नवदुर्गा स्वरूप 02. ब्रह्मचारिणी
मांँ दुर्गा की नौ शक्तियों में दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी है। दूसरे नवरात्रि अर्थात द्वितीया को माता ब्रह्मचारिणी का पूजन किया जाता है। ब्रह्म शब्द के कई अर्थ हैं यहां 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ 'तपस्या' से तथा 'चारणी' का अर्थ 'तप का आचरण करने वाली' से लगाया जाता है। इस प्रकार 'तपस्चारणी' अर्थात 'तप का आचरण करने वाली देवी' ही ब्रह्मचारिणी है।
इनका स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। देवी ब्रह्मचारिणी को ब्रह्मज्ञान (ब्रह्म का ज्ञान) कराने वाली देवी भी कहा गया है। इन के दाहिने हाथ में जप माला एवं बाएं हाथ में कमंडल है। अपने पूर्व जन्म में यह हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थी। तब इन्होंने भगवान शंकर जी को प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। इसी कारण इन्हें तपस्चारणी अर्थात ब्रह्मचारिणी कहा गया। उन्होंने एक हजार वर्ष तक केवल फल खाकर, सौ वर्ष तक केवल शाक पर निर्भर रहकर, खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के विकट कष्ट सहे। इसके बाद केवल जमीन पर टूट कर गिरे बेल पत्रों को खाकर हजारों वर्ष तक भगवान शंकर की आराधना की। पत्तों को भी छोड़ देने के कारण उनका नाम अपर्णा पड़ा।
वे खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप सहकर कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार व्रत करती रही। इस कठिन तपस्या से देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। उनकी माता मैना से देवी की यह दशा देखी न गई और उन्होंने अत्यंत दुखी होकर देवी को तपस्या से व्रत करने के लिए आवाज दी 'उमा' अरे नहीं। तब से देवी का एक और नाम उमा पड़ गया था । उनकी कठिन तपस्या से तीनों लोगों में हाहाकार मच गया। देवताा, ऋषि, सिद्ध, मुनि सभी देवी की तपस्या की सराहना करने लगे । बृृृृह्मा जी ने आकाशवाणी की द्वारा कहां, 'हे देवी ! तुम्हारी मनोकामना सर्वतो भावेन पूर्ण होगी। भगवान चंद्र मौली शिव तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगें । अब तुम अपनी तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ ।
मांँ दुर्गा का यह स्वरुप भक्तों को अत्यंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार व संयम की वृद्धि होने लगती है। उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। देवी ब्रम्हचारिणी का मंत्र है *ॐ ऐं ह्वीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ शैलपुत्री देवयै नमः।* है।
इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में अवस्थित हो जाता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता । मांँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है।।
मांँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए मांँ ब्रह्मचारिणी का मंत्र कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए।
मंत्र:
या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ:
हे मांँ ! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।
ध्यान मंत्र:
वन्दे वांच्छितलाभायचन्द्रर्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलुधराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णास्वाधिष्ठानास्थितांद्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
धवल परिधानांब्रह्मरूपांपुष्पालंकारभूषिताम्॥
पद्मवंदनापल्लवाराधराकातंकपोलांपीन पयोधराम्।
कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीनिम्न नाभि नितम्बनीम्॥
स्तोत्र मंत्र:
तपश्चारिणीत्वंहितापत्रयनिवारिणीम्।
ब्रह्मरूपधराब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
नवचक्रभेदनी त्वंहिनवऐश्वर्यप्रदायनीम्।
धनदासुखदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रियात्वंहिभुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदामानदा,ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्।
कवच मंत्र:
त्रिपुरा में हृदयेपातुललाटेपातुशंकरभामिनी।
अर्पणासदापातुनेत्रोअर्धरोचकपोलो॥
पंचदशीकण्ठेपातुमध्यदेशेपातुमहेश्वरी॥
षोडशीसदापातुनाभोगृहोचपादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातुब्रह्मचारिणी॥
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