मेरी वैष्णो देवी यात्रा

मेरी वैष्णो देवी यात्रा
(यह यात्रा वृतांत मई 2013 का है जब मैं अपने परिवार के साथ पहली बार वैष्णो देवी दर्शन के लिए गया मुझे आशा है कि यह लेख आपको बहुत पसंद आएगा।)
इस धार्मिक स्थल की आराध्य देवी, वैष्णो देवी को सामान्यतः माता रानी और वैष्णवी के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर, 5,200 फ़ीट की ऊंचाई पर, कटरा से लगभग 12 किलोमीटर (7.45 मील) की दूरी पर स्थित है। हर वर्ष, लाखों तीर्थ यात्री, इस मंदिर का दर्शन करते हैं।
बचपन से यादों को संजोये बैठा था कि किसी प्रकार माता वैष्णो देवी के दरबार में जाकर माता के दर्शन पाये जायें। मेरी वैष्णो देवी जी के दर्शनों की आकांक्षा तब जागृत हुई जब मेरे चाचा जी, श्री लक्ष्मन सिंह वैष्णो देवी के दर्शनों को गए थे। उस समय मेरी उम्र दस या बारह बरस रही होगी। उस वक्त चाचा जी ने मुझसे पूंछा था कि बेटे तुम्हे कुछ मंगाना है, तो उस वक्त मैने केवल माता जी का फोटो लाने को कहा था। चाचा जी एक फोटो के स्थान पर पूरी एलबम ही ले आये थे। जिसमें वहाँ की सुंदरता को देखकर मान में ठान लिया था कि एक बार माता के भवन को अवश्य जाऊँगा।
समय का घोडा पंख लगा कर ऐसा उडा कि पता ही नहीं चला कि कब मेरी उम्र दस बारह साल के स्थान पर पैंतीस बरस की हो गई। इस समय में मैं दिल्ली आ गया। घर के सभी सदस्य दर्शन करके आ गये परंतु मेरी बारी नहीं आई। मेरी इच्छा और बलवान होती चली गई। एक बार घर में कहीं से दस हजार रूपये आये। उसी वक्त मझला भाई विकास भी मेरे पास ही बैठा था। हम उस पैसे के बारे में सोच ही रहे थे कि भाई ने कहा भैया चलो पैसे हैं वैष्णो देवी चलते है। मेरी पत्नी व बच्चे भी उसी वक्त मान गये। फिर क्या था मैने उसी वक्त विकास को चार टिकट बुक कराने को दे दिये। जिनमें एक मेरे, मेरी पत्नी (विनीता), मझला भाई तथा पुत्र राहुल का नाम था। इस वक्त मेरी पुत्री कामाख्या भोजपुरी थी।इस समय हम चारों के टिकट का कुल मूल्य 968 रूपये था।
यहाँ हमसे एक गलती हो गई कि हमे आने जाने का टिकट बुक कराना था। परंतु यह गलती भी एक अच्छी गलती साबित हुई। जिसका वर्णन आगे जाकर करेगें। घर से प्रस्थान की तारीख 03/05/2003 थी। हम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन समय से दो घंटे पहले ही पहुँच गए। समर स्पेशल जम्मूतवी अपने सही रेलवे समय 1630 पर स्टेशन पर आ गई। हमने अपने कनफर्म सीटे प्राप्त कर ली। मेरी इच्छा थी कि सारी रात जाग्रत रहकर रास्ते की सुंदरता का आनंद लूँ , मगर रात के अंधेरे में सब कुछ काला व धूमिल दिखाई दे रहा था। निराश होकर सोना ही उचित समझा।
हमारे सहयात्री भी दिल्ली से थे। वे चार थे जिनमे पति-पत्नी तथा उनके दो बच्चे थे। वे गाडी में चढते ही सो गए। उनकी पत्नी हमसे घुलमिल गई। राहुल उनके हम उम्र बच्चों के साथ घुलमिल गया परंतु हमारी डेढ वर्ष की बच्ची कलश (कामाख्या) के लिए यह एक नया अनुभव था। वह बार बार खिडकी के पास जाती तथा बाहर के दृश्य को देखकर डरकर गोद में बैठ जाती। उसका यह क्रम लगभग आधी रात तक चला, फिर वह सो गई।
रात को सब सो गए परंतु मैं आँख बंद करके सोने का प्रयास करता रहा। मुझे चलते वाहन में नींद नहीं आती। गाडी जब चलती आँख खुल जाती, जब रूकती जब आँख खुल जाती। अगर नींद लगती तो केवल उस समय के लिए जब गाडी खडी होती या एक समान गति से चल रही होती। रात काफी हो चुकी थी। कलश बोतल से दूध पीती थी। उसका दूध समाप्त हो गया। हमें इस बात की आशा थी कि हर स्टेशन पर दूध मिल ही जायेगा। परंतु दूध मिलना दूभर हो गया और मिला भी तो पाउडर का दूध मिलता जो जल्दी ही खराब हो जाता था। इस बात से हम बहुत परेशान हो गये। दूध किसी भी स्टेशन पर नहीं मिला। हम 0745 पर जम्मू रेलवे स्टेशन पर थे।

एक कटु व्यंग - 
सुबह के चार बजे थे। नींद अपने घरेलू कार्याकलाप के अनुरूप अपने आप खुल गई । इसके बाद नींद नहीं आई। हमारे सहयात्री की पत्नी भी जाग गईं। हमने स्लीपर सीट को सिटिंग में बदल लिया। वह सहयात्रिन अब भी बार बार आँख बंद करके सोने का प्रयास करती थीं। उनकी आँखें बंद थी कि तभी मेरे ऊपर एक बैग गिरा जो सहयात्री का था। वह ऊपर सोया हुआ था। उसमें रूपये भरे हुए थे। मैने वह पर्श उसकी पत्नी को दे दिया। उसने वह पर्श खोला तो देखा पर्श नोटों से भरा हुआ था। उसने वह पर्श अपने पास रख लिया। जब सहायात्री जागा तो उसकी पत्नी ने उससे पर्श के बारे में पूंछा तो वह सन्न रह गया। उसकी पत्नी ने उसे सारी बात बता दी और अपने पति पर बहुत गुस्सा किया। तो उस व्यक्ति ने व्यंग में एक बात कही जिसे सुनकर मैं अवाक रह गया। 
‘इसी लिए तो मैने इतने सच्चे व इमानदार व्यक्ति के साथ अपना टिकट बुक कराया था। ’ धन्यबाद तो दूर उसका यह व्यंग पूर्ण जवाब मुझे चुभ सा गया। बाद में बातों बातों में पता चला कि वह सहयात्री सी0 बी0 आई0 अफसर था।

नसीहत :- 
इससे हमें नसीहत मिली कि आगे से अगर बच्चा दूध पीता हो तो अपने साथ दूध का पाउडर अवश्य ले जायें। दूध तो वहाँ नही मिलता अगर मिलता है तो वह पाउडर का होता है। हाँ एक बात ध्यान देने वाली है, अगर आपको वैश्णव देवी जी के रास्ते में गरम पानी चाहिए तो वह किसी भी दुकान से मुफ्त में लिया जा सकता है। इसके लिए कोई मना नहीं करता और न ही दाम लेता है।

जम्मू रेलवे स्टेशन  पर :- 
जम्मू रेलवे स्टेशन सुरक्षा गार्डो से घिर हुआ था। निकलने का एक ही रास्ता था, जिस पर सख्त चैकिंग थी। मगर इस चैकिंग के बावजूद हमें कोई असुविधा नहीं हुई। यहाँ सबसे पहले दूध पाने की कौशिश की परंतु कोई भी दूध देने को तैयार नहीं हुआ। कलश का रो रोकर बुरा हाल हो गया था। एक बुजुर्ग टी स्टाल वाले ने बहुत खुशामद के बाद एक पाव ही दूध दिया। जो कटरा तक पहुँचते पहुँचते ही खराब हो गया।
यह ध्यान रहे कि जम्मू स्टेशन से ही बस कटरा के लिए मिल जाती है। इसके लिए वहांँ पर विशेष व्यवस्था है। मगर पर्यटन विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई बसों का किराया इस प्रकार थीं।
सामान्य बसों में 22 रूपये
सेमी डीलक्स बसों में 30 रूपये
डीलक्स बसों में 35 रूपये।
यहां यह देखने में आया कि सामान्य बसों तथा डीलक्स बसों की सेवा में कोई अंतर नहीं था। आप इन बसों के अलावा बाहर से अन्य बसें लेकर कटरा जा सकते हैं इनमें समान्य किराया 20 रूपये प्रति व्यक्ति था।
नोट :- अगर आपके साथ कोई छोटा बच्चा है तो उसे यात्रा से कुछ दिन पूर्व से डिब्बे के दूध को पिलाने की आदत डाल लें क्योंकि रास्ते में पाउडर का दूध मिलता है।

जम्मू से कटरा :- जम्मू से कटरा के बीच की दूरी लगभग 50 किलोमीटर है। कटरा समुद्र तल से 2800 फुट की ऊंचाई पर बसा है। यहाँ पर रोजाना के लिए कटरा के लिए बस सर्विस है जो पांच से दस मिनट के अंतराल पर चालू रहती है। जम्मू से कटरा यात्रा बहुत ही सुंदर व रोमांचपूर्ण थी। प्राकृतिक छटा देखते ही बनती थी। प्रकृति का इतना सुंदर नजारा प्रथम बार देख रहा था। सड़क सर्प की तरह बल खाकर पर्वतों के बीच गायब हो जाती थी। सड़क के दोनों और की गहरी खाईयों में देखते ही डर लगता था। गहरी खाईयों के पास आने पर कंडक्टर ने कहा कि कमजोर दिल वाले गाड़ी से बाहर न झांके। ड्राईवर सधी हुई ड्राइविंग कर रहा था। जब कभी घाटी के निकट से अन्य गाडी निकलती तो मेरा रोम रोम सिहर जाता था। रास्ते में पड़ने वाली घाटियों व छोटे झरनों वाली नदियों का नजारा देखते ही बनता था।
लेकिन आधुनिकता के इस युग में विज्ञापनों ने पर्वतों की सुंदर वादियों को भी नहीं छोडा। लोगों ने विज्ञापन के द्वारा प्रकृति की सुंदर छटा को रंगों से पोत कर बदरंग करने मे कोई कसर नहीं छोडी है। कटरा व जम्मू के बीच लगभग दस हजार वर्ग मीटर पहाडी क्षेत्र पर विज्ञापन बनाये गए हैं। जो एक प्रकार से वातावरण से खिलवाड़ ही तो है। दुनिया वातावरण के प्रति चिंता दर्शा रही है जबकि यहां लोग उसे बिगाडने पर तुले हैं। सरकार न जाने क्या कर रही थी ? क्या कभी वह समय आयेगा जब लोग पर्यावरण हानि के प्रति सचेत होकर पर्यावरण हानि को पहचान पायेंगें।
बस कटरा के लिए लगातार आगे बढ रही थी। सुंदर से सुंदर नजारा आँखों के सामने आता तथा विलुप्त हो जाता। सुंदर पहाडियों ने तो मन मोह ही रखा था साथ ही घाटियों में खिले रंग बिरंगे फूल अपनी अनोखी छटा बिखेरने में पीछे नहीं थे। फूलों के रंग बहुत ही सुंदर तथा अजीबो गरीब थे। उनको गहराई से देखने के लिए जैसे ही उठता गहरी घाटियों को देख कर दिल दहल जाता था। दो घंटे की अनवरत यात्रा के उपरांत 1030 पर हम कटरा बस स्टेंड पर थे।

कटरा में :- 
कटरा पहुँचते पहुँचते पानी व दूध बदलने के कारण कलश का पेट खराब हो गया। वहां पर व्यक्तिगत धर्मशाला वाले दलाल हमें बहका कर ले गए। उन्होने बताया कि केवल प्रसाद ले लेना हमारा कोई किराया नहीं है। चाहें तो आप क्लाकरूम की सुविधा भी ले सकते हैं। हम उनके साथ चले गए। 1600 बजे तक आराम करने के बाद हमें क्लाक रूम में अपना सामान जमा करके तथा कुछ जरूरी सामान लेकर माता के दर्शनों के लिए आगे बढे। यहाँ हमने पुनः बस स्टेंड पर जाकर अपने नाम की पर्ची बनवाई जिसके बिना ऊपर भवन में दर्शन नहीं किये जा सकते था। इस पर्ची में मुफ्त बीमा सुविधा के बारे में भी लिखा हुआ था। अगर इस पर्ची को लेना भूल जाते है तो बांण गंगा पर चैकिंग करने वाले आगे नहीं जाने देते और पर्ची बनवाने के लिए वापिस आना पडता है। बांण गंगा पर पर्ची की एंटरी करवानी जरूरी है। वहां से कुछ ही आगे निकले थे कि एक थ्रीव्हीलर वाला मिला जिसने बताया कि दर्शनी दरवाजा यहां से करीब दो किलोमीटर दूर है। अगर आप थ्रीव्हीलर से चलना चाहते हैं तो चले सभी का एक समान किराया है। जो प्रति व्यक्ति 20 रूपये है। हमे उसमें बैठ कर दर्शनी दरवाजे पर पहुचें। वहाँ से दस रूपये में यात्रा के लिए दो छडियाँ खरीदीं। कटरा का समूचा यात्र क्षेत्र शुद्व शाकाहारी है । यहाँ लहसुन व प्याज आदि का खाना नहीं मिल पाता है।
साधारण व्यक्ति अपनी गति से 13 किलोमीटर की दूरी चार से पांच घंटे में पूरी कर माता के दरवार में पहुंच सकता है । परिवार व बच्चों के साथ यह समय बढ जाता है। यात्रा पैदल या घोडे (टट्टू) या पालकी या पिट्ठू की सहायता से की जा सकती है। छोटे बच्चे व सामान को ले जाने के लिए यहाँ पर पिट्ठू भी किराये पर मिल जाते हैं।
यात्रा के लिए केनवस के जूते, बांस की छडी, टार्च, टोपी, रेनकोट, छाता आदि भी किराये पर मिल जाते हैं।

माता वैश्णव की कहानी :- 
पौराणिक कथा के अनुसार त्रेता युग में जब राक्षसों के अत्याचार अत्यधिक बढ गए तो भगवती की समस्त शक्तियों ने एकत्रित होकर धर्म की रक्षा के लिए अपने सम्मिलित तेज से एक दिव्य शक्ति को जन्म दिया। जो महादेवियों की इच्छा से रत्नाकरसागर के परिवार मे अवतरित हुईं। इस कन्या का नाम त्रिकुटा रखा गया। बाद में त्रिकूटा भगवान विष्णु के अंश से प्रकृट हुई इसलिए त्रिकुटा कहलाईं। माता वैश्णव देवी भगवान विष्णु की उपासक थीं।
देवी त्रिकुटा पिता की आज्ञा पाकर समुंद्र तट पर तप करने लगी। वह भगवान राम के ध्यान में मग्न होकर उनके आने का इंतजार करने लगीं। सीता हरण के बाद जब राम ने कन्या को सागर तट पर तप करते देख उनके समाधी लगाने का कारण पूछा। श्री राम के पूछने पर कन्या ने कहा कि प्रभु मैने आप को पति रूप में पाने के निश्चय से यह समाधी ली है। तो राम ने उसे समझाया कि इस जन्म में तो मैंने एक पत्नीव्रत धारण कर रखा है। परंतु तुम्हारे तप का फल तुम्हे अवश्य मिलेगा। लंका से लौटते वक्त मैं तुमसे अवश्य मिलुगां। उस समय तुमने मुझे पहचाल लिया तो मै तुम्हे पत्नी रूप में वरण कर लूंगा।
लौटते वक्त राम ने वृद्व साधु का रूप रख कर त्रिकुटा के आश्रम में प्रवेश किया। वह उन्हे पहचान न सकीं। तब राम ने अपने सही रूप दिखाया तो वे राम को पहचान सकीं। उन्हे बहुत दुख हुआ उन्होने शरीर त्यागने की इच्छा व्यक्त की। तब श्री राम ने उस कन्या को आश्वासन दिया कि कलियुग के कल्कि अवतार में तुम मेरी सहचरी बनोगी। तब तक तुम उत्तर भारत के मणिकपर्वत पर स्थित तीन शिखर वाले त्रिकूट पर्वत की गुफाओं में तीनों महाशक्तियों के साथ निवास करो। तुम वैश्णव देवी के नाम से विख्यात हो संसार में अमर हो जाओगी।
वैश्णव देवी देवियों के 51 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि माता सती के सती हो जाने के कारण वैराग्य को प्राप्त शिव सती की शव लेकर तीनों लोको में भ्रमण करने लगे, तो भागवान शिव का मोह भंग करने के लिए विष्णु भगवान ने सुदर्शन से सती के शरीर काट कर गिरा दिया। जहां जहां पर माता के अंग गिरे वहां पर शक्तिपीठ की स्थापना की गई है। कहा जाता है कि वैश्णव देवी के दरबार में सती की बाजू (भुजा) गिरी थी।

दर्शनी दरवाजा :- 
कटरा बस अड्डे से दो किमी दूर पत्थर का बना हुआ एक दरवाजा है। जो दर्शनी दरवाजे के नाम से प्रसिद्व है। कहा जाता है कि दिव्य कन्या भूमिका नामक स्थान से गायब होकर इसी रास्ते से त्रिकूट पर्वत की ओर गई थी। 
इसी के संकेतार्थ यह दरवाजा बनाया गया है। आज सभी दर्शनार्थी भी इसी रास्ते त्रिकूट पर्वत पर जाते हैं। त्रिकूट पर्वत के पहले दर्शन इसी दरवाजे से होते हैं इसी लिए इस दरवाजे को दर्शनी दरवाजा कहते हैं। यह स्थान भूमिका मंदिर से तथा कटरा बस अड्डे से सड़क द्वारा सीधा जुडा हुआ है।

कटरा के अन्य दर्शनीय  स्थल :- 
कटरा में कुछ अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं। कटरा के दर्शनीय स्थानों में रधुनाथ मंदिर, चिंतामणि मंदिर, इसी के अंदर चिंतामणि के नाम से एक धर्मशाला है। जो बस अड्डे से लगभग एक किलोमीटर दूर है। इस मंदिर की विशाल दुर्गा प्रतिमा तथा विशाल शिवलिंग दर्शन योग्य है। भूमिका मंदिर कटरा का एक प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है।

भूमिका मंदिर :- 
भूमिका मंदिर कटरा का एक प्रमुख ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल है। जो पैंथल मार्ग पर कटरा से लगभग दो किलोमीटर दूर है। कहा जाता है कि इसी स्थान पर कन्या रूपी माता ने बाबा श्रीधर को लगभग 700 वर्ष पूर्व साक्षात दर्शन देकर विशाल भंडारा करने को कहा था। इस समय भैरव को इस कन्या पर शक हो गया और उसकी हठ के कारण लोप होकर त्रिकूट पर्वत की ओर चली गई।
अनभिज्ञता के कारण मैं इस स्थान का दर्शन नहीं कर पाया। इस बात का दुःख रहेगा। अनभिज्ञता के कारण कुछ अन्य स्थल भी अनदेखे रह गये। उन्हे अगली बार देखने का प्रयास करूंगा।
रधुनाथ मंदिर कटरा :- 
इसकी बस अड्डे से दूरी लगभग आधा किलोमीटर है। इसका निर्माण स्वामी नित्यानन्द जी ने कराया था। इसमें भगवान राम, हनुमान, भगवान आशूतोश का मंदिर तथा स्वामी नित्यानन्द जी की समाधी है। यह मंदिर दर्शनी दरवाजे की ओर जाते हुए रास्ते में ही पडता है। अगर पैदल जाया जाये तो इसके दर्शन किये जा सकते हैं।
प्रथम त्रूटि :- 
जम्मू से कटरा की ओर जाते समय जम्मू से आठ किलोमीटर दूर नगरौटा नामक स्थान है। इस स्थान पर कौल कन्धोली नामक प्राचीन मंदिर है। कहा जाता है कि वैष्णो देवी जी के दर्शन को जाते वाक्त सबसे पहले इसी स्थान के दर्शन करने चाहिए।
इस मंदिर के बारे में एक कथा प्रचलित है। माता जी इस स्थान पर कन्याओं के साथ गेंद क्रीडा करती थीं। एक दिन गरमी के कारण बालिकाओं को प्यास बहुत सताने लगी तो करूणमयी माँ ने उन्हे एक कौल (कटोरा) दिया। जिसे एक सूखे गड्डे में कन्धालने (हिलाने) पर वहाँ पानी निकल आया। इसी कारण इस स्थान को कौल कन्धौली कहा जाता है। नगरौटा एक बडा स्थान नहीं है इसलिए यहाँ बस नहीं रूकती केवल अपने वाहन से ही यहाँ के दर्शन किये जा सकते हैं। यहाँ पर एक छोटा सा मंदिर भी स्थापित है।
दूसरी त्रूटि :- 
अनभिज्ञता के कारण मैं कटरा के भूमिका मंदिर, रधुनाथ मंदिर तथा चिंतामणि मंदिर देखने वे वंचित रह गया। इन स्थानों का दर्शन नहीं कर पाने का दुःख रहेगा। अगली बार इन त्रूटियों को दूर करने का प्रयास करूंगा।
गुलशन कुमार का देवी मंदिर :- दर्शनी दरवाजे से कुछ ही आगे चलने पर देवी माता का मंदिर दिखाई देता है। इस मंदिर की स्थापना स्व० गुलषन कुमार द्वारा की गई थी। इस लिए इसे गुलशन कुमार का देवी मंदिर कहते हैं। यहाँ पर भक्तों के लिए निशुल्क भंडारा चलता रहता है। वर्तमान में इसके प्रबंधक भूषण गुलशन हैं। इसी स्थान पर गुलशन कुमार की टी० सीरीज की दुकान है। इस स्थान से माता आद्यकुमारी के मंदिर तथा बांण गंगा के दर्शन किये जा सकते हैं।
बांण गंगा :-
गुलशन कुमार के देवी मंदिर से कुछ कदम आगे चलने पर बांण गंगा के लिए प्रवेश द्वार है। बांण गंगा के प्रवेश द्वारा पर पर्यटन विभाग द्वारा दी गई पर्ची की एंटरी होती है। अतः यहाँ एंटरी कराकर ही आगे बढा जा सकता है। यदि आपने पर्ची न कटवाने की गलती की है तो आपको पुनः वापिस बस अड्डे पर जाकर पर्ची बनवानी होगी।
बांण गंगा के विषय में एक कथा प्रचलित है कि जब कन्या रूपी महाशक्ति त्रिकूट पर्वत की ओर बढी तो उनके साथ वीर लांगुर भी था। जब मार्ग में वीर लांगुर को प्यास लगी तो देवी ने बाण चलाकर एक गंगा रूपी जलधारा प्रवाहित की तथा अपनी तथा लांगुर की प्यास को तृप्त किया। बांण से गंगा के निकलने के कारण इसे बांण गंगा कहा जाता है।
ऐसी भी मान्यता है कि इस गंगा में देवी ने बाल धोकर संवारे थे इसलिए इसे बाल गंगा भी कहते हैं। यह कटरा से 2.5 किलोमीटर तथा दर्शनी दरवाजे से लगभग एक किलोमीटर दूर है। इस स्थान की समुंद्र तल से ऊँचाई लगभग 2800 फीट है। लोग बांण गंगा में स्नान करके ही आगे बढते है। कुछ लोग यहाँ पर अपने बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं।
गीता देवी मंदिर व झरना :-
बांण गंगा से लगभग 200 मीटर की दूरी पर मुख्य मार्ग पर ही छोटा सा गीता देवी का मंदिर है। इस मंदिर के पास एक सुंदर व छोटा सा झरना है। जिसका आनन्द इस यात्रा में चढाई व उतराई के समय लिया जा सकता है। इस पानी में छोटी छोटी मछलियों को झुंड है। इस लिए इसमें थोडी सावधानी से उतरना चाहिए क्योंकि मछलिया पैर के नीचे आ सकती हैं।
टट्टू , पिट्ठू व पालकी :- 
बांण गंगा के चैक पोस्ट को पार करते ही टट्टू , पिट्ठू व पालकी वाले मिल जाते है। यहाँ से टट्टू , पिट्ठू व पालकी आदि को अपनी सुविधा के अनुसार किराये पर लिया जा सकता है। यहाँ यह हिदायत दी जाती है कि इनमें से किसी का भी प्रयोग करने से पहले उसका नाम, पता व रजिस्ट्रेशन नम्बर लेना न भूले, हो सके तो इसे नोट कर लेना चाहिए। इनके बीच कोई गलत आदमी भी हो सकता है, जो आपको धोखा भी दे सकता है।
ऊपर चढाई के लिए लोग नंगे पैर चढ़ना पसंद करते हैं। यदि आप जूते या चप्पल पहन कर जाना चाहते हैं तो वे चपटे (फ्लेट) व मजबूत होने चाहिए ऐडी (हील) वाली वाली चप्पल व जूते का प्रयोग कदापि न करें। सरपट ढलान व ऊँचे नीचे रास्ते पर पैर में मौंच (क्रेंप) आ सकती है। जिससे आपको चढने में परेशानी होगी।
चरण पादुका :- 
बांण गंगा से 1.5 किलोमीटर आगें बढने पर चरण पादुका मंदिर के दर्शन होते हैं। इस मंदिर की समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 3380 फीट है। यह वैश्णव देवी यात्रा का बांण गंगा के बाद दूसरा मुख्य पडाव है। इस स्थान के बारे में प्रसिद्व है कि इस स्थान पर रूक कर देवी ने पीछे मुड कर देखा था कि भैरवनाथ उनके पीछे आ रहा है या नहीं। रूकने के कारण इस स्थान पर माता के चरणों के निशान बन गए इस कारण इस स्थान को चरण पादुका के नाम से जाना जाता है। यह एक छोटा सा मंदिर है इसके दर्शन में चूक हो सकती है। सीढियों से चढते वक्त इस मंदिर के दर्शन से वंचित रह जाना पडता है। हमसे भी ऐसा ही हुआ था। हम सीढियों से शार्टकट रास्ते से आगे बढ़ गए और चरण पादुका बीच में ही कहीं छूट गया। इसी कारण उतरते वक्त सीधा रास्ता अपनाया और इसके दर्शन आसानी से हो गए।
नोट :-
सीढियाँ चढे उतरे या नहीं :- 

सीढ़ियाँ चढने से रास्ता छोटा हो जाता है मगर सीढ़ियाँ चढने से अधिक थकान होने लगती है। थकान का मुख्य कारण मांसपेषियों का अधिक काम करना होता है। सीढ़ियाँ चढते वक्त ज्यादा ऊर्जा की हानि होती है इसलिए सीढ़ियों का उपयोग न करके सरल रास्ते का ही उपयोग करना चाहिए। कमजोंरों, बच्चों व वृद्वों को तो सीढ़ियों का प्रयोग ही नहीं करना चाहिए। सीढियाँ चढते व उतरते वक्त हम सममतल पर चलने से अधिक ऊर्जा खर्च करते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ऊर्जा बचाने तथा कम थकान के लिए सीढियों के चढने व उतरने से बचना चाहिए।
शार्टकट के चक्कर में छोटे रास्ते या पगडंडी से पर चढना खतरनाक हो सकता है। सारा रास्ता पथरीला है। जिससे पत्थर चटक कर गिरते रहते हैं। अतः ध्यान से चलना चाहिए।
आदि कुमारी या गर्भजून गुफा :-
चरण पादुका से 4.5 किलोमीटर आगे बढने पर आदिकुमारी नामक स्थान है। यह स्थान समुंद्र तल से लगभग 4800 फीट की ऊँचाई पर है। माता जब इस रास्ते पर आई तो यहाँ पर तपस्यारत साधु को दिव्य दर्शन देकर कहा ‘हे ! तपस्वी मैं यहाँ कुछ समय विश्राम करूंगी। यदि कोई मेरे विषय में पूंछे तो कुछ मत बताना।’ यह कहकर कन्या गुफा में चली गई और वहाँ नौ माह तक तपस्या में लीन रही। जिस प्रकार एक शिशु माता के गर्भ में बिना कुछ खाए पिए नौ माह तक रहाता है। उसी प्रकार माता रूपी कन्या ने भी नौ माह तक इस गुफा में तपस्या की। इसलिए इस गुफा को गर्भजून कहा जाता है।
जब भैरव कन्या की खोज करता हुआ गुफा के द्वार पर आया तो उसने तपस्वी से कन्या के बारे में पूंछा तो उस तपस्वी ने भैरव से कहा कि जिसे तू साधारण कन्या समझता है। वह तो महाशक्ति व आद्यकुमारी (अर्थात जब से सृश्टि की रचना हुई है तभी से उसने कौमार्य व्रत धारण कर रख है।) है। जा यहाँ से चला जा। भैरव हठ करने पर माता समझ गई कि भैरव यहाँ आ जायेगा। उन्होने अपने त्रिशूल से दूसरा नया रास्ता बनाया तथा वहाँ से निकल गईं। इस स्थान को अदि कुमारी तथा गर्भजून भी कहा जाता है। इस स्थान पर दो धर्मशालाऐं हैं जिनमें से एक का नाम शारदा भवन है। रात्रि में लोग यहाँ विश्राम कर सकते हैं। यहाँ पर खाने पीने का सभी सामान तथा किराए पर कंबल मिल जाते हैं, जिन्हे जमा करने पर किराया पूरा का पूरा वपिस प्राप्त हो जाता है। अतः यहाँ कंबल निशुल्क मिलते हैं।
यहाँ यह सलाह दी जाती है कि सीधे माता के दर्शन न करके पहले गर्भ जून के दर्शन करने चाहिए। ऐसी ही मान्यता है। परंतु इन्हे छोड कर सीधे माता के दर्शन भी किये जा सकते हैं। यहाँ पर भी दर्शनों के लिए पर्ची लेनी होती है फिर अपने नम्बर पर माता के दर्शन करने होते हैं। यहा पर्ची भी निशुल्क प्राप्त होती है। इस कारण अपनी बारी पर आराम से बैठ कर दर्शन कियो जा सकते हैं। माता वैश्णव देवी ट्रस्ट का यह एक सराहनीय प्रयास है। पर्ची सुविधा हो जाने के बाद से बच्चों व वृद्वों को आसानी से बिना किसी परेशानी के दर्शन हो जाते हैं। यहाँ पहले दर्शन करने की आपाधापी की भीड देखने को नहीं मिलती। यह वैश्णव देवी ट्रस्ट के बुद्विजीवी वर्ग का एक सराहनीय कार्य है।
आद्यकुमारी तक पहुँचते पहुँचते दिन छिप गया। सायं के पांच बज चुके थे। हमने पर्ची बनवाई जिसका नम्बर 179 था। उस दिन काफी भीड थी और 66 वाँ नम्बर चल रहा था। गर्भजून के दर्शन हमें लगभग एक बजे हुए। अंदर जाते वक्त काफी सख्त चैकिंग थी। गुफा में चमडे व प्लास्टिक की बनी कोई भी वस्तु ले जाना मना है। गुफा में अंदर जाने से पहले पर्स, बैल्ट, पेंन, डायरी, कंघा आदि भी बाहर ही छोडने होते हैं। अंदर केवल प्रसाद ही ले जाया जा सकता है। अतः उसे क्लाकरूम में जमा करें या अपने किसी साथी के पास छोडकर दर्शन किये जा सकते हैं। अपना सामान किसी अनजान के पास नहीं छोडना चाहिए। अधिक भीड होने के कारण हमें धर्मशाला में स्थान नहीं मिला। हमे टिनशेड के नीचे ही आराम करना पडा। रात में काफी ठंड हो जाती है इसलिए गरम कपडे भी साथ में रखने चाहिए। हम मई माह में गये थे। गरमी के समय में भी वहाँ पर रात में ठंड से दाँत बजने लगे थे। भोजन ढ़ाबों पर न करके ट्रस्ट द्वारा बनाये गये भोजनालयों में ही करना चाहिए। मगर इनके खुलने का समय निश्चित है। यह सुबह में प्रातः 0900 बजे से दोपहर 1300 बजे तक तथा सायं काल में 1400 बजे से 2100 बजे तक ही खुलता है। भीड रहने के कारण इनपर सामान भी जल्दी ही समाप्त हो जाता है। अतः पहले ही पहुँचने का प्रयास करें तो अच्छा है। अन्य दुकान दार यहाँ प्रत्येक वस्तु पर दो रूपये अधिक लेते हैं। मगर ट्रस्ट के भोजनालयों में कुछ सामान्य उपयोग की कुछ खाद्य सामाग्री प्रिंट रेट पर भी मिल जाती है।
आदि कुमारी से मिले नये सहयात्री :- 
राजस्थान से आए बंसल परिवार का साथ प्राप्त हुआ जिनमें चार सदस्य व एक बच्चा था। हम उनके साथ भवन तक रहे। यह रास्ता किस प्रकार हंसते बोलते कट गया पता ही नहीं चला। मगर भवन से भैरों मंदिर के रास्ते में अलग हो गये। फिर उनसे मुलाकात सांझी छत पर हुई। उन्हे उसी दिन की गाडी पकडनी थी जबकि हमें कोई फिकर नहीं नहीं थी। इसके बाद हमारा संपर्क टूट गया दुःख होता है कि आपसी मेलजोल के बाद हमने उनका फोन नम्बर क्यों नहींं लिया।
माता के भवन का नया रास्ता व पुराना रास्ता :-
चरण पादुका से आदि कुमारी मार्ग पर जाते वक्त मंदिर के लगभग 100 या 1500 मीटर दूर से माता के भवन को एक नया रास्ता जाता है, जो बहुत ही सरल व सपाट है।
आदि कुमारी मंदिर से माता के भवन के लिए दो रास्ते जाते है। पहला रास्ता शारदा भवन से होकर हिमकुटी रास्ते से सीधा माता के भवन को जाता है। इसे नये रास्ते के नाम से भी जाना जाता है, जबकि दूसरा रास्ता हाथी मत्था से होकर जाता है जो सांझी छत्त से होते हुए सीधा माता के भवन पर निकलता है। इस रास्ते को पुराना रास्ता भी कहा जाता है। हाथी मत्थे का रास्ता कठिन है। इसे पुराने रास्ते के नाम से भी जाना जाता है। इसपर टट्टू चलते है। जबकि हिमकुटी रास्ते पर इनका चलना मना है।
नये रास्ता जो हिमकुटी मार्ग से जाता है, जिससे होकर आसानी से माता के भवन तक जाया जा सकता है। इस रास्ते को आदि कुमारी से भी जोड दिया गया है। वह जोडक रास्ता शारदा भवन से होकर निकलता है। यह सरल व चढाई मुक्त रास्ता सीधे माता के भवन को जाता है। अतः हमें चढाई मुक्त नये रास्ते को अपनाना चाहिए। इसकी कुल दूरी लगभग 8.5 किलोमीटर है।
नये रास्ते पर स्थान स्थान पर विश्राम स्थल, शौचालय, तथा पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध है। खाई की तरफ संपूर्ण रास्ते पर ग्रिल लगा दी गई है। इस रास्ते को पत्थरों के बीच से पत्थर काट कर बनाया गया है। यह सरल रास्ता बनाना वैश्णव देवी ट्रस्ट का दूसरी सराहनीय कार्य है। यह रास्ता पर्वत के नीचे से होकर गुजरता है जिसकारण पत्थर के चटक कर गिरने तथा किसी जानवर द्वारा अनजाने में लुडका दिये जाने वाले पत्थरों के गिरने का खतरा बना रहता है। नये रास्ते का अधिकांश भाग टिनशेड से ढक दिया गया है। जिस स्थान पर टिनशेड नहीं है। वहाँ पर सावधानी पूर्वक आगे बढना चाहिए। यह रास्ता सीधा व सरल है।
माता के  दर्शन  :- 
गुफा में प्रवेश करने से पूर्व गुफा के अन्त में बह रही चरण गंगा में स्नान किया जाता है। जहाँ तक संभव हो सके दर्शन के लिए जाना एक पवित्र कार्य है। इसलिए स्नान से शुद्व होकर, शुद्व वस्त्र पहन कर तथा माता का ध्यान करते हुए माता के दर्शनों को जाना चाहिए। यहाँ भी अंदर प्लास्टिक व चमडे से बना कोई भी सामान ले जाना मना है। यहाँ भी धर्मशालाएं, क्लाकरूम तथा किराए पर कंबलों की सुविधा उपलब्ध है। गुफा में अंदर केवल प्रसाद ही ले जाने दिया जा सकता है। हमे कलश के दूध की बोतल भी नहीं ले जाने दी गई।
माता के दर्शन के लिए भी दो गुफाएें है जिन्हे पुरानी गुफा व नई गुफा के नाम से पुकारा जाता है। दर्ननार्थियों की सुविधा के लिए तथा उन्हे आसानी से दर्शन कराने के लिए नई गुफा का निर्माण कराया गया है। इस गुफा का उद्घाटन 13 अप्रैल 1977 को महाराजा कर्ण सिंह जी द्वारा किया गया। इस गुफा के निर्माण का उद्देश्य था कि अधिक से अधिक मात्रा में लोग माता के दर्शन कर सकें।
पुरानी गुफा का रास्ता प्रायः बंद ही रहता है। प्राचीन गुफा के द्वारा पर ही बडा सा पत्थर है जिसे भैरो का धड कहते हैं। इसी के ऊपर लेटकर प्राचीन गुफा में अंदर प्रवेश किया जाता है। लगभग दस मीटर लम्बी इस गुफा में पैरों के नीचे शीतल जल बहता रहता है। पूरी गुफा में सीधे खडा हो पाना कठिन है लेकिन इसकी सुदंरता के आँखों में बसा ही सकता परंतु इसका वर्णन कर पाना कठिन है। इस गुफा के अंत में महालक्ष्मी, सरस्वती, तथा महाकाली रूपी तीन भव्य पिंडियाँ है। इन्ही को माता वैश्णव देवी कहा जाता है। कहा जाता है कि माता वैश्णव देवी अदृश्य रूप में आज भी इन तीनों के साथ इस स्थान पर निवास करती हैं।
पिंडियों में न जाने कौन सा आकर्षण था कि मुझे इनके ऊपर से निगाह हटा पाना कठिन हो गया था। इनकी शोभा देखते ही बनती थी। पुरानी गुफा के द्वारा देवी दर्शन से आजकल लोग वंचित रह जाते हैं। नई गुफा में प्रवेश करते वक्त प्रसाद लेकर एक टोकन दे दिया जाता है। माता के दर्शन करके नई गुफा से ही बाहर आया जाता है। इस नई गुफा में जयकारे लगाने पर पाबंदी है अतः माता के नाम का जाप करते हुए ही पिंडियों को आँखों बसा कर माता के दर्षन करने चाहिए। बाहर आकर प्रसाद व नारियल ग्रहण करना चाहिए। जो टोकन देने पर मिलता है। इस टोकन के साथ एक स्मारक सिक्का भी मिलता है। जिसे लोग माता का खजाना मान कर संभाल कर रखते हैं।
इस स्थान से जुडी भी एक कथा है कि श्रीधर जी माता की खोज में उपवास कर रहे थे। मां ने सपने में उन्हे त्रिकूट पर्वत पर इस गुफा में विराजने के बारे में बताया। जब श्रीधर उस पवित्र स्थान पर पहुंचे तो माता को पहले से ही मौजूद पाया। माता एक तीन सिर की आकृति वाले पत्थर में समा गईं। इस प्रकार माता ने तीन सिर वाले पत्थर में सत्व, रज तथा तम गुणों की प्रतीक माता महासरस्वती, माता महालक्ष्मी तथा माता काली के रूप में दर्शन दिये। इसके उपरांत पंडित श्रीधर ने अपना समस्त जीवन माता को सेवा में लगा दिया।
भैरों मंदिर :- 
माता के दर्शनों के बाद भैरो बाबा के दर्शन को जाते हैं। कहा जाता है कि भैरो बाबा को अंदर जाने से राकने के लिए माता शक्ति ने चंडी रूप धारण करके अपने त्रिशूल से उसके सिर को धड से अलग कर दिया। धड तो माता के द्वार पर ही गिर गया परंतु जिस स्थान पर भैरव का सिर गिरा उस घाटी को भैरव घाटी कहते हैं। आज इस स्थान पर भैरव मंदिर स्थापित है। 
इसके बाद भैरव को अपनी गलती का अहसास हुआ। पश्च्याताप के शब्दों में माँ कहने पर दयालू माँ ने उसे वरदान दिया कि मेरे भक्त मेरे दर्शन के बाद तेरा भी दर्शन करेगें तभी उनकी यात्रा सफल मानी जायेगी। माता के भवन अर्थात वैश्णव देवी के दरबार से भैरों मंदिर की दूरी 2.5 किलोमीटर है। इस स्थान की संमुद्र तल से ऊँचाई 6583 फीट है।
भैरों के दर्शन के साथ ही यात्रा समाप्त हो जाती है। अब चाहें तो लोग इसी रास्ते आगे बढें या फिर वापिस मुडकर नया रास्ता अपनायें या फिर पुराने रास्ते की अपनाऐं। इसके बाद चढाई नाममात्र के लिए रह जाती है केवल उतराई ही शेष रह जाती है। यह रास्ता सांझी छत और हाथी मत्था से होता हुआ सीधे माता आदिकुमारी मंदिर पर निलकता है। इस रास्ते पर एक कठिनाई होती है कि यह टट्टुओं को भी रास्ता है। सांझी छत से टटूओं का रास्ता प्रारम्भ होता है। जो बांण गंगा तक जारी रहता है। इस रास्ते पर टट्टुओं से बच कर उतरना होता है।
सांझी छत :- 
जब हाथी मत्था से माता के दरबार को जाया जाता है। मुख्य पडाव होता है सांझी छत से होकर दो रास्ते माता के दरबार को जाते है। एक रास्ता जिससे हम लौट रहें है अर्थात भैरो घाटी से होकर जाता है। दूसरा रास्ता दिल्ली वालों की छबीली से होता हुआ सीधा माता के दरबार को जाता है। आदि कुमारी से पुराने रास्ते चढाई करने वाले इसी रास्ते से होकर माता के दरबार जाते हैं क्योंकि भैरो दर्शन का विधान लौटते समय ही है। भैरो मंदिर से सांझी छत की दूरी 2.5 किलोमीटर तथा संमुद्र तल से इसकी ऊँचाई लगभग 7200 फीट है। यहाँ चायपान की सुविधा भी उपलब्ध है। यह इस यात्रा का सबसे ऊँचा स्थल है। सांझी छत तक हेलीकाप्टर सेवा भी उपलब्ध है। जो कटरा से ही प्राप्त की जा सकती है।
हाथी मत्था :- 
आदि कुमारी से इस चढाई को देखें तो लगता है। जैसे हाथी का माथा हो इसीलए इस चढाई को हाथी मत्था के नाम से जाना जाता है। यह चढाई पुराने रास्ते पर पडती है। नया रास्ता बन जाने से इसे हाथी मत्थे की उतराई कहा जाये तो अच्छा है। सांझी छत से हाथी मत्थे की दूरी लगभग दो किलोमीटर है। हाथी मत्थे की संमुद्र तल से ऊँचाई लगभग 6500 फीट है। हाथी मत्थे से आदि कुमारी मंदिर की दूरी लगभग 2.5 किलोमीटर है। यह वही स्थान है जहाँ पर हम कल रूके थे परंतु आज इतनी भीड नहीं थी आज केवल पचास के आसपास ही नम्बर थे।
यात्रा कहाँ से कहाँ तक उनके बीच की दूरी तथा संमुद्र तल से ऊँचाई नीचे सारणी में दी जा रही है

क्र०सं०   यात्रा कहाँ से कहाँ तक    बीच की दूरी (किमी0)     संमुद्र तल से ऊँचाई (फीट)
01           कटरा से भूमिका मंदिर                  2.0,                              2500 - 2500 
02           भूमिका मंदिर से दर्षनी दरबाजा      2.0,                              2500-2700 
03           दर्शनी दरबाजा से बांण गंगा           1.0,                              2700 - 2800 
04           बांण गंगा से चरण पादुका              1.5,                              2800 - 3380 
05           चरण पादुका से आदि कुमारी         4.5,                             3380 - 4780 
06           आदि कुमारी से माता का भवन      5.5,                             4780- 5200 
07           माता का भवन से भैरो मंदिर          2.5,                             5200- 6583 
08           भैरो मंदिर से सांझी छत               1.5,                              6583 - 7200 
09           सांझी छत से हाथी मत्था                2.0,                             7200-6500 
10           हाथी मत्था से आदि कुमारी           2.5,                              6500 -4780 
11           आदि कुमारी से चरण पादुका        4.5,                              4780- 3380 
12           चरण पदुका से बांण गंगा             1.5,                               3380-2800 
13            बांण गंगा से दर्शनी दरबाजा         1.0,                               2800-2700 
14           दर्शनी दरबाजे से कटरा              1.0,                                2700- 2500 
इस प्रकार यह दूरी लगभग 13 किलोमीटर बैठती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि कुल दूरी में कटरा से कटरा तक 14 पडाव है। जिन्हे हम आसानी से पार कर सकते हैं। वास्तव में यह दूरी कुल 13 किलोमीटर है।
04/05/2003 की रात्रि आदि कुमारी पर व्यतीत की। मगर लौटते वक्त रात हो जाने पर 05/05/2003 को भी रात्रि आदि कुमारी पर ही व्यतीत की। मगर आज दर्शनों की पर्ची संख्या केवल 66 ही थी। इस प्रकार हमने कल तीन गुनी से अधिक भीड में दर्शन किए थे।
06/05/2003 की रात कटरा में आकाशगंगा रेस्टोरैंट में बिताई, इसका किराया मात्र 125 रूपये प्रति दिन प्रति कमरा था। आज रात ही कटरा के बाजार में भी घूमें। हम कटरा के बाजार की तुलना दिल्ली के चावडी बाजार से कर सकते हैं। यहाँ पर चावडी बाजार की तुलना में भीड कम थी साथ ही खरीददारी के सामान के दामों में काफी ज्यादा अंतर नहीं था।
18.00/01/15/05/2003

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