निद्रा या नींद

निद्रा या नींद (Sleep)

*कै सोवे राजा का पूत, कै सोवे योगी अवधूत।*
अर्थ –या तो राजा का पुत्र निश्चिन्त हो के सो सकता है (क्योंकि वह सब प्रकार से सुरक्षित होता है) या फिर योगी सन्यासी (क्योंकि उसे कोई सांसारिक चिंता नहीं होती)।

नींद, शरीर की बहुत ही महत्वपूर्ण अवस्था है, जिसमें मनुष्य ही नहीं सभी जीव अपने शरीर को पुनः चलाने के लिए ऊर्जा प्राप्त करते हैं। आइए आज हम उसी के बारे में जानने का प्रयास करते हैं।

हमने इस लेख में प्रयास किया है कि इसमें नींद से संबंधित सभी जानकारियों को आपके सामने रखें ताकि आप नींद से जुड़ी समस्याओं और जानकारियों का लाभ उठा सकें। 

जिस प्रकार हमें शारीरिक क्रियाओं अर्थात जैविक क्रियाओं के चलाने के लिए भोजन अर्थात आहार की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार शरीर को चलाने के लिए हमें नींद की भी आवश्यकता होती है, इसलिए हमें नींद की अहमियत को अच्छे से जान लेना चाहिए।

नींद क्या है?

नींद हर 24 घंटे में नियमित रुप से आने वाली वह शारीरिक अवस्था है जिसमें हम अचेतन अवस्था मे होते है। और आस पास के क्रियाकलापों से हमारा संबंध पूर्णतया टूट जाता है।


उम्र के अनुसार हर व्यक्ति को कितनी नींद चाहिए जानी इस सारणी के द्वारा। 

उम्र और स्थिति       प्रति दिन औसत नींद

0–3 महीने           14–19 घंटे

3–12 महीने         14–18 घंटे

1–3 वर्ष              11–15 घंटे

3–6 वर्ष             10–14 घंटे

6–14 वर्ष            9–12 घंटे

14–18 वर्ष         8 –11 घंटे

18–25 वर्ष         7–9 घंटे

25–60 वर्ष          6 –8 घंटे

60वर्ष सेअधिक     14–18 घंटे

अर्थात

नवजात 18 घंटे तक

किशोरावस्था 9–10 घंटे

वयस्क व बुजुर्ग  7–8(+) घंटे

गर्भवती महिलाएं 8 (+) घंटे

नींद हमेशा जरूरत के हिसाब से लेनी चाहिए लेकिन यह भी मुमकिन है कि कोई व्यक्ति 5 घंटे की गहरी नींद में अपनी जरूरत की नींद पूरी कर ले और वहीं दूसरा व्यक्ति 7– 8 घंटे सोने के बावजूद भी अपनी नींद पूरी न कर सके। फिर भी हमें उम्र के अनुसार औसतन नींद अवश्य लेनी का प्रयास करना चाहिए ताकि हमारा शरीर स्वस्थ बना रहे।

क्यों जरूरी है पूरी नींद लेना ? –

वर्तमान में हमारा सरोकार मोबाइल से पड़ता है और हम उसी मोबाइल की बैटरी को उदाहरण लेकर आप को समझाने का प्रयास करते हैं इवनिंग कितनी जरूरी है?

मान लीजिए कि एक मोबाइल आपने पूरा चार्ज किया तो वह जब तक पूरा चार्ज है आपका अच्छी तरीके से साथ देगा । लेकिन जैसे उसकी चार्जिंग खत्म हो जाएगी या कम होती तो हमें मोबाइल फोन का की बैटरी को पुनः चार्ज करना होगा। 

यही स्थिति हमारे शरीर की भी है और नींद शरीर की चार्जिंग है जो उसे रिचार्ज कर देती है। 

रिचार्जिंग कम होने पर जैसे मोबाइल ठीक से काम नहीं करता उसी प्रकार से हमारे शरीर भी ठीक से काम नहीं कर सकता। और धीरे-धीरे हमारा शरीर रोगों का घर बनने लगता है।

कम नींद लेने की वजह से लोगों में निम्नलिखित लक्षण उभर आते हैं जैसे * ध्यान में कमी, *अनिद्रा, * चिड़चिड़ापन , * याददाश्त में कमी, *  बेचैनी, *  हारमौनल गड़बड़ियां, *  महिलाओं में माहवारी से संबंधित परेशानियां, *  शुगर बीपी आदि बीमारियों का बढ़ने का खतरा यदि पहले से यह बीमारियां हैं तो इन्हें रोक पाने का खतरा, *  और इससे सबसे बड़ी जो हानि होती है वह है रिश्तो का टूटना।

नींद न आने के कारण

नींद ना आने के अनेक कारण हो सकते हैं? ज्यादातर हमारा खानपान और दिनचर्या में बदलाव मुख्य है, जिसमें मोबाइल, लैपटॉप, देर तक टीवी देखना और देर तक जागना, डिप्रेशन, तनाव, शरीर का कमजोर होना, विटामिन डी की कमी, विटामिन बी12 की कमी, सही और तय समय पर खाना नहीं खाना, अल्कोहल लेना, स्मोकिंग करना, जंग फूड खाना, खर्राटे लेना, बेड की क्वालिटी अच्छी नहीं होना, मोटे ताकि का उपयोग करना, स्लिप एप्नीया (सोते वक्त सांस लेने में रुकावट) जैसी समस्याएं नींद में खलल पैदा करती हैं और नींद में आने का कारण बनती हैं।

यदि हम उपरोक्त स्थितियों को समझें और इन पर गंभीरता से विचार करें तो हम नींद में पड़ने वाली खलल अर्थात अनिद्रा से बच सकते हैं और अपने आप को स्वस्थ रख सकते हैं।

आइए अब हम नींद के बारे में जानने का प्रयास करते हैं हम आपको बता दें कि नींद के दो प्रमुख हिस्से होते है-

1) मन्द चक्षुगति निद्रा (Non Rapid Eye Movement Sleep -non REM)

मन्द चक्षुगति निद्रा जैसा की नाम से ही विदित होता है कि इसमें चक्षु अर्थात नेत्रों की गति मन्द होती है इसीलिए तीव्र गति चक्षुनिद्रा कहां गया है। इसमे मस्तिष्क शान्त रहता  है लेकिन हमारा शरीर चल फ़िर सकता है। रक्त में कुछ हार्मोन्स (Hormones) बनते है जिससे हमारा शरीर दिन भर की टूट फूट की मरम्मत करता है। 

इस अवस्था के चार भाग होते है।

 

  1. पूर्व निद्रा  - मांसपेंशियाँ ढीली हो जाती है, ह्र्दय गति धीमी हो जाती है और शरीर का तापमान कम हो जाता है|
  2. हल्की निद्रा - इस समय तक आपको बिना किसी परेशानी के आसानी से जगाया जा सकता है|
  3. मन्द तरंग निद्रा - हमारे खून का दौरा कम हो जाता है|हम इस अवस्था मे निद्रा में बोलने या चलने की क्रियायें हो सकती है|
  4. अति मन्द तरंग निद्रा - इस समय आपको जगाना बहुत कठिन होता है और यदि कोई आपको जगा दे तो आप बहुत अजीब सा महसूस करते है|

2) तीव्र चक्षुगति निद्रा (Rapid Eye Movement Sleep - REM) 

तीव्र चक्षुगति निद्रा जैसा की नाम से ही विदित होता है कि इसमें चक्षु अर्थात नेत्रों की गति तीव्र होती है इसीलिए तीव्र चक्षुगति निद्रा कहां गया है। इस दौरान दिमाग बहुत सक्रिय होता है। आँखें तेजी से हरकत करती है। लेकिन हमारी मांसपेंशियाँ बहुत ढीली रहती है। इस अवस्था में अक्सर हम सपने देखते है। ये अवस्था नींद का लगभग पांचवा हिस्सा बनाती है। 

 





सामान्यतः आपको नींद के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं होती| ये आपकी दिनचर्या का एक हिस्सा है| लेकिन ज्यादातर लोग कभी न कभी नींद आने मे परेशानी का सामना करते है| आप लोगो ने एक शब्द सुना होगा - अनिद्रा (Insomnia), अगर आप बहुत चिन्तित हों या बहुत उत्तेजित हों तो थोड़े समय के लिए आप इसके शिकार हो सकते हो और जब आपकी उत्तेजना या चिन्ता खत्म हो जाती है तो सब सामान्य हो जाता है| अगर आपको अच्छी नींद  नही आती है तो ये एक समस्या है क्योंकि नींद आपके शरीर और दिमाग को स्वस्थ एवं चुस्त रखती है|


 

पूरी रात मे आप लगभग 5 बार  REM एवं non REM निद्रा के बीच आते जाते है और सुबह के समय ज्यादा सपने देखते है| एक सामान्य रात में आप लगभग हर दो घंटे पर 1-2 मिनट के लिये जगते हैं| आप सामान्यतः इस जगने के बारे में नहीं जान पाते| लेकिन आप इतना याद रख सकते हैं कि आपको घबराहट हो रही थी या बाहर कुछ हो रहा था जैसे शोर या आपका साथी खर्राटे ले रहा था।

 

हमें कितनी नींद की आवश्यकता होती है ?

यह उम्र पर निर्भर है|

1- बच्चे -17 घन्टे

2- किशोर - 9 से 10 घन्टे 

3- व्यस्क - 8 घन्टे

4- वृद्ध - व्यस्क के समान, लेकिन गहरी नींद केवल एक बार ही आती है, सामान्यतः शुरुआती 3-4 घन्टे- उसके बाद वे आसानी से जाग जाते हैं तथा वे स्वप्न भी कम देखते हैं| रात में जागने का थोड़ा समय भी उनको वास्तविकता से ज्यादा लम्बा लगता है। उनको लगता है कि वे उतना नहीं सोये हैं जितना कि वे वास्तव में सोये थे|

समान उम्र के लोगों के बीच मे भी अन्तर पाया जाता है| अधिकांश लोग 8 घन्टे सोते हैं जबकि कुछ लोगों के लिये 3 घन्टे की नींद ही पर्याप्त होती है|

 

क्या होगा अगर मै न सोऊँ ?

जब आपको नींद नहीं आती है तो आपको चिन्ता होती है। अगर आप एकाध रात न सोएं तो अगले दिन आप थका हुआ मह्सूस करते हैं लेकिन इससे आपके मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुँचता| लेकिन, अगर आप कई रातों तक ना सो पाये तो

  • आप हर समय थकान मह्सूस करेंगें
  • दिन भर झपकी लेंते रहेंगें
  • ध्यान नही लगा पायेंगे
  • निर्णय लेने में दिक्कत होगी
  • उदासी मह्सूस होगी

आप अगर वाहन चलाते हैं या मशीनों पर काम करते हैं तो यह खतरनाक हो सकता है| हर साल कई लोगों की म्रृत्यु इसलिये हो जाती है क्योंकि वे वाहन चलाते समय सो जाते हैं|

अनिद्रा से उच्च रक्तचाप, मधुमेह और मोटापा जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं|

 

व्यस्कों में निद्रा सम्बन्धी समस्याएँ :

कभी कभी आप महसूस करते हैं कि आपने पूरी नींद नहीं ली है या पर्याप्त समय सोने के बाद भी आपको ताजगी महसूस नहीं होती| 

ठीक तरह से न सो पाने के कई कारण रोजमर्रा की जिंदगी से ज़ुडे होते हैं -

  • शयनकक्ष मै बहुत शोर हो या बहुत ठंडा या बहुत गर्म हो |
  • बिस्तर  छोटा  हो या आरामदायक ना हो |
  • आपकी सोने की कोई नियमित दिनचर्या न हो | 
  • आपके साथी का सोने का समय या तरीका आपसे अलग हो |
  • आपको पर्याप्त थकान न होती हो या आप पर्याप्त परिश्रम न करते हो |
  • आप बहुत देर में खाना खाते हो |  
  • आप भूखे पेट ही सोने के लिए चले जाते हों |
  • सोने से पूर्व चाय, काफी (जिनमे कैफीन नामक रसायन होता है), सिगरेट या शराब का सेवन करते हों।
  • आपको कोई रोग, दर्द या बुखार हो |

 

अनिद्रा के कुछ और गम्भीर कारण भी सकते है| जैसे  

  • भावनात्मक समस्यायें  
  • रोजगार सम्बन्धित परेशानियां 
  • उलझन और चिन्ता
  • उदासी की बीमारी - आप सुबह बहुत जल्दी उठ जाते है और फिर से सोने मे दिक्कत होती है 
  • बार -बार समस्याओं के बारे मे सोचना 

 

अपनी मदद स्वंय करना

यहाँ कुछ आसान तरीके दिये गये है जो आपके लिए उपयुक्त हो सकते है

 

क्या करना चाहिए ?

  • बिस्तर एवं शयन कक्ष आरामदायक हो, बहुत ठंडा या गरम न हो |
  • इस बात का ध्यान रखे कि आपका गद्दा आपके लिए उपयुक्त हो | अगर वो बहुत सख्त होगा तो आप के कन्धो व कमर पर ज्यादा दबाव पडेगा| अगर बहुत ज्यादा मुलायम हो तो आपका शरीर नीचे चला जाता है जो कि आपकी पीठ के लिये नुक़सानदायक है| इस स्थिति में आपको अपना गद्दा बदल देना चाहिये ताकि आप को आराम मिले|
  • थोड़ा बहुत व्यायाम करें, लेकिन आवश्यकता से अधिक न करें। बस नियमित रूप से थोड़ी तैराकी या टहलना ठीक रहता है| दिन के समय व्यायाम करना ज्यादा अच्छा रहता है विशेषकर दोपहर के बाद या पूर्व सन्ध्या के समय| इसके बाद व्यायाम करने से आपकी नींद में दिक्कत हो सकती है|
  • सोने जाने से पूर्व थोड़ा रिलैक्स करें|
  • यदि कोई चीज़ आपको परेशान कर रही है और आप उसके बारे में सही तरीके से नहीं सोच पा रहे हों तो अपनी समस्या को सोने से पहले कागज़ पर लिख लें और स्वंय से कहें कि कल आप इस समस्या से निपटेगे|
  • अगर आप सो नहीं पाते हैं तो उठ जाएं और कुछ ऐसा करें जिससे आपको हल्का महसूस हो| जैसे – पढ़ना, टीवी देखना या हल्का संगीत सुनना और जब आप थकान महसूस करें तो फ़िर से सोने जायें|

 

क्या ना करें?

  • बहुत लम्बे समय तक न जागें| तभी सोने जायें जब आप थके हों| हर दिन का एक नियमित दिनचर्या बना लें| निश्चित समय पर उठें चाहे आप थका हुआ महसूस कर रहे हो या नहीं|
  • चाय या काफ़ी पीने के बाद कैफ़ीन काफ़ी देर तक शरीर में अपना प्रभाव बनाये रखती है, इसलिये दोपहर के बाद से इसका सेवन ना करें| यदि आप किसी गर्म पेय का सेवन करना चाह्ते हैं तो दूध या हर्बल पेय जिसमें कैफ़ीन न हो, का सेवन कर सकते हैं|
  • बहुत ज्यादा शराब का सेवन न करें| ये आपको जल्दी सोने में मदद तो कर सकती है लेकिन आप रात में अवश्य जागेंगे।
  • रात को बहुत लेट ज्यादा खानपान न करें| शाम को अपना भोजन लेने की कोशिश करें|
  • अगर आप एक रात नहीं सोये हों तो अगले दिन में न सोये अन्यथा अगली रात भी आप नहीं सो पायेंगे|
  • मोटापा घटाने वाली दवाओ का प्रयोग ना करे क्योंकि ये आपकी नींद में बाधा पहुँचाती हैं |
  • नशे की गोलियां जैसे - हेरोइन, कोकेन, एम्फ़िटामीन का प्रयोग न करें क्योंकि ये कैफ़ीन की तरह ही आपकी नीद में बाधा पहुँचाती हैं|

अगर उपरोक्त उपाय करने के बाद भी आप नहीं सो पा रहे हैं तो चिकित्सक से परामर्श लें| आप अपने डाक्टर से अपनी हर समस्या के बारे में परामर्श ले सकते हैं| आपके डाक्टर आपको बता सकते हैं कि आपकी अनिद्रा का कारण कोई शारीरिक बीमारी है, कोई दवा है जो आप खा रहे हैं, या कोई भावात्मक समस्या है| इस बात के प्रमाण है कि "काग्नीटिव बिहैवियर थिरैपी" (CBT) आपकी अनिद्रा की समस्या का समाधान कर सकती है|

 

मनोचिकित्सा:

काग्नीटिव थिरैपी आपकी उस गलत सोच को बदलती हो जिसके कारण आप चिन्तित होते हों और आपको सोने में दिक्कत हो रही है। 

स्टिम्यूलस कन्ट्रोल (Stimulus Control) आपकी मदद करता है-

  • इस बात का ध्यान रखें कि जब आप बिस्तर पर हों - आप तभी सोने जाएँ जब आप थका मह्सूस करें और अपने बिस्तर का उपयोग केवल सोने और सेक्स के लिये ही करें।
  • बिस्तर पर ऐसे कार्य न करें जो आपको सोने न दें जैसे टीवी पर उत्तेजक कार्यकम देखना, कार्य करना या चीजें ठीक करना।
  • बिस्तर पर लेटे हुए चिन्ता न करें बल्कि बिस्तर से उठ जायें और कुछ हल्का फ़ुल्का कार्य करें।

प्रोग्रेसिव मसल रिलैक्सिशन (Progressive Muscle Relaxation): आपकी मांसपेशियां को आराम देने में सहायक होता है। एक एक करके आप अपनी मांसपेशियों में तनाव लाते हैं, फ़िर ढीला करते हैं- ऐसा आप नीचे से ऊपर की ओर करते हैं अर्थात सर्वप्रथम पैर फ़िर हाथ फ़िर कन्धे, फ़िर चेहरा व गर्दन्।

 

क्या दवाईयाँ मदद कर सकती हैं ?

लोग सालों से नींद की गोलियां का इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन अब हम जानते हैं कि वे

  • बहुत लम्बे समय तक काम नहीं करती हैं।  
  • आपको अगले दिन थका हुआ और चिड़चिड़ा बनाती है।
  • बहुत जल्दी अपना असर खो देती हैं जिससे आपको बाद में समान असर के लिये ज्यादा दवा लेनी पड़ती है।
  • आपको नशे की आदत लगा देती है। जितने ज्यादा समय तक आप ये गोलियां लेते हैं आप उन पर उतने ज्यादा निर्भर हो जाते हैं।

 

कुछ नई दवाइयाँ आई हैं लेकिन इनमें भी पुरानी दवाइयों के नुकसान हैं।

 

नींद की गोलियां केवल बहुत थोड़े समय के लिये लेनी चाहिये (2 हफ़्ते से कम समय के लिये) जब आप इतने परेशान हों कि सो ही न पाये।

अगर आपको लम्बे समय तक नींद की दवाइयाँ लेनी हो तो अपने डाक्टर से सलाह लेने के बाद उनकी मात्रा धीरे धीरे कम कीजिये।

कभी कभी उदासी खत्म करने की दवाओं का प्रयोग बेहतर रहता है |

 

ओवर द काउन्टर मेडिकेशन (Over the Counter Medication) :

आप अपने दवा विक्रेता से कुछ नींद की गोलियां बिना किसी डाक्टर के पर्चे के ले सकती हैं। ऐसी दवाइयों में ज्यादातर एन्टी हिस्टामीनिक होते हैं जो कि फ़ीवर, सर्दी जुकाम में दिये जाते हैं। ये कार्य करती हैं लेकिन आपको अगली सुबह भी हल्की नींद में रखती हैं। अगर आप इन दवाइयों को लेते हैं तो अगली सुबह गाडी न चलाये और मशीनो के साथ काम न करें । इन दवाइओ को लगातार इस्तेमाल करने से आपके शरीर को इनकी आदत पड़ सकती है। इसलिये बेहतर है कि आप ऐसी दवाइयों को लम्बे समय तक न लें।

हर्बल दवाइयाँ ज्यादातर वैलेरिन नामक हर्ब पर आधारित होती है| ये तब ज्यादा असर करती है कि जब आप 2-3 सप्ताह या ज्यादा समय तक हर रात इन्हें ले| अगर आप इन्हें कभी कभी लेते है तो ये कार्य नही करती| जैसा कि एन्टी हिस्टामीनिक के साथ होता है वैसे ही इन दवाइयों को लेने पर आपको अगली सुबह सावधान रहना चाहिये | अगर आप अपने रक्तचाप के लिए कोई दवा लेते है(या कोई और नींद की गोली ) तो आपको डाक्टर की सलाह लेनी चाहिए |

आपको कभी कभी रात में काम करना पड़ सकता है जब सामान्यतः आप सोते है |अगर ऐसा कभी कभी होता है तो आप आसानी से समायोजन कर लेते है। लेकिन अगर आपके साथ लगातार ऐसा होता रहे तो आपको परेशानी होती है। शिफ़्ट में कार्य करने वाले कर्मचारी (shift workers),चिकित्सक एव नर्स जिन्हे सारी रात काम करना पड़ता है या स्तन पान कराने वाली माँ ,इन सबको ये दिक्कत होती है कि इनको तब सोना पड़ता है जब सामान्यतः ये जगते है|ये "जेट लैग" की तरह होता है जिसमें अलग अलग समय मे तीव्र गति से यात्रा करने के कारण आप उस समय जागते हैं जब बाकी सब सोते हैं |

सामान्य होने का अच्छा तरीका यह है कि आप रात मे चाहे जब सोये हो सुबह निशिचत समय पर उठे| इसके लिए आप अलार्म घड़ी का उपयोग कर सकते है |इस बात का ध्यान रखे कि अगली रात आप 10 बजे से पहले न सोये |अगर आप ऐसा कुछ रातो तक करेगे तो जल्द ही आप रात मे सही समय पर सोने लगेगे|


बहुत ज्यादा सोना (अतिनिन्द्रा)- Hypersomnia

कभी कभी आपको लगता है कि आपको दिन के समय भी नीद आ रही जब आपको जगना होता है सामान्यत ऐसा रात मे न सोने के कारण होता है|

अगर आपको लगता है कि रात मे पूरी नींद लेने के बाद भी लगातार 1 या 2 हफ्तो तक आपको ज्यादा नीद आ रही हो तो आपको डाक्टर से सलाह लेनी चाहिए| कुछ शारीरिक रोग जैसे मधुमेह ,वायरल फीवर या थायराइड सम्बंधी समस्या इसका कारण हो सकते है|कुछ अन्य कारण भी हो सकते है|

 

1: नार्कोलेप्सी (दिन में ज्यादा सोना)

 यह कम पाया जाने वाला रोग है जिससे चिकित्सक इसे पहचानने मे अकसर गलती कर देते है

   इसके दो मुख्य लक्षण होते है - 

क) आपको दिन भर बहुत नीद महसूस होती है तथा आपको अचानक नीद के गहरे झटके आते है जिसे आप रोक नही पाते है चाहे आप और लोगों के साथ ही क्यों न बैठे हों |

ख) जब आप बहुत गुस्से में या उत्तेजित होते है या हँस रहे होते हैं तो आप अपनी मासपेशियो नियंत्रण खो देते है और गिर जाते है इसको कैटालेप्सी कहते हैं| कभी कभी ये उम्र के साथ ठीक हो जाता है |

 

 ऐसा भी हो सकता है कि आप: 

  • जब सोने जाने वाले हो या उठने वाले हो तो कुछ बोल न पाये या चल न पाये (Sleep Paralysis)।
  • अजीब सी आवाजें सुने या स्वप्न जैसी तस्वीरें देखें (Hallucinations)।
  • आप एक स्वचालित यन्त्र की तरह कार्य करते हैं, आप कुछ कार्य कर देते हैं लेकिन आप को पता नहीं चलता। आप को लगता है कि आप सो रहे थे।
  • घबराहट में अचानक उठ जाएँ।

 

नार्कोलेप्सी का कारण हाइपोक्रिटिन नामक तत्व की कमी का होना है।

      इसके उपचार के लिये सर्वप्रथम आप नियमित व्यायाम करिये एवं सोने की नियमित दिनचर्या बनाइये। अगर इससे मदद नहीं मिलती है तो कुछ दवाइयाँ आपकी मदद कर सकती हैं। जैसे एन्टीडिप्रेसेन्ट एवं मोडफ़ेनिल।

एन्टीडिप्रेसेन्ट जैसे क्लोमिप्रामीन एवं फ़्लूआक्सिटीन कैटालेप्सी में सहायक होती है। इसके अलावा सोडियम आक्सीबेट नाम की नई दवा भी उपलब्ध है।

 

स्लीप एप्नीया (Interuppted Sleep)

  • आप रात मे तेजी से खर्राटे लेते है और रात मे अचानक से थोडे समय के लिए आपकी साँस रुक जाती है। ऐसा श्वास नली के ऊपरी हिस्से के बन्द हो जाने से होता है।
  • हर बार जब आपकी साँस रुक जाती है, आप अचानक से जाग जात्ते हैं और आपके शरीर, हाथ व पैर में कुछ झटके महसूस होते हैं ।
  • आप थोड़ी देर के लिये जगते हैं और फ़िर से सो जाते हैं।

      ऐसा रात में कई बार होता है। आप अगले दिन थका हुआ महसूस करते हैं और आपको इतनी तेज नींद आती है कि आप खुद को रोक नहीं पाते हैं। अतः सुबह जागने पर आपका मुँह सूखा लगता है और सिर दर्द होता है।

 

अगर आप -

  • उम्रदराज हैं
  • मोटे हैं (वजन ज्यादा है)
  • धूम्रपान करते हैं
  • मदिरा सेवन करते हैं

तो आपको स्लीप एप्नीया होने की ज्यादा सम्भावना रहती है।

ये समस्या रोगी के बजाय ज्यादातर उसका साथी बताता है।

चिकित्सा:

  • धूम्रपान एवं मदिरा सेवन बन्द करें।
  • दूसरी स्थिति में सोने का प्रयास करें।
  • आपको सी पी ए पी मास्क(CPAP Mask) पहनने की आवश्यकता पड़ सकती हैं ये आपकी नाक के अन्दर लगता है व तेज दबाव में हवा अन्दर भेजता है व श्वास नली को खुला रखता है।

 

कुछ अन्यसम स्याएँ:

हर 20 में से व्यक्ति को नाइट टेरर होते हैं । हर 100 में से 1 व्यक्ति सोते हुए चलता है, ये दोनों समस्याएँ बच्चों में ज्यादा होती हैं ।

स्लीप वाकिंग: अगर आपको ये बीमारी है तो अन्य लोगों को ऐसा लगता है कि आप बहुत गहरी नींद से जगे हैं। आप उठते हैं व कुछ कार्य करते हैं। ये कार्य कठिन भी हो सकते हैं जैसे आस पास घूमना, सीढ़ियों से ऊपर नीचे आना। इसमें कई बार आप खुद को परेशानी में भी डाल सकते हैं । अगर आपको कोई जगाए न तो आपको अगले दिन कुछ याद नहीं रहता।   स्लीप वाकिंग कभी कभी नाइट टेरर के बाद हो सकती है। अगर आप को ठीक से नींद नहीं आती है या बहुत कम समय के लिये सोते हैं तो इस बात की सम्भावना ज्यादा है कि आप सोते हुए चलें । इसलिये एक पर्याप्त नींद लेना जरूरी हो जाता है।

      ऐसे रोगी को धीरे से उसके बिस्तर पर पुन: लिटा देना चाहिये और उसे जगाना नहीं चाहिये। दरवाजे व खिड़कियॉ बन्द रखनी चाहिये, धारदार वस्तुओं जैसे चाकू आदि को दूर रखना चाहिये।

नाइट टेरर : ये बिना स्लीप वाकिंग के भी हो सकता है। रोगी गहरी नींद से अचानक जगा हुआ प्रतीत होता है। रोगी अर्धनिद्रा में व बहुत डरा हुआ सा लगता है लेकिन बिना पूरी तरह जगे हुए ही वो पुन: सो जाता है। आप इस दौरान उनके साथ रह सकते हैं जब तक वो फ़िर से न सो जाएँ।

रोगी को अगले दिन इस बारे में कुछ भी याद नहीं रहता।

 

नाइट मेयर: हममे से अधिकांश को डरावने सपने या नाइट मेयर आते हैं। ये ज्यादातर देर रात में होते हैं जब हम सबसे सजीव एवं याद रहने वाले स्वप्न देखते हैं। इनमे कोई दिक्कत नहीं होती जब तक ये भावात्मक समस्याओं के कारण रोज नहीं होते। ये सामान्यतः किसी बहुत परेशान करने वाले या जीवन को संकट मे डालने वाली घटना जैसे तूफ़ान, महामारी, किसी की मौत, दुर्घटना या जानलेवा हमला के बाद होते हैं। इसके उपचार के लिये परामर्श एवं सलाह उपयुक्त रहती है।

 

रेस्टलेस लेग सिन्ड्रोम (Restless Leg Syndrome):

  •  आपको लगता है कि आपको पैर हिलाना जरूरी हो गया है और आप इसे रोक नहीं सकते (कभी - कभी शरीर के अन्य अंग भी)
  •  आपको अपने पैरों मे तकलीफ़, दर्द या जलन का अनुभव होता हो।
  •  ये आपको तब ज्यादा महसूस होता है जब आप खाली बैठे हों या आराम कर रहे हों।
  •  रात में ये दिक्कतें बढ़ जाती हों।
  •  जब तक आप टहले या अपने पैरों को खींचें  केवल तब तक आराम मिलता हो।
  •  आप दिन में एक जगह स्थिर बैठने और ठीक से सोने में परेशानी होती है।

 

हालाँकि कई लोग बचपन से ही इस बीमारी से ग्रसित होते हैं लेकिन ज्यादातर लोग मध्यावस्था में डाक्टर के पास जाते हैं। ये बीमारी आनुवंशिक होती है।

      अधिकांश मामलों में इस बीमारी का कोई कारण नहीं होता, लेकिन कभी कभी ये शारीरिक बीमारियों जैसे लौह तत्व व विटामिन की कमी, मधुमेह तथा गुर्दे की बीमारियों से हो सकती है। ये गर्भावस्था के दौरान भी कभी कभी हो सकता है।

      अगर इस बीमारी का कोई कारण नहीं हो जैसा कि अधिकांश मामलों में होता है तो उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज को कितनी परेशानी है। अगर ज्यादा परेशानी है तो नींद बेह्तर करने के आसान उपायों से आराम मिल सकता है। ज्यादा गम्भीर मरीज़ो मे दवाइयों की आवश्यकता होती है। जैसे कि पार्किंसन्स रोग में प्रयोग होने वाली दवाएं, मिर्गी के दौरे मे प्रयोग होने वाली दवाएं, बेन्ज़ोडायाजिपीन, दर्द निरोधी दवाइयाँ।

अगर मरीज को आराम न मिले तो विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिये।

आटिस्म : इस रोग से ग्रसित रोगियो को कभी इस बात का अह्सास नहीं होता कि रात का समय सोने के लिये होता हो और वे रात भर इधर उधर चलते रहते हैं। इस बीमारी के लिये विशेषज्ञ डाक्टर की सलाह लेनी चाहिये।

 

नींद अपेक्षाकृत निलंबित संवेदी और संचालक गतिविधि की चेतना की एक प्राकृतिक बार-बार आनेवाली रूपांतरित स्थिति है, जो लगभग सभी स्वैच्छिक मांसपेशियों की निष्क्रियता की विशेषता लिए हुए होता है।[1] इसे एकदम से जाग्रत अवस्था, जब किसी उद्दीपन या उत्तेजन पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता कम हो जाती है और अचेतावस्था से भी अलग रखा जाता है, क्योंकि शीत नींद या कोमा की तुलना में नींद से बाहर आना कहीं आसान है। नींद एक उन्नत निर्माण क्रिया विषयक (एनाबोलिक) स्थिति है, जो विकास पर जोर देती है और जो रोगक्षम तंत्र (इम्यून), तंत्रिका तंत्र, कंकालीय और मांसपेशी प्रणाली में नयी जान डाल देती है। सभी स्तनपायियों में, सभी पंछियों और अनेक सरीसृपों, उभयचरों और मछलियों में इसका अनुपालन होता है।यह एक अत्यावश्यक है।एक निश्चित आयुवर्ग के व्यक्तियों को निर्धारित सीमा में नींद अवश्य लेना चाहिए।जिस प्रकार शरीर को भोजन की आवश्यकता होती है,ठीक उसी तरह नींद भी ज़रूरी है।[2] नींद के उद्देश्य और प्रक्रिया सिर्फ आंशिक रूप से ही स्पष्ट हैं और ये गहन शोध के विषय हैं।
सोऐ हुए बच्चे
बिल्ली का बच्चा सो रहा है

शरीरविज्ञानसंपादित करें

नींद के चरणसंपादित करें

रात भर नींद गहरी नींद के साथ चक्र पर और अधिक REM (लाल रंग में) चिह्नित सुबह की ओर.
स्टेज N3 नींद, लाल बॉक्स द्वारा प्रकाश डाला हुआ ईईजी.50% से अधिक डेल्टा तरंगों के साथ गहरी नींद के तीस सेकंड.
आरइएम् (REM) नींद, लाल बॉक्स द्वारा डाला ईईजी (EEG); लाल रेखा से प्रकाश डाला हुआ आंख आंदोलनों.सोने के तीस सेकंड.

स्तनधारियों और पक्षियों में, नींद को दो मुख्य भागों में बांटा जाता है: तेज नेत्र गति (REM) और गैर-तेज नेत्र गति (NREM या non-REM) नींद. प्रत्येक प्रकार एक भिन्न किस्म की शारीरिक, तंत्रिका संबंधी और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के सेट से जुड़े हुए हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ स्लीप मेडिसिन (AASM) ने NREM को और भी तीन स्तरों में विभाजित किया है: N1, N2 और N3. अंतिम स्तर को डेल्टा स्लीप (डेल्टा नींद) या स्लो-वेव स्लीप (धीमी गति की नींद) (SWS) भी कहते हैं।[3]

REM और NREM के चक्र में नींद अग्रसर होती जाती है, क्रम सामान्य रूप से N1 → N2 → N3 → N2 → REM होता है। रात में आरंभ में बहुत अधिक गहरी नींद (N3 स्तर) हुआ करती है, जबकि रात में बाद में और प्राकृतिक जागरण से ठीक पहले REM नींद का अनुपात बढ़ जाता है।

1937 में सबसे पहले अल्फ्रेड ली लूमिस और उनके सहकर्मियों ने नींद के चरणों का वर्णन किया था; जिन्होंने नींद की विभिन्न इलेक्ट्रोएन्सेफालोग्राफी विशेषताओं को पांच स्तरों में विभाजित (ए से ई तक) किया था, जो जाग्रतावस्था से गहरी नींद के क्रम का प्रतिनिधित्व करते हैं।[4] 1953 में, REM निद्रा के भिन्न रूप की खोज की गयी और इस प्रकार विलियम डिमेंट और नाथानियल क्लीटमैन ने निद्रा को NREM चरणों तथा REM में पुनर्वर्गीकृत किया।[5] 1968 में "आर एंड के स्लीप स्कोरिंग मैन्युअल" में अलान रेच्ट्सचाफ्फेन और एंथोनी कालेस ने चरणों के मानदंड को मानकीकृत किया।[6] आर एंड के मानक में, NREM निद्रा को चार चरणों में विभाजित किया गया था, धीमी-तरंगों की निद्रा चरणों को चरण 3 और 4 रखा गया। चरण 3 में, डेल्टा तरंगें कुल तरंग पैटर्न का 50% से कम होती हैं, जबकि चरण 4 में ये 50% से अधिक हो जाया करती हैं। इसके अलावा, REM निद्रा का उल्लेख कभी-कभी चरण 5 के रूप में किया जाता था।

2004 में, AASM ने आर एंड के स्कोरिंग प्रणाली की समीक्षा के लिए AASM दृश्य स्कोरिंग टास्क फोर्स को नियुक्त किया। समीक्षा से कई बदलाव किये गये, इनमें सबसे महत्वपूर्ण रहा चरण 3 और चरण 4 का चरण N3 में संयोजन. 2007 में संशोधित स्कोरिंग द AASM मैनुअल फॉर स्कोरिंग ऑफ़ स्लीप एंड एसोसिएटेड इवेंट्स के रूप में प्रकाशित हुआ।[7] उत्तेजना और श्वास प्रश्वास संबंधी, हृदय संबंधी तथा गति वृतांतों को भी जोड़ा गया।[8][9]

विशेषीकृत निद्रा प्रयोगशाला में पोलीसोम्नोग्राफी द्वारा नींद के चरण तथा नींद की अन्य विशेषताओं का आम तौर पर मूल्यांकन किया जाता है। लिये गये माप में मस्तिष्क की तरंगों का EEG, नेत्र गति का इलेक्ट्रोक्युलोग्राफी (EOG) और कंकालीय मांसपेशी की गतिविधि का इलेक्ट्रोमाइयोग्राफी शामिल हैं। मनुष्यों में, प्रत्येक निद्रा चक्र औसत 90 से 110 मिनट तक के लिए रहता है,[10] और प्रत्येक चरण के अलग-अलग शारीरिक कार्य हो सकते हैं। इससे नींद तो आ सकती है और बेहोशी जैसी हालत लग सकती है, लेकिन इससे शारीरिक कार्य पूरे नहीं होते (जैसे कि, पर्याप्त नींद लेने के बाद भी कोई व्यक्ति थका हुआ महसूस कर सकता है)।

एनआरईएम् निद्रासंपादित करें

2007 के एएएसएम् मानकों के अनुसार, एनआरईएम् तीन चरणों के होते हैं। एनआरईएम् में अपेक्षाकृत कम सपने आया करते हैं।

चरण N1 मस्तिष्क के संक्रमण से संबंधित है, इस चरण में मस्तिष्क 8 से 13 हर्ट्ज (जाग्रत स्थिति में आम) की फ्रीक्वेंसी (बारंबारता) के अल्फा तरंगों से 4 से 7 हर्ट्ज फ्रीक्वेंसी की थेटा तरंगों में संक्रमण करता है। इस चरण को कई बार उनींदापन या ऊंघती नींद कहा जाता है। अचानक झटका आना और नींद के उभरने को सकारात्मक मायोक्लोनस के रूप में भी जाना जाता है, जो N1 के दौरान नींद के आरंभ के साथ जुड़ा हो सकता है। कुछ लोगों को इस चरण के दौरान निद्राजनक मतिभ्रम भी हो सकता है, जो उनके लिए परेशानी का सबब बन सकता है। N1 के दौरान, व्यक्ति कुछ मांसपेशी दशा और बाहरी वातावरण की सबसे अधिक सचेत जागरूकता गंवा देता है।

चरण N2 की विशेषता है कि इस दौरान नींद की तकली 11 से 16 हर्ट्ज और के-समष्टियों के बीच घूमती रहती है। इस चरण के दौरान, जैसा कि EMG द्वारा मापा गया, मांसपेशियों की गतिविधि कम हो जाती है और बाहरी वातावरण के प्रति सचेत जागरूकता गायब हो जाती है। वयस्कों में यह चरण कुल नींद के 45% से 55% में हुआ करता है।

स्टेज N3 (गहरी या धीमी-तरंग नींद) का चरित्र चित्रण इस तरह किया जाता है कि इस दौरान डेल्टा तरंगों का कम से कम 20% 0.5 से 2 हर्ट्ज के बीच हों और चोटी-से-चोटी आयाम >75 μV का हो। (ईईजी मानक 0-4 हर्ट्ज पर डेल्टा तरंगों को परिभाषित करते हैं, लेकिन मूल आर एंड के तथा नए 2007 के एएएसएम् दोनों के ही दिशानिर्देश में नींद मानक का क्रम 0.5 - 2 हर्ट्ज है।) इसी चरण में रात्रि आतंक, रात्रि शय्यामूत्र, नींद में चलना और नींद में बडबडाना जैसे पारासोमनियाई (नींद के अनेक विकार) हुआ करते हैं। कई दृष्टांत और विवरण अभी भी 20% -50% डेल्टा तरंगों के साथ N3 चरण और 50% से अधिक डेल्टा तरंगों के साथ N4 को दर्शाते हैं; ये संयुक्त रूप से चरण N3 हैं।

आरईएम् निद्रासंपादित करें

तेज नेत्र गति नींद, या आरईएम् नींद, अधिकांश मानव वयस्कों की कुल नींद का 20%–25% हुआ करती है। आरईएम् निद्रा के लिए मानदंडों में तेज नेत्र गति और एक द्रुत कम-वोल्टेज ईईजी शामिल है। इसी चरण में सबसे यादगार सपने आया करते हैं। कम से कम स्तनधारियों में, एक अवरोही मांसपेशी तनाव देखा गया है। इस तरह का पक्षाघात जरुरी हो सकता है ताकि शारीरिक रचना को आत्म-क्षति से बचाया जा सके, जो कि इस चरण के दौरान अक्सर आने वाले सजीव सपनों से शारीरिक क्रिया के जरिये हो सकता है।

समयसंपादित करें

मानव जैविक घड़ी

नींद का समय सिर्काडियन घड़ी (circadian clock), स्लीप-वेक होमियोस्टेसिस द्वारा नियंत्रित है और मनुष्यों में, कुछ सीमा के अंदर, इच्छाशक्ति व्यवहार पर निर्भर है। सिर्काडियन घड़ी -एक भीतरी समयनिर्धारक, तापमान-अस्थिरता, एंजाइम-नियंत्रक उपकरण- एडेनोसाइन के साथ अग्रानुक्रम में काम करती है, यह एक ऐसा न्यूरोट्रांसमीटर है जो जाग्रतावस्था के साथ जुडी अनेक शारीरिक प्रक्रियाओं को बाधित करता है। एडेनोसाइन दिन भर में तैयार होता है; एडेनोसाइन के उच्च स्तर से तंद्रा आती है। दिनचर पशुओं में, हारमोन मेलाटोनिन के निर्गमन के कारण सिरकाडियन तत्व से और शरीर के भीतरी तापमान में क्रमिक कमी से तंद्रा या उनींदापन आया करता है। किसी के क्रोनोटाईप द्वारा समय प्रभावित होता है। सिरकाडियन आवर्तन से एक सही ढंग से संरचित और स्वास्थ्यवर्द्धक निद्रा प्रकरण का आदर्श समय निर्धारित होता है।[11]

होमियोस्टेटिक निद्रा की सहजप्रवृत्ति (पिछली पर्याप्त निद्रा प्रकरण के बाद से गुजर चुकी समय राशि की एक क्रिया के रूप में नींद की जरुरत) का संतोषप्रद नींद के लिए सिर्काडियन तत्व के साथ संतुलित होना जरुरी है।[12] सिर्काडियन घड़ी से प्राप्त संदेश के साथ-साथ यह शरीर को बताता है कि इसे नींद की जरूरत है।[13] सिर्काडियन आवर्तन से नींद से जगने का मुख्य रूप से निर्धारण होता है। एक व्यक्ति जो नियमित रूप से जल्दी उठता या उठती है, आम तौर पर वह अपने सामान्य समय से अधिक देर तक सोये नहीं रह सकता या सकती, यहां तक कि भले ही उसने कम नींद ली हो।

नींद की अवधि DEC2 जीन द्वारा प्रभावित है। कुछ लोगों में इस जीन का उत्परिवर्तन होता है; वे सामान्य से दो घंटे कम सोते हैं। तंत्रिका संबंधी विज्ञान की प्रोफेसर यिंग-हुई फू और उनके सहयोगियों ने DEC2 उत्परिवर्तन लिए चूहों की नस्ल पैदा की, जो आम चूहों की तुलना में कम सोया करते.[14][15]


नींद की समस्याएं प्राय: तीन तरह की होती हैं. एक तो यह कि नींद आए ही नहीं या फिर आने के बाद टूट जाए और वापस ही न आए, और ऐसी भी कि रातभर टूट-टूटकर आती रहे - सोए भी और नहीं भी. हम तकनीकी तौर पर इन सबको अनिद्रा (इन्सोमनिया) कहते हैं. इनमें से हर एक के कारण अलग हैं और इलाज भी.

दूसरी तरह की समस्या है दिनभर नींद आते रहना. बैठे-बैठे सो जाना. काम करते-करते ऊंघ जाना. गाड़ी चलाते वक्त झपकी आना. कुल मिलाकर देखें तो अनिद्रा के एकदम उलट नींद ज्यादा आने से परेशान. और तीसरी तरह की नींद की समस्याएं वे हैं जो मायावी सी लगती हैं, कहानियों तथा चुटकुलों का विषय बनती है. नींद में चलना, सोते-सोते चीखकर उठ जाना, जोर-जोर से लातें चलाना, खर्राटे मारना, नींद में दांत पीसना, सोते-सोते पेशाब कर देना आदि.


इनके अलावा ‘जेट लेग’ और ‘रात्रिकालीन शिफ्ट’ ड्यूटी करने वालों की नींद की अपनी समस्याएं हैं. यहां मैं नींद की समस्याओं को लेकर न्यूज चैनलों टाइप का फटाफट, दस मिनट में सौ खबरें जैसा कुछ पेश कर रहा हूं.

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अनिद्रा से संबंधित तथ्य :

1. अनिद्रा यदि चंद दिनों से ही है तो यह प्राय: किसी घरेलू या दफ्तर के तनाव से है. घबराने की बात नहीं. शायद दवा की जरूरत भी नहीं.

2. यदि अनिद्रा दो-तीन-चार सप्ताह तक खिंच जाए तो कुछ दिनों के लिए डॉक्टर की नींद की दवा ले लें. ऐसा प्राय: तनाव से तो होता ही है, किसी बीमारी या सर्जरी से उठने के बाद भी हो सकता है.

3. हां, यदि अनिद्रा कई महीनों या सालों से है तो इसे पूरी जांच और इलाज की आवश्यकता है. इसमें मानसिक रोग विशेषज्ञ से मिलकर डिप्रेशन आदि की आशंका की जांच भी हो सकती है. थायरॉयड, अस्थमा, हृदय रोग, पार्किन्सोनिज्म, माइग्रेन, यहां तक कि असामान्य किस्म की मिर्गी तक की संभावना रहती है.

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4. अनिद्रा का एक बड़ा कारण आपकी ‘खराब स्लीप हाइजीन’ भी हो सकती है. ‘स्लीप हाइजीन’ में बहुत सी बातें आती है. बिस्तर अधिक गद्देदार हो, सोने के कमरे में बहुत रोशनी या शोर हो, साथ वाला खर्राटे मारता हो, लात चलाता हो, यहां तक कि दीवार घड़ी जोर से टिकटिक करती हो तो यह खराब ‘स्लीप हाइजीन’ है. यदि सोने से पहले आप ऑफिस के तनाव में लगे रहें, ठूसकर खा लिया है, गर्म पानी से स्नान कर लिया है, कसरत कर ली है - तो ये सब भी निद्रा विरोधी हैं.

5. जहां तक दारू की बात है तो पीकर आप सो तो जाएंगे परंतु रातभर टूट-टूटकर ही नींद आएगी या आने के कुछ देर बाद जो टूटेगी तो फिर आएगी ही नहीं. आज दो पेग में आई है, बाद में तीन में आएगी और फिर चार पेग में भी नहीं आएगी.

6. क्या अनिद्रा किसी मानसिक रोग का लक्षण है? हां, यह संभव है. बेचैनी, अवसाद (डिप्रेशन) तथा मूड डिसऑर्डर में भी अनिद्रा हो सकती है. डिप्रेशन इस मामले में अनोखा है कि इसके रोगी को अनिद्रा भी हो सकती है और वह अति निद्रा का शिकार होकर दिन-रात सोता पड़ा भी रह सकता है. डिप्रेशन की दवाइयां भी अनिद्रा पैदा कर सकती है.

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7. कई बीमारियों में अनिद्रा एक महत्वपूर्ण कारक तथा लक्षण हो सकता है. सांस की बीमारी, हार्ट के पंप के कमजोर हो जाने पर होने वाला फेफड़ों का कंजेशन, मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति), किडनी व लीवर खराब होने में अनिद्रा ही एक प्रमुख शिकायत हो सकती है.

8. नींद की दवाई डॉक्टर की सलाह पर ही लें. हो सके तो बस कुछ समय के लिए ही. यदि अनिद्रा की क्रॉनिक बीमारी है और नींद की दवाएं लंबे समय तक लेनी पड़ें तो इन्हें बीच-बीच में रोक लें. इन्हें लगातार लेंगे तो इनका असर खत्म हो जाएगा.

9. नई जगह पर, होटल के कमरे में, अस्पताल में, जीवन में कुछ नया घट जाने पर, कोई महत्वपूर्ण तारीख पास आने पर नींद गड़बड़ हो ही सकती है. इसे ‘एडजस्टमेंट अनिद्रा’ कहते हैं. यह स्वत: ठीक हो जाती है.

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10. ऊंचे पहाड़ों पर पहुंचने पर नींद डिस्टर्ब हो सकती है. इसे ‘एल्टीट्यूड अनिद्रा’ कहते हैं. इसके लिए नींद दवा नहीं बल्कि डायमोक्स नामक दवा लेनी पड़ती है. जो इन स्थानों से एडजस्ट करने के लिए दी जाती है.

दिन के समय उनींद रहना

दिन के समय नींद के झोंके आने की बात प्राय: मरीज स्वयं नहीं मानता. साथ वाले बताते हैं. ऐसे लोग मीटिंग में, गाड़ी चलाते हुए, मशीन पर काम करते हुए अचानक झपकी ले लेते हैं. यह ‘स्लीप एपनिया’ नाम की बीमारी हो सकती है जिससे आदमी रात में खर्राटे मारता है, सोते हुए उसकी सांस तेज होती-रुकती है और मरीज को पता भी नहीं होता. वह बस दिन भर उनींदा रहता है. यदि ऐसा है तो इसे नजरअंदाज न करें. जांच से एक बार इसका कारण पता चल जाएगा तो फिर इसे ठीक भी किया जा सकता है.

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कुछ अन्य रोचक तथ्य

1. नींद में चलने की बीमारी का न तो कारण पता है, न इलाज. एक तिहाई केसों में यह खानदानी बीमारी हो सकती है.

2. बच्चा रात में नींद में उठकर चीखें, पसीने से नहा जाए, तेज सांसें ले, फिर वापस सो जाए, और सुबह उठने पर उसे कुछ याद ही न रहे तो यह कोई भूत-प्रेत बाधा नहीं है. यह भी नींद की एक बीमारी है जो उम्र के साथ स्वत: ठीक हो जाती है.

3. पांच-छह वर्ष तक का बच्चा यदि सोते में पेशाब करे तो यह नॉर्मल बात मानी जाती है. बाद मे ऐसा करे तो फिर इलाज की जरूरत है. गोलियां-दवाइयां तो हैं ही. बच्चे का पूरा यूरोलॉजी चेकअप जरूरी है.

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4. ‘जेट लेग’ अर्थात अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के बाद नींद न आना, टूट-टूटकर आना. इसके नॉर्मल होने में दो दिन से लगाकर दो सप्ताह तक लग सकते हैं. यदि यात्रा में ज्यादा ‘टाइम-जोन’ से गुजरे होंगे तो ज्यादा दिन तक ‘जेट-लेग’ चलेगा.

5. रात की शिफ्ट में काम करने वालों की दिन में भी नींद ठीक से नहीं हो पाती. वे लेटे रहें पर नींद नहीं आती. फिर वापस रात में ड्यूटी करते समय वे उतने अलर्ट नहीं रह पाते जिससे ड्यूटी पर गलतियां और दुर्घटनाएं भी होती है. रात में काम की जगह पर अच्छी तेज रोशनी हो तो ऐसा कम होता है. कोशिश यह भी हो कि रात की शिफ्ट दो-तीन सप्ताह के अंतराल पर बदलती रहे.

नींद की कथा लिखते-लिखते स्वयं मुझे नींद आने लगी है. पढ़ते-पढ़ते, शायद आपको भी. तो ठाठ से सोइए, यही सबसे बड़ा राजसी विलास है. याद है न?
 ‘के सोये राजा का पूत, के सोये जोगी अवधूत.’

तीन प्रकार की होती है नींद, इस तरह सोने से मिलेगी तनाव से मुक्ति


जब मन माथे के बीचों-बीच आज्ञाचक्र पर आता है और हम साक्षी होकर उसको अनुभव करते रहते हैं तो उसे ध्यान कहते हैं। जब मन आज्ञाचक्र पर तो आता है लेकिन साक्षी भाव नहीं होता तो उसे नींद कहते हैं। फिट बने रहने के लिए भरपूर नींद आवश्यक है। नींद हमारे अंग-प्रत्यंग को आराम पहुंचाकर उनमें नई ऊर्जा भर देती है, जिससे शरीर अगले दिन फिर से तैयार हो जाता है। नींद से शरीर के साथ-साथ मन, बुद्धि और इंद्रियों में भी नयापन आता है। नींद एक देवी है, ऊर्जा है जो हमें जीवन भर ऊर्जावान बनाए रखती है। वैसे जब शरीर में तमोगुण बढ़ता है, तब नींद आती है और सत्व गुण के बढ़ने पर जागना होता है। स्वभाव से ही नींद आती है और स्वभाव से ही जागना होता है।

अधिक निद्रा या कम निद्रा से तन और मन में रोग पैदा होते हैं। समुचित नींद से शरीर को पोषण मिलता है और बल, बुद्धि, पौरुष में वृद्धि होती है। इससे ज्ञानेंद्रियों की भी क्षमता बढ़ती है। नींद पूरी न लेने से शरीर और मन बीमार हो जाता है। जिन लोगों को ठीक से नींद नहीं आती, उनमें कब्ज, गैस, भूख न लगना, अपच, एसिडिटी आदि रोग हो जाते हैं, शरीर का वजन घटने या बढ़ने लगता है, हार्मोनल इम्बैलेंस होने लगता है। कुछ लोग रात को काम करते हैं और दिन में सोते हैं। ऐसा करना प्रकृति के नियम के विरुद्ध होता है। इससे भी आदमी कम उम्र में ही बुड्ढा और रोगी हो जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार नींद तीन प्रकार की होती है- स्वाभाविक नींद, जिसमें स्वभाव से सोते जागते हैं। दूसरी- तामसी नींद, जिसमें उठ जाने के बाद भी व्यक्ति फिर सो जाता है और तीसरी- विकारी नींद, जिसमें किसी बीमारी के होने पर व्यक्ति ज्यादा सोता है। इसमें तामसी नींद खराब होती है। यह आलस्य पैदा करती है और आलस्य व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु होता है। नींद नहीं आने से शरीर की शक्ति कम पड़ जाती है और कई बीमारियां घेर लेती हैं, शरीर रोगी हो जाता है।

नींद न आना आज बहुत बड़ी समस्या बनता जा रहा है। बिस्तर, भले कितना भी अच्छा क्यों ना हो, लेकिन यदि आंखों में नींद नहीं तो वो बिस्तर भी काटने लगता है। असलियत में जब इंद्रियां व मन काम करते-करते थक कर बाहर संसार से हट जाता है तो स्वाभाविक रूप से नींद आ जाती है। लेकिन जब तक मन संसार से नहीं हट पाता और केवल इंद्रियां शांत हो जाती हैं, तब व्यक्ति को नींद नहीं आती। यदि आ भी जाए तो वह नींद में तरह-तरह के सपने देखता रहता है।

गहरी नींद के लिए रात को सोने से लगभग दो घंटे पहले भोजन कर लें। रात को जल्दी सो जाएं। सोते समय उत्तर दिशा में सिर न हो, डिनर के बाद मन को सक्रिय न करें, सोने का समय निश्चित करें। बिस्तर पर लेटने के बाद सोचें नहीं। सोने से पहले गहरा श्वास-प्रश्वास करें, भ्रामरी प्राणायाम और ॐ का जाप करना काफी फायदेमंद रहता है, क्योंकि ऐसा करने से भागता हुआ मन ठहर जाता है और ठहरा मन गहरी नींद देगा। हमारे द्वारा दिनभर किए गए कार्यों का असर रात को नींद पर पड़ता है। अतः दिनभर प्रसन्न और उत्साही रहें। दिन में शरीर से कार्य करें, व्यायाम करें और मन को तनाव मुक्त रखें, गहरी नींद के लिए शरीर का थकना और मन का तनाव मुक्त रहना जरूरी है।

मानव में सर्वोत्कृष्ट 

वयस्क 

नींद की सर्वोत्कृष्ट मात्रा कोई अर्थपूर्ण अवधारणा नहीं हो सकती, जब तक कि किसी व्यक्ति के सिरकाडियन आवर्तन के साथ जोड़कर नींद के समय या टाइमिंग को न देखा जाय. एक व्यक्ति का बड़ा नींद प्रकरण अपेक्षाकृत निष्फल और अपर्याप्त हो सकता है अगर यह दिन के "गलत" समय में होता है; व्यक्ति को शरीर के तापमान के न्यूनतम होने से पहले कम से कम छः घंटे सोना चाहिए। [16] सही टाइमिंग वो है जब नींद के मध्य प्रकरण के बाद और जगने से पहले निम्नलिखित दो चिह्नक या मार्कर प्रकट हो जाएं:[17]

  • हार्मोन मेलाटोनिन का अधिकतम जमाव और
  • न्यूनतम भीतरी शरीर तापमान.

मानव नींद उम्र के हिसाब से और व्यक्तियों के बीच भिन्न हो सकती है और अगर दिन में उनींदापन या दुष्क्रिया न हो तो नींद को पर्याप्त माना जाता है।

विश्वविद्यालय कैलिफोर्निया, सान डिएगो के दस लाख वयस्कों के एक मनःचिकित्सा अध्ययन में पाया गया कि जो लोग सबसे अधिक समय तक जीवित हैं वे रात में छः से सात घंटे रोज स्वयं प्रेरित होकर सोया करते हैं।[18] नींद की अवधि और महिलाओं में मृत्यु दर के जोखिम पर हुए एक अन्य अध्ययन में भी ऐसा ही परिणाम पाया गया।[19] अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि "प्रतिदिन 7 से 8 घंटे से अधिक नींद लेने वालों में बढी हुई मृत्यु दर लगातार जुडी हुई है", हालांकि इस अध्ययन का यह भी कहना है कि इसका कारण अवसाद और सामाजोक-आर्थिक स्थिति हो सकती है, जो आंकड़ों की दृष्टि से सह-संबंधित हो जाते हैं।[20] यह भी कहा गया है कि अलार्म लगाकर जगने वालों की तुलना में, जो लोग प्राकृतिक रूप से कम नींद के बाद जग जाया करते हैं, सिर्फ उनमे कम नींद के घंटे और कम रुग्णता के बीच सह-संबंध प्रकट होते हैं।

वारविक विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं ने पाया कि नींद की कमी ह्रदय रोग से मृत्यु के खतरे को दुगुने से अधिक बढ़ा देती है, लेकिन बहुत अधिक नींद भी मृत्यु के खतरे को दुगुना करने के साथ जुड़ी हो सकती है, हालांकि मुख्य रूप से ह्रदय रोग से नहीं। [22][23] प्रोफेसर फ्रांसिस्को कैपुसीओ ने कहा, "छोटी नींद को वजन बढ़ने, उच्चरक्तचाप और टाईप 2 मधुमेह के लिए और कभी-कभी मृत्यु के लिए एक जोखिम का कारक बनता देखा गया है; लेकिन छोटी नींद-मृत्यु दर के विपरीत लंबी नींद को बढी हुई मृत्यु दर से जोड़ सकने के लिए कोई संभावित तंत्र सामने नहीं आया है, अभी इसकी जांच होना बाक़ी है। कुछ लोग इसमें शामिल हैं लेकिन इसके लिए अवसाद, निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति और कैंसर-संबंधित क्लान्ति इसकी वजह रहे... रोकथाम के संदर्भ में, हमारे निष्कर्षों से पता चलता है कि लगातार प्रति रात सात घंटे के आसपास सोना स्वास्थ्य के लिए इष्टतम या सर्वोत्तम है और नींद में निरंतर कमी बीमार स्वास्थ्य के लिए पहले से प्रवृत्त होना हो सकता है।"

इसके अलावा, नींद की कठिनाइयां घनिष्ठ रूप से अवसाद, मद्यपता और द्विध्रुवी विकार जैसे मनोरोग विकारों से जुडी हैं।[24] अवसाद से ग्रस्त वयस्कों के 90% तक में नींद की कठिनाइयां पाई गयी हैं। ईईजी में पाए गये अनिमयन (Dysregulation) में नींद की निरंतरता में विघ्न, डेल्टा नींद में कमी और प्रसुप्ति के संबंध सहित बदलते REM पैटर्न, रात भर का विभाजन तथा नेत्र गति का घनत्व शामिल हैं।[25]

उम्र के साथ घंटेसंपादित करें

विकसित होने और ठीक से काम करने के लिए बच्चों को प्रतिदिन अधिक नींद की जरूरत होती है: नवजात शिशु के लिए 18 घंटे तक, इसके बाद उम्र बढ़ने के साथ-साथ इसमें कमी आती जाती है।[13] एक नवजात शिशु रोजाना लगभग 9 घंटे की REM नींद लिया करता है। पांच वर्ष की आयु तक या उससे ऊपर, केवल दो घंटे से ज़रा ज्यादा REM नींद लिया करता है।[26]

उम्र और स्थितिप्रति दिन औसत नींद
नवजात18 घंटे तक
1–12 महीने14–18 घंटे
1–3 वर्ष12–15 घंटे
3–5 वर्ष11–13 घंटे
5–12 वर्ष9–11 घंटे
किशोरवय9–10 घंटे
बुजुर्ग समेत वयस्क7–8(+) घंटे
गर्भवती महिलाएं8 (+) घंटे

सोने का कर्ज 

पर्याप्त आराम और नींद नहीं लेने का असर है नींद का कर्ज; ऐसे बड़े कर्ज मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक थकान का कारण बनते हैं।

नींद के कर्ज के परिणामस्वरूप उच्च स्तरीय संज्ञानात्मक कार्य कर पाने की क्षमता में कमी आती है। न्यूरोफिजियोलौजिकल और कार्यात्मक इमेजिंग अध्ययनों ने दिखाया है कि मस्तिष्क के सामने के क्षेत्र विशेष रूप से होमियोस्टेटिक नींद दबाव के लिए प्रतिक्रियाशील हैं।[28]

वैज्ञानिक इस बात पर सहमत नहीं हैं कि कितना नींद का कर्ज जमा होना संभव है; क्या यह किसी व्यक्ति की औसत नींद के हिसाब से जमा होता है या कोई अन्य मानदंड है; न ही हाल के दशकों में औद्योगिक विश्व में वयस्कों में नींद के कर्ज की प्रबलता में कोई उल्लेखनीय बदलाव आया है। यह जरुर हुआ है कि पहले की तुलना में पश्चिमी समाजों के बच्चे कम सो रहे हैं।[29]

आनुवंशिकीसंपादित करें

ऐसा संदेह है कि कब और कितनी देर तक एक व्यक्ति को नींद की जरूरत है, जैसे नींद से संबंधित व्यवहार का एक बड़ा परिमाण, हमारे आनुवंशिकी द्वारा विनियमित होता है। शोधकर्ताओं ने कुछ सबूत की खोज की है जिससे इस धारणा को समर्थन मिलता हुआ लगता है।[30]

प्रकार्यसंपादित करें

नींद के प्रकार्य के बारे में अनेक सिद्धांतों ने अपनी-अपनी व्याख्या प्रस्तावित की है, लेकिन ऐसा प्रतिबिंबित होता है कि विषय के बारे में समझदारी फिलहाल अधूरी है। ऐसा संभव है कि कुछ मौलिक कार्य को पूरा करने के लिए नींद का विकास हुआ और समय के साथ इसने कई काम अपना लिया। (उपमा के तौर पर, सभी स्तनपायियों की कंठनली भोजन और हवा के मार्ग का नियंत्रण करती है, किन्तु मनुष्यों में इनके अलावा बोलने की क्षमता अलग से मिली हो सकती है।)

यह मुद्दा उठाया गया कि अगर नींद आवश्यक नहीं होती, तो यह जानने की अपेक्षा की जाएगी:

  • वो पशु प्रजातियां जो कि कभी सोती नहीं हैं
  • वो प्राणी जिन्हें स्वास्थ्य लाभ के लिए सोने की जरूरत नहीं पडती, जब वे सामान्य से कहीं अधिक समय तक जगे होते हैं
  • वो प्राणी जिन्हें नींद की कमी से कोई गंभीर परिणाम नहीं भुगतने पड़ते

आज तक कोई भी पशु ऐसा नहीं मिला है जो इन मानदंडों को पूरा कर सके। [31]

अनेक में से नींद के कुछ प्रस्तावित कार्य निम्नलिखित हैं।

आरोग्यतासंपादित करें

एक कुच्ची औरत सो रही है।

नींद द्वारा घाव भरने में सहायता मिलते देखा गया है। 2004 में गुमुस्टेकिन एट अल.[32] द्वारा किये गये एक अध्ययन से पता चला कि नींद के अभाव के कारण चूहों के जले को ठीक होने में बाधा आयी।

यह पाया गया है कि नींद की क्षति रोगक्षम (इम्यून) प्रणाली को प्रभावित करती है। 2007 में जागेर एट अल. द्वारा किये गये एक अध्ययन में,[33] चूहों को 24 घंटे तक नींद से वंचित रखा गया। जब एक नियंत्रित समूह के साथ तुलना की गयी तो नींद से वंचित चूहों के रक्त परीक्षण में श्वेत रक्त कण गणना में 20% की कमी पायी गयी, जो कि रोगक्षम प्रणाली में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है। अब यह कहा जाना संभव है कि "नींद की क्षति रोगक्षम कार्य को क्षीण करती है और रोगक्षम नींद में हेरफेर की चुनौती पेश करता है," और यह बताया गया कि स्तनधारी प्राणी जो कि लंबी नींद में अपना समय लगाया करते हैं वे रोगक्षम प्रणाली में निवेश करते हैं, क्योंकि जिन प्रजातियों की लंबी नींद हुआ करती है उनमें अधिक श्वेत रक्त कण हुआ करते हैं।[34]

यह प्रमाणित होना अभी बाकी है कि नींद की अवधि दैहिक विकास को प्रभावित करती है। 2007 में जेनी एट अल.[35] द्वारा एक अध्ययन में 305 बच्चों के विकास, ऊंचाई और वजन को दर्ज किया गया, यह उनके माता-पिता के साथ सहसम्बद्ध होकर किया गया, माता-पिता द्वारा बच्चों के सोने के समय की जानकारी दी जाती रही और यह अध्ययन नौ वर्षों (उम्र 1-10) तक चला. यह पाया गया कि "बच्चों में नींद की अवधि में बदलाव का असर उनके विकास पर होता नहीं लगता है।" यह देखा गया कि नींद-और अधिक विशेष रूप से धीमी गति की नींद (SWS)- वयस्क पुरुषों के हार्मोन स्तरों की वृद्धि को प्रभावित करती है। आठ घंटे की नींद के दौरान, वान काउटर, लेप्रौल्ट और प्लाट[36] ने पाया कि जिन लोगों में SWS का ऊंचा प्रतिशत (औसत 24%) रहा उनमें हार्मोन स्राव की ऊंची संवृद्धि भी रही, जबकि लम प्रतिशत SWS वालों में हार्मोन की निम्न वृद्धि (औसत 9%) रही।

नींद के स्वस्थ्यकारी कार्य के पक्ष में अनेक तर्क है। नींद के दौरान चयापचय चरण सर्जन क्रिया है; नींद के दौरान संवृद्धि हार्मोन (जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है) जैसे सर्जन क्रिया हार्मोन जैसे अधिमान्य ढंग से स्रावित होते हैं। सामान्यतः, प्रजातियों में नींद की अवधि, जानवर के आकार से विपरीत ढंग से संबंधित है और सीधे-सीधे आधारीय चयापचय दर से जुड़ी हुई है। एक बहुत ही उच्च आधारीय चयापचय दर के साथ चूहे रोजाना 14 घंटे तक की नींद लिया करते हैं, जबकि हाथी और जिराफ निम्न आधारीय चयापचय दर के साथ मात्र 3-4 घंटे ही सोते हैं।

वातावरण से ऐन्द्रिक रचना को बंद किये बिना शांति से आराम करने के जरिये ऊर्जा संरक्षण संपन्न किया जा सकता है, जो संभवतः एक खतरनाक स्थिति है। एक मंद नहीं सोने वाला जानवर की शिकारियों से बचे रहने की अधिक संभावना है, जबकि तब भी वह ऊर्जा संरक्षण करता रहता है। सो, नींद, ऊर्जा संरक्षण करने के अलावा अन्य उद्देश्य या उद्देश्यों को पूरा करती लगती है; उदाहरण के लिए, सुप्तावस्था वाले पशु शीतनिद्रा से जगने के बाद सुप्तावस्था की अवधि के दौरान नींद पूरी नहीं होने के कारण फिर से नींद में चले जाते हैं। वे निश्चित रूप से अच्छी तरह से आराम कर चुके होते हैं और शीतनिद्रा के दौरान ऊर्जा संरक्षण भी किया है, लेकिन कुछ अन्य कारण से उन्हें सोने की जरूरत है।[37] जिन चूहों को अनिश्चितकाल तक जगाये रखा जाता है, उनमें त्वचा के जख्म, हायपरफेगिया (अत्यधिक भूख), शरीर पिंड का नुकसान, अल्पताप और अंततः, घातक सैप्टिसीमिया का विकास होता है।[38]

व्यक्तिवृत्तसंपादित करें

REM नींद की ओंटोजेनेटिक (व्यक्तिवृत्त) परिकल्पना के अनुसार, नवजात शिशु संबंधी REM नींद (या सक्रिय नींद) के दौरान होने वाली गतिविधि खासकर शरीर के विकास के लिए महत्वपूर्ण है (मार्क्स एट अल., 1995)। सक्रिय नींद के अभाव के प्रभावों पर किये गये अध्ययनों से पता चला कि जीवन के आरम्भ में इस अभाव से व्यवहार की समस्याएं, स्थायी नींद विघ्न, मस्तिष्क पिंड में कमी (मिर्मिरान एट अल., 1983) और एक असामान्य परिमाण में न्यूरोन कोशिकाओं की मृत्यु (मोरिसे, डंटली एंड एंच, 2004) की समस्याएं पैदा होती हैं।

मस्तिष्क के विकास के लिए REM नींद महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। शिशुओं की नींद के अधिकांश भाग पर REM नींद का ही कब्जा होता है, शिशु अपना अधिक समय नींद में ही गुजारा करते हैं। विभिन्न प्रजातियों में, जन्म लेनेवाला शिशु जितना अधिक अपरिपक्व होता है, वह उतना ही अधिक समय REM नींद में बिताता है। प्रस्तावकों का यह भी कहना है कि मस्तिष्क सक्रियण की उपस्थिति में REM-प्रेरित मांसपेशी अवरोधन से चेतोपागम को सक्रिय करने के जरिये मस्तिष्क विकास में मदद मिलती है, तथापि किसी संचालक परिणाम के बगैर इससे शिशु मुश्किल में पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, REM नींद के अभाव से बाद के जीवन में विकास की असामान्यताएं पैदा होती हैं।

बहरहाल, इसकी व्याख्या नहीं की गयी है कि प्रौढ़ वयस्कों को तब भी क्यों REM नींद की जरूरत पड़ती है। जलीय स्तनपायी शिशु शैशवावस्था में REM नींद नहीं लेते;[39] उम्र बढ़ने के साथ ऐसे पशुओं में REM नींद बढ़ती जाती है।

स्मृति प्रक्रमणसंपादित करें

इन्हें भी देखें: निद्रा और ज्ञाननिद्रा और रचनात्मकता, एवं निद्रा और स्मरण

वैज्ञानिकों ने ऐसे अनेक तरीके बताये हैं जिनमें नींद को स्मृति से संबंधित दिखाया गया है। टर्नर, ड्रमंड, सलामत और ब्राउन द्वारा किये गये एक अध्ययन[40] में नींद के अभाव से कार्यरत स्मृति पर प्रभाव पड़ता दिखाया गया। कार्यरत स्मृति महत्वपूर्ण है क्योंकि यह निर्णय लेने, तर्क-वितर्क करने और प्रासंगिक स्मृति जैसे उच्च स्तरीय संज्ञानात्मक कार्यों के अधिक प्रक्रमण और मदद के लिए सूचनाओं को सक्रिय रखता है। अध्ययन में 18 महिलाओं और 22 पुरुषों को चार दिनों की अवधि में प्रति रात सिर्फ 26 मिनट ही सोने की अनुमति दी गयी। इन व्यक्तियों ने पूरे आराम के बाद शुरुआत में संज्ञानात्मक परीक्षण दिए और फिर चार दिनों में नींद के अभाव के दौरान दिन में दो बार परीक्षण किये गये। अंतिम परीक्षण में, नियंत्रित समूह की तुलना में इस नींद-अभावग्रस्त समूह की औसत कार्यरत स्मृति विस्तार में 38% की गिरावट पायी गयी।

REM और धीमी गति (या तरंग) की नींद (SWS) जैसे नींद के कुछ चरणों द्वारा स्मृति अलग तरह से प्रभावित होती जान पड़ती है। बोर्न, रास्च और गेस में उद्धृत,[41] एक अध्ययन में अनेक मानव विषयों का उपयोग किया गया था: जागरण नियंत्रित समूहों और नींद परीक्षण समूहों का. नींद और जागरण समूहों को एक कार्य सिखाया गया और फिर सभी प्रतिभागियों में संतुलित रूप से रात के क्रम में, रात की शुरुआत और देर रात दोनों ही समय परीक्षण किया गया। जब नींद के दौरान उन प्रतिभागियों के मस्तिष्क को स्कैन किया गया तो हिप्नोग्राम ने पाया कि रात के आरंभ में नींद का चरण SWS हावी रहता है, जो नींद चरण गतिविधि का औसतन 23% के आसपास का प्रतिनिधित्व करता है। नियंत्रित समूह की तुलना में, घोषणात्मक स्मृति परीक्षण में आरंभिक-रात्रि परीक्षण समूह ने 16% बेहतर प्रदर्शन किया। देर-रात्रि नींद के दौरान, लगभग 24% के साथ REM सबसे सक्रिय नींद का चरण बन गया और नियंत्रित समूह की तुलना में प्रक्रियात्मक स्मृति परीक्षण में देर-रात्रि परीक्षण समूह ने 25% बेहतर प्रदर्शन किया। इससे पता चलता है कि देर-रात्रि REM-संपन्न नींद से प्रक्रियात्मक स्मृति को लाभ मिलता है, जबकि आरंभिक-रात्रि SWS-संपन्न नींद से घोषणात्मक स्मृति को लाभ होता है।

दत्ता द्वारा किए गए एक अध्ययन[42] में इन परिणामों का परोक्ष रूप से समर्थन किया गया है। 22 नर चूहों को अध्ययन का पात्र बनाया गया था। एक ऐसे डिब्बे का निर्माण किया गया था जिसमें एक चूहा मजे से एक छोर से दूसरे छोर तक आ-जा सके। डिब्बे की तली इस्पात की जाली से बनायी गयी थी। एक ध्वनि के साथ डिब्बे में एक रोशनी चमकती. पांच सेकंड बाद, बिजली का झटका लगाया जाता. झटका शुरू होते ही चूहा डिब्बे के दूसरे छोर पर चला जाता, तब झटका तुरंत ही समाप्त हो जाता. चूहे भी पांच सेकंड देरी का उपयोग करके डिब्बे के दूसरे छोर जा सकते थे और इस तरह झटके से पूरी तरह बच सकते थे। झटके की अवधि कभी भी पाँच सेकंड से अधिक नहीं रही। आधे चूहों पर इसे 30 बार दुहराया गया। अन्य आधे, नियंत्रण समूह, को उसी परीक्षण में रखा गया, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया पर ध्यान दिए बिना चूहों को झटका दिया गया। प्रत्येक प्रशिक्षण सत्र के बाद, चूहे को पोलिग्राफिक रिकॉर्डिंग के लिए छह घंटे तक एक रिकॉर्डिंग पिंजरे में रखा जाता. यह प्रक्रिया लगातार तीन दिनों तक दुहरायी गयी। इस अध्ययन में पाया गया परीक्षण के बाद नींद कि नींद रिकॉर्डिंग सत्र के दौरान, चूहों ने नियंत्रण परीक्षणों के बाद की तुलना में, अभ्यास परीक्षणों के बाद REM नींद में 25.47% अधिक समय बिताया. ये परीक्षण बोर्न एट अल. अध्ययन के परिणामों का समर्थन करते हैं, इनसे REM नींद और प्रक्रियात्मक ज्ञान के बीच सहसंबंध का एक स्पष्ट संकेत मिलता है।

दत्ता अध्ययन का एक अवलोकन यह है कि परीक्षण के बाद रिकॉर्डिंग सत्र के दौरान नियंत्रण समूह की तुलना में नींद अभ्यास समूह ने SWS में 180% अधिक समय बिताया. इस तथ्य को कुद्रीमोती, बर्न्स और मैकनौटन द्वारा किये गये एक अध्ययन से समर्थन मिला। [43] इस अध्ययन से पता चलता है कि स्थानिक खोज गतिविधि के बाद, प्रयोग में हिप्पोकैम्पल की कोशिकाओं का पैटर्न SWS के दौरान पुनःसक्रिय होता है। कुद्रीमोती एट अल. के एक अध्ययन में, किसी छोर में इनाम का उपयोग करके सात चूहों को एक रेखीय ट्रैक (मार्ग) में दौड़ाया गया। चूहों को ट्रैक में अनुकूल होने के लिए 30 मिनट तक रहने दिया गया (पूर्व), फिर उन्हें इनाम-आधारित प्रशिक्षण के लिए ट्रैक में 30 मिनट तक दौड़ाया गया (दौड़) और फिर उन्हें 30 मिनट तक आराम करने दिया गया। इन तीन प्रत्येक अवधियों के दौरान, चूहों की नींद के चरणों की सूचना के लिएईईजी डेटा एकत्र किये गये। कुद्रीमोती एट अल. ने SWS (पूर्व) के पूर्व-व्यवहार के दौरान हिप्पोकैम्पल की कोशिकाओं की मीन फायरिंग रेट्स (mean firing rates) को और सात चूहों के औसतन 22 ट्रैक -दौड़ द्वारा SWS (बाद का) के उत्तर-व्यवहार में तीन बार रखे दस मिनट के अवकाश को परिकलित किया। नतीजे बताते हैं कि परीक्षण दौड़ सत्र के बाद के दस मिनट में पूर्व स्तर की तुलना में हिप्पोकैम्पल की कोशिकाओं की मीन फायरिंग रेट में 12% की वृद्धि देखी गयी; हालांकि 20 मिनट के बाद, मीन फायरिंग रेट तेजी से पूर्व स्तर पर वापस लौट गयी। स्थानिक अन्वेषण के बाद SWS के दौरान हिप्पोकैम्पल की कोशिकाओं की फायरिंग में वृद्धि से समझा जा सकता है कि आखिर क्यों दत्ता के अध्ययन में SWS नींद का स्तर बढ़ गया था, क्योंकि यह भी स्थानिक अन्वेषण के एक रूप से संबद्ध था।

SWS के दौरान धीमे दोलन के परिमाण को बढाने के लिए पुरोमुखीय वल्कल (prefrontal cortex) में एकदिश धारा उत्तेजन (direct current stimulation) को शामिल करते हुए एक अध्ययन हुआ (मार्शल एट अल., जैसा की वाकर में उद्धृत, 2009)। एकदिश धारा उत्तेजन ने अगले दिन शब्द-जोड़ी स्मरण में बहुत वृद्धि कर दी, इससे यह प्रमाण मिला कि प्रासंगिक स्मृतियों के समेकन में SWS एक बड़ी भूमिका निभाता है।[44]

विभिन्न अध्ययनों का यह कहना हैं कि नींद और स्मृति के जटिल कार्यों के बीच एक सह-संबंध है। हार्वर्ड के नींद शोधकर्ता सपर और स्टिकगोल्ड[45] का कहना है कि स्मृति और अभ्यास का एक आवश्यक हिस्सा तंत्रिका कोशिका द्रुमाश्म (dendrites) से युक्त होता है, जो नए न्यूरोनल संपर्कों में संगठित होने के लिए कोशिका पिंड को सूचना भेजता है। इस प्रक्रिया की मांग है कि कोई बाहरी जानकारी इन द्रुमाश्मों को प्रस्तुत नहीं की जाय और यह भी कहा गया कि संभवतः इसीलिए नींद के समय स्मृतियां और ज्ञान ठोस और व्यवस्थित होती हैं।

परिरक्षणसंपादित करें

"परिरक्षण और संरक्षण" के सिद्धांत का मानना है कि नींद अनुकूलनीय कार्य करती है। दिन के 24 घंटों के उन भागों में जब प्राणी की रक्षा करता है, जब वह जगा होता है और इसीलिए आसपास घूमता रहता है और जब व्यक्ति बड़े जोखिम में होता है।[46] जीव को भोजन करने के लिए 24 घंटे की जरूरत नहीं होती और वह अन्य जरूरतों को पूरा करता है। अनुकूलन के इस दृष्टिकोण से, जीव नुकसान के रास्ते से दूर रहते हैं, जहां वे अन्य संभावित मजबूत जीवों का शिकार बन सकते हैं। वे उसी समय नींद लेते हैं जो उनकी सुरक्षा को अधिकतम बनाता है, उन्हें शारीरिक क्षमता और उनका आवास प्रदान करता है। (एलीसन और सिच्चेट्टी, 1976; वेब्ब, 1982)।

हालांकि, यह सिद्धांत इसकी व्याख्या करने में विफल रहा की आखिर क्यों सामान्य नींद के दौरान बाहरी वातावरण से मस्तिष्क का संबंध टूट जाता है। इस सिद्धांत के खिलाफ एक और तर्क है कि नींद महज वातावरण से पशुओं को अलग करने का एक निष्क्रिय परिणाम नहीं है, बल्कि एक "ड्राइव" है;नींद लेने के क्रम में पशु अपने व्यवहार में तब्दिली लेट है। इसलिए, गतिविधि और निष्क्रियता की अवधि की व्याख्या के लिए सिरकाडियन विनियमन पर्याप्त से अधिक है, जो जीव के लिए अनुकूलनीय है, लेकिन नींद की और भी अधिक अजीब विशिष्टताएं संभवतः अन्य तथा अज्ञात कार्यों को पूरा करती हैं। इसके अलावा, परिरक्षण सिद्धांत को यह व्याख्या करने की जरूरत है कि सिंह जैसे मांसाहारी, जो खाद्य श्रृंखला में सबसे ऊपर हैं और जिन्हें अधिक भय भी नहीं है, क्यों बहुत अधिक सोया करते हैं। यह कहा गया है कि वे जब शिकार पर नहीं होते तब उन्हें ऊर्जा क्षरण को कम करने की जरूरत होती है।

परिरक्षण सिद्धांत इसकी भी व्याख्या नहीं करता है कि जलीय स्तनपायी चलते हुए क्यों सोया करते हैं। इन संवेदनशील घंटों के दौरान निष्क्रियता वही करती है और अधिक लाभप्रद बन जाती है, क्योंकि प्राणी तब भी शिकारियों आदि की तरह की पर्यावरण चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होता है। निद्राहीन रात के दोषपूर्ण अनुकूलन के बाद नींद फिर से पलट कर आती है, लेकिन स्पष्ट रूप से किसी कारण से ही आती है। अपने सोने के समय किसी सिंह से अपनी जान बचाने में लगा हुआ एक जेबरा दिन के समय नींद से निढाल होकर सो जाता है, जो शिकार बनने से कम नहीं, कहीं अधिक असुरक्षित है।

स्वप्नसंपादित करें

नींद के दौरान संवेदी छवियों और ध्वनियों के अनुभव को महसूस करने को सपने देखना कहते हैं, अनुक्रम में आनेवाले सपनों को स्वप्नदर्शी एक पर्यवेक्षक के बजाय एक प्रकट भागीदार की तरह आम तौर पर महसूस किया करता है। सपने देखना पोन्स (मस्तिष्क का संयोजक अंश) द्वारा उत्प्रेरित होता है और नींद के REM चरण के दौरान अधिकांशतः सपने आया करते हैं।

सपने के कार्य के बारे में लोगों ने अनेक अवधारणाएं पेश की हैं। सिगमंड फ्रायड ने निर्विवाद रूप से मान लिया कि सपने उन अपूर्ण इच्छाओं की अभिव्यक्ति हैं जो अचेतन मन में डाल या फेंक दी जाती हैं और उन्होंने इन इच्छाओं की खोज के लिए मनोविश्लेषण के रूप में सपनों की व्याख्या का उपयोग किया। देखें फ्रायड: द इंटरप्रिटेशन ऑफ़ ड्रीम्स

फ्रायड का काम सपनों की मनोवैज्ञानिक भूमिका से संबंधित है, जो स्पष्ट रूप से किसी भी शारीरिक भूमिका के हो सकने को छोड़ नहीं देता. इसलिए हाल के स्मृति और अनुभव के व्यवस्थापन और समेकन में बढ़ती आधुनिक दिलचस्पी द्वारा इससे इंकार नहीं किया गया है। हाल के शोध का दावा है कि अभ्यास और अनुभव के दौरान चेतोपागम संपर्कों के समेकन और व्यवस्थापन की समग्र भूमिका नींद की है।

जॉन एलन हौब्सन और रॉबर्ट मैककार्ले का सक्रियण संश्लेषण सिद्धांतकहता है कि REM अवधि में दिमागी वल्कल में होने वाली न्यूरोन की अंधाधुंध फायरिंग से सपने आया करते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार, अग्रमस्तिष्क तब सामंजस्य स्थापित करने और अतर्कसंगत संवेदी सूचना प्रस्तुत करके अर्थ निकालने के प्रयास में एक कहानी बुनता है; इसीलिए अनेक सपने अजीब प्रकृति के होते हैं।[47]

नींद पर खान-पान का प्रभावसंपादित करें

निद्राजनकसंपादित करें

  • अनिद्रा के रूपों के इलाज के लिए डॉक्टरों द्वारा सुझाये एस्जोपीक्लोन (लुनेस्टा), जालेप्लोन (सोनाटा) और ज़ोल्पीडेम (एम्बिएन) जैसे नॉनबेन्जोडायपाइन हिप्नोटिक्स दवाओं का आम उपयोग होता है। नॉनबेन्जोडायपाइन गोलियां बहुत आम ढंग से नियत की जाती हैं और OTC नींद की गोलियाँ विश्व स्तर पर इस्तेमाल होती रहीं और 1990 के दशक से इनके इस्तेमाल में बहुत वृद्धि हुई है। वे गाबा (GABAA) रिसेप्टर को लक्ष्य करती हैं।
  • बेंजोडायजेपाइन भी गाबा रिसेप्टर को लक्ष्य करती हैं और उसी रूप में, वे आम तौर पर नींद की दवा का भी इस्तेमाल करती हैं, हालांकि पाया गया है कि बेंजोडायजेपाइन REM नींद में कमी लाती है।[48]
  • एंटीहिस्टेमाइंस, जैसे कि डिपेहेनहाइड्रेमाइन (बेनाड्रिल) और डोक्सीलेमाइन (विभिन्न OTC दवाओं में पायी जाती है, जैसे कि नाइकुइल)
  • शराब - अक्सर लोग सोने के लिए शराब पीना शुरू करते हैं (आरंभ में शराब एक शामक है और उनींदापन का कारण है, नींद को प्रोत्साहन देता है)। [49] हालांकि, शराब की लत लग जाने के बाद इससे नींद में विघ्न पड़ती है, क्योंकि देर रात में शराब का उल्टा प्रभाव होता है। परिणामस्वरुप, मद्यपता और अनिद्रा के रूपों को जोड़ने के ठोस सबूत हैं।[50] शराब REM नींद को भी कम कर देती है।[48]
  • बार्बीट्युरेट्स से ऊंघ आया करती है और इसका असर शराब जैसा होता है, इसका भी उल्टा प्रभाव (rebound effect) पड़ता है और इससे REM नींद विघ्नित होती है। सो दीर्घावधि में नींद लाने के लिए इसका उपयोग नहीं किया जाता.[51]
  • मेलाटोनिन एक स्वाभाविक रूप से आनेवाला हार्मोन है जो झपकी को नियंत्रित करता है। यह मस्तिष्क में बनता है, जहां ट्राइप्टोफैन सेरोटोनिन में परिवर्तित होता है और तब मेलाटोनिन में, जो कि रात में शीर्षग्रंथि द्वारा स्रावित होकर नींद लाने और उसे कायम रखने का काम करता है। नींद की दावा के रूप में मेलाटोनिन अनुपूरण का इस्तेमाल किया जा सकता है, हायप्नोटिक और क्रोनोबायोटिक दोनों के रूप में (देखें फेज रेस्पोंस कर्व, पीआरसी)।
  • मध्याह्न विश्राम और "भोजनोपरांत झपकी" - अनेक लोगों में दिन के भोजन के बाद अस्थायी रूप से एक ऊंघ छा जाती है, जिसे आम तौर पर "भोजनोपरांत झपकी" कहते हैं। जब कोई व्यक्ति पेट भर कर खाना खाता है तो उसे नींद आने लगती है, दोपहर के भोजन के बाद आनेवाली झपकी ज्यादातर जैविक घड़ी का प्रभाव होता है। स्वाभाविक रूप से लोगों को दिन में 12 घंटे के अंतर में दो बार नींद आने लगती है (सबसे ज्यादा "जोरों से नींद" आती है)—उदाहरण के लिए पूर्वाह्न 2 बजे और मध्याह्न दो बजे, इन दो समय में शरीर की घड़ी "बज उठती है". मध्याह्न लगभग 2 बजे (14:00), यह समस्थापित बकाया नींद पर हावी हो जाती है, इससे कई घंटों तक जगना पड़ जाता है। पूर्वाह्न लगभग 2 बजे रोजाना की बकाया नींद पूरी होने के साथ यह फिर से कुछ और घंटे की नींद को सुनिश्चित करने के लिए "बज उठती है।"
  • ट्राइप्टोफैन – अमीनो एसिड ट्राइप्टोफैन प्रोटीन के बहुत सारे प्रखंड है। कहते हैं नींद की खुमारी में इन्हीं का योगदान होता है, चूंकि यह न्यरोट्रांसमीटर सेरोटोनिन का पूर्वलक्षण है, नींद को नियत्रित करने में इसकी भूमिका होती है। हालांकि, मामूली आहार से ट्राइप्टोफैन के परिवर्तन का नींद जुड़े होने का कोई ठोस आंकड़ा अभी तक प्राप्त नहीं है।

उत्तेजक पदार्थसंपादित करें

  • एम्फैटैमाइन्स (एम्फ़ैटेमिन (amphetamines), डेक्सट्रोएम्फेटैमाइन्स (dextroamphetamine) मेथम्फैटैमाइन्स (methamphetamine) वगैरह) अक्सर नींद की बीमारी (narcolepsy) तथा एडीएचडी (ADHD) विकार के इलाज के लिए इस्तेमाल होता है और जब इसका इस्तेमाल मौज-मस्ती के लिए होता है तो इसे "रफ्तार" कहा जा सकता है। इनके आम प्रभाव चिंता, अनिद्रा, उत्तेजना, सतर्कता बढ़ाने और भूख की कमी है।
  • कैफीन एक तरह का उत्तेजक पदार्थ है, जिससे मस्तिष्क में हार्मोन्स की सक्रियता की गति को धीमा कर देते है, जिसके कारण उनींदापन, खास तौर पर एडेनोसाइन अभिग्राहक के प्रतिद्वंद्वी के रूप में काम करता है।

प्रभावी खुराक कुछ हद तक पूर्व में उपयोग पर निर्भर करता है। जैसे-जैसे इसका असर खत्म होने लगता है तो यह सतर्कता में एक तेजी का करण हो सकता है।

  • कोकीन और विशुद्ध कोकीन - कोकीन पर हुए अध्ययन में इसके प्रभाव को सर्केडियन रिदम प्रणाली के जरिए दिखाया गया है।[52] हो सकता है इस हाइपरसोमिया (अतिनिद्रा) का हमला "कोकीन से प्रेरित निद्रा विकार" से संबंधित हो। [53]
  • ऊर्जा पेय - ऊर्जा पेय का उत्तेजक प्रभाव कैफीन और शक्कर जैसे उत्तेजक पदार्थों से आता है और वे कैफीन की ही तरह सतर्कता में एकबारगी तेजी से कमी कर देंगे।
  • एमडीएमए (MDMA) समेत एमडीए (MDA), या एमएमडीए (MMDA), एमडीएमए (MDMA) या बीके-एमडीएमए (bk-MDMA) – श्रेणी के मादक पदार्थ एम्पैथोजेन-एनटैक्टोजेन्स कहलाता है, यह उपयोगकर्ताओं को उल्लासोन्माद के साथ जगाये रखता है। सामान्यतः "परमानंद" के रूप में जाना जाता है।
  • मेथेल्फेनिडेट (methylphenidate) – आमतौर पर रिटालिन (Ritalin) और कॉन्सेर्टा (Concerta) ब्रांड के नाम से जाना जाता है, काम में यह एम्फेटामाइन्स और कोकीन के सामान है।

निद्रा से सम्बंधित कठिनाई के कारणसंपादित करें

खराब नींद के कई कारण हैं। निम्नलिखित स्वास्थ्यकर नींद के सिद्धांत शारीरिक या भावनात्मक समस्याओं का हल हो सकते हैं।[54] नींद से संबंधित विकार, जैसे कि स्लीप एपनिया (Sleep Apnoea) या ऊपरी वायुमार्ग प्रतिरोध सिंड्रोम (upper airway resistance syndrome)

कुछ दवाओं, जड़ी-बूटियों, कैफीन, निकोटीन, कोकन, या अत्यधिक शराब के सेवन सहित मनोवैज्ञानिक दवाओं (जैसे उत्तेजक) का उपयोग। किसी कारण से दर्द की शिकायत होना या हृदय रोग होना भी नींद ना आने का कारण हो सकता है। इसके इलावा कुछ और कारण जैसे कि डर, चिंता, तनाव आदि भी नींद ना आने के कुछ मुख्य कारण है।

बुजर्ग व्यक्ति माहौल में गड़बड़ी से आसानी से जग जाते हैं[55] और कुछ हद तक अच्छी नींद लेने की क्षमता खो दे सकते हैं।

निद्रा सहायक के रूप में विभिन्न तरह के पेटेंट, उत्पाद और नींद की तकनीक के रूप में उपलब्ध हैं, जो बेहतर रक्त संचालन और शरीर के दर्द को कम करने के लिए नींद के दौरान स्वाभाविक स्थिति की अनुमति देते हैं। चूंकि मानव इतिहास में खाट या पलंग का आविष्कार अपेक्षाकृत अभी हाल ही में हुआ है,[56] इसलिए इस तरह के तरीके वापस जमीन पर सोने की सलाह देने से लेकर ऐसे उत्पाद जो आपके पांवों से कम्बल को दूर करता हो,[57] से लेकर अनेक प्रकार के "स्मृति फोम" की क्रमबद्धता की और ले जाता है, जो एक व्यक्ति को धरातल के अनुकूल बनाता है।[58]

इसके अलावा सो जाने की कशमकश या नींद आने से रोकने का आग्रह यहां तक कि क्षणभर के लिए "दूसरी प्राथमिकता" को सक्रिय कर सकता है, जो तब अस्थायी रूप से जाने के बाद जरा ‍कठिन हो जा सकता है।

निद्रा का नृविज्ञानसंपादित करें

शोध से पता चलता है कि निद्रा का पैटर्न विभिन्न संस्कृतियों में अलग-अलग तरह का है।[59][60] समाजों में सबसे बड़ा अंतर यह है कि कहीं बड़े पैमाने पर कृत्रिम रोशनी के स्रोत हैं और कहीं नहीं हैं।[59] प्राथमिक अंतर जो नजर आता है वह यह है कि पुरानी संस्कतियों में निद्रा का पैटर्न कहीं अधिक भंगुर रहा है।[59] उदाहरण के लिए, लोगों को हो सकता है सूरज डूबने के तुरंत बाद लोग सो जाएं, इसके बाद पूरी रात भर बार-बार बहुत बार जग जाते हैं, जग-जग कर सोने की रुक-रुक कर चलती रहती है, शायद घंटों यह चलता रहता है।[59] सोने और जागने के बीच की सीमा अन समाजों में अस्पष्ट है।[59] कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन समाजों में नींद एक दु:स्वप्न है जहां नींद दो अवधि के बीच में टूट जाती है, पहला हिस्सा गहरी नींद का होता है और दूसरा हिस्सा REM निद्रा का.[59]

कुछ समाजों में निद्रा का पैटर्न खंडित होता है, जिसमें लोग ‍पूरे दिन भर सोते हैं और रात में थोड़े समय के लिए। बहुत सारे खानाबदोश या शिकारी-फ़रमर समाजों में लोग पूरे दिन या रात भर सोते-जगते रहते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कब क्या कुछ हो रहा है।[59] कम से कम मध्य 19वीं सदी से औद्योगिक पश्चिमी देशों में बड़े पैमाने पर कृत्रिम रोशनी उपलब्ध होने लगी और प्रकाश व्यवस्था की शुरुआत होने से सभी जगह नींद के पैटर्न में उल्लेखनीय बदलाव आया।[59] सामान्य तौर पर, लोग रात के समय सोने जाने के बहुत बाद अत्यंत गहरी नींद में होते हैं, हालांकि हमेशा ऐसा सच नहीं होता है।[59]

कुछ समाजों में, आम तौर पर लोग कम से कम एक अन्य व्यक्ति (कभी कभी कई) के साथ या फिर जानवरों के साथ सोते हैं। कुछ अन्य संस्कृतियों में, लोग सबसे अंतरंग परिजन जैसे कि पति-पत्नी को छोड़कर विरले ही किसी के साथ सोते हैं। लगभग सभी समाजों में, साथ में सोनेवाला साथी सामाजिक नियमों द्वारा नियंत्रित होता है। उदाहरण के लिए, हो सकता है वे केवल सबसे नजदीकी परिवार, विस्तारित परिवार, पति-पत्नी, उनके बच्चे, हर उम्र के बच्चे, हर विशिष्ट लिंग, लिंग विशेष के साथी, मित्र, समान सामाजिक हैसियत के मित्र या फिर किसी के साथ भी नहीं होते हैं। सोना बगैर किसी अड़चन या शोर के सक्रिय सामाजिक समय हो सकता है, सोनेवाले समूह पर यह निर्भर करता है।[59]

लोग अलग-अलग किस्म के स्थानों पर सोते हैं। कोई सीधे जमीन पर सो जाता है, दूसरा कोई किसी चादर या कंबल पर और कुछ लोग तख्ती या खाट पर सोते हैं। कुछ कंबल पर, कुछ तकियों के साथ, कुछ साधारण सिरहाने के साथ और कुछ सिर को बगैर कोई सहारा दिए सोते हैं। ये विकल्प बहुत सारे कारकों के द्वारा मसलन; आबोहवा, हमलावरों से रक्षा के लिए, घर के किस्म, तकनीक और कीड़े-कमौड़े के उत्पात को देखते हुए तय होते हैं।[59]

आर.डी. अग्रवाल ‘प्रेमी’
शरीर जिन पांच तत्वों से बना है, क्रमानुसार वे हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। पृथ्वी तत्व से हमारा भौतिक शरीर बनता है। जिन तत्वों, धातुओं और अधातुओं से पृथ्वी (धरती) बनी उन्हीं से हमारे भौतिक शरीर की भी रचना हुई है। यही कारण है कि आयुर्वेद में शरीर को निरोग और बलशाली बनाने के लिए धातु के भस्मों का प्रयोग किया जाता है।

जल तत्व से मतलब तरलता से है। जितने भी तरल तत्व शरीर में बह रहे हैं वे जल तत्व हैं, चाहे वह पानी हो, खून हो या शरीर में बनने वाले सभी तरह के रस और एंजाइम हों। जल तत्व ही शरीर की ऊर्जा और पोषक तत्वों को पूरे शरीर में पहुचाने का काम करते हैं। इसे आयुर्वेद में कफ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें असंतुलन शरीर को बीमार बना देता है।

अग्नि तत्व ऊर्जा, ऊष्मा, शक्ति और ताप का प्रतीक है। हमारे शरीर में जितनी गर्माहट है, सब अग्नि तत्व से है। यही अग्नि तत्व भोजन को पचाकर शरीर को स्वस्थ रखता है। इसे आयुर्वेद में पित्त के नाम से जाना जाता है। ऊष्मा का स्तर ऊपर या नीचे जाने से शरीर भी बीमार हो जाता है। इसलिए इसका संतुलन जरूरी है।

जिनमें प्राण है, उन सबमें वायु तत्व है। हम सांस के रूप में हवा (ऑक्सीजन) लेते हैं, जिससे हमारा जीवन है। पतंजलि योग में जितने भी प्राण व उपप्राण बताए गए हैं, वे सब वायु तत्व के कारण ही काम कर रहे हैं। आयुर्वेद में इसे वात नाम से जानते हैं।

आकाश तत्व अभौतिक रूप में मन है। जैसे आकाश अनंत है वैसे ही मन की भी कोई सीमा नहीं है। जैसे आकाश अनंत ऊर्जाओं से भरा है, वैसे ही मन की शक्ति की कोई सीमा नहीं है जो दबी या सोयी हुई है। आकाश में कभी बादल, कभी धूल नजर आते हैं तो कभी वह बिल्कुल साफ होता है, वैसे ही मन भी कभी खुशी, कभी उदास तो कभी शांत रहता है। इन पंच तत्वों से ऊपर एक तत्व है आत्मा। इसके होने से ही ये तत्व अपना काम करते हैं। तभी शरीर में ऊर्जा रहती है और वह इन तत्वों को नियंत्रण में रख सकता है।

मनुष्य का शरीर तंत्रिकाओं पर खड़ा है। विभिन्न प्रकार के ऊतकों से मिलकर अंगों का निर्माण हुआ है। शरीरतंत्र में मुख्य चार अवयव हैं- मस्तिष्क, प्रमस्तिष्क, मेरुदंड और तंत्रिकाओं का पुंज। इसके अलावा कई और तंत्र हैं जैसे श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र, ज्ञानेंद्रियां, प्रजनन तंत्र आदि। इन सभी तत्वों को समझ कर हम तत्वों को कुछ प्रयोग के द्वारा संतुलन में कर सकते हैं जिससे हमारे आगे की यात्रा बढ़ सके। जैसे-जैसे हम क्रिया करेंगे उसका अनुभव हमें प्रत्यक्ष मिलेगा। हमारी हाथ की उंगलियों में तत्व संदेश देंगे कि कौन सा तत्व आपके भीतर कम है और कौन सा अधिक है। हम जानते हैं कि हाथ की पांच उंगलियां इन्हीं पांच तत्वों का प्रतिनिधत्व करती हैं। अंगूठा अग्नि का, तर्जनी वायु का, मध्यमा आकाश का, अनामिका पृथ्वी का और कनिष्का जल का प्रधिनिधित्व करती हैं। इन उंगलियों में विद्युत धारा प्रवाहित होती रहती है।

मानव शरीर प्रकृति द्वारा तैयार की गई एक मशीन है जिसके सूक्ष्म संसाधनों व तंत्रों और तत्वों के प्रयोग की सटीक सहज क्रिया के जरिए हम अपनी ऊर्जा को निरंतर गति दे सकते हैं।

विटामिन B12 की कमी से नींद न आने से लेकर पेट साफ न होने तक होती हैं 7 प्रॉब्लम, 88% वेजिटेरियन में इसकी कमी, सर्वे में आया सामने

3 वर्ष पहले

हेल्थ डेस्क। गुजरात के राजकोट में 200 लोगों पर विटामिन B12 को लेकर सर्वे किया गया। इनमें से 176 लोगों में विटामिन B12 की कमी पाई गई। खास बात ये है कि सर्वे में शामिल 88% लोग वेजिटेरियन थे। यानी वेजिटेरियन लोगों की बॉडी में विटामिन B12 नहीं पहुंच पा रहा है।

यह सर्वे इंदौर की डाइटिशियन डॉ. प्रीति शुक्ला ने किया। वे चाइना के हांगकांग में चल रही एशियन फेडरेशन ऑफ डाइटिशियन एसोसिएशन की एनुअल कॉन्फ्रेंस में गुरुवार को विटामिन B12 की कमी को लेकर अपना रिसर्च पेपर प्रेजेंट करने वाली हैं। इसके पहले उन्होंने विटामिन B12 को लेकर dainikbhaskar.com से खास बातचीत की।


क्या होता है विटामिन B12 की कमी से

- हाथ-पैर में झुनझुनी होती है।
- पैरों में दर्द रहता है।
- नींद नहीं आती।
- डाइजेशन सिस्टम खराब हो जाता है। खाना पचता नहीं।
- शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस की प्रॉब्लम हो जाती है।

बॉडी में जाकर क्या करता है B12


- विटामिन B12 ब्लड सेल्स को सपोर्ट करता है। नर्व को हेल्दी रखने के साथ ही डीएनए प्रोडक्शन में मददगार होता है। प्रेग्नेंट महिलाओं को ज्यादा मात्रा में इसकी जरूरत होती है।

- इसकी नॉर्मल रेंज 211 से 911 pg/mL होना चाहिए।
- सर्वे में शामिल 88 परसेंट लोगों में इसकी मात्रा 123 से 124 pg/mL मिली।
- वहीं कुछ लोगों में तो इसकी मात्रा 30pg/mL से भी कम थी।

बहुत कम है तो क्या प्रॉब्लम होती हैं
- नीचे से ऊपर उठते समय चक्कर आने लगते हैं।
- आंखों के आगे अंधेरी छांव आने लगती है।
- नींद बहुत मुश्किल से आती है।
- हाथ-पैर शुन्य हो जाते हैं।

कैसे करें कमी को पूरा
- डॉ. अग्रवाल ने बताया कि, शाकाहारी भोजन लेने लोग भी इसकी कमी को पूरा कर सकते हैं। इस तरह के संकेत आपको दिख रहे हैं तो दही ज्यादा मात्रा में खाएं। दालों में भी यह होता है।

- आप सप्लीमेंट्स के जरिए भी इसकी कमी को पूरा कर सकते

अमानवों में नींदसंपादित करें

जापानी मकाक सो रही है।

कुछ पशुओं में स्नायविक निद्रावस्थाओं का पता लगाना कठिन हो सकता है। इन मामलों में, निद्रा को परिभाषित करने के लिए आचरण विशेषताओं का उपयोग किया जा समकता है; मसलन, कम से कम हिलना-डुलना, प्रजातियों की विशिष्ट मुद्राएं और बाहरी उत्तेजना से प्रतिक्रियाशीलता का काम होना. शीतनिद्रा या कोमा के विपरीत, नींद या निद्रा तेजी से उत्क्रमणीय होता है और नींद की कमी होने के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप लंबी और गहरी नींद आती है। शाकाहारी पशु, जिन्हें अपना आहार इकट्ठा करने या खाने के लिए लंबे समय तक चलने की जरूरत होती है, आमतौर पर प्रतिदिन कम अवधि की नींद लेते हैं, बनिस्पत मांसाहारी पशुओं के, जो कई दिनों तक बैठे-बिठाये मांस की आपूर्ति हो जाने पर अच्छा आहार ग्रहण कर सकते हैं।

घोड़े और इसकी ही तरह खुरवाले अन्य शाकाहारी पशु खड़े-खड़े हो सकते हैं, लेकिन लेकिन आरईएम (REM) निद्रा के लिए (मांसपेशियों में कमजोरी के कारण) अनिवार्य रूप से जरूरी है कि थोडे समय के लिए लेट जाए. उदाहरण के लिए, जिराफ को केवल REM नींद के लिए एक बार में कुछ मिनटों के लिए लेट की जरूरत होती है। चमगादड़ उल्टा लटक कर सोता है। कुछ जलचर स्तनपायी और कुछ पक्षी आधे मस्तिष्क की नींद सो सकते हैं, जबकि उनका आधा मस्तिष्क जगा रहता है, तथाकथित रूप से इसे एक ओर का प्रमस्तिष्कीय गोलार्थ की धीमी गति की निद्रा (unihemispheric slow-wave sleep) कहते है।[61] पक्षियों और स्तनपायियों में गैर REM और REM नींद का चक्र होता है (जैसा कि ऊपर मानव के लिए वर्णित है), हालांकि पक्षियों का चक्र बहुत छोटा होता है और उनके मांसपेशी का टोन (शिथिल हो जाना) एक हद तक खराब नहीं होता, जैसा कि स्तनधारियों का होता है।

बहुत सारे स्तनपायी छोटी उम्र में प्रति 24 घंटे की अवधि में लंबे-लंबे अनुपात के लिए सोते हैं।[62] हालांकि, ‍कीलर व्हेल कुछ डॉल्फिन अपने जीवन के पहले महीने के दौरान नहीं सोती हैं।[63] इन अंतरों की व्याख्या इस तरह से की जा सकती है कि थलचर स्तनपायियों के नवजात जब सोते हैं तब वे अपने माता-पिताओं द्वारा संरक्षित होते हैं, जबकि समुद्रीय जीवों के लिए नन्हीं सी उम्र में भी, अपने शिकारियों से लगातार सतर्क होना जरूरी है।

विटामिन B12 की कमी से नींद न आने से लेकर पेट साफ न होने तक होती हैं 7 प्रॉब्लम, 88% वेजिटेरियन में इसकी कमी, सर्वे में आया सामने

3 वर्ष पहले

आर.डी. अग्रवाल ‘प्रेमी’
शरीर जिन पांच तत्वों से बना है, क्रमानुसार वे हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। पृथ्वी तत्व से हमारा भौतिक शरीर बनता है। जिन तत्वों, धातुओं और अधातुओं से पृथ्वी (धरती) बनी उन्हीं से हमारे भौतिक शरीर की भी रचना हुई है। यही कारण है कि आयुर्वेद में शरीर को निरोग और बलशाली बनाने के लिए धातु के भस्मों का प्रयोग किया जाता है।

जल तत्व से मतलब तरलता से है। जितने भी तरल तत्व शरीर में बह रहे हैं वे जल तत्व हैं, चाहे वह पानी हो, खून हो या शरीर में बनने वाले सभी तरह के रस और एंजाइम हों। जल तत्व ही शरीर की ऊर्जा और पोषक तत्वों को पूरे शरीर में पहुचाने का काम करते हैं। इसे आयुर्वेद में कफ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें असंतुलन शरीर को बीमार बना देता है।

अग्नि तत्व ऊर्जा, ऊष्मा, शक्ति और ताप का प्रतीक है। हमारे शरीर में जितनी गर्माहट है, सब अग्नि तत्व से है। यही अग्नि तत्व भोजन को पचाकर शरीर को स्वस्थ रखता है। इसे आयुर्वेद में पित्त के नाम से जाना जाता है। ऊष्मा का स्तर ऊपर या नीचे जाने से शरीर भी बीमार हो जाता है। इसलिए इसका संतुलन जरूरी है।

जिनमें प्राण है, उन सबमें वायु तत्व है। हम सांस के रूप में हवा (ऑक्सीजन) लेते हैं, जिससे हमारा जीवन है। पतंजलि योग में जितने भी प्राण व उपप्राण बताए गए हैं, वे सब वायु तत्व के कारण ही काम कर रहे हैं। आयुर्वेद में इसे वात नाम से जानते हैं।

आकाश तत्व अभौतिक रूप में मन है। जैसे आकाश अनंत है वैसे ही मन की भी कोई सीमा नहीं है। जैसे आकाश अनंत ऊर्जाओं से भरा है, वैसे ही मन की शक्ति की कोई सीमा नहीं है जो दबी या सोयी हुई है। आकाश में कभी बादल, कभी धूल नजर आते हैं तो कभी वह बिल्कुल साफ होता है, वैसे ही मन भी कभी खुशी, कभी उदास तो कभी शांत रहता है। इन पंच तत्वों से ऊपर एक तत्व है आत्मा। इसके होने से ही ये तत्व अपना काम करते हैं। तभी शरीर में ऊर्जा रहती है और वह इन तत्वों को नियंत्रण में रख सकता है।

मनुष्य का शरीर तंत्रिकाओं पर खड़ा है। विभिन्न प्रकार के ऊतकों से मिलकर अंगों का निर्माण हुआ है। शरीरतंत्र में मुख्य चार अवयव हैं- मस्तिष्क, प्रमस्तिष्क, मेरुदंड और तंत्रिकाओं का पुंज। इसके अलावा कई और तंत्र हैं जैसे श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र, ज्ञानेंद्रियां, प्रजनन तंत्र आदि। इन सभी तत्वों को समझ कर हम तत्वों को कुछ प्रयोग के द्वारा संतुलन में कर सकते हैं जिससे हमारे आगे की यात्रा बढ़ सके। जैसे-जैसे हम क्रिया करेंगे उसका अनुभव हमें प्रत्यक्ष मिलेगा। हमारी हाथ की उंगलियों में तत्व संदेश देंगे कि कौन सा तत्व आपके भीतर कम है और कौन सा अधिक है। हम जानते हैं कि हाथ की पांच उंगलियां इन्हीं पांच तत्वों का प्रतिनिधत्व करती हैं। अंगूठा अग्नि का, तर्जनी वायु का, मध्यमा आकाश का, अनामिका पृथ्वी का और कनिष्का जल का प्रधिनिधित्व करती हैं। इन उंगलियों में विद्युत धारा प्रवाहित होती रहती है।

मानव शरीर प्रकृति द्वारा तैयार की गई एक मशीन है जिसके सूक्ष्म संसाधनों व तंत्रों और तत्वों के प्रयोग की सटीक सहज क्रिया के जरिए हम अपनी ऊर्जा को निरंतर गति दे सकते हैं।

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