त्रिभुज
तीन सरल रेखाओं से घिरी बंद आकृति को त्रिभुज या त्रिकोण कहते हैं। त्रिभुज में तीन भुजाएं और तीन कोण होते हैं। त्रिभुज सबसे कम भुजाओं वाला व सबसे सरल बहुभुज है।
त्रिभुज (Triangle), तीन शीर्षों और तीन भुजाओं (Angle)वाला एक बहुभुज (Polygon) होता है।
यह ज्यामिति की मूल आकृतियों में से एक है। शीर्षों A, B, और C वाले त्रिभुज को ∆ABC लिखा जाता है।
किसी त्रिभुज के तीनों आन्तरिक कोणों का योग सदैव 180° होता है। इन भुजाओं और कोणों के माप के आधार पर त्रिभुज का विभिन्न प्रकार से वर्गीकरण किया जाता है।
एक त्रिभुज में तीन शीर्ष तीन भुजाएं और तीन कोण होते हैं।
तीन शीर्ष
त्रिभुज के तीन शीर्ष A, B, C
तीन भुजाएँ
एक त्रिभुज की तीन भुजाएं होती हैं। एक भुजा को हम दो प्रकार से लिख सकते हैं ।
जैसे AB या BA, BC या CB, CA या CA । इसे हम स्मॉल लेटर्स के द्वारा दिल्ली सकते हैं जैसे c, a, b
तीन कोण
एक त्रिभुज के तीन कोण होते हैं और प्रत्येक कौन-कौन 3 तरीके से ले सकते हैं परंतु मध्य वाला कौन मुख्य कौन माना जाता है जैसे।
∠A = ∠BAC = ∠CAB,
∠B = ∠ABC = ∠CBA,
∠C = ∠BCA = ∠ACB
आन्तरिक कोणों का योग
त्रिभुज के तीनों कोणों का योग संपूरक (180०) होता है।
∠A + ∠B + ∠C = 180०
त्रिभुज के प्रकार
भुजाओं के आधार पर त्रिभुज के प्रकार
भुजाओं के आधार पर त्रिभुज तीन प्रकार के होते हैं
समबाहु त्रिभुज:
वह त्रिभुज जिसकी तीनों भुजाएं समान होती हैं। इनका प्रत्येक कोण 60° का होता है।
समद्विबाहु त्रिभुज:
वह त्रिभुज जिसकी दो भुजाएं आपस में बराबर होती हैं। समदिबाहु त्रिभुज कहलाते हैं।
यह ध्यान रखना चाहिए कि समान भुजाओं के सम्मुख (सामने के) कोण समान होते हैं।
विषमबाहु त्रिभुज:
वह त्रिभुज जिसकी सभी भुजाएं आपस में असमान होती हैं। विषमबाहु त्रिभुज का रहता है।
इसके तीनों को आप भी अलग-अलग माप के होते हैं।
कोणों के आधार पर त्रिभुज के प्रकार कोणों के आधार पर त्रिभुज तीन प्रकार के होते हैं।
न्यूनकोण त्रिभुज:
वह त्रिभुज जिसका प्रत्येक कोण न्यून कोण (90 डिग्री से कम) होता है। न्यून कोण त्रिभुज कहलाता है।
समकोण त्रिभुज:
वह त्रिभुज जिसमें एक कोण समकोण (90 डिग्री) तथा शेष दोनों कोण न्यून कोण तथा एक दूसरे के पूरक होते हैं। समकोण त्रिभुज कहलाता हैं।
ध्यान दें कि
समकोण त्रिभुज में, समकोण के सामने की भुजा को कर्ण (hypotenuse) कहते हैं, जो त्रिभुज की सबसे लंबी भुजा होती है।
अन्य दो भुजाओं को त्रिभुज के पाद (legs) या भुज (cathetus) कहा जाता है।
समकोण के सामने वाली भुजा कर्ण (hypotenuse) होती है, जो त्रिभुज की सबसे बड़ी भुजा होती है।
लिए गए किसी कोण के सामने की भुजा लम्ब (perpendicular) होती है।
तीसरी भुजा आधार (base) कहलाती है, जो लिए गए कोण से संपर्कित होती है।
समकोण त्रिभुज, पाइथागोरियन प्रमेय का पालन करते हैं:
पाइथागोरियन प्रमेय:
किसी भी समकोण त्रिभुज में उसकी किन्हीं दो भुजों (आधार और लम्ब) की लंबाई के वर्गों का योग, कर्ण की लंबाई के वर्ग के बराबर होता है:
समद्विबाहु समकोण त्रिभुज में अन्य दोनों दो कोण 45° के होते हैं।
अधिककोण त्रिभुज:
वह त्रिभुज जिसमें एक कोण अधिककोण (90 डिग्री से अधिक) अधिक का होता है।अधिककोण त्रिभुज कहलाता हैं।
त्रिभुज की कुछ मुख्य परिभाषाएं
अभिलम्ब:
किसी त्रिभुज में उसके किसी शीर्ष से उसकी सम्मुख (विपरीत) भुजा पर डाला गया लम्ब अभिलम्ब कहलाता है। एक त्रिभुज में अधिकतम तीन अभिलंब खींचे जा सकते हैं।
माध्यिका:
किसी त्रिभुज में उसके किसी शीर्ष के सामने वाली भुजा के मध्य बिन्दु से मिलाने वाली रेखा मध्यिका को माधिका कहते हैं। एक त्रिभुज में अधिकतम तीन माध्यिकाए हो सकती हैं।
कोण समद्विभाजक:
वह रेखाखंड, जो त्रिभुज के किसी शीर्ष कोण को दो समान भागों में बांटता है। उषा शीर्ष का कोण समद्विभाजक कहलाता है।
भुजा का लम्ब समद्विभाजक:
वह रेखाखण्ड, जो त्रिभुज की किसी भुजा को समकोण बनाते हुए उसे दो समान भागों में बांटता है। भुजा का लम्ब समद्विभाजक कहलाता है।
लम्ब केन्द्र:
वह बिन्दु जहाँ किसी त्रिभुज के तीनों अभिलम्ब मिलते है। लंब केंद्र कहलाता है।
केन्द्रक:
त्रिभुज की तीनों मध्यिकायें जिस बिंदु पर मिलती हैं । वह बिन्दु केंद्रक (सेन्ट्रॉड) कहलाता है। यह याद रहे कि केंद्रक प्रत्येक मध्यिका को 2:1 में विभाजित करता है।
अंतःकेन्द्र: त्रिभुज के कोण समद्विभाजक जिस बिन्दु पर मिलते हैं, वह बिन्दु अंतःकेन्द्र कहलाता है।
परिकेन्द्र: वह बिन्दु जहाँ भुजाओं के लम्ब समद्विभाजक मिलते हैं परिकेंद्र कहलाता है। परिकेंद्र हमेशा तीनों शीर्षो से समान दूरी पर होता है।
परिकेन्द्र से त्रिभुज के परित: एक वृत्त खींचा जा सकता है।
मूलभूत तथ्य संपादित करें
यूक्लिडियन तल में,
त्रिभुज के तीनों आंतरिक कोणों का योग हमेशा 180 अंश होता है।
जब त्रिभुज के अन्य दोनों कोणों की माप ज्ञात हो तो यह किसी भी त्रिभुज के तीसरे कोण की माप का निर्धारण करने की अनुमति देता है।
त्रिभुज का बहिष्कोण (Exterior Angle) :
वह कोण है जो एक आंतरिक कोण के लिए, एक रैखिक कोण (और इसलिए पूरक) होता है, अर्थात त्रिभुज की किसी भुजा को आगे बढ़ाने पर जो कोण बनता है, वह त्रिभुज का एक बहिष्कोण होता है।
त्रिभुज के बहिष्कोण की माप, अन्य दो आंतरिक कोणों की मापों के बराबर होती है जो इससे संलग्न नहीं होते हैं; यह बहिष्कोण प्रमेय है।
किसी भी त्रिभुज के तीनों बहिष्कोणों (प्रत्येक शीर्ष के लिए एक) की मापों का योग 360 अंश होता है।
दो त्रिभुज समरूप (Similiar) होते हैं यदि एक त्रिभुज के प्रत्येक कोण का मान, दूसरे त्रिभुज के (तत्स्थानिक) कोणों के मान के बराबर होता है। समरूप त्रिभुजों में तत्स्थानिक भुजाओं की लंबाइयाँ समान अनुपात में होती हैं, और यह गुण त्रिभुजों में समरूपता स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।
समरूप त्रिभुजों के बारे में कुछ मूल प्रमेय निम्न हैं:
यदि दो त्रिभुजों के आंतरिक कोणों का एक युग्म (जोड़ा), एक दूसरे के समान होता है, और एक और युग्म भी एक दूसरे के समान होता है, तो दोनों त्रिभुज समरूप होते हैं।
यदि दो त्रिभुजों की तत्स्थानिक भुजाओं का एक युग्म(जोड़ा), एक अन्य तत्स्थानिक भुजाओं के युग्म के समानुपाती होता है और उन भुजाओं के द्वारा निर्मित कोण भी समान होते हैं, तो दोनों त्रिभुज समरूप होते हैं। (बहुभुज की किन्हीं दो भुजाओं द्वारा निर्मित कोण, उन दोनों भुजाओं के बीच का आंतरिक कोण होता है।)
यदि दो त्रिभुजों की तत्स्थानिक भुजाओं के तीनों युग्म समान अनुपात में होते हैं, तो दोनों त्रिभुज समरूप होते हैं।
दो त्रिभुज सर्वांगसम (Congruent) होते हैं, यदि उनकी आकृति और आकार बिल्कुल एक जैसे हों, दोनों त्रिभुजों में आंतरिक कोण के सभी जोड़े माप में बराबर हों, और तीनों तत्स्थानिक भुजाओं की लंबाई समान हो।
दो त्रिभुजों के सर्वांगसम होने के लिए, कुछ अलग-अलग आवश्यकताएँ और पर्याप्त स्थितियां निम्न हैं:
SAS (Side-Angle-Side) नियम:
एक त्रिभुज में किन्हीं दो भुजाओं की लंबाई, दूसरे त्रिभुज में किन्हीं दो भुजाओं की लंबाई के बराबर होती है, और एक कोण की माप भी समान होती है।
इसी प्रकार, दो त्रिभुजों की सर्वांगसमता सिद्ध करने के लिए ASA नियम, SSS नियम, AAS नियम का प्रयोग किया जाता है।
त्रिभुज से संबन्धित बिन्दु, रेखाएं, और वृत्त संपादित करें
त्रिभुज के तीन लंब समद्विभाजक होते हैं, जो एक ही बिंदु पर मिलते हैं (या प्रतिच्छेद करते हैं)। यह बिन्दु त्रिभुज का 'परिकेन्द्र' कहलाता है। यह बिंदु त्रिभुज के परिवृत्त का केंद्र होता है (यह वृत्त त्रिभुज के तीनों शीर्षों से होकर गुजरता है)।
एक त्रिभुज की किसी भुजा का लंब समद्विभाजक (Perpendicula Bisector), उस भुजा के मध्यबिन्दु से गुजरने वाली एक सीधी रेखा है जो भुजा के लम्बवत होती है, यानी भुजा के साथ समकोण बनाती है। त्रिभुज के तीन लंब समद्विभाजक होते हैं, जो एक ही बिंदु पर मिलते हैं (या प्रतिच्छेद करते हैं)। यह बिन्दु त्रिभुज का 'परिकेन्द्र (Circumcenter)' कहलाता है, इसे आमतौर पर O द्वारा दर्शाया जाता है; यह बिंदु त्रिभुज के परिवृत्त(Circumcircle) का केंद्र होता है (यह वृत्त त्रिभुज के तीनों शीर्षों से होकर गुजरता है)। इस वृत्त का व्यास, जिसे परिव्यास (Circumdiameter) कहा जाता है, उपरोक्त ज्या के नियम द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। परिवृत्त की त्रिज्या को परित्रिज्या (Circumradius) कहा जाता है।
थाल्स प्रमेय से पता चलता है कि यदि परिकेन्द्र, त्रिभुज की किसी भुजा पर स्थित है, तो वह त्रिभुज समकोण त्रिभुज है और उस भुजा के सामने का कोण समकोण है। यदि परिकेन्द्र, त्रिभुज के अंदर स्थित है, तो त्रिभुज न्यूनकोण त्रिभुज है; यदि परिकेन्द्र, त्रिभुज के बाहर स्थित है, तो त्रिभुज अधिककोण त्रिभुज है।
त्रिभुज के तीन शीर्षलंब होते हैं, जो एक ही बिंदु पर प्रतिच्छेद करते हैं। यह बिन्दु त्रिभुज का 'लंबकेंद्र' कहलाता है,
त्रिभुज का शीर्षलंब (Altitude), एक शीर्ष से होकर जाने वाली एक सीधी रेखा है, जो उस शीर्ष के सामने की भुजा पर लंब होती है। इस सामने की भुजा को, शीर्षलंब का आधार (Base of the altitude) कहा जाता है, और वह बिंदु जहां शीर्षलंब, आधार को प्रतिच्छेद करता है, शीर्षलंब का पाद (Foot of the altitude) कहलाता है। शीर्षलंब की लंबाई, आधार और शीर्ष के बीच की दूरी है। त्रिभुज के तीन शीर्षलंब होते हैं, जो एक ही बिंदु पर मिलते हैं (या प्रतिच्छेद करते हैं)। यह बिन्दु त्रिभुज का 'लंबकेंद्र (Orthocenter)' कहलाता है, जो H द्वारा दर्शाया जाता है। केवल न्यूनकोण त्रिभुजों में, लंबकेंद्र त्रिभुज के अंदर स्थित होता है।
त्रिभुज के तीन कोण समद्विभाजक होते हैं, जो एक ही बिंदु पर मिलते हैं (या प्रतिच्छेद करते हैं)। यह बिन्दु त्रिभुज का 'अन्तःकेंद्र' कहलाता है।
त्रिभुज का कोण समद्विभाजक (Angle Bisector), शीर्ष से होकर जाने वाली एक सीधी रेखा है, जो उस शीर्ष के कोण को दो समान भागों में बाँटती है। त्रिभुज के तीन कोण समद्विभाजक होते हैं, जो एक ही बिंदु पर मिलते हैं (या प्रतिच्छेद करते हैं)। यह बिन्दु त्रिभुज का 'अन्तःकेंद्र (Incenter)' कहलाता है, इसे आमतौर पर I द्वारा दर्शाया जाता है; यह बिंदु त्रिभुज के अन्तःवृत्त (Incircle) का केंद्र होता है (यह वृत्त त्रिभुज के अंदर स्थित होता है और उसकी तीनों भुजाओं को स्पर्श करता है)। अन्तःवृत्त की त्रिज्या को अन्तःत्रिज्या (Inradius) कहा जाता है। किसी त्रिभुज के तीन बहिर्वृत्त (excircle या escribed circle) होते हैं। ये तीनों वृत्त उस त्रिभुज के बाहर होते हैं। इनमें से प्रत्येक वृत्त, त्रिभुज की किसी एक भुजा को तथा शेष दो भुजाओं को आगे बढाने से बनी दो रेखाओं को स्पर्श करता है।
ज की तीन माध्यिकाएँ होती हैं, जो एक ही बिंदु पर मिलती हैं (या प्रतिच्छेद करती हैं)। यह बिन्दु त्रिभुज का 'केंद्रक' कहलाता है।
त्रिभुज की माध्यिका (Median), एक शीर्ष और उस शीर्ष के सामने की भुजा के मध्यबिंदु से होकर जाने वाली एक सीधी रेखा है। माध्यिका, त्रिभुज को दो बराबर क्षेत्रों में विभाजित करती है। त्रिभुज की तीन माध्यिकाएँ होती हैं, जो एक ही बिंदु पर मिलती हैं (या प्रतिच्छेद करती हैं)। यह बिन्दु त्रिभुज का 'केंद्रक (Centroid)' कहलाता है, जो G द्वारा दर्शाया जाता है। एक दृढ़ त्रिभुजाकार वस्तु (जो एकसमान घनत्व की पतली शीट से काटा गया है) का केंद्र, उसका द्रव्यमान केंद्र (Center of Mass) भी होता है: एकसमान गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में, वस्तु अपने केंद्रक पर संतुलित रह सकती है। केंद्रक, प्रत्येक माध्यिका को 2:1 के अनुपात में विभाजित करता है, यानी एक शीर्ष और केंद्रक के बीच की दूरी, केंद्रक और सामने की भुजा के मध्यबिंदु के बीच की दूरी से दोगुनी होती है।
तीनों भुजाओं के मध्य बिंदु और तीनों शीर्षलम्बों के पाद, सभी एक ही वृत्त पर होते हैं, जिसे त्रिभुज का नवबिन्दु वृत्त कहते हैं।
तीनों भुजाओं के मध्य बिंदु और तीनों शीर्षलम्बों के पाद, सभी एक ही वृत्त पर होते हैं, जिसे त्रिभुज का नवबिन्दु वृत्त (Nine-point Circle) कहते हैं। शेष तीन बिंदु जिनके लिए इसका नाम नवबिन्दु (नौ बिन्दु) वृत्त है, वे शीर्ष और लंबकेन्द्र के बीच, शीर्षलंब के हिस्से के मध्यबिंदु हैं। नवबिन्दु वृत्त की त्रिज्या, परिवृत्त की त्रिज्या की आधी होती है। यह अन्तःवृत्त और तीनों बहिर्वृत्तों को स्पर्श करता है।
यूलर रेखा वह रेखा है, जिस पर केंद्रक (पीला), लंबकेन्द्र (नीला), परिकेन्द्र (हरा) और नवबिन्दु वृत्त का केंद्र (लाल बिंदु) स्थित होते हैं।
केंद्रक (पीला), लंबकेन्द्र (नीला), परिकेन्द्र (हरा) और नवबिन्दु वृत्त का केंद्र (लाल बिंदु), सभी एक एकल रेखा पर होते हैं, जिसे यूलर की रेखा (लाल रेखा) कहा जाता है। नवबिन्दु वृत्त का केंद्र, लंबकेन्द्र और परिकेन्द्र के बीच के मध्यबिंदु पर स्थित होता है, और केंद्रक और परिकेन्द्र के बीच की दूरी, केंद्रक और लंबकेन्द्र के बीच की दूरी की आधी होती है।
अन्तःवृत्त का केंद्र, सामान्य रूप से यूलर की रेखा पर स्थित नहीं होता है।
भुजाओं और कोणों की गणना संपादित करें
त्रिभुज में, भुजा की लंबाई या कोण की माप की गणना करने के लिए विभिन्न मानक विधियां हैं। समकोण त्रिभुज में इनके मानों की गणना करने के लिए कुछ विधियां उपयुक्त हैं; लेकिन अन्य परिस्थितियों में अधिक जटिल विधियों की आवश्यकता हो सकती है।
समकोण त्रिभुजों में त्रिकोणमितीय अनुपात
मुख्य लेख : त्रिकोणमितीय फलन
एक समकोण त्रिभुज में हमेशा एक कोण 90° (π/2 रेडियन) का होता है, यहां C समकोण है। कोण A और B भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। त्रिकोणमितीय फलन भुजा की लंबाई और त्रिभुज के आंतरिक कोणों के बीच संबंध निर्दिष्ट करते हैं।
समकोण त्रिभुजों में ज्या(sine), कोज्या(cosine) और स्पर्शज्या(tangent) अनुपातों का प्रयोग करके अज्ञात कोणों और अज्ञात भुजाओं की लंबाई को किया जा सकता है। त्रिभुज की भुजाएँ निम्नानुसार ज्ञात की जा सकती हैं:
ज्या, कोज्या और स्पर्शज्या
कोण A की ज्या, उस कोण के सामने की भुजा (लम्ब) की लंबाई और कर्ण की लंबाई का अनुपात होती है। चित्रानुसार
{\displaystyle \sin A={\frac {\text{perpendicular}}{\text{hypotenuse}}}={\frac {p}{h}}\,.}{\displaystyle \sin A={\frac {\text{perpendicular}}{\text{hypotenuse}}}={\frac {p}{h}}\,.}
कोण A की कोज्या, उस कोण की आसन्न भुजा (आधार) की लंबाई और कर्ण की लंबाई का अनुपात होती है। चित्रानुसार
{\displaystyle \cos A={\frac {\text{base}}{\text{hypotenuse}}}={\frac {b}{h}}\,.}{\displaystyle \cos A={\frac {\text{base}}{\text{hypotenuse}}}={\frac {b}{h}}\,.}
कोण A की स्पर्शज्या, उस कोण के सामने की भुजा (लम्ब) की लंबाई और उस कोण की आसन्न भुजा (आधार) की लंबाई का अनुपात होती है। चित्रानुसार
{\displaystyle \tan A={\frac {\text{perpendicular}}{\text{base}}}={\frac {p}{b}}={\frac {\sin A}{\cos A}}\,.}{\displaystyle \tan A={\frac {\text{perpendicular}}{\text{base}}}={\frac {p}{b}}={\frac {\sin A}{\cos A}}\,.}
प्रतिलोम फलन (Inverse Functions)
प्रतिलोम त्रिकोणमितीय फलनों का प्रयोग समकोण त्रिभुज में किन्हीं भी दो भुजाओं की लंबाई के द्वारा आंतरिक कोणों की गणना के लिए किया जा सकता है।
Arcsin का प्रयोग समकोण त्रिभुज में लम्ब और कर्ण की लंबाई के द्वारा आंतरिक कोण की गणना के लिए किया जा सकता है।
{\displaystyle \theta =\arcsin \left({\frac {\text{perpendicular}}{\text{hypotenuse}}}\right)}{\displaystyle \theta =\arcsin \left({\frac {\text{perpendicular}}{\text{hypotenuse}}}\right)}
Arccos का प्रयोग समकोण त्रिभुज में आधार और कर्ण की लंबाई के द्वारा आंतरिक कोण की गणना के लिए किया जा सकता है।
{\displaystyle \theta =\arccos \left({\frac {\text{base}}{\text{hypotenuse}}}\right)}{\displaystyle \theta =\arccos \left({\frac {\text{base}}{\text{hypotenuse}}}\right)}
Arctan का प्रयोग समकोण त्रिभुज में लम्ब और आधार की लंबाई के द्वारा आंतरिक कोण की गणना के लिए किया जा सकता है।
{\displaystyle \theta =\arctan \left({\frac {\text{perpendicular}}{\text{base}}}\right)}{\displaystyle \theta =\arctan \left({\frac {\text{perpendicular}}{\text{base}}}\right)}
प्रारंभिक ज्यामिति और त्रिकोणमिति पाठ्यक्रमों में, sin−1, cos−1 आदि संकेतों का प्रयोग अक्सर arcsin, arccos आदि के स्थान पर किया जाता है। हालांकि, arcsin, arccos इत्यादि संकेत, उच्च गणित में मानक हैं, जहां त्रिकोणमितीय फलनों को आमतौर पर घातों के लिए प्रयुक्त किया जाता है, क्योंकि यह गुणात्मक प्रतिलोम और योगात्मक प्रतिलोम के बीच उलझन से बचाते हैं।
त्रिभुजों के हल
मुख्य लेख: त्रिभुजों के हल
"त्रिभुजों के हल (Solution of Triangles)" मुख्य त्रिकोणमितीय समस्या है: त्रिभुज की अज्ञात विशेषताओं (तीन कोण, तीन भुजाओं की लंबाई इत्यादि) को ढूंढना, जब इनमें कम से कम तीन विशेषताएँ दी गई हों। त्रिकोण एक समतल या गोले पर स्थित हो सकता है। यह समस्या अक्सर विभिन्न त्रिकोणमितीय अनुप्रयोगों में होती है, जैसे भूगर्भीय, खगोल विज्ञान, निर्माण, पथ प्रदर्शन इत्यादि।
त्रिभुज के क्षेत्रफल की गणना संपादित करें
त्रिभुज के क्षेत्रफल को, समान आधार और समान ऊंचाई के एक समांतर चतुर्भुज के क्षेत्रफल के आधे के रूप में वर्णित किया जा सकता है।
त्रिभुज के क्षेत्रफल T की गणना करना एक मूल समस्या है जो अक्सर कई अलग-अलग स्थितियों में सामने आती है। सबसे अच्छा ज्ञात और सबसे सरल सूत्र निम्न है:
{\displaystyle T={\frac {1}{2}}bh}{\displaystyle T={\frac {1}{2}}bh}
जहां b त्रिभुज के आधार की लंबाई है, और h त्रिभुज की ऊंचाई या शीर्षलंब है। "आधार" शब्द किसी भी भुजा को इंगित करता है, और "ऊंचाई" भुजा के विपरीत शीर्ष से उसी भुजा पर लंब की लंबाई को दर्शाती है। 499 CE में भारतीय गणित और भारतीय खगोल विज्ञान के शास्त्रीय युग से एक महान गणितज्ञ-खगोलविद आर्यभट्ट ने पुस्तक आर्यभट्टीय (अनुभाग 2.6) में इस विधि का उपयोग किया था।
हेरॉन के सूत्र का उपयोग करके
त्रिभुज का आकार, भुजाओं की लंबाई से निर्धारित होता है। इसलिए, उसका क्षेत्रफल भी भुजाओं की लंबाई से ज्ञात किया जा सकता है। हेरॉन के सूत्र द्वारा:
त्रिभुज का अर्द्धपरिमाप (परिमाप का आधा) है।
हेरॉन के सूत्र को लिखने के तीन अन्य समकक्ष तरीके निम्न हैं:
सदिशों का प्रयोग
एक त्रिविमीय यूक्लिडियन अंतरिक्ष में उपस्थित समांतर चतुर्भुज का क्षेत्रफल सदिशों का उपयोग करके ज्ञात किया जा सकता है। माना सदिश AB और AC, क्रमशः A से B और A से C को इंगित करते हैं। तब समांतर चतुर्भुज का क्षेत्रफल निम्न होगा-
जो सदिशों AB और AC के सदिश गुणन का परिमाण है। त्रिभुज ABC का क्षेत्रफल इसका आधा होता है,
{\displaystyle {\frac {1}{2}}|\mathbf {AB} \times \mathbf {AC} |.}
त्रिभुज ABC का क्षेत्रफल अदिश गुणन के संदर्भ में भी निम्नानुसार व्यक्त किया जा सकता है:
द्विविमीय यूक्लिडियन अन्तरिक्ष में, कार्तीय तल में एक मुक्त सदिश के रूप में सदिश AB को (x1,y1) और सदिश AC को (x2,y2) व्यक्त करने पर, इसे निम्न प्रकार लिखा जा सकता है:
{\displaystyle {\frac {1}{2}}\,|x_{1}y_{2}-x_{2}y_{1}|.\,}
== इन्हें भी देखें ==(त्रिभुजों के तीन कोण होते है।1.अधिक कोण त्रिभुज 2.समकोण त्रिभुज 3.नयुन त्रिभुजों
संस्कृत में गणित एवं विज्ञान के सिद्धान्त
भारतीय परम्परा में गणेश दैवज्ञ ने अपने ग्रन्थ बुद्धिविलासिनी में गणित की परिभाषा निम्नवत की है-
गण्यते संख्यायते तद्गणितम्। तत्प्रतिपादकत्वेन तत्संज्ञं शास्त्रं उच्यते।
(जो परिकलन करता और गिनता है, वह गणित है तथा वह विज्ञान जो इसका आधार है वह भी गणित कहलाता है।)
वेदांग ज्योतिष में गणित का स्थान सर्वोपरि (मूधन्य) बताया गया है -
यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्ध्नि संस्थितम् ॥ -- (वेदांग ज्योतिष - ५)
(जिस प्रकार मोरों के सिर पर शिखा और नागों के सिर में मणि सर्वोच्च स्थान में होते हैं उसी प्रकार वेदांगशास्त्रों में गणित का स्थान सबसे उपर (मूर्धन्य) है।
इसी प्रकार,
बहुभिर्प्रलापैः किम्, त्रयलोके सचरारे।
यद् किंचिद् वस्तु तत्सर्वम्, गणितेन् बिना न हि ॥ — महावीराचार्य, गणितसारसंग्रह में
(बहुत प्रलाप करने से क्या लाभ है ? इस चराचर जगत में जो कोई भी वस्तु है वह गणित के बिना नहीं है / उसको गणित के बिना नहीं समझा जा सकता)
खगोल-विज्ञान के साथ तो गणित का अन्योन्य सम्बन्ध माना गया है। भास्कराचार्य का कहना है कि खगोल तथा गणित में एक दूसरे से अनभिज्ञ पुरुष उसी प्रकार महत्त्वहीन है, जैसे घृत के बिना व्यंजन, राजा के बिना राज्य तथा अच्छे वक्ता के बिना सभा होती है—
भोज्यं यता सर्वरसं विनाज्यं राज्यं यथा राजविवर्जितं च।
सभा न भातीव सुवक्तृहीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथात्र ॥ -- (सिद्धान्तशिरोमणि, गोलाध्याय, श्लोक 4)
गणकों के गुण
गणितसारसंग्रह के संज्ञाधिकार के अन्त में महावीराचार्य ने गणकों (गणितज्ञों) के ८ गुण गिनाए हैं-
अथ गणकगुणनिरूपणम्
लघुकरणोहापोहानालस्यग्रहणधारणोपायैः।
व्यक्तिकराङ्कविशिष्टैर् गणकोऽष्टाभिर् गुणैर् ज्ञेयः॥
(लघुकरण, उह, अपोह, अनालस्य, ग्रहण, धारण, उपाय, व्यक्तिकरांकविशिष्ट - इन आठ गुणों से गणक को जाना जाता है।)
ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के अनुसार 'आचार्य' की योग्यताएँ
कुट्टक-ख-ऋण-धन-अव्यक्त-मध्य-हरण-एक-वर्ण-भावितकैस् ।
आचार्यस् तन्त्र-विदाम् ज्ञातैस् वर्ग-प्रकृत्या च ॥
बोधायन सूत्र (तथाकथित पाइथागोरस प्रमेय)
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शुल्बसूत्रों में बौधायन का शुल्बसूत्र सबसे प्राचीन माना जाता है। इन शुल्बसूत्रों का रचना समय १२०० से ८०० ईसा पूर्व माना गया है।
बोधायन का सूल्व सूत्र इस प्रकार है-
दीर्घ चतुरस स्याक्ष्व्या रज्जुः पार्श्वमानी,
तिर्यङ्मानी च यत्पृथ्बभूते कुरु हस्तेदुर्भय करोति॥
अर्थात् दीर्घ चतुरस (आयत) के विकर्ण (रज्जू) का क्षेत्र (वर्ग) का मान आधार (पार्श्वमानी) एवं त्रियंगमानी (लंब) के वर्गों का योग होता है। सूल्व सूत्र आधुनिक काल में 'पाइथागोरस का सूत्र' के नाम से प्रचलित है। पैथागोरस ने ईसा पूर्व 535 में मिस्र की यात्रा की थी। संभव है कि पैथागोरस को मिस्र में सूल्व सूत्र की जानकारी प्राप्त हो चुकी हो।
ग्रहों की स्थिति, काल एवं गति
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महर्षि लगध ने ऋग्वेद एवं यजुर्वेद की ऋचाओं से वेदांग ज्योतिष संग्रहीत किया। वेदांग ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति, काल एवं गति की गणना के सूत्र दिए गए हैं।
तिथि मे का दशाम्य स्ताम् पर्वमांश समन्विताम्।
विभज्य भज समुहेन तिथि नक्षत्रमादिशेत॥
अर्थात् तिथि को 11 से गुणा कर उसमें पर्व के अंश जोड़ें और फिर नक्षत्र संख्या से भाग दें। इस प्रकार तिथि के नक्षत्र बतावें।नेपाल में इसी ग्रन्थ के आधार मे विगत ६ साल से "वैदिक तिथिपत्रम्" व्यवहार मे लाया गया है।
पृथ्वी का गोल आकार
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निम्नलिखित में पृथ्वी को 'कपित्थ फल की तरह' (गोल) बताया गया है और इसे 'पंचभूतात्मक' कहा गया है-
मृदम्ब्वग्न्यनिलाकाशपिण्डोऽयं पाञ्चभौतिकः।
कपित्थफलवद्वृत्तः सर्वकेन्द्रेखिलाश्रयः ॥
स्थिरः परेशशक्त्येव सर्वगोऴादधः स्थितः ।
मध्ये समान्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति ॥
प्रकाश का वेग
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सायणाचार्यः ने प्रकाश का वेग निम्नलिखित श्लोक में प्रतिपादित किया है-
योजनानं सहस्रे द्वे द्वे शते द्वे च योजने ।
एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते ॥
इसकी व्याख्या करने पर प्रकाश का वेग ६४००० कोस (= १८५०० मील) इति उक्तम् अस्ति । प्रकाश के वेग का आधुनिक मान १८६२०२.३९६० मील/सेकेण्ड है।
त्रिकोणमितीय सन्निकटन (approximation)
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In the third section ग्रहगणित, while treating the motion of planets, he (भास्कर द्वितीय) considered their instantaneous speeds. He arrived at the approximation:
{\displaystyle \sin y'-\sin y\approx (y'-y)\cos y} {\displaystyle \sin y'-\sin y\approx (y'-y)\cos y} for {\displaystyle y'} {\displaystyle y'} close to {\displaystyle y} {\displaystyle y}, or in modern notation:
{\displaystyle {\frac {d}{dy}}\sin y=\cos y} {\displaystyle {\frac {d}{dy}}\sin y=\cos y}.
भास्कर द्वितीय के शब्दों में,
बिम्बार्धस्य कोटिज्या गुणस्त्रिज्याहारः फलं दोर्ज्यायोरान्तरम्
इसी को मुञ्जलाचार्य या मञ्जुलाचार्य (९३२ ई०) ने भास्कर से भी पहले अपने ग्रन्थ 'लघुमानसम्' में ज्या सारणी (table of sines) में प्रतिपादित किया था। भास्कर ने यह भी कहा है कि अपने कक्षा के उच्चतम बिन्दु पर ग्रह की तात्क्षणिक चाल शून्य होती है।
संख्या रेखा की परिकल्पना (कॉन्सेप्ट्)
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In Brhadaranyaka Aankarabhasya (4.4.25) Srisankara has developed the concept of number line. In his own words
एकप्रभृत्यापरार्धसंख्यास्वरूपपरिज्ञानाय रेखाध्यारोपणं कृत्वा एकेयं रेखा दशेयं, शतेयं, सहस्रेयं इति ग्राहयति, अवगमयति, संख्यास्वरूम, केवलं, न तु संख्याया: रेखातत्त्वमेव
जिसका अर्थ यह है-
1 unit, 10 units, 100 units, 1000 units etc. up to parardha can be located in a number line. Now by using the number line one can do operations like addition, subtraction and so on.
पाई
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अपरिमेय (इर्रेशनल) के रूप में पाई
आर्यभट ने पाई ( π ) के सन्निकटन (approximation) पर कार्य किया और शायद उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया था कि पाई अपरिमेय (इर्रेशनल) है। आर्यभटीय (गणितपाद) के दूसरे भाग में वह लिखते हैं:
चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्त्राणाम्।
अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्य आसन्नौ वृत्तपरिणाहः॥
१०० में चार जोड़ें, आठ से गुणा करें और फिर ६२००० जोड़ें। इस नियम से २०००० परिधि के एक वृत्त का व्यास ज्ञात किया जा सकता है।
(१०० + ४) * ८ + ६२०००/२०००० = ३.१४१६
पृथ्वी गतिशील है
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अनुलोम-गतिस् नौ-स्थस् पश्यति अचलम् विलोम-गम् यद्-वत् ।
अचलानि भानि तद्-वत् सम-पश्चिम-गानि लङ्कायाम् ॥ (आर्यभटीय गोलपाद ९)
जैसे एक नाव में बैठा आदमी आगे बढ़ते हुए स्थिर वस्तुओं को पीछे की दिशा में जाते देखता है, बिल्कुल उसी तरह श्रीलंका में (अर्थात भूमध्य रेखा पर) लोगों द्वारा स्थिर तारों को ठीक पश्चिम में जाते हुए देखा जाता है।
सतत भिन्न द्वारा अनिर्धार्य समीकरण का हल
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Indian scholar Narayana (1350 A. D.) composed two books, viz. (i) बीजगणितम and (ii) गणितकौमुदी. He perhaps used the knowledge of simple recurring continued fraction in the solution of the indeterminate equation of type Nx2 + K<su2 = y2.
Result I. (Ganita Kaumudi, Varga prakrti Vss. 2−412)
hrasvajyesthaksepan kramasastesamadho nyaset tanstu
anyanyesam nyasa stasya bhaved bhavana-nama || 2 ||
vajrabhyasau hrasva jyesthakayoh samyutirbhaved hrasvam
laghughatah prakrtihato jyesthavadhenanvito jyestham || 3 ||
ksiptorghatah ksepah syad vajrabhyasayorviseso va
hrasvam lavdhorghatah prakrtighno jyesthyosca vadhah || 4 ||
tadvivaram jyesthapadam ksepah ksiptyoh prajayate ghatah 412
अंग्रेजी अनुवाद:
Set down successively (क्रमशः) the lesser (ह्रस्व) root, greater (ज्येष्ठ) root and interpolator (क्षेप) and below them set down in order the same or another (set of similar quantities). [From them by the principle of composition can be obtained numerous roots]. The principle of composition (भवन) will be explained here.
"(Find) the two cross products (वज्रभ्यासो) of the two lesser and two greater roots ; their sum is a lesser root. Add the product of the two lesser roots multiplied by prakrti to the product of the two greater roots. The sum will be a greater root. (3).
In that (equation) the interpolator will be the product of the two previous interpolators. Again the difference of the two cross products is a lesser root. Subtract the product of the two lesser roots multiplied by prakrti from the product of the greater roots; (The difference) will be a greater root. Here also the interpolator is the product of the two (previous) interpolator (4,412)."
छन्दशास्त्र में गणित
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पिंगल के छन्दशास्त्र में 'मेरूप्रस्तर' नाम से पास्कल त्रिकोण (पास्कल ट्रैंगिल) की चर्चा है। हलायुध ने इस पर 'मृतसंजीवनी' नामक टीका लिखी है।
हलायुध के व्याख्यान से उद्धृत-
परे पूर्णमिति । उपरिष्टादेकं चतुरस्रकोष्ठं लिखित्वा तस्याधस्तात् उभयतोर्धनिष्क्रान्तं कोष्ठद्वयं लिखेत् । तस्याप्यधस्तात् त्रयं तस्याप्यधस्तात् चतुष्टयं यावदभिमतं स्थानमिति मेरुप्रस्तारः । तस्य प्रथमे कोष्ठे एकसंख्यां व्यवस्थाप्य लक्षणमिदं प्रवर्तयेत् । तत्र परे कोष्ठे यत् वृत्तसंख्याजातं तत् पूर्वकोष्ठयोः पूर्णं निवेशयेत् ।
चक्रीय चतुर्भुज का क्षेत्रफल
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ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के गणिताध्याय के क्षेत्रव्यवहार के श्लोक १२.२१ में निम्नलिखित श्लोक वर्णित है-
स्थूल-फलम् त्रि-चतुर्-भुज-बाहु-प्रतिबाहु-योग-दल-घातस् ।
भुज-योग-अर्ध-चतुष्टय-भुज-ऊन-घातात् पदम् सूक्ष्मम् ॥
(त्रिभुज और चतुर्भुज का स्थूल (लगभग) क्षेत्रफल उसकी आमने-सामने की भुजाओं के योग के आधे के गुणनफल के बराबर होता है। तथा सूक्ष्म (exact) क्षेत्रफल भुजाओं के योग के आधे में से भुजाओं की लम्बाई क्रमशः घटाकर और उनका गुणा करके वर्गमूल लेने से प्राप्त होता है। )
ब्रह्मगुप्त प्रमेय
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चक्रीय चतुर्भुज के विकर्ण यदि लम्बवत हों तो उनके कटान बिन्दु से किसी भुजा पर डाला गया लम्ब सामने की भुजा को समद्विभाजित करता है।
ब्रह्मगुप्त ने श्लोक में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है-
त्रि-भ्जे भुजौ तु भूमिस् तद्-लम्बस् लम्बक-अधरम् खण्डम् ।
ऊर्ध्वम् अवलम्ब-खण्डम् लम्बक-योग-अर्धम् अधर-ऊनम् ॥ -- (ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त, गणिताध्याय, क्षेत्रव्यवहार १२.३१)
वर्ग-समीकरण का व्यापक सूत्र
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ब्रह्मगुप्त का सूत्र इस प्रकार है —
वर्गचतुर्गुणितानां रुपाणां मध्यवर्गसहितानाम् ।
मूलं मध्येनोनं वर्गद्विगुणोद्धृतं मध्यः ॥ -- ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत - 18.44
अर्थात :-
व्यक्त रुप (c) के साथ अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित गुणांक (4ac) को अव्यक्त मध्य के गुणांक के वर्ग (b²) से सहित करें या जोड़ें। इसका वर्गमूल प्राप्त करें तथा इसमें से मध्य अर्थात b को घटावें। पुनः इस संख्या को अज्ञात ञ वर्ग के गुणांक (a) के द्विगुणित संख्या से भाग देवें। प्राप्त संख्या ही अज्ञात ञ राशि का मान है।
श्रीधराचार्य ने इस बहुमूल्य सूत्र को भास्कराचार्य का नाम लेकर अविकल रुप से उद्धृत किया —
चतुराहतवर्गसमैः रुपैः पक्षद्वयं गुणयेत् ।
अव्यक्तवर्गरूपैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम् ॥ -- भास्करीय बीजगणित, अव्यक्त-वर्गादि-समीकरण, पृ. - 221
अर्थात :-
प्रथम अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित रूप या गुणांक (4a) से दोनों पक्षों के गुणांको को गुणित करके द्वितीय अव्यक्त गुणांक (b) के वर्गतुल्य रूप दोनों पक्षों में जोड़ें। पुनः द्वितीय पक्ष का वर्गमूल प्राप्त करें।
आर्यभट की ज्या (Sine) सारणी
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आर्यभटीय का निम्नांकित श्लोक ही आर्यभट की ज्या-सारणी को निरूपित करता है:
मखि भखि फखि धखि णखि ञखि ङखि हस्झ स्ककि किष्ग श्घकि किघ्व ।
घ्लकि किग्र हक्य धकि किच स्ग झश ङ्व क्ल प्त फ छ कला-अर्ध-ज्यास् ॥
माधव की ज्या सारणी
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निम्नांकित श्लोक में माधव की ज्या सारणी दिखायी गयी है। जो चन्द्रकान्त राजू द्वारा लिखित 'कल्चरल फाउण्डेशन्स आफ मैथमेटिक्स' नामक पुस्तक से लिया गया है।
श्रेष्ठं नाम वरिष्ठानां हिमाद्रिर्वेदभावनः।
तपनो भानुसूक्तज्ञो मध्यमं विद्धि दोहनं।।
धिगाज्यो नाशनं कष्टं छत्रभोगाशयाम्बिका।
म्रिगाहारो नरेशोऽयं वीरोरनजयोत्सुकः।।
मूलं विशुद्धं नालस्य गानेषु विरला नराः।
अशुद्धिगुप्ताचोरश्रीः शंकुकर्णो नगेश्वरः।।
तनुजो गर्भजो मित्रं श्रीमानत्र सुखी सखे!।
शशी रात्रौ हिमाहारो वेगल्पः पथि सिन्धुरः।।
छायालयो गजो नीलो निर्मलो नास्ति सत्कुले।
रात्रौ दर्पणमभ्राङ्गं नागस्तुङ्गनखो बली।।
धीरो युवा कथालोलः पूज्यो नारीजरैर्भगः।
कन्यागारे नागवल्ली देवो विश्वस्थली भृगुः।।
तत्परादिकलान्तास्तु महाज्या माधवोदिताः।
स्वस्वपूर्वविशुद्धे तु शिष्टास्तत्खण्डमौर्विकाः।। २.९.५
पाई (π) का मान
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निम्नलिखित श्लोक में संगमग्राम के माधव ने वृत्त की परिधि और उसके व्यास का सम्बन्ध (अर्थात पाई का मान) बताया है जो इस श्लोक में भूतसंख्या के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है-
विबुधनेत्रगजाहिहुताशनत्रिगुणवेदाभवारणबाहवः
नवनिखर्वमितेवृतिविस्तरे परिधिमानमिदं जगदुर्बुधः
इसका अर्थ है- 9 x 1011 व्यास वाले वृत्त की परिधि 2872433388233 होगी।
33 2 8 8
विबुध (देव) नेत्र गज अहि (नाग)
3 3 3
हुताशन (अग्नि) त्रि गुण
4 27 8 2
वेदा भ (नक्षत्र) वारण (गज) बाहवै (भुजाएँ)
त्रिभुज के अन्तःवृत्त की त्रिज्या
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परिधेः पादेन भजेदनायतक्षेत्रसूक्ष्मगणितं तत् ।
क्षेत्राभ्यन्तरवृत्ते विष्कम्भोsयं विनिर्दिष्टः॥ -- गणितसारसंग्रह २२३ १/२
The area of any rectangualar figure other than rectangle divided by one-fourth of the perimeter gives the diameter of the inscribed circle.
पूर्णांक को इकाई भिन्नों के रूप में व्यक्त करना
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To express 1 as the sum of n unit fractions (गतिणसारसंग्रह कलासवर्ण 75, examples in 76):
रूपांशकराशीनां रूपाद्यास्त्रिगुणिता हराः क्रमशः ।
द्विद्वित्र्यंशाभ्यस्ताव आदिमचरमौ फले रूपे ॥
When the result is one, the denominators of the quantities having one as numerators are [the numbers] beginning with one and multiplied by three, in order. The first and the last are multiplied by two and two-thirds [respectively].
1 = 1 1 ⋅ 2 + 1 3 + 1 3 2 + ⋯ + 1 3 n − 2 + 1 2 3 ⋅ 3 n − 1
भास्कराचार्य ने लीलावती में लिखा है-
तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः दोष्कर्णवर्गयोर्विवरात् ।
मूलं कोटिः कोटिश्रुतिकृत्योः अन्तरात् पदं बाहुः ॥
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