नवदुर्गा स्वरूप 03. तृतीय चंद्रघंटा

नवदुर्गा स्वरूप 03. चंद्रघंटा
मांँ दुर्गा की नौ शक्तियों में तीसरा स्वरूप चंद्रघंटा है। तीसरे नवरात्रि अर्थाात तृतीया को माता चंद्रघंटा का पूजन किया जाता है। 

दस हाथों में अस्त्र शस्त्र रखेे, रखें धनुष बाण।
घंटे की ध्वनि से हरती मां चंद्रघंटा दुष्ट के प्राण।।

मांँ का यह स्वरूप सबकेेेेेेेे लिए शांति दायक तथा कल्यााणकारी हैै। इनके माथे पर घंटे के आकार का चंद्रमा बिराजता है। इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। कुछ भक्त इसका अर्थ इस प्रकार लगाते हैं कि 'चंद्रघंटाया यस्य सा' आ अर्थात जिसके घंटे में आलस्य युक्त चंद्रमा का वास है। वही चंद्रघंटा कहलाती हैैं।

इनके तीन नेत्र तथा दस हाथ हैं । जो खड्ग, बाण त्रिशूल, धनुष, गदा आदि दस प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से सुशोभित हैं। इन का शरीर स्वर्ण के समान उज्जवल है। इनका वाहन सिंह है। यह देवी उग्र रूप है तथा युद्ध के लिए उद्यत रहने वाली हैं । भक्तों को अभयदान देने वाली यह देवी अपने घंटे की प्रचंड ध्वनि से दानवों , अत्याचारियों,  दैत्यों व राक्षसों का नाश कर डालती हैं। इनके घंटे की ध्वनि भक्तों की प्रेत बाधा आदि से सदा रक्षा करती हैं । दुष्ट-दमनकारी व विनाशक रूप के बाद भी यह देवी साधक के लिए अत्यंत सौम्य एवं शांत रहती हैं।

नवरात्रों की तीसरे दिन की पूजा का भी अत्यधिक महत्व है। इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है । कहा जाता है कि इस अवस्था में साधक को दिव्य ध्वनियां सुनाई देने लगती हैं तथा उसे दिव्य सुगंध का एहसास होने लगता है। इस अवस्था में साधक को अत्यंत सावधान रहना चाहिए । साधक को चाहिए कि मन, वचन, कर्म तथा काया से पूर्णत: शुद्ध होकर माता की साधना में रत रहे। ये साधक को सहज ही परम पद का अधिकारी बना देती हैं। इनका ध्यान इहलोक ही नहीं परलोक में भी सदा सद्गति देने वाला है।

मांँ चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएं नष्ट हो जाती हैं । इनकी आराधना सदा सद्य फलदाई है। यह शीघ्र ही भक्तों के कष्टों का निवारण कर देती हैं। इनका उपासक इनके वाहन सिंह की तरह पराक्रमी वीर और निर्भय हो जाता है। इनकी उपासना से उपासक में सौम्यता तथा नम्रता का विकास होता है। शरीर कांतिमान हो जाता है। उनमें अद्भुत माधुर्य समा जाता है। इनके साधक जहां भी जाते हैं, लोग उन्हें देखकर शांति व सुख का अनुभव करते हैं । इनके शरीर से अदृश्य दिव्य प्रकाश विकृत होता रहता है। संपर्क में आने वाले लोग इसका प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए प्रसन्नता महसूस करते हैं। देवी चंद्रघंटा का मंत्र *ॐ ऐं ह्वीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ शैलपुत्री देवयै नमः।* है। 

मांँ चंद्रघंटा का भोग

मांँ चंद्रघंटा की पूजा में अक्षत, पुष्प,‌ गंध, सिंदूर और धूप अवश्य अर्पित करनी चाहिए। ‌इसके साथ मां चंद्रघंटा को चमेली का पुष्प या लाल फूल भी अर्पित करना चाहिए। भोग के दौरान देवी चंद्रघंटा को दूध से बनी मिठाई अर्पित करें।

मां चंद्रघंटा की कथा

बहुत समय पहले जब असुरों का आतंक बढ़ गया था, तब दैत्यों का राजा महिषासुर ने देवताओं के राजा इंद्र से उनका सिंहासन व स्वर्ग छीन लिया। वह अन्य अन्य देवताओं के भोग भाग भी स्वयं ही ग्रहण करने लगा। सभी देव अपनी परेशानी लेकर त्रिदेवों के पास गए।

देवताओं की बात सुनकर तीनों देव बहुत क्रोधित हुए तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के शरीर से  एक तेज उत्पन्न होने लगा तब अन्यान्य देवताओं ने भी उसी तेज में अपने तेज को भी समाहित करा दिया। इस समग्र तेज ने तब एक देवी का रूप लिया।

इस देवी को भगवान शिव ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र, सूर्य देव ने तेज और तलवार, और बाकी देवताओं ने भी अपने-अपने अस्त्र और शस्त्र दिए। इस देवी का नाम चंद्रघंटा रखा गया।

इस प्रकार दैत्यों को सबक सिखाने के लिए मां दुर्गा ने अपने चंद्रघंटा नामक तीसरे स्वरूप में अवतार लिया और महिषासुर का संहार कर दिया था।


मंत्र
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

कवच

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

माँ चंद्रघंटा बीज मंत्र:-

ऐं श्रीं शक्तयै नम:

माँ चंद्रघंटा के बीज मंत्र की एक माला अर्थात 108 बार जाप करे। माँ के बीज मंत्रो का जाप करने से आपकी समस्त पारिवारिक समस्या का निस्तारण जल्द से जल्द होगा।

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