कोकिला वन, जहां शनिदेव को कोयल बन भगवान श्री कृष्ण ने दर्शन दिए थे।

कोकिला वन की स्थिति:

राधे राधे जय श्री कृष्णा चलिए आज हम आपको लेकर के चलते हैं शनि महाराज के दूसरे सबसे बड़े धाम कोकिलावन में जो मथुरा में स्थित है।

शनिदेव का नाम लेते ही जैसे शिंगणापुर धाम की यादें ताजा होती है वैस ही उत्तर प्रदेश के कोसी कला गांव के पास स्थित कोकिलावन के शनिदेव जी की यादें भी ताजा हो जाती हैं। यह उत्तर प्रदेश के मथुरा के कोसीकलां गांव के पास स्थित दूसरा सिद्ध धाम है, जहां दर्शन मात्र से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। 

मथुरा-दिल्ली नेशनल हाइवे पर मथुरा से 21 किलोमीटर दूर कोसीकलां गांव पड़ता है। यहां से एक रास्‍ता नंदगांव तक आता है, वहीं से कोकिला वन शुरू हो जाता है। कोकिलावन मथुरा से लगभग 40 किलोमीटर दूर तथा तथा गोवर्धन से 19 किलोमीटर दूर है।

जैसे शिंगणापुर के शनि देव दक्षिण भारत के प्रतिष्ठित देव हैं वैसे ही कोकिलावन के शनि महाराज उत्तर भारत के प्रतिष्ठित देव है।

कोकिलावन धाम में एक नहीं दो-दो भगवानों का  मिलता है, आशीर्वाद।

कोकिलावन धाम में एक नहीं दो-दो भगवानों का आशीर्वाद मिलता है। यहां आने पर हमें शनिदेव के साथ कृष्‍ण भगवान भी विराजते हैं। कहा जाता है कि यहां दर्शन करने से कृष्ण भगवान का सौभाग्य तो मिलता ही है, साथ ही शनि दोषों से मुक्ति भी मिल जाती है।

कोकिला वन और शनिदेव की कथा:

माना जाता है कि द्वापरयुग में जब भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा में जन्म लिया तो सभी देव किसी न किसी रूप में उनके दर्शन करने के लिए आने लगी। इसी उत्सुकता में शनिदेव भी अपने आराध्य भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप के दर्शन करने के लिए नंदगांव आए। 

जब मैं यशोदा को इस बात का पता चला तो हमें बहुत चिंता में कि कहीं उनके लाला पर शनि देव की वक्र दृष्टि न पड़ जाएं। मां यशोदा ने यही बात नंद बाबा के सामने रखी। नंद बाबा समझ गए कि यशोदा का कारण सही है। इस कारण शनिदेव को नंद बाबा ने रोक दिया, क्‍योंकि वे भी उनकी वक्र दृष्‍टि से भयभीत हो गए थे। 

इस पर शनिदेव भी अपनी जिद पर डट गए उन्हें दुख हुआ कि उन्हें उनके इष्टदेव के दर्शन करने से वंचित किया जा रहा है। तब दुखी शनिदेव को सांत्‍वना देने के लिए कृष्‍ण ने संदेश दिया कि नंदगांव से सटा कोकिला वन उनका वन है। वे नंद गांव के निकट के इस वन में मेरा इंतजार करें। मैं आपको दर्शन अवश्य दूंगा परंतु अभी सही वक्त नहीं है। मैं दर्शन देने के लिए वहीं प्रकट होंऊंगा। श्री कृष्ण की बात मानकर शनिदेव निकट के वन में जाकर भगवान श्री कृष्ण की तपस्‍या करने लगे। 

समय आने पर भगवान श्री कृष्‍ण ने शनिदेव जी को वन में कोयल रूप में दर्शन दिया। यही कारण है कि इस स्‍थान या वन का नाम कोकिला वन पड़ा। शनिदेव ने इस स्‍थान पर घोर तप किया। उसके बाद से भगवान श्री कृष्ण की आज्ञा से वे कोकिलावन धाम में ही रहने लगे। 

मिलती है शनि की कृपा

भगवान श्री कृष्‍ण ने शनिदेव से आग्रह किया कि वे कोकिलावन धाम में ही विराजमान हो जाए। साथ ही में भी इस स्थान पर तुम्हारे साथ ही रहूंगा। अतः इनके बाईं ओर कृष्ण, राधा जी के साथ विराजमान हैं। 

साथ ही भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि जो लोग इस स्‍थान पर आकर उनके दर्शन करेंगे। उन पर शनि की वक्रदृष्‍टि नहीं पड़ेगी, बल्‍की उनकी सभी ‍ इच्छाएं पूर्ण होंगी। भक्तगण यहां किसी भी प्रकार की परेशानी लेकर आते हैं तो शनिदेव उनकी परेशानी दूर कर उनके सभी कष्ट हर लेते हैं। जो लोग कोकिला वन आकर शनि महाराज के दर्शन करते हैं उन्हें शनि की दशा, साढ़ेसाती और ढैय्या में शनि नहीं सताते।

माना जाता है कि यहां आने वाले सभी लोगों की मनोकामना पूर्ण होती है। इसी उम्मीद के साथ यहां शनिवार के दिन दूर-दूर से सैकड़ों भक्तगण अपनी फरियाद लेकर आते हैं और अपनी झोली भरकर जाते हैं। शनिवार के दिन यहां भारी भीड़ होती है। देश-विदेश से कृष्ण दर्शन को मथुरा आने वाले हजारों श्रद्धालु यहां आकर शनिदेव के दर्शन करते हैं। 

सवा कोस की परिक्रमा फिर स्नान

जो भी व्यक्ति कोकिलावन की श्रद्धा और भक्ति के साथ परिक्रमा करेगा, उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे। अतः इस वन की परिक्रमा करने से सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। कोकिलावन धाम की परिक्रमआ लगभग सवा कोसीय भगवान लगभग 4 किलोमीटर की परिक्रमा हैं। जो लोग कोकिलावन धाम की परिक्ररमा कर सूर्यकुंड में स्नान कर शनिदेव की प्रतिमा पर तेल आदि चढ़ाकर पूजा अर्चना करते हैं। 

मान्‍यता है कि यहां राजा दशरथ द्वारा लिखा शनि स्तोत्र पढ़ते हुए परिक्रमा करने से शनि की कृपा प्राप्त होती है। कोकिला धाम में हर शनिवार को लाखों श्रद्धालु आते हैं। यहां आकर ये श्रद्धालु 'ॐ शं शनिश्चराय नम:' और 'जय शनि देव' का उच्चारण करते हुए परिक्रमा करते हैं। इस मार्ग पर लोग जरूरतमंदों को दान भी करते हैं। यह शनि देव और उनके गुरु बरखंडी बाबा का बहुत प्राचीन मंदिर है। 

क्यों सिद्ध कहलाता है कोकिला वन का शनिदेव मंदिर:

कोकिला धाम में श्री शनि देव मंदिर, श्री गोकुलेश्वर महादेव मंदिर, श्री गिरिराज मंदिर, श्री बाबा बनखंडी मंदिर, श्री देव बिहारी मंदिर प्रमुख हैं। मंदिरों के अलावा यहां दो प्राचीन सरोवर और एक गौशाला भी स्थित हैं। यहां पर हनुमान जी का मंदिर भी स्थित हैं कहते हैं कि सबसे पहले हनुमान जी की पूजा और दर्शन करें क्योंकि हनुमान जी की पूजा करने वाले को शनि महाराज दंड नहीं देते। 

कोकिला वन और सूर्य कुंड:

परिक्रमा पूरी होने के बाद लोग पवित्र सूर्य कुंड में स्नान कर शनि महाराज के दर्शन करने का विधान है। 

कुंड के पास ही नवग्रह और भगवान शिव का मंदिर है। शनि महाराज के दर्शन के बाद श्रद्घालु इन मंदिरों में आकर पूजा करते हैं। तो आइए कुंड में डुबकी लगाकर हम भी अपनी यात्रा की थकान मिटाते हैं।

ज्योतिषशास्त्र में तिल, तेल, उड़द, काला वस्त्र, लोहे की वस्तु आदि को शनि महाराज को प्रसन्न करने का यह साधन बताया गया है। तो आप अपनी इच्छा के अनुसार इन वस्तुओं से महाराज शनि देव की पूजा करनी चाहिए। मंदिर प्रांगण में मंदिर के मुख्य द्वार पर ही अनेक दुकानें हैं, जिनमें शनिदेव की पूजा का पूरा सामान मिल जाता है। जहां से आप अपनी श्रद्धा के अनुसार खरीद सकते हैं। 

शनि महाराज के दर्शन

मंदिर के बीच में एक ऊंचे से चबूतरे पर शनि महाराज का चतुर्मुखी विग्रह है। यहां आप चारों दिशाओं से शनि महाराज का तैल से अभिषेक कर सकते हैं। आप यहां अपनी इच्छा के अनुसार तेल का अर्पण कर सकते हैं। यहां आपको ऐसे-ऐसे श्रद्घालु को भी देख सकते हैं, जो 5 से 10 लीटर तक सरसों तेल एक बार में शनि महाराज को अर्पित कर देते हैं। 
मंदिर एक पवित्र स्थान होता है आते हैं यहां पर गंदगी नहीं खिलानी चाहिए आप लोग कुछ ऐसे श्रद्धालुओं को भी देख सकते हैं जो तैलाभिषेक करके बोतल वहीं छोड़कर चले जाते हैं। डालना चाहिए ताकि मंदिर में साफ-सफाई बनी रहे। यदि आप मंदिर में गंदगी फैलाएंगे तो ऐसा करने से शनिदेव प्रसन्न होने की बजाय नराज हो जायेगें।

कोकिला वन 

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