नवदुर्गा 01. प्रथम शैलपुत्री

प्रथम शैलपुत्री 

देवी की पूजा के लिए आवाहन, स्थापन और विसर्जन ये तीनों आज प्रात:काल ही करने चाहिए। 

पहले दिन ही किसी एकान्त और पवित्र स्थान पर मृत्तिका से वेदी बनाकर उसमें जौ गेंहू बोयें। उस पर कलश स्थापित करें। कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके युग्म पार्श्व में त्रिशूल बनायें। कलश पर मूर्ति की स्थापना करें। मूर्ति किसी भी धातु या मिट्टी की हो सकती है। 

मंत्र:

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्‌।वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

मंत्र का अर्थ

देवी वृषभ पर विराजित हैं। शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा है। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री का पूजन करना चाहिए।

मां दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री है । नवदुर्गा में सबसे पहले अर्थात पहले ही दिन मां शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। नवदुर्गा में प्रथम शैलपुत्री का महत्व और शक्तियां अनन्त हैै। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' अर्थात 'पर्वत पुत्री' पड़ा। भगवती का वाहन 'वृषभ' अर्थात 'बैल' है। इसलिए इन्हें 'वृषभारूढ़ाा' के नाम से भी जाना जाता हैै। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है । 

इस जन्म में भी देवी शैलपुत्री भगवान शिव जी की ही अर्धांगिनी बनी थी, कहा जाता है कि पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थी। तब इनका नाम सती था और इनका विवाह भगवान शंकरजी से ही हुआ था।

एक बार राजा दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें समस्त देवों को आमंत्रित किया गया परंतु उन्होंने भगवान शिव तथा सती को आमंत्रित नहीं किया। सती मन ही मन पिता का यज्ञ देखने व माता और बहनों से मिलने के लिए उत्सुक होने लगी। भगवान शिव ने उन्हें बहुत समझाया फिर सारी बातें विचार कर भगवान शिव ने कहा, 'देवी! प्रजापति दक्ष किसी कारण हमसे रूष्ट हैं। इसी कारण इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं को बुलाया है और उनके यज्ञ भाग भी उनको अर्पित किए हैं, परंतु उन्होंने जानबूझकर हमें यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी भी प्रकार ठीक नहीं है।' परंतु सती पर उनके इस उपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ा यज्ञ में जाने व बहनों से मिलने की व्यग्रता कम होने की स्थान पर और बढ़ गई। जब भगवान शिव ने उनकी उत्सुकता व आग्रह देखा तो उन्होंने, उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी।

जब सती वहां पहुंची तो उन्होंने तिरस्कार ही मिला। वहां पर उनसे आदर के साथ बात करने के स्थान पर सब मुंह फेर रहे थे। बहने व्यंग और उपहास भरे शब्द बोलती थी। केवल माता ने ही उन्हें गले लगाया । जब दक्ष ने सती को देखा तो दक्ष ने भगवान शंकर के प्रति कटु वचन कहे। यज्ञ स्थल पर भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव देखकर तथा पिता से अपने पति के प्रति अपमानजनक वचन सुनकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से भर उठा। वे अपने पति भगवान शंकर का अपमान सह न सकीं। देवी बोली, 'अरे मूढ ! यह शरीर तुम से ही प्राप्त हुआ है इसलिए मैं इसे अभी त्याग दी हूं ।' यह कहकर उन्होंने उसी समय अपने शरीर की हवन कुंड में आहुति दे दी। लेकिन अग्निदेव ने उन्हें जलाने से मना कर दिया तब उन्होंने स्वयं को योगाग्नि में भस्म कर दिया।

वज्रपात के समान दुखद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध होकर अपने गुणों को भेजकर दक्ष का यज्ञ विध्वंस करा दिया।

इसके उपरांत शैलराज या पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री अर्थात पर्वत पुत्री पड़ा था। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण ही इन्हें 'पार्वती' भी कहा जाता है। इनका एक नाम हेमवती भी है। उपनिषदों की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हेमवती स्वरूप से देवताओं के गर्व का भजन किया था, इसलिए इनका नाम हेमवती हुआ।


नवरात्र पूजन में प्रथम दिन की पूजा और उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करके योग साधना आरंभ करते हैं। शैलपुत्री के पूजन करने से मूलाधार चक्र जागृत हो जाता है। मूलाधार चक्र के जाग्रत होने से अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। 

देवी शैलपुत्री का पुत्री का मंत्र है *ॐ ऐं ह्वीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ शैलपुत्री देवयै नमः।* ।

देवी शैलपुत्री के ध्यान, कवच और मंत्र

ध्यान

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।

वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥

पूर्णेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥

पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।

कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥



स्तोत्र पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।

धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥

त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।

सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।

मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥


कवच

ओमकार: में शिर: पातु मूलाधार निवासिनी।

ह्रींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥

श्रींकार पातु वदने लावाण्या महेश्वरी ।

हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।

फट्कार पात सर्वांगे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥


नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री का ध्यान करके उन्हें सफेद वस्तुओं का भोग लगाएं। कहा जाता है कि यदि मां को भोग लगाने वाली चीजें गाय के घी में बनी हो तो व्यक्ति को रोगों से मुक्ति मिलती है।


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