Spiritual Healing Vibes blog channel is presented to introduce with spiritual and Cosmic Healing Vibrations.The purpose of Spiritual Healing Vibes blog channel is to heal you by the Cosmic Energy of Universe. Science has confirmed that everything in the Universe, including us, is pure energy vibrating at different frequencies. By the vibrations of positive thinking we can change our destiny.
श्री दुर्गासप्तशती माहात्म्य
| ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।। |
| मेरी आन रखना मेरी शान रखना, मेरी मैय्या बेटे का तुम ध्यान रखना बनाना मेरे भाग्य दुःख दूर करना, तू है लक्ष्मी मेरे भण्डार भरना। न निराश दर से मुझे तू लौटाना, सदा बैरियों से मुझे तू बचाना मुझे तो तेरा बल है विशवास तेरा, तेरे चरणों में है नमस्कार मेरा। चामुण्डा दसों दिशाओं में हर कष्ट तुम मेरा हरो, संसार में माता मेरी रक्षा करो रक्षा करो रक्षा करो मातेश्वरी दास के कष्ट मिटाओ, मेरी रक्षा को सदा सिंह चढ़ी माँ आओ। |
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ:। निर्विघ्नं कुरुमेदेव सर्वकार्येशु सर्वदा।। |
| परम गुरु भगवान शिव का दक्षिणामूर्ति रूप |
ततपदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
प्रथमे गुरु वंदना करां, फेर मनवा गणेश
सिमरा माता शारदा, मेरे कंठ करो परवेश, जय माँ
मेरी आन रखना मेरी शान रखना
माँ बछड़ा विनती करे, देयो चरना दा प्यार
चिंतपूर्णी चिंता हरो, काली दयो वरदान, जय माँ
चिंतपूर्णी चिंता हरो, काली दयो वरदान, जय माँ
मेरी आन रखना मेरी शान रखना
उच्चा भवन रंगील्डा, विच्च पिण्डी दा वास
सूरज लै के निकल्दा, ज्योति तो परकाश, जय माँ
मेरी आन रखना मेरी शान रखना
बेड़ा साडा डोलदा, विच सारा परिवार
बालिया वाजां मारदा, आ हो के शेर सवार, जय माँ
मेरी आन रखना मेरी शान रखना
बक्शो बक्शो मात वैष्णों, असी बछड़े अंजान
चरना दे नाल ला लवो, हो जाए कल्याण, जय माँ
बक्शो बक्शो मात वैष्णों, असी बछड़े अंजान
चरना दे नाल ला लवो, हो जाए कल्याण, जय माँ
मेरी आन रखना मेरी शान रखना
माँ अपने दास दी करो विनती मंजूर
मैय्या सब नू कर देयो अन्न धन नाल भरपूर, जय माँ
मैय्या सब नू कर देयो अन्न धन नाल भरपूर, जय माँ
मेरी आन रखना मेरी शान रखना
मिटटी का तन हुआ पवित्र गंगा के स्नान से
अंताकरण हो जाये पवित्र जगदम्बे के ध्यान से।
सर्व मंगल मंगलेय शिवे सर्वार्थ साधिके
शरण्यं त्रियम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते।
शक्ति, शक्ति दो मुझे करुँ तुम्हारा ध्यान
पाठ निर्विघ्न हो तेरा मेरा हो कल्याण।
ह्रदय सिंघासन पैर आ बैठो मेरी मात
सुनो विनय मम दीन की जग जननी वरदात।
सुंदर दीपक घी भरा करुँ आज तैयार
ज्ञान उजाला माँ करो मेटो मोह अंधकार।
चंद्र सूरज की रौशनी चमके 'चमन' अखंड
सर्व व्यापक तेज है ज्वाला का प्रचंड।
ज्वाला जगजननी मेरी रक्षा करो हमेश
दूर करो माँ अम्बिके मेरे सभी कलेश।
श्रद्धा और विशवास से तेरी ज्योत जगाऊँ
तेरा ही है आसरा तेरे ही गुण गाऊँ।
तेरी अद्भुद गाथा को पढ़ू मैं निश्चय धार
साक्षात दर्शन करुँ तेरे जगत आधार।
मन चंचल यह पाठ के समय जो अवगुण होय
दाती अपनी दया से ध्यान न देना कोय।
मैं अनजान मलिन मन न जानू कोई रीत
अटपट वाणी को ही माँ समझो मेरी प्रीत।
मेरे अवगुण बहुत हैं करना नहीं ध्यान
सिंह वाहिनी आम्बिके करो मेरा कल्याण।
धन्य धन्य माँ अम्बिके शक्ति शिवा विशाल
अंग अंग में रम रही दाती दीन दयाल।
'चमन'
भजन सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें
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ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।।
शक्ति ध्यान
मैं तीन नेत्रों से सुशोभित सर्वशक्तिस्वरूपिणी भगवती दुर्गा देवी का ध्यान करती हूँ, जिनके श्रीअङ्गो की प्रभा प्रभातकाल के सूर्य के समान है, जो सिंह की पीठ पर विराजमान हैं, जिनका सवरूप अग्निमय है तथा वे माथे पर चंद्रमा का मुकुट धारण करतीं हैं। लाल रंग की रेशमी साड़ी तथा कभी न कुम्हलाने वाले कह्लार पुष्पों की माला जिनके श्री अंगों में शोभित हो रही है, जो उभरे हुए स्तनों वाली, जिनके मुख पर मुस्कान की छटा छाई हुई है, वे महान बल तथा असीम पराक्रम वाली, मुक्तकेशी, लाल रंग के गुलाब के फूलों को धारन करके प्रसन्न रहने वाली हैं, रत्न जिनको बहुत प्रिय हैं, जिनके भिन्न भिन्न अंग बंधे हुए हीरे मोती जड़ित बाजूबंद, दिव्य चूडामणि, कुण्डल, सुन्दर हंसली, रत्नजडित अंगूठियां, नौलखा हार, हीरे जड़ित कंगन, खनखनाती हुई करघनी और पैरों में रुनझुन करते हुए नूपुर जिनकी शोभा बढ़ा रहे हैं, जो अपनी अनेक भुजाओं में सुन्दर अक्षमाला, कमल, बाण, खडक, वज्र, गदा, चक्र, त्रिशूल, परशु, शंख, घंटा, पाश, शक्ति, दण्ड, ढाल, धनुष, पानपात्र, कमण्डलु, फरसा, अँकुश धारण करती है, मैं उन कल्याणकत्रीं भगवती दुर्गा देवी को प्रणाम करती हूँ। हे महात्रिपुरसुन्दरी! हे श्रीमहाविद्या! हे ब्रह्म-विष्णु-रुद्ररूपिणी देवी! आप पाप नाश करने वाली हो, कालरूपिणी हो , अन्तरहित हो, विज्याधिष्ठात्री हो, निर्दोष हो, शरण लेने योग्य हो, ऐसी मंगलरूपिणी देवी को मैं सदा प्रणाम करती हूँ। माँ ! मैं भक्ति भाव से आपकी शरण में आई हूँ, आप मुझे अपनी शरण में ले लें, तथा मुझे यह ब्लॉग लिखने की शक्ति और ज्ञान प्रदान करें। आप मेरा कल्याण करें तथा प्रकार से मेरी रक्षा करें व कृपा कर मुझे अपनी असीम भक्ति प्रदान करें।
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श्री दुर्गासप्तशती
दुर्गा सप्तशती का वर्णन प्राचीन ग्रन्थ ' श्रीमार्कण्डेय पुराण ' में अध्याय 81 - 93 में किया गया है। दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय तथा 700 श्लोक हैं। दुर्गा सप्तशती को चण्डी पाठ अथवा देवी माहात्म्य भी कहा जाता है। दुर्गा देवी माहात्म्य में सम्पूर्ण संसार की सर्वोच्चय शक्ति दुर्गा देवी की मूल प्रकृति के रूप में स्तुति की गयी है।
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| श्रीदुर्गासप्तशती इस Blog में लिखी देवी महिमा तथा देवी के पार्दुभाव की सुन्दर कथाएँ, गीता प्रेस, गोरखपुर की पुस्तक श्रीदुर्गासप्तशती से ली गयीं हैं जिसके लिए मैं गीता प्रेस, गोरखपुर की आभारी हूँ। Amazone से ऑनलाइन Geeta Press, Gorakhpur की पुस्तक श्रीदुर्गासप्तशती मंगवाने के लिए नीचे दिए हुए link पर क्लिक करें⟱ Shree Durga Saptshati |
दुर्गा सप्तशती के पाठ और साधना करने से से जो पुण्य प्राप्त होता है उस की कभी भी समाप्ति नहीं होती क्यूंकि दुर्गा सप्तशती की साधना संसार की सबसे शक्तिशाली साधना है। इस साधना को करने से सकारात्मक तरंगे पैदा होती है जो साधक के चारों तरफ रक्षा कवच का निर्माण करती हैं। जिस स्थान पर दुर्गा सप्तशती के उत्तम चरित्रों का विधिपूर्वक एकाग्रता से पाठ किया जाता है वहां महान ऊर्जा का संचार होता हैं तथा स्वयं भगवती दुर्गा वहां निवास करती हैं जिससे साधक बलवान, शक्तिशाली, निर्भय, और धनवान हो जाता है। शत्रुओं पर विजयी होने के साथ उस के सभी काम निर्विघ्नता से पूर्ण होते हैं। वह साधक वाक सिद्धि को प्राप्त करता है। वह घर बहुत भाग्यशाली है जहाँ दुर्गा सप्तशती के पादुर्भाव की सुन्दर कथाएँ कही जाती है, उस स्थान को छोड़ भगवती दुर्गा देवी कभी नहीं जाती। दुर्गा सप्तशती देवी के साधकों के लिए वरदान है।साधकों को शुभ फल देने वाला है। दुर्गा शप्तशती के 13 अध्याय जो 700 मन्त्रों का शक्तिशाली भंडार हैं, जिस को तीन चरित्रों में दर्शाया गया है। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली हैं। मध्यमचरित्र की देवी महालक्ष्मी हैं तथा उत्तरचरित्र की महासरस्वती देवी हैं। इसमें कथा के अनुसार देवी संसार के कल्याण के लिए प्रकट हो कर असुरों का वध करती है तथा देवताओं और भक्तों को वरदान देती है कि जब भी इस संसार पर कोई कष्ट आएगा अथवा प्रेम और भक्ति भाव से जब भी मुझको याद करोगे, मैं आ कर सदा ही रक्षा करुँगी।
श्रीदुर्गासप्तशती ग्रन्थ में लिखा गया तेरह अध्याय और सात सौ श्लोकों का यह चण्डी पाठ, सप्तश्लोकी दुर्गा, श्रीदुर्गाष्टोतरशतनाम स्तोत्र, देवी कवच, अर्गलास्तोत्रं, कीलक स्तोत्र, रात्रिसूक्तम, श्री देव्यथर्वशीर्षम , नर्वाण विधि, देवी सूक्तम, तीनो रहस्य, दुर्गाद्वात्रिंशत्राममाला, सिद्धकुज्जिकास्तोत्रम, देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रं के साथ श्री दुर्गा सप्तशती पुस्तक में दिए गए निर्देशों को ध्यान में रख कर पढ़ना चाहिए अथवा किसी योग्य गुरु से श्री दुर्गा सप्तशती की दीक्षा लेनी चाहिए। गुरु कृपा से यह साधना अति सरल हो जाती है एवं जल्दी फलीभूत होने लगती है। श्री दुर्गा सप्तशती की साधना भोग और मोक्ष की साधना है। अथार्त साधक अपने जीवन में सब सुखों को भोगता हुआ अंत में मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है। यह साधना अक्षय फल देने वाली है। अतः सदा ही चंडिका देवी की साधना करनी चाहिए।
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श्रीदुर्गा सप्तशती पाठ विधि
साधक स्नान कर के पवित्र हो कर लाल वस्त्र धारण कर ले तथा शुद्ध ऊनी आसान पर पूर्वाभिमुख हो कर बैठ जायें। दुर्गा देवी की मिट्टी की मूर्ति या कोई चित्र या देवी का यंत्र लाल रेशमी आसान पर स्थापित करें। दीपक प्रज्वलित करें एवं सुगंधि करें। देवी का आवाहन करें। दुर्गा देवी को सुन्दर लाल चुनरी, श्रृंगार, लाल चूड़ियाँ, लाल चन्दन, शुद्ध जल, लाल गुलाब के पुष्प, ऋतू फल, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, नारियल, पंचमेवा, पंचामृत, बेलपत्र , भेंट करें। श्रीदुर्गासप्तशती पुस्तक को अपने सामने काष्ठ के आसान पर विराजमान कर लें तथा साथ में और पूजनसामग्री रख ले। अपने ललाट में रूचि अनुसार भस्म, चन्दन या रोली लगा ले, शिखा बाँध ले। नवरात्री में विशेष रूप से कलश स्थापना एवं आखंड दीप की स्थापना की जाती है तथा कन्या पूजन और होम किया जाता है। निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण कर साधना आरम्भ करें :
ॐ श्री गणेशाय नमः
ॐ ऐं आत्मतत्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्वं शोधयामि नमः स्वाहा।।
ॐ क्लीं शिवतत्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्वं शोधयामि नमः स्वाहा।।
तत्पश्तात प्राणायाम करके श्री गणेश का ध्यान करें और अपने गुरु का ध्यान करें। हाथ में जल, अक्षत , लाल फूल ले कर संकल्प करें। देवी का ध्यान करते हुए पुस्तक की पूजा करें। योनिमुद्रा का प्रदर्शन कर के भगवती को प्रणाम करें। फिर मूल नर्वाण मन्त्र से शक्ति का आवाहन करें। शापोद्वार, उत्कीलन मन्त्र जप, मृतसंजीवनी विद्या का जप करते हुए आरम्भ में चण्डिका -शाप -विमोचन मन्त्रों का पाठ करना चाहिए। यंत्र पूजन करें तथा छः अंगों सहित दुर्गा पाठ आरम्भ करें। कवच, अर्गला, कीलक, और तीनो रहस्य यह ही सप्तशती के छः अंग माने गए हैं।
श्रीदुर्गासप्तशती ग्रन्थ में लिखा गया तेरह अध्याय और सात सौ श्लोकों का यह चण्डी पाठ, सप्तश्लोकी दुर्गा, श्रीदुर्गाष्टोतरशतनाम स्तोत्र, देवी कवच, अर्गलास्तोत्रं, कीलक स्तोत्र, रात्रिसूक्तम, श्री देव्यथर्वशीर्षम , नर्वाण विधि, देवी सूक्तम, तीनो रहस्य, दुर्गाद्वात्रिंशत्राममाला, सिद्धकुज्जिकास्तोत्रम, देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रं के साथ श्री दुर्गा सप्तशती पुस्तक में दिए गए निर्देशों को ध्यान में रख कर पढ़ना चाहिए अथवा किसी योग्य गुरु से श्रीदुर्गासप्तशती की दीक्षा लेनी चाहिए। गुरु कृपा से यह साधना अति सरल हो जाती है एवं जल्दी फलीभूत होने लगती है। श्री दुर्गा सप्तशती की साधना भोग और मोक्ष देने वाली साधना है। यह साधना अक्षय फल देने वाली है।अतः सदा ही चंडिका देवी की साधना करनी चाहिए।
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श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रमं
ईश्वर उवाच
शतनाम प्रवक्ष्यामि श्रृणुष्व कमलानने।
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥
ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्र शूलधारिणी।। २।।
पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघंटा महातपा:।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चिति: ।।३।।
सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।
अनंता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागति:।।४।।
शाम्भवी देवमाता च चिंता रत्नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयागीविनाशिनी।।५।।
अर्पणानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमज्ज़ीररज्जिनी ।। ६।।
अमेयविक्रमा क्रूरा सुंदरी सुरसुंदरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता ।। ७।।
ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीच्श्र पुरुषाकृति:।। ८।।
विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ।। ९।।
निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ।। १०।।
सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा।। ११।।
अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यति:।। १२।।
अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला।। १३।।
अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी।। १४।।
शिवदूती कराली च अनंता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी।।१५।।
य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति॥१६॥
धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्॥१७॥
कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।
पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम्॥१८॥
तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात्॥१९॥
गोरोचनालक्तककुङ्कुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः॥२०॥
भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्॥२१॥
इति श्रीविश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं समाप्तम्।
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ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनी विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।।
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चंडिका-शाप-विमोचन मन्त्र
चण्डिका शाप विमोचन मंत्र के पाठ को करने से देवी की पूजा में की गयी किसी भी प्रकार त्रुटि से मिला श्राप खत्म हो जाता है।
विनियोग ऊँ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचन मन्त्रस्य वसिष्ठनारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषय: सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्रीं शक्ति: त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तो मम संकल्पितकार्यसिद्धयर्थे जपे विनियोग:।
शापविमोचन मंत्र
ॐ (ह्रीं) रीं रेत:स्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१॥
ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिणये महिषासुरसैन्य नाशिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥२॥
ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥३॥
ॐ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥४॥
ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥५॥
ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥६॥
ॐ तं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥७॥
ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥८॥
ॐ जां जातिरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥९॥
ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१०॥
ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥११॥
ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफ़लदात्र्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१२॥
ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१३॥
ॐ माँ मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमासहितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१४॥
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१५॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नम: शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१६॥
ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फ़ट स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१७॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नम:॥१८॥
इत्येवं हि महामन्त्रान पठित्वा परमेश्वर,चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशय:॥१९॥
एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति य:,आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशय:॥२०॥
श्रीदुर्गामार्पणामस्तु
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अथ कीलकम्
ॐ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य, शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहासरस्वती देवता,
मार्कण्डेय उवाच
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।
कृत्वा निमंत्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम्।।५।।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्निमंत्रणाम्।।६।।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः।।७।।
इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम्।।८।।
चण्डिका शाप विमोचन मंत्र के पाठ को करने से देवी की पूजा में की गयी किसी भी प्रकार त्रुटि से मिला श्राप खत्म हो जाता है।
विनियोग ऊँ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचन मन्त्रस्य वसिष्ठनारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषय: सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्रीं शक्ति: त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तो मम संकल्पितकार्यसिद्धयर्थे जपे विनियोग:।
शापविमोचन मंत्र
ॐ (ह्रीं) रीं रेत:स्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१॥
ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिणये महिषासुरसैन्य नाशिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥२॥
ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥३॥
ॐ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥४॥
ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥५॥
ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥६॥
ॐ तं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥७॥
ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥८॥
ॐ जां जातिरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥९॥
ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१०॥
ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥११॥
ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफ़लदात्र्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१२॥
ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१३॥
ॐ माँ मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमासहितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१४॥
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१५॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नम: शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१६॥
ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फ़ट स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१७॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नम:॥१८॥
इत्येवं हि महामन्त्रान पठित्वा परमेश्वर,चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशय:॥१९॥
एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति य:,आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशय:॥२०॥
श्रीदुर्गामार्पणामस्तु
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॥अथ श्री देव्याः कवचम्॥
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥
ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥
ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३॥
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
माहेश्वरी वृषारुढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥
श्वेतरुपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥
ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥
दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥
शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥२५॥
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥२५॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥
स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥
रसे रुपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः। ४७॥
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः। ४७॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥४९॥
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥४९॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥५०॥
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥५०॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥
लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥
इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।
श्री दुर्गा कवच सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें
👉Shree Durga Kavach।। अथार्गलास्तोत्रम् ।।
विनियोग
ॐ अस्य श्री अर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः अनुष्टुप छन्दः श्रीमहालक्ष्मीर्देवता श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।
ॐ नमश्चण्डिकायै
मार्कण्डेय उवाच
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।। १।।
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तुते ।।२।।
ॐ चंडिका देवी को नमस्कार है।
मार्कण्डेय जी कहते हैं - जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा - इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो। देवि चामुण्डे! तुम्हारी जय हो। सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। सब में व्याप्त रहने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार हो।।मधुकैटभविद्राविविधातृ वरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।३।।
महिषासुरनिर्णाशि भक्तनाम सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ४।।
मधु और कैटभ को मारने वाली तथा ब्रह्माजी को वरदान देने वाली देवि! तुम्हे नमस्कार है। तुम मुझे रूप (आत्मस्वरूप का ज्ञान) दो, जय (मोह पर विजय) दो, यश (मोह-विजय और ज्ञान-प्राप्तिरूप यश) दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो।। महिषासुर का नाश करने वाली तथा भक्तों को सुख देने वाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।३-४।।रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। ५ ।।
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ६।।
रक्तबीज का वध और चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। शुम्भ और निशुम्भ तथा धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।५-६।।वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ७।।
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ८।।
सबके द्वारा वन्दित युगल चरणों वाली तथा सम्पूर्ण सौभग्य प्रदान करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! तुम्हारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हैं। तुम समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हो। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।७-८।।नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ९।।
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वाम चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। १०।।
पापों को दूर करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणों में सर्वदा (हमेशा) मस्तक झुकाते हैं, उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। रोगों का नाश करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हें तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।९-१०।।चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ११।।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १२।।
चण्डिके! इस संसार में जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करते हैं उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मुझे सौभाग्य और आरोग्य (स्वास्थ्य) दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।११-१२।।विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १३।।
विधेहि देवि कल्याणम् विधेहि परमां श्रियम।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १४।।
जो मुझसे से द्वेष करते हों, उनका नाश और मेरे बल की वृद्धि करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! मेरा कल्याण करो। मुझे उत्तम संपत्ति प्रदान करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। १३-१४।।सुरसुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १५।।
विद्यावन्तं यशवंतं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १६।।
अम्बिके! देवता और असुर दोनों ही अपने माथे के मुकुट की मणियों को तुम्हारे चरणों पर घिसते हैं तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। तुम अपने भक्तजन को विद्वान, यशस्वी, और लक्ष्मीवान बनाओ तथा रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१५-१६।।प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १७।।
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्र संस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १८।।
प्रचंड दैत्यों के दर्प का दलन करने वाली चण्डिके! मुझ शरणागत को रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। चतुर्भुज ब्रह्मा जी के द्वारा प्रशंसित चार भुजाधारिणी परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१७-१८।।कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वत भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १९।।
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २०।।
देवि अम्बिके! भगवान् विष्णु नित्य-निरंतर भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। हिमालय-कन्या पार्वती के पति महादेवजी के द्वारा होने वाली परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१९-२०।।इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २१।।
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २२।।
शचीपति इंद्र के द्वारा सद्भाव से पूजित होने वाल परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। प्रचंड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।२१-२२।।देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदये अम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २३।।
पत्नीं मनोरमां देहिमनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ।। २४।।
देवि! अम्बिके तुम अपने भक्तजनों को सदा असीम आनंद प्रदान करती हो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मन की इच्छा के अनुसार चलने वाली मनोहर पत्नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसार से तारने वाली तथा उत्तम कुल में जन्मी हो।।२३-२४।।इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशती संख्या वरमाप्नोति सम्पदाम्। ॐ ।। २५।।जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करके सप्तशती रूपी महास्तोत्र का पाठ करता है, वह सप्तशती की जप-संख्या से मिलने वाले श्रेष्ठ फल को प्राप्त होता है। साथ ही वह प्रचुर संपत्ति भी प्राप्त कर लेता है।।२६।।।। इति देव्या अर्गला स्तोत्रं सम्पूर्णम ।।
⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿मार्कण्डेय जी कहते हैं - जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा - इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो। देवि चामुण्डे! तुम्हारी जय हो। सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। सब में व्याप्त रहने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार हो।।
मधुकैटभविद्राविविधातृ वरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।३।।
महिषासुरनिर्णाशि भक्तनाम सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ४।।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। ५ ।।
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ६।।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ७।।
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ८।।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ९।।
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वाम चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। १०।।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।३।।
महिषासुरनिर्णाशि भक्तनाम सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ४।।
मधु और कैटभ को मारने वाली तथा ब्रह्माजी को वरदान देने वाली देवि! तुम्हे नमस्कार है। तुम मुझे रूप (आत्मस्वरूप का ज्ञान) दो, जय (मोह पर विजय) दो, यश (मोह-विजय और ज्ञान-प्राप्तिरूप यश) दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो।। महिषासुर का नाश करने वाली तथा भक्तों को सुख देने वाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।३-४।।
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनी।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। ५ ।।
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ६।।
रक्तबीज का वध और चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। शुम्भ और निशुम्भ तथा धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।५-६।।
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनी।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ७।।
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ८।।
सबके द्वारा वन्दित युगल चरणों वाली तथा सम्पूर्ण सौभग्य प्रदान करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! तुम्हारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हैं। तुम समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हो। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।७-८।।
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ९।।
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वाम चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। १०।।
पापों को दूर करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणों में सर्वदा (हमेशा) मस्तक झुकाते हैं, उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। रोगों का नाश करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हें तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।९-१०।।
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ११।।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १२।।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १३।।
विधेहि देवि कल्याणम् विधेहि परमां श्रियम।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १४।।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १५।।
विद्यावन्तं यशवंतं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १६।।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १७।।
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्र संस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १८।।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १९।।
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २०।।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २१।।
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २२।।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २३।।
पत्नीं मनोरमां देहिमनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ।। २४।।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १२।।
चण्डिके! इस संसार में जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करते हैं उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मुझे सौभाग्य और आरोग्य (स्वास्थ्य) दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।११-१२।।
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १३।।
विधेहि देवि कल्याणम् विधेहि परमां श्रियम।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १४।।
जो मुझसे से द्वेष करते हों, उनका नाश और मेरे बल की वृद्धि करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! मेरा कल्याण करो। मुझे उत्तम संपत्ति प्रदान करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। १३-१४।।
सुरसुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेम्बिके।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १५।।
विद्यावन्तं यशवंतं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १६।।
अम्बिके! देवता और असुर दोनों ही अपने माथे के मुकुट की मणियों को तुम्हारे चरणों पर घिसते हैं तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। तुम अपने भक्तजन को विद्वान, यशस्वी, और लक्ष्मीवान बनाओ तथा रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१५-१६।।
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १७।।
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्र संस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १८।।
प्रचंड दैत्यों के दर्प का दलन करने वाली चण्डिके! मुझ शरणागत को रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। चतुर्भुज ब्रह्मा जी के द्वारा प्रशंसित चार भुजाधारिणी परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१७-१८।।
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वत भक्त्या सदाम्बिके।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १९।।
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २०।।
देवि अम्बिके! भगवान् विष्णु नित्य-निरंतर भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। हिमालय-कन्या पार्वती के पति महादेवजी के द्वारा होने वाली परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१९-२०।।
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २१।।
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २२।।
शचीपति इंद्र के द्वारा सद्भाव से पूजित होने वाल परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। प्रचंड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।२१-२२।।
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदये अम्बिके।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २३।।
पत्नीं मनोरमां देहिमनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ।। २४।।
देवि! अम्बिके तुम अपने भक्तजनों को सदा असीम आनंद प्रदान करती हो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मन की इच्छा के अनुसार चलने वाली मनोहर पत्नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसार से तारने वाली तथा उत्तम कुल में जन्मी हो।।२३-२४।।
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशती संख्या वरमाप्नोति सम्पदाम्। ॐ ।। २५।।
स तु सप्तशती संख्या वरमाप्नोति सम्पदाम्। ॐ ।। २५।।
जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करके सप्तशती रूपी महास्तोत्र का पाठ करता है, वह सप्तशती की जप-संख्या से मिलने वाले श्रेष्ठ फल को प्राप्त होता है। साथ ही वह प्रचुर संपत्ति भी प्राप्त कर लेता है।।२६।।
।। इति देव्या अर्गला स्तोत्रं सम्पूर्णम ।।
अथ कीलकम्
ॐ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य, शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहासरस्वती देवता,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
ॐ नमश्चण्डिकायै।मार्कण्डेय उवाच
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे।।१।।
महर्षि श्री मार्कडेयजी बोले – निर्मल ज्ञानरूपी शरीर धारण करने वाले, देवत्रयी रूप दिव्य तीन नेत्र वाले, जो कल्याण प्राप्ति के हेतु है तथा अपने मस्तक पर अर्द्धचन्द्र धारण करने वाले हैं उन भगवान शंकर को नमस्कार है ॥१॥
सर्वमेतद्विजानीयान्मंत्राणामभिकीलकम्।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जप्यतत्परः।।२।।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जप्यतत्परः।।२।।
मन्त्रों की सिद्धि में विघ्न उपस्थित करने वाले शाप रूपी कीलक का जो निवारण करनेवाला है, उस सप्तशतीस्तोत्र को सम्पूर्ण रूप से जानना चाहिये (और जानकर उसकी उपासना करनी चाहिये), यद्यपि सप्तशतीके अतिरिक्त अन्य मन्त्रोंके जपमें भी जो निरन्तर लगा रहता है, वह भी कल्याणका भागी होता है॥ २॥
सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि।
एतेन स्तुवतां देवीं स्तोत्रमात्रेण सिद्धयति।।३।।
एतेन स्तुवतां देवीं स्तोत्रमात्रेण सिद्धयति।।३।।
मन्त्रों का जो अभिकीलक है अर्थात् उसके भी उच्चाटन आदि कर्म सिद्ध होते हैं तथा उसे भी समस्त दुर्लभ वस्तुओंकी प्राप्ति हो जाती है; तथापि जो अन्य मन्त्रोंका जप न करके केवल इस सप्तशती नामक स्तोत्र से ही देवीकी स्तुति करते हैं, उन्हें स्तुतिमात्र से ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणी देवी सिद्ध हो जाती हैं ॥३॥
न मंत्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते।
विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम्।।४।।
विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम्।।४।।
उन्हें अपने कार्य की सिद्धि के लिये मन्त्र, ओषधि तथा अन्य किसी साधन के उपयोग की आवश्यकता नहीं रहती। बिना जप के ही उनके उच्चाटन आदि समस्त आभिचारिक कर्म सिद्ध हो जाते हैं ॥ ४॥
समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशङ्कामिमां हरः।कृत्वा निमंत्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम्।।५।।
इतना ही नहीं, उनकी सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ भी सिद्ध होती हैं। लोगों के मन में यह शंका थी कि 'जब केवल सप्तशती की उपासना से अथवा सप्तशती को छोड़कर अन्य मन्त्रोंकी उपासना से भी समानरूप से सब कार्य सिद्ध होते हैं, तब इनमें श्रेष्ठ कौन-सा साधन है?' लोगोंकी इस शंका को सामने रखकर भगवान् शंकरने अपने पास आये हुए जिज्ञासुओं को समझाया कि यह सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्तोत्र ही सर्वश्रेष्ठ एवं कल्याणमय है॥५॥
स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः।समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्निमंत्रणाम्।।६।।
तदनन्तर भगवती चण्डिका के सप्तशती नामक स्तोत्र को महादेवजीने गुप्त कर दिया। सप्तशती के पाठ से जो पुण्य प्राप्त होता है, उसकी कभी समाप्ति नहीं होती; किंतु अन्य मन्त्रों के जपजन्य पुण्य की समाप्ति हो जाती है। अत: भगवान् शिव ने अन्य मन्त्रों की अपेक्षा जो सप्तशती की ही श्रेष्ठता का निर्णय किया, उसे यथार्थ ही जानना चाहिये ॥ ६॥
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेव न संशयः।कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः।।७।।
अन्य मन्त्रों का जप करने वाला पुरुष भी यदि सप्तशती के स्तोत्र और जप का अनुष्ठान कर ले तो वह भी पूर्णरूप से ही कल्याण का भागी होता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो साधक कृष्णपक्ष की चतुर्दशी अथवा अष्टमी को एकाग्रचित्त होकर भगवती की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है
ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति।इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम्।।८।।
और फिर उसे प्रसादरूप से ग्रहण करता है, उसी पर भगवती प्रसन्न होती हैं; अन्यथा उनकी प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती। इस प्रकार सिद्धि के प्रतिबन्धक रूप कील के द्वारा महादेवजी ने इस स्तोत्र को कीलित कर रखा है॥ ७-८॥
यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम्।
स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः।।९।।जो पूर्वोक्त रीति से निष्कीलन करके इस सप्तशती स्तोत्र का प्रतिदिन स्पष्ट उच्चारणपूर्वक पाठ करता है, वह मनुष्य सिद्ध हो जाता है, वही देवी का पार्षद होता है और वही गन्धर्व भी होता है॥९॥
तेन चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जाय।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात्।।१०।।सर्वत्र विचरते रहनेपर भी इस संसारमें उसे कहीं भी भय नहीं होता। वह अपमृत्युके वशमें नहीं पड़ता तथा देह त्यागने के अनन्तर मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ १०॥
ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः।।११1।।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः।।११1।।
अतः कीलन को जानकर उसका परिहार करके ही सप्तशती का पाठ आरम्भ करे। जो ऐसा नहीं करता, उसका नाश हो जाता है। इसलिये कीलक और निष्कीलन का ज्ञान प्राप्त करने पर ही यह स्तोत्र निर्दोष होता है और विद्वान् पुरुष इस निर्दोष स्तोत्र का ही पाठ आरम्भ करते हैं ॥ ११ ॥
सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद् दृश्यते ललनाजने।
तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जप्यमिदम् शुभम्।।१२।।
तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जप्यमिदम् शुभम्।।१२।।
स्त्रियों में जो कुछ भी सौभाग्य आदि दृष्टिगोचर होता है, वह सब देवी के प्रसादका ही फल है। अतः इस कल्याणमय स्तोत्र का सदा जप करना चाहिये ॥ १२॥
शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत्।।१३।।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत्।।१३।।
इस स्तोत्र का मन्दस्वर से पाठ करने पर स्वल्प फल की प्राप्ति होती है और उच्च स्वर से पाठ करने पर पूर्ण फल की सिद्धि होती है।अतः उच्च स्वर से ही इसका पाठ आरम्भ करना चाहिये ॥ १३॥
ऐश्वर्यं तत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः।।१४।।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः।।१४।।
जिनके प्रसाद से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, सम्पत्ति, शत्रुनाश तथा परम मोक्ष की भी सिद्धि होती है, उन कल्याणमयी जगदम्बा की स्तुति मनुष्य क्यों नहीं करते? ॥ १४॥
।।इति श्रीभगवत्याः कीलकस्तोत्रं समाप्तम्।।
⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿अथ वेदोक्तं रात्रिसूक्तम
विनियोग:
ॐ रात्रीत्याद्यष्टर्चस्य सूक्तस्य कुशिक: सौभरो रात्रिर्वा भारद्वाजो ऋषि:, रात्रिर्देवता, गायत्री छन्द:, देवीमाहात्म्यपाठे विनियोग:
ॐ रात्रि व्य्ख्यदायती पुरुत्रा देव्यक्षभि:। विश्वा अधि श्रियोSधित।। १।।
अर्थात --- महा तत्वादिरूप व्यापक इन्द्रियों से सब देशों में समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली ये रात्रिरूपा देवी अपने उत्पन्न किये हुए जगत के जीवों के शुभाशुभ कर्मों को विशेष रूप से देखती है। और उनके अनुरूप फल की व्यवस्था करने के लिए समस्त विभूतियों को धारण करती हैं।
ओर्वप्रा अमर्त्यानिवतो देव्युद्वत: । ज्योतिषा बाधते तम: ।।२।।
अर्थात --- यह देवी अमर हैं सम्पूर्ण विश्व को, नीचे फैलने वाली लता को तथा ऊपर बढ़ने वाले व्रक्ष को भी व्याप्त करके स्तिथ है, इतना ही नहीं, यर्ह ज्ञानमयी ज्योति से जीवों के अज्ञानान्धकार का नाश कर देती है
निरु स्वसारमस्कृतोषसं देव्यायती । अपेदु हासते तम: ।।3।।
अर्थात --- परा चिच्छक्तिरूपा रात्रिदेवी आकर अपनी बहिन ब्रह्मविद्यामयी उषादेवी को प्रकट करती है, जिससे अविद्यामय अन्धकार स्वात: नष्ट हो जाता है।
सा नो अद्य यस्या वयं नि ते यामन्नविक्ष्महि । वृक्षे न वसतिं वय: ।।4।।
अर्थात --- वे रात्रिदेवी इस समय मुझपर प्रसन्न हों, जिसके आने पर हमलोग अपने घरों में सुख से सोते हैं --- ठीक वैसे ही, जैसे रात्रि क समय पक्षी वृक्षों पर बनाये हुए अपने घोंसलों में सुखपूर्वक शयन करते हैं।
निग्रामासो अविक्षत नि पद्वन्तो नि पक्षिण: । नि श्येनासश्र्चिदर्थिन: ।।5।।
अर्थात --- उस करुणामयी रात्रि देवी के अङ्गमें सम्पूर्ण ग्रामवासी मनुष्य, पैरों से चलने वाले गाय, घोड़े आदि पशु, पंखों से उड़ने वाले पक्षी एवं पतंग अदि किसी प्र्योजन से यात्रा करने वाले पथिक और बाज आदि भी सुखपूर्वक सोते हैं।
यावया वृक्यं वृकं यवय स्तेनमूर्म्ये । अथा न: सुतरा भव ।।6।।
अर्थात --- हे रात्रिमयी चिच्छक्ति ! तुम कृपा करके वासनामयी वृकी तथा पापमय वृक को हमसे अलग करो। काम अदि तस्कर समुदाय को भी दूर हटाओ। तदनन्तर हमारे लिए सुखपूर्वक तैरने योग्य हो जाओ --- मोक्षदायिनी एवं कल्याणकारिणी बन जाओ।
अर्थात --- हे उषा ! हे रात्रि की अधिष्टात्रि देवी ! सब और फैला हुआ यह अज्ञानमय काला अंधकार मेरे निकट आ पहुँचा है। तुम इसे ऋण की भाँति दूर करो --- जैसे धन देकर अपने भक्तों के ऋण दूर करती हो, उसी प्रकार ज्ञान देकर इस अज्ञान को भी हटा दो।उप मा पेपिशत्तम: कृष्णं व्यक्तमस्थित । उष ऋणेव यातय ।।7।।
उप ते गा इवाकरं वृणीष्व दुहितर्दिव: । रात्रि स्तोमं न जिग्युषे ।।8।।
अर्थात --- हे रात्रिदेवी ! तुम दूध देने वाली गो के समान हो। में तुम्हारे समीप आकर स्तुति अदि से तुम्हे अपने अनुकूल करता हूँ। परम व्योमस्वरूप परमात्माकी पुत्री! तुम्हारी कृपा से में काम आदि शत्रुओं को जीत चुका हूँ, तुम स्तोम की भाँति मेरे इस हविष्य को भी ग्रहण करो।
अथ वेदोक्तंरात्रिसूक्तम् सम्पूर्ण हुआ।।
अथ वेदोक्तंरात्रिसूक्तम् सम्पूर्ण हुआ।।
(ऋग्वेद के मं. 10 अ. 10 सू. 127 मंत्र 1 से 8 तक)
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अथ तंत्रोक्तं रात्रिसूक्तं
तंत्रोक्त रात्रि सूक्त दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में श्लोक 70 से श्लोक 90 तक दिया गया है, यह सूक्त भगवती योगमाया जो भगवान विष्णु की शक्ति हैं, की स्तुति में ब्रह्मा जी ने रचित किया था और भगवती से मधु-कैटभ को मारने के लिए भगवान् विष्णु को निद्रा से जगाने के लिए विनती की थी।
ॐ विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं सिथतिसंहार कारिणीम।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजस:प्रभु:।। १।।
ब्रह्मोवाच
तवं स्वाहा त्वं स्वधा तवं हि वषट्कार: स्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्तिथा।। २।।
तवं स्वाहा त्वं स्वधा तवं हि वषट्कार: स्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्तिथा।। २।।
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः।
त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।। ३।।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्
त्वयैतत्पाल्यते देवी त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ।। ४।।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने.
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोअस्य जगन्मये ।। ५।।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः।
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी ।। ६।।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोह्रात्रिश्च दारुणा ।। ७।।
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ।। ८।।
खडिगनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ।। ९।।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ।। १०।।
यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा ।। ११।।
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्।
सोअपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ।। १२।।
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च
कारितास्ते यतोअतस्त्वां क: स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ।। १३।।
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि सन्स्तुता।
मोहयैतो दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ।। १४।।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु।
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ।। १५।।
इति रात्रिसूक्तम्
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श्री देव्यथर्वशीर्षम
श्री देव्यथ श्री देव्यथर्वशीर्ष को अथर्ववेद में लिखा गया है अथर्ववेद में इसकी बड़ी भारी महिमा बतायी गयी है इसका पाठ सप्तशती के आरम्भ में करने से देवी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। यधपि सप्तशती पाठ का अंग बनाकर इसका अन्यत्र कहीं उल्लेख नहीं हुआ है तथापि सप्तशती आरंभ करने से पूर्व इसका पाठ लाभदायक है। इस देव्यथर्वशीर्ष के जप से पांचों अथर्वशीर्ष के जप का फल मिलता है। इसका दस बार पाठ करने से उसी क्षण पापों से मुक्ति मिलती है और महादेवी के प्रसाद से बड़े दुस्तर संकटों को पार कर जाता है। इसका सांयकाल में अध्ययन करने वाला दिन में किये हुए पापों का नाश करता है, प्रात:काल में अध्ययन करने वाला रात्रि में किये हुए पापों का नाश करता है। दोनों समय अध्ययन करने वाला निष्पाप होता है। तुरीय संध्या के समय जप करने से वाक् सिद्धि प्राप्त होती है।नयी प्रतिमा पर जप करने से देवता सानिध्य प्राप्त होता है। प्राणप्रतिष्ठा के समय करने पर प्राणो की प्रतिष्ठा होती है। अमृतसिद्धि योग में महादेवी के सानिध्य में जप करने से महामृत्यु से तर जाता है। इस प्रकार यह अविद्यानाशिनी ब्रह्मविद्या है तथा अत्यंत महत्वपूर्ण एवं गोपनीय है। इसलिए इसके मंत्र यहाँ नहीं दिए गए इसे साधक श्रीदुर्गासप्तशती से स्वयं ही प्राप्त करें।
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सिद्धकुज्जिकास्तोत्रं
शृणु देवी प्रवक्ष्यामि कुज्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चंडीजाप: शुभो भवेत् ।।1।।
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ।।2।।
कुज्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्मतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ।।3।।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मरणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठ मात्रेण संसिद्ध्येत् कुज्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।।4।।
अथ मन्त्र:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः
ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट स्वाहा
।।इति मंत्र:।।
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नम: कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ।।1।।
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।।2।।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।।3।।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।।4।।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणि ।।5।।
धां धीं धू धूर्जटे: पत्नीं वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ।।6।।
हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः।।7।।
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।। 8।।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंं कुरुष्व मे।।
इदं तु कुज्जिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति।।
यस्तु कुज्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा।।
।इति श्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती संवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्।
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अथ सप्तश्लोकी दुर्गा
ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।। १।।
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाद्रचित्ता ।। २।।
सर्वमङ्गल मंगलेय शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नायायणि नमोअस्तु ते।। ३।।
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे
सर्वस्यातिरहरे देवि नारायणि नमोअस्तु ते ।। ४।।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्ति समन्विते।
भयभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोअस्तु ते ।। ५।।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कमान सकलानभीष्टान।
त्वामाश्रितानां न विपत्रराणां
त्वामाश्रिता ह्राश्रयतां प्रयान्ति ।। ६।।
सर्वाबाधाप्रश्मनं त्रेेलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वेेरिविनाशनं ।। ७।।
श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्ण
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ॐ ।।श्री दुर्गायै नमः।।
अथ नवार्णविधि:
श्री गणपतिर्जयति। 'ॐ अस्य श्रीनर्वाणमंत्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषय:, गायत्र्युष्णिनुष्टुभर छन्दांसि, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता;, ऐं बीजमं, ह्रीं शक्ति:, क्लीं कीलकं, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोग:। '
इसे पढ़ कर जल गिराएं।
ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः, शिरसि।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् छन्दोभ्यो नमः, मुखे।
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः, हृदिः।
ऐं बीजाय नमः, गुह्ये।
ह्रीं शक्त्ये नमः:, पादयो:।
क्लीं कीलकाय नमः, नाभौ।
'ॐ ऐं ह्रीं कलीं चामुण्डायै विच्चे ' - हाथो की शुद्धि करें।
करन्यास:
ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ विच्चे कनिष्ठकाभ्यां नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हदयादिन्यास:
ॐ ऐं हदयाय नमः।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा।
ॐ क्लीं शिखायै वषट्।
ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम्।
ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट्।
अक्षरन्यास:
ॐ ऐं नमः, शिखायामं।
ॐ ह्रीं नमः, दक्षिणनेत्रे।
ॐ क्लीं नमः, वामनेत्रे।
ॐ चां नमः, दक्षिणकर्णे।
ॐ मुं नमः, वामकर्णे।
ॐ डां नमः, दक्षिणनासापुटे।
ॐ यैं नमः, वामनासापुटे।
ॐ विं नमः, मुखे।
ॐ च्चें नमः, गुह्ये।
दिङ्ग-न्यास:
ॐ ऐं प्राच्यै नमः।
ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः।
ॐ ह्रीं दक्षिणायै नमः।
ॐ ह्रीं नैर्ऋत्यै नमः।
ॐ कलीं प्रतीच्यै नमः।
ॐ क्लीं वायव्यै नमः।
ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नमः।
ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे उर्ध्वायै नमः।
ॐ ऐं ह्रीं कलीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः।
ध्यानम्
खड्गं चक्रगदेषुचाप परिधाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः,
ॐ कलीं प्रतीच्यै नमः।
ॐ क्लीं वायव्यै नमः।
ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नमः।
ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे उर्ध्वायै नमः।
ॐ ऐं ह्रीं कलीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः।
ध्यानम्
खड्गं चक्रगदेषुचाप परिधाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः,
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् ।
नीलाश्मद्युतिमास्य पाददशकां सेवे महाकालिकाम्,
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ।। १।।
अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां,
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम् ।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां,
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ।। २।।
घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं,
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्य प्रभाम् ।।
गौरीदेहसमुद्भुवां त्रिजगतामाधारभूतां महापूर्वामत्र,
सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम् ।। ३।।
माला-पूजन
रुद्राक्ष की माला से “ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः” इस मंत्र से पूजा करके प्रार्थना करें :
ॐ मां माले महामाये सर्वशक्ति स्वरुपिणि ।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तः तस्मान्मे सिद्धिदाभव ।।
ॐ अविघ्नं कुरुमाले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे ।
जपकाले च सिद्धयर्थं प्रसीद मम सिद्धये ।।
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्व मंत्रार्थ साधिनि साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा ।
इसके बाद “ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” इस मंत्र का 108 बार जप करें ।
ॐ गुह्याति-गुह्य-गोप्त्री त्वं, गृहाणास्मत्-कृतं जपम् । सिद्धिर्मे भवतु देवि ! त्वत्-प्रसादान्महेश्वरि !
उक्त श्लोक पढ़कर देवी के वाम हस्त में जप समर्पित करें।⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿
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| प्राचीन १० वीं शताब्दी में लिखा गया दुर्गा सप्तशती ग्रन्थ |
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| प्राचीन १७वीं शताब्दी में लिखा गया दुर्गा शप्तशती ग्रन्थ |
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| मेधा मुनि |
अथ श्रीदुर्गासप्तशती
प्रथमचरित्र
प्रथमो अध्याय:
मेधा ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को देवी की महिमा बताते हुए
मधु-कैटभ-वध का प्रसंङ्ग सुनाना
मधु-कैटभ-वध का प्रसंङ्ग सुनाना
विनियोग:
ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषि:, महाकाली देवता, गायित्री छंदा:, नन्दा शक्ति:, रक्तदन्तिका बीजं, अग्निस्तत्त्वं, ऋग्वेद: स्वरूपं, श्री महाकाली प्रीत्यर्थे प्रथम चरित्र जपे विनियोग:।
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| जयंती मङ्गला काली भद्र काली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।। |
देवी महाकाली ध्यान
मैं तमोगुणमयी महाकाली देवी का ध्यान करती हूँ। जो भगवान् विष्णु की योग निद्रा हैं, मधु और कैटभ का नाश करने के लिए ब्रह्मा जी ने जिनकी स्तुति की थी, वे काजल के समान काले रंग की, दस मुख, दस भुजाएँ, और दस पैर तथा तीस नेत्रों की विशाल पंक्ति से सुशोभित हैं। उनके दांत और दाढ़ें चमकती रहती हैं। जो विभिन्न प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित हैं, लाल गुड़हल के फूल जिनको प्रिय हैं, वे भगवती महाकाली अपने हाथों में खड्ग, बाण, गदा, शूल, चक्र,शंख, भुशुण्डि, परिघ, धनुष, तथा जिससे रक्त चूता रहता है ऐसा कटा हुआ मस्तक धारण करती हैं। वे अपने गले में मुण्डो की माला धारण करती हैं। उनका रूप बहुत ही भयंकर है तथा उनकी और देखना भी कठिन है। वे शत्रुओं के नाश के लिए ऐसा भयंकर रूप धरती हैं जिससे कि शत्रुओं के प्राण उनकी और देखने मात्र से ही उड़ जाएँ यद्यपि उनका रूप भयंकर है, तथापि वे रूप, सौभाग्य, कान्ति एवं महती सम्पदा की अदिष्ठान हैं। हे महाकाली देवी! मैं आपको लाल गुड़हल के पुष्प अर्पित करती हूँ। आपको मेरा नमस्कार, नमस्कार बारम्बार नमस्कार है। आप मेरे शत्रुओं का अपने शूल से नास करें और मेरा भय दूर कर मुझे शक्ति प्रदान करें।
मार्कण्डेय जी बोले - पूर्वकाल की बात है स्वारोचिष मन्वन्तर में 'सुरथ' नाम के राजा का समस्त भूमण्डल पर अधिकार था। उस समय 'कोलाविध्वंसी' नाम के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये और उन से राजा सुरथ परास्त हो कर शिकार के बहाने घोड़े पर स्वर हो कर वहां से अकेले ही एक घने जंगल चले गये। उन्होंने वहां पर मेधा मुनि का आश्रम देखा और वहां रहने लगे। कुछ दिन बाद उनको अपने राज्य की याद सताने लगी।
एक दिन उन्होंने वहां पर एक वैश्य को देखा और उसके वहां आने का कारन पुछा। वैश्य बोला - मेरा नाम समाधि है। मेरे विश्वसनीय बंधुओं ने मेरा धन ले लिया है और मुझे घर से निकल दिया है, इसलिए मैं दुखी होकर वन में चला आया हूँ। परन्तु अब मुझे मेरे स्त्री और पुत्रों की याद सता रही है कि इस समय वो घर में कुशलता से हैं या उनको कोई कष्ट है ?
वे दोनों मेधा मुनि के पास गए और राजा मेधा मुनि से कहने लगे -हे मुनिश्रेष्ठ ! हम दोनों ही बहुत दुखी हैं। राज्य अब मेरा नहीं है उसके सम्पूर्ण अंगों में मेरी ममता बनी हुई हैं और अज्ञानी की भांति मुझको दुःख होता है। यह क्या है ? इधर यह वैश्य को भी स्वजनों ने परित्याग दिया है तो भी यह उनके प्रति अत्यंत हार्दिक स्नेह रखता है। हे मुनिवर ! यह मोह कैसा है?
ऋषि बोले - महाभाग! पशु, पक्षी, मृग आदि भी मनुष्यों की ही भांति समझदार होते हैं। समझ होने पर भी इन पक्षियों को देखो, ये स्वयं भूखे होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं। लेकिन मनुष्य समाज होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिए पुत्रों की अभिलाषा क्यों करते हैं ? इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्यूंकि वे सब संसार की जनम-मरण की परंपरा बनाये रखने वाली भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोहके गहरे गर्त में गिराए गए हैं। वे भगवती ज्ञानियों के चित को भी बलपूर्वक खींच कर मोह में डाल देती है तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वरदान देती हैं।
राजा बोले - हे श्रेष्ठ महर्षे ! वे देवी कौन हैं? उन देवी का जैसा प्रभाव और सवरूप हो और जैसे उनका प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब में आपसे सुनना कहता हूँ।
ऋषि बोले - वह मुझसे सुनो। वे देवी नित्य और अजन्मा हैं। देवताओं के कार्य सिद्ध करने के लिए उनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है। कल्प के अंत में जब सम्पूर्ण जगत एकार्णवमें निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानो की मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभ नाम के थे। वे दोनों भगवान विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्मा जी का वध करने को तैयार हो गए। तब ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु को जगाने के। लिए उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा का स्तवन आरम्भ किया।
ब्रह्मा जी बोले - देवी! तुम्ही स्वाहा, स्वधा और वषट्कार हो। तुम्ही स्वर हो. मूलप्रकृति, सृष्टि, लज्जा, पुष्टि, शांति क्षमा भी तुम्ही हो। पालन भी तुम ही करती हो और संहार भी तुम ही करती हो। तुम्ही महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहरूपा, महादेवी, महासुरी भी तुम ही ही। तुम ही तीनो गुणों को उत्पन्न करती हो। कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि भी तुम ही हो। तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररुपा हो तथा गदा, चक्र, शंख, धनुष, बाण, भुशुण्डि, परिघ - यह सब तुम्हारे ही अस्त्र हैं। हे अत्यधिक सुंदरी सर्वस्वरूपे देवी! यह जो कुछ भी वस्तुए है उनकी शक्ति तुम्ही हो ऐसे में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुमने भगवन को भी निद्रा के अधीन कर दिया है अतः तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है? हे देवी! यह जो दो असुर मधु-कैटभ हैं, इनको मोह में डाल दो और विष्णु भगवन को शीघ्र ही जगा कर इनको मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो।
ऋषि कहते हैं - जब ब्रह्मा जी ने विष्णु जी को जगाने के लिए इस प्रकार तमोगुणी अधिष्ठरात्री देवी योगनिद्रा की स्तुति की, तब देवी भगवन के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हदय और वक्ष:स्थल से निकल कर ब्रह्मा जी के समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रा से मुक्त होने पर भगवन जग उठे। तब विष्णु भगवन ने उन दोनों असुरों के साथ पाँच हज़ार वर्षों तक केवल बाहुयुद्ध किया। महामाया ने उनको मोह में डाल दिया इसलिए वे भगवन विष्णु से कहने लगे - 'हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं। तुम हम से कोई वर मांगो ' .
श्रीभगवान बोले- यदि तुम मेरे से प्रसन्न हो तो मेरे हाथों से मारे जाओ। बस, इतना सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है?
ऋषि कहते है- इस प्रकार धोखे में आ जाने पर उन्होंने सम्पूर्ण जगत में जल ही जल देखा और भगवन से बोले -' जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो - जहाँ सूखा स्थान हो, वहीँ हमारा वध करो ' तब भगवान विष्णु ने 'तथास्तु' कह कर उन दोनों के मस्तक अपनी जांघ पर रखकर चक्र से काट डाले।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'मधु-कैटभ-वध' नाम का पहला अध्याय पूरा हुआ।।१।।
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मध्यमचरित्रस्य
द्वितीयो अध्याय
देवताओं के तेज से देवी का प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना का वध
देवताओं के तेज से देवी का प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना का वध
विनियोग
ॐ मध्यचरित्रस्य विष्णु ऋषि:, महालक्ष्मी देवता, उष्णिक छंद:, शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीजं, वायुस्तत्त्वं, यजुर्वेद: स्वरूपं, श्री महालक्ष्मी प्रीत्यर्थे माध्यम चरित्र जपे विनियोग।
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| नमस्तेअस्तु महामाये श्री पीठे सुरपूजिते। शंखचक्रगदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते। |
सिद्ध लक्ष्मी स्तोत्र सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें
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देवी महालक्ष्मी ध्यान
मैं उन देवी का ध्यान करती हूँ जिनका सम्पूर्ण देवताओं के अंगों से जिनका प्रादुर्भाव हुआ, वे अत्यंत कान्तिमय सुन्दर रूप और सौभाग्य से सुशोभित साक्षात महालक्ष्मी हैं। वे ही त्रिगुणमयी प्रकृति, मुख गोरा, भुजाएँ श्याम, स्तनमण्डल अत्यंत श्वेत, कटिभाग और चरण लाल तथा जङ्घा और पिंडली नीले रंग की है। उनके बहुरंगे वस्त्र, माला, तपाये हुए स्वर्ण के हीरे मोती जड़ित आभूषण, अङ्गराग अत्यंत सुन्दर एवं विचित्र हैं। यधपि उनकी हज़ारों भुजाएँ हैं, तथापि उन्हें अठारह भुजाओं से युक्त मान कर उनके दाहिने और से निचले हाथों से लेकर बायीं और के निचले हाथों तक क्रमशः जो अस्त्र हैं वे हैं- अक्षमाला, कमल, बाण, खडक, वज्र, गदा, चक्र, त्रिशूल, परशु, शंख, घंटा, पाश, शक्ति, दण्ड, ढाल, धनुष, पानपात्र, कमण्डलु - इन आयुधों से उनकी भुजाएं विभूषित हैं। वे मूल प्रकृति, कमल के आसान पर विराजमान हैं।हे नारायणी देवी ! आप सब प्रकार के मङ्गल प्रदान करने वाली मङ्गलमयी हो, सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा शरणागतवत्सला हो। आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को, दुःख को, दरिद्रता को, भय को नष्ट कर देती हो। हे देवी! मैं आपको नमस्कार करती हूँ। आप समस्त बाधाओं को शांत करते हुए मुझ पर प्रसन्न होकर मेरी मनोवांछित कामना की पूर्ती करें।
देव दैत्य संग्राम --- पूर्वकाल में देवताओं और असुरों में पूरे सौ वर्षों तक घोर संग्राम हुआ जिसमें असुरों का स्वामी महिषासुर ने देवताओं के नायक इंद्र देव को पराजित कर दिया तथा इंद्र देव का सिंघासन छीन लिया। पराजित देवता प्रजापति ब्रह्मा जी को आगे कर के भगवान् शंकर जी और भगवान् विष्णु जी के पास गये तथा असुरों की सारी करतूत कह सुनाई और रक्षा करने की प्राथना करने लगे। इस प्रकार देवताओं के वचन सुन कर भगवान् विष्णु और भगवान् शिव को असुरों पर बहुत क्रोध आया।
देवी प्रकट्य --- अत्यंत कोप में भरे हुए चक्रपाणि श्री विष्णु जी के मुख से महान तेज प्रकट हुआ तथा इसी प्रकार भगवान् शंकर जी, ब्रह्मा जी तथा इंद्र देव आदि अन्यान्य देवताओं के शरीर से भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब तेज मिल कर एक हो गया। महान तेज का वह पुँज जाज्व्लयमान पर्वत सा जान पड़ा। उसकी ज्वालाएँ सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त हो रही थीं। देवताओं के शरीर से प्रकट हुए उस तेज की कहीं भी कोई तुलना नहीं थी। वह एक नारी के रूप में परिणत हो गया और तीनो लोकों में वह प्रकाश व्याप्त जान पड़ा। भगवान् शंकर के तेज से उस देवी का मुख प्रकट हुआ। यमराज के तेज से सर में बाल आ गये। श्री विष्णु के तेज से उसकी भुजाएँ उत्पन्न हुई। चन्द्रमा के तेज से दोनों स्तनों का और इंद्र के तेज से मध्यभाग का पादुर्भाव हुआ। वरुण के तेज से जङ्घा और पिंडली तथा पृथ्वी के तेज से नितंबभाग प्रकट हुआ। ब्रह्मा के तेज से दोनों चरण और सूर्य के तेज से उनकी अंगुलियाँ प्रकट हुई। वसुओं के तेज से हाथों की अँगुलियाँ और कुबेर के तेज से नासिका प्रकट हुई। देवी के दांत प्रजापति के तेज से और तीनों नेत्र अग्नि के तेज से प्रकट हुए। उनकी भोहें संध्या के और कान वायु के तेज से उत्पन्न हुए। इस प्रकार अन्यान्य देवताओं के तेज से भी उस कल्याणमयी देवी का आविर्भाव हुआ।
देवताओं द्वारा देवी को दिव्य अस्त्र तथा आभूषण अर्पण --- पिनाकधारी भगवान् शिव ने अपने शूल से एक शूल निकालकर देवी को दिया तथा भगवान् विष्णु ने भी अपने चक्र से एक चक्र उत्पन्न करके भगवती को अर्पण किया। वरुण देव ने शंख भेंट किया, अग्नि ने शक्तिऔर वायु ने धनुष तथा बाण से भरे हुए दो तरकस प्रदान किये। देवराज इंद्र ने अपने वज्र से वज्र उत्पन्न करके दिया और ऐरावत हाथी से उतार कर एक घंटा भी प्रदान किया। यमराज ने कालदण्ड से दण्ड, वरुण देव ने पाश, प्रजापति ने स्फटिकाक्ष की माला तथा ब्रह्मा जी ने कमंडलु भेंट किया। सूर्यदेव ने देवी के समस्त रोम कूपों में अपनी किरणों का तेज भर दिया। काल ने उन्हें चमकती हुई ढाल और तलवार दी। क्षीर समुद्र ने उज्जवल हार तथा कभी कभी जीर्ण न होने वाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ ही उन्होंने दिव्य चूड़ामणि, दो कुण्डल, कड़े, उज्जवल अर्धचन्द्र, सब बाहुओं के लिए केयूर, दोनों चरणों के लिए निर्मल नूपुर, गले की सुन्दर हँसली और सब अँगुलियों में पहनने के लिए रत्नो की अँगूठियाँ भी दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें अत्यंत निर्मल फरसा भेंट किया तथा अनेक प्रकार के अस्त्र और अभेद्य कवच दिये, इसके साथ मस्तक और वक्षस्थल पर धारण करने के लिये कभी न कुम्हलाने वाले कमलों की मालाएँ दीं। जलधि ने उन्हें सुन्दर कमल का फूल भेंट किया। हिमालय ने सवारी के लिए सिंह तथा भाँति भाँति के रत्न समर्पित किये। धनाध्यक्ष कुबेर ने मधु से भरा पानपात्र दिया तथा सम्पूर्ण नागों के राजा शेषनाग ने, जो इस पृथ्वी को धारण करते हैं, उन्हें बहुमूल्य मणियों से विभूषित नाग हार भेंट दिया। इसी प्रकार अन्य देवताओं ने भी आभूषण और अस्त्र शस्त्र दे कर देवी का सम्मान किया।
देवी की अट्हास पूर्वक गर्जना --- सभी देवताओं की भेंट स्वीकार करने के तत्पश्चात देवी ने बारम्बार अट्हास पूर्वक उच्चस्वर से गर्जना की। उनके भयंकर नाद से सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा। देवी का यह अत्यंत उच्च स्वर से किया हुआ सिंहनाद कहीं समा न सका, आकाश उसके सामने लघु प्रतीत होने लगा। उससे बड़े जोर की प्रतिध्वनि हुई, जिससे सारे विश्व में हलचल मच गयी और समुद्र काँप उठे। पृथ्वी डोलने लगी और समस्त पर्वत हिलने लगे। उस समय देवताओं ने अत्यंत प्रसन्नता के साथ सिंहवाहिनी भवानी से कहा - 'देवी ! तुम्हारी जय हो'। महर्षियों ने भक्तिभाव से विनम्र हो कर उनका स्तवन किया।
महिषासुर की सेना का वध --- भयंकर सिंह नाद को सुन और सम्पूर्ण त्रिलोकी को क्षोभ ग्रस्त देख कर दैत्यगण कवच और हथियार ले कर सहसा उठ कर खड़े हो गए. क्रोध में भरे महिषासुर ने कहा - 'आ: ! यह क्या हो रहा है ?' फिर वह बहुत बड़ी असुरों की सेना ले कर सिंह नाद की और लक्ष्य करके दौड़ा और वहाँ उसने देवी को देखा, जो अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रहीं थीं। उनके चरणों के भर से पृथ्वी दबी जा रही थी। वे अपने धनुष की टंकार से सातो पातालों को क्षुब्ध किये दे रहीं थीं। तदनन्तर उनके साथ दैत्यों का युद्ध छिड़ गया। नाना प्रकार के अस्त्र-शास्त्रों के प्रहार से सम्पूर्ण दिशाएँ उद्भसित होने लगीं।
चिक्षुर नाम का सेनानायक, चामर दैत्य चतुरङ्गिनी सेना लेकर लड़ने लगे। उदग्र दैत्य साठ हज़ार रथियों के साथ, एक करोड़ रथियों के साथ महाहनु दैत्य, जिसके रोयें तलवार के सामान तीखे थे,वह असिलोमा नामक महादैत्य पाँच करोड़ रथी सैनिकों सहित युद्ध में आ डटा। साठ लाख रथियों से घिरा बाष्कल दैत्य भी युद्ध भूमि में आ गया। परिवारित राक्षस एक करोड़ रथियों की सेना और हाथीसवार और घुडसवारों के साथ आ गया। बिडाल दैत्य पाँच अरब रथियों से घिर कर लोहा लेने लगा। और भी हजारों दैत्य देवी से युद्ध करने लगे। स्वयं महिषासुर उस रणभूमि में कोटि-कोटि सहस्र रथ, हाथी, और घोड़ों की सेना से घिरा हुआ खड़ा था। वे दैत्य देवी के साथ तोमर, शक्ति , मूसल, खडग, परशु और पट्टिश आदि अस्त्र-शास्त्रों का प्रहार करते हुए युद्ध कर रहे थे। देवी ने भी खेल-खेल में क्रोध से अपने अस्त्रों की वर्षा कर दैत्यों के कई अस्त्र-शास्त्र काट डाले। देवी ने जितने निश्वास छोड़े, वे सभी तत्काल सैंकड़ों-हज़ारों गणो के रूप में प्रकट हो गए और हथियारों से दैत्यों से युद्ध करने लगे और नागडा, मृदंङ्ग और शंख आदि बजाने लगे।
देवी का वाहन सिंह भी गर्दन के बालों को हिला-हिला कर जोर-जोर से गर्जना करता हुआ दैत्यों की सेना में इस प्रकार विचरने लगा मानो वनों में दावानल फैल रहा हो।
देवी ने अपने त्रिशूल, गदा से, शक्ति और खड्ग की वर्षा से सैंकड़ों महादैत्यों का संहार कर डाला। बहुतेरे दैत्यों को पाश से बांध कर धरती पर घसीटा। देवी ने अपने बाणों से उनके बाणसमूहों को अनायास ही काट कर उनके घोड़ों और सारथियों को भी मारने लगीं। देवी के शूल से कई दैत्यों के सैंकड़ों टुकड़े हो गये देवी की हुंकार से ही डर कर कई दैत्य अपने प्राणों से हाथ धो बैठे तथा कितने ही घण्टे के भयंकर नाद से मूर्छित हो कर मर गए। कितनो को गदा घायल किया तथा मूसल से मारा और वे वामन करने लगे। कितने ही असुरों की बाहें, मस्तक, जांघें काट-काट कर गिरने लगे। कुछ के शरीर मध्यभाग से विदीर्ण हो गए। कितने ही बिना सर के धड़ हाथों में खडग, शक्ति एवं ऋषि लिए दौड़ते थे तथा दूसरे-दूसरे महादैत्य 'ठहरो ! ठहरो !!' यह कहते हुए देवी को युद्ध के लिए ललकारते थे।
थोड़ी ही देर में वहां खून की नदियाँ बहने लगीं। वहाँ की धरती देवी के गिराए हुए रथ, हाथी, घोड़े, और असुरों की लाशों से ऐसे पट गयी थी की वहाँ चलना-फिरना असंभव हो गया। जगदम्बा ने असुरों की विशाल सेना को क्षणभर में नष्ट कर दिया - ठीक उसी तरह जैसे तृण और काठ के भरी ढेर को आग कुछ ही क्षणों में भस्म कर देती है।
देवी का वाहन सिंह भी गर्दन के बालों को हिला-हिला कर जोर-जोर से गर्जना करता हुआ असुरों के शरीर से मानो उनके प्राण चुने जा रहा था। आकाश में खड़े देवता गण इस युद्ध से प्रसन्न हो कर फूल बरसाने लगे।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'महिषासुर की सेना का वध' नाम का दूसरा अध्याय पूरा हुआ।।२ ।।
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तृतीयो अध्याय
सेनापतियों सहित महिषासुर का वध
सेनापतियों सहित महिषासुर का वध
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| नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि। नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि।। |
देवी ध्यान
जगदम्बा के श्री अंगों की कांति उदयकाल के सहस्रों सूर्यों के समान है। वे लाल रंग की रेशमी साड़ी पहने हुए है। गले में मुंडमाला है। दोनों स्तनों पर रक्त चन्दन का लेप लगा है। वे अपने कर-कमलों में जपमालिका, विद्या और अभय तथा वर मुद्राएँ धारण करती हैं। तीन नेत्रों से सुशोभित मुखारविंद की बड़ी शोभा ही रही है। उनके मस्तक पर चन्द्रमा के साथ ही रत्नमय मुकुट बंधा है तथा वे कमल के आसान पर विराजमान हैं। ऐसी देवी को में बारम्बार प्रणाम करती हूँ। वे मेरे भी शत्रुओं का नास करें।
चिक्षुर वध --- दैत्यों की सेना को इस प्रकार तहस-नहस होते देख महादैत्य सेनापति चिक्षुर क्रोध में भरकर अम्बिका से युद्ध करने लगा। वह असुर रणभूमि में देवी के ऊपर इस प्रकार बाणों की वर्षा करने लगा , जैसे बादल मेरुगिरि के शिखर पर पानी की धार बरसा रहा हो। तब देवी ने अपने बाणो से उसके बाण समूहों को काट कर उसके घोड़ो और सारथि को मार डालातथा उसके धनुष और अत्यंत ऊँची धवजा को भी काट डाला। उसके अंगों को अपने बानो से बींध डाला। सब नष्ट होने पर उसने तीखी तलवार से सिंह के मस्तक पर चोट की और देवी की बायीं भुजा में बड़े वेग से प्रहार किया परन्तु देवी की बाँह पर पहुँचते ही वह तलवार टूट गयी। फिर उस दैत्य ने देवी पर शूल चलाया। वह शूल आकाश से गिरते हुए सूर्यमण्डल की भाँति अपने तेज से प्रज्वलित हो उठा। देवी ने भी अपने शूल से उसके शूल के सैंकड़ों टुकड़े कर दिए , साथ ही महादैत्य चिक्षुर की भी धज्जियाँ उड़ गयीं और वह अपने प्राणों से हाथ धो बैठा।
सिंह के पंजों से चामर वध --- तब देवताओं को पीड़ा देने वाला महिषासुर का सेनापति चामर हाथी पर चढ़ कर आया और देवी पर शक्ति का प्रहार किया, किन्तु जगदम्बा ने उसे अपने हुंकार से ही आहात एवं निष्प्रभ कर पृथ्वी पर गिरा दिया। उसने टूटी हुई शक्ति को देखा और क्रोध से शूल चलाया, देवी ने वो भी अपने बाणो से काट गिराया।
इतने में ही देवी का सिंह उछल कर हाथी के मस्तक पर जा बैठा और चामर से खूब जोर से बाहुयुद्ध करने लगा। सिंह और चामर दैत्य लड़ते लड़ते हठी से पृथ्वी पर जा गिरे तथा अत्यंत क्रोध में भर कर एकदूसरे पर प्रहार करने लगे। तब सिंह ने बड़ी जोर से आकाश की ओर उछल कर उधर से अपने पंजों की मार से चामर का सर धड़ से अलग कर दिया।
उदग्र, कराल, उद्धत आदि कई दैत्यों का वध --- इसीप्रकार उदग्र भी शिला और वृक्ष अदि की मार खा कर रणभूमि में देवी के हाथों मारा गया। कराल भी दाँतो, मुक्कों और थपड़ों की चोट खा कर धराशायी हो गया। उद्धत का भी देवी ने कचूमर निकल दिया। भिन्दिपाल से वाष्कल को तथा बाणो से ताम्र और अन्धक को मौत के घाट उतर दिया। तीन नेत्रों वाली अम्बिका ने त्रिशूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा महाहनु नाम के दैत्यों को मार डाला। तलवार की चोट से विडाल के मस्तक को धड़ से अलग कर दिया। दुर्धर और दुर्मुख---इन दोनों को भी अपने बनो से यमलोक भेज दिया।
महिषासुर का भैंसा रूप --- महिषासुर अपनी सेना का संहार होते देख कर, भैंसे का रूप धारण कर के देवी के गणो को त्रास देने लगा। किसी थूथुन से मार कर, किन्ही के ऊपर खुरों का प्रहार कर के , किन्ही-किन्ही को पूँछ से चोट पहुंचा कर, कुछ को सींगों से विदीर्ण करके, कुछ गणो को वेग से, किन्ही को सिंह नाद से, चक्कर देकर और कितनो को निःश्वास वायु के झोंके से धराशायी कर दिया। इस प्रकार वो गणो की सेना गिरा कर वह असुर महादेवी के सिंह को मारने के लिए झपटा। इससे जगदम्बा को बहुत क्रोध हुआ।
महापराक्रमी महिषासुर भी क्रोध में भैंसे का रूप धारण किये हुए अपने खुरों से धरती को खोदने लगा और अपने सींगो से ऊंचे-ऊंचे पर्वत उखाड़ कर फेंकने लगा। उसके वेग से चक्कर देने के कारण पृथ्वी क्षुब्ध हो कर फटने लगी। अपनी पूँछ से टकराकर धरती को समुंद्र में डुबो रहा था, वह अपने हिलते हुए सींगो के आघात से बादलों के टुकड़े-टुकड़े करने लगा। उसके श्वास की प्रचंड वायु के वेग से सैंकड़ों पर्वत आकाश से गिराने लगा।
महिसासुर के विभिन्न रूप --- वह जैसे ही देवी की और बढ़ा, देवी को यह देख कर बहुत क्रोध आया तथा देवी ने पाश फेंककर उस महान दैत्य को बाँध लिया तथा उस महासंग्राम में बंध जाने पर वह भैंसे का रूप त्याग कर सिंह के रूप में आ गया। इस अवस्था में देवी ज्यों ही उसका मस्तक काटने के लिए उधत हुईं, त्यों ही वह खड्गधारी पुरुष के रूप में दिखाई देने लगा। तब देवी ने तुरंत ही बाणो की वर्षा कर के ढाल और तलवार से उस पुरुष को भी बींध डाला। इतने में ही वो महादैत्य गजराज के रूप में परिणत हो गया तथा अपनी सूंढ़ से देवी के विशाल सिंह को खींचने और गरजने लगा। देवी ने तब उसकी सूंढ़ तलवार से काट गिरायी। तब वह महादैत्य पुन: भैंसे का शरीर धारण कर के तीनो लोकों को व्याकुल करने लगा।
देवी का मधुपान करना --- तब क्रोध में भरी हुई देवी चंडिका बारंबार उत्तम मधु का पान करने लगी और आँखे लाल कर के हंसने लगी।उधर वह बल और पराक्रम के मद से चूर हुआ दैत्य भी गरजने लगा और अपने सींगों से देवी के ऊपर पर्वत फेंकने लगा। उस समय देवी अपने बाणो के समूह से उन पर्वतों को चूर्ण करती हुईं, बोलते समय उनका मुख मधु के मद से लाल हो रहा था और मुख से लड़खड़ाती हुई वाणी से बोलीं - "ओ मूढ़ ! जब तक मैं मधु पी रही हूँ तब तक तू क्षण भर के लिए खूब गरज ले। मेरे हाथ से यहीं तेरी मृत्यु हो जाने पर अब शीघ्र ही देवता भी गर्जना करेंगे।"

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें
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महिसासुर वध --- यों कह कर देवी उछलीं और उस महादैत्य के ऊपर चढ़ गयीं तथा अपने पैरों से उसको दबाकर शूल से उसके कंठ पर आघात किया। देवी के पैरों से दबा होने पर भी महिषासुर अपने मुख से दूसरे रूप में बाहर होने लगा। अभी आधे ही शरीर से वो बहार निकलने पाया था कि देवी ने अपने प्रभाव से उसे रोक दिया। आधा निकला होने पर भी वह देवी से युद्ध करने लगा। तब देवी ने अपनी बहुत बड़ी तलवार से उसका मस्तक काट गिराया। फिर तो हाहाकार करती हुई दैत्यों की बाकी की की सेना भाग गयी। सम्पूर्ण देवता अत्यंत प्रसन्न हो गए। देवताओं और महाऋषियों ने दुर्गा देवी का स्तवन किया। गंधर्व राज गाने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगी। महिषासुर का वध करने के कारण ही देवी जगत में 'महिषासुरमर्दिनी' कहलायीं।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'महिषासुर वध' नाम का तीसरा अध्याय पूरा हुआ ।।३ ।।
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चतुर्थो अध्याय
इंद्रादि देवताओं द्वारा देवी की स्तुति
देवी ध्यान
सिद्धि की इच्छा रखने वाले पुरुष जिनकी सेवा करते हैं तथा देवता जिनको सब और से घेरे रहते हैं उन जया नाम वाली दुर्गा देवी का ध्यान करें। उनके श्री अंगों की आभा काले मेघ के समान श्याम है। वे अपने कटाक्षों से शत्रुसमूह को भय प्रदान करती हैं। उनके मस्तक पर आबद्ध चन्द्रमा की रेखा शोभा पाती है। वे अपने हाथों में शंख, चक्र, कृपाण और त्रिशूल धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे सिंह के कंधे पर चढ़ी हुई है और अपने तेज से तीनो लोकों को परिपूर्ण कर रही हैं। ऐसी मेरी आराध्य देवी को मेरा नमस्कार है।
ऋषि कहते हैं --- अत्यंत पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर तथा उसकी सेना देवी के हाथों मारे जाने पर देवताओं ने महर्षियों के साथ देवी का स्तवन और स्तुति की। देवता बोले --- "सम्पूर्ण देवताओं की शक्ति का समुदाय ही जिनका स्वरूप है तथा जिन देवी ने सम्पूर्ण जगत को व्याप्त कर रखा है उन पूजनीया देवी को हम भक्ति पूर्वक नमस्कार करते हैं। जिनके अनुपम प्रभाव और महान बल का वर्णन करने में भगवान शेषनाग, ब्रह्मा जी, तथा महादेव जी भी समर्थ नहीं हैं उन देवी को हम नमस्कार करते है। देवी! आपके इस अचिन्तय रूप का, असुरों का नास करने वाले भरी पराक्रम का तथा समस्त देवताओं और दैत्यों के समक्ष युद्ध में प्रकट किये हुए आपके अद्भुत चरित्रों का हम किस प्रकार वर्णन करें। आपमें सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण - यह तीनो गन तथा समस्त देवो की शक्तियां मौजूद हैं; तो भी दोषों के साथ आपका कोई संसर्ग नहीं मालूम पड़ता। देवता भी आपका पार नहीं पा सके तथा आपकी महिमा का वर्णन करने में असमर्थ हैं। आप ही सबका आश्रय हैं। आपकी कहीं भी आसक्ति नहीं है। इस विश्व की उत्पत्ति तथा घोर पीड़ा का नाश करने वाली, भवसागर से पार उतारने वाली भगवती लक्ष्मी, देवी गौरी भी आप ही हैं। हे वरदायिनी देवी ! आपने अपने शत्रुओं पर भी दया ही की है।खडग के तेज पुञ्ज की भयंकर दीप्ति से तथा आपके त्रिशूल के अग्र भाग की घनीभूत प्रभा से चौंधिया कर जो असुरों की आंखे फुट नहीं गयीं, उसका कारण यह था कि वे मोहर राशिमयों से युक्त चन्द्रमा के समान आनंद प्रदान करने वाले आपके इस सुन्दर मुख का दर्शन करते थे। देवी! आपका शील दुराचारियों के बुरे बर्ताव को दूर करने वाल्ला है। आपकी किसी के साथ तुलना नहीं हो सकती। आप तीनों लोकों में निश्चय ही मनोवांछित फल देने वाली हैं। आपको हमारा नमस्कार है। हे देवी ! आप प्रसन्न हों। तीनो लोकों में आपके जो अत्यंत सुन्दर और अत्यंत भयंकर रूप विचरते रहते हैं, उनके द्वारा भी आप हमारी भी सदा ही रक्षा करें।
ऋषि कहते हैं --- इस तरह जब देवताओं ने नंदन वन के दिव्य पुष्पों एवं गन्ध - चन्दन आदि के द्वारा उनका पूजन किया, धूपों की सुगंध निवेदित की तबी देवी ने प्रसन्न हो कर प्रणाम करते हुए देवताओं से कहा --- देवी बोलीं --"देवताओं! तुम सब लोग मुझसे जिस वास्तु की अभिलाषा रखते हो, उसे मांगो"। देवता बोले - "भगवती आपने हमारे शत्रुओं का नास कर ही डाला है जिससे हमारी सब इच्छा पूर्ण हो गयी, अब कुछ भी बाकी नहीं है। हे आम्बिके ! इतने पर भी यदि आप हमें और वर देना चाहतीं हैं तो दीजिये - हम जब-जब आपका स्मरण करें , तब-तब आप दर्शन दे कर हमारे सब संकट दूर कर दिया करें तथा जो भी मनुष्य आपकी शरण में आ जाये आप उसके सभी कष्ट दूर करें तथा उस को सुख, समृद्धि, वैभव, धन, स्त्री आदि संपत्ति को बढ़ाने के लिए आप सदा हम पर प्रसन्न रहें"। देवताओं ने इस प्रकार अपने तथा जगत के कल्याण के लिए देवी भद्रकाली को प्रसन्न किया तो देवी "तथास्तु " कह कर अंतरध्यान हो गयीं।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'शक्रादिस्तुति ' नाम का चौथा अध्याय पूरा हुआ ।।४।।
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उत्तरचरित्र
पच्चमों अध्याय
देवताओं द्वारा देवी की स्तुति, चण्ड -मुंड के मुख से अम्बिका के रूप की प्रशंशा सुनकर शुम्भ का उनके पास दूत भेजना और दूत का निराश लौटना
विनियोग
ॐ अस्य श्री उत्तर चरित्र रूद्र ऋषि:, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप छंदा, भीमा शक्ति , भ्रामरी बीजं, सूर्यस्तत्वं , संविदा: सवरूपम, महासरस्वती प्रीत्यर्थे उत्तर चरित्र पाठे विनियोग:
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
देवी सरस्वती ध्यान
ॐ अस्य श्री उत्तर चरित्र रूद्र ऋषि:, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप छंदा, भीमा शक्ति , भ्रामरी बीजं, सूर्यस्तत्वं , संविदा: सवरूपम, महासरस्वती प्रीत्यर्थे उत्तर चरित्र पाठे विनियोग:
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
देवी सरस्वती ध्यान
जो अपने कर कमलों में घंटा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र , धनुष और बाण धारण करती हैं, शरद ऋतू के शोभा संपन्न चन्द्रमा के समान जिनकी मनोहर कांति है, जो तीनो लोकों की आधारभूता और शुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली हैं तथा गौरी के शरीर से जिनका प्राकट्य हुआ है, उन सरस्वती देवी का मैं निरंतर भजन करती हूँ।
ऋषि कहते हैं --- पूर्वकाल में शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरों ने अपने बल के घमंड में आ कर इंद्र देव, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, कुबेर, यम, और वरुण आदि देवताओं के अधिकार छीन लिए तथा सब को अधिकारहीन, पराजित एवं अपमानित कर स्वर्ग से निकाल दिया। तब देवताओं को देवी का वरदान याद आया - "करोगे याद मुझे जब भी, मैं आकर तत्काल संकट दूर करुँगी तब ही" ! सभी देवता गिरिराज हिमालय पर भगवती विष्णुमाया की स्तुति करने लगे- देवी को नमस्कार है। महादेवी शिवा, इस प्रकृति, गौरी, धात्री, दुर्गा, दुर्गम संकट से पार उतारने वाली देवी को नमस्कार है। अत्यंत सौम्य तथा अत्यंत रौद्ररूपा, विष्णुमाया, शरणागतों का कल्याण करने वाली कृति देवी को बारम्बार नमस्कार है। जो देवी प्राणियों में चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, शक्ति, तृष्णा, क्षमा, जाती, लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, कांति, लक्ष्मी, वृति, समृति, दया, तुष्टि, माता रुप से स्थित है उन देवी को नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी चैतन्य रूप से इस जगत को व्याप्त करके स्थित है, अपने अभीष्ट की प्राप्ति होने से देवताओं ने जिनकी स्तुति की, वह कल्याणकी साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मंगल करें तथा सारी आपत्तियों का नाश करें। उद्दण्ड दैत्यों से सताए हुए हम सभी जिन परमेश्वरि को इस समय नमस्कार करते हैं तथा जो भक्ति भाव से स्मरण की जाने पर तत्काल ही सम्पूर्ण विपत्तियों का नाश कर देती हैं , वे जगदम्बा हमारा इस समय संकट दूर करें।
पार्वती जी के शरीर से अम्बिका का प्रादुर्भाव --- इस प्रकार जब देवता स्तुति कर रहे थे, उस समय पार्वती देवी गंगाजी के जल में स्नान करने के लिए वहाँ आयीं। उन भगवती ने देवताओं से पुछा - "आप यहाँ किसकी स्तुति कर रहे हो ?" तब पारवती देवी के ही शरीर से प्रकट हो कर शिवादेवी बोलीं - "शुम्भ और निशुम्भ के सताए हुए यह सभी देवता मेरी ही स्तुति कर रहे और मेरी ही शरण में आये हुए हैं। पारवती जी शरीर से अम्बिका का प्रादुर्भाव हुआ था इसीलिए "कौशिकी " कहलायीं। कौशिकी जी के प्रकट होने के बाद पार्वती जी का शरीर काले रंग का हो गया, अतः वे हिमालय पर रहने वाली कालिका देवी के नाम से विख्यात हुईं।
चण्ड -मुण्ड का शुम्भ को देवी के रूप का वर्णन --- तदनन्तर दैत्य शुम्भ-निशुम्भ के भृत्य चण्ड-मुण्ड वहाँ आये और उन्होंने परम मनोहर रूप धारण करने वाली अम्बिका देवी को देखा। फिर वे शुम्भ के पास जा कर बोले- "महाराज! एक अत्यंत सुन्दर स्त्री है, अपनी दिव्य कान्ति से हिमालय को प्रकाशित कर रही है। असुरेश्वर ! तीनो लोकों के सभी कीमती रत्न, मणि, ऐरावत हाथी, उच्चै:श्रवा घोड़ा, हंस विमान, सुवर्ण की वर्षा करने वाला वरुण का छत्र आदि सभी आपके पास हैं। फिर जो यह स्त्रियों में रत्न रूप कल्याणमयी देवी है, इसको आप क्यों नहीं अपने अधिकार में कर लेते ?"
शुम्भ का महादैत्य सुग्रीव को दूत बना कर देवी के पास भेजना --- चण्ड-मुण्ड का यह वचन सुन कर शुम्भ ने महादैत्य सुग्रीव को दूत बना कर भेजा और कहा - " तुम मेरी आज्ञा से देवी के सामने यह यह बातें कहना और ऐसा उपाय करना, जिससे प्रसन्न हो कर जल्दी ही वे यहाँ आ जाये।" वह दूत ठीक वैसे ही देवी के पास गया और मधुर वाणी में बोला - देवी! मैं दैत्यराज शुम्भ जो की इस समय तीनो लोको के परमेश्वर हैं, का भेजा हुआ दूत हूँ। उन्होंने आपके लिए जो सन्देश दिया है वह सुनो - "सम्पूर्ण त्रिलोकी मेरे अदिकार में है। जितने भी रत्नभूत पदार्थ, हाथी, घोड़े देवताओं, गन्धर्वों और नागों के पास थे वह सभी मेरे ही पास आ गए हैं। देवी! आप को हम स्त्रियों में रत्न मानते हैं इसीलिए आप भी मेरी या मेरे भाई महापराक्रमी निसुम्भ की सेवा में आ जाओ। मेरी पत्नी बन महलों में आ कर रहो। ऐसा करने से तुम्हे महान ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी। "
देवी प्रतिज्ञा --- देवी बोलीं - "दूत! तुमने सत्य ही कहा है। मैंने भी सुना है कि शुम्भ तीनो लोको का स्वामी है तथा निशुम्भ भी पराक्रमी है। किन्तु मैंने एक प्रतिज्ञा पहले से ही कर रखी है उसे सुनो - जो मुझे युद्ध में जीत कर मेरा अभिमान चूर्ण करेगा तथा संसार में जो मेरे ही समान बलवान होगा, वही मेरा स्वामी होगा। अतः अब तुम जाओ और शुम्भ को जा कर मेरा सन्देश दे दो। "
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'देवी-दूत संवाद ' नाम का पाँचवा अध्याय पूरा हुआ ।।५।।
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षष्ठो अध्याय --- धूम्रलोचन-वध
ऋषि कहते हैं --- दूत को बहुत अमर्ष हुआ तथा वह दैत्यराज के पास गया और देवी का समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाया। दूत के यह वचन सुन कर दैत्यराज बहुत कुपित हो उठाऔर दैत्यसेनापति धूम्रलोचन से बोला - "धूम्रलोचन ! तुम अपनी सेना साथ ले कर जाओ और उस देवी को बलपूर्वक पकड़कर यहाँ ले कर आओ। " शुम्भ की आज्ञा पा कर धूम्रलोचन साथ हज़ार सेना लेकर देवी के पास हिमालय पर जा पहुंचा बोलै-" चलो ख़ुशी से अपने आप ही मेरे स्वामी के पास नहीं तो आज तो मैं तुमको बलपूर्वक ले कर ही जाऊँगा। " देवी बोलीं- तुम बहुत बलवान हो और इतनी बड़ी सेना के साथ आये हो अब मैं क्या कर सकती हूँ? " देवी के यों कहने पर धूम्रलोचन देवी की और दौड़ा, तब अम्बिका ने "हुं " शब्द के उच्चारण मात्र से ही उसे वहीं पर भस्म कर दिया। देवी ने उसकी सेना को भी शक्ति और फरसा चला कर मार डाला। देवी का वाहन सिंह भी क्रोध में भर कर भयंकर गर्जना करते हुए गर्दन के बालों को हिलाता हुआ असुरों की सेना में कूद पड़ा और दैत्यों को अपने जबड़ों और पंजों से पटक कर घायल कर मार डाला। सिंह ने अपने नखों से कितने ही दैत्यों के पेट फाड़ डाले और सर धड़ से अलग कर दियाऔर उनका रक्त चूस लिया।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'धूम्रलोचन-वध ' नाम का छठा अध्याय पूरा हुआ ।।६।।
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सप्तमो अध्याय --- चण्ड और मुण्ड वध
हे शारदेय माँ ! हे शारदेय माँ ! अज्ञानता से हमें तार दे माँ- भजन सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें
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देवी ध्यान
मैं श्री मातंगी देवी ( सरस्वती देवी का तांत्रिक रुप ) का ध्यान करती हूँ। वे तीन नेत्रों वाली, रत्नमय सिंहासन पर बैठ कर पड़ते हुए तोते का मधुर शब्द सुन रही हैं। उनके शरीर का वर्ण श्याम है। वे अपना एक पैर कमल पर रखे हुए हैं और मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करतीं हैं। उनकी अभय मुद्रा है तथा वे गुंजा के बीजों की माला धारण किये हुए वीणा बजाती हैं। उनके ललाट में बिंदी है तथा वे लाल रंग की साड़ी पहने हाथ में खोपड़ी, खड़ग, शँखमय पात्र लिए हुए हैं। उनके बदन पर मधु का हल्का-हल्का प्रभाव जान पड़ता है। वह प्रकृति और संगीत की देवी हैं। मैं विद्या और वाणी की अधिष्टरात्री देवी को नमस्कार करती हूँ । वे मातंगी देवी मुझको ज्ञान और बुद्धि दे करके मेरा कल्याण करें।
ऋषि कहते हैं --- शुम्भ ने जब सुना कि देवी ने धूम्रलोचन और उसकी सेना को मार डाला तो क्रोध से आगबबूला हो कर उसने चण्ड और मुंड दो महादैत्यों को आज्ञा दी - हे चण्ड ! और हे मुण्ड !-तुम लोग बड़ी सेना ले कर जाओ और देवी को बलपूर्वक बाँध कर यहाँ ले आओ और अगर इस प्रकार उसको लेन में संदेह हो तो युद्ध में सभी अस्त्रों- शास्त्रों तथा आसुरी सेना का प्रयोग कर उसकी हत्या कर देना।
चण्ड-मुण्ड वध --- तदन्तर शुम्भ की आज्ञा पा कर चण्ड -मुंड चतुरङ्गिनी सेना लेकर हिमालय जा पहुंचे जहाँ देवी सिंह पर बैठी मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। जैसे ही देती देवी को पकड़ने का उद्योग करने लगे वैसे ही देवी का मुख क्रोध के कारण काला पड़ गया। भौहें टेडी हो गयीं और तुरंत वहां से विकरालमुखी काली प्रकट हुई जो तलवार और पाश लिए हुए थी। वे विचित्र खट्ववाङ्गं धारण किये हुए थी तथा चीते के चर्म की साड़ी पहने नर-मुण्डो की माला से विभूषित थीं। उनके शरीर का मास सूख गया था, केवल हड्डियों का ढांचा था जिससे वे अत्यंत भयंकर जान पड़ती थीं। उनका मुख बहुत विशाल था तथा जीभ लपलपाने के कारण बहुत ही डरावनी प्रतीत होती थीं। उनकी आंखे लाल और भीतर को धसीं हुई थीं। वे अपनी भयंकर गर्जना से सम्पूर्ण दिशाओं को गुँजा रही थीं।
कलिका देवी बड़े वेग से दैत्यों की उस सेना पर टूट पड़ी तथा पकड़ -पकड़ कर सब को मुँह में डाल कर चबाने लगीं। तलवार और खट्ववाङ्गं से कई देती मार डाले वे घोड़े , घंटे सहित हाथियों को और अस्त्र-शास्त्र को भी खाने लगी। क्षणभर में ही को मरते देख कर चण्ड उन कलिका देवी की और दौड़ा तथा मुण्ड ने भी अपने बाणो और चक्रों की वर्षा से काली को आच्छादित कर दिया। वे अनेक चक्र देवी के मुख में समाते हुए ऐसे जान पड़े जैसे कि सूर्य के बहुतेरे मंडल बादलों के उदार में प्रवेश कर रहे हों। तब भयंकर गर्जना करने वाली काली ने अत्यंत रोष में भर कर विकत अट्हास किया और बहुत बड़ी तलवार हाथ में लेकर "हं " शब्द का उच्चारण करते हुए उसके बाल पकड़ कर उसका मस्तक काट दिया। चण्ड को मारा गया देख मुंड भी देवी को मारने के लिए दौड़ा। तब कलिका ने उसको भी अपनी तलवार से घायल कर मार डाला। यह देख बाकी की सेना भय से व्याकुल हो चारों और भाग गयी।
'चामुण्डा' नाम --- तब कलिका ने चण्ड-मुण्ड का मस्तक हाथ में ले जा कर चण्डिका देवी से कहा - "देवी ! मैंने चण्ड -मुंड नाम के दो महापशुओं को तुम्हे भेंट किया है अब शुम्भ - निशुंभ का तुम स्वयं ही वध करना।" तब कल्याणमयी चंडिका देवी ने मधुर वाणी में कहा - "देवी ! तुम चण्ड -मुंड को लेकर मेरे पास आयी हो, इसलिए संसार में 'चामुण्डा' के नाम से तुम्हारी ख्याति होगी"।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'चण्ड-मुण्ड-वध ' नाम का सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ।।७।।
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अष्टमो अध्याय --- रक्तबीज वध
देवी धयान
मैं अणिमा अदि सिद्धिमयी किरणों से आवृत भवानी का ध्यान करती हूँ। उनके शरीर का रंग लाल है। नेत्रों में करुणा लहरा रही है तथा हाथों में पाश, अङ्कुश, बाण, और धनुष शोभा पाते हैं।
ऋषि कहते हैं --- चण्ड - मुण्ड और सेना का संहार हो जाने पर शुम्भ ने दैत्यों की सम्पूर्ण सेना को युद्ध में कूच करने की आज्ञा दी। वह बोला - आज उडायुध नाम के छियासी देती-सेनापति, कुम्भ नाम के चौरासी सेनानायक, पचास कोटिवीर्य-कुल के, सौ धौम्र - कुलके असुर सेनापति, कालक, दौहृद, मौर्य और कालकेय असुर भी युद्ध के लिए तैयार हो मेरी आज्ञा से तुरंत प्रस्थान करें। असुरराज शुम्भ इस प्रकार आज्ञा दे सहस्रों बड़ी बड़ी सेना के साथ युद्ध के लिए प्रस्थित हुआ।
शुम्भ की सेना का आना --- उसकी अत्यंत भयंकर सेना आती देख चंडिका ने अपने धनुष की टंकार, घंटे की ध्वनि से चरों दिशाओं को गूंजा दिया। सिंह ने भी भयंकर दहाड़ मारी। उस तुमुल नाद को सुन दैत्यों की सेनाओं ने चारों और से आकर चंडिका,सिंह तथा कलिका को घेर लिया। देवताओं के शरीर से भी अत्यंत बल और पराक्रम वाली शक्तियां जो उनके ही रूप और साधनो से संपन्न थीं, असुरों से युद्ध करने वहां आ गयीं।
भगवन शिव को दूत बनाने से शिवदूती नाम होना --- तब महादेव जी ने चण्डिका से कहा --- "मेरी प्रसन्नता के लिए तुम शीघ्र ही इन असुरों का संहार करो"। तब देवी के शरीर से अत्यंत भयानक और परम उग्र चण्डिका - शक्ति प्रकट हुई। उस अपराजिता देवी ने महादेव जी को कहा- " भगवान् ! आप शुम्भ - निसुम्भ के पास दूत बन कर जाइये और मेरा सन्देश दीजिये - दैत्यों ! अगर जीवित रहना चाहते हो तो पातळ को वापिस लौट जाओ। अगर बल के घमंड में युद्ध की अभिलाषा रखते हो तो मेरी योगिनियाँ तुम्हारे कच्चे मास से तृप्त हों। भगवन शिव को दूत के कार्य में नियुक्त करने के लिए संसार में उन देवी का नाम 'शिवदूती' विख्यात हुआ।
भगवान शिव द्वारा दैत्यों को देवी का सन्देश --- भगवान शिव से देवी का सन्देश सुन असुर क्रोध में भर कर कात्यायनी देवी की और बढ़े और शक्ति, ऋष्टि, बाणो की वर्षा करने लगे। चामुंडा शूल और खट्ववाङ्गं से उनका कचूमर निकलने लगी। उधर देवताओं के शरीर से उत्पन्न हुई शक्तियाँ, हंसयुक्त विमान पर बैठी हुई ब्रह्मा जी की शक्ति ब्रम्हाणी अक्षसूत्र से सुशोभित,अपने कमण्डलु से जल छिड़क कर, महादेव जी की शक्ति माहेश्वरी महानाग का कंगन पहने वृषभ पर आरूढ़ हो कर त्रिशूल से , कार्तिकेय जी की शक्ति कौमारी हाथों में शक्ति लिए, मयूर पर आरूढ़ हो कर, शक्ति के प्रहार से से दैत्यों का संहार आरम्भ कर दिया। विष्णु जी की शक्ति वैष्णवी गरुड़ पर विराजमान हो कर, हाथों में शंख,चक्र, गदा से, इंद्र की शक्ति ऐन्द्री वज्र हाथों में लिए गजराज ऐरावत पर बैठ कर वज्रप्रहार से, श्रीहरि की शक्ति वाराही ने अपनी थूथुन की मार से , नारसिंही शक्ति अपने नखों से विदीर्ण करके घायल करने लगीं तथा रक्त की धारा बहाते हुए उनको पृथ्वी पर सुलाने लगीं। कइयों को शिवदूती ने अपना ग्रास बना लिया।
रक्तबीज वध --- मातृगणों से पीड़ित दैत्यों को युद्ध से भागते देख कर रक्तबीज नाम का महादैत्य गदा से इन्द्रशक्ति के साथ युद्ध करने लगा। घायल होने पर उसके रक्त की बूंदे जो धरती पर गिरती उन्ही से उसी के आकार के सहस्रों महादैत्य पैदा होने लगे। वे सब भी देवियों से युद्ध करने लग जाते। तब चंडिका ने कलिका से कहा- " चामुण्डे ! मेरे शस्त्रों के प्रहार से जो भी रक्त गिरे वह तुम पी जाओ और सारी लाशों का भी भक्षण करो, यह रक्त अगर जमीन पर नहीं गिरेगा तो नए दैत्य पैदा न होंगे तब यह असुर आवश्य ही मारा जाएगा"। यह कह कर चण्डिका देवी ने शूल से रक्तबीज पर प्रहार किया। वह भी गदा से प्रहार करने लगा। जैसे ही उसका रक्त गिरा उसका रक्त काली ने अपने मुख में ले लिया और पी गयी। रक्त गिरने से कलिका के मुख में जो दैत्य पैदा हुए वह उनको चबा कर खा गयी। तब चण्डिका देवी ने वज्र, बाण, खड्ग आदि से रक्तबीज को मार डाला।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'रक्तबीज-वध ' नाम का आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।।८।।
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नवमो अध्याय --- निशुम्भ-वध
अर्धनारीश्वर ध्यान
मैं अर्धनारीश्वर के श्री विग्रह की निरंतर शरण लेती हूँ। उसका वर्ण बन्धूकपुष्प और स्वर्ण के समान रक्तपीत मिश्रित है। वह अपनी भुजाओं में सुन्दर अक्षमाला, पाश,और वरद-मुद्रा धारण करता है; अर्धचंद्र उसका आभूषण है तथा वह तीन नेत्रों से सुशोभित है।
राजा ने कहा --- युद्ध में रक्तबीज तथा अन्य दैत्यों के मारे जाने पर शुम्भ और निशुम्भ के क्रोध की सीमा न रही। निशुम्भ अमर्ष में भर कर असुरों की प्रधान सेना के साथ देवी की और दौड़ा। महापराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेना के साथ वहां आ पहुंचा। तब शुम्भ -निशुम्भ के साथ देवी का घोर संग्राम छिड़ गया। उनके द्वारा चलाये हुए भयंकर बाण चंडिका ने अपने बनो के समूह से तुरंत काट डाले तथा उन असुरों को चोट भी पहुँचायी। निशुम्भ ने तीखी तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर देवी के वाहन सिंह के मस्तक पर प्रहार किया। अपने सिंह को चोट पहुँचाने पर देवी ने क्षुरप्र नामक बाण से निशुम्भ की श्रेष्ठ तलवार तुरंत ही काट डाली और उसकी ढाल को भी जिसमें आठ चाँद जड़े थे खंड-खंड कर दिया। उसने शक्ति और शूल चलाए किन्तु समीप आने पर देवी ने मुक्के से मरकर चूर्ण कर दिया। तब उसने गदा घुमा कर चण्डिका के ऊपर चलाई परन्तु वह देवी के त्रिशूल से कट कर भस्म हो गयी। फिर निशुम्भ को फरसा हाथ में लेकर आते देख कर देवी ने बाणसमूहों से घायल कर उसको धरती पर सुला दिया।
शुम्भ और देवी का युद्ध --- अपने भयंकर पराक्रमी भाई निशुम्भ के धराशायी हो जाने पर शुम्भ को बहुत क्रोध आया और वह बहुत वेग से वह अम्बिका का वध करने के लिए आगे बढ़ा। उसे आते देख अम्बिका ने शंख बजाय और धनुष की प्रत्यंच्चा का तथा घंटे का अत्यंत दुस्सह शब्द किया। सिंह ने भी अपनी दहाड़ से आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाओं को गुँजा दिया। फिर काली ने आकाश में उछल कर अपने दोनों हाथों से पृथ्वी पर आघात किया जिससे भयंकर शब्द हुआ तथा पहले के सब शब्द शांत हो गए। तत्पश्चात शिवदूती ने दैत्यों के लिए अमङ्गलजनक अट्ठास किया जिसे सुन कर असुर थर्रा उठे, शुम्भ ने क्रोध कर के ज्वालाओं से युक्त अत्यंत भयानक शक्ति चलाई जिसे देवी ने बड़े भारी लूके से दूर हटा दिया। शुम्भ ने बाण चलाये और देवी उसके टुकड़े करने लगी। वह भी देवी के अस्त्रों को काटने लगा। तब चंडिका के शूल से मूर्छित हो वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
महाबली दैत्य का देवी को युद्ध के लिए ललकारना --- इतने में निशुम्भ को चेतना हुई। और उसने धनुष हाथों में लेकर बाणो द्वारा देवी, काली तथा सिंह को घायल कर डाला। फिर वह अपनी दस हजार बाँहें बनाकर चक्र चलने लगा। देवी ने कुपित हो कर उन बाणो और चक्रों को अपने बाणो से काट गिराया। फिर वह देवी पैर गदा और शूल से वार करने लगा। देवी ने अपनी तीखी तलवार से वह काट दिए। वह शूल लेकर जैसे ही देवी की और बढ़ा वैसे ही चंडिका ने शूल से उसकी छाती छेद डाली जिसमें से एक और महाबली दैत्य पैदा हुआ और देवी को "खड़ी रह , खड़ी रह " कह कर युद्ध के लिए ललकारने लगा। यह सुन कर देवी ठठाकर हँस पड़ी तथा खडग से उसका मस्तक काट गिराया। वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
देवताओं की शक्तियों द्वारा सेना का संहार --- तदनन्तर सिंह अपनी दाढ़ों से असुरों की गर्दन कुचल कर खाने लगा, वह बड़ा भयंकर दृश्य था। उधर कलिका तथा शिवदूती ने भी कई दैत्यों का भक्षण कर लिया। कौमारी की शक्ति से विदीर्ण कई महा दैत्य नष्ट हो गए। ब्राह्मणी के मन्त्रपूत जल से निस्तेज होकर कितने ही भाग गए। कितने ही दैत्य माहेश्वरी के त्रिशूल से छिन्न-भिन्न हो धराशायी हो गए। वाराही के थूथुन के आघात से कितनो का पृथ्वी पर कचूमर निकल गया। वैष्णवी ने अपने चक्र से दानवो के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। एन्द्री के वज्र से कितने ही प्राणो से हाथ धो बैठे। नारसिंही की शक्ति से कुछ असुर नष्ट हो गए और बाकी भाग गए।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'निशुंभ -वध ' नाम का नवम अध्याय पूरा हुआ ।।९।।
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दशमो अध्याय --- शुम्भ-वध
देवी ध्यान
मैं मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली शिवशक्तिस्वरूपा भगवती कामेश्वरी का हदय में चिंतन करती हूँ। वे तपाये हुए सुवर्ण के समान सुन्दर हैं। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि --- यह ही तीन उसके नेत्र हैं। वे अपने मनोहर हाथों में धनुष-बाण, अङ्कुश, पाश और शूल धारण किये हुए है।
ऋषि कहते हैं --- राजन ! अपने प्राणों के समान प्रिय भाई निशुम्भ तथा साडी सेना को मारा गया देख कर शुम्भ ने कुपित हो कर कहा --- दुर्गे ! तू बल के अभिमान में आकर झूठ -मूठ का घमंड न दिखा। तू बड़ी मानिनी बानी हुई है, किन्तु तू दूसरी स्त्रियों के बल का सहारा लेकर लड़ती है।
देवी बोलीं --- ओ दुष्ट ! मैं अकेली ही हूँ। इस संसार में मेरे सिवा दूसरी कौन है? देख यह मेरी ही विभूतियाँ हैं, अतः मुझमें ही प्रवेश कर रहीं हैं। तदन्तर ब्राहणी अदि समस्त देवियाँ अम्बिका के शरीर में ही प्रवेश हो गयीं। उस समय केवल अम्बिका ही रह गयी।
देवी बोलीं --- मैं अपनी ऐश्वर्य शक्ति से अनेक रूपों में यहाँ उपस्थित हुई थी। उन सब रूपों को मैंने समेट लिया। अब में अकेली ही युद्ध मैं खड़ी हूँ। तुम भी स्थिर हो जाओ।
ऋषि कहते हैं --- देवी और शुम्भ दोनों में भयानक युद्ध छिड़ गया। अम्बिका ने जो दिव्य अस्त्र छोड़े उन्हें शुम्भ ने काटा। शुम्भ ने जो दिव्य अस्त्र चलाये उन्हे देवी ने भयंकर हुंकार शब्द के उच्चारण से खिलवाड़ में ही नष्ट कर डाला। तब उस असुर ने सैंकड़ों बाणो से देवी को आच्छादित कर दिया। देवी ने उसका धनुष ही तोड़ डाला। देवी ने उसकी शक्ति भी काट डाली। फिर शुम्भ ने सौ चाँद वाली चमकती हुई ढाल और तलवार हाथ में ले कर देवी पर धावा किया। उसके आते ही चंडिका ने अपने धनुष से छोड़े हुए तीखे बनो से उसकी ढाल और तलवार काट डाली। अब वो मुदगर लाया। देवी ने वो भी काट डाला। तिसपर भी वह असुर मुक्का ले कर बड़े वेग से देवी की और दौड़ा और देवी की छाती में मुक्का मारा। देवी ने भी उसकी छाती में एक चांटा जड़ दिया। देवी का थप्पड़ खा कर दैत्यराज शुम्भ पृथ्वी पर जा गिरा, फिर खड़ा हो गया। तब वे दोनों आकाश में बिना किसी आधार के ही युद्ध करने लगे। सब देवता विस्मित हो गए। फिर अम्बिका ने उसे उठा कर घुमाया और पृथ्वी पर पटक दिया। पुनः वह चंडिका का वध करने के लिए उनकी और बड़े वेग से दौड़ा। तब क्रोध से उसको अपनी और आते देख कर देवी ने त्रिशूल से उसकी छाती छेद कर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। देवी के शूल की धार से घायल होने पर उसके प्राण-पखेरू उड़ गए और वह समुन्द्रों, द्वीपों तथा पर्वतों सहित समूची पृथ्वी को कंपाता हुआ भूमि पर गिर पड़ा।
प्रकृति का प्रसन्न होना --- उस दुरात्मा के मारे जाने पर सम्पूर्ण जगत प्रसन्न एवं स्वस्थ हो गया तथा आकाश स्वच्छ दिखाई देने लगा। पहले जो उत्पातसूचक मेघ और उल्कापात होते थे, वे सब शांत हो गए तथा नदियाँ ठीक मार्ग से बहने लगीं। पवित्र वायु बहने लगी। सूर्य की प्रभा उत्तम हो गयी। अग्निशाला की बुझी हुई आग अपने आप प्रज्वलित हो उठी तथा सम्पूर्ण दिशों के भयंकर शब्द शांत हो गए। गन्धर्व बाजे बजने लगे और मधुर गीत गाने लगे। अप्सराएँ नाचने लगीं
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'शुम्भ -वध ' नाम का दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।।१० ।।
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एकादशो अध्याय
देवताओं द्वारा देवी की स्तुति तथा देवी द्वारा देवताओं को वरदान
देवी ध्यान
मैं भुवनेश्वरी देवी का ध्यान करती हूँ। उनके श्रीअंगों की आभा प्रभातकाल के सूर्य समान है। मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है। वे उभरे हुए स्तनों और तीन नेत्रों से युक्त है। उनके मुख पर मुस्कान की छठा छाई रहती है और हाथों में वरद, अङ्कुश, पाश एवं वरद मुद्रा शोभा पाते हैं। में आपको नमस्कार करती हूँ।
ऋषि कहते हैं --- शुम्भ के मारे जाने पर अग्नि को आगे कर सभी देवता प्रसन्न हो कर कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे। उनके मुख के प्रकाश से सभी दिशाएं जगमगा रहीं थी। देवता बोले--- शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवी ! हमपर प्रसन्न हो जाओ। विश्वेश्वरि १ विश्व की रक्षा करो। तुम इस जगत का एकमात्र आधार हो। तुम्ही जल में स्थित हो कर सम्पूर्ण जगत को तृप्त करती हो। सम्पूर्ण विद्ये तुम्हारा ही भिन भिन रूप हैं जगत में जितनी भी स्त्रियां हैं तुम्हारी ही मूर्तियां है। इस विश्व को व्याप्त करने वाली देवी, तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है ? तुम परा वाणी हो। तुम स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाली हो। नारायणी ! तुम सब प्रकार का मङ्गल करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है।
तुम ब्रह्माणी का रूप धार कर हंसो पर बैठ कर कुश मिश्रित जल छिड़कती रहती हो। तुम्हे नमस्कार है। माहेश्वरी रूप से वृषभ की पीठ पर बैठकर त्रिशूल, चन्द्रमा और सर्पको धारण करने वाली नारायणी देवी तुमको नमस्कार है। मोरों और मुर्गों से घिरी रहने वाली तथा महाशक्ति को धारण करने वाली कौमारी रूप धारिणी तुम्हे नमस्कार है। शंख,चक्र, गदा लिए हुए उत्तम आयुधों को धारण करने वाली वैष्णवी देवी आपको नमस्कार है।वाराही रूप धारिणी आपको नमस्कार है। नारसिंही रूप से दैत्यों का वध करने वाली देवी तुमको नमस्कार है। इन्द्र शक्तिरूपा ऐन्द्री देवी आपको नमस्कार है। शिवदूती रूप से दैत्यों की महती सेना का वध करने वाली देवी आपको नमस्कार है। विकराल मुख वाली चामुंडा रूपा नारायणी देवी ! तुमको नमस्कार है। देवी! आपका त्रिशूल, घंटा और खडग हमारा मंगल करें। देवी तुम प्रसन्न होने पर सभी रोगों को नाश कर देती हो। अपनी शरण में आये हुए भक्तों की तुम सब प्रकार से रक्षा करती हो। उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। आपके सिवा ऐसी दूसरी कौन सी देवी है? देवी हम तुम्हारे चरणों में पड़े हैं , हम पर प्रसन्न हो जाओ और हम को वरदान दो।
देवी बोली---देवताओं! जो इच्छा हो सो वर मांग लो। मैं अवश्य ही उसे पूरा करूंगी।
देवता बोले--- देवी! तुम इसी प्रकार तीनो लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।
देवी बोली --- देवताओं ! जब-जब इस पृथ्वी पर दैत्य पैदा होंगे मैं उनको आ कर मारूँगी। दैत्यों को मरने के कारण समय समय पर मैं विभिन्न नमो से पुकारी जाऊँगी। मनुष्य मुझे 'रक्तदन्तिका', 'शताक्षी', 'शाकम्भरी', 'दुर्गा देवी', भीमादेवी' और 'भ्रामरी' के नाम से जानेंगे। इस प्रकार जब-जब भी संसार में कोई बाधा होगी तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रुओं का संघार करूंगी।
तुम ब्रह्माणी का रूप धार कर हंसो पर बैठ कर कुश मिश्रित जल छिड़कती रहती हो। तुम्हे नमस्कार है। माहेश्वरी रूप से वृषभ की पीठ पर बैठकर त्रिशूल, चन्द्रमा और सर्पको धारण करने वाली नारायणी देवी तुमको नमस्कार है। मोरों और मुर्गों से घिरी रहने वाली तथा महाशक्ति को धारण करने वाली कौमारी रूप धारिणी तुम्हे नमस्कार है। शंख,चक्र, गदा लिए हुए उत्तम आयुधों को धारण करने वाली वैष्णवी देवी आपको नमस्कार है।वाराही रूप धारिणी आपको नमस्कार है। नारसिंही रूप से दैत्यों का वध करने वाली देवी तुमको नमस्कार है। इन्द्र शक्तिरूपा ऐन्द्री देवी आपको नमस्कार है। शिवदूती रूप से दैत्यों की महती सेना का वध करने वाली देवी आपको नमस्कार है। विकराल मुख वाली चामुंडा रूपा नारायणी देवी ! तुमको नमस्कार है। देवी! आपका त्रिशूल, घंटा और खडग हमारा मंगल करें। देवी तुम प्रसन्न होने पर सभी रोगों को नाश कर देती हो। अपनी शरण में आये हुए भक्तों की तुम सब प्रकार से रक्षा करती हो। उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। आपके सिवा ऐसी दूसरी कौन सी देवी है? देवी हम तुम्हारे चरणों में पड़े हैं , हम पर प्रसन्न हो जाओ और हम को वरदान दो।
देवी बोली---देवताओं! जो इच्छा हो सो वर मांग लो। मैं अवश्य ही उसे पूरा करूंगी।
देवता बोले--- देवी! तुम इसी प्रकार तीनो लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।
देवी बोली --- देवताओं ! जब-जब इस पृथ्वी पर दैत्य पैदा होंगे मैं उनको आ कर मारूँगी। दैत्यों को मरने के कारण समय समय पर मैं विभिन्न नमो से पुकारी जाऊँगी। मनुष्य मुझे 'रक्तदन्तिका', 'शताक्षी', 'शाकम्भरी', 'दुर्गा देवी', भीमादेवी' और 'भ्रामरी' के नाम से जानेंगे। इस प्रकार जब-जब भी संसार में कोई बाधा होगी तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रुओं का संघार करूंगी।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'देवी स्तुति ' नाम का ग्यारवाँ अध्याय पूरा हुआ ।।११।। ⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿⇿
द्वादशो अध्याय ---फलस्तुति
देवी ध्यान
मैं तीन नेत्रों वाली दुर्गा देवी का ध्यान करती हूँ, उनके श्री अंगों की प्रभा बिजली के समान है। सिंह के कंधे पर बैठी हुई वह भयंकर प्रतीत होतीं हैं। हाथों में तलवार और ढाल लिए अनेक कन्याएँ उनकी सेवा में खड़ी हैं। वे अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जिनी मुद्रा धारण किये हुए है। उनका स्वरूप अग्निमय है तथा वे माथे पर चंद्रमा का मुकुट धारण करती हैं।
देवी बोलीं --- " देवताओं ! जो एकाग्रचित होकर प्रतिदिन मेरा स्तवन करेगा, उसकी सारी बाधा में निश्चय ही दूर कर दूँगी। जो मधुकैटभ नाश, महिषासुर वध तथा शुम्भ-निशुम्भ के संहार के प्रसंग का पाठ करेंगें तथा अष्टमी चतुर्दशी तथा नवमी को को भी एकाग्रचित्त हो कर भक्तिपूर्वक मेरे उत्तम माहात्म्य का श्रवण करेंगें उन्हें कोई पाप नहीं छू सकेगा। उन पर पापजनित आपतियाँ भी नहीं आयेंगी। उनके घर में कभी दरिद्रता नहीं होगी। उनको कभी प्रेमीजनों के विछोह का कष्ट भी नहीं भोगना पड़ेगा।
इतना ही नहीं, उन्हें शत्रु से, लुटेरों से, राजा से, शस्त्र से, अग्नि से तथा जल की राशि से भी कभी भय नहीं होगा। इसलिए सबको एकाग्रचित होकर भक्तिपूर्वक मेरे इस माहात्म्य को सदा पढ़ना और सुनना चाहिये। यह परम कल्याणकारक है।
मेरा माहात्म्य महमारीजनित समस्त उपद्रवों तथा आध्यात्मिक आदि तीनो प्रकार के उत्पातों को शांत करने वाला है। मेरे जिस मंदिर में प्रतिदिन विधिपूर्वक मेरे इस माहात्म्य का पाठ किया जाता है, उस स्थान को मैं कभी नहीं छोड़ती। वहाँ सदा ही मेरा सन्निधान बना रहता है।
बलिदान, पूजा, होम तथा महोत्सव के अवसरों पर मेरे इस चरित्र का पूरा-पूरा पाठ पढ़ना और पाठ को श्रवण करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य विधि को जान कर या बिना जाने भी मेरे लिए जो बलि, पूजा या होम आदि करेगा, उसे मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ ग्रहण करुँगी। शरत्काल में जो वार्षिक महापूजा (दुर्गा पूजा ) की जाती है, इस अवसर पर जो मेरे इस माहात्म्य को भक्तिपूर्वक सुनेगा, वह मनुष्य मेरे प्रसाद से सब बाधाओं से मुक्त तथा धन, धान्य एवं पुत्र से संपन्न होगा। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
जो भी मेरे इस माहात्म्य को , मेरे प्रादुर्भाव की सुंदर कथाएँ तथा युद्ध में किये हुए मेरे पराक्रम को सुनता है वह निर्भय हो जाता है। मेरे माहात्म्य का श्रवण करने वाले पुरुषों के शत्रु नष्ट हो जाते हैं। उन्हें कल्याण की प्राप्ति होती तथा उनका कुल आनंदित रहता है। सर्वत्र शान्ति कर्म में, बुरे स्वप्न दिखाई देने पर तथा ग्रहजनित भयंकर पीड़ा उपस्थित होने पर मेरे माहात्म्य का श्रवण करना चाहिए। इससे सब ग्रह पीड़ाएँ शांत हो जाती हैं और मनुष्यों द्वारा देखा गया दुःस्वप्न शुभ स्वप्न में परिवर्तित हो जाता है।
बालग्रहों से आक्रांत हुए बालकों के लिए यह माहात्म्य शांतिकारक है तथा मनुष्यों के संगठन में फूट होने पर यह अच्छी प्रकार मित्रता कराने वाला है। यह माहात्म्य समस्त दुराचारियों के बल का नाश करने वाला है। इसके पाठ से राक्षशों, भूतों और पिशाचों का नाश हो जाता है। मेरा यह सब माहात्म्य मेरे समीप्य की प्राप्ति करने वाला है।
पशु, पुष्प, अघर्य, धुप, दीप, गन्ध अदि उत्तम सामग्रियों द्वारा पूजन करने से, ब्राह्मणो को भोजन कराने से, होम करने से, प्रतिदिन अभिषेक करने से, नानाप्रकार के भोगों का अर्पण करने से तथा दान देने से एक वर्ष तक जो मेरी आराधना की जाती है और उससे मुझे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी प्रसन्नता मेरे इस उत्तम चरित्र का एक बार श्रवण करने मात्र से ही हो जाती है। यह माहात्म्य श्रवण करने पर पापों को हर लेता है और आरोग्य प्रदान करता है।
मेरे प्रादुर्भाव का कीर्तन समस्त भूतों से रक्षा करता है तथा मेरा युद्धविषयक चरित्र दुष्ट दैत्यों का संहार करने वाला है। इसके श्रवण करने पर मनुष्यों को शत्रु का भय नहीं रहता। देवताओं ! तुमने और ब्रह्मर्षियों ने जो मेरी स्तुतियाँ की हैं तथा ब्रह्मा जी ने जो स्तुतियाँ की हैं, वे सभी कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं।
वन में, सूने मार्ग में अथवा दावानल से घिर जानेपर, निर्जन स्थान में, लुटेरों के दाव में पड़ जाने पर या शत्रुओं से पकड़े जाने पर अथवा जंगल में सिंह, व्याघ्र या जंगली हाथियों के पीछा करने पर, कुपित राजा के आदेश से वध या बंधन के स्थान में ले जाये जाने पर अथवा महासागरमें नाव पर बैठने के बाद भारी तूफ़ान से नाव डगमग होने पर और अत्यंत भयंकर युद्ध में शस्त्रों का प्रहार होने पर अथवा वेदना से पीड़ित होने पर कि बहुना, सभी भयानक बाधाओं के उपस्थित होने पर, जो मेरे इस चरित्र का स्मरण करता है, वह मनुष्य संकटों से मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभाव से सिंह अदि हिंसक जंतु नष्ट हो जाते हैं तथा लुटेरे और शत्रु भी मेरे चरित्र का स्मरण करने वाले पुरुष से दूर भागते हैं।
ऋषि कहते हैं --- यों कह कर प्रचंड पराक्रम वाली भगवती चंडिका सब देवताओं के देखते-देखते वहीं अन्तर्ध्यान हो गयीं। फिर समस्त देवता भी शत्रुओं के मारे जाने पर निर्भय हो पहले की ही भांति यज्ञभाग का उपभोग करते हुए अपने-अपने अधिकार का पालन करने लगे। संसार का विध्वंस करने वाले महाभयंकर अतुलपराक्रमी देवशत्रु शुम्भ तथा महाबली निशुम्भ के युद्ध में देवी के द्वारा मारे जाने पर शेष दैत्य पाताललोक में चले आये।
राजन! इस प्रकार भगवती अम्बिका देवी नित्य होती हुई भी पुनः-पुनः प्रकट हो कर जगत की रक्षा करती है। वे ही इस विश्व को मोहित करती हैं। वे ही जगत को जन्म देती तथा वे ही प्रार्थना करने पर संतुष्ट हो विज्ञानं एवं समृद्धि प्रदान करती हैं। राजन! महाप्रलय समय महामारी स्वरुप धारण करने वाली वे महाकाली ही इस समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। वे ही समय-समय पर महामारी होती हैं और वे ही स्वयं अजन्मा होती हुई भी सृष्टि के रूप में प्रकट होती है। वे सनातनी देवी ही समयानुसार सम्पूर्ण भूतों की रक्षा करती है। मनुष्यों के अभ्युदय के समय वे ही घर में लक्ष्मी के रूप में स्तिथ हो उन्नति प्रदान करती हैं और वे ही आभाव के समय दरिद्रता बनकर विनाश का कारण होती हैं। पुष्प, धुप और गंध अदि से पूजन करके उनकी स्तुति करने पर वे धन, पुत्र, धार्मिक बुद्धि तथा उत्तम गति प्रदान करती है।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'फल स्तुति ' नाम का बारहवां अध्याय पूरा हुआ ।।१२।।
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त्रयोदशो अध्याय --- सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान
त्रयोदशो अध्याय --- सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान
देवी ध्यान
जो उदयकाल सूर्यमण्डल की सी कांति करने वाली हैं, जिनकी चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं तथा जो अपने हाथों में पाश, अंकुश, वर एवं अभय की मुद्रा धारण किये रहती है, उन शिवा देवी का मैं ध्यान करती हूँ।ऋषि कहते हैं --- राजन! इस प्रकार मैंने तुमसे देवी के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया। वे ही इस जगत को धारण करने वाली हैं। देवी का ऐसा ही प्रभाव है। वे ही विद्या उत्पन्न करती हैं। उन देवी के द्वारा ही तुम, ये वैश्य तथा अन्य सभी विवेकी जन मोहित होते हैं, अभी भी हुए हैं और आगे भी ऐसे ही मोहित होंगे। महाराज! आप परमेश्वरि की शरण में जाओ। आराधना करने पर वे देवी ही मनुष्य को भोग, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं।
मार्कण्डेय जी कहते हैं --- क्रौष्टुकि जी! मेधामुनि के यह वचन सुन कर सुरथ ने उत्तम व्रत का पालन करने वाले उन महाभाग महर्षि को प्रणाम किया। वे अत्यंत ममता और राज्यापहरण से बहुत खिन्न हो चुके थे। महामुने ! इसलिए विरक्त हो कर वे राजा तथा वैश्य तत्काल तपस्या को चले गए। जगदम्बा के दर्शन के लिए वे नदी के तट पर रह कर तपस्या करने लगे। वे दोनों उत्तम देवी सूक्त का जप करते हुए, नदी के तट पर देवी की मिटटी की मूर्ति बना कर पुष्प, धूप, दीप और हवन आदि के द्वारा उनकी आराधना करने लगे। वे पहले कम आहार से फिर बिलकुल निराहार रहकर देवी में लगाए एकाग्रतापूर्वक उनका चिंतन आरम्भ किया। वे दोनों अपने शरीर के रक्त से प्रोक्षित बलि देते हुए लगातार तीन वर्ष तक संयम पूर्वक आराधना करते रहे।
देवी दर्शन --- इस पर प्रसन्न हो कर जगत को धारण करने वाली चंडिका देवी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा ---
देवी बोलीं --- राजन ! तथा अपने कुल को आनंदित करने वाले वैश्य ! तुम लोग जिस वास्तु की अभिलाष रखते हो, वह मुझसे माँगो। मैं संतुष्ट हूँ, अतः तुम्हे वह सब कुछ दूँगी।
मार्कण्डेय जी कहते हैं --- तब राजा ने देवी से दूसरे जन्म में नष्ट न होने वाला राज्य माँगा तथा इस जन्म में भी शत्रुओं की सेना को बलपूर्वक नष्ट करके पुनः अपना राज्य प्राप्त का वरदान माँगा। वैश्य का चित संसारकी और से खिन्न एवं विरक्त हो चुका था बड़े बुद्धिमान थे , अतः उस समय उन्होंने तो ममता और अहन्तारूप आसक्ति का नाश करने वाला ज्ञान माँगा।
देवी बोलीं ---राजन ! तुम थोड़े ही दिनों में शत्रुओं को मार कर अपना राज्य प्राप्त क्र लोगे। अब वहाँ तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा। फिर मृत्यु के पश्चात् तुम भगवान विवस्वान के अंश से जन्म लेकर पृथ्वी पर सावर्णिक मनु के नाम से विख्यात होओगे। वैश्यवर्य ! तुमने भी जिस वर को मुझसे प्राप्त करने की इच्छा की है, उसे देती हूँ ! तुम्हे मोक्ष के लिए ज्ञान प्राप्त होगा।
मार्कण्डेय जी कहते हैं ---इस प्रकार उन दोनों को मनोवाञ्छित वरदान देकर तथा उनके द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुति सुनकर देवी अम्बिका अंतर्ध्यान गयीं। इस तरह वरदान पा कर क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ सूर्य से जन्म ले कर सावर्णि नमक मनु होंगें।
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अंतर्गत देवी माहात्म्य में 'सुरथ और वैश्य को वरदान ' नाम का तेहरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।।१२।।
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ऋग्वेदोक्त देवीसूक्तम
ॐ अहमित्यष्टर्चस्य सूक्तस्य वागाम्भृणी ऋषिः , सच्चित्सौखात्मकः सर्वगतः परमात्मा देवता ,द्वितीयाया ॠचो जगती , शिष्टानां त्रिष्टुप् छन्दः, देवीमाहात्म्यपाठे विनियोगः।
ध्यानम्
ॐ सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्र्चतुर्भिर्भुजैः शङ्खं चक्रध्नुःशरांश्र्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता।आमुक्ताङ्गदहारकङकणरणत्काञ्चीरणन्नूपुरा दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला॥
जो सिंह की पीठ पर विराजमान हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा का मुकुट है, जो मरकतमणि के समान कान्तिवाली अपनी चार भुजाओं में शंख, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, तीन नेत्रों से सुशोभित होती हैं, जिनके भिन-भिन अंग बांधे हुए बाजूबंद, हार, कङ्कण, खनखनाती हुई करघनी और रुनझुन करते हुए नूपुरों से विभूषित है तथा जिनके कानों में रत्नजड़ित कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं, वे भगवती दुर्गा हमारी दुर्गति दूर करने वाली हों।
देवीसूक्तम्
ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्र्चराम्यहमादित्यैरुत विश्र्वदेवैः।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्र्विनोभा॥१॥
महर्षि अम्भृण की कन्या नाम वाक् था। वह बड़ी ब्रह्मज्ञानिनी थी। उसने देवी के साथ अभिन्नता प्राप्त कर ली थी। उसी के यह उदगार हैं)- मैं सच्चिदानन्दमयी सर्वात्मा देवी रूद्र, वसु, आदित्य तथा विश्वे देव गणों के रूप में विचरती हूँ। में ही मित्र और वरुण दोनों को, इन्द्रऔर अग्नि को तथा दोनों अश्विनीकुमारों को धारण करती हूँ।
अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्।
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते॥२॥
मैं ही शत्रुओं के नाशक आकाशचारी देवता सोम को, त्वष्टा प्रजापति को तथा पूषा और भाग को भी धारण करती हूँ। जो हविष्य से संपन्न हो देवताओं को उत्तम हविष्य की प्राप्ति करता है तथा उन्हें सोमरस के द्वारा तृप्त करता है, उस यजमान के लिए मैं ही उत्तम यज्ञ का फल और धन प्रदान करती हूँ।
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।
तां म देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्याय वेश यंतीम॥ ३॥
मैं सम्पूर्ण जगत की अधीश्वरी, अपने उपासकों को धन प्राप्त कराने वाली , करने योग्य परब्रह्म को अभिन्न रूप में जानने वाली, तथा पूजनीय देवताओं में प्रधान हूँ। मैं प्रपञ्च रूप से अनेक भावों में स्थित हूँ। सम्पूर्ण भूतों में मेरा प्रवेश है। अनेक स्थानों में रहने वाले देवता जहाँ -कहीं कुछ भी करते हैं, वः सब मेरे लिए करते हैं।
अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्।
अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि॥४॥
जो अन्न खाता है, वह मेरी शक्ति से ही खाता है (क्यूँकि में ही भोग शक्ति हूँ ) इसी प्रकार जो देखता है, जो सांस लेता है तथा जो कही हुई बात को सुनता है, वह मेरी ही सहायता से उक्त सब कर्म करने में समर्थ होता है। जो मुझे इस रूप में नहीं जानते, वे न जान ने के कारण ही दीन दशा को प्राप्त होते हैं। हे बहुश्रुत! मैं तुम्हे श्रद्धा से प्राप्त होने वाले ब्रह्मतत्व का उपदेश करती हूँ सुनो-
अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः।
यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्॥५॥
में स्वयं ही देवताओं और मनुष्यों द्वारा सेवित इस दुर्लभ तत्व का वर्णन करती हूँ। में जिस जिस पुरुष की रक्षा करना चाहती हूँ, उस उसको सबकी अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बना देती हूँ। उसीको सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, परोक्षज्ञान-सम्पन्न ऋषि तथा उत्तम मेधाशक्ति से युक्त बनती हूँ।
अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ ।
अहं जनाय समदं क्रिणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश ।।६।।
में ही ब्रह्मद्वेषी हिंसक असुरों का वध करने के लिए रूद्र के धनुष को चढ़ाती हूँ। में ही शरणागत जनों की रक्षा के लिए शत्रुओं से युद्ध करती हूँ तथा अन्तर्यामी रूप से पृथ्वी और आकाश के भीतर व्याप्त रहती हूँ।
अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ।तो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि ।।७।।मैंै ही इस जगत के पितरूप आकाश को सर्वाधिष्ठान स्वरूप परमात्मा के ऊपर उत्पन्न करती हूँ। समुद्र (सम्पूर्ण भूतों का उत्पत्तिस्थान परमात्मा ) में तथा जल (बुद्धि की व्यापक वृतियों ) में मेरे कारण (कारणस्वरूप चैतन्य ब्रह्म) की स्तिथि है, अतएव में समस्त भुवन में व्याप्त रहती हूँ तथा उस स्वर्गलोक का भी अपने शरीर से स्पर्श करती हूँ।हमेव वात इव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा ।
परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव ।।८।।
मैं कारणरूप से जब समस्त विश्व की रचना आरम्भ करती हूँ, तब दूसरों की प्रेरणा के बिना स्वयं ही वायु की भॉँति चलती हूँ, स्वेच्छा से ही कर्म में प्रवृत होती हूँ। मैं पृथ्वी और आकाश दोनों से परे हूँ। अपनी महिमा से ही मैं ऐसी हुई हूँ।
।। इति श्री ऋग्वेदोक्तं देवी सूक्तं संपूर्णम् ।।
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अथ तंत्रोक्तं देवीसूक्तमं
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥१ ॥
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरुपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥२॥
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिध्दयै कुर्मो नमो नमः।
नैऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥३ ॥
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यातै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥४ ॥
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥५ ॥
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥६ ॥
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥७ ॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥८ ॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥९ ॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१० ॥
या देवी सर्वभूतेषुष्छायारुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥११ ॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१२ ॥
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१३ ॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१४ ॥
या देवी सर्वभूतेषू जातिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥१५॥
या देवी सर्वभूतेषू लज्जारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥१६॥
या देवी सर्वभूतेषू शान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥१७॥
या देवी सर्वभूतेषू श्रद्धारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥१८॥
या देवी सर्वभूतेषू कान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥१९॥
या देवी सर्वभूतेषू लक्ष्मीरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥२०॥
या देवी सर्वभूतेषू वृत्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥२१॥
या देवी सर्वभूतेषू स्मृतिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥२२॥
या देवी सर्वभूतेषू दयारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥२३॥
या देवी सर्वभूतेषू तुष्टिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥२४॥
या देवी सर्वभूतेषू मातृरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥२५॥
या देवी सर्वभूतेषू भ्रान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमो नमः ॥२६॥
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्ति देव्यै नमो नमः ॥२७॥
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥२८॥
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥२९॥
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नःसर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥३०॥
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प्राधानिकं रहस्यं ----- वैकृतिकं रहस्यं ----- मूर्तिरहस्यं
यह तीनो रहस्य परम गोपनीय हैं तथा इनको किसी से कहने योग्य नहीं बताया गया है। अतः साधक स्वयं ही इन तीनो रहस्यों को श्री दुर्गा सप्तशती से प्राप्त करें तथा इनका पाठ करें और मनोवांछित फल को प्राप्त करें।
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अथ दुर्गाद्वात्रिंशत्रामाला
दुर्गा जी के यह 32 नाम दुर्लभ से भी दुर्लभ, रहस्यरूप एवं अत्यन्त गोपनीय है। तीनो लोकों में इसके समान कोई दूसरी स्तुति नहीं है। यह सब प्रकार की विपत्ति का नाश करने वाली है। कोई शत्रुओं से पीड़ित हो अथवा दुर्भेद्य बंधन में पड़ा हो, राजा के द्वारा किसी कठोर दंड को भुगतना पड़े, युद्ध में शत्रुओं द्वारा घिर जाये, अथवा वन में व्याघ्र आदि हिंसक जंतुओं के चंगुल में फास जाये, तो इन 32 नामो का 108 बार पाठ करने पर वह सम्पूर्ण भयो से मुक्त हो जाता है। विपत्ति के समय इस के समान कोई दूसरा उपाय नहीं है।
दुर्गा दुर्गार्ति शमनी दुर्गापद्विनिवारिणी।
दुर्गामच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी
दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला
दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी
दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता
दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी
दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी
दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी
दुर्गमाङ्गी दुर्गमाता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी
दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्लभा दुर्गधारिणी
नामावली ममायास्तु दुर्गया मम मानसः
पठेत् सर्व भयान्मुक्तो भविष्यति न संशयः।।
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क्षमा प्रार्थना
क्षमा प्रार्थना
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा:।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्।।
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा:।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्।।
माँ ! मैं न मन्त्र जानती हूँ, न यन्त्र, अहो ! मुझे स्तुति का भी ज्ञान नहीं है। न आवाहन का पता है, न ध्यान का। स्तोत्र और कथा की भी जानकारी नहीं है। न तो आपकी मुद्राएँ जानती हूँ और न मुझे व्याकुल हो कर विलाप करना ही आता है, परन्तु एक बात जानती हूँ - केवल आपका अनुसरण - आपके पीछे चलना। जो कि मेरे सब कलेशों को - समस्त दुःख-विपत्तियों को हर लेने वाला है।
परमेश्वरि ! मेरे द्वारा रात दिन सहस्रों अपराध होते रहते हैं। 'यह मेरी दास है'--- यों समझ कर मेरे उन अपराधों को तुम कृपापूर्वक क्षमा करो। हे भगवती ! में आपका आवाहन नहीं जानती, विसर्जन करना नहीं जानती, पूजा करने का विधिवध ढंग भी मुझको नहीं आता। हे त्रिपुरसुन्दरी ! क्षमा करो। हे देवी ! सुरेश्वरि ! मैंने जो सदा भक्ति भाव से आपका पूजन किया है- वह सब आपकी कृपा से पूर्ण हो। सैंकड़ों अपराध करने के बाद भी जो कोई आपकी शरण में जा 'जगदम्बा' कह कर पुकारता है - आप उस को अपनी शरण में लेती हो। उसे वह गति प्राप्त होती है जो ब्रहादि देवताओं के लिए भी सुलभ नहीं है। हे जगदम्बिके ! मैं अपराधों और पापों सहित आपकी शरण में आयी हूँ। इस समय दया की पात्र हूँ। आप जैसा चाहो करो।
सुरेश्वरि! आप गोपनीय से गोपनीय वस्तु की भी रक्षा करने वाली हैं। देवी ! आप से मेरी यह प्रार्थना है कि आप मेरी भी रक्षा करें। देवी ! अज्ञानता से, भूल से अथवा बुद्धि भ्रान्त होने के कारण मैंने यह ब्लॉग लिखते समय कोई न्यूनता या अधिकता कर दी हो, वह सब को क्षमा करो और प्रसन्न होओ। हे सच्चिदानन्दस्वरूपा परमेश्वरि ! हे जगन्माता कामेश्वरि ! आप प्रेमपूर्वक मेरी यह पूजा, यह लेख स्वीकार करो और मुझ पर प्रसन्न होओ। मेरे निवेदन किये हुए इस जप को ग्रहण करो। आपकी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो।
मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि इस लेख में लिखी हुई आपके पार्दुभाव की सुन्दर कथाएं जो भी पढ़े या किसी को सुनाये आप उस को उत्तम फल प्रदान करें तथा उस की मनोकामना पूर्ण करें।
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दुर्गा मानस पूजा
माता त्रिपुरसुन्दरी ! तुम भक्तजनो की मनोवाञ्छा पूर्ण करने वाली कल्पलता हो। यह पादुका आदरपूर्ण तुम्हारे श्री चरणों में समर्पित है, इसे ग्रहण करो। यह उत्तम चन्दन और कुमकुम से मिली हुई लाल जल की धारा से धोयी गयी है। भाँति - भाँति की बहुमूल्य मणियों तथा मूँगों से इसका निर्माण हुआ हैऔर बहुत से देवांगनाओँ ने अपने कर - कमलों द्वारा भक्तिपूर्वक इसे सब और से धो - पोंछ कर स्वच्छ बना दिया है ॥१ ॥ माँ ! देवताओं ने युम्हारे बैठने के लिए यह दिव्य सिंहासन ला कर रख दिया है। इसपर विराजो। अपनी कांति से दमकते हुए राशि - राशि सुवर्ण से इसका निर्माण किया गया है। यह अपनी मनोहर प्रभा से सदा प्रकाशमान रहता है। इसके सिवा यह चंपा और केतकी की सुगंध से पूर्ण अत्यंत निर्मल तेल और सुगंध युक्त उबटन है, जिसे दिव्य युवतियाँ आदरपूर्वक तुम्हारी सेवा में प्रस्तुत कर रहीं हैं, कृपया इसे स्वीकार करो ॥ 2॥
देवी ! इसके पश्चात यह विशुद्ध आंवले का फल ग्रहण करो। शिवप्रिये। त्रिपुरसुन्दरी ! इस आँवले में प्राय जितने भी सुघंधित पदार्थ हैं, वे सभी डाले गए हैं, इससे यह परम् सुगंधित हो गया है। अतः इसको लगा क्र बालों को कंघी से झाड़ लो और गंगा जी की पवित्र धरा में स्नान करो। तदनन्तर यह दिव्य गंध तुम्हारी सेवा में प्रस्तुत है, ये तुम्हारे आनंद की वृद्धि करने वाला हो ॥3॥
संपत्ति प्रदान करने वाली वरदायिनी त्रिपुरसुन्दरी ! यह सरस शुद्ध कस्तूरी ग्रहण करो। इसे स्वयं देवराज इंद्र की पत्नी महारानी शची अपने कर - कमलों में लेकर सेवा में खड़ी है। इसमें चन्दन, कुमकुम तथा अगुरुका मेल होने से इसकी और भी शोभा बढ़ गयी है। इससे बहुत अधिक गंध निकलने के कारण यह बड़ी मनोहर प्रतीत होती है ॥4॥
तुम्हारे दोनों कानो में सोने के बने हुए कुण्डल झिलमिलाते रहें, कर - कमल की एक ऊँगली में अँगूठी शोभा पावे,कटिभाग में नितम्बों पर करघनी सुहाए, दोनों चरणों में मंजीर मुखरित होता रहे, वक्ष स्थल में हार सुशोभित हो और दोनों कलाइयों में कंगन खनखनाते रहें। तुम्हारे मस्तक पर रखा हुआ दिव्य मुकुट प्रतिदिन आनंद प्रदान करें। यह सब आभूषण प्रशंसा के योग्य हैं॥5॥
धन देने वाली शिवप्रिया पार्वती ! तुम गले में बहुत ही चमकीली सुन्दर हँसली पहन लो, ललाट के मध्य भाग में सौंदर्य की मुद्रा धारण करने वाले सिंदूर की बिंदी लगाओ तथा अत्यंत सुन्दर पद्मःपत्र की शोभा को तिरस्कृत करने वाले नेत्रों में यह काजल भी लगा लो। यह काजल दिव्य औषधियों से तैयार किया गया है ॥6॥
पापों का नाश करने वाली संपत्ति दायिनी त्रिपुरसुन्दरि ! अपने मुख की शोभा निहारने के लिए यह दर्पण ग्रहण करो। इसे साक्षात रति रानी अपने कर - कमलों में लेकर सेवा में उपस्थित है। इस दर्पण के चारों और मूंगे जड़े हैं। प्रचंड वेग से घूमने वाले मंदराचल की मथानी से जब क्षीर समुन्द्र मथा गया, उस समय यह दर्पण उसी से प्रकट हुआ था। यह चन्द्रमा की किरणों के समान उज्जवल हैं ॥7॥
भगवन शंकर की धरम पत्नी पार्वती देवी ! देवांगनाओं के मस्तक पर रखे बहुमूल्य रत्नमय कलशों द्वारा शीघ्रता पूर्वक दिया जाने वाला यह निर्मल जल ग्रहण करो। इसे चंपा और गुलाल अदि सुघंधित द्रव्यों से सुवासित किया गया है तथा यह कस्तूरी रस, चन्दन , अगुरु, और सुधा की धरा से आप्लावित हैं ॥8॥
मैं कहार, उतपल, नागकेसर, कमल, मालती, मल्लिका, कुमुद, केतकी और लाल कनेर आदि फूलों से, सुगन्धित पुष्पमालाओं से तथा नाना प्रकार के रसों की धरा से लाल कमल के भीतर निवास करने वाली श्री चंडिका देवी की पूजा करती हूँ ॥9॥
श्री चंडिका देवी ! देव वधुओं के द्वारा तैयार किया हुआ यह दिव्य धूप तुम्हारी प्रसन्नता बढ़ाने वाला हो। यह धूप रत्नमय पात्र में, जो सुगंधचन्दन का निवासस्थान है, रखा हुआ है, यह तुम्हे संतोष प्रदान करे। इसमें जटामासी, गुग्गुल, चन्दन, अगुरु - चूर्ण, कपूर, शिलाजीत, मधु, कुमकुम, तथा घी मिला कर उत्तम रीती से बनाया गया है ॥10॥
देवी त्रिपुरसुंदरी ! तुम्हारी प्रसन्नता के लिए यहां पर दीप प्रकाशित हो रहा है। यह घी से जलता है। इसकी दियट में सुन्दर रत्न का डंडा है , इसे देवांगनाओं ने बनाया है। यह दीपक सुवर्ण के पात्र में जलाया गया है। इसमें कपूर के साथ बत्ती राखी है। यह दीपक भरी से भी भरी अन्धकार का नाश करने वाला है ॥11॥
श्रीचण्डिका देवी ! देववधुओं ने तुम्हारी प्रसन्नता के लिए यह दिव्य नैवेद्य तैयार किया है, इसमें अगहनी के चावल का स्वच्छ भात है, जो बहुत ही रुचिकर और चमेली की सुगंध से वसित है। साथ ही हींग, मिर्ची, और जीरा आदि सुगंधित द्रव्यों से छोंक - बघारकर बनाये हुए नाना प्रकार के व्यंजन भी हैं , इसमें भाँति - भाँति के पकवान, खीर, मधु, दही, और घी का भी मेल है ॥12 ॥
माँ ! सुन्दर रत्नमय पात्र में सजाकर रखा हुआ यह दिव्य ताम्बूल अपने मुख में ग्रहण करो। लवंग की कली चुभो कर इसमें बीड़े लगाए गये हैं, अतः बहुत सुन्दर जान पड़ते हैं, इसमें बहुत से पान के पत्तों का उपयोग किया गया है। इन सब बीड़ो में कोमल जावित्री, कपूर और सुपारी पड़े हैं। यह ताम्बूल सुधा के माधुर्य से परिपूर्ण है ॥13॥
महात्रिपुरसुन्दरी माता पार्वती ! तुम्हारे सामने यह विशाल एवं दिव्य छत्र प्रकट हुआ है। इसे ग्रहण करो। यह शरत्काल के चन्द्रमा की भांति चटकीली चांदनी के समान सुन्दर है। इसमें लगे हुए सुंदर मोतियों की झालर ऐसे जान पड़ती है मनो देवनदी गंगा का स्तोत्र ऊपर से नीचे गिर रहा हो। यह छत्र सुवर्णमय दण्ड के कारण बहुत शोभा पा रहा है॥14॥
माँ! सुंदर स्त्रियों के हाथों निरंतर डुलाया वाला यह स्वेत चँवर, जो चन्द्र्मा ओर ,कुंद के समान उज्जवल तथा पसीने के कष्ट को दूर करने वाला है, तुम्हारे हर्ष को बढ़ावे। इसके शिव महर्षि अगस्त्य, वशिष्ठ, नारद, शुक, व्यास, आदि तथा बाल्मीकि अपने-अपने चित में जो वेद मन्त्रों का उच्चारण का विचार करते हैं, उनकी वः मन-संकल्पित वेदध्वनि तुम्हारे आनंद की वृद्धि करे॥15॥
स्वर्ग के आँगन में वेणु, मृदङ्ग , शँख तथा भेरी की मधुर ध्वनि के साथ जो संगीत होता है तथा जिसमें अनेक प्रकार के कोलाहल का शब्द व्याप्त रहता है, वह विद्या धरी द्वारा प्रदर्शित नित्य-कला तुम्हारे सुख की वृद्धि करे ॥16॥
देवी! तुम्हारे भक्तिरस से भवित इस पधमय स्तोत्र में यदि कहीं से भी कुछ भक्ति का लेश मिले तो उसी से ही प्रसन्न हो जाओ। माँ ! तुम्हारी भक्ति के लिए चित में जो आकुलता होती है, वही एकमात्र जीवन का फल है, वह कोटि-कोटि जन्म धारण करने पर भी संसार में तुम्हारी कृपा के बिना सुलभ नहीं होती ॥17॥
इन उपचारकल्पित सोलह पदों से जो परा देवता भगवती का स्तवन करता है, वह उन उपचारों के समर्पण का फल प्राप्त करता है॥18॥
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मात मेरी पींघाँ ज़्हूटे भजन
एक मुलाकात लेखिका से -
ॐ नमश्चण्डिकायेै।।
ॐ नमश्चण्डिकायेै।।
मेरी आध्यात्मिक यात्रा का यह एक बहुत सुंदर पहलू है कि भगवती देवी ने मुझको अपनी महिमा लिखने का और अपने प्रदुर्भाव की सुंदर कथाओं का वर्णन करने का तथा अपनी वीरता का चरित्रण इस ब्लॉग के माध्यम से करने की बुद्धि एवं अनुमति प्रदान की। अवश्य ही मेरे कुछ पुण्य कर्म जागृत हुए होंगे जो यह सौभाग्य मुझको मिला। यह ब्लॉग लिखते समय मुझे अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हुआ। यह ब्लॉग माँ दुर्गा के चरणों में बैठ कर माँ के आशीर्वाद से ही लिखा गया है वार्ना माँ की आज्ञा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। यह ब्लॉग चैत्र नवरात्री 2020 में लिखना प्रारंभ किया गया तथा इसको लिखने में देवी से भक्ति भाव की ही प्रबलता अधिक है।
दुर्गा सप्तशती की सबसे पहली दीक्षा मुझको मेरी माँ 'फूलां राणी' जी से बचपन में मिली जो की दुर्गा देवी उपासक थीं। मैंने सिर्फ भक्ति भाव से, कोई विधि न जानते हुए भी साधना जारी रखी जिसके परिणाम स्वरूप कुछ वर्षों बाद जब मेरे मन में मेरे गुरु से मिलने की अति तीव्र इच्छा हुई तो मुझे कुछ ही समय में मेरे बाबा अवधूत बाबा शिवानंद जी का सानिध्य प्राप्त हुआ और ऐसा लगा जैसे आत्मा की तलाश ख़त्म हुई और अब मंजिल मिल गयी। बाबा जी एक सिद्ध गुरु हैं तथा श्री विद्या साधना की दीक्षा देने वाले एकमात्र जागृत और सिद्ध गुरु हैं। 2012 में अवधूत बाबा शिवानंद जी से प्रथम दीक्षा 'श्री विद्या' की तथा 'दुर्गा सप्तशती' की अनमोल दीक्षाऐ मिली जिससे जीवन सार्थक हुआ। फिर बाबा जी से 'शाम्भवी' , 'महामृत्युंजय', 'कॉस्मिक स्पिरिचुअल हीलिंग ' , 'प्राण क्रियाएँ ', 'सूक्षम क्रियाएँ ' , 'नव आवरण पूजन ' की तथा अनेक अन्य दीक्षाए मिली जिससे अनेक आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुई तथा कठिन दुर्गा साधना करना अत्यंत सरल हो गया। मैं बाबा जी का ह्दय से धन्यवाद करना चाहती हूँ जिनकी कृपा से मैं आध्यात्म के मार्ग पर आगे बढ़ पायी। यह ब्लॉग लिखने में लगभग तीन महीने का समय लगा, यह भी भगवती की ही माया थी, परन्तु इसको लिखते लिखते जीवन की अनेक कठिन पहेलियाँ अपने आप स्वयं ही माँ की कृपा से सुलझने लगी। यह अनुभव बेहद ख़ास अनुभव रहा जो कि मुझको माँ की महिमा तथा माँ की सुन्दर कथाएँ लिखते लिखते हुआ। मैं भगवती से यह प्राथना करती हूँ कि वे मेरे ऊपर सदा ऐसे ही अपनी दया द्रिष्टि बनाये रखें तथा सदा ही मुझे अपने चरणों में स्थान दें। हे माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी ! हे देवी ! मैं आपसे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करती हूँ कि इस समय संसार में जो महामारी का संकट छाया हुआ है, आपकी कृपा से वो शांत हो, प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप शांत हो जाए तथा आप भारत देश के शत्रुओं का भी नाश करें और जो कोई भी मेरे इस ब्लॉग से प्रेरित हो कर माँ दुर्गा जी की साधना अपने जीवन में आरंभ करे उसकी साधना को आप अति शीघ्र स्वीकार कर उन्हे सुख प्रदान करें तथा उनकी सभी मनोकामनायें पूर्ण करें।














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