे इसका आध्यात्मिक अर्थ अगर आप निकाले तो ये किसी साधक की अवस्था को दर्शाता है जैसे कूर्म अवतार विष्णु जी का जिसने मंदराचल पर्वत को आधार दिया यानी अगर साधना शुरु करनी हो तो एक आधार यानी गुरु चाहिए जो आपकी सहायता कर सके।

दूसरा वासुकि नाग दर्शाता है उस साधना सूत्र को जिसको लेके आप साधना करेगे यांनी जिस विधि को आप साधेंगे चाहे वो मंत्र हो योग हो ध्यान हो उस विधि का आप बार बार अभ्यास करेगे जो नाग को मथने के समान है।

तीसरा देवता और दानव हमारे चित्त को दर्शाते हैं चित्त यानी मन और बुद्धि का समन्वय मन दानव को दर्शाता है यानी जो दुष्टता दिखाता है जिसको सही गलत से कोई मतलब नही है जिसको सिर्फ अनुभव चाहिए जिसको सिर्फ अपना स्वार्थ देखना है। वही बुद्धि देवता का प्रतीक है बुद्धि में विवेक होता है विवेक बताता है क्या काम हमारे लिए सही है क्या गलत है। तो देव दानव मन बुद्धि की खींचातानी को दर्शाते हैं।मन जीतता है तब हम गलत काम करते है जब बुद्धि जीतती है तो हम सही काम करते है।

चौथा समुद्र मंथन में नाना प्रकार की चीजें निकलती है जो साधना से उत्त्पन्न होने वाले फल को दर्शाता है जिससे साधक के मन मे लोभ आता है ।

विष भी निकलता है जिसे शिव पीते है यानी साधना में जो भी विघ्न पैदा होता है उसका निराकरण आपका इष्ट करता है।

फिर अंत मे अमृत निकलता है यानी आप लक्ष्य के करीब पहुच गए है लेकिन सिर्फ करीब पहुचे है प्राप्त नही हुआ है ।फिर अंत मे भटकाने के लिए मोहनी आती है जो कि देवता को यानी बुद्धि को अमृत पिलाती है यानी जो उस अंतिम समय मे बुद्धि से काम ले लेता है वो अमृत पी लेता है यानी सफलता प्राप्त कर लेता है लेकिन एक दानव भी अमृत पी लेता है यानी कोई कोई मन से यानी छल से कपट से भी सफलता प्राप्त कर लेते है फिर भगवान उनको 2 टुकड़ो में काट देते है यानी ऐसी सफलता जो छल पूर्वक आये उसका अंत अच्छा नही होता या वो ज्यादा देर टिकती नही है।

ये बात किसी साधक और किसी विद्यार्थी पे भी लागू होती है। बाकी लोग भी अपनी अपनी मानसिकता के अनुसार उत्तर देगे ।

ये मेरी मौलिक सोच है इसमें कुछ गलत भी हो सकता है या किसी को अच्छा न लगे उसके लिए क्षमा चाहूगां।

समुद्र मंथन कब हुआ था?

समुद्र मंथन सतयुग में हुआ था। इसका समयकाल 23182 ईसवी पूर्व से 24500ईसवी पूर्व हो सकता है ।इसमें अनुमानित अधिकतम और न्यूनतम अवधि शामिल है। समुद्र मंथन में धन्वंतरि वैध अवतरित हुऐ थे और धन्वंतरि वैध आयुर्वेद के जनक थे। धन्वंतरि वैध से आयुर्वेद क़ा ज्ञान इंद्र ने प्राप्त किया था और इंद्र ने बाद में य़ह ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया और दक्ष प्रजापति में कश्यप ऋषि को दिया। दक्ष प्रजापति 19हजार साल पहले जन्में थे.


समुद्र मंथन किस समुद्र में किया गया था और उससे क्या निकला था?

द्वारका नगरी के पास ही देवताओं और राक्षसों ने अमृत की प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया था. इस मंथन के लिए मन्दराचल पर्वत का उपयोग किया था. समुद्र मंथन के दौरान विष भी निकला था, जिसे महादेव शिव ने ग्रहण कर लिया था. सामान्यत: समुद्र की गोद में मिलने वाले पर्वत ऐसे नहीं होते.


प्राचीन काल में जो घटनाये,शास्त्र, या दन्त कथाये लिखी गई थी उसके पीछे कुछ अच्छी बाते समझाने का प्रयोजन होता था।

शायद आपको पता हो देवताओ और दानव का समुद्र मंथन हुआ था तो शायद वह एक स्थुल बात का सुचक हो सकता है इसको ऐसा समझे कि हमारे मन में देवता वाले विचार अर्थात सकारात्मक विचार और दानव मने नकारात्मक विचार। चुके जब शास्त्र लिखे उस समय मानव में मनुष्य के मन में नकारात्मक विचार बढ़ गये थे। तब उन्होने समझाने का प्रयास किया मंथन मने हम हमारे मन को परमात्मा में लगाये चुकि परमात्मा ज्ञान का सागर है जब उनसे लगाये तो पहले विष निकलेगा अर्थात नकारात्मक विचार हमारे मन से निकलेगे इसका सुचक समुद्र मंथन में ​विष ​निकला जिसको शिव परमात्मा ने पिया अर्थात हम अपने नकारात्मक मन के विचार ​शिव परमात्मा को सौप दे धीरे —धीरे करके । आपको पता है शिवलिंग में धतुरा,अंक के फुल और कांटे चढ़ाये जाते है जो वास्तव में स्थुल है परन्तु ऐसा हो सकता है वह नकारात्मक विचारे के सुचक है । और जब नकारात्मक विचार निकल जाते है तो हमार मन पवित्र और सकारात्मक हो जाता है, आपको पता हो शायद शिव के उपर दुध भी चढ़ाया जाता है जो पवित्रता और सकारात्मकता विचारो का सुचक हो सकता है। आपको पता है समुद्र मंथन के आखरी में अमृत निकला अर्थात जब हमारे नकारात्मक विचार निकल जाते है तो हमार मन ठीक अर्थात अमृत के समान हो जाता है।

तो ये तभी हो पायेगा जब स्वय को आत्मा निश्चय कर अपने मन को परमात्मा में लगाये । गीता में एक शब्द आया है मनमनाभव अर्थात अपना मन मुझ परमात्मा में लगायो। अपना मन परमात्मा में लगाना राजयोग के श्रेणी में आता है और इसका वर्णन भी गीता आता हैै। तो ऐसा हो सकता है।

समुद्र मन्थन से निकले चौदह रत्न

1=हलाहल (विष) : समुद्र का मंथन करने पर सबसे पहले पहले जल का हलाहल (कालकूट) विष निकला जिसकी ज्वाला बहुत तीव्र थी। हलाहल विष की ज्वाला से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर की प्रार्थना की। शंकर ने उस विष को हथेली पर रखकर पी लिया, किंतु उसे कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया तथा उस विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया इसीलिए महादेवजी को 'नीलकंठ' कहा जाने लगा। हथेली से पीते समय कुछ विष धरती पर गिर गया था जिसका अंश आज भी हम सांप, बिच्छू और जहरीले कीड़ों में देखते हैं।

2= कामधेनु : विष के बाद मथे जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े जोर की आवाज उत्पन्न हुई। देव और असुरों ने जब सिर उठाकर देखा तो पता चला कि यह साक्षात सुरभि कामधेनु गाय थी। इस गाय को काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंग की सैकड़ों गौएं घेरे हुई थीं। गाय को हिन्दू धर्म में पवित्र पशु माना जाता है। गाय मनुष्य जाति के जीवन को चलाने के लिए महत्वपूर्ण पशु है। गाय को कामधेनु कहा गया है। कामधेनु सबका पालन करने वाली है। उस काल में गाय को धेनु कहा जाता था।

3= उच्चैःश्रवा घोड़ा : घोड़े तो कई हुए लेकिन श्वेत रंग का उच्चैःश्रवा घोड़ा सबसे तेज और उड़ने वाला घोड़ा माना जाता था। अब इसकी कोई भी प्रजाति धरती पर नहीं बची। यह इंद्र के पास था। उच्चै:श्रवा का पोषण अमृत से होता है। यह अश्वों का राजा है। उच्चै:श्रवा के कई अर्थ हैं, जैसे जिसका यश ऊंचा हो, जिसके कान ऊंचे हों अथवा जो ऊंचा सुनता हो।

4= ऐरावत हाथी : हाथी तो सभी अच्‍छे और सुंदर नजर आते हैं लेकिन सफेद हाथी को देखना अद्भुत है। ऐरावत सफेद हाथियों का राजा था। 'इरा' का अर्थ जल है, अत: 'इरावत' (समुद्र) से उत्पन्न हाथी को 'ऐरावत' नाम दिया गया है। यह हाथी देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान निकली 14 मूल्यवान वस्तुओं में से एक था। मंथन से प्राप्त रत्नों के बंटवारे के समय ऐरावत को इन्द्र को दे दिया गया था। चार दांतों वाला सफेद हाथी मिलना अब मुश्किल है। महाभारत, भीष्म पर्व के अष्टम अध्याय में भारतवर्ष से उत्तर के भू-भाग को उत्तर कुरु के बदले 'ऐरावत' कहा गया है। जैन साहित्य में भी यही नाम आया है। उत्तर का भू-भाग अर्थात तिब्बत, मंगोलिया और रूस के साइबेरिया तक का हिस्सा। हालांकि उत्तर कुरु भू-भाग उत्तरी ध्रुव के पास था संभवत: इसी क्षेत्र में यह हाथी पाया जाता रहा होगा।

5= कौस्तुभ मणि : मंथन के दौरान पांचवां रत्न था कौस्तुभ मणि। कौस्तुभ मणि को भगवान विष्णु धारण करते हैं। महाभारत में उल्लेख है कि कालिय नाग को श्रीकृष्ण ने गरूड़ के त्रास से मुक्त किया था। उस समय कालिय नाग ने अपने मस्तक से उतारकर श्रीकृष्ण को कौस्तुभ मणि दे दी थी। यह एक चमत्कारिक मणि है। माना जाता है कि इच्छाधारी नागों के पास ही अब यह मणि बची है या फिर समुद्र की किसी अतल गहराइयों में कहीं दबी पड़ी होगी। हो सकता है कि धरती की किसी गुफा में दफन हो यह मणि।

6= कल्पद्रुम : यह दुनिया का पहला धर्मग्रंथ माना जा सकता है, जो समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुआ। कुछ लोग इसे संस्कृत भाषा की उत्पत्ति से जोड़ते हैं और कुछ लोग मानते हैं कि इसे ही कल्पवृक्ष कहते हैं। जबकि कुछ का कहना है कि पारिजात को कल्पवृक्ष कहा जाता है।

7= रंभा : समुद्र मंथन के दौरान एक सुंदर अप्सरा प्रकट हुई जिसे रंभा कहा गया। पुराणों में रंभा का चित्रण एक प्रसिद्ध अप्सरा के रूप में माना जाता है, जो कि कुबेर की सभा में थी। रंभा कुबेर के पुत्र नलकुबर के साथ पत्नी की तरह रहती थी। ऋषि कश्यप और प्राधा की पुत्री का नाम भी रंभा था। महाभारत में इसे तुरुंब नाम के गंधर्व की पत्नी बताया गया है। समुद्र मंथन के दौरान इन्द्र ने देवताओं से रंभा को अपनी राजसभा के लिए प्राप्त किया था। विश्वामित्र की घोर तपस्या से विचलित होकर इंद्र ने रंभा को बुलाकर विश्वामित्र का तप भंग करने के लिए भेजा था। अप्सरा को गंधर्वलोक का वासी माना जाता है। कुछ लोग इन्हें परी कहते हैं।

8= लक्ष्मी : समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मी की उत्पत्ति भी हुई। लक्ष्मी अर्थात श्री और समृद्धि की उत्पत्ति। कुछ लोग इसे सोने (गोल्ड) से जोड़ते हैं। माना जाता है कि जिस भी घर में स्त्री का सम्मान होता है, वहां समृद्धि कायम रहती है। दूसरी लक्ष्मी : महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति के गर्भ से एक त्रिलोक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम लक्ष्मी था और जिसने भगवान विष्णु से विवाह किया।

9= वारुणी (मदिरा) : वारुणी नाम से एक शराब होती थी। वारुणी नाम से एक पर्व भी होता है और वारुणी नाम से एक खगोलीय योग भी। समुद्र मंथन के दौरान जिस मदिरा की उत्पत्ति हुई उसका नाम वारुणी रखा गया। वरुण का अर्थ जल। जल से उत्प‍न्न होने के कारण उसे वारुणी कहा गया। वरुण नाम के एक देवता हैं, जो असुरों की तरफ थे। असुरों ने वारुणी को लिया। वरुण की पत्नी को भी वरुणी कहते हैं। कदंब के फलों से बनाई जाने वाली मदिरा को भी वारुणी कहते हैं।

10= चन्द्रमा : ब्राह्मणों-क्षत्रियों के कई गोत्र होते हैं उनमें चंद्र से जुड़े कुछ गोत्र नाम हैं, जैसे चंद्रवंशी। पौराणिक संदर्भों के अनुसार चंद्रमा को तपस्वी अत्रि और अनुसूया की संतान बताया गया है जिसका नाम 'सोम' है। दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियां थीं जिनके नाम पर 27 नक्षत्रों के नाम पड़े हैं। ये सब चन्द्रमा को ब्याही गईं। आज आसमान में हम जो चंद्रमा देखते हैं वह समुद्र मंथन के दौरान उत्पन्न हुआ था। इस चंद्रमा का चंद्रवंशियों के चंद्रमा से क्या संबंध है, यह शोध का विषय हो सकता है। पुराणों अनुसार चंद्रमा की उत्पत्ति धरती से हुई है।

11= पारिजात वृक्ष : समुद्र मंथन के दौरान कल्पवृक्ष के अलावा पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति भी हुई थी। 'पारिजात' या 'हरसिंगार' उन प्रमुख वृक्षों में से एक है जिसके फूल ईश्वर की आराधना में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के पुष्प प्रिय हैं। यह माना जाता है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है।पारिजात वृक्ष में कई औषधीय गुण होते हैं। हिन्दू धर्म में कल्पवृक्ष के बाद पारिजात को महत्व दिया गया है। इसके बाद बरगद, पीपल और नीम का महत्व है।

12= शंख : शंख तो कई पाए जाते हैं लेकिन पांचजञ्य शंख मिलना मुश्किल है। समुद्र मंथन के दौरान इस शंख की उत्पत्ति हुई थी। 14 रत्नों में से एक पांचजञ्य शंख को माना गया है। शंख को विजय, समृद्धि, सुख, शांति, यश, कीर्ति और लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि शंख नाद का प्रतीक है। शंख ध्वनि शुभ मानी गई है। 1928 में बर्लिन यूनिवर्सिटी ने शंख ध्वनि का अनुसंधान करके यह सिद्ध किया कि इसकी ध्वनि कीटाणुओं को नष्ट करने की उत्तम औषधि है। शंख 3 प्रकार के होते हैं- दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। इनके अलावा लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरूड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख आदि प्रकार के होते हैं।

13= धन्वंतरि वैद्य : देवता एवं दैत्यों के सम्मिलित प्रयास के शांत हो जाने पर समुद्र में स्वयं ही मंथन चल रहा था जिसके चलते भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत का स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए। विद्वान कहते हैं कि इस दौरान दरअसल कई प्रकार की औषधियां उत्पन्न हुईं और उसके बाद अमृत निकला। हालांकि धन्वंतरि वैद्य को आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है। उन्होंने विश्वभर की वनस्पतियों पर अध्ययन कर उसके अच्छे और बुरे प्रभाव-गुण को प्रकट किया। धन्वंतरि के हजारों ग्रंथों में से अब केवल धन्वंतरि संहिता ही पाई जाती है, जो आयुर्वेद का मूल ग्रंथ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वंतरिजी से ही इस शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था। बाद में चरक आदि ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। 'धनतेरस' के दिन उनका जन्म हुआ था। धन्वंतरि आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देवता हैं। रामायण, महाभारत, सुश्रुत संहिता, चरक संहिता, काश्यप संहिता तथा अष्टांग हृदय, भाव प्रकाश, शार्गधर, श्रीमद्भावत पुराण आदि में उनका उल्लेख मिलता है। धन्वंतरि नाम से और भी कई आयुर्वेदाचार्य हुए हैं। आयु के पुत्र का नाम धन्वंतरि था।

14= अमृत : 'अमृत' का शाब्दिक अर्थ 'अमरता' है। निश्चित ही एक ऐसे पेय पदार्थ या रसायन रहा होगा जिसको पीने से व्यक्ति हजारों वर्ष तक जीने की क्षमता हासिल कर लेता होगा। यही कारण है कि बहुत से ऋषि रामायण काल में भी पाए जाते हैं और महाभारत काल में भी। समुद्र मंथन के अंत में अमृत का कलश निकला था। अमृत के नाम पर ही चरणामृत और पंचामृत का प्रचलन हुआ।


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समुद्र मन्थन

धर्मपौराणिक घटना, देवताओं और असुरों के बीच अमृत के लिए संघर्ष

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समुद्र मन्थन एक प्रसिद्ध हिन्दू धर्मपौराणिक कथा है। यह कथा भागवत पुराण, महाभारत तथा विष्णु पुराण में आती है।


अंगकोर वाट में समुद्र मंथन का भत्ति चित्र।

परन्तु उपरोक्त जितने सन्दर्भ प्रस्तुत किये गये है,उनमें शंख धनुष का उल्लेख नहीं है


कथा

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श्री शुकदेव जी बोले, "हे राजन्! राजा बलि के राज्य में दैत्य, राक्षस तथा दानव अति प्रबल हो उठे थे। उन्हें शुक्राचार्य की शक्ति प्राप्त थी। इसी बीच दुर्वासा ऋषि के श्राप से देवराज इन्द्र शक्तिहीन हो गये थे। असुर राज बलि का राज्य तीनों लोकों पर था। इन्द्र सहित देवतागण उससे(असुर) से भयभीत रहते थे। इस स्थिति के निवारण का उपाय केवल बैकुण्ठनाथ विष्णु ही बता सकते थे, अतः ब्रह्मा जी के साथ समस्त देवता भगवान नारायण के पास पहुचे। उनकी स्तुति करके उन्होंने भगवान विष्णु को अपनी विपदा(समस्या) सुनाई। तब भगवान मधुर वाणी में बोले, कि इस समय तुम लोगों के लिये संकट काल है। दैत्यों, राक्षसों एवं दानवों का अभ्युत्थान हो रहा है और तुम लोगों की अवनति हो रही है,किन्तु संकट काल को मैत्रीपूर्ण भाव से व्यतीत कर देना चाहिये। तुम असुरों से मित्रता कर लो और क्षीर सागर को मथ कर उसमें से अमृत निकाल कर पान कर लो। असुरों की सहायता से यह कार्य सुगमता से हो जायेगा। इस कार्य के लिये उनकी हर शर्त मान लो और अन्त में अपना काम निकाल लो। अमृत पीकर तुम अमर(कभी न मरने बाला) हो जाओगे और तुममें असुरों को मारने का सामर्थ्य आ जायेगा।



सुवर्णभूमि अन्तर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र, बैंगकॉक में सागर मन्थन की एक प्रतिमा के दो तरफ़ से चित्र

"भगवान(विष्णु) के आदेशानुसार इन्द्र देव ने समुद्र ममन्थन से अमृत निकलने की बात बलि को बताया। असुरराज बलि ने देवराज(देवताओं के राजा) इन्द्र से समझौता कर लिया और समुद्र मंथन के लिये तैयार हो गये। मन्दराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी नाग को नेती बनाया गया। वासुकी के नेत्र से नेतङ(राजपुरोहित) का उद्भव हुआ। स्वयं भगवान श्री विष्णु कच्छप अवतार लेकर मन्दराचल पर्वत को अपने पीठ पर रखकर उसका आधार बन गये। भगवान नारायण(विष्णु) ने असुर रूप से असुरों में और देवता रूप से देवताओं में शक्ति का संचार किया। वासुकीनाग(मथनी) को भी गहन निद्रा दे कर उसके कष्ट को हर लिया। देवता वासुकी नाग को मुख की ओर से पकड़ने लगे। इस पर उल्टी बुद्धि वाले दैत्य, राक्षस, दानवादि ने सोचा कि वासुकी नाग को मुख की ओर से पकड़ने में अवश्य कुछ न कुछ लाभ होगा। उन्होंने देवताओं से कहा कि हम किसी से शक्ति में कम नहीं हैं, हम मुँह की ओर का स्थान लेंगे।(मथने के लिए) तब देवताओं ने वासुकी नाग के पूँछ की ओर का स्थान ले लिया।

"समुद्र मन्थन आरम्भ हुआ और भगवान कच्छप के एक लाख योजन चौड़ी पीठ पर मन्दराचल पर्वत घूमने लगा। हे राजन! समुद्र मंथन से सबसे पहले जल का हलाहल विष निकला। उस विष की ज्वाला से सभी देवता तथा असुर जलने लगे और उनकी कान्ति फीकी पड़ने लगी। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर महादेव जी उस विष को हथेली पर रख कर उसे पी गये किन्तु उसे कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया। उस कालकूट विष के प्रभाव से शिव जी का कण्ठ नीला पड़ गया। इसीलिये महादेव जी को नीलकण्ठ कहते हैं। उनकी हथेली से थोड़ा सा विष(जहर) पृथ्वी पर टपक(गिर) गया था जिसे नाग , बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं ने ग्रहण कर लिया।

"विष को शंकर भगवान के द्वारा पान(ग्रहण) कर लेने के पश्चात् फिर से समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ। दूसरा रत्न कामधेनु गाय निकली जिसे ऋषियों ने रख लिया। फिर उच्चैःश्रवा घोड़ा निकला जिसे असुरराज बलि ने रख लिया। उसके बाद ऐरावत हाथी निकला जिसे देवराज इन्द्र ने अपना वाहन बना लिया। ऐरावत के पश्चात् कौस्तुभमणि समुद्र से निकली उसे विष्णु भगवान ने रख लिया। फिर कल्पवृक्ष निकला और रम्भा नामक अप्सरा निकली। इन दोनों को देवलोक में रख लिया गया। आगे फिर समु्द्र को मथने से महलक्ष्मी जी निकलीं। महालक्ष्मी जी ने स्वयं ही भगवान विष्णु को वर लिया। उसके बाद कन्या के रूप में वारुणी प्रकट हई जिसे असुरों ने ग्रहण किया। फिर एक के पश्चात एक चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष तथा शंख निकले और अन्त में धन्वन्तरि वैद्य अमृत का घट लेकर प्रकट हुये।" धन्वन्तरि के हाथ से अमृत को असुरों ने छीन लिया और उसके लिये आपस में ही लड़ने लगे। देवताओं के पास दुर्वासा के शापवश इतनी शक्ति रही नहीं थी, कि वे असुरों से लड़कर उस अमृत को छीन सकें इसलिये वे निराश खड़े हुये। उनका आपस में लड़ना देखते रहे। देवताओं की निराशा को देखकर भगवान विष्णु तत्काल मोहिनी रूप धारण कर आपस में लड़ते असुरों के पास जा पहुँचे। उस विश्वमोहिनी रूप को देखकर असुरों तथा देवताओं की तो बात ही क्या, स्वयं ब्रह्मज्ञानी, कामदेव को भस्म कर देने वाले, भगवान शंकर भी मोहित होकर उनकी ओर बार-बार देखने लगे। जब असुरों ने उस नवयौवना सुन्दरी को अपनी ओर आते हुये देखा तब वे अपना सारा झगड़ा भूल कर उसी सुन्दरी की ओर कामासक्त(मोहित) होकर एकटक देखने लगे।

देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन रस्सी का काम शेषनाग के छोटे भाई वासुकी करते हुए और नीचे अपने कवच पर मदरांचल पर्वत रखे हुए कुर्म रूपी विष्णु

वे असुर बोले, "हे सुन्दरी! तुम कौन हो? लगता है कि हमारे झगड़े को देखकर उसका निबटारा करने के लिये ही हम पर कृपा कटाक्ष कर रही हो। आओ शुभगे! तुम्हारा स्वागत है। हमें अपने सुन्दर कर कमलों से यह अमृतपान कराओ।" इस पर विश्वमोहिनी रूपी विष्णु ने कहा, "हे देवताओं और असुरों! आप दोनों ही महर्षि कश्यप जी के पुत्र होने के कारण भाई-भाई हो फिर भी परस्पर लड़ते हो। मैं तो स्वेच्छाचारिणी स्त्री हूँ। बुद्धिमान लोग ऐसी स्त्री पर कभी विश्वास नहीं करते, फिर तुम लोग कैसे मुझ पर विश्वास कर रहे हो? अच्छा यही है, कि स्वयं सब मिल कर अमृतपान कर लो।"

विश्वमोहिनी(विष्णु रूप) के ऐसे नीति कुशल वचन सुन कर उन कामान्ध दैत्यो, दानवों और राक्षसों को उस पर और भी विश्वास हो गया। वे बोले, "सुन्दरी! हम तुम पर पूर्ण विश्वास है। तुम जिस प्रकार बाँटोगी हम उसी प्रकार अमृतपान कर लेंगे। तुम ये घट ले लो और हम सभी में अमृत वितरण करो।" विश्वमोहिनी ने अमृत घट लेकर देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियो में बैठने के लिये कहा। उसके बाद असुरों को अपने कटाक्ष से मदहोश करते हुये देवताओं को अमृतपान कराने लगे। असुर उनके कटाक्ष से ऐसे मदहोश हुये कि अमृत पीना ही भूल गये।

भगवान की इस चाल को स्वरभानु नामक दानव समझ गया। वह देवता का रूप बना कर देवताओं में जाकर बैठ गया और प्राप्त अमृत को मुख में डाल लिया। जब अमृत उसके कण्ठ में पहुँच गया तब चन्द्रमा तथा सूर्य ने पुकार कर कहा कि ये स्वरभानु दानव है। यह सुनकर भगवान विष्णु ने तत्काल अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर गर्दन से अलग कर दिया। अमृत के प्रभाव से उसके सिर और धड़ राहु और केतु नाम के दो ग्रह बन कर अन्तरिक्ष में स्थापित हो गये। वे ही बैर भाव के कारण सूर्य और चन्द्रमा का ग्रहण कराते हैं।

इस तरह देवताओं को अमृत पिलाकर भगवान विष्णु वहाँ से लोप(गायब) हो गये। उनके लोप होते ही असुरों की मदहोशी समाप्त हो गई। वे अत्यन्त क्रोधित हो देवताओं पर प्रहार करने लगे। भयंकर देवासुर संग्राम आरम्भ हो गया, जिसमें देवराज इन्द्र ने असुरराज बलि को परास्त कर अपना इन्द्रलोक वापस ले लिया।

एक प्रचलित श्लोक के अनुसार चौदह रत्न निम्नवत हैं:

लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुराधन्वन्तरिश्चन्द्रमाः। ::

गावः कामदुहा सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवांगनाः। ::

अश्वः सप्तमुखो विषं हरिधनुः शंखोमृतं चाम्बुधेः।::

रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्यात्सदा मंगलम्। ::

कालकूट (या, हलाहल)[1]

ऐरावत

कामधेनु

उच्चैःश्रवा[2]

कौस्तुभ एवं पद्मराग मणि

कल्पवृक्ष

रम्भा नामक अप्सरा

महालक्ष्मी

वारुणी मदिरा

चन्द्रमा

शारंग धनुष

पांचजन्य शंख

धन्वन्तरि

अमृत

अन्य पुराणों के अनुसार इनके अतिरिक्त और चार रत्न भी हैं:-

निद्रा देवी

माताअदिति के कुण्डल

वरुणदेवता का छत्र

देवी अलक्ष्मी


मोहिनी अवतार

हिंदू भगवान विष्णु का महिला अवतार

मोहिनी हिन्दू भगवान विष्णु का एकमात्र स्त्री अवतार है। इसमें उन्हें ऐसे स्त्री रूप में दिखाया गया है जो सभी को मोहित कर ले। उसके मोह में वशीभूत होकर कोई भी सब भूल जाता है, इस अवतार का उल्लेख महाभारत में भी आता है। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं व असुरों को सागर से अमृत मिल चुका था, तब देवताओं को यह डर था कि असुर कहीं अमृत पीकर अमर न हो जायें। तब वे भगवान विष्णु के पास गये व प्रार्थना की कि ऐसा होने से रोकें। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर अमृत देवताओं को पिलाया व असुरों को मोहित कर अमर होने से रोका।

मोहिनी
मोह और वासना की देवी

विश्व मोहित करने वाली श्री विष्णु के अवतार देवी मोहिनी
संबंधविष्णु का अवतार, अमृत के वितरक
अस्त्रमोहकता, सुदर्शन चक्र

मोहिनी अवतार और भस्मासुर

भस्मासुर पौराणिक कथाओं में ऐसा दैत्य था जिसने भगवान शिव से वरदान माँगा था कि वो जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। कथा के अनुसार भस्मासुर ने इस शक्ति का गलत प्रयोग शुरू किया और स्वयं शिव जी को भस्म करने चला। शिव जी ने विष्णु जी से सहायता माँगी। विष्णु जी ने एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण किया, भस्मासुर को आकर्षित किया और नृत्य के लिए प्रेरित किया। नृत्य करते समय भस्मासुर विष्णु जी की ही तरह नृत्य करने लगा और उचित मौका देखकर विष्णु जी ने अपने सिर पर हाथ रखा, जिसकी नकल शक्ति और काम के नशे में चूर भस्मासुर ने भी की। भस्मासुर अपने ही वरदान से भस्म हो गया।

समुद्र मंथन और मोहिनी अवतार

मोहिनी देवताओं को अमृत पिला रहीं है (बायें) ; असुर अभी प्रतीक्षा कर रहे हैं (दाहिने)।

समुद्र मन्थन के दौरान अंतिम रत्न अमृत कलश लेकर भगवान विष्णु धनवंतरी रूप में प्रकट हुए। असुर भगवान धन्वंतरि से अमृत कलश लेकर भाग गए तो विष्णु ने धंवतरि रूप को त्यागकर एक नारी का रूप लिया वे बहुत सुन्दर थी उस नारी का नाम मोहिनी रखा गया। मोहिनी ने असुरों से अमृत लिया और देवताओं के पास गईं। उन्होंने असुरों को अपनी ओर मोहित कर लिया और देवताओं को अमृत पिलाने लगीं। मोहिनी रूपी विष्णु की चाल स्वरभानु नाम का दानव समझ गया और वह देवता का भेस लेकर अमृत पीने चला गया। मोहिनी को जब ये बात पता चली तो उन्होंने स्वरभानु का सिर सुदर्शन चक्र से काट दिया किंतु तब तक उसके गले से अमृत की घूंट नीचे चली गई और वह अमर हो गया और राहु के नाम से उसका सिर और केतु के नाम से उसका धड़ प्रसिद्ध हुआ।

सन्दर्भ

धार्मिक ग्रन्थों का संदर्भ
  • अग्नि पुराण ३.१२ (अमृत वितरण हेतु विष्णु द्वारा मोहिनी रूप धारण, रुद्र की मोहिनी पर आसक्ति व वीर्यपात आदि)
  • गणेश पुराण २.३९.२० (भस्मासुर द्वारा शिव को मारने की चेष्टा पर विष्णु का मोहिनी रूप में प्रकट होना),
  • गरुड़ पुराण १.२१.४(वामदेव शिव की १३ कलाओं में से एक),
  • गर्ग संहिता १०.१७.२०(राजा नारीपाल की पत्नी, नारीपाल का वृत्तान्त),
    • १०.१७.४६(रानी सुरूपा को पूर्व जन्म का स्मरण : मोहिनी अप्सरा द्वारा तप से सुरूपा रूप में जन्म),
  • नारद पुराण १.६६.१२७(निरंजन की शक्ति मोहिनी का उल्लेख),
    • १.९१.८०(वामदेव शिव की १२वीं कला),
    • २.७(राजा रुक्मांगद को धर्मपथ से विचलित करने के लिए ब्रह्मा द्वारा मोहिनी की उत्पत्ति),
    • २.२३(मोहिनी द्वारा रुक्मांगद राजा से एकादशी व्रत न करने का दुराग्रह),
    • २.३२+ (मोहिनी द्वारा रुक्मांगद से पुत्र धर्मांगद के मस्तक की मांग),
    • २.३५+ (देवताओं द्वारा मोहिनी को वरदान की चेष्टा, रुक्मांगद - पुरोहित के शाप से मोहिनी का भस्म होना, यम लोक में यातनाएं, दशमी के अन्त भाग में स्थान की प्राप्ति, पुन: शरीर प्राप्ति),
    • २.८२(वसु ब्राह्मण के उपदेश से मोहिनी द्वारा तीर्थ यात्रा का उद्योग, दशमी तिथि के अन्त भाग में स्थित होना),
  • पद्म पुराण २.३४.३९(सखियों द्वारा सुनीथा को पुरुष विमोहिनी विद्या का उपदेश),
    • २.११८(विष्णु द्वारा मोहिनी रूप धारण कर विहुण्ड के विमोहन का वृत्तान्त),
    • ४.१०(समुद्र मन्थन से अमृत उत्पन्न होने पर विष्णु का मोहिनी रूप धारण कर दैत्यों का विमोहन और देवों को अमृत प्रदान),
    • ६.४९(वैशाख शुक्ल मोहिनी एकादशी व्रत का माहात्म्य : धनपाल वैश्य के दुष्ट पुत्र धृष्टबुद्धि की मुक्ति),
    • ६.२२०(मोहिनी वेश्या की प्रयाग जल से मुक्ति, जन्मान्तर में हेमांगी रानी बनना),
  • ब्रह्मवैवर्त्त पुराण ४.३१+ (मोहिनी का रम्भा से संवाद, काम स्तोत्र, ब्रह्मा से संवाद, ब्रह्मा को शाप),
  • ब्रह्माण्ड पुराण २.३.४.१०(अमृत वितरणार्थ विष्णु द्वारा धारित मोहिनी रूप पर शिव की आसक्ति),
    • ३.४.१०.२७(मोहिनी अवतार द्वारा देवों को अमृतपान कराने का वर्णन, मोहिनी दर्शन से शिव का वीर्यपात),
    • ३.४.१९.६५(कामदेव की ५ बाण शक्तियों में से एक),
    • ३.४.१९.७४ (गीतिचक्र रथेन्द्र के पंचम पर्व पर स्थित १६ शक्तियों में से एक),
  • भविष्य पुराण ३.२.१८(गौरीदत्त व धनवती - पुत्री, शूली आरोपित चोर से विवाह, प्रहेलिका का अर्थ बताने वाले पण्डित से गर्भ धारण आदि),
  • भागवत पुराण १.३.१७(विष्णु के २१ अवतारों में १३वें मोहिनी अवतार का उल्लेख),
    • ८.८+ (मोहिनी द्वारा अमृत वितरण का आख्यान),
    • ८.१२(मोहिनी की क्रीडा का वर्णन, मोहिनी द्वारा शिव का मोहन),
  • मत्स्य पुराण २५१.७(मोहिनी अवतार द्वारा असुरों के मोहन व देवों को अमृत प्रदान का कथन),
  • वायु पुराण २५.४८(मधु - कैटभ से पीडित होने पर ब्रह्मा के समक्ष मोहिनी माया के प्रकट होने का कथन, ब्रह्मा द्वारा मोहिनी माया के नामकरण, मधु - कैटभ द्वारा मोहिनी से पुत्रत्व वर की प्राप्ति),
    • २५.५० (महाव्याहृति : ब्रह्मा द्वारा मोहिनी माया को महाव्याहृति नाम प्रदान),
  • शिव पुराण ३.२०(मोहिनी के रूप से शिव के वीर्य की च्युति, हनुमान का जन्म),
  • स्कन्द पुराण १.१.१२(मोहिनी रूपी विष्णु द्वारा दैत्यों की अमृतपान से वंचना),
    • लक्ष्मीनारायण १.९२(मोहिनी रूप धारी विष्णु द्वारा अमृत के वितरण की कथा),
    • १.१६२.४२(मधु - कैटभ वध हेतु विष्णु द्वारा महामाया की सहायता से मोहिनी रूप धारण),
    • १.१८४.५८(शिव को समाधि से बाहर लाने के लिए कृष्ण द्वारा मोहिनी रूप धारण, मोहिनी के दर्शन से ब्रह्मा, काम आदि के वीर्य का पतन, कामदेव की सहायता से मोहिनी द्वारा शिव को मोहित करना आदि),
    • १.१९९.१६(शिव द्वारा दानवों को मोहित करनेv वाली मोहिनी के रूप के दर्शन की इच्छा, मोहिनी के दर्शन से वीर्यपात आदि का वृत्तान्त),
    • १.२८६.१५(ब्रह्मा द्वारा राजा रुक्मांगद के व्रत को भंग करनेv के लिए मोहिनी का सृजन तथा रुक्मांगद के प्रति प्रेषण),
    • १.२८७-२९२(रुक्मांगद - मोहिनी आख्यान),
    • १.५१५.३(ब्रह्मा की मानसी कन्या मोहिनी द्वारा ब्रह्मा के सेवन का हठ, ब्रह्मा द्वारा उपेक्षा पर ब्रह्मा तथा ऋषियों को अपूज्यत्व तथा षण्ढत्व का शाप, षण्ढत्व नाश हेतु मोहिनी की अर्चना का कथन),
    • २.५७.७८(निद्रा देवी का अपर नाम),
    • २.२४६.९०(अज्ञानमूलक वृक्ष के रूपक में मोहिनी के रसतृष्णा होने का उल्लेख),
    • ३.१६.८५(व्याघ्रानल असुर के वध हेतु लक्ष्मी द्वारा मोहिनी रूप धारण करना, व्याघ्रानल असुर का मोहिनी को देख जडीभूत होना आदि),
    • ३.१७०.१९(विष्णु के ३३वें धाम के रूप में मोहिनी का उल्लेख),
  • कथासरित्सागर ८.३.११८(याज्ञवल्क्य ऋषि द्वारा सूर्यप्रभ को मोहिनी विद्या प्रदान करना)

शंकर ने दौड़कर क्रीड़ा करती हुई मोहिनी को ज़बरदस्ती पकड़ लिया। महादेव शिव शंकर की तत्कालीन दयनीय अवस्था का चित्र देखना हो तो श्रीमद्भागवत, स्कन्द 8, अध्याय 12, देखने का कष्ट करें जिसमें लिखा है-

आत्मानं मोचयित्वाङग सुरर्षभभजान्तरात्।
प्रादवत्सापृथु श्रोणी माया देवविनिम्र्मता।। 30।।
तस्यासौ पदवीं रूद्रो विष्णोरद्भुत कम्मर्णः।
प्रत्यपदत्तकामेन वैदिणेव निनिर्जितः।। 31।।
तस्यानुधावती रेतश्चल्कन्दार्माघरेतसः।
शुष्मिणो यूथपस्येव वासितामनु धावतः।। 32।।

अर्थात् : हे महाराजा ! तदन्तर देवों में श्रेष्ठ शंकर के दोनों बाहुओं के बीच से अपने को छुड़ाकर वह नारायणनिर्मिता विपुक्ष नितंबिनी माया (मोहिनी) भागचली॥

30: अपने वैरी कामदेव से मानो परास्त होकरमहादेव जी भी विचित्र चरित्र वाले विष्णु का मायामय मोहिनी रूप के पीछे-पीछे दौड़ने लगे॥
31: पीछा करते-करते ऋतुमती हथिनी के अनुगामी हाथी की तरह अमोघवीर्य महादेव का वीर्य स्खलित होने लगा॥
32।।

समुद्र मंथन

क्या आप जानते हैं कि कामधेनु गाय क्या है? धन्वन्तरि वैद्य का जन्म कैसे हुआ? शिव का नाम नीलकंठ कैसे पड़ा? ऐरावत हाथी कहां से आया? 

इन सबका संबंध बहुचर्चित समुद्र मंथन से है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन बहुत महत्वपूर्ण घटना थी। इसने देवताओं को अमर कर दिया और साथ ही साथ इतनी सारी नई नई चीजे निकली जो उसके पहले तक अज्ञात थीं। दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण देवतागण सामान्य मनुष्यों की भांति हो गए थे अर्थात श्री हीन और शक्ति हीन हो गए थे। दूसरी तरफ दैत्यों का राजा बलि बहुत ताकतवर होता जा रहा था। सभी देवता विष्णु के पास गए। विष्णु ने सलाह दी कि असुरों के साथ संधि करके क्षीर सागर का मंथन करें जिससे उन्हें अमृत मिलेगा जिसे पीकर देवतागण अमर हो जाएंगे। देवताओं और दैत्यों के बीच संधि हो गयी की मंथन के दौरान जो रत्न निकलेंगे उसे आपस में बांट लिया जाएगा। विष्णु ने स्वयं कच्छप अवतार लिया जिनके पीठ पर मंदार पर्वत रख कर वासुकि सांप को इसपर लपेट कर देवताओं और दैत्यों ने समुद्र मंथन किया। इस समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले। आइये जानते हैं किसको कौन सा रत्न मिला। हलाहल विष समुद्र मंथन में सबसे पहले काफी शक्तिशाली विष निकला। ये विष इतना ज्वलनशील था की देवता और दानव दोनों जलने लगें। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शंकर ने इसे गले में धारण कर लिया। ऐसा कहा जाता है की हलाहल पीने से शिव को भी समस्या हो सकती है इसलिए इन्होंने कंठ में धारण कर रखा है इसे नीचे नहीं उतरने देते। इस विष के कारण ही शिव का कंठ नीला पड़ गया और शिव का नाम नीलकंठ हो गया। 

 उच्चै श्रवा (घोड़ा): विष के बाद सबसे तेज गति वाला सात मुख सहित एक घोडा निकला जिसका रंग सफ़ेद था। इस घोड़े का नाम उच्चै श्रवा था। ये घोड़ों का राजा था। पहले तो इसे दैत्यराज बलि ने रख लिया कालांतर में ये इंद्र के अधीन हो गया। 

ऐरावत हाथी: उच्चै श्रवा घोड़े के बाद सफ़ेद रंग और चार दांतों वाला हाथी निकला। इसका नाम ऐरावत था जो हाथियों का राजा था। इसे इंद्र ने अपनी सवारी बना ली। 

कौस्तुभ मणि: ऐरावत हाथी के बाद एक चमकदार काफी तेज वाला कौस्तुभ मणि निकला जिसे भगवान विष्णु ने अपने मुकुट में धारण किया। ऐसा कहा जाता है कि चूंकि ये मणि कालिया नामक सांप ने कृष्ण को उपहार स्वरुप दे दिया था और कृष्ण ने अपना शरीर धरती पर ही त्याग दिया था इसलिए ये मणि अभी भी द्वारका के साथ समुद्र में ही कही है। 

कामधेनु गाय: उस समय गाय को धेनु कहा जाता था। कौस्तुभ मणि के बाद दिव्य गाय निकली जिसे लोक कल्याणकारी कहा गया और इसी लिए इस काम धेनु को ऋषियों को दे दिया गया। 

मां लक्ष्मी: मंथन चलता रहा फिर धन की देवी लक्ष्मी निकली। इनको पाने के लिए असुर लड़ने लगे किंतु लक्ष्मीजी ने विष्णु से विवाह कर लिया। 

अप्सरा रंभा: रम्भा बहुत ही सुंदर अप्सरा थी। सर्वगुण संपन्न इस सुंदर नृत्यांगना को इंद्र ने अपने पास रख लिया। विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने इसी रम्भा को भेजा था। 

पारिजात पुष्प: मंथन प्रक्रिया में इसके बाद कल्पतरु नामक पेड़ निकला जिसके पुष्प देवताओं को बहुत पसंद आये। स्कंदपुराण और विष्णु पुराण में पारिजात को कल्पवृक्ष कहा गया है। कल्पतरु भी देवताओं के ही हिस्से में आया। 

वारुणी देवी: वरुण का अर्थ होता है जल। ये देवी मदिरा लेकर मंथन से निकली इसलिए इन्हें वारुणी देवी कहा गया। वारुणी को असुरों को दे दिया गया। 

पाच्चजन्य शंख: इसके बाद पांचजन्य नामक एक दिव्य शंख निकला। ये शंख विजय, समृद्धि और यश का प्रतीक था। इसकी ध्वनि भगवान विष्णु को भा गयी इसलिए इसे विष्णु को समर्पित कर दिया गया। आज भी विष्णुजी की पूजा में शंख अवश्य बजाया जाता है। 

चंद्रमा: शीतल प्रकाश देने वाले चंद्रमा की उत्पत्ति भी मंथन से ही हुई। चूंकि ये जल से निकला इसलिए इसका जल पर काफी प्रभाव पड़ता है। समुद्र में ज्वार भाटा का कारक चंद्रमा को ही मानते हैं। इसकी शीतलता की वजह से शिव ने इसे अपने शीश पर धारण कर लिया। 

भगवान धन्वंतरी: मंथन से ही आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वन्तरि का जन्म हुआ। इन्होंने ही देवताओं और ऋषियों को चिकित्सा शास्त्र की जानकारी दी। ये भी विष्णु के अधीन हो गये। अमृत कलश जब धन्वन्तरि देव उत्पन्न हुए तो उन्हीं के हाथ में अमृत कलश था। इस अमृत को पीने वाला अमर हो जाता इसलिए देवताओ और दानवों में युद्ध छिड़ गया। 

विष्णु ने बड़ी चालाकी से एक सुंदर युवती का रूप धारण किया जिसका नाम मोहिनी था। मोहिनी ने चालाकी से देवताओं को अमृत पीला दिया और सारे देवता अमर हो गए। राहु नामक दैत्य ने छल से अमृत पान कर लिया तभी विष्णु ने अपने चक्र से उसके दो टुकड़े कर दिए। ये दो टुकड़े राहु और केतु आज भी ग्रहों के रूप में विद्यमान हैं। संधि के अंतर्गत सभी रत्नों और अमृत पर दोनों पक्षों का बराबर हिस्सा था पर कुल मिलाकर असुरों को सिर्फ वारुणी देवी मिली जिनके पास मदिरा था। बाकि सारे रत्न देवताओं को मिलें। 

समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों का रहस्य, जाने 

यह वह समय था जबकि देवता लोग धरती पर रहते थे। धरती पर वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। काम था धरती का निर्माण करना। धरती को रहने लायक बनाना और धरती पर मानव सहित अन्य आबादी का विस्तार करना।

देवताओं के साथ उनके ही भाई बंधु दैत्य भी रहते थे। तब यह धरती एक द्वीप की ही थी अर्थात धरती का एक ही हिस्सा जल से बाहर निकला हुआ था। यह भी बहुत छोटा-सा हिस्सा था। इसके बीचोबीच था मेरू पर्वत।

धरती के विस्तार और इस पर विविध प्रकार के जीवन निर्माण के लिए देवताओं के भी देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने लीला रची और उन्होंने देव तथा उनके भाई असुरों की शक्ति का उपयोग कर समुद्र मंथन कराया। समुद्र मंथन कराने के लिए पहले कारण निर्मित किया गया।
दुर्वासा ऋषि ने अपना अपमान होने के कारण देवराज इन्द्र को ‘श्री’ (लक्ष्मी) से हीन हो जाने का शाप दे दिया। भगवान विष्णु ने इंद्र को शाप मुक्ति के लिए असुरों के साथ 'समुद्र मंथन' के लिए कहा और दैत्यों को अमृत का लालच दिया। इस तरह हुआ समुद्र मंथन। यह समुद्र था क्षीर सागर जिसे आज हिन्द महासागर कहते हैं। जब देवताओं तथा असुरों ने समुद्र मंथन आरंभ किया, तब भगवान विष्णु ने कच्छप बनकर मंथन में भाग लिया। वे समुद्र के बीचोबीच में वे स्थिर रहे और उनके ऊपर रखा गया मदरांचल पर्वत। फिर वासुकी नाग को रस्सी बानाकर एक ओर से देवता और दूसरी ओर से दैत्यों ने समुद्र का मंथन करना शुरू कर दिया।

1. हलाहल (विष) : समुद्र का मंथन करने पर सबसे पहले पहले जल का हलाहल (कालकूट) विष निकला जिसकी ज्वाला बहुत तीव्र थी। हलाहल विष की ज्वाला से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर की प्रार्थना की।
शंकर ने उस विष को हथेली पर रखकर पी लिया, किंतु उसे कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया तथा उस विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया इसीलिए महादेवजी को 'नीलकंठ' कहा जाने लगा। हथेली से पीते समय कुछ विष धरती पर गिर गया था जिसका अंश आज भी हम सांप, बिच्छू और जहरीले कीड़ों में देखते हैं।

2. कामधेनु : विष के बाद मथे जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े जोर की आवाज उत्पन्न हुई। देव और असुरों ने जब सिर उठाकर देखा तो पता चला कि यह साक्षात सुरभि कामधेनु गाय थी। इस गाय को काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंग की सैकड़ों गौएं घेरे हुई थीं।
गाय को हिन्दू धर्म में पवित्र पशु माना जाता है। गाय मनुष्य जाति के जीवन को चलाने के लिए महत्वपूर्ण पशु है। गाय को कामधेनु कहा गया है। कामधेनु सबका पालन करने वाली है। उस काल में गाय को धेनु कहा जाता था।

3. उच्चैःश्रवा घोड़ा : घोड़े तो कई हुए लेकिन श्वेत रंग का उच्चैःश्रवा घोड़ा सबसे तेज और उड़ने वाला घोड़ा माना जाता था। अब इसकी कोई भी प्रजाति धरती पर नहीं बची। यह इंद्र के पास था। उच्चै:श्रवा का पोषण अमृत से होता है। यह अश्वों का राजा है। उच्चै:श्रवा के कई अर्थ हैं, जैसे जिसका यश ऊंचा हो, जिसके कान ऊंचे हों अथवा जो ऊंचा सुनता हो।

4. ऐरावत हाथी : हाथी तो सभी अच्‍छे और सुंदर नजर आते हैं लेकिन सफेद हाथी को देखना अद्भुत है। ऐरावत सफेद हाथियों का राजा था। 'इरा' का अर्थ जल है, अत: 'इरावत' (समुद्र) से उत्पन्न हाथी को 'ऐरावत' नाम दिया गया है।

यह हाथी देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान निकली 14 मूल्यवान वस्तुओं में से एक था। मंथन से प्राप्त रत्नों के बंटवारे के समय ऐरावत को इन्द्र को दे दिया गया था। चार दांतों वाला सफेद हाथी मिलना अब मुश्किल है।

महाभारत, भीष्म पर्व के अष्टम अध्याय में भारतवर्ष से उत्तर के भू-भाग को उत्तर कुरु के बदले 'ऐरावत' कहा गया है। जैन साहित्य में भी यही नाम आया है। उत्तर का भू-भाग अर्थात तिब्बत, मंगोलिया और रूस के साइबेरिया तक का हिस्सा। हालांकि उत्तर कुरु भू-भाग उत्तरी ध्रुव के पास था संभवत: इसी क्षेत्र में यह हाथी पाया जाता रहा होगा।
5. कौस्तुभ मणि : मंथन के दौरान पांचवां रत्न था कौस्तुभ मणि। कौस्तुभ मणि को भगवान विष्णु धारण करते हैं। महाभारत में उल्लेख है कि कालिय नाग को श्रीकृष्ण ने गरूड़ के त्रास से मुक्त किया था। उस समय कालिय नाग ने अपने मस्तक से उतारकर श्रीकृष्ण को कौस्तुभ मणि दे दी थी।
यह एक चमत्कारिक मणि है। माना जाता है कि इच्छाधारी नागों के पास ही अब यह मणि बची है या फिर समुद्र की किसी अतल गहराइयों में कहीं दबी पड़ी होगी। हो सकता है कि धरती की किसी गुफा में दफन हो यह मणि।

6. कल्पद्रुम : यह दुनिया का पहला धर्मग्रंथ माना जा सकता है, जो समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुआ। कुछ लोग इसे संस्कृत भाषा की उत्पत्ति से जोड़ते हैं और कुछ लोग मानते हैं कि इसे ही कल्पवृक्ष कहते हैं। जबकि कुछ का कहना है कि पारिजात को कल्पवृक्ष कहा जाता है।
यह स्पष्ट नहीं है कि कल्पद्रुम आखिर क्या है? ज्योतिषियों के अनुसार कल्पद्रुप एक प्रकार का योग होता ह

7. रंभा : समुद्र मंथन के दौरान एक सुंदर अप्सरा प्रकट हुई जिसे रंभा कहा गया। पुराणों में रंभा का चित्रण एक प्रसिद्ध अप्सरा के रूप में माना जाता है, जो कि कुबेर की सभा में थी। रंभा कुबेर के पुत्र नलकुबर के साथ पत्नी की तरह रहती थी। ऋषि कश्यप और प्राधा की पुत्री का नाम भी रंभा था। महाभारत में इसे तुरुंब नाम के गंधर्व की पत्नी बताया गया है।
समुद्र मंथन के दौरान इन्द्र ने देवताओं से रंभा को अपनी राजसभा के लिए प्राप्त किया था। विश्वामित्र की घोर तपस्या से विचलित होकर इंद्र ने रंभा को बुलाकर विश्वामित्र का तप भंग करने के लिए भेजा था। अप्सरा को गंधर्वलोक का वासी माना जाता है। कुछ लोग इन्हें परी कहते हैं।

8. लक्ष्मी : समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मी की उत्पत्ति भी हुई। लक्ष्मी अर्थात श्री और समृद्धि की उत्पत्ति। कुछ लोग इसे सोने (गोल्ड) से जोड़ते हैं। माना जाता है कि जिस भी घर में स्त्री का सम्मान होता है, वहां समृद्धि कायम रहती है।
दूसरी लक्ष्मी : महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति के गर्भ से एक त्रिलोक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम लक्ष्मी था और जिसने भगवान विष्णु से विवाह किया।

9. वारुणी (मदिरा) : वारुणी नाम से एक शराब होती थी। वारुणी नाम से एक पर्व भी होता है और वारुणी नाम से एक खगोलीय योग भी। समुद्र मंथन के दौरान जिस मदिरा की उत्पत्ति हुई उसका नाम वारुणी रखा गया। वरुण का अर्थ जल। जल से उत्प‍न्न होने के कारण उसे वारुणी कहा गया। वरुण नाम के एक देवता हैं, जो असुरों की तरफ थे। असुरों ने वारुणी को लिया।
वरुण की पत्नी को भी वरुणी कहते हैं। कदंब के फलों से बनाई जाने वाली मदिरा को भी वारुणी कहते हैं।

10. चन्द्रमा : ब्राह्मणों-क्षत्रियों के कई गोत्र होते हैं उनमें चंद्र से जुड़े कुछ गोत्र नाम हैं, जैसे चंद्रवंशी। पौराणिक संदर्भों के अनुसार चंद्रमा को तपस्वी अत्रि और अनुसूया की संतान बताया गया है जिसका नाम 'सोम' है। दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियां थीं जिनके नाम पर 27 नक्षत्रों के नाम पड़े हैं। ये सब चन्द्रमा को ब्याही गईं।
आज आसमान में हम जो चंद्रमा देखते हैं वह समुद्र मंथन के दौरान उत्पन्न हुआ था। इस चंद्रमा का चंद्रवंशियों के चंद्रमा से क्या संबंध है, यह शोध का विषय हो सकता है। पुराणों अनुसार चंद्रमा की उत्पत्ति धरती से हुई है।

11. पारिजात वृक्ष : समुद्र मंथन के दौरान कल्पवृक्ष के अलावा पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति भी हुई थी। 'पारिजात' या 'हरसिंगार' उन प्रमुख वृक्षों में से एक है जिसके फूल ईश्वर की आराधना में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के पुष्प प्रिय हैं। यह माना जाता है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है।
पारिजात वृक्ष में कई औषधीय गुण होते हैं। हिन्दू धर्म में कल्पवृक्ष के बाद पारिजात को महत्व दिया गया है। इसके बाद बरगद, पीपल और नीम का महत्व है।

12. शंख : शंख तो कई पाए जाते हैं लेकिन पांचजञ्य शंख मिलना मुश्किल है। समुद्र मंथन के दौरान इस शंख की उत्पत्ति हुई थी। 14 रत्नों में से एक पांचजञ्य शंख को माना गया है। शंख को ‍विजय, समृद्धि, सुख, शांति, यश, कीर्ति और लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि शंख नाद का प्रतीक है। शंख ध्वनि शुभ मानी गई है।
1928 में बर्लिन यूनिवर्सिटी ने शंख ध्वनि का अनुसंधान करके यह सिद्ध किया कि इसकी ध्वनि कीटाणुओं को नष्ट करने की उत्तम औषधि है।
शंख 3 प्रकार के होते हैं- दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। इनके अलावा लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरूड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख आदि प्रकार के होते हैं।

13. धन्वंतरि वैद्य : देवता एवं दैत्यों के सम्मिलित प्रयास के शांत हो जाने पर समुद्र में स्वयं ही मंथन चल रहा था जिसके चलते भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत का स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए। विद्वान कहते हैं कि इस दौरान दरअसल कई प्रकार की औषधियां उत्पन्न हुईं और उसके बाद अमृत निकला।
हालांकि धन्वंतरि वैद्य को आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है। उन्होंने विश्वभर की वनस्पतियों पर अध्ययन कर उसके अच्छे और बुरे प्रभाव-गुण को प्रकट किया। धन्वंतरि के हजारों ग्रंथों में से अब केवल धन्वंतरि संहिता ही पाई जाती है, जो आयुर्वेद का मूल ग्रंथ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वंतरिजी से ही इस शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था। बाद में चरक आदि ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
धन्वंतरि 10 हजार ईसापूर्व हुए थे। वे काशी के राजा महाराज धन्व के पुत्र थे। उन्होंने शल्य शास्त्र पर महत्वपूर्ण गवेषणाएं की थीं। उनके प्रपौत्र दिवोदास ने उन्हें परिमार्जित कर सुश्रुत आदि शिष्यों को उपदेश दिए। धन्वंतरि के जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग अमृत का है। उनके जीवन के साथ अमृत का स्वर्ण कलश जुड़ा है। अमृत निर्माण करने का प्रयोग धन्वंतरि ने स्वर्ण पात्र में ही बताया था।
उन्होंने कहा कि जरा-मृत्यु के विनाश के लिए ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोम नामक अमृत का आविष्कार किया था। धन्वंतरि आदि आयुर्वेदाचार्यों अनुसार 100 प्रकार की मृत्यु है। उनमें एक ही काल मृत्यु है, शेष अकाल मृत्यु रोकने के प्रयास ही आयुर्वेद निदान और चिकित्सा हैं। आयु के न्यूनाधिक्य की एक-एक माप धन्वंतरि ने बताई है।
' धनतेरस' के दिन उनका जन्म हुआ था। धन्वंतरि आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देवता हैं। रामायण, महाभारत, सुश्रुत संहिता, चरक संहिता, काश्यप संहिता तथा अष्टांग हृदय, भाव प्रकाश, शार्गधर, श्रीमद्भावत पुराण आदि में उनका उल्लेख मिलता है। धन्वंतरि नाम से और भी कई आयुर्वेदाचार्य हुए हैं। आयु के पुत्र का नाम धन्वंतरि था।.

14. अमृत : 'अमृत' का शाब्दिक अर्थ 'अमरता' है। निश्चित ही एक ऐसे पेय पदार्थ या रसायन रहा होगा जिसको पीने से व्यक्ति हजारों वर्ष तक जीने की क्षमता हासिल कर लेता होगा। यही कारण है कि बहुत से ऋषि रामायण काल में भी पाए जाते हैं और महाभारत काल में भी। समुद्र मंथन के अंत में अमृत का कलश निकला था। अमृत के नाम पर ही चरणामृत और पंचामृत का प्रचलन हुआ।
देवताओं और दैत्यों के बीच अमृत बंटवारे को लेकर जब झगड़ा हो रहा था तथा देवराज इंद्र के संकेत पर उनका पुत्र जयंत जब अमृत कुंभ लेकर भागने की चेष्टा कर रहा था, तब कुछ दानवों ने उसका पीछा किया। अमृत-कुंभ के लिए स्वर्ग में 12 दिन तक संघर्ष चलता रहा और उस कुंभ से 4 स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें गिर गईं। यह स्थान पृथ्वी पर हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक थे। यहीं पर प्रत्येक 12 वर्ष में कुंभ का आयोजन होता है। बाद में भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण करके अमृत बांटा था।
' अमृत' शब्द सबसे पहले ऋग्वेद में आया है, जहां यह सोम के विभिन्न पर्यायों में से एक है। संभवत: 'सोमरस' को ही 'अमृत' माना गया हो। सोम एक रस है या द्रव्य, यह कोई नहीं जानता। कुछ विद्वान सोम को औषधि मानते है। उनके अनुसार सुश्रुत के चिकित्सास्थान में लिखा है कि इसका सेवन करने से कायाकल्प हो जाता है, वृद्ध पुनः युवा हो जाता है। किंतु वेद में एक और सोम की भी चर्चा है जिसके संबंध में लिखा है कि ब्राह्मणों को जिस सोम का ज्ञान है उसे कोई नहीं पीता। ब्राह्मण के सोम की महिमा इन शब्दों में है। देखो हमने सोमपान किया और हम अमृत हो गए या जी उठे।



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