Mix 13

वैदिक गणित


वैदिक गणित की एक नई श्रूंख्ला - भाग एक 

Vedic Mathematics Series - Learn Un-Conventional ways of Multiplication Division

भारत का इतिहास व इसकी सभ्यता सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक मानी जाती है। कोई वस्तु जितनी पुरानी होती जाती है उतने ही उसके टूटने व खराब होने के आसार बढ़ते जाते हैं। परन्तु आज भी भारत यदि अपने स्वाभिमान के साथ टिका हुआ है तो उसका कारण इस देश का इतिहास ही है। जब हम देखते हैं पश्चिम के लोग आध्यात्मिकता के लिये भारत का रूख करते हैं तो गर्व का अनुभव होता है। आध्यात्मिकता ही आज एकमात्र रास्ता है पृथ्वी व विश्व के टिके रहने का। हिन्दू धर्म में आध्यात्मिकता की जो बातें हैं व सीख है उससे पूरा विश्व आकर्षित होता है। भारतीय इतिहास ने राम व कृष्ण को देखा है जो मर्यादा में भी रहते हैं और आदि व अनन्त का रहस्य भी बताते हैं। हमने चरक व सुश्रुत को भी देखा है जिन्होंने शल्य चिकित्सा यानि चीरफ़ाड़ के ऑप्रेशन में महारत हासिल की। आज की भाषा में बात करूँ तो वे उस समय के बहुत बड़े सर्जन थे। हजारों वर्ष पूर्व के सर्जन!! हमने वीर शिवाजी को देखा है, हमने लक्ष्मी बाई जैसी वीरांगना को भी देखा जो महज तेईस बरस में अंग्रेजों को दाँतों तले उंगलियाँ दबाने पर मजबूर किया। हमने भगत सिंह को देखा, हमने मोहनदास करमचंद गाँधी को भी देखा, हमने स्वामी दयानन्द व राजा राम मोहन राय को देखा जिन्होंने हिन्दू धर्म की कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। ऐसा ही शायद ही किसी धर्म में होता हो जब वे स्वयं अपनी गलतियों से सीखें व उसे सुधारने का प्रयास करें। ऐसे साधुओं को मेरा प्रणाम। हमने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया। मुगलों, तुगलकों, लोदियों व अंग्रेज़ों का डटकर सामना किया।

हमारे देश में गर्व करने के लिये व सीखने के लिये इतना सब कुछ है फिर भी जब हम पश्चिम का मुँह ताकते हैं तो हैरानी होती है। दरअसल बात यह है कि हम अपना इतिहास भूल चुके हैं। या यूँ कहें कि इतिहास जानते ही नहीं। बराक ओबामा जब कहते हैं आज का विज्ञान भारत के इतिहास में दिये गये वैज्ञानिक उपलब्धियों पर टिका हुआ है तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं है। हमने शून्य दिया इस पर हमें गर्व होना चाहिये। जब हमने चिकिसा प्रणाली दी तब गर्व होना चाहिये। जब हमने Trigonometry का सिद्धांत दिया तब गर्व होना चाहिये। मैंने जब नारद पुराण के कुछ पन्ने पलटे तो मैं दंग रह गया कि उसमें ज्योतिष सिखाया गया है और उसमें Trigonometry की Pythagoras Theorem भी है और Heights & Distances के उदाहरण भी। हमें अपने वेदों व उपनिषदों पर गर्व होना चाहिये जिन्होंने आज के विज्ञान की नींव रखी। हमें अपने पूर्वजों पर गर्व होना चाहिये। हमें गीता पर गर्व होना चाहिये जो आज के आध्यात्मिकता की नींव है।

आज से धूप छाँव पर वैदिक गणित का आरम्भ कर रहा हूँ। मैंने अभी हाल ही में इसे पढ़ना शुरू किया और मैं शुरू के कुछ पन्ने पढ़ कर ही हैरान हो गया हूँ। मैं चाहता हूँ कि इस बेहतरीन तकनीक को सभी के साथ बाँटा जाये और सरकार से बार बार अनुरोध करूँगा कि छोटे बच्चों को इसकी शिक्षा दी जाये। ये विदेशी तकनीकों से बिल्कुल अलग है और बेहद सरल है। इसके किसी भी Calculation के लिये आपको केवल पाँच तक का ही पहाड़ा (Table) आने की जरूरत है।

वैदिक गणित सोलह सूत्रों से बना है।

आज एक उदाहरण से इस श्रृंख्ला का प्रारम्भ कर रहा हूँ।

मान लीजिये आपको 8 x 7 निकालना है।
आप कहेंगे कि इसका जवाब 56 है। बिल्कुल सही। लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा कि केवल 5 तक का ही Table आने की आवश्यकता है।

8 और 10 में 2 का अंतर है व 7 और 10 में 3 का अंतर है। इन्हें कुछ इस तरह से लिखें:

8   -  2
7   -  3

अब 8 में से 3 को (8-3 = 5)या फिर 7 में से 2 (7 - 2 = 5) को घटायें।
और 2 * 3 निकालें...(2*3=6)  और कुछ इस तरह से लिखें:

8 2
7 3
(8-3)     (2*3)
5 6

जवाब आपके सामने है: 56

इसी तरह से
7 x 6 = 42

7  3
6  4
(6-3)          (3*4)
3  12 (अब इसमें से 1 को 3 में जोड़ें)

उत्तर : 42

इसे आप 100 के Base तक ले जा सकते हैं.. मसलन
99 * 88

99  1
88  12

(88-1)  (1*12)
87  12

= 8712

इस प्रश्न का उत्तर निकालने के लिये आपको ज्यादा से ज्यादा 5 सेकंड लगेंगे... वहीं यदि आप किताबी तरीके से इसका उत्तर निकालने का प्रयास करें तो??? शर्त लगा सकता हूँ तीन से चार गुना अधिक समय लगेगा..
जो आपने ऊपर सूत्र जाना है वह है निखिलं नवतश्चरम दशत: । जगद्गुरू स्वामी श्री भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज (1884-1960) का धन्यवाद जिन्होंने वैदिक गणित को सोलह सूत्रों में पिरो कर हम तक पहुँचाया है।

यह तो अभी शुरूआत है। जैसे जैसे मैं आगे के पन्ने पढूँगा मैं आपके साथ बाँटता रहूँगा।

जय हिन्द
वन्देमातरम
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदापि गरीयसी।

तपन शर्मा Tapan Sharma at Tuesday, December 13, 2011
16 comments:

प्रभात शारदाDecember 13, 2011 at 8:30 PM
How do we know which diagonal should we proceed? In first example, you go from left-top to right-bottom. Whereas in other examples, you go from left-bottom to right top?

Additionally, you have added 12 in first case and in third case you have not do the same? How do we make sure that need to add the output or not?

Reply

प्रभात शारदाDecember 13, 2011 at 8:38 PM
I got the answers...but still like if share your views too..

Reply

तपन शर्माDecember 14, 2011 at 5:50 PM
चाहें किसी भी Diagonal से subtract करें, नतीजा एक ही होगा...
इससे भी आसान तरीके आगे इंतज़ार कर रहें हैं.. :-)

Reply

AbhishekDecember 16, 2011 at 9:18 AM
multiply 
73 * 77

Jab ikai Ke dono ank ek jase ho and dahai Ke anko Ka yog 10 ho tab 
3x7=21
Just add 1 in ikai like 1+7x7=56 ans is 5621
5621

एक और सरल बिधि:-गुणा को इस प्रकार भी किया जा सक्ता है
99*88=8712
यहा पर 100 को अधार मानेगे और निम्न प्रकार से लिखेगे:--
99 88
1 12 (क्योकि 100-99=1 और 100-88=12) 
अब (88-1=87) या(99-12=87) (1*12) 
कोइ भी एक सरल संख्या को घटाये‍गे(जैसे 88 मे से 1 घटाना ज्यादा सरल है) और उसे पहिले लिखेगें फिर difference(या संख्या मे कितना जोडा जाये की बो 100 बन जाये उस अन्तर की संख्याओ को गुणा करेंगे) का गुणन फल किखेगें
(88-1)(1*12)
यानि 87 12
उत्तर =8712

!!2!!

वैदिक गणित की श्रृंखला, भाग-दो ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम का एक उदाहरण 
Learning Unconventional Methods - Vedic Mathematics Part -2

वैदिक गणित से बड़े अंकों का गुणा कितनी तेज़ी से हो जाता है यह हमने पिछले भाग में जाना। "वेद" का अर्थ होता है ज्ञान। हमारे चारों वेद ज्ञान के अथाह समन्दर हैं जिससे हम ज्ञान की असंख्य बूँदें निकाल सकते हैं। इस सागर में डुबकी लगा सकते हैं व जीवन-ज्ञान अर्जित कर सकते हैं। इन्हीं वेदों में छिपा है वैदिक गणित भी। गणित की जटिलता को बड़ी सरलता से समाप्त करता है यह गणित। हमने जो उदाहरण पिछले भाग में जाना था वह "निखिलं नवतश्चरम दशत:" था।

मेरे मित्र अभिषेक ने जानना चाहा था कि क्या 73*77 को हम जल्दी से गुणा कर सकते हैं?
आइये पहले जानते हैं कि आज के अंग्रेज़ी माध्यम से हम किस तरह से Multiply करते हैं:

    7 3
   *7 7
--------
   51 1
5 11  *
-----------
5621

अब जानते हैं वैदिक गणित का हल:
 7 3
 7 7
--------------------------
(7*7 बायें के दोनों अंक का गुणा =  49)
(Top-left * Right Bottom) + (Top-Right*Bottom Left) = 7*7 + 7*3 = 70
अंतिम दोनों अंकों का गुणा = 3 * 7 = 21

4 9 0
   7 2 1
------------------------
5621

Algebra की दृष्टि से:

मान लीजिये ये दो संख्यायें हैं: ax+b, cx+d
यानि (ax+b) * (cx+d) = acx^2 + (ad + bc)x + bd

और अब x=10 मानिये और 73*77 का उत्तर निकालिये

इसे ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम कहते हैं।

निखिलं नवतश्चरमं दशत: सूत्र का एक उदाहरण और देते चलें:

मान लीजिये आपको 18 का square निकालना है:
(यहाँ "/" का अर्थ Divide से नहीं है)

18 * 18 = (18 + 8) / (8*8)  = 26/64 = (26+6)/4 = 324 (उत्तर)

इसी तरह:

या 12*12 = (12+2)/(2*2) = 14/4 = 144 (उत्तर)

ऊपर दिये गये उदाहरणों में 18 व 12 संख्यायें 10 से क्रमश: 8 व 2 अधिक हैं इसलिये उनमें 8, 2 जोड़े हैं।

इसी तरह नीचे दिये गये उदाहरणों में संख्यायें 100 से कम हैं।
या 92*92 = (92 - 8)/(8*8) = 84/64 = 8464
96*96 = (96-4)/(4*4) = 92/16 = 9216

989*989 = (989-11)/(11*11) = 978/121 = 978121 (उत्तर) 
कितना समय लगा??? पाँच सेकंड? या पाँच मिनट.. कैलकुलेटर से भी जल्दी है यह!!!!

988*988 = (988-12)/(12*12)= 976/144 = 976144

आने वाले अंकों में हम हर सूत्र को विस्तार में जानेंगे।

वैदिक गणित के सोलह सूत्र इस प्रकार हैं:

१. एकाधिकेन पूर्वेण Recurring Decimals
२. निखिलं नवतश्चरमं दशत: (Multiplication/Division)
३. ऊर्ध्वतिर्यग्भ्यां (Multiplication/Division of Quadratic Numbers)
४. परावर्त्य योजयेत (Division, Partial Fractions)
५. शून्यं साम्यसमुच्चये (Simple Equation, Cubic Equations, Quadratic Equations Find x types)
६. (आनुरूप्ये) शून्यमन्यत (Factorization)
७. संकलनव्यवकलनाभ्यां (Factorization/H.C.F)
८. पूरणापूरणाभ्यां Biquadratic equations, Multiple Simultaneous equations (Three equations, three variables)
९. चलनकलनाभ्यां
१०. यावदूनम (Squaring, Cubing etc)
११. व्यष्टिसमष्टि
१२. शेषाण्यंकेन
१३. सोपान्त्यद्वयमन्तयं
१४. एकन्यूनेन पूर्वेण
१५. गुणितसमुच्चय:
१६. गुणकस्मुच्चय: (Factorization and Differential Calculus)

ऊपर दिये गये सूत्रों की मदद से हम Multiplication, Division, Partial Fractions, Square, Cube, Quadratic Equations, Simple equations, Cubic equations, factorization, H.C.F, Differential Calculus, Square root, Cube roots, Pythagoras Theorem, Analytical Conics व Apollonius' Theorem जैसे जटिल Topics से गुजरेंगे।

आशा है आपको यह प्रयास पसंद आयेगा। चूँकि मैं भी नया ही सीख रहा हूँ तो चूक होने पर क्षमा कीजियेगा। सहयोग मिलता रहा है तो हम मिलकर इस प्राचीन गणित को फिर से जीवित कर सकेंगे। आप भी बच्चों को ये "तेज़" गणित सिखायें।

three numbers wale words ka ans kaise niklega? 133*133?

Reply

pawan balsoriyaApril 7, 2015 at 5:31 PM
133*133
133 +33
133 +33
--------
166 1089 /33*33
17689

!!3!!

वैदिक गणित के पहले दो अंकों में हमने जाना कि कितनी सरलता से हम बड़े अंकों का गुणा (Multiply) कर सकते हैं। हमने उन Theorems की लिस्ट भी देखी जिनकी सहायता से हम बड़ी से बड़ी कैलकुलेशन भी सेकंड में कर सकेंगे। वेद ज्ञान का सागर है और इसी सागर की एक बूँद है वैदिक गणित। वैदिक गणित के सोलह सूत्रों को जानने की कोशिश जारी रहेगी।

आज इस अथाह सागर की एक बूँद से लेकर आये हैं Multiplication के ही कुछ Shortcuts. इसमें निखिलंसूत्र और ऊर्ध्वतिर्यग्भाम की सहायता से हम Shortcuts को समझेंगे।

निखिलंसूत्रं के कुछ टिप्स :

मान लीजिये आपने 7 का square निकालना है:

चूँकि 7 के लिये 10 को Base माना जायेगा अत: 10 में से 7 जितना कम होगा उसे 7 से उतना ही घटायेंगे.. उदाहरण से समझ आ जायेगा।

(7 - 3)/(3*3) = 4/9 = 49
6^2 = (6-4)/(4*4) = 2/16=(2+1)/6  = 36
8^2 = (8-2)/(2*2) = 6/4 = 64

12^2 = (12 + 2)/(2*2) = 14/4 = 144
14^2 = (14+4)/(4*4) = 18/16 = (18 + 1) / 6 = 196

इन सभी उदाहरणों में क्योंकि 10 को base माना गया है इसलिये "/" के दाईं और एक ही अंक आयेगा और दाईं संख्या में जो अंक दहाई का होगा यानि 10th place का होगा उसको बाईं संख्या में जोड़ दिया जाता है।

19^2 = (19 + 9 )/ (9 * 9 )= 28/81 = (28 + 8) /1 = 361

आगे जानते हैं एकादिकेन पूर्वेण की सहायता से 5 पर समाप्त होने वाली किसी भी संख्या का Square कैसे निकाला जाता है:
करना केवल इतना है कि "/" के बाद के अंक हमेशा 25 रहेंगे और इसके पहले के अंक के लिये 5 से पहले जो संख्या है उसमें एक जोड़ कर उसी संख्या से Multiply करना होगा।
15 के लिये 1 को 2 से और 65 के लिये 6 को 7 से।

15 ^ 2 = (1 * 2) / 25 = 225
25 ^ 2 = (2 * 3)/25 = 625
35 ^ 2 = (3 * 4) / 25 = 1225
75 ^ 2 = (7 * 8)/25 = 5625

135 ^ 2 = (13 * 14)/25 = 182/25 = 18225
195 ^ 2 = (19 * 20)/25 = 38025

इसी तरह हम उन संख्याओं को भी Multiply कर सकते हैं जिनके आखिरी के अंकों का जोड़ 10 बनता है और पहले का अंक बराब्रर है। जैसे:

27 * 23 | इसमें 7 + 3 = 10 और पहला अंक 2 ही है। इसलिये:
(2 * 3)/ (7 * 3) = 6 / 21 = 621

96 * 94 = (9 * 10)/(6 * 4) = 90/24 = 9024
98 * 92 = (9 * 10) / (8 * 2) = 9016
87 * 83 = (8 * 9) / (7 * 3) = 72/21 = 7221
114 * 116 = (11 * 12 )/ (4 * 6) = 132/24

ऊर्ध्वत्रियाक सूत्रं

10th place के दोनों अंकों को गुणा करें, (Top-Left * Right-Bottom) + (Bottom-Left * Top-Right) और दोनों संख्याओं के आखिरी अंकों को गुणा करें एवं कुछ इस प्रकार लिखें:

12
11
_________
1 : 1 + 2 : 2 = 1:3:2 = 132

21
14
____________
2 : 8 + 1 : 4  = 2 : 9 : 4 = 294

37
33
___________________

9 : 9 + 21 : 21 = 9  : 30 : 21
यहाँ हमें बीच चाली संख्या का 10th place का अंक सबसे पहली वाली संख्या में जोड़ना है और इसी तरह सबसे दाईं ओर वाली संख्या का अंक बीच वाले में जोड़ना है।
9 : 30 : 21 = 9 + 3 : 0 + 2 : 1 = 1221

73
76
___________________
49 : 42 + 21 : 18 = 49 : 63 : 18 = 56:4:8 = 5548

बड़ी संख्या के Multiplication का हल केवल चंद सेकंड में!!!

इसके पीछे की Algebraic Equation:
(ax^2 + bx + c) by (dx^2 + ex + f)

= adx^4 + (ae + bd)x^3 + (af + be + cd )x^2 + (bf + ce)x + cf for x = 10

109
111
_____________________________________
1 : 1 : 10 : 9 : 9 = 1 : 2 :0 :9 :9 = 12099

582
231
___________________________________
10 : 15 + 16 : 5 + 24 + 4 : 8 + 6 : 2
= 10 :31:33:14:2 = 13:4:4:4:2 = 134442

785
362
__________________________________________
21 : 42 + 24 : 14 + 48 + 15 : 16 + 30 : 10
= 21 : 66 : 77 :46 : 10 = 28:4:1:7:0 = 284170



वैदिक गणित के 16 सूत्र,उनके अर्थ ,प्रयोग और उदाहरण 
16 sutras of vedic mathematics for beginners

वैदिक गणित के 16 सूत्र,  शंकराचार्य स्वामी भारती कृष्ण तीर्थजी महाराज की कृति के बिखरे सन्दर्भों में से अलग किये गए हैं. जिस एक मात्र पुस्तक पर आधारित है वर्तमान में पढ़ा-पढ़ाया जाने वाला वैदिक गणित, उसी पुस्तक के अनुसार वैदिक गणित के 16 सूत्रों  और  13 उपसुत्रों के नाम,अर्थ,और इनके  प्रयोग किये वाले स्थान ,यहाँ पर दिए जा रहे हैं.

1.एकाधिकेन पूर्वेण
   
 अर्थ:  पूर्व वाले से एक अधिक 
 प्रयोग: आवर्ती दशमलव भिन्न[recurring decimal fraction],वर्ग ज्ञात करने में,आंशिक भिन्नों द्वारा समाकलन[integration by using partial fractions].
 उदाहरण: --वर्ग निकालने के लिए--(यहाँ केवल 5 से अंत होने वाली संख्याओं की बात की जा रही है)--
25 का वर्ग:यहाँ पूर्व का अंक(संख्या) है 2 .----->2 का एकाधिक है 3.
अब अंतिम हल है 2x3\25------->वर्गफल के दुसरे भाग में हमेशा 25 ही होगा.
इस तरह 25 का वर्ग=625.
35 का वर्ग=3x4\25=1225,
175 का वर्ग=17x18\25=30625,
995 का वर्ग=99x100\25=990025.इत्यादि.

2.निखिलं नवतः चरमं  दशतः

 अर्थ: सभी  9 में से, अंत वाला  10 में से
 प्रयोग: संख्याओं के गुणा और भाग में,रेखांक ज्ञात करने में.
 उदाहरण:--आधार(10,100,1000,10000,...) के प्रयोग से गुणा--                    9998x6543=        

  9998   -0002 ----->आधार 10000-9998* 
  6543   -3457-----> आधार 10000-6543**
-------------------
  6541  \ 6914 ------>6541=9998-3457 या 6543-2;6914=-2 x -3457
-------------------
 अतः 9998x6543=65416914 होगा.

सूत्र का प्रयोग कहाँ हुआ ?--->10000-6543= . यहाँ सभी अंकों को 9 से घटाएंगे और अंतिम/चरम अंक को 10 में से घटाएंगे. इस सूत्र के प्रयोग से मन में ही घटाकर सीधे लिखेंगे. 
*9998,10000 से 2 कम है इसलिए -2 लिखा गया.
**इसी प्रकार 6543,10000 से 3457 कम है इसलिए -3457 लिखा गया.
#अगर *,** में कम न हो करके अधिक होता तो ऋणात्मक चिन्ह नहीं लिखा जाता.

3.ऊर्ध्व-तिर्यग्भ्याम्[vertically and crosswise]:

 अर्थ: सीधा/ऊर्ध्वाधर और तिरछा/तिर्यक
 प्रयोग: संख्याओं के गुणा,बीजगणितीय[algebraic] गुणा ,साथ ही इनके भाग में भी,वर्गमूल ज्ञात करने में.
 उदाहरण:--सामान्य गुणा-- 124x235=

  2.1=2;  2.2+3.1=7;  2.4+3.2+5.1=19;  3.4+5.2=22;  5.4=20

बाएं से दायें----------------------------------------

दायें से बाएं----------------------------------------  
यहाँ 2;7;19;22;20 को दो तरह से लिखा गया है -
बाएं से दायें उत्तर पाने के लिए ध्वजांक को बाएं से उठाकर दायें में जोड़िये*.इसी तरह दायें से बाएं में ठीक विपरीत कार्य करना है.

*यदि दो अंक आ जाये तो दहाई अंक पहले वाले में जोड़ा जायेगा.
इस कारण से दायें से बाएं ,ज्यादा आसान लगता है अधिकतर लोगों को.

दोनों ओर से गुणनफल एक ही आएगा. 124x235=29140.

4.परावर्त्य योजयेत्[transpose and apply]:

 अर्थ: पक्षान्तरण तथा अनुप्रयोग
 प्रयोग: भाग करने में,जटिल समीकरणों को हल करने में.
 उदाहरण: --भाग--15324/123 जहाँ पर भाजक ,आधार 10,100,...के निकट ऊपर हो .
  

यहाँ Q=122 और R=13 है ,हम इसपर बाद में विस्तार से बात करेंगे.

5.शून्यं साम्यसमुच्चये

 अर्थ: जब समुच्चय एक समान है तब उस समुच्चय का मान शून्य होता है.
 सामान्य समीकरणों को आसानी से हल करने में अच्छा है यह सूत्र.
यहाँ समुच्चय के 6 अर्थ निकलते हैं.जिनके बारे में आगे बताया जायेगा.

प्रयोग: सरल समीकरणों को हल करने में.

उदाहरण: --समुच्चय के पहले अर्थ (सार्वगुणनखंड) का अनुप्रयोग--
 समी० 9(x+1)=5(x+1) को हल करने के लिए सीधे लिखेंगे x+1=0.         =>x=  -1
*9 और 5 का कोई प्रभाव नहीं है हल पर इसीलिए 9 से और 5 से गुणा करना और फिर जोड़-घटाव करने के बाद हल पाना उपयुक्त नहीं है.

6.(आनुरूप्ये) शून्यंमन्यत्

 अर्थ: प्रयोग में इसका अर्थ है -यदि एक अनुपात में है तो दूसरा शून्य है.

 प्रयोग:एक विशिस्ट प्रकार के युगपत[simultaneous] सरल समीकरण को हल करने में.
 उदाहरण:
                5x+6y=3
                10x+18y=6
 यहाँ x के गुणांकों का अनुपात तथा अचर पदों का अनुपात एक ही है--
5:10;  3:6.  इसलिए सूत्र से, दूसरा अर्थात y शून्य होगा.
इस तरह से x=3/5 होगा.

7.संकलन व्यवकलनाभ्याम्

अर्थ: जोड़ने तथा घटाने द्वारा
प्रयोग: वैसे युगपत समी० को हल करने में ,जिनमे x-गुणांक तथा y-गुणांक अदल-बदल कर दिए हों.

उदाहरण: 
             5x-3y=11
             3x-5y=5
संकलन(जोड़ने पर)--  8x-8y=16 =>8(x-y)=16 =>x-y=2
व्यवकलन(घटाने पर)--  2x+2y=6 =>2(x+y)=6 =>x+y=3

इसलिए x=5/2,y=1/2.

8.पूरणापूरणाभ्याम्

अर्थ: पूर्ण या अपूर्ण(बिना पूर्ण) करने से.

प्रयोग:वर्ग,घन,चतुर्घात इत्यादि को पूर्ण करके या किये बिना समीकरणों को हल करने में.
* पारंपरिक गणित में इसका प्रयोग पहले से ही किया जा रहा है(solution by completing square).

उदाहरण: द्विघात को पूर्ण करके हल करना--
x^2 +2x-8 = 0    =>x^2 +2.1.x+ 1^2 -8 -1^2 =0
                           =>x^2 +2x+1 -9=0
                           =>x^2 +2x+1 = 9
                           =>(x+1)^2=9  =>x+1 =3 या -3
इस प्रकार x = 2 या -4 होगा.

9.चलनकलनाभ्याम्

अर्थ:चलन-कलन की क्रियाओं द्वारा
प्रयोग: द्विघात समीकरणों को हल करने में. अन्य स्थानों में भी.
उदाहरण: x2 + 5x + 4 = 0 
 इसका विविक्त्कर D=5^2 - 4.1.4=25-16=9
  x2 + 5x + 4 का प्रथम अवकलज(first differential) होगा=2x+5
इस सूत्र के अनुसार 2x+5=(D का वर्गमूल) =>2x+5=+3 या 2x+5=-3
अतः x=-1 या -4 होगा.

10.यावदूनम

अर्थ: जितने का विचलन(कमी/अधिकता)है/जितना कम है.
प्रयोग:किसी संख्या का घन निकालने में.
उदाहरण: 103 का घन----यहाँ (आधार 100 से) विचलन +3 है.
घन निकालने के तीन चरण(step) हैं 1).जितना विचलन है उसका दुगुना विचलन और करो---  103+6=109   2).विचलन को विचलन के तिगुने से गुणा करो---  3x9=27   3).विचलन का घन =3^3=27
इस तरह 103 का घन है:-103^3 =109\27\27=1092727.

11.व्यष्टिसमष्टिः
अर्थ: इसका प्रायोगिक अर्थ हो सकता है--समष्टि(समूह) से व्यष्टि(एकल) में बदलकर.
प्रयोग: चतुर्घात समीकरणों--जिनके LHS में दो द्विपदों के चतुर्घातों का योग रहता है और RHS में कोई निश्चित संख्या होता है--के गुणनखंडन करने में.
उदाहरण: (x+7)^4 +(x+5)^4 =706 
 --दोनों द्विपदों के औसत, x+6 को y मान लेते हैं.
तब, (y+1)^4 +(y-1)^4 =706
 =>2y^4 +12y^2+2                                   --  [y^3 और y कट गए]
 =>y^4 +6y^2 -352 = 0 
 =>y^2 =16 या -22
और इस तरह y का मान ज्ञात किया जाता है.

*यह सूत्र कभी कभी इस तरह के सवालों के लिए भी लागु नहीं होता है.

12.शेषाण्यङ्केन चरमेण
अर्थ: अवशेष को अंतिम अंक के द्वारा.
प्रयोग: विशेष भाग/दशमलव भिन्न की क्रियाओं में.
उदाहरण: 1/7=  
 7 से 1 को भाग देने में,भजनफल(quotient) में दशमलव लिखने पर अब १ला भाज्य है 10---शेष=3
२.Q=4;R=2 ३.Q=2;R=6  ४.Q=8;R=4  ५.Q=5;R=5  

यहाँ शेष(अवशेष)है :1(सबसे पहले),3(पहले भाग से),2,6,4,5 ---इसके बाद फिर वही क्रम शुरू हो जायेगा.
उत्तर पाने के लिए इन अवशेषों को 7 से गुणा करेंगे और गुणनफल का अंतिम अंक लिखेंगे-
3x7=21 ---- 1  ---3 २रा अवशेष है----- सबसे पहले का अवशेष सबसे अंत में गुणा होगा.
2x7=14 ----  4
6x7=42 ----  2
4x7=28 ----  8
5x7=35 ----  5
1x7=7  ----   7  --------यहाँ 1 सबसे पहला अवशेष है.

इस तरह 1/7=0.142857

13.सोपान्त्यद्वयमन्त्यम्
अर्थ: अंतिम तथा उपान्तिम का दुगुना
प्रयोग: 1/A.B +1/A.C = 1/A.D +1/B.C के प्रकार के समीकरण हल करने में.(A,B,C,D समान्तर श्रेढ़ी में हैं).
उदाहरण: 

A=(x+2),B=(x+3),C=(x+4),D=(x+5) ---यहाँ अंतिम है (x+5) और उपान्तिम है (x+4)
 इसलिए (x+5) + 2(x+4)=0  => x = -13/3.

14.एकन्युनेन पूर्वेण

अर्थ: पूर्व वाले से एक कम द्वारा.
प्रयोग: उन संख्याओं के गुणन में प्रयुक्त होता है जिनके गुणक में सभी अंक 9 होते हैं.
उदाहरण: 783x999 = 
 यहाँ पूर्व 9 वाले को नहीं मानना है दूसरा वाला हमेशा ही पूर्व के रूप में माना जायेगा.
अब पूर्व का एकन्यून है -- 783-1=782
 इसलिये गुणनफल होगा--- 782\(999-782) =782217.

15.गुणितसमुच्चयः

 इस सूत्र तथा अगले सूत्र में समुच्चय का अलग अलग अर्थ है और उसके साथ गुणित या अगले सूत्र में गुणक लगा है.हम सूत्र का प्रायोगिक अर्थ देखेंगे.

अर्थ: गुणनखंडो के गुणांकों के योग का गुणनफल, गुणनफल के गुणांकों के योग के बरावर होता है(S' of the product=product of S' of the factors; where S'  stands for sum of co-efficients).
जैसे- 3x^2+5x+2=(x+1)(3x+2)
गुणनखंडों के गुणांको के योग का गुणनफल=(1+1)(3+2)=10
गुणनफल(3x^2+5x+2) के गुणांको का योग=3+5+2=10.

प्रयोग: गुणनखंडों और गुणांकों में संबंध स्थापित कर गुणनखंडन करने में.
उदाहरण: x^3 +6x^2 +11x+6 का गुणनखंडन----

हमें ज्ञात है कि (x+1) इसका एक गुणनखंड है. 'आद्यं आद्येन' के प्रयोग से (x+1)(x^2 +......+6); अब सूत्र के प्रयोग से---
(1+1)(1+......+6)=(1+6+11+6) अर्थात् रिक्त स्थान में 5 होना चाहिए.

इस प्रकार हम पाते हैं (x+1)(x^2 +5x +6)=(x+1)(x+2)(x+3).

16.गुणक समुच्चयः
अर्थ: यदि द्विघात व्यंजक दो द्विपदों (x+a) तथा (x+b) का गुणनफल है,तब इसका प्रथम अवकलन दोनों गुणनखण्डों का योग होता है आदि आदि*.(if and when a quadratic expression is the product of the binomials (x+a) and (x+b), its first differential is the sum of the said two factors and so on.)

--इसको (x+6)(x-5) लिख सकते है.  अगर इस द्विघात समी० का प्रथम अवकलन D1 हो तो,
 D1= गुणनखंडो का योग =>2x+1= (x+6) + (x-5).
*यह कार्य तो हमने चलन-कलन सूत्र से भी किया था किन्तु इस सूत्र से अधिक घात वाले व्यंजको का एक से अधिक कलन D2,D3 आदि के साथ भी कार्य किया जाता है.

प्रयोग: गुणनखंडन करने में और अवकल(differentiation) ज्ञात करने में.

 
वैदिक गणित

Monday, December 25, 2017
वैदिक गणित के 13 उपसुत्र-अर्थ,प्रयोग और उदाहरण 13 upsutras of vedic mathematics
पिछले post में हमने 16 सूत्रों पर चर्चा किया था अब हम 13 उपसुत्रों पर बात करेंगे .....

1.आनुरुप्येण

अर्थ :अनुपात से / अनुरूपता से
प्रयोग :संख्याओं के गुणा में, किसी संख्या का घन (cube) ज्ञात करने में; सरल द्विघाती समी०(simple quadratic eq.n) और सरल युगपत समी०(simultaneous eq.n )  हल करने में,  किसी संख्या को दो संख्याओं के वर्गों के योग या वर्गों के अंतर के रूप में व्यक्त करना.
उदाहरण:हम यहाँ किसी संख्या का घन --का उदाहरण दे रहे हैं.

12 का घन= 12^3=    

चरण 1.  हम 12 के अंकों को देखेंगे-- 1 और 2 का अनुपात 1:2 है.
चरण 2.  1 का घन (cube) लिखेंगे ---  1^3 =1
चरण 3.  अब अंकों का अनुपात 1:2* है इसलिए दुसरे चरण में प्राप्त संख्या को 2 से गुणा* कर लिखते जायेंगे (तीन बार)--- 1  2   4   8.

चरण 4.  बीच के दो संख्याओं का दुगुना कर उन्हीं के नीचे लिख देंगे--- 2 और 4 का दुगुना 4 और 8 है.

चरण 5.अब दायें से बाएं जोड़ना है---यदि जोड़ में एक से अधिक अंक आये तो उसे उसके बाएं वाले में जोड़ देना है,जैसे 8+4=12 का 2 लिखा गया और 1 को अगले में 2+4+1=7 कर दिया गया.

*यदि यह अनुपात 2:5  (=1:  5/2) होता तो पहले तो 2 का घन=2^3=8 लिखते फिर अन्य तीन के लिए 8 को 5/2 से गुणा करते=20, 20x 5/2=50,50x 5/2=125 लिखते. अगले चरण में बीच वाले का दुगुना--40 और 100.और अंत में जोड़ करने से 25 का घन मिलता. 
25^3 =

दायें से बाएं जोड़ने के क्रम में 8\60\150\125-- 8\60\150+12\5-- 8\60\162\5-- 8\60+16\2\5-- 8\76\2\5-- 8+7\6\2\5-- 15\6\2\5.

2.शिष्यते शेषसंज्ञः 

हमने इस सूत्र का अर्थ और प्रयोग खोजने का प्रयास किया,भारती कृष्ण तीर्थजी महाराज की (प्रकाशित हुई) कृति में इस सूत्र का आभाव है.internet में कई स्थानों पर 'शेष' के साथ अन्य बातें लिखी हुई है.वैसे श्रीमद् भागवत में इसके लिखे होने के संकेत हैं.हम निरंतर प्रयासरत हैं जिस भी क्षण हमें कुछ जानकारी मिलती है हम update कर देंगे.

3. आद्यं आद्येन् अन्त्यम् अन्त्येन

अर्थ: प्रथम को प्रथम के द्वारा और अंतिम को अंतिम के द्वारा.  
प्रयोग : इस उपसूत्र का 'आनुरुप्येण' और 'लोपनस्थापनाभ्यां' उपसुत्रों के साथ प्रयोग होता है.इसकी सहायता से द्विघात और त्रिघात व्यंजको का गुणनखंडन किया जाता है.
उदाहरण: 'आनुरुप्येण' के साथ इसका प्रयोग--  द्विघात व्यंजक का       गुणनखण्डन ---चरण1(step 1).--

 इसका गुणनखंडन के लिए बीच वाले गुणांक अर्थात 13 को दो भागों में बांटना है जिससे की आदि के गुणांक का आदि भाग से और अंत के भाग का अंत के गुणांक से  आनुरुप्य हो. 13का दो भाग है-- 18;-5.  3:18 बराबर है -5: -30 ;दोनों अनुपात बराबर हैं तब----

चरण 2.   3:18 (या -5: -30) का सरलतम रूप है-- 1:6  इसलिए (x + 6) होगा पहला गुणनखंड.
चरण 3.   3x^2  को x से भाग दें और -30 को 6 से भाग दें-- 3x और -5 आया, इस तरह दूसरा गुणनखंड होगा (3x-5)
  अतः गुणनखंडन है (x+6)(3x-5).

4.केवलैः सप्तकं गुण्यात्

अर्थ :  यह सूत्र वास्तव में संख्यात्मक कूट (numeric code)है, जो कहता है 7 के केस में गुणक 143 होगा.
प्रयोग: इस तरह के और भी कूट हैं--1.'कलौ क्षुद्रससैः' तथा 2.'कंसे क्षामदाहखलैर्मलैः'. इनका प्रयोग भिन्न को दशमलव में बदलने के लिए किया जाता है.
उदाहरण: 
 1/7 =          इसके लिए, 999 x 143=142857

इस तरह 1/7=0.142857  
 इस संख्या में 1, 2, 4, 5, 7, 8 बढ़ते क्रम में हैं.
1/7 के दशमलव प्रसार को पलटने पर----2 के स्थान से बढते हुए --

2/7=0.285714  ;3/7=0.428571--इसके लिए 4 के स्थान से बढ़ते हुए.
4/7=0.571428;  5/7=0.714285;  6/7=0.857142.

5.वेष्टनम्

अर्थ: आश्लेषण करके(by osculation) /आश्लेषक के द्वारा 
प्रयोग:दो तरह के आश्लेषक (osculator)  होते हैं-धनात्मक और ऋणात्मक. इस  सूत्र का प्रयोग किसी संख्या की किसी संख्या से  विभाज्यता जाँच करने में किया जाता है.
उदाहरण:  धनात्मक आश्लेषक के प्रयोग से जाँच करना है कि 5293240096, 139 से विभाज्य है या नहीं .

*आश्लेषण होता क्या है?-- यदि 5 आश्लेषक हो तो 28 का आश्लेषण होगा -- 2+8x5=42; 14 का होगा 1+4x5=21; 21का होगा 2+1x5=7.

अब, 139 का आश्लेषक होगा --  14
5293240096 का 14 से आश्लेषण करेंगे.---  529324009+6x14=529324093;  52932409+3x14=52932451; 5293245+1x14=5293259; 529325+9x14=529451; 52945+1x14=52959; 5295+9x14=5421; 542+1x14=556; 55+6x14=139.  अतः दिया गया संख्या 139 से विभाज्य है(प्रत्येक आश्लेषण से प्राप्त संख्याएँ भी 139 से विभाज्य होगा) .

6.यावदूनं तावदूनम्

अर्थ:जितने की कमी है उतनी और कमी करें.
प्रयोग: यह यावदूनं* सूत्र के समतुल्य है या दोनों एक ही हैं.इसका प्रयोग वही होना चाहिए जो यावदूनं का है.--किसी संख्या का घन ज्ञात करना,किसी संख्या  का चतुर्घात ज्ञात करना.

*16 सूत्रों की सूची देखें.

7.यावदूनं तावदूनीकृत्य वर्गं च योजयेत्

अर्थ:संख्या की आधार से जितनी भी कमी हो उतनी कमी और करें,  और उसी कमी (या विचलन)का वर्ग भी रखें.
प्रयोग:इस उपसुत्र का प्रयोग किसी संख्या का वर्ग ज्ञात करने में होता है.

उदाहरण: 91का वर्ग =91^2=
 यहाँ आधार 100 से 9 की कमी* है,इतनी और कमी करने पर 91-9=82.
फिर कमी का वर्ग =9^2=81.
इस तरह 91^2=8281.

*यदि कमी के स्थान पर आधार से अधिकता होता तो,जितने की अधिकता है उतना और अधिक कर दें.और अधिकता का वर्ग भी रखें. 

जैसे-13 का वर्ग=13^2= 
  यहाँ आधार 10 से तीन की अधिकता है,इतना और अधिक करने पर 13+3=16 और 3 का वर्ग =3^2=9 अतः 13^2=169.

**ध्यान देने की आवश्यकता है -- जब आधार 100 है तब विचलन का वर्ग करने पर दो अंक होने चाहिए,यदि नहीं है तो 0 लगाकर लिखेंगे.और जब आधार 10 है तो एक ही अंक होने चाहिए यदि एक से अधिक अंक आ जाता  है तो दहाई का अंक पहले वाले में जोड़ दें. आधार 1000 हुआ तो--तीन अंक.

8.अन्त्ययोर्दशकेऽपी

अर्थ: पूर्व के अंक एक समान हों और अंतिम अंक का योग भी 10* हो.
प्रयोग:इस सूत्र का एक विशेष प्रयोग है गुणा के लिए,और 5 से अंत होने वाली संख्याओं के वर्ग के लिए.

उदाहरण:64x66=    
इस में (पूर्व) 6 दोनों में है, और 4+6=10 होता है, इसलिए यह सूत्र यहाँ लागू होता है.
पूर्व का एकाधिक लिखें-- 6 का एकाधिक 7 होगा.
6x7\4x6=42\24   इस तरह 64x66=4224

73x77 =7x8\3x7 =56\21 =5621
122x128 =12x13\2x8 =15616

*यदि अंत के संख्या का योग 10 न होकर 100,या 1000, या 100..0.. हो तब भी यह सूत्र लागू होगा. और पूर्व में एक से अधिक अंक भी एक समान हो सकते हैं(122x128). जैसे - 398x302= 3x4\98x2=12\196 =12\0196 =120196. 
*#उत्तर के दायें पक्ष में, आधार में जितने 0 हैं उसके दोगुना अंक होंते हैं. आधार 10--अंक दो;आधार 100--अंक 4 ;आधार 1000--अंक 6...... .

9. अन्त्ययोरेव

अर्थ: केवल अंतिम (स्वतंत्र) पद द्वारा ;by constant term only.
प्रयोग:एक विशिस्ट प्रकार के समीकरण को हल करने में.

 उदाहरण: इस नीचे लिखे हुए समीकरण में-------------------------------------------> 

बाएं तरफ अचर पद (constant term) को छोड़ दें तो 3x^2+5x और 5x^2+6x उसी अनुपात में हैं जिसमे कि 3x+5 और 5x+6 हैं.

 ऐसी स्तिथि में, यह सूत्र कहता है कि -------------------> 

अतः 4x=12  या x=3.

10.समुच्चयगुणितः

 यह सूत्र 'गुणित समुच्चयः ' से भिन्न नहीं है ऐसा प्रतीत होता है.और यदि दोनों में भिन्नता है तो वर्तमान में स्वामी जी की प्रकाशित हुई कृति में उपलब्ध नहीं है.

11.लोपनस्थापनाभ्याम्

अर्थ: (एकांतर से) लोपन और स्थापना द्वारा.
प्रयोग: कठिन द्विघाती व्यंजकों का गुणनखंडन करने में,व्यंजकों का HCF ज्ञात करने में,घन समीकरणों को हल करने में, और बहु युगपत समीकरणों को हल करने में.

उदाहरण:  कठिन द्विघाती व्यंजकों का गुणनखंडन----
इस व्यंजक को हल करने के लिए लोपन और स्थापन करना है (आद्यं.. सूत्र का भी प्रयोग है).

1.)पहले z का लोपन[z=0] और x , y का स्थापन------
 अब जो द्विघात व्यंजक प्राप्त हुआ उसका गुणनखंडन(आद्यं सूत्र से) करेंगे -->  (x+2y)(2x+3y)
 2.)फिर y का लोपन[y=0]और x ,z का स्थापन-------

 फिर से जो व्यंजक प्राप्त हुआ है उसका गुणनखंडन करेंगे- (x+3z)(2x+z)

(x+2y),(x+3z),(2x+3y),(2x+z) इनसे दो पद बनते हैं--
    (x+2y+3z) ; (2x+3y+z)
अतः हमारा गुणनखंड है : (x+2y+3z)(2x+3y+z)

**कभी कभी ये दो पद आसानी से नहीं बनते हैं तब तीनो का लोपन करना पड़ेगा.

12.विलोकनम्

अर्थ: अवलोकन द्वारा (by mere observation)
प्रयोग: सामान्य द्विघात समीकरणों को हल करना,युगपत द्विघात समीकरणों को हल करना, भाग की क्रिया में.
 उदाहरण:   सामान्य द्विघात समी०----  x+ 1/x=  17/4
     विलोकनम सूत्र अवलोकन करने को कहता है जैसे यहाँ  x का मन 4 रखने पर 17/4 मिल जायेगा अतः x=4 होगा इसके लिए और अधिक कुछ नहीं करना है.

13. गुणितसमुच्चयः समुच्चयगुणितः 
अर्थ:गुणनखंडों के गुणांकों के योग का गुणनफल, गुणनफल के गुणांकों के योग के बराबर होता है.
**यही अर्थ गुणित समुच्चयः  के लिए भी लिखा गया है.इन दोनों सूत्रों का कोई अलग उपयोग नहीं दिखता है अपितु दोनों सूत्र एक ही हैं या हम इसमें समुच्चयगुणितः को भी ले लें तो भी गलत नहीं होगा.  अगर कोई त्रुटी आपको दिखती है तो सूचित करें. हम बेहतर को और बेहतर बनाने के प्रयास में लगे हुए हैं.

Ekadhikena Purvena (एकाधिकेन पूर्वेण)

The Sutra means: “By one more than the previous one”.

पहले से एक अधिक के द्वारा।

1. This sutra is useful to the ‘squaring of numbers ending in 5’.

Example: 252.

For the number 25, the last digit is 5 and the 'previous' digit is 2. According to formula 'One more than the previous one', that is, 2+1=3. The Sutra gives the procedure 'to multiply the previous digit 2 (by one more than itself) by 3. It becomes the L.H.S (left hand side) of the result, that is, 2 X 3 = 6. The R.H.S (right hand side) of the result is 52, that is, 25.

252 = 2 X 3 / 25 = 6/25=625.

152 = 1 X (1+1) /25 =225;

952 = 9 X 10/25 = 9025;

1352 = 13 X 14/25 = 18225;

 

2. Vulgar fractions whose denominators are numbers ending in Nine

We take examples of 1 / a9, where a = 1, 2………… In the conversion of vulgar fractions into recurring decimals, Ekadhika process can be effectively used both in division and multiplication.

 

Division Method:  Value of 1 / 19.

The numbers of decimal places before repetition is the difference of numerator and denominator, 19 -1=18 places. For the denominator 19, the purva (previous) is 1. Hence Ekadhikena purva (one more than the previous) is 1 + 1 = 2.

1.      0.10 (Divide numerator 1 by 20, 0 times, 1 remainder)

2.      0.005 (Divide 10 by 2, 5 times, No remainder)

3.      0.0512 (Divide 5 by 2, 2 times, 1 remainder)

4.      0.0526 (Divide 12 or12 by 2, 6 times, No remainder)

5.      0.05263 (Divide 6 by 2, 3 times, No remainder)

6.      0.0526311(Divide 3 by 2, 1 time, 1 remainder)

7.      0.05263115 (Divide 11 or 11 by 25 times, 1 remainder)

8.      0.052631517 (Divide 15 or 15 by 2, 7 times, 1 remainder)

9.      0.0526315718 (Divide 17 or 17 by 2, 8 times, 1 remainder)

10.       0.0526315789 (Divide 18 or 18 by 2, 9 times, No remainder)

11.       0.052631578914 (Divide 9 by 2, 4 times, 1 remainder)

12.       0.052631578947 (Divide 14 or 14 by 2, 7 times, No remainder)

13.       0.05263157894713 (Divide 7 by 2, 3 times, 1 remainder)

14.       0.052631578947316 (Divide 13 or 13 by 2, 6 times, 1 remainder)

15.       0.052631578947368 (Divide 16 or 16 by 2, 8 times, No remainder)

16.       0.0526315789473684 (Divide 8 by 2, 4 times, No remainder)

17.       0.05263157894736842 (Divide 4 by 2, 2 times, No remainder)

18.       0.052631578947368421 (Divide 2 by 2, 1 time, No remainder)

(1/19)=0.052631578947368421

Multiplication Method: Value of 1 / 19

For 1 / 19, 'previous' of 19 is 1. And one more than of it, is 1 + 1 = 2. Therefore 2 is the multiplier for the conversion. We write the last digit in the numerator (अंश) as 1 and follow the steps leftwards.

1.      1

2.      21(multiply 1 by 2, put to left)

3.      421(multiply 2 by 2, put to left)

4.      8421(multiply 4 by 2, put to left)

5.      168421 (multiply 8 by 2=16, 1 carried over, 6 put to left)

6.      1368421 (6 X 2 =12, +1 = 13, 1 carried over, 3 put to left)

7.      7368421 (3 X 2, = 6 +1 = 7, put to left)

8.      147368421 (7 X 2 =14, 1 carried over, 4 put to left)

9.      947368421 (4 X 2, = 8, +1 = 9, put to left)

10.       18947368421(9 X 2 =18, 1 carried over, 8 put to left)

11.       178947368421(8 X 2 =16,+1=17, 1 carried over, 7 put to left)

12.       1578947368421(7 X 2 =14,+1=15, 1 carried over, 5 put to left)

13.       11578947368421(5 X 2 =10,+1=11,1 carried over, 1 put to left)

14.       31578947368421(1 X 2 =2,+1=3, 3 put to left)

15.       631578947368421(3 X 2 =6, 6 put to left)

16.       12631578947368421(6 X 2 =12, 1 carried over, 2 put to left)

17.       52631578947368421(2 X 2 =4,+1=5, 5 put to left)

18.       1052631578947368421(5 X 2 =10, 1 carried over, 0 put to left)

Now from step 18 onwards the same numbers and order towards left continue.

Thus 1 / 19 = 0.052631578947368421

 

Example: Value of 1 / 7.

1/7 में हर के अंक को 9 बनाने के लिए हर और अंश में 7 से गुणा करते हैं।

(1/7 = 7/49); हर के 49 का पूर्वेण हैं, 4; जिसका एकाधिक 5 हैं। भिन्न के आवृति दशमलव स्वरूप का अन्तिम अंक 7 होगा तथा 7-1 = 6 अंकों के पश्चात् दशमलव अंकों की पुनरावृति होगी।

1.      7

2.      357 (multiply 7 by 5 =35, 3 carried over, 5 put to left)

3.      2857 (5 X 5 =25, +3 = 28, 2 carried over, 8 put to left)

4.      42857 (8 X 5 =40, +2 = 42, 4 carried over, 2 put to left)

5.      142857 (2 X 5 =10, +4 = 14, 1 carried over, 4 put to left)

6.      2142857 (4 X 5 =20, +1 = 21, 2 carried over, 1 put to left)

Nikhilam Navatas’charamam Dasatah (निखिलम् नवतश्चरमं दशतः)

The formula simply means: “all from 9 and the last from 10”

सभी नौ में से परन्तु अन्तिम दस में से।
*1*
 

Example: 1000 - 368 = 632

We subtract each figure of 368 from 9 and the last figure from 10.

हम संख्या 368 के सभी अंकों को 9 में से तथा अन्तिम अंक 8 को 10 में से घटाते हैं।

The formula can be very effectively applied in multiplication of numbers, which are nearer to bases 10, 100, 1000 or to the powers of 10 (for example: 96 x 98 or 102 x 104).

जब दो संख्याएँ आधार 10 , 100 या 10 की धात के निकट हो तो उनका गुणनफल सूत्र निखिलम् द्वारा ज्ञात किया जाता हैं।

i.     When both the numbers are lower than the base.

Find 92 X 86. Here base is 100. Now follow the rules, 92 is 8 less than base 100. And 86 is 14 less than the same base 100. Hence 8 and 14 are called deviations from the base.
*2*

 

ii.   When both the numbers are higher than the base.

Here the deviation is positive as the numbers are higher then base.

*3*

 

We consider 03x07=21. This is done because, we need to consider two digits in deviation as it the base 100 has two zeros. If the deviation is near 1000 then we need to consider 3 digits in the deviation (e.g., 004 and not just 4).

 

iii. One number is more and the other is less than the base.

In this situation one deviation is positive and the other is negative. So the product of deviations becomes negative. So the right hand side of the answer obtained will therefore have to be subtracted.
*4*
 

12/ (-8) =112 how?

12/ (-8) should be read as 'one two, eight bar'. Here 'one' and ' two ' are in normal form. ‘Eight' is in complement form (परम मित्र रुप में). So, when we bring a carry from normal form to complement form, '12' becomes '11' and 'eight bar' becomes '2'( complement of 8). Hence 12/ (-8) =112.

Anurupyena (आनुरूप्येण)

The upa-Sutra 'Anurupyena' means 'proportionality' or 'similarly'.

अनुपातों से।

इस सूत्र के उपयोग से आनुपातिक गुणन या भाग किया जाता हैं। जब संख्याऐं सैद्धान्तिक आधार 100 से काफी दूर हो तो क्रियात्मक आधार उपयोग में लाया जाता हैं।

This Sutra is highly useful to find products of two numbers when both of them are near the Common bases like 50, 100 etc (multiples of powers of 10).

 

Example: 47 X 42

As per the previous methods, if we select 100 as base we get

47     -53

42     -58

This is much more difficult. Now by ‘Anurupyena’ we take a different working base through we can solve the problem. Take the nearest higher multiple of 10. In this case it is 50.

Treat it as 100 / 2 = 50.

1.      We choose the working base. Working base is 100 / 2 = 50

2.      Write the numbers one below the other

47

42

__

3.      Write the differences from 50 against each number on right side

47     -03

42     -08

________

4.      Write cross-subtraction or cross- addition as the case may be under the line drawn. Multiply the differences and write the product in the left side of the answer.

*1*

5.      Since base is 100 / 2 = 50, 39 in the answer represent 39X50.

Hence divide 39 by 2 (because 50 = 100 / 2). Thus 39 ÷ 2 gives 19½ where 19 is quotient and ½ is remainder. This ½, as Reminder gives 50; making the L.H.S of the answer, 24 + 50 = 74 or (½ x 100 + 28) i.e. R.H.S. 19 and L.H.S. 74 together give the answer 1974.



Adyamadyena-Antyamantyena (आद्यमाद्येन अन्त्यमन्त्येन)

The Sutra “Adyamadyena-Antyamantyena” means “the first by the first and the last by the last”.

प्रथम को प्रथम के द्वारा तथा अन्तिम को अन्तिम के द्वारा।

Area of rectangle:

Example:

Find out the area of a rectangle whose length and breadth are respectively 5 ft.2 inches and 4 ft.5 inches.

Generally we continue the problem like this.

Area    = Length X Breadth

= 5’ 2" X 4’ 5"               (Since 1’ = 12")

= (5 X 12 + 2) (4 X 12 + 5) conversion in to single unit

= 62" X 53" = 3286 Sq. inches.

Since 1 sq. ft. =12 X 12 = 144 sq.inches

We have area

3286 /144 = Quotient is 22 and Remainder is 118.

Area of rectangle is 22 Sq. ft 118 Sq. inches.

Mental argumentation:

It is interesting to know the mental argumentation. It goes in his mind like this

    5’     2"

    4’     5"

First by first: 5’ X 4’ = 20 sq. ft.

Last by last: 2" X 5" = 10 sq. in.

Now cross wise 5 X 5 + 4 x 2 = 25 +8 = 33.

Adjust units  to left as  33 = 2 X 12 +9 , 2 twelve's as 2 square feet make the first 20+2 = 22 sq. ft ; 9 left becomes 9 x 12 square inches and go towards right  9 x 12 = 108 sq. in. gives 108+10= 118 sq.inch.

We got area in some sort of 22 sq ft and 128 sq. inches.

By Vedic principles "the first by first and the last by last"

5’ 2" can be treated as 5a + 2 and 4’ 5" as 4a + 5,

Where a= 1ft. = 12 inch and a2 = 1 sq. ft = 144 sq. inch.

= (5a + 2) (4a + 5)

= 20a2 + 25a + 8a + 10

= 20a2 + 33a + 10

= 20a2 + (24a+9a) + 10

= 20a2+ (2a+9) a + 10     writing 33 = 2X12 +9

= 22a2+ 9a + 10

= 22 sq. ft. + 9X12 sq. inch + 10 sq. inches

= 22 sq. ft. + 108 sq. inch + 10 sq. inches

= 22 sq. ft. + 118 sq. inch

 

Factorization of quadratics:

By Vedic process two sub-sutras are used to factorizing a quadratic.

(a) Anurupyena   (b) Adyamadyena-Antyamantyena

The usual procedure of factorizing a quadratic is as follows:

= 2 a2 + 9a + 10

= 2 a2 + 4a + 5a + 10

= 2a (a + 2) + 5 (a + 2)

= (a + 2) (2a + 5)

But by mental process, we can get the result immediately. The steps are as follows.

1.      Split the middle coefficient in to two such parts that the ratio of the first coefficient to the first part is the same as the ratio of the second part to the last coefficient. Thus we split the coefficient of middle term of 2 a2 + 9a + 10 i.e. 9 in to two such parts 4 and 5 such that the ratio of the first coefficient to the first part of the middle coefficient i.e. 2:4 and the ratio of the second pat to the last coefficient, i.e. 5: 10 are the same. It is clear that 2:4 = 5:10. Hence such split is valid. Now the ratio 2: 4 = 5: 10 = 1:2 give one factor (a+2). 

2.      Second factor is obtained by dividing the first coefficient of the quadratic by the first coefficient of the factor already found and the last coefficient of the quadratic by the last coefficient of the factor. i.e. the second factor is
*1*

2 a2 + 9a + 10 = (a + 2) (2a + 5)

Sankalana – Vyavakalanabhyam (संकलन-व्यवकलनाभ्याम्)

This Sutra means:  by addition and by subtraction.

जोड़ने और घटाने के द्वारा।

This sutra is widely used in solving a simultaneous equation where the coefficients of algebraic value are found interchanged.

 

Example:

84a + 41b = 166                                                                                           (1)

41a + 84b = 209                                                                                           (2)

With the help of Sankalana – vyavakalanabhyam

Add equation (1) and (2)

125a + 125b = 375

125 (a + b) = 375

a + b =3                                                                                                          (3)

Subtract equation (1) from (2)

43a - 43b = -43

43 (a – b) = -43

a – b = -1                                                                                                        (4)

Adding equation (3) and (4)

2a = 2

a = 1

Subtracting equation (3) from (4)

2b = 4

b = 4 /2

b = 2

Hence a = 1 and b = 2

 

Example:

7a + 3b = 13                                                                                                  (1)

3a + 7b = 17                                                                                                  (2)

समीकरण (1) व (2) को  जोड़ने पर

10a + 10b = 30

a + b =3                                                                                                          (3)

समीकरण (1) व (2) को  घटाने पर

4a - 4b = -4

a – b = -1                                                                                                        (4)

समीकरण (3) व (4) को  जोड़ने पर

2a = 2     

a =1                                                                                                                (3)

समीकरण (3) व (4) को  घटाने पर

2b = 4

b = 2

अतः a = 1 and b = 2


Yavdunam Taavdunikritya Vargancha Yojayet (यावदूनम् तावदूनीकृत्य बर्ग च योजयेत)

This sutra means “What ever the deficiency subtract that deficit from the number and write along side the square of that deficit.”

संख्या की आधार से जितनी न्यूनता हो उसमे उतनी न्यूनता और करके उसी न्यूनता का वर्ग भी रखे।

This sutra is used to calculate squares of numbers near (lesser) to powers of 10

Example:  982

1.      The nearest power of 10 to 98 is 100.

2.      We take 100 as our base.

3.      Since 98 is 2 less than 100, hence deficiency is 2.

4.      We decrease the number by an amount equal to the deficiency which is (98 -2) = 96. This is the left side of our answer.

5.      On the right hand side put the square of the deficiency. That is square of 2 = 04.

6.      Hence the answer is 9604.

While calculating step 5, the number of digits in the squared number (04) should be equal to number of zeroes in the base (100). Hence in our case, the base 100 has 2 zeros and hence square of 2 is 04 and not just 4.

Example: 962.

1.    96, 100 के पास हैं।

2.    अतः आधार 100 लेते हैं।

3.    आधार से न्यूनता = 4

4.    96 में से 4 घटाते हैं। (96 - 4 ) = 92 जो उत्तर का बायाँ भाग होगा।

5.    4 का वर्ग करते हैं, 42 = 16 ( 2 digits) जो उत्तर का दायाँ भाग होगा।

6.    पद 4 तथा 5 के परीणाम को साथ में रखने पर 962 = 9216 प्राप्त होता हैं।


Yavadadhikam Taavadhikikritya Vargancha Yojayet (यावद्धिकम् तावद्धिकृत्य वर्ग च योजयेत)

This sutra means “whatever the extent of its surplus, increment it to that very extent; write along side the square of that extent.”

संख्या की आधार से जितनी अधिकता हो उसमें उतनी अधिकता और करके उसी अधिकता का वर्ग भी रखें।

This sutra is very useful in calculating the squares of numbers nearer (greater) to powers of 10.

इस सूत्र का उपयोग उन संख्याओं का वर्ग ज्ञात करने में किया जाता हैं, जो 10 की घात से थोड़ी बड़ी हो।

 

Example: 1092

1.      109, 100 के पास हैं।

2.      हम आधार 100 लेते हैं।

3.      आधार से अधिकता = 9

4.      109 में 9 जोड़ते हैं, (109+9 ) = 118 जो उत्तर का बायाँ भाग होगा।

5.      अब 9 का वर्ग करते हैं, 92 = 81, जो उत्तर का दायाँ भाग होगा।

6.      उत्तर के दायें भाग में उतने ही अंक रखते हैं, जितने आधार में शून्य हो। यदि अंक कम या अधिक हो तो उन्हें समायोजित करते हैं।

7.      पद 4 तथा 5 के परीणाम को साथ में रखने पर 1092 = 11881 प्राप्त होता हैं।

 

Example: 1042

1.      The nearest power of 10 to 104 is 100.

2.      We take 100 as our base.

3.      Since 104 is 4 more than 100, hence surplus is 2.

4.      We increase the number by an amount equal to the surplus which is (104 +4) = 108. This is the left side of our answer.

5.      On the right hand side put the square of the surplus. That is square of 4 = 16.

6.      Hence the answer is 10816.


Antyayor Dasakepi (अन्त्ययोर्दशकेऽपि)

The Sutra means - numbers of which the last digits added up give 10.

अन्तिम अंकों का योग 10 वाली संख्याओं के लिए।

जिन अंकों के चरम (अन्तिम) अंकों का योग 10 या 10 की घात हो तथा शेष निखिलम् अंक समान हो, उनकी गुणन संक्रिया इस विधि द्वारा की जाती हैं।

15 and 15, 1 is common and 5 + 5 = 10

57 and 53, 5 is common and 7 + 3 = 10

82 and 88, 8 is common and 2 + 8 = 10

126 and 124, 12 is common and 6 + 4 = 10

425 and 475, 4 is common and 25 + 75 = 100

 

Example: 32 X 38

32 X 38

= 3 x 4 / 2 x 8

= 12 /16

= 1216

1.      Sum of last digits is 2+8 =10,

2.      Remaining digits =3 are same in both numbers.

3.      RHS 2x8 =16,

4.      LHS 3 x (3+1) =12

 

Example: 83 X 87

83 X 87

= 8 x 9 / 3 x 7

= 72 /21

= 7221

1.      चरमं अंकों का योग = 3+7 =10,

2.      शेष निखिलम् अंक समान =8

3.      दायाँ पक्ष = 3 x 7 =21,

4.      बायाँ पक्ष = 8 x (8+1) =72


Lopana Sthapanabhyam (लोपनस्थापनाभ्याम्)

The sutra means 'by alternate elimination and retention’.

विलोपन तथा स्थापना से।

This sutra is used to factorizing a quadratic equation of type ax2+by2+cz2+dxy+eyz+fzx. It is a homogeneous equation of second degree with three variables x, y, z.

इस सूत्र का उपयोग द्विघात समीकरण के गुणनखण्ड़ करने में किया जाता हैं।

Example: 3a2 + 6b2+ c2 +11ab + 5bc + 4ac

1.    सर्वप्रथम c=0; रखकर c को विलोपित करते हैं, तथा आद्यमाद्येन अन्त्यमन्त्येन सूत्र की सहायता से गुणनखण्ड़ करते हैं।

3a2 +11ab + 6b2

= 3a2 +9ab +2ab + 6b2

= (3a + 2b) (a + 3b)      

2.    अब b=0; रखकर b को विलोपित करते हैं, तथा आद्यमाद्येन अन्त्यमन्त्येन सूत्र की सहायता से गुणनखण्ड़ करते हैं।

3a2 + 4ac + c2

= 3a2 +3ac + ac + c2

= (3a + c) (a + c)   

3.    इन दो गुणनखण्ड़ समूह की सहायता से विलोपन के कारण आई रिक्तियों की पूर्ति करते हैं।

= (3a + 2b +c) (a + 3b +c)

 

Example: 2a2 + 6b2+ c2 +7ab + 5bc + 3ac

1.      Eliminate c and retain a, b; factorize

2a2 + 7ab + 6b2 = (2a + 3b) (a + 2b)

2.      Eliminate b and retain a, c; factorize

2a2 + 3ac + c2 = (2a + c) (a + c)

3.      Fill the gaps, the given expression

= (2a + 3b + c) (a + 2b + c)


Gunita Samuccayah - Samuccaya Gunitah (गुणितसमुच्चयः समुच्चयगुणितः)

The product of the sum of the coefficients in the factors is equal to the sum of the coefficients in the product (i.e., the product of the sum is the sum of the products).

गुणनखण्ड़ों की गुणन संख्याओं के योग का गुणनफल, गुणनफल की गुणन संख्याओं के योग के समान होता हैं।

This sutra is useful for the factorization of quadratic expressions.

Example: (2a + 1) (3a + 5) = 6a2 + 13a + 5

Here:  (2 + 1) (3 + 5) = (6 + 13 + 5)

= 24: Thus verified.

Example: (x + 5) (x + 7) (x - 2) = x3 + 10x2 + 11x – 70

(1 + 5) (1 + 7) (1 - 2) = 1 + 10 + 11 – 70

6 x 8 x -1 = 22 – 70

– 48 = – 48 Verified


Paravartya-yojayet (परावर्त्य योजयेत्)

‘Paravartya – Yojayet’ means 'transpose and apply'

चिन्ह परिवर्तित कीजिये तथा संक्रिया प्रारम्भ कीजिये।

 

Simple division of algebra

Example: Divide (a3 – 3a2 + 10a – 4) by (a – 5)

1.    (a3 / a) gives a2, 1 the first coefficient in the Quotient.

2.    Multiply 1 by + 5, (obtained after reversing the sign of second term in the Quotient) and add to the next coefficient in the dividend. It gives 1 X (+5) = +5, adding to the next coefficient, i.e., –3 + 5 = 2, this is second coefficient in Quotient.

3.    Multiply 2 by +5, i.e., 2 X +5 =10, add to the next coefficient 10 + 10 = 20. This is third coefficient in Quotient.

4.     Thus Quotient is a2 + 2a + 20

5.    Now multiply 20 by + 5 =100. Add to the next (last) term, 100 + (-4) = 96, which becomes R, i.e., R =96.

 

Example: Divide (2a5 + a3 – 3a + 7) by (a3 + 2a – 3)

We treat the dividend as (2a5 + 0a4 + 1a3+ 0a2 – 3a + 7) and divisor as (a3 + 0a2 + 2a - 3).

क्रियाविधिः

1.    भाजक के प्रथम पद को छोड़कर शेष पदों के गुणकों के चिन्ह बदलकर परावर्तित अंक प्राप्त करते हैं, जो क्रमशः 0, -2, +3 हैं।

2.    2a5 में a3 का भाग देने पर 2a2 आता हैं, अतः भागफल का प्रथम गुणक =2;

3.    भागफल का प्रथम गुणक अंक (2) X परावर्तित अंक (0) = 0, मध्य खण्ड़ के +0a4 के नीचे 0 लिखते हैं, (2) X (-2) = -4, मध्य खण्ड़ के +1a3 के नीचे -4 लिखते हैं, तथा (2) X (+3) = +6, तृतीय खण्ड़ के +0a2 के नीचे +6 लिखते हैं।

4.    भाजक के द्वितीय पद का योग = 0 + 0 = 0, अतः भागफल का दूसरा गुणक = 0;

5.    भागफल का दूसरा गुणक अंक (0) X परावर्तित अंक  (0) = 0, मध्य खण्ड़ के +1a3 के नीचे 0 लिखते हैं, (0) X (-2) = 0, तृतीय खण्ड़ के 0a2 के नीचे 0 लिखते हैं, तथा (0) X (+3) = 0, तृतीय खणड़ के -3a के नीचे 0 लिखते हैं।

6.    योग = 1 - 4 + 0 = -3, अतः भागफल का तीसरा गुणक = -3;

7.    भागफल का तीसरा गुणक अंक (-3) X परावर्तित अंक  (0) = 0, तृतीय खण्ड़ के 0a2 के नीचे 0 लिखते हैं, (-3) X (-2) = +6, तृतीय खण्ड़ के -3a के नीचे +6 लिखते हैं, तथा (-3) X (-3) = +9, तृतीय खणड़ के +7  के नीचे +9 लिखते हैं।

8.    अतः भागफल = 2a2 - 3; शेषफल = + 6a2 + 3a -2

 

Paravartya in solving simple equations:

'Paravartya yojayet' means 'transpose and apply'. According to the rule invariable change its sign with every change of side from left to right, (+) becomes (-) and; and (X) becomes (÷). Further it can be extended from numerator to denominator in the concerned problems.

प्रत्येक पक्षान्तरण में गणितीय राशियों के चिन्ह परिवर्ति‍त होते हैं। इस प्रकार (+) चिन्ह (-) हो जाता हैं व (-) चिन्ह (+) हो जाता हैं, (x) का (÷) व (÷) का (x) हो जाता हैं।

 

Application 1: If ax + b = cx + d.

By paravartya, we get-

 

Example: 4x + 3 = 2x + 9

Here a =4, b = 3, c = 2, d = 9

 

Application 2: If (x + a) (x +b) = (x +c) (x +d).

By paravartya, we get -

 

Example: (x + 7) (x + 9) = (x - 8) (x - 11).

Here a =7, b = 9, c = - 8, d = -11

 

Application 3: If

By paravartya, we get-

 

Example:

 

Application (4): If

By paravartya we get-

 

Example:

 

Application (5): If

 

Example:

 

Application (6): If

 

Example:

 

Simple equations:

By Paravartya sutra we can derive the values of x and y. which are given in two simple equations.

 

Example:

2x + 3y = 13,

4x + 5y = 23.

1.      x का मान ज्ञात करने के लिए दोनों समीकरण के y के गुणक तथा अचर राशियों का बज्र गुणा करते हैं, तथा बज्र गुणा से प्राप्त राशियों को घटाते हैं, प्राप्त संख्या x के लिए अंश के रुप में प्रयुक्त होती हैं।

2x + 3y = 13

4x + 5y = 23

“X” के लिए अंश

= 3 x 23 – 5 x 13

= 69 – 65 = 4

2.      दोनों समीकरणों के x तथा y के गुणक का बज्र गुणा कर घटाने पर प्राप्त संख्या x के लिए हर के रुप में प्रयुक्त होती हैं।

“X” के लिए हर

= (3 x 4) – (2 x 5)

= 12 – 10 = 2       

अतः X = 4 ÷ 2 = 2

3.      y का मान ज्ञात करने के लिए दोनों समीकरण के x के गुणक तथा अचर राशियों का बज्र गुणा करते हैं, तथा बज्र गुणा से प्राप्त राशियों को घटाते हैं, प्राप्त संख्या y के लिए अंश के रुप में प्रयुक्त होती हैं।

“Y” के लिए अंश

= (13 x 4) – (23 x 2)

= 52 – 46 = 6

4.      y के लिए हर = 2; जो पद 2 से प्राप्त हुआ।

अतः y = 6÷2 = 3

अतः समीकरण में, x = 2 तथा y = 3


Sunyam Samyasamuccaye (शून्यं साम्यसमुच्चये)

The Sutra 'Sunyam Samyasamuccaye' means 'Samuccaya is the same, that Samuccaya is Zero.' The term 'Samuccaya' has several meanings under different contexts.

'जब समुच्चय एक समान हो तो उस समुच्चय का मान शून्य होता हैं'। भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में समुच्चय के अर्थ भिन्न-भिन्न होते हैं।

 

Situation 1: “Samuccaya” as a term which occurs as a common factor in all the terms concerned and proceed as follows.

यदि समीकरण के प्रत्येक पद में x एक सर्वनिष्ट खण्ड़ हो तो x = 0 होगा।

 

Example: The equation 12x + 3x = 4x + 5x has the same factor “x” in all its terms. Hence according to the sutra it is zero.

12x + 3x = 4x + 5x

x = 0

 

Example: In 2(x+1) = 7(x+1)

(x + 1) is Common Samuccaya

Hence   (x + 1) = 0

x = -1

 

Situation 2: If the product of independent terms in a equations like (x+a) (x+b) = (x+c) (x+d), is same then x = 0;

यदि समीकरण के दोनों पक्षों में अचर राशियों रहित (स्वतंत्र) पद समान हो तो x का मान शून्य  (0) होगा।

 

Example: (x + 3) (2x + 5) = -3(x - 5)

Samuccaya is 3 x 5 = 15 = -3 x -5

Since it is same, Hence x = 0

 

Situation 3: “Samuccaya” as the sum of the denominators of two fractions having the same numerical numerator.

यदि समीकरण में दो भिन्नों के अंश परस्पर समान हो तो उनके हरों का योग शून्य रखने पर चर राशि का मान प्राप्त होता हैं।

Example:

Numerator are same = j;

Hence according to sutra, sum of the denominators is zero.

(2x + 1 + 3x + 4) = 0

= (5x + 5) = 0

5x = -5

x = -1

Situation 4: If the sum of the numerators and the sum of the denominators are same, then that sum = 0.

यदि समीकरण में दोनों पक्षों के अंशों तथा हरों का योग परस्पर समान या एक निश्चित अनुपात में हो तो उनके अंशों तथा हरों का योग शून्य रखने पर चर राशि का मान प्राप्त होता हैं।

 

Example:

Sum of numerator = 2x+3+2x+5 = 4x + 8

Sum of denominator =2x+5+2x+3 = 4x + 8

Hence according to sutra, sum is zero

(4x + 8) = 0

4x = -8

x = -2

 

Example:

दोनों पक्षों के अंशों का योग = 3x+4+x+1 = 4x+5

दोनों पक्षों के हरों का योग = 6x+7+2x+3 = 8x+10

दोनों पक्षों का अनुपात = 1 : 2

सूत्र के अनुसार

(4x +5) = 0

4x = -5

x = -5/4

 

Situation 5: If the differences of the numerators and denominators of each side are same, then that difference = 0.

यदि समीकरण में एक पक्ष के अंश तथा हर का अन्तर दूसरे पक्ष के अंश तथा हर के अन्तर के समान या एक निश्चित अनुपात में हो तो किसी भी अन्तर का मान शून्य रखने पर चर राशि का मान प्राप्त होता हैं।

 

Example:

बायें पक्ष के अंश व हर का अन्तर = (3x+6) – (6x+3)

= - 3x + 3 = - (3x-3)

दायें पक्ष के अंश व हर का अन्तर = (5x+4) – (2x+7)

= 3x - 3

सूत्र के अनुसार

3x - 3 = 0

3x = 3

x = 1

 

Situation 6: ‘Samuccaya’ with the same sense but in a different context and application.

यदि समीकरण के प्रत्येक पक्ष में दो पद हो और पद का प्रत्येक अंश परस्पर समान हो तथा दोनों पक्षों के हरों का योग समान हो तो योग को शून्य रखने पर चर राशि का मान प्राप्त होता हैं।

Example:

बायें पक्ष के हरों का योग = x+2+x+6 = 2x+8

दायें पक्ष के हरों का योग = x+1+x+7 = 2x+8

सूत्र के अनूसार

(2x + 8) = 0

2x = -8

x = -4


Anurupye– Shunyamanyat (आनुरूप्ये शून्यमन्यत्)

The Sutra means: 'If one is in ratio, the other one is zero'.

अनुरूपता होने पर दूसरा शून्य होता हैं।

This Sutra in used to solve simultaneous simple equations in which the coefficients of 'one' variable are in the same ratio to each other as the independent terms are to each other. In such a case the Sutra says the 'other' variable is zero.

यदि किसी युगपत् समीकरण के किसी एक चर का अनुपात अचर राशियों के अनुपात के समान हो तो दूसरा चर शून्य होगा।

 

Example:

3x + 4y = 1 

4x + 12y = 3

The ratio of y-coefficients is 4:12 = 1:3, which is same as the ratio of independent terms is = 1:3.

Hence the other variable x = 0

4y = 1 or 12y = 3

y = ¼

 

Example:

175x + 140y = 350 

350x + 324y = 700

X के गुणकों का अनुपात = 175:350 =1:2 तथा

अचर पदों का अनुपात =350:700 = 1:2 समान हैं,

अतः y = 0

(175x =350) or (350x =700)

x = 2


Puranapuranabhyam (पूरणापूरणाभ्याम्)

The Sutra can be taken as Puranapuranabhyam which means by the completion or non - completion. We use it to solve the roots of quadratic equation.

अपूर्ण को पूर्ण करके।

इस सूत्र का प्रयोग द्विघात तथा त्रिघात समीकरणों को हल करने में किया जाता हैं।

ax2 + bx + c = 0

x2 + (b/a)x + c/a  =  0    ( dividing by a )

x2 + (b/a)x = - c/a

Completing the square (purana) on L.H.S

[x2 + (b/a)x + (b2/4a2)] = -c/a + (b2/4a2)

[x + (b/2a)] 2 = (b2 - 4ac) / 4a2

*1*

Example: x3 + 6x2 + 11 x + 6 = 0.

क्योंकि (x + 2) 3 = x3 + 6x2 + 12x + 8

दोनों पक्षों में (x + 2) जोड़ते हैं।

x3 + 6x2 + 11x + 6 + (x + 2) = x + 2

x3 + 6x2 + 12x + 8 = x + 2

(x + 2) 3 = (x + 2)

a3 = a                               for (a = x + 2)

a = 0, a = 1, a = - 1

x + 2 = 0, 1,-1

x = -2,-1,-3

 

 

Chalana - Kalanabhyam (चलन-कलनाभ्याम्)

The Sutra means 'Sequential motion' or “By calculus”.

चलन कलन के द्वारा।

 

Application 1: It is used to find the roots of a quadratic equation

(x2 – 3x + 1) = 0.

Now by calculus formula:

*2*

2x–3 = ±√5

x = 3±√5 / 2

Every Quadratic can thus be broken down into two binomial factors.

 

Application 2: Gunak samuccaye: यदि द्विघात समीकरण ax2 + bx + c, किन्ही दो पदों का गुणनफल हैं, तो इसकी प्रथम अवकलन गुणन संख्या दोनों गुणनखण्ड़ों का योग होती हैं।             

ax2 + bx +c

= (x + d) (x +e)

By calculus formula:

*3*

Sutra says 2ax + b = (x + d) + (x +e)

Example:

x2 + 5x + 4 =(x+4) (x+1)

(2x + 5) =(x+4) + (x+1)

 

Ekanyunena Purvena (एकन्यूनेन पूर्वेण)

This Sutra is a Sub-sutra to Nikhilam which means 'by one less than the previous one’.

पहले से एक कम के द्वारा।

This sutra is used to multiply a number by 9, 99, 999...

दो गुणन संख्याओं में जब एक संख्या के सभी अंक 9 हो तो एकन्यूनेन पूर्वेण विधि द्वारा गुणा किया जाता हैं। जिस संख्या के सभी अंक 9 हो उसे गुणक तथा दूसरी संख्या को गुण्य कहते हैं।

 

Example: 11 x 99

11 X 99

= 11-1 / 99-10

= 10 / 89

= 1089

1.      बायाँ पक्ष= 11 - 1 = 10

2.      दायाँ पक्ष = 99-10 = 89

 

Example: 125 X 9

1.      Divide the multiplicand (125) of by a Vertical line or by the Sign (:) put as many digits as the multiplier into a right hand portion.

125 has to be written as 12/5 or 12:5

 

2.      Subtract from the multiplicand one more than the whole excess portion on the left.

Left portion of multiplicand is 12. One more than it 12 + 1 = 13,

Now subtract this from multiplicand,         

3.      Subtract the R.H.S. part of the multiplicand by nikhilam process.

R.H.S of multiplicand is 5 its nikhilam is 5.

It gives the R.H.S of the product

Answer is 11: 2: 5 = 1125

This is useful in solving simple equations. The type of equations are those whose numerator and denominator on the L.H.S. leaving the independent terms stand in the same ratio to each other as the entire numerator and the entire denominator of the R.H.S. stand to each other.

यह सूत्र उन समीकरणों को सरल करने में प्रयुक्त होता हैं, जिनके बायें पक्ष में अन्तिम पदों ( स्वतंत्र पदों) को छोड़कर अंश तथा हर का अनुपात वही होता है, जो दायें पक्ष के पूरे अंश तथा हर का होता हैं। इसे अन्त्ययोरेव अर्थात् अन्तिम पदों के अनुपात द्वारा आसानी से हल किया जा सकता हैं।

Example:

Example: (a + 2) (a + 3) (a + 11) = (a + 4) (a + 5) (a + 7)

Sum of the binomials on both the L.H.S. and R.H.S = 3a + 16 are same. Hence antyayoreva can be applied. Adjusting we get

 

 

Vilokanam (विलोकनम्)

The Sutra 'Vilokanam' means 'Observation'.

देखकर।

 

Example: x + (1/x) = 10/3

उक्त समीकरण में विलोकनम् के अनुसार बायाँ पक्ष दो व्युत्क्रमों (x तथा 1/x) का योग हैं। साथ ही दायाँ पक्ष भी दो व्युत्क्रमों (3 तथा 1/3) का योग हैं।

अतः x = 3, 1/3.

 

Example:

 

Simultaneous Quadratic Equations:

 

Example: 5x – y = 7 and xy = 6.

xy = 6 gives

x = 6, y = 1;

x = 1, y = 6;

x = 2, y = 3;

x = 3, y = 2 and of course negatives of all these.

Observe that

For x = 6, y = 1; 5x – y = 5 (6) – 1 = 30 – 1 ≠ 7.

For x = 1, y = 6; 5x – y = 5 (1) – 6 = 5 – 6 ≠ 7.

For x = 3, y = 2; 5x – y = 5 (3) – 2 = 15 – 2 ≠ 7.

These set are not solutions because they do not satisfy the equation 5x – y = 7.

But for x = 2, y = 3; 5x – y = 5 (2) – 3 = 10 – 3 = 7

Hence x = 2, y = 3 is a solution.

Negative values of the above are also not the solutions. Thus one set of the solutions is x = 2, y = 3.

 

Partial Fractions:

 

Example:






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