नवरात्र रहस्य
ऊँ जितेन्द्र सिंह तोमर
ISBN –
विनजीत पब्लिशर्स एण्ड प्रिटर्स
ए० – 136, वैस्ट विनोद नगर
दिल्ली – 110092
वैबसाईटः-
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संस्करण 2018 (September)
आवरण
शब्द संयोजन
मुद्रक
मूल्य 100/-
समर्पण
तेरे मार्ग पर पैर रख तो दिया।
मेरे लिए कोई एक द्वार खोले तो मानूं।
तेरे लिए कडवे वचन सुनने लगा।
मुझ पर मधुर वचन बरसाए तो मानूं।
तेरी तरफ आना शुरू कर तो दिया।
मेरा भी ध्यान रखकर दिखाए तो जानूं।
तेरी चर्चा लोगों से मैं करने लगा।
मुझे अपने बारे में बताए तो मानूं।
तेरे चरित्र का मनन मैं करने लगा।
अपना ज्ञान मुझ में भरकर दिखाए तो मानूं।
तुझे अपना सहायक बना तो लिया।
मुझे सबकी बुराई से बचाए तो जानूं।
तेरे लिए दुख में उठाने तो लगा।
मेरे जीवन में आनन्द सागर बहाए तो मानूं।
तेरे लिए कुछ बनने अब चला।
मुझे कीमती बनाए तो मानूं।
तेरे मार्ग पर निकलकर तो देख लिया।
मुझे भी अपने जैसा बनाए तो जानूं।
तेरे लिए व्यय करना शुरू कर दिया।
कुबेर के भंडार मेरी ओर उडेले तो मानूं।
स्वयं को तुझपर नौछावर कर तो दिया।
मुझे अब जगत प्रसिद्व बनाए तो मानूं।
तेरा कीर्तन अब मैं करने लगा हूँ।
अब कोई तुम्हारा विस्मरण कराए तो मानूं।
मैने तेरा बनकर तो दिखा दिया।
तू मेरा अपना बनकर दिखाए तो जानूं।
ऊँ जितेन्द्र सिंह तोमर ने तो तुझे अपना बनाकर दिखा दिया
तू ऊँ जितेन्द्र सिंह तोमर को अपनाकर दिखाए तो जानूं।
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क्रम संख्याा |
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नवरात्र पूजा मातृ शक्ति पूजा का रूप है। जो हमें मातृ शक्ति का सम्मान करने की प्रेरणा देता है। आदि माता अम्बिका जी ने अपनी ब्रह्माणी शक्ति महासरस्वती, वैश्णवी शक्ति महालक्ष्मी तथा शैव शक्ति रूद्राणी क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सोंपकर इनका सम्मान करते हुए सृष्टि को रचने, पालन करने व संहार करने का कार्य इन तीनों देवों को सोंपा था।
प्राचीन काल में दो ही नवरात्रों का प्रचलन था वासन्तिक नवरात्र तथा शरदीय नवरात्र। इन दोनों ऋतुओं (वसंत व शरद) को यम दृष्टा बताया गया है क्योंकि इस समय लोग अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित होकर अपने प्राणों से हाथ धो बैठते थे। इसलिए ब्रह्मचर्य तथा उपवास दोनों की शक्ति के द्वारा शरीर को पुष्ट व बलिष्ठ बनाने (या रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने) का साधन बना दिया गया। इस श्लोक में वेद व्यास जी महाराज जनमेजय को भी नवरात्र के बारे में बताते हैं कि
द्वावेव सुमाहाघोरावृतू रोग करो नृणाम् वसन्त शरदावेव सर्वनाशकरावुभो नवरत्रेशु सर्वेषु चक्रः सर्वेविधानतः अर्चनं हवनं यागं देत्य भक्ति परा जनः।।
एक अन्य स्थान पर वर्णन आता है कि पहले देवता भी मरणधर्मा थे। प्रजापति ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार देवताओं ने भगवती की विधिवत नवरात्र पूजन व साधना की और उन्होनें मृत्यु को जीत लिया। नवरात्रेण देवा अमरत्वं प्रायच्छत। इस प्रकार देवताओं ने मृत्यु से मुक्ति (अमरता) प्राप्त की तथा स्वर्ग पर निष्कंंटक राज्य करने लगे।
संपादक
विनीता
इस पुस्तक को लिखते वक्त हमारा प्रयास रहा है कि हम आपको नवरात्र के बारे में पूर्ण, प्रमाणिक तथा विश्वनीय जानकारी दे ताकि आप उसका उपयोग करके अपने जीवन को सफल बना सकें। इस पुस्तक को लिखने के लिए हमने अनेकों महापुरूषों, विद्यवतजनों, भक्तजनों तथा पुराग्रंथों की सहायता ली है। इनके द्वारा प्राप्त जानकरियों का उपयोग करके हमने इस पुस्तक की प्रमाणिकता को अक्षुण बनाने का प्रयास किया है। सभी मातृ भक्तों को सलाह दी जाती है कि वे नवरात्र पूजन से पहले इस पुस्तक को दो या तीन बार पढ़ लें। इससे आप पूजन के नियमों से भलीभाँति परिचित हो जायेंगें।
सभी सावधानियों को अपनाने के उपरांत भी इस पुस्तक में कुछ त्रुटियां संभव है। इस संबंध में हमारा आपसे अनुरोध है कि इन त्रुटियों को दूर करने के लिए हमारा मार्ग दर्शन करें। यदि आपके पास नवरात्रों से संबंधित जानकारियों के अकाट्य स्रोत है। तो उन जानकारियों को पूर्ण प्रमाण या स्रोतों की फोटो कापी या सही सूचना सहित हमें भेजें ताकि धर्म में अस्था रखने वाले अन्य विद्ववान भी इससे लाभ प्राप्त कर सकें।
हमे विश्वास है कि इस पुस्तक में दी गई जानकारी से आपके नवरात्र संबंधी लगभग सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगें और नवरात्र से जुड़ी सभी शंकाऐं दूर हो जयेंगीं, फिर भी किसी बात को लेकर आपके मन में कोई भ्रम या कोई प्रश्न अब भी शेष रह गया हो तो हमारा आपसे अनुरोध है कि हमें उससे अवगत कराने का प्रयास करें। हम आपके प्रश्नों व शंकाओं को हल करने का प्रयास करेंगें। यदि आपके पास इस पुस्तक को और अधिक सुंदर तथा बहुउपयोगी बनाने के लिए कोई सुझाव है तो वह भी सादर आमंत्रित है। इसके लिए आप सीधे हमारे कार्यलय से पत्र व्यवहार द्वारा या फोन द्वारा संपर्क कर सकते हैं। यदि माता जी की कृपादृष्टि बनी रही तो शीध्र ही इस पुस्तक का चित्रयुक्त संस्करण भी आपके सामने उपलब्ध होगा।
लेखक
ऊँ जितेन्द्र सिंह तोमर
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सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्यै त्रयंबकै गौरी नारायणी नमोस्तुते।।
पुराग्रथों में एक स्थान पर वर्णन मिलता है कि स्वयं देवी ने भगवान शंकर से कहा कि जो भक्त नवरात्र पूजन भक्तिपूर्वक करते हैं। उनकों प्रसन्न होकर मैं उसे धन, धान्य, पुत्र, आरोग्य व उन्नति प्रदान करती हूँ। अतः माता के इस वचन को सत्य मानकर हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आप कम से कम एक नवरात्र में माताजी का पूजन अवश्य करें। माताजी अपनी आराधना से प्रसन्न होकर हमारे जीवन में आने वाली भूत-प्रेत व ग्रहादि की बाधाओं तक को दूर कर देती हैं। अतः माता का पूजन जीवन को खुशहाल बनाता है।
सृष्टि का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था। इस कारण यह प्रथम तिथि मानी जाती है। इसे सर्वश्रेष्ठ तिथि ‘प्रवरा’ भी कहा जाता है कि भारतीय काल गणना में ब्रह्मा जी ने इस ब्रह्माण्ड़ की सृष्टि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्रारम्भ की थी।
चैत्रमासे जगदब्रह्मा ससर्ग प्रथम हनि।
शुक्ल पक्षे समग्रेतु सदा सूर्योदय सति।।
एक अन्य स्थान पर वर्णन मिलता है कि करोड़ों यज्ञों तथा कोटि नामजपों से जो फल मिलता है वह समस्त फल मेरी इस वार्षिक पूजा करने से असानी से प्राप्त हो जाता है।
अश्वमेघादियज्ञानां कोटिनामापियत्फलम्।
तत्फलम् समवाप्नेति कृत्वाचार्यां वार्षिकीमिमाम्।।
मेघामुनि राजा सुरथ को देवि के बारे में बताते हैं कि
‘ज्ञानिनामापि चेतांसि देव भगवति हिसा।
बलादा कृष्यमोहाय महामाया प्रयच्छति।।
अर्थात वे महामाया हैं जो इतनी बलवान हैं कि ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहपाश में फँसा देती हैं।
चैस्तुभक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षते तान्नं संशयः।।
अर्थात जिन्होने देवी का तनिक भी स्मरण किया है। उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेशवरि ! जो लोग तुम्हारा चिंतन करते हैं। तुम निसंदेह उनकी रक्षा करती हो।
नवरात्र परिचयः - भारतवर्ष में नवरात्र का त्योहार सामान्यतया वर्ष में चार बार आता है। इस अवसर पर घरों में अनेक स्थानों पर कलश स्थापना की जाती और दुर्गा सप्तशती पाठ आदि के आयोजन किए जाते हैं। इस काल के दो नवरात्र तो जगत प्रसिद्ध हैं। जबकि दो कम प्रसिद्ध। इन कम प्रचलित नवरात्रों को ‘गुप्त नवरात्र’ कहते हैं। ये चारों नवरात्र इस प्रकार हैं -
क) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल नवमी तक
ख) आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से आषाढ़ शुक्ल नवमी तक
ग) अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से अश्विन शुक्ल नवमी तक
घ) माघ शुक्ल प्रतिपदा से माघ शुक्ल नवमी तक
इनमें से (क) तथा (ग) के नाम तो प्रचलित हैं या ये नवरात्र सर्वविदित हैं जबकि (ख) तथा (घ) कम प्रचलित होने के कारण ‘गुप्त नवरात्र’ कहे जाते हैं। इन नवरात्रों के कुछ और नाम भी प्रचलित हैं। जो इस सारणी से जाने जा सकते हैं।
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| क) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल नवमी तक | ग) अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से अश्विन शुक्ल नवमी तक | ख) आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से आषाढ़ शुक्ल नवमी तक | घ) माघ शुक्ल प्रतिपदा से माघ शुक्ल नवमी तक |
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वासंतिक नवरात्र |
शरदीय नवरात्र |
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वासंतिक नवरात्र : - चैत्र शक्ल प्रतिपदा से चैत्र शक्ल नवमी तक के नवरात्रों को ‘वासंतिक नवरात्र’ के रूप में जाना जाता है क्योंकि इनका आगमन वसंत ऋतु में होता है। हिन्दु नववर्ष का प्रारम्भ इन्ही नवरात्रों से माना जाता है। वर्ष में सर्वप्रथम पड़ने के कारण इन्हे हम ‘प्रथम नवरात्र’ भी कह सकते हैं। इन वासंतिक नवरात्रों को पूरे भारत में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
शरदीय नवरात्र : - अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से अश्विन शुक्ल नवमी तक के नवरात्रों को ‘शरदीय नवरात्र’ के रूप में पूरे भारतवर्ष में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। वासंतिक नवरात्रों के समान ही चूंकि ये नवरात्र शरद ऋतु में आते हैं। इसलिए इन नवरात्रों को शरदीय नवरात्र के नाम से जाना जाता है। ये क्रम में तृतीय नवरात्र हैं।
गुप्त नवरात्र : - आषाढ़ शक्ल प्रतिपदा से आषाढ़ शक्ल नवमी तथा माघ शक्ल प्रतिपदा से माघ नवमी तक के नवरात्र को ‘गुप्त नवरात्र’ के रूप में जाना जाता है। इन्हे गुप्त नवरात्र कहने का प्रमुख करण है कि ये कम प्रचलित हैं तथा इन्हें कम ही लोग जानते हैं। विद्ववानों का कहना हैं कि सिद्धी के लिए ये नवरात्र भी किसी रामबाण से कम नहीं है। अपना भला चाहने वालों को इन नवरात्रों में देवी पूजन का सौभाग्य प्राप्त होता है। अतः इन नवरात्रों में भी देवी पूजा उतनी ही लाभ दायक है जितनी की प्रचलित नवरात्रों में।
इन चारों नवरात्रों में माँ भगवती के नौ प्रमुख रूपों की एक-एक कर प्रत्येक दिन अर्थात प्रत्येक तिथि पर विशिष्ट पूजा की जाती है। वैसे तो चारों नवरात्रों का अपना-अपना महत्व है। चैत्र मास के वासंतिक नवरात्र तथा अश्विन मास के शरदीय नवरात्र का अपना ही विशेष महत्व है। इनमें भी अश्विन मास के शरदीय नवरात्रों का महत्व सबसे अधिक माना जाता है। इसी कारण ऋशियों ने शरदीय नवरात्रों को शीघ्र फल देने वाला बताया है अतः शरदीय नवरात्र शीघ्र एवं शुभ फल प्रदान करने वाले हैं।
ऋषियों के अनुसार यह समय शीत और ताप को संतुलित करने का है। वसंत में शीत धीरे-धीरे कम होती जाती है तथा ताप धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। इसके विपरीत शरद ऋतु ताप धीरे-धीरे कम करके शरीर में शीत को भरने लगता है। वास्तव में समझें तो ये दिन ताप साम्यता के प्रतीक हैं। इन दिनों में रखे गए उपवास से शरीर शुद्ध होकर शरीर के ताप को सामन्य बनाए रखने में सक्ष्म हो जाता है। आयुर्वेद भी इस काल को प्रकृति संतुलन का काल बताता है। नवरात्र में किए गए पूजा पाठ व उपासना आदि शरीर को प्राकृतिक दृष्टि से वात, पित्त व कफ आदि को संतुलित करने में सहायक बनते हैं। साथ ही उनका मानना है कि शुभ फलों को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को इन चारों नवरात्रों में से कम से कम शरदीय नवरात्रों में उपासना अवश्य करनी चाहिए। नवरात्र के दिनों को भुक्ति व मुक्ति का साधन माना गया है। ऐसा माना जाता है कि नवरात्रों में की गई उपासना से संसार के सभी सुख प्राप्त होते हैं और साधक को मृत्यु के उपरांत मुक्ति प्राप्त होती है।
भगवती के भक्त राम और रावण : - मर्यादा पुरूषोत्तम राम का संबंध दोनों प्रचलित नवरात्रों चैत्र और आश्वन नवरात्रों से है। चैत्र नवरात्र की नवमी को रामनवमी कहते हैं क्योकि इस दिन भगवान राम का जन्म हुआ था। इसी प्रकार का संबंध आश्विन (शरदीय) नवरात्रों से जोड़ा जाता है। शरदीय नवरात्र में दशमी के दिन को ‘विजय दशमी’ कहते हैं। इस दिन भगवान राम ने रावण पर विजय पाई थी। यहाँ भी एक किवदंती प्रचलित है कि भगवान राम तथा रावण दोनों ने ही भगवती की पूजा की थी। भगवती राम तथा रावण दोनों के सामने प्रकट हुई तथा दोनों को ही मन मांगा वरदान दिया।
रावण ब्राह्मण था। उसने अपने कल्याण को उचित माना और कल्याणकारी वर मांगा तो उसे माता वर दिया ‘कल्याणमस्तु’ तथा राम क्षत्रिय तथा तारण हार थे। इस कारण उन्होने माता से विजय का आशीर्वाद मांगा तो माता ने उन्हे ‘विजयी भव’ का आशीर्वाद दिया। इस कारण एक ही तिथि विजय दशमी पर राम को विजय प्राप्त हुई तथा रावण को उसकी कल्याणकारी मृत्यु प्राप्त हुई।
दुर्गा शब्द का अर्थ : - देव्यथर्वशीर्ष में वर्णित एक श्लोक के अनुसार
ता दुर्गा दुर्गमां देवीं, दुराचर विद्यातिनीम्।
अर्थात जो कठिनाई में हृदयागंम होने वाली, जो दुराचार को नष्ट करने वाली हैं। वहीं दुर्गा हैं।
दुर्गा को दुगर्ति नाशिनी भी कहा जाता है क्योंकि माँ दुर्गा के नाम स्मरण मात्र से ही शारीरिक (रोग दोश), मानसिक तथा भौतिक तीनों प्रकार के कष्ट नष्ट हो जाते हैं। वैसे तो दुर्गा शब्द के अर्थ अलग-अलग विचारों के अनुसार अलग-अलग लगाए जाते हैं। यहाँ हम केवल शास्त्र सम्मत अर्थ प्राप्त करने का प्रयास कर रहैं हैं। दर्गा शब्द का अर्थ पूरा ग्रंथों में मिले एक श्लोक में दुर्गा शब्द को इस प्रकार से विभक्त किया गया है।
दुर्गा शब्द का विग्रह है –
द + ुु+ र् + ग् + आ
उपरोक्त श्लोक के अनुसार -
द = दैत्य नाशक
ुुुुुुुुुुुुुुुु = विध्ननाशक
र् = रोग नाशक
ग् = पाप नाशक
आ = शत्रु व भय नाशक
अर्थ : - दुर्गा शब्द में ‘द’ कार दैत्यनाशक, ‘उ’ कार विध्ननाशक, ‘रेफ’ रोग नाशक तथा ‘ग’ कार पाप नाशक तथा ‘आ’ शत्रु और भय नाशक है। इस प्रकार हम कह सकते हैं। माँ दुर्गा हर प्रकार से दुर्गतिनाशिनी है।
माता दुर्गा के बत्तीस नाम
दुर्गा दुगार्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी। दुगमच्छेदिनी दुर्गसाधिनि दुर्गनाशिनी।।
दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा। दुर्गमज्ञानदा दुर्गदेत्यलोकदावानला।।
दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपणी। दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता।।
दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी। दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी।।
दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी।
दुर्गमांगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गेश्वरी।।
दुर्गभीमा दुर्गभमा दुर्गभा दुर्गदारिणी। नामावलिमियां यस्तु दुर्गाया मम मानव।।
पठे्त सवीयान्मुक्तो भविष्यति न संशयः।।
जो मानव माता के इन बत्तीस नामों को पढ़ता है उसका भविष्य संवर जाता है। इसमें संशय नहीं करना चाहिए।
01. दुर्गा
02. दुगार्तिशमनी
03. दुर्गापद्विनिवारिणी
04. दुगमच्छेदिनी
05. दुर्गसाधिनि
06. दुर्गनाशिनी
07. दुर्गतोद्धारिणी
08. दुर्गनिहन्त्री
09. दुर्गमापहा
10. दुर्गमज्ञानदा
11. दुर्गदेत्यलोकदावानला
12. दुर्गमा
13. दुर्गमालोका
14. दुर्गमात्मस्वरूपणी
15. दुर्गमार्गप्रदा
16. दुर्गमविद्या
17. दुर्गमाश्रिता
18. दुर्गमज्ञानसंस्थाना
19. दुर्गमध्यानभासिनी
20. दुर्गमोहा
21. दुर्गमगा
22. दुर्गमार्थस्वरूपिणी
23. दुर्गमासुरसंहन्त्री
24. दुर्गमायुधधारिणी
25. दुर्गमांगी
26. दुर्गमता
27. दुर्गम्या
28. दुर्गेश्वरी
29. दुर्गभीमा
30. दुर्गभमा
31. दुर्गभा
32. दुर्गदारिणी
माँ दुर्गा का महामंत्र : - नीचे दिए गए मंत्र को माँ दुर्गा का महामंत्र बताया जाता है। पुराणों में इसके माहात्म्य का बहुत वर्णन किया गया है।
नवरात्र शक्ति उपासना का पर्व क्यों है ? : - इस प्रश्न का उत्तर हमें पुराणों से मिलता है। उसमें वर्णन मिलता है कि जब-जब अति उग्र दर्पमयी, मदान्ध आसुरी शक्तियाँ उदित होती हैं तब-तब उनका दमन करने के लिए माँ दुर्गा अपनी लीला रचती है।
‘ता दुर्गा दुर्गमां देवीं, दुराचर विद्यातिनीम्।’
जब-जब ब्रह्मा, विष्णु व महेश की शक्तियाँ दैत्य संहार में सक्ष्म नहीं होती तब-तब महाशक्ति दुर्गा (या परमेश्वरी), दुर्गा रूप में प्रकट होती हैं।
शास्त्र रक्षा क्यों ? :- शक्ति उपासना के पीछे शारीरिक शक्ति के साथ-साथ आंतरिक शक्ति का आरोहण करना भी है। भारतीय सास्कृति में निहित आध्यात्मिक साधना के बिना शरीर व आंतरिक बल को प्राप्त कर पाना संभव नहीं है। इसलिए उपनिषद प्रेरणा देते हैं कि ‘तस्माद बलं उपास्वः।’ इसी
शारीरिक व अध्यात्मिक शक्ति की प्राप्ती के लिए ब्रह्मचर्य के पालन पर जोर दिया गया है। शक्ति संपन्न राष्ट्र में ही ऋषि तथा मनीषी अपने ज्ञान विज्ञान व शास्त्रादि के चिन्तन में लगे रहते हैं। महाभारत में भी कहा गया है कि ‘शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे, शास्त्र चिंता प्रवर्तते।।’ इसीलिए शक्ति प्राप्ति के लिए ही रक्षा व शक्ति की मौलिक नही, सात्विक कल्पना की गई है।
पूर्व काल में महामाया भगवती जगदम्बा का पूजन करने वाले : - पुराग्रंथों के अनुसार पूर्व काल में भगवती महामाया का पूजन करने वालों में ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों के नाम आते हैं। ऐसा वर्णन भी आता है कि महर्षि विश्वामित्र, महर्षि भृगु, महर्षि वशिष्ठ तथा महर्षि कश्यप द्वारा भी इस व्रत का अनुष्ठान किया जा चुका है।
व्रतासुर के वध के लिए इन्द्र ने, त्रिपूरवध के लिए भगवान शंकर ने, मधु को मारने के लिए श्री हरि ने सुमेरूगिरि पर इस व्रत को किया था। अतः किसी कठिन या विपरीत परिस्थिति में पड़ने पर स्त्री अथवा पुरूष को यह व्रत अवश्य करना चाहिए।
महामाया भगवती जगदम्बा का भगवान राम द्वारा पूजन : - एक बार गुप्त रखने योग्य पूजन के में बारे में बताते हुए देवर्षि नारद जी भगवान राम को बताते हैं कि इससे पूर्व देवी महामाया का पूजन इन्द्र ने भी किया था। इसलिए आपको भी अश्विन मास के नवरात्र व्रत का अनुुष्ठान करना चाहिए। त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) सहित अनेक महर्षियों (विश्वामित्र, महर्षि भृगु, महर्षि वशिष्ठ तथा महर्षि कष्यप) भी इस व्रत का अनुष्ठान किया है। इसलिए लंका विजय के लिए आपको भी अश्विन मास के नवरात्र व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए।
किश्किन्धा पर्वत पर अश्विन मास में भगवान राम के नवरात्र व्रत की व्यवस्था की गई। उन्होने पूरे नौ दिन तक उपवास किया। इसी बीच अष्टमी की तिथि को आधी रात के समय भगवती महामाया ने प्रकट होकर राम और लक्ष्मण को दर्शन दिए। वे भगवान राम को वर देकर अन्तर्धान हो गईं। नवरात्र समाप्त करके दशमी के दिन भगवान राम ने पूजा कार्य संपन्न कर, लंका विजय के लिए लंका की ओर कूच किया। इसी कारण इस दिन को विजय दशमी कहा गया है।
महामाया भगवती जगदम्बा का भगवान कृष्ण द्वारा पूजन : - भगवान श्री कृष्ण की आठ पत्नियों में से प्रथम रूकमणीं थीं। शेष सातों में जाम्बवती, सत्यभामा, मित्रविन्दा, कालिन्दी, लक्ष्मणा, भद्रा तथा नाग्नजिती थीं। रूकमणी के गर्भ से प्रद्युम्न का जन्म हुआ। जल्द ही प्रद्युम्न का हरण शम्बासुर द्वारा कर लिया गया। इस बात से उद्विग्न होकर भगवान कृष्ण ने माँ भगवती की शरण ली। उन्होने माता से कहा कि पूर्व समय में मैं बद्रिकाश्रम में धर्म के घर पुत्र रूप में पैदा हुआ था। उस समय आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हुई थीं। आप तो जगतजननी हैं। फिर आप मेरी वह पूजा भूल कैसे गईं। पूरी सुरक्षा के बाद भी मेरा पुत्र प्रसवगृह से किसी मायावी द्वारा हर लिया गया है।
यह सब आपकी ही माया है कि उसका हरण हो गया है। मैं अब उसका पता लगाने में असमर्थ हूँ। मैं जानता हूँ कि मेरे जन्म से पूर्व आपने माया से मेरी माता के पाँचवे गर्भ (हलधर) को माता रोहणी के गर्भ में स्थापित कर दिया था। आप मेरे प्रभाव को कंस को बताने के लिए मेरी बहन योगमाया रूपी कन्या बनकर आई। जब आपकी गुप्त माया को मैं नही जान व समझ पाया तो साधारण प्राणी आपके प्रभाव को कैसे जान सकते हैं।
इस पर महामाया भगवती जगदम्बा ने भगवान कृष्ण के सामने प्रकृट होकर कहा। यह आपके पूर्व जन्म का श्राप है। उसी श्राप के कारण शम्बासुर तुम्हारे पुत्र का हरण करके अपनी नगरी ले गया है। इस समय तुम्हारा पुत्र वहाँ मायावती के पास सुरक्षित रूप से पल रहा है। अब तुम्हारा अधीर होना ठीक नहीं है। मैं उसे आशीर्वाद देती हूँ कि सौलह वर्ष का हो जाने पर वह शम्बासुर का वध करके स्वयं ही घर आ जायेगा।
भगवान व्यास जी द्वारा देवी की प्रशंषा : - वेद, पुराणादि की रचना करने वाले भगवान व्यास भी भगवती महामाया की प्रशंसा करते नहीं थकते। वे उनकी प्रशंसा में कहते हैं कि ये महामाया पारब्रह्मस्वरूपिणी हैं। इन भगवती योगमाया के हृदय में कभी भी विषमता व निर्दयता अंकुरित नहीं होती। ये प्राणीमात्र की रक्षा के लिए हमेेशा तत्पर रहती हैं। यदि ये आलस्य कर जाएँ तो संपूर्ण विश्व जड़ बन जायेगा। इनके सारे कार्य प्राणी मात्र की रक्षा के लिए चालू रहते हैं। देवता व दानव सभी इनकी आधीनता में रहकर ही व्यवहार करते हैं।
इस पूरे विश्व में केवल एक भगवती भुवनेश्वरी पर किसी का शासन लागू नहीं होता। ये स्वच्छन्दता पूर्वक संपूर्ण विश्व में भ्रमण करती हैं अतः यत्नपूर्वक इन देवी की उपासना करनी चाहिए। संपूर्ण त्रिलोकी में इनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। गुरू के मुखारविन्द से अथवा वेदांत के श्रवण से इस विषय को पूर्ण रूप से जान लेना चाहिए कि सभी देव उनकी आराधना करते हैं। अतः मनुष्य को भी उनकी आराधना करनी चाहिए।
माता जी का आना व जाना : - ऐसी मान्यता है कि दुर्गा पूजा के समय माँ दुर्गा अपने बच्चों (गणेेश व कार्तिकेय) तथा बहनों (लक्ष्मी व सरस्वती जी) के साथ मायके आती हैं। अपने बच्चों तथा बहनों के साथ दुर्गा देवी का आगमन सप्तमी तिथि को तथा प्रस्थान दशमी तिथि को होता है। इनमें गणेेश जी को प्रज्ञा का, कार्तिकेय जी को रक्षा का तथा बहनों लक्ष्मी जी को धन का तथा सरस्वती जी को ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। परंपरा के अनुसार माता जी का आगमन तथा प्रस्थान चार वाहनों (हाथी, घोड़ा, नाव तथा झूला) के द्वारा होता है।
माता जी के आगमन का अनुमान किस प्रकार लगाया जाता है। आईए जानें। यदि सप्तमी के दिन रविवार या सोमवार है तो माता जी का आगमन हाथी पर होता है। यदि मंगलवार या शनिवार है तो माता जी का आगमन घोडे़ से, यदि बुद्धवार है तो माताजी का आगमन नाव से तथा यदि गुरूवार या शुक्रवार है तो माता जी का आगमन झूले द्वारा होता है।
इसी प्रकार माता जी के प्रस्थान का अनुमान लगाया जाता है। यदि दशमी के दिन रविवार या सोमवार है तो माता जी का प्रस्थान हाथी पर होता है। यदि मंगलवार या शनिवार है तो माता जी का प्रस्थान घोड़े से, यदि बुद्धवार है तो माता जी का प्रस्थान नाव से तथा यदि गुरूवार या शुक्रवार है तो माताजी का प्रस्थान झूले के द्वारा होता हे।
भगवती की आगमन सवारी से जो शुभाशुभ विचार किया जाता है वह इस प्रकार है कि हाथी की सवारी से आगमन अच्छी वर्षा व अच्छी फसल का प्रतीक है, घोड़े पर आगमन सूखा, गर्मी, भूकंप आदि आपदाओं का प्रतीक होता है। यदि आगमन नाव से होता है तो हरियाली, खुशहाली व समृद्धि का सूचक होता है। झूले पर आगमन प्रजा के लिए अशुभ माना जाता है।
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सप्तमी के दिन आगमन दशमी के दिन प्रस्थान |
सवारी |
आगमन का फल |
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रविवार, सोमवार |
हाथी |
अच्छी वर्षा अच्छी फसल |
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मंगलवार, शनिवार |
घोड़ा |
सूखा, गर्मी, भूकंप, आपदा |
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बुधवार |
नाव |
हरियाली खुशहाली समृद्धि |
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गुरुवार, शुक्रवार |
झूला |
अशुभ |
नौ दिन की पूजा के उपरांत दसवें दिन माता जी को विदा किया जाता है। विदा करते वक्त उनसे हाथ जोडकर प्रार्थना की जाती है कि ‘गच्छ गच्छ स्वस्थानम् परमेश्वरी .......’ अर्थात ‘जाओ जाओ माँ अपने स्वस्थान को जाओ। आपका प्रवास पूर्ण हुआ। आप हमें आशीर्वाद प्रदान करके अपने परम धाम को प्रस्थान करें। हे देवी में अगले वर्ष पुनः अपने परिवार सहित हम तुच्छ बच्चों के पास आना हम आपकी राह देखेंगें।’ इस प्रकार प्रार्थना करके देवी माँ को अपनी परंपरा के अनुसार मंदिर आदि में स्थापित करें या धूमधाम से देवी माँ का विसर्जन करें।
भारतीय संस्कृति में पर्व का अर्थ : - सामान्यतः पर्व का अर्थ संधि (जोड़ या गांठ) होता है परंतु पुराकाल में कालक्रम के आधार पर पर्व को व्यक्त किया गया है।। भारतीय ज्योतिष में पृथ्वी द्वारा सूर्य के परिक्रमण काल को एक वर्ष कहा जाता है। इस परिक्रमण काल या एक वर्षषमान में चार जोड़, दो अयन व दो गोल में विभक्त किया गया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पर्व काल से संबंधित इकाई है।
नवरात्र और पुराविज्ञान : - वर्षमान की अयन संधियों में आषाढ़-श्रावण संधि को दक्षिणायन संधि तथा पौष-माघ संधि को उत्तरायण या उत्तरायन के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार वर्षमान की गोल संधियों में अश्विन-कार्तिक संधि को उत्तरी गोल संधि तथा चैत्र बैशाख संधि को दक्षिण गोल संधि के नाम से जाना जाता है। इन कालों में ही नवरात्र का त्योहार मनाया जाता है। इस गणना के अनुसार वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं। नवरात्रों का ज्योतिषीय तथा वैज्ञानिक कारण भी यही है।
चैत्र मास के नवरात्रों को ‘वासंतिक नवरात्र’ कहा जाता है क्योंकि यह समय वसंत ऋतु का होता है। इसी प्रकार अश्विन मास के नवरात्रों को ‘शरदीय नवरात्र’ कहा जाता है क्योंकि इस समय शरद ऋतु होती है। भारतीय ज्योतिष में पृथ्वी द्वारा सूर्य के परिक्रमण काल या एक वर्ष के मान में स्थित चार स्थानों पर अधिक जो दिया है। यह समय सायन मेष आरम्भ, सायन कर्क आरम्भ, सायन तुला आरम्भ तथा सायन मकर आरम्भ का है। इन्ही को हम दो अयन तथा दो गोल के रूप में ऊपर जान चुके हैं।
सायन मेश का समय 21 मार्च को, सायन कर्क का आरम्भ 23 सितम्बर को माना जाता है। इस समय दिन रात के मान अर्थात दिनमान तथा रात्रिमान दोनों बराबर होते हैं। इसी प्रकार सायन तुला आरम्भ का समय 21 जून को तथा सायन मकर आरम्भ का समय 22 दिसम्बर को है। इस समय दिन रात के मान अर्थात दिनमान तथा रात्रिमान में न्यूनाधिक का अंतर होता है। इसे इस प्रकार समझ सकते हैं कि 21 जून को उत्तर गोल में दिन का मान अर्थात दिनमान सबसे अधिक तथा रात का मान अर्थात रात्रिमान न्यूनतम होता है। इसी प्रकार सायन मकर आरम्भ में (अर्थात इस समय) उत्तर गोल में दिन का मान अर्थात दिनमान न्यूनतम तथा रात का मान अर्थात रात्रिमान अधिकतम होता है। ये चारों बिन्दु 21 मार्च, 23 सितम्बर, 21 जून तथा 22 दिसम्बर को चंद्रमास के अनुसार क्रमशः चैत्र, आषाढ़, अश्विन तथा माघ मास में पड़ते हैं।
नवरात्र का शुभाशुभ विचार : - ज्योतिषाचार्यों के अनुसार नवरात्र प्रतिपदा सम्मुखी (प्रतिपदा सम्मुख होने) या द्वितीयायुक्त प्रतिपदा (द्वितीया से युक्त प्रतिपदा हाने) पर शुभ माने जाते हैं। अमायुक्त प्रतिपदा (अमावस्या से युक्त प्रतिपदा) को शुभ नहीं माना जाता है। इसी प्रकार नवरात्रों का प्रारम्भ यदि चित्रा या वैधृति नक्षत्र में हो तो इसे त्याज्य माना जाता है। ज्योतिषाचार्यों का मत है चित्रा होने पर धन की हानि तथा वैधृति नक्षत्र होने पर पुत्र की हानि होती है। इसीलिए इन नक्षत्रों के उतरने के बाद ही व्रत का प्रारम्भ करना चाहिए। इसकी सूचना कुछ अच्छे पांचांगों में पहले ही दे दी जाती है।
नवरात्र नामकरण किस प्रकार हुआ ? : - देवी के नौ दिनों को नवरात्रि, नवरात्र, नवरात्रा, नवदुर्गा, नौरते आदि के नाम से जाना जाता है। नवरात्र एक संस्कृत शब्द है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार यह ‘नव + रात्र’ के मेल से बना है। द्वंद समास होने के कारण इसे ‘नवरात्र’ कहा जाता है। इस प्रकार हम पाते हैं कि नौ रात्रियों के समाहार (समूह) को नवरात्र कहा जाता है। साथ ही इस शब्द के पुर्लिंग होने के कारण भी इसे नवरात्र कहना ही शुद्ध है। नवरात्रि या नवरात्रा कहना त्रुटिपूर्ण या गलत है।
नव शब्द नौ का द्यौतक (प्रतीक) है। इसीलिए कहा भी गया है कि ‘नवानां रात्रीणां समाहारं नवरात्रं।’
रूद्रयामल में एक स्थान पर वर्णन मिलता है जिसके अनुसार ‘नवशक्तिसमायुक्तां नवरात्रं तदुच्यते।’ अर्थात नौ शक्तियों से युक्त होने के कारण इसे नवरात्र कहा गया है। नौ देवियों के नौ रूपों के पूजे जाने के कारण इन्हे ‘नवदुर्गा’ कहना भी उचित है चूंकि व्रत के नियमों को अमावस्या की रात के अगले दिन (शुभाशुभ का ध्यान रखते हुए) पड़वा (प्रतिपदा) के प्रातःकाल से अष्टमी या नवमी की दोपहर तक पालित किया जाता है। इन व्रतों के नियमों को नौ रातों तक पालन करने के कारण भी इनको नवरात्र कहा जाता है। इस काल में 9 दिन व 9 रात्रि शमिल होती हैं इसलिए भी इस काल को नवरात्र ही कहा जाता है।
लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि प्रथम नवरात्र की शुरूआत सृष्टि के प्रथम दिन हुई थी। उसी रात को रात्रिस्वरूपा शक्ति की उपासना हुई। नव + रात्र अर्थात नवीन रात में शक्ति की उपासना पहली बार हुई। इसी कारण इसे नवरात्र नाम दिया गया। प्रथम तिथि का नाम ब्रह्मा जी ने श्रेष्ठ तिथि अर्थात प्रवरा रखा था।
नवरात्र क्यों ? नवदिन या नवदिवस क्यों नहीं ? : - चूंकि देवी रात्रि स्वरूपा हैं और इनकी पूजा रात्रि में ही होती है। महेश्वर को दिवारूपा तथा देवि को रात्रि रूपा बताया गया है। ‘रात्रि रूपा यतो देवि दिवा रूपा महेेश्वरः। रात्रि व्रतमिदं देवी सर्वपाप प्रणाशनम्।' अतः देवी का रात्रि स्वरूप मानकर रात्रि में देवी की पूजा की जाती है। ‘रात्रि देवीं च पूज्येत।’ रात्रि तमोगुण का प्रतीक है और इसी तमोगुण से आशक्त होकर ही हम तमोगुण रूपी निद्रा के आधीन होते हैं। तमोगुण से बचाने के लिए शास्त्रों में दिन मे सोना वर्जित किया है। जिससे शरीर में तमोगुण उत्पन्न न हों। रात्रि जागरण का अर्थ भी इसी तमोगुण से छुटकारा पाना हैं अतः हमें ,रात्रि जागरण करके तमोगुण पर नियंत्रण करने प्रयास करना चाहिए। रात्रि में तथा नौ देवियों की उपासना के विधान के कारण ही इसे नवरात्र कहा जाता है। नवदिन या नवदिवस नहीं।
नवरात्र में किसकी पूजा होती है ? : - चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को सतोगुण प्रधान ब्रह्माजी के द्वारा इस सृृष्टि का निमार्ण किया गया क्योंकि इन्हे सृष्टि का सृजक बनाया गया। इस सृृृष्टि के संरक्षक के रूप में रजोगुण प्रधान विष्णु जी को चुना गया तथा तमोगुण प्रधान भगवान रूद्र को इसके संहार या विनाश का दयित्व सोपा गया हैं। इनके इन कार्यो में सहायता के लिए, महासरस्वती (ब्रह्माणी), महालक्ष्मी तथा महाकाली को इनके साथ जोड़ा गया है।
नवरात्र के नौ दिनों को इन तीन महादेवियों को ही समर्पित किया गया है। जो तम, रज व सत्व गुणों की प्रतीक महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती हैं। इन तीनों को सम्मिलित रूप से दुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रकार हम पाते हैं कि महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती दुर्गा के ही प्रतिरूप हैं। नवरात्रों में वैसे तो दुर्गा के नौ स्वरूपों की मुख्य रूप से पूजा की जाती है। नवरात्रों में अनुशासन, आत्मसंयम और सात्विक आचार विचार से अपनी अपनी आत्मा की शुद्धि करके उपसना करने से साधक परमधाम को पाता है। अतः महासरस्वती जी की कृपा से साधक के ज्ञान चक्षु खुल जातें हैं। उसे मोक्ष प्राप्त करने का तरीका सुलभ हो जाता है और वह देवी में मन लगाकर अंत में मोक्ष का अधिकारी हो जाता है।
नवरात्र के तीन चरण : - प्रत्येक नवरात्र के तीन चरण माने गए हैं। इस समय तीनों देवियों (महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती) की क्रमशः तीन-तीन दिन पूजा-उपासना का विधान है। नवरात्रों के प्रथम तीन दिन तमोगुण को दूर करने के लिए तमोगुण प्रधान देवी महाकाली की पूजा की जाती है। तमोगुण नकारात्मक शक्ति को जन्म देता है। महाकाली की पूजा इस नकारात्मक शक्ति को सकारात्मक शक्ति में बदलती है। इससे नकारात्मक शक्ति के कारण जन्मी सुस्ती, आलस्य व जड़ता समाप्त होने लगती है और साधक निर्भीक व साहसी बनने लगता है।
अगले तीन दिनों तमोगुणों पर अधिकार करने के उपरांत रजोगुणों पर अधिकार करने के लिए महालक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। महालक्ष्मी जी को धन और वैभव का प्रतीक माना जाता है। यह धन रूपये-पैसे ही नहीं, ज्ञान, कौशल और प्रतिभा के रूप में भी हो सकता है। ये देवि आघ्यात्मिक तथा भौतिक ऊर्जा की प्रतीक हैं।
इस प्रकार प्रथम छः दिनों में तमोगुणों व रजोंगुणों को जीत कर हम सतोगुणी देवी महासरस्वती की पूजा के अधिकारी बन जाते हैं। इस प्रकार नवरापत्रों के अंतिम तीन दिनों में महासरस्वती जी की पूजा की जाती है। ये विद्या, विवके, ज्ञान और बुद्धि की अधिष्ठात्री मानी गईं हैं। ये हमारे अज्ञानता को दूर करके आध्यात्मिक जीवन का रास्ता खोल हमें मुक्ति का अधिकारी बनातीं हैं।
नवरात्र पूजन : - शुभाशुभ का ध्यान रखते हुए प्रतिपदा के दिन प्रातः (ब्रह्म मुहुर्त में) स्नानादि से निवृत होकर एक समय अन्नरहित भोजन ग्रहण करने के व्रत को धारण करने का संकल्प करें। जल, अक्षत, हाथ में पुुष्प लेकर संकल्प मंत्र द्वारा संकल्प किया जाता है। जो संस्कृत में है यदि संकल्प मंत्र याद न हो तो हिन्दी में बोल कर भी संकल्प किया जा सकता है। जपमाला या किसी पुस्तक के पाठ आदि का संकल्प पहले ही कर लें।
माता की पूजा सूक्ष्म या दीर्घ किसी प्रकार से भी की जा सकती है। इसमें भाव महत्वपूर्ण है। यदि संस्कृत श्लोक नहीं आते हैं तो आप श्लोक की हिन्दी पढ़कर भी पूजा कर सकते हैं। यदि वह भी नहीं जानते हैं तो आप केवल माता की स्तुति को पढ़कर पंचोपचार या षोड़शोपचार पूजन संपन्न कर सकते हैं।
अपने कमरे या पूजाघर के ईशानकोण (उत्तर-पूर्व) को गंगाजल से पवित्र करें। वहाँ रोली अथवा हल्दी से सुंदर सा स्वातिक बनाए। इसी स्थान को आप नौ दिन पूजा के लिए प्रयोग करने वालें हैं। इसलिए सभी कार्य सोच-समझकर तथा सुंदरता को ध्यान में रखकर करें। कमरे के ईशानकोण में मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोएं तथा सोने (या चाँदी या ताबे या मिट्टी) के कलश (घट) की स्थापना करें। कलश में सभी देवों का वास माना जाता है। इसके लिए कलश के कंठ में कलावा बांधें, इसे पूरी तरह से जल भरें तथा इसके अंदर सोना, चाँदी या सिक्के ड़ाल दें। इसके मुख को पंचपल्लव से ढ़ककर उस पर धान या अनाज से भरा बर्तन रखकर उस बर्तन में सूखा नारियल लाल कपड़े में लपेटकर रख दें। इसके उपरांत देशी घी का दीपक प्रज्ज्वलित करके कलश के पास रखें।
कलश के पास ही किसी चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर दुगा देवी या नवदुर्गा तथा अपनी कुलदेवी की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित करके उनका पंचोपचार अथवा षोड़षोपचार पूजन करें या किसी विद्ववान से कराएं। प्रथम दिन तीन देवियों के प्रतीक तीन कन्याओं का पूजन करें तथा अश्टमी नवमी को नौ कन्याओं का पूजन करना चाहिए। नौ दिन तक धरती को बिछोना बनाएं अर्थात धरती पर ही सोएं या शयन करें।
नवरात्र को शक्ति पूजन का समय माना जाता है, इसलिए नवरात्रों में दुर्गा की नौ शक्तियों की पूजा की जाती है। पूजा के उपरांत आरती करके प्रसाद आर्पित किया जाता है। इस व्रत में नौ दिन तक स्वयं या किसी योग्य ब्राह्मण के द्वारा भगवती दुर्गा का पूजन या दुर्गा सप्तशती का पाठ किया या कराया जाता है। अधिकतर भक्त नौ दिन तक अखण्ड दीप जालकर रखते हैं। कुल (वंश) परंपरा के अनुसार दुर्गा अष्टमी अथवा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। भगवती दुर्गा को नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराया जाता है। जिसे कंजक (कन्या) पूजन कहते हैं।
यदि किसी स्त्री को नवरात्र व्रत के बीच में ही मासिक धर्म हो जाए तो उपवास बीच में न छोड़ें। उपवास जारी रखें परंतु इस मासिक धर्म के समय किसी भी प्रकार के पूजा सामान, देव स्थान या अन्य पूजक आदि को भी न छुऐं ऐसा विद्यवानों का मत है। इन्हे अपनी पूजा रजोनिवृत्ति के बाद ही शुरू करनी चाहिए।
नवरात्र क्या है और क्यों मनाया जाता है ? : - जैसा कि हम जान चुके हैं कि भारतीय ज्योतिष में पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल या वर्षमान को चार जोड़ों (दो अयनों तथा दो गालों) में विभक्त किया गया है। विश्व की सबसे प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में असौज (अश्विन) तथा चैत्र के महीनों को यमराज का जबड़ा कहा गया है। समय व वातावारण परिवर्तन के कारण इस समय सूक्ष्मजीव तथा रोगाणु तेजी से पनपने लगते हैं। इस कारण रोगों के आक्रमण को संभावना बढ़ जाती है। इसी कारण ऋतु संधियों में अक्सर शरीरिक बीमारियाँ बढ़ जाती हैं।
आयुर्वेद में शरीर को नौ द्वारा (दो कान, दो नाक, दो आँख, एक मुख तथा एक मलद्वार) वाला दुर्ग बताया गया है। अतः इन द्वारों से रोग कारक शरीर में प्रवेश कर सकते हैं तो इस समय में शरीर रूपी दुर्ग को स्वस्थ रखने के लिए उपवास रूपी चिकित्सा का सहारा लेकर हमें तन और मन को निर्मल और पूर्णत स्वस्थ बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। नवरात्र पर्व को मनाये जाने का मुख्य कारण यही है। शरीर से विजातीय पदार्था के निकल जाने के कारण शरीर अगले छः मास के लिए पूर्णतः स्वस्थ हो जाता है।
तिथि के घटने या बढ़ने का विचार : - पुराणों के अनुसार तिथि की घट या बढ़ से बेअसर रहकर कलश स्थापना वाले दिन अर्थात प्रतिपदा से लेकर लगातार कुल परंपरा के अनुसार दुर्गा अष्टमी अथवा नवमी की दोपहर तक व्रत व उपवास रखना चाहिए।
नारियल रखने का तरीका : - कलश पर नारियल किस प्रकार रखें यह भी हमें जान लेना चाहिए कि नारियल की स्थापना शास्त्र सम्मत तरीके से करनी चाहिए। आमतोर पर कलश पर खड़ा नारियल स्थापित करते देखा गया है। जो शस्त्र सम्मत नहीं है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि ‘अधोमुखं शत्रुविवर्धनाय, ऊर्ध्वस्य बहुरोग वृध्यै। प्राचीमुखं वित्त विनाशाय तस्तमात शुभं संमुख्यं नारिकेल।’ यहाँ नारियल के मुख की बात हुई है तो आपको बता दें कि नारियल का मुख वह सिरा होता है। जिससे नारियल वृक्ष से जुड़ा होता है। उपरोक्त श्लोक स्पष्ट करता है कि नारियल के उल्टा (अधोमुख नारियल का मुख नीचे की तरफ रखने से शत्रु में वृद्धि होती है, ऊपर की ओर मुख करके रखने से रोग बढ़ते हैं। पूर्व की ओर मुख रखने पर धन का विनाश होता है। नारयिल का मुख साधक की ओर होने पर शुभ होता है अतः नारियल की स्थापना सदैव इस प्रकार करनी चाहिए कि उसका मुख साधक की तरफ रहे।
कन्या पूजन क्यों किया जाता है ? : - वैसे भी सभी कार्यो में कन्या पूजन किया जाता है परंतु नवरात्र पर कन्यापूजन का विशेष महत्व माना गया है। कन्या पूजन से भय, विध्न तथा शत्रुओं का विनाष होता है। पुराग्रंथों में वर्णित श्लोक ‘स्त्रियः समस्तास्तव देवी!’ के अनुसार सभी स्त्रियाँ महामाया की प्रकृति हैं। हम सभी उस भगवती जगदम्बा की प्रकृति नारी की संतान होने के कारण उनके पुत्र हैं। कन्याओं में माता दुर्गा का वास माना जाता है। इनकी पूजा से साक्षात भगवती की कृपा प्राप्त होती है। ऐसी मान्यता है कि एक कन्या पूजन से ऐश्वर्य, दो से भोग, तीन से धर्म-अर्थ-काम, चार से चारों पुरूषार्थ व राजकीय सम्मान, छः से कार्य सिद्धि, सात से परमपद, आठ से अष्टलक्ष्मी तथा नौ कन्याओं के पूजन से नवनिधि अर्थात संपूर्ण ऐश्वर्य की प्राप्ती होती है। ऐसा माना जाता है कि होम, जप व दान से देवी इतनी प्रसन्न नहीं होती जितनी वे कन्या पूजन से प्रसन्न होती हैं।
छोटी कन्याओं को पुराग्रंथों में ‘नग्निका’ कहा गया है। जो स्त्री पुरूष भेद न जानने के कारण निर्विकार रहती हैं क्योंकि उसे अपने अंगों को ढ़कने का ज्ञान नहीं होता। इन निर्विकार कन्याओं को ही दुर्गा पूजा के योग्य माना गया है। दो वर्ष से अधिक की कन्या दूध पर निर्भर नहीं रहती। उसे स्वाद व गंध का ज्ञान हो जाता है। इसलिए पहली कन्या कुमारिका ली गई है। कंजक पूजन में नौ कन्या तथा दो लड़कों को भोजन कराया जाता है। इसमें नौ कन्याओं को नौ देवियों के प्रतीक रूप में तथा दो लड़कों को हनुमान व लांगुर के प्रतीक रूप में भोजन कराया जाता है। कहीं-कहीं इन्हे बटुक के रूप में भी देखा जाता है। यदि उम्र के हिसाब से कन्या मिल जाए तो हर दिन पूजन करें अथवा अष्टमी के दिन अपनी कुल-परंपरा के अनुसार अष्टमी अथवा नवमीं को अलग-अलग बिठाकर पृथक-पृथक नाम मंत्रों से इनकी पूजा करें।
कन्या (कंजक) पूजन किस प्रकार करें ? : - कुल परंपरा के अनुसार दुर्गा अष्टमी अथवा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। भगवती दुर्गा को नैवेद्य, चना, हलवा, खीर, पूरी व फल आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराया जाता है। जिसे कंजक (कन्या) पूजन कहते हैं। कन्याओं का कराया जाने वाला भोजन शुद्ध व सात्विक होना चाहिए। उपवास रखने वाला या दोनों (पती-पत्नि) कंजकों को प्रेम से भोजन कराऐं। इसमें नौ कुंवारी (या कुमारी) कन्याओं तथा दो लड़कों को भोजन कराया जाता है। इसके लिए कन्याओं के हाथ पैर धुलाएं तथा उन्हे उत्तर आसन पर बैठकर, दाएँ हाथ में मोली (कलावा) बांधें, रोली का तिलक करें। फिर प्रेम से उन्हे भोजन कराएं।
इस भोज में शामिल नौ कन्याओं को नौ देवियों (शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्ड़ा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री) के रूप में तथा दो लड़कों को हनुमान व लांगुर के प्रतीक रूप में भोजन कराया जाता है। कुछ साधक केवल एक लड़के को ही बिठाते हैं। वे इनमें गणेश भगवान का रूप मानते हैं। लड़कियों की संख्या कितनी भी हो सकती है। यदि कन्यएँ नौ से अधिक आ गई हैं तो उन्हे लौटाएं नहीं उन्हे भी प्रेम से भोजन कराएं व उपहार देने का प्रबंध करें। (यदि किसी कारण कन्या भोज नही कर पा रहें हैं तो केवल तीन लड़कियों व एक लड़के को भोजन अवश्य कराना चाहिए।) इस भोज में शामिल इन ग्यारह बच्चों को कुछ न कुछ भेट देकर ही विदा करें तो बहुत अच्छा है। विदा करते वक्त उनके पुनः पैर छुएं तथा अपनी पीठ पर थपकी या सिर पर हाथ रखवाकर आशीर्वाद लेना न भूलें।
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कंजक पूजन का ध्यान : - कंजक पूजन का ध्यान मंत्र निम्न हैः मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मी मात्रणां रूप धारिणीम्। नवदुर्गात्मिकांसाक्षात् कन्यामावाह्याम्यहम।। जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वषक्तिस्वरूपिणि। पूजां ग्रहाण कौमारि जगन्मार्त नमोस्तुते।। |
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S.N. |
स्वरूप |
कन्या की उम्र |
कन्या का नाम |
कन्यापूजन का मंत्र |
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01 |
‘कुमारी |
2 वर्ष |
कुमारी |
ऊँ कुमारीकायै नमः। |
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02 |
ब्रह्मचारिणी |
3 वर्ष |
त्रिमूर्ति |
ऊँ त्रिमूर्तिरूपारूपायरूपारूपरूर नमः। |
|
03 |
चंद्रघंटा |
4 वर्ष |
कल्याणी |
ऊँ कल्याण्यै नमः। |
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04 |
कुष्मांडा |
5 वर्ष |
रोहिणी |
ऊँ रोहण्यै नमः। |
|
05 |
स्कंदमाता |
6 वर्ष |
कालिका | ऊँ काल्यै नमः। |
|
06 |
कात्यायनी |
7 वर्ष |
चंडिका |
ऊँ चण्डित्रकायै नमः। |
|
07 |
कालरात्रि |
8 वर्ष |
शांभवी |
ऊँ शाम्भव्यै नमः। |
|
08 |
महागौरी |
9 वर्ष |
दुर्गा |
ऊँ दुर्गायै नमः। |
|
09 | सिद्धिदात्री | 10 वर्ष | सुभद्रा | ऊँ सुभद्रायै नमः |
कंजक पूजन में कन्या का चुनाव 2 से 10 वर्ष के बीच ही किया जाना चाहिए। कंजक पूजन में एक वर्ष से कम की कन्या को नहीं लिया जाता क्योंकि उन्हे भोजन के स्वाद व गंध आदि का ज्ञान नहीं होता है। साथ ही वह शौच आदि के बारे में न बता पाने के कारण अपनी शुद्वता को बनाए रखने मे असमर्थ रहती हैं। कंजक पूजन में दस वर्ष से अधिक की कन्या को भी नहीं लिया जाता क्योंकि कुछ विद्वानों का मानना है कि इसके बाद कन्याओं में ऋतुस्राव (माहवारी) शुरू हो सकता है। इसका कारण भी शुद्धता ही है। इसी कारण ग्यारह वर्ष से अधिक की कन्या को कोई नाम नहीं दिया गया है। जबकि शुद्वता के कारण ही 10 वर्ष से कम उम्र की कन्या को शुद्ध माना जाता है।
देवी भागवत के अनुसार कंजक पूजन में कन्याओं की संख्या प्रतिपदा से लेकर प्रतिदिन एक-एक करके बढ़ाते जाने के लिए कहा गया है। इस प्रकार प्रतिपदा को एक, द्वितीया को दो, तृतीया को तीन, चतुर्थी को चार, पंचमी को पाँच, षष्ठी (छठ) को छः, सप्तमी को सात, अष्टमी को आठ तथा नवमीं को नौ कन्याओं का पूजन करना चाहिए। इस प्रकार हम इन नौ दिनों में तिथि के अनुरूप देवियों का आह्वान व पूजन कर पाते हैं।
यदि यह क्रम बनाना संभव न हो तो प्रतिपदा को तीन देवियों के प्रतीक स्वरूप तीन कन्याओं का पूजन अवश्य करें। अष्टमी या नवमी को नौ कन्याओं का पूजन करना चाहिए। प्रत्येक कन्या को भोजन कराने के उपरांत भेंट देने में कंजूसी न करें। अपने परिवार की कन्या को न बिठाएं। पूजा में श्रृद्धा, भावना, आस्था, समर्पणता और निष्ठा होनी चाहिए। ध्यान रहे कि भोजन तथा व्रताहार में तामसी भोजन वर्जित है।
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S.N. |
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03 |
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04 |
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05 |
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06 |
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|
08 |
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09 |
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नवदेवियों के पूजन के मंत्र : - ज्ञानी जन को यदि संभव हो तो भक्तिभाव से श्रीयुक्त मंत्र या निम्न मंत्रों से वस्त्राभूषण, माला, चन्दन आदि श्रेेेेेेष्ठ भोजन व वस्तुओं से कन्याओं का पूजन करनी चाहिए। पैर धोएं, पंचोपचार पूजन करें और यथाशक्ति दक्षिणा देकर विदा करें।
कुमारस्य च तत्त्वानि या सृजत्यापि लीलया।
कादीनापि च देवांस्तां कुमारीं पूजयाम्यहम्।।
जो स्कंद के तत्वों तथा ब्रह्मादि देवों की भी लीलापूर्वक रचना करने वाली हैं। उन कुमारी देवी की मैं पूजा करता हूँ।
सत्त्वादिभिस्त्रिमूर्तिर्या तैर्हि नानास्वरूपिणी।
त्रिकालव्यपिनी शक्तिस्त्रिमूर्ति पूजयाम्यहम्।।
जो सत्वादि तीन गुणों को धारण करके तीन रूप धारण करती हैं। नाना रूप वाली तीनों कालों में व्याप्त उन भगवती त्रिमूर्ति का मैं पूजन करता हूँ।
कल्याणकारिणी नित्यं भक्तानां पूजितानिशम्।
पूजयामि च तां भक्तया कल्याणीं सर्वकामदाम्।।
जो नित्य भक्तों के द्वारा पूजित होने वाली कल्याणकारी तथा सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली भगवती कल्याणी की मैं पूजा करता हूँ।
रोहयन्ति च बीजानि प्राग्जन्मासंचितानि वै।
या देवी सर्वभूतानां रोहिणीं पूजयाम्यहम्।।
जो सभी जीवों में संचित बीजों का रोपण करती हैं उन सर्वभूता भगवती रोहणी की मैं पूजा करता हूँ।
काली कालयते सर्व ब्रह्माण्डं सचराचरम्।
कल्पान्तसमये या तां कालिकां पूजयाम्यहम्।।
जो कल्प के अंत में चराचर जगत को अपने में विलीन कर लेती या समा लेती हैं उन कालिका देवी की मैं पूजा करता हूँ।
चण्ड़िकां चण्डरूपां च चण्डमुण्डविनाशिनीम्।
तां चण्डपापहरिणीं चण्डिकां पूजयाम्यहम्।।
अत्यन्तप्रकाशमान तथा चण्ड और मुण्ड का संहार करने वाली तथा अपनी कृपा से घोर पाप को तत्काल नष्ट करने वाली भगवती चण्डिका की मैं पूजा करता हूँ।
अकारणात् समुत्पत्तिर्यन्मयैः परिकीर्तिता।
यस्यास्तां सुखदां देवीं शांम्भवीं पूजयाम्यहम्।।
जिनके प्रकाट्य के विषय का अभाव है। जो सभी को सुखी बनाती हैं। उन देवी शांम्भवी की मैं पूजा करता हूँ।
दुर्गात् त्रायति भक्तं या सदा दुर्गार्तिनाशिनी।
दुर्ज्ञेया सर्वदेवानं तां दुर्गां पूजयाम्यहम्।।
जों भक्तों को संकट से तारती हैं। उनके दुखों को दूर करती हैं। सभी देवों की देव उन भगवती दुर्गा देवी की मैं पूजा करता हूँ।
सुभद्राणि च भक्तानां कुरूते पूजिता सदा।
अभद्रनाशिनी देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम्।।
जो सुपूजित होने पर भक्तों का कल्याण करने में सदा लगी रहती हैं। उन अशुभ-नाशिनी भगवती सुभद्रा की मैं पूजा करता हूँ।
खेतड़ी या जौं बोना : - जौं वैदिक कालीन अन्न है। ऐसा माना जाता है कि सृृष्टि के प्रारम्भ में सबसे पहले जौं ही उत्पन्न हुआ था। यही पहली फसल के रूप में उगाया गया था। यह शुद्ध सत्विक तथा सुपाच्चय होने के कारण हविष्यान्न कहलाता है। यह वसंत ऋतु में सबसे पहले आने वाली फसल है। इसी कारण इसे माता जी को अर्पित करने के प्रतीक के रूप में जौं बोए जाते हैं।
दस औशधियों में जौं औषधि व अथर्वेद में जौं को धान्यों में सर्वोपरि धान्य बताया गया है। इसीलिए यज्ञ आहुति भी इसी की सबसे अच्छी मानी गई है। कहा जाता है कि अनुष्ठानों में जब तक जौं नहीं बोए जाते वह पूरा नहीं होता। खेतड़ी पंजबी भाषा का शब्द है। जौं को जयंति भी कहा जाता है। कमरे या पूजाघर के ईशानकोण में भूमि पर शुद्ध मिट्टी में गोबर मिलाकर जगदम्बा का स्मरण करते हुए जौं बाए जाते हैं। जौं के ज्वारे के आकार व रंगादि से शुभाशुभ का अंदाजा लगाया जाता है। सीधे मुलायम, कोमल व सफेद हरे शुभ तथा उलझे हुए अशुभ माने जाते हैं। यहाँ अशुभ का अर्थ अन्यथा न लें। यह स्थिति हमें सोच समझकर उचित कार्य करने को प्रेरित करती है। जौं बोने के बाद कृंतकों (कुतरने वाले जीवों) से इनकी रक्षा करनी चाहिए।
व्रत के नौ प्राकृतिक खाद्य पदार्थ : - व्रत में निराहार रहना उचित है। परंतु हमें, उपवास व व्रत के अंतर को भी जान लेना चाहिए। यदि व्रत रखना संभव न हो तो एक बार फलाहार करें। व्रत में फलाहार सादा, हल्का, सात्विक तथा सुपाच्य होना चाहिए। यदि फलाहार से व्रत रखना संभव न हो तो एक बार सात्विक व सुपाच्य आहार ले सकते हैं। व्रत में पेय पदार्थ ग्रहण करने की कोई समय सीमा नहीं हैं। यह दिन मे एक से अधिक बार लिया जा सकता है। व्रत में, तामसिक तथा राजसिक भोजन का त्याग कर देना चाहिए। कुट्टू, शैलान्न, दूध, दही, चौलाई, पैठा, श्यामक चावल, हरी तरकारी (सब्जी), काली मिर्च, तुलसी, साबूदाना, सूखे मेवे, मिश्री, आंवला, सिंघाड़े का आटा, आदि व्रत से संबंधित खाद्य पदार्थ हैं। इन्हे व्रत में लिया जा सकता है। शुद्ध, सुपाच्य तथा सात्विक आहार को हविष्यान्न कहते हैं। परंतु एक बात हमेशा याद रखें यदि यह आहार स्वयं तैयार किया जाए तो सबसे अच्छा है। यह आहार साफ शुद्ध वा ताजा होनी चाहिए। रखा हुआ कुट्टू या सिंघाडे का आटा भूलकर भी उपयोग न करें क्योंकि यह बहुत जल्दी खराब हो जाता है।
दुर्गा के अनेक स्वरूप : - पुराग्रंथों में माँ दुर्गा के अनन्त स्वरूपों का वर्णन मिलता है। जिनमें तीन महााशक्ति (महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली), दस महाविद्याएँ, नवदुर्गा (शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्ड़ा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री) आदि के अतिरिक्त भी अनन्त देवियों के नाम के वर्णित हैं।
नवदुर्गा के कौन-कौन से स्वरूप हैं ? : - कालभेद एवं उनके कार्य के आधार पर दुर्गा के नौ अवतार माने जाते हैं। माँ दुर्गा के इन नौ अवतारों को नवदुर्गा कहा जाता है। इनके नाम निम्न ष्लोक से जाने जा सकते हैं।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥
उपरोक्त श्लोक के आधार पर नवदुर्गाओं के नाम इस प्रकार हैं।
|
01 |
शैलपुत्री |
02 |
ब्रह्मचारिणी |
03 |
चन्द्रघण्टा |
|
04 |
कूष्माण्डा |
05 |
स्कन्दमाता |
06 |
कात्यायनी |
|
07 |
कालरात्री |
08 |
महागौरी |
09 |
सिद्धिदात्री |
देवी जी का विसर्जन कब करें : - नौं दिनों की पूजा के उपरांत दशमी में पूजन व नवदुर्गाओं को भोग लगाने के बाद ही देवी को विदा किया जाना चाहिए।
ज्योति स्वरूपा हैं माताजी : - माँ दुर्गा का स्वरूप अग्निमय है इसलिए इनके नाम की अखण्ड ज्योति जलाई जाती है और माता की ज्योति की जय जय कार की जाती है। कहा जाता है कि यदि साधक के पास प्रतिमा, यंत्र आदि कुछ भी न हो तो वे दीपक की ज्योति में माता का आवाह्न कर सकते हैं। यदि माँ की ज्योति प्रयास करने के बाबजूद नहीं जलती तो एक बार माता का जयकारा लगाकर ज्योति जलाने का प्रयास करें तो आप देखेंगे कि ज्योति एकदम जल उठती है। यह कुछ और नहीं माता का चमत्कार है। इसे अपना कर देखें।
दुर्गा पूजा में दो प्रकार के दीपकों का उपयोग किया जाता है। साधारण दीपक व अखण्ड़ दीपक। साधारणतया दीपक को देशी घी से प्रज्ज्वलित किया जाता है। यह दीपक पूजा के प्रथम दिन से प्रारंभ होकर पूजा के अंत तक जलता रहे, इसके लिए दीपक से पूजा के अंत तक जलते रहने की प्रार्थना भी करनी चाहिए।
पूजा में जलने वाला दूसरी प्रकार का दीपक, अखण्ड़ दीपक कहलाता है। अखण्ड़ दीपक भी देशी घी से ही प्रज्ज्वलित किया जाता है। यह अखण्ड़ दीपक पूरे नौ दिनरात लगातार जलता रहता है। इस दीपक में ज्योति लगातार बिना खंड़ित हुए नौ दिन तक जलती है। इसीलिए इस दीपक को ‘अखण्ड़ दीपक’ तथा इस ज्योति को ‘अखण्ड़ ज्योति’ कहते हैं। इस दीपक की यत्न पूर्वक रक्षा करनी चाहिए। अखण्ड़ दीपक पूजा के प्रारम्भ में ही जला दिया जाता है। कभी कभी दीपक की बत्ती बदलनी पड़ती है। यदि ऐसा करना पड़े तो नई बत्ती व एक नया दीपक लें। यह छोटा दीपक भी हो सकता है। इस दीपक में बत्ती लगाकर व घी ड़ालकर इस दीपक को अखण्ड़ ज्योति से जला लें। अब आप आराम से अखण्ड़ दीपक की बत्ती को बदल सकते हैं। बत्ती बदलने के उपरांत अखण्ड़ दीपक को जल रहे दीपक से पुनः प्रज्जवलित किया जाता है। यदि कभी अखण्ड़ दीपक बीच में बुझ जाए तो हमें निराश नहीं होना चाहिए। दीपक को पुनः जला लें। दीपक का बीच में बुझ जाना सफलता में देरी को दर्शाता है। असफलता को नहीं।
व्रत का पारण : - पारण के स्थान पर शास्त्रों में ‘तिथि अंते’ अर्थात ‘तिथि के अंत’ नामक शब्द का उपयोग होता है। जिसका अर्थ है तिथि के समाप्त होने का समय। दूसरे शब्दों में तिथि समाप्त होने पर पारण करना चाहिए। नवरात्र, उपवास के बाद अन्न ग्रहण करने को पारण कहते हैं। कहीं-कहीं, पारण दशमी में करने के लिए कहा गया है। आपको अपनी कुल परम्परा के अनुसार अष्टमी, नवमी या दशमी को पारण करना चाहिए।
नवरात्र के नौ तप : - 01. ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें, 02. उपवास रखें व क्रोध का त्याग, 03. कोमल सैय्या का त्याग कर धरा पर शयन करें, 04. सत्य वाचन करना या सत्य बोलना, 05. अहिंसा व्रत का पालन, 06. मातृ शक्ति का सम्मान करना, 07. अपने वरिष्ठजनों का सम्मान करना, 08. दुराचरणों (झूठ बोलना, क्रोध, छल, कपट, कडवे वचन बोलना, चोरी, चालाकी, ईर्ष्या, द्वेश, काम, प्रतिशोध व अशिष्ट आचरण आदि) को त्याग कर अपने कर्तव्यों का पालन करना और 09. अपने कार्य स्वयं करना।
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दस महाविद्याएँ : - नवरात्र को शक्ति की उपासना का प्रतीक माना गया है। शक्ति की उपासना में विद्याओं का बहुत महत्व माना गया है। विद्या तीन प्रकार की (अविद्या, विद्या तथा महाविद्या) मानी गई हैं। सांसारिक कार्यो में सहायता करने वाली विद्या को ‘अविद्या’ कहते हैं। मुक्ति प्राप्ति के कार्यो में सहायक महाविद्या को विद्या कहते हैं। जो विद्या भोग तथा मोक्ष दोनों कार्यो में सहायता करती हैं महाविद्या कहलाती है। आगमशास्त्रों के अनुसार दस महाविद्याएँ हैं। जो इस प्रकार हैं।
काली तारा महाविद्या षोड़शी भुवनेश्वरी।
भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती।।
मातंगी सिद्धविद्या च कथित बगुलामुखी।
एता दश महाविद्याः सर्वतंत्रेशु गोपिताः।।
कुछ स्थानों पर इनके नामें में भिन्नता मिलती है। फिर भी दस विद्याओं के नाम उपरोक्त श्लोक के अनुसार निम्न हैं।
|
01 |
काली |
02 |
तारा |
03 | षोड़शी |
|
04 |
भुवनेश्वरी |
05 |
भैरवी (त्रिपुर सुंदरी) |
06 |
छिन्नमस्ता |
|
07 |
धूमावती |
08 |
मातंगी |
09 |
कमला (कमला- त्मिका) |
|
10 |
बगुलामुखी |
|
|
|
इनके जन्म के बारे में पुराग्रंथ बताते हैं कि जब राजा दक्ष ने भगवान शिव व सती को यज्ञ में नहीं बुलाया तो भगवान शिव ने सती को रोकने का बहुत प्रयास किया परंतु वे अंत में गुस्से में बोली, ‘हे प्राणनाथ ! मैं, प्रजापति के यज्ञ में अवश्य जाऊँगी तथा अपने परमेश्वर देवाधिदेव के लिए यज्ञ भाग भी प्राप्त करूँगी अन्यथा यज्ञ का विध्वंस कर दुंगी।’ यह कहते हुए उनकी आँखे लाल हो गईं। वे भगवान शिव की तरफ उग्र दृष्टि से देखने लगीं। सती के क्रोध को देख उन्होंने सती का यज्ञ में जाना ही उचित समझा। इस समय महामाया का शरीर प्रचंड तेज से तमतमा रहा था। वे क्रोधाग्नि से दग्ध थीं।उनके होठ फड़फड़ा रहे थे। भ्यानक क्रोध से उनकी जिह्वा बाहर निकल आई। गले में मुण्डों की माला तथा मस्तक पर चन्द्रमा प्रकट हो गए। वे कालाग्नि के समान भयप्रद, उग्र व प्रचंड प्रतीत हो रहीं थीं।
इस पर भगवान ने उनके इस भ्यंकर रूप से बच निकलना चाहा तो उन्हें रोकने के लिए देवी ने, दसों दिशाओं में अपनी अंगभूता दस शक्तियों को प्रकट किया। ये दसों शक्तियां महाविद्याएं कहलाईं।
नवरात्र के बारे में कुछ अन्य बातें : -
1. चूंकि नवरात्र में नौ देवियों को पूजा जाता है इसलिए इन दिनों को देवी के दिन भी कहा जाता है। इन दिनों को पुण्य दिन मानकर अनेक मांगलिक कार्य किए जाते हैं परंतु ध्यान रखें कि इन दिनों में विवाह संस्कार कभी न करें। यमदृष्टा होने के कारण ये दिन हमारे ब्रह्मचर्य पालन करने के हैं। संभोग कर शक्ति खोने के नहीं। अतः इन दिनों में यथा संभव ब्रह्मचर्य का पालन करें।
2. यमदृष्टा होने के कारण इन ऋतुओं को महान कष्टकारक कहा जाता है। विद्ववानों के अनुसार इस समय शौक, मौज को छोड़कर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए देवी की शरण में जाना चाहिए।
3. कुछ भी खाने से पहले अपने आराधक को अवश्य आर्पित करें। नवरात्रों में तामसी भोजन (शराब, अण्ड़, मांस, मछली, लहसुन, प्याज आदि) को पूर्णतया त्याग दें। फलाहार, दूध, कुट्टू का आटा, सिंघाडे का आटा, शैला चावल खा सकते हैं। मसालों का भी पूर्णतया त्याग करना है। नमक में साधारण नमक के स्थान पर सेंधा (व्रत का नमक) लिया जा सकता है।
4. प्रत्येक देवी के पूजन के उपरांत देवी के मंत्र की कम से कम एक माला अवश्य जपें। इससे हमारी आंतरिक आध्यात्मिक शक्ति को ताकत मिलती है।
5. देवी की त्रिकाल (सुबह, दोपहर व सायंकाल) पूजा का विधान है। यदि यह संभव न हो तो सुबह और सायंकाल में पूजा अवश्य करनी चाहिए।
6. यदि घर के आसपास कोई देविय स्थान है तो वहाँ पूजा पाठ किया जा सकता है। देवी स्थान में पूजा पाठ के बाद घर में देवी स्थान की आवश्यकता नहीं रहती। परंतु घर की शुद्धि के लिए घर में देवी की स्थापना अवश्य करनी चाहिए।
7. यदि स्थान अभाव के बाद भी यदि कोई घर में देवी स्थापना करना चाहे तो वह पूरब, उत्तर या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) की अलमारी में देवी की स्थापना कर सकता है परंतु ध्यान रहे कि देवी की स्थापना नीचे वाली अलमारी में करनी है ताकि आप आराम से बैठ कर माता की पूजा व ध्यान कर सके।
8. यदि घर में देवी की स्थापना कर दी गई है तो घर में शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। पति पत्नी ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करें।
9. पुरूषों के लिए साज सज्जा वर्जित है। स्त्रियाँ साधारण श्रंगार करें।
10. दुर्गा पूजा में प्रयोग होने वाले आसन, कंबल या रेशम का होना चाहिए। मंत्र जप नियम से तथा नियमित संख्या में करें। इसके लिए उत्तर या पूर्व या उत्तर-पूर्व (ईशान) की ओर मुख होना चाहिए।
11. दुर्गा देवी को दुर्गुणों को दूर करने वाली तथा दुर्गति का नाश करने वाली कहा गया है परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसने इन्हे दूर करने के लिए हमें निमित्त बनाया है। अतः उसकी इच्छा मान कर हर कार्य पूर्ण पवित्रता, संयम व एकाग्रता के साथ करना चाहिए। लाभ व हानि माँ दुर्गा पर छोड़ देनी चाहिए।
12. व्रत व उपवास के अनेक लाभ हैं।
क) पाचन शक्ति ठीक रहती है।
ख) नौ दिन का ब्रह्मचर्य व्रत शरीर की क्षीण शक्ति को पुनः पाने का एक साधन है।
ग) इससे शरीर के विजातीय पदार्थ बाहर निकलते हैं। जिससे जीवनी शक्ति बढती है।
घ) मानव अपने शरीर के नौ द्वारों के प्रति जागरूक हो जाता है। वह दुःख रूपी शत्रु को शरीर में प्रवेश करने से रोकने में सक्ष्म हो जाता है।
ड) इस समय ब्रह्मचर्य व उपवास का पालन करने वाला माता के समान पराक्रमी तथा शक्तिशाली हो जाता है।
13. यदि आप व्रत रखने में सक्ष्म नहीं हैं अर्थात जब आप व्रत न रख सकें तो शरीर की शक्ति को ध्यान में रखते हुए 1, 2, 3, 5, 7, अथवा नौ व्रतों में आपको जो भी उचित लगे उतने दिनों के व्रतों का पालन कर सकते हैं।
14. व्रत का पलन खुशी से किया जाना चाहिए। मुख या हावभाव से ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि व्रती इन्हे मजबूरी में रख रहा है या उपवासी किसी कष्ट में हैं। यदि ऐसा है तो व्रत न करें। यदि किसी को ऐसा महसूस होता है तो समझो आपका उपवास निष्फल हो गया।
15. अपने व्रत का किसी से बखान भी न करें। अपनी सभी इंन्द्रियों को वश में रखकर उपवास करें।
16. यदि सूतक पहले से लग जाएं तो पूजा न करें। यदि सूतक बीच में हो जाए तो पूजा बीच में न छोड़ें। उसे जारी रखें। हाँ आप अपना पारण सूतक के समय मंदिर में या सूतक समाप्ती के बाद अपने घर में भी कर सकते हैं।
17. देवी का आवाह्न, पूजन व विर्सजन प्रातःकाल में ही शुभ माना जाता है। इन तीनों कार्यो के लिए शुभाशुभ का ध्यान रखते हुए प्रातः काल को ही चुनना चाहिए।
18. तिथि के न्हास (घटने) या वृद्धि (बढ़ने) के कारण इनकी न्यूनाधिकता नहीं होती।
19. दुर्गा चालीसा व दुर्गा सप्तशती पाठ का विधान है।
20. नारियल अपनी कुल परंपरा के अनुसार अष्टमी या नवमी को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
21.नवरात्र नौ दोषों (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मतस्य, राग, द्वेश, व ईर्ष्या) को त्यागने का समय है।
नवरात्र व नवदुर्गा चरित्र का वर्णन
नवरात्र आरम्भ होने पर कलश (घट) स्थापना करें, मिट्टी की वेदी बनाकर जौं बोएं, कलश के पास ही अपनी कुलदेवी की प्रतिमा स्थापित कर उनका पूजन करें या कराएं। इसके साथ ही माँ दुर्गे व उसके नौ स्वरूपों की पूजा शुरू हो जाती है। किसी एकांत स्थान पर मृत्तिका सें वेदी बनाकर उसमें जौं, गेंहू बोए जाते हैं। उसके ऊपर कलश की स्थापना होती है। मूर्ति किसी भी धातु या मिट्टी की हो सकती है। कलश के पीछे स्वास्तिक और त्रिशूल बनाया जाता है।
प्रथम शैलपुत्री
माँ दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री है। नव दुर्गाओं में सबसे पहले अर्थात पहले ही दिन माँ शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री का महत्व और शक्तियाँ अनन्त हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम, शैलपुत्रीत्री (पर्वतपुत्री) पड़ा था। भगवती का वाहन वृषभ है। इसलिए इन्हे, वृषभारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। इस जन्म में भी देवी शैलपुत्री भगवान शिवजी की ही अर्द्धांग्नि बनी थी। कहा जाता है कि पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुईं थी। तब इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शंकर जी से हुआ था।
एक बार राजा दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें समस्त देवों को अमंत्रित किया गया, परंतु उन्होनें भगवान शिव तथा सती को उसमें आमंत्रित नहीं किया। सती मन ही मन पिता का यज्ञ देखने, माता और बहनों से मिलने के लिए उत्सुक होने लगीं। भगवान शिव ने उन्हे बहुत समझाया फिर सारी बातों पर विचार करके भगवान शिव ने कहा - प्रजापति दक्ष किसी कारण हमसे रूष्ट हैं इसी कारण इस यज्ञ में उन्होने सभी देवताओं को बुलाया है। उनके यज्ञ भाग भी उनको अर्पित किए हैं परंतु उन्होने जानबूझकर हमें यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी भी प्रकार ठीक नहीं हैं परंतु सती पर उनके इस उपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। यज्ञ में जाने व बहनों से मिलने की व्यग्रता कम होने के स्थान पर ओर बढ़ गई। जब भगवान शिव ने उनकी उत्सुकता व आग्रह देखा तो उन्हे यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी।
जब सती वहाँ पहुँची तो उन्हें तिरस्कार ही मिला। वहाँ पर उनसे आदर के साथ बात करने के स्थान पर सब मुँह फेर रहे थे। बहने व्यंग और उपहास भरे शब्द बोलती थीं। केवल माता ने ही उन्हे गले लगाया। जब दक्ष ने सती को देखा तो दक्ष ने भगवान शंकर के प्रति कटु वचन कहे। यज्ञ स्थल पर भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव देखकर तथा पिता से अपने पति के प्रति अपमानजनक वचन सुनकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से भर उठा। वे अपने पति भगवान शंकर का अपमान सह न सकीं। उन्होने उसी समय अपने शरीर को योगाग्नि में भस्म कर दिया। वज्रपात के समान दुःखद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रोधित होकर अपने गणों को भेजकर दक्ष का यज्ञ विध्वंस करा दिया।
इसके उपरांत शैलराज या पर्वतराज हिमालय के यहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ (पर्वतपुत्री) पड़ा था। पर्वतराज हिमालय के यहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण ही इन्हे ‘पार्वती’ भी कहा जाता है। इनका एक नाम, हेमवती भी है। उपनिषद की एक कथा के अनुसार इन्ही ने हेमवती स्वरूप से देवताओं के गर्व का भंजन किया था। इसलिए इनका नाम हेमवती हुआ।
नवरात्र पूजन में प्रथम दिन की पूजा और उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करके योगसाधना का आरम्भ करते हैं। शैलपुत्री के पूजन करने से मूलाधार चक्र जाग्रत हो जाता है। जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। देवी शैलपुत्री का मंत्र ‘ऊँ ऐं हवीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ शैलपुत्री दैव्यै नमः।’ माँ शैलपुत्री के इस स्वरूप का आवाह्न, पूजन प्रथम दिन के प्रातःकाल में ही होंगें।
द्वितीय ब्रहमचारिणी
माँ दुर्गा की नवशक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी है। दूसरे नवरात्रे अर्थात द्वितीया को माता ब्रह्मचारिणी का पूजन किया जाता है। ब्रह्म शब्द के कई अर्थ हैं। यहाँ ‘ब्रह्म’ शब्द का अर्थ ‘तपस्या’ से तथा ‘चारिणी’ का अर्थ ‘तप का आचरण करने वाली’ से लगाया जाता है। इस प्रकार तपस्चारिणी अर्थात तप का आचरण करने वाली देवी ब्रह्मचारिणी है।
इनका स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। देवी ब्रह्मचारिणी को ब्रह्मज्ञान (ब्रह्म का ज्ञान) कराने वाली देवी भी कहा गया है। इनके दाहिने हाथ में जपमाला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल है। अपने पूर्व जन्म में ये हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थी। तब इन्होने भगवान शंकर जी को प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। इसी कारण इन्हे तपस्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी कहा गया। इन्होने एक हजार वर्ष तक केवल फल खाकर, सौ वर्ष तक केवल शाक पर निर्भर रहकर, खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के विकट कष्ट सहे, इसके बाद केवल जमीन पर टूट कर गिरे बेलपत्रों को खाकर हजारों वर्षों तक भगवान शंकर की आराधना की। पत्तों को भी छोड़ देने के कारण उनका नाम ‘अपर्णा’ पड़ा।
वे खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप सहकर कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार व्रत करती रहीं। इस कठिन तपस्या से देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। उनकी माता मैना से देवी की यह दशा देखी न गई और उन्होनें अत्यंत दुखी होकर देवी को तपस्या से विरत करने के आवाज दी ‘उमा’ अरे नहीं। तब से देवी का एक और नाम ‘उमा’ पड़ गया। उनकी कठिन तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता, ऋषि , सिद्धगण, मुनि सभी देवी की तपस्या की सराहना करने लगे। अन्त में पितामह ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी के द्वारा कहा, ‘हे देवी ! तुम्हारी मनोकामना सर्वतोभावेन पूर्ण होगी तथा भगवान चन्द्रमौलि शिव तुम्हे पति रूप में प्राप्त होंगें। अब तुम अपनी तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ।’
माँ दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों को अनन्त फल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार व संयम की वृद्धि होने लगती है। उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। देवी ब्रह्मचारिणी का मंत्र ‘ऊँ ऐं हवीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ ब्रह्मचारिणी दैव्यै नमः।’ है।
इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में अवस्थित हो जाता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है।
तृतीय चंद्रघंटा
माँ दुर्गा के तृतीय स्वरूप का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्र के तीसरे दिन अर्थात तृतीया को माँ चंद्रघंटा का पूजन किया जाता है। माँ का यह स्वरूप सबके लिए शांतिदायक तथा कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचन्द्र विराजता है। इसीकारण इन्हे ‘चंद्रघंटा’ कहा जाता है। कुछ भक्त इसका अर्थ इस प्रकार लगाते हैं कि ‘चन्द्र घंटाया यस्य सा’ अर्थात जिसके घंटे में आलस्य युक्त चन्द्रमा का वास है। वही चंद्रघंटा कहलाती हैं।
इनके तीन नैत्र तथा दस हाथ हैं। जो खड्ग, बाण आदि दस प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित हैं। इनका शरीर स्वर्ण के समान उज्जवल है। इनका वाहन सिंह है। ये देवी उग्ररूपा तथा युद्ध के लिए उद्यत रहले वाली हैं। भक्तों को अभयदान देने वाली ये देवी अपने घंटे की भयानक प्रचंडध्वनि से दानवों, अत्याचारियों, दैत्यों व राक्षसों का नाश कर डालती हैं। इनके घंटे की ध्वनि भक्तों की प्रेतबाधादि से सदा रक्षा करती हैं। दुष्ट-दमनकारी व विनाशक रूप के बाद भी ये देवी साधक के लिए अत्यंत सौम्य एवं शान्त रहती हैं।
नवरात्रों में तीसरे दिन की पूजा का भी अत्यधिक महत्व है। इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है। कहा जाता है कि इस अवस्था में साधक को दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देने लगती हैं तथा उसे दिव्य सुगंध का अहसास होता है। इस अवस्था में साधक को अत्यंत सावधान रहना चाहिए। साधक को चाहिए कि मन, वचन, कर्म तथा काया से पूर्णतः शुद्ध होकर माता की साधना में रत रहें। ये साधक को सहज ही परमपद का अधिकारी बना देती हैं। इनका ध्यान इहलोक ही नहीं परलोक में भी सदगति देने वाला है।
माँ चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ नष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सदा सद्यः फल दायी है। ये शीघ्र ही भक्तों के कष्टों का निवारण कर देती हैं। इनका उपासक इनके वाहन सिंह की तरह पराक्रमी, वीर और निर्भय हो जाता है। इनकी उपासना से उपासक में सौम्यता तथा नम्रता का विकास होता है। शरीर कांतिमान हो जाता है। उनमें अद्भुत माधुर्य समा जाता है। इनके साधक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हे देखकर शांति व सुख का अनुभव करते हैं। इनके शरीर से अदृश्य दिव्य प्रकाश विकरित होता रहता है। संपर्क में आने वाले लोग इसका प्रत्यक्ष अनुभव करते व प्रसन्नता महसूस करते हैं। देवी चंद्रघंटा का मंत्र ‘ऊँ ऐं हवीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ चंद्रघंटादैव्यै नमः।’ है।
चतुर्थ कूष्माण्ड़ा
माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा देवी है। नवरात्र के चौथे दिन अर्थात चतुर्थी को माँ कूष्माण्डा का पूजन किया जाता है। अपनी मंद हँसी (मुस्कान) से ‘अण्ड़’ अर्थात ‘ब्रह्माण्ड़’ उत्पन्न करने के कारण इन्हे ‘कूष्माण्डा देवी’ के नाम से जाना जाता है। यह सृृष्टि की आदिस्वरूपा और आदि शक्ति हैं। कहा जाता है कि जब सृष्टि नहीं थी और चारों ओर अंधकार ही अंधकार था तब इन्होने अपने ईशत् हास्य से इस संपूर्ण ब्रह्माण्ड़ की रचना की थी। सूर्य लोक में निवास करने की क्षमता कवेल इन्हीं में है; इसलिए इनका निवास सूर्यमण्ड़ल के अंदर के लोक को माना जाता है अतः सूर्य लोक में निवास करने की क्षमता तथा शक्ति केवल इन्हीं में है। दसों दिशाएं इनके तेज व प्रकााश से प्रकाशित हो रहीं हैं। इनका वाहन सिंह है। संस्कृत भााषा में कूम्हडे (सफेद पेठे) को कूष्माण्ड कहा जाता है। इस कारण से भी इन्हे कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। इन देवी को कूम्हडे की बलि सबसे प्रिय है। नवरात्र के चौथे दिन इन्हे कूम्हडे़ (सफेद पेठे) का भोग लगाया जाता है। देवी कूष्माण्डा का मंत्र है। ‘ऊँ ऐं हवीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ कूष्माण्डा दैव्यै नमः।’ है।
इनका शरीर सूर्य के समान दैदिप्यमान तथा रक्तवर्ण का है। ये आठ हाथ (भुजाएँ) धारण करती हैं। इसलिए इन्हे अष्टभुजाधारी भी कहा जाता है। इनके आठ हाथों में से एक हाथ सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला से तथा अन्य हाथ क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत कलश, चक्र तथा गदा से सुशोभित रहते हैं। साधक का मन इस दिन अनाहत चक्र में अवस्थित रहता है। इस दिन पवित्र मन से देवी कूष्माण्डा की पूजा करने से भक्त के सभी रोग दोश नष्ट हो जाते हैं। उसके यश, बल, आयु, और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।
भक्त को चाहिए कि उसे संकल्प व संयम के साथ पुराग्रंथों में वर्णित इन देवी की उपासना अवश्य करनी चाहिए। साधना के पथ पर कुछ ही कदम आगे बढ़ाने पर साधक को माँ की कृपा का अनुभव होने लगता है। ये देवी दुःख भरे संसार में हमें आधियों व व्याधियों से मुक्त रख सुखद व सुगम मुक्ति का अधिकारी बना देती हैं। ये देवी अल्प सेवा से प्रसन्न होने वाली हैं और ये अल्प सेवा से प्रसन्न होकर तथा आशीर्वाद देकर साधक को सुगमता से परम पद दिलाने में सहायक बनती हैं।
पंचम स्कन्दमाता
माँ दुर्गा के पांचवे स्वरूप का नाम स्कन्दमाता है। नवरात्रि में पांचवे दिन अर्थात पंचमी को माँ स्कन्दमाता की पूजा की जाती है। माँ का वर्ण कमल के पुश्प के समान पूर्णतः शुभ्र है और ये कमल के पुष्प पर विराजमान हैं। इसलिए इन्हे पद्मासना भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) की माता होने के कारण दुर्गा के इस पांचवे स्वरूप को स्कन्दमाता कहा जाता है। इनके विग्रह में भगवान स्कन्द अपनी माता की गोद में बालरूप में विराजमान हैं। इनके चार भुजाएं हैं। इसलिए इन्हे चतुर्भुजाधारी भी कहा जाता है। ये अपनी दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कन्द को पकड़े हुए हैं तथा दाहिनी ऊपर को उठी निचली भुजा में कमल पकड़ा हुआ है। देवी स्कन्दमाता का मंत्र ‘ऊँ ऐं हवीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ स्कन्दमातेति नमः।’ है।
ये पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थी तब इन्होने भगवान शंकर जी को प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की और ब्रह्मचारिणी कहलायीं। इन्होंने अपनी तपस्या से भगवान चन्द्रमौलि शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। भगवान स्कन्द को जन्म देने के कारण देवी ब्रह्मचारिणी को भगवान स्कन्द की माता अर्थात स्कन्दमाता होने का गौरव प्राप्त है। एकबार देवासुर संग्राम में कुमार स्कन्द देवताओं के सेनापित भी बने थे। पुराणों में कुमार और शक्तिधर बताकर इनका वर्णन किया गया है। कुमार स्कन्द का वाहन मयूर होने के कारण इन्हे मयूरवाहना के नाम से भी जाना जाता है।
नवरात्र पूजा में इस दिन साधक का मन विशुद्धिचक्र में स्थापित हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस चक्र में अवस्थित साधक के मन से समस्त बाह्य क्रियाओं और चित्तवृत्तियों का लोप हो जाने से उसका ध्यान चैतन्य स्वरूप की ओर बढ़ने लगता है। इस समय साधकों को अपने मन को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए। इनकी उपासना समस्त इच्छाओं को पूर्ण करती है। इनकी पूजा के साथ ही भगवान स्कन्द की पूजा स्वयमेव ही हो जाती है। साधक परमशक्ति व परम सुख का अनुभव करता है। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक आलौकिक तेज व प्रभामंडल से घिरा रहता है। साधक को, इस अवस्था में अपने मन को एकाग्र रखकर माँ के शरणागत हो जाना चाहिए।
इनकी कृपा से मूढ भी ज्ञानी बन जाता है। इनकी साधना भवसागर से मुक्त कर मोक्ष मार्ग को सुलभ बनाने वाली है। अतः साधक को मोक्ष व ज्ञान प्राप्त करने के लिए इनकी पूजा में संलग्न रहना चाहिए।
षष्टम कात्यायनी
माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। नवरात्रि में छठवें दिन अर्थात षष्ठी को माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य तथा दिव्य है। इनका शरीर स्वर्ण के समान दैदिप्यमान है। ये भी चार भुजाएँ धारण करने के कारण चतुर्भुजाधारी कहलाती हैं। माँ कात्यायनी की ऊपर वाली दाहिनी भुजा अभय मुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा वर मुद्रा में उठी हुई हैं। इन्होने अपनी ऊपर वाली बाई भुजा में तलवार तथा नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प धारण कर रखा है। इनका वाहन भी सिंह है। देवी कात्यायनी का मंत्र ‘ऊँ ऐं हवीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ कात्यायनी दैव्यै नमः।’ है।
श्रुतियों के अनुसार कत नाम के प्रसिद्ध ऋषि के पुत्र का नाम कात्य था। उन्ही के नाम से प्रसिद्ध कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध ऋषि कात्यायन का जन्म हुआ था। उन्होने भगवती जगदम्बा को अपनी पुत्री के रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की। भगवती जगदम्बा ने उनको दर्शन देकर उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कालांतर में जब महिषासुर नामक राक्षस के अत्याचार बढ़ गए तो उनका विनाश करने के लिए त्रिदेवों (ब्रह्मा, विश्णु तथा महेष) ने अपने अपने तेज और प्रताप का अंश देकर इन देवी को उत्पन्न किया था। इसके उपरांत देवी ने अपने संपूर्ण अंश सहित महर्षि कात्यायन के घर जन्म लिया। माहिर्शी कात्यायन के घर जन्म लेने के कारण ये देवी कात्यायनी कहलायीं।
अश्विन कृष्ण चतुर्दशी को देवी के जन्म लेने के बाद कात्यायन ऋशि ने शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथियों में इनकी पूजा की, पूजा ग्रहण करने के उपरांत दशमी को देवी कात्यायनी ने महिषासुर का वध किया। साधक का मन इस दिन आज्ञा चक्र में अवस्थित हो जाता है। आज्ञा चक्र में स्थित साधक देवी कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है। अपना सर्वस्व माता को अर्पित करने पर माता साधक पर प्रसन्न हो दर्शन देती हैं। इनके सानिध्य में रहकर साधक को सहजरूप से माँ की कृपा, धर्म, अर्थ, कर्म, काम, मोक्षादि को प्राप्त कर लेता है। अतः माँ कात्यायनी की पूजा अमोघ फल देने वाली है।
कहा जाता है कि ब्रज की गोपियों ने भी श्री कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए यमुना के तट पर इन्ही देवी की पूजा की थी इसलिए ये ब्रज की अधिष्ठात्री देवी के रूप में आज भी प्रतिष्ठित हैं। ये अपने साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने के साथ ही उसके रोग, शोक, संताप और भय आदि को नष्ट कर देती है। इनकी उपासना साधक को परमपद का अधिकारी बनाती है। इसलिए साधक को इनकी साधना में रत रहना चाहिए।
सप्तम कालरात्रि
दुर्गा के सातवें स्वरूप को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि में सातवें दिन अर्थात सप्तमी को माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। माँ का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है किंतु साधक के लिए सदैव शुभ फलदायक है। इसलिए इन्हे शुभंकरी भी कहा जाता है। अतः भक्तों को इनसे भयभीत नहीं होना चाहिए। इनके शरीर का रंग घने अंधकार के समान काला है। इनके सिर के बाल सात लटों में बिखरे हुए हैं। गले में विधुत की भाँति चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र ब्रह्माण्ड़ की तरह गोल हैं। जिनमें बिजली की सी चमक है। ये अपनी नासिका से ज्वालायुक्त भयंकर एवं तीव्र निःश्वास छोड़ती रहती हैं।
इनका वाहन गदर्भ (गधा) है। इनके चार भुजाएं हैं अर्थात ये भी चतुर्भुजाधारी हैं। माँ कालरात्रि के ऊपर वाली दाहिनी भुजा वर मुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा अभय मुद्रा में हैं। ये ऊपर वाली बाई भुजा में लोहे का कांटा तथा नीचे वाली भुजा में खड्ग धारण किए हुए हैं।
इस दिन साधक का मन सहस्त्रारचक्र या भानुचक्र में अवस्थित होता है। कहा जाता है कि भगवती कालरात्रि का ध्यान, कवच, स्तोत्र करने से सहस्त्रार चक्र या भानुचक्र जागृत हो जाता है। इस चक्र में स्थित साधक के लिए समस्त प्रकार की सिद्धियों के द्वार खुलने लगते हैं। साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरूप में स्थित हो जाता है। साधक उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का अधिकारी हो जाता है और उसकी समस्त विध्न बाधाएं व पाप नष्ट हो जाते हैं। उसे अक्ष्य पुण्य लोक की प्राप्ति होती है। माँ के कृपापात्र साधक के अग्नि भय, आकाश भय, भूत-पिशाच भय, शत्रु भय आदि अनेक भय माता के स्मरण मात्र से ही दूर हो जाते हैं। अतः कालरात्रि माता भक्तों को अभय प्रदान करती हैं। देवी कालरात्रि का मंत्र ‘ऊँ ऐं हवीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ कालरात्रि दैव्यै नमः।’ है।
माँ कालरात्रि के विग्रह को मन में बिठाकर एकनिष्ठ भाव से यम नियम व संयम का पालन करते हुए माँ के स्मरण एवं पूजन में रत हो जाना चाहिए। इनकी उपासना से प्राप्त होने वाले शुभों की गणना कोई नहीं कर सकता। अतः अपना शुभ चाहने वाले को इनकी पूजा में लग जाना चाहिए।
अष्टम महागौरी
दुर्गा के अष्टम स्वरूप को महागौरी के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि में आठवें दिन अर्थात अष्टमी को माँ महागौरी की उपासना का विधान है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर (श्वेत) है। इन्हें ब्रह्माण्ड़ की सबसे सुन्दर स्त्री अर्थात विश्वसुंदरी बताया गया है। इसी कारण इन्हे महागौरी कहा जाता है। उनकी गौरता की तुलना शंख, चन्द्र और कुन्द के फूल से की गई है। अष्टवर्षा भवेदगौरी के अनुसार पुराणादि में इनकी आयु आठ वर्ष बतायी गई है। तीन नेत्र वाली इन देवी के वस्त्र और आभूूषण भी श्वेत तथा दिव्य प्रकााश से प्रकाशित हैं। इसलिए इन्हे श्वेतताम्बरधरा भी कहते हैं। इनकी भी चार भुजाएं है अर्थात ये भी चतुर्भुजाधारी हैं। इनका ऊपरी दाहिना हाथ अभय मुद्रायुक्त तथा नीचे के दाहिने हाथ में त्रिशूल है। इनके ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे वाला बाया हाथ वर की शांत मुद्रा में शोभित हो रहा है। इनका वाहन भी वृषभ है। इसलिए इनको भी वृषभारूढ़ा कहते हैं। इनकी उपासना से कोई कार्य असंभव नहीं रहता।
पर्वतराज के घर पार्वती रूप में जन्म लेने के उपरांत इन देवी ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की जिससे इनका शरीर काला पड़ गया। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से मलमल कर धोया तो वह कृशकाय शरीर विधुत के समान कांतिमान गौर हो गया, तभी से इनका नाम गौरी या महागौरी पड़ा और ये विश्व की सबसे सुंदर स्त्री के रूप में जानी गई। इनकी आराधना से सोमचक्र जाग्रत होता है। देवी महागौरी का मंत्र ‘ऊँ ऐं हवीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ महागौरी दैव्यै नमः।’ है। इनकी पूजा व उपासना कल्याणकारी तथा आलौकिक सिद्धियों को देने वाली हैं।
इनकी उपासना सद्यफल देने वाली है। इनकी उपासना सभी कल्मषों को धोकर सभी पापों को नष्ट कर देती है। इनके साधक के पास पाप व संताप भटकते भी नहीं और साधक अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है। ये साधक की वृत्तियों को असत से सत की ओर मोड़कर उसके मुक्ति पाने के मार्ग को सुलभ बनाती हैं।
नवम सिद्धिदात्री
दुर्गा के नवम स्वरूप को सिद्धिदात्री के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि में नवें दिन अर्थात नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की उपासना का विधान है। सभी प्रकार की सिद्धी देने के कारण ये देवी सिद्धिदात्री कहलाती हैं। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार इनकी उपासना से अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। देवी पुराण में भी एक स्थान पर वर्णन आता है कि भगवान शिव ने भी इन्ही की कृपा से सिद्धियाँ प्राप्त की थीं।
इन्हीं की अनुकम्पा से भगवान संसार में अर्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। माता सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। ये कमल के पुष्प पर आसीन होती हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। इनकी दाहिनी नीचे वाली भुजा में चक्र, ऊपर वाली भुजा में गदा और बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प हैं। नवरात्रि पूजन के नवे दिन इनकी पूजा की जाती है। इनकी पूजा के बिना सारी पूजा अधूरी मानी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि नौ दिनरात के पूजा पाठ का फल ये ही प्रदान करती हैं। इनकी आराधना से निर्वाण चक्र जाग्रत हो जाता है। यदि व्यक्ति चाहे तो निर्वाण प्राप्त कर सकता है। देवी सिद्धिदात्री का मंत्र ‘ऊँ ऐं हवीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ सिद्धिदात्री दैव्यै नमः।’ है।
इनका साधक सदगुणी, वीर, सौम्य एवं विनम्र होता है। उसके नेत्र, मुख तथा संपूर्ण शरीर में दिव्य चमक देखी जा सकती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि देवी के ऐसे साधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण विकरित होता रहता है। जो साधारण चक्षुओं से दिखालाई नहीं देता परंतु साधक के संपर्क में आने वाले लोग इसका अनुभव कर लेते हैं। उन्हे आलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है। वे शांति और सुख का अनुभव करते हैं। इनके साधक के स्वर में आलौकिक माधुर्य होता है।
माँ सिद्धिदात्री के साधक को चाहिए कि वे अपने मन, वचन, कर्म एवं शरीर से पूर्णतः शुद्व एवं पवित्र रहकर इनकी उपासना व आराधना में तत्पर रहें। हमें निरंतर माता के पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होना चाहिए। उनकी आराधना इहलोक और परलोक दोनों में सदगति देने वाली तथा समस्त सांसारिक कष्टों से मुक्त करके परमपद का अधिकारी बनाने वाली है।
जगतमाता अम्बिका जी रहस्य
एक बार व्यास जी ने नारद जी से पूछा, ‘‘मुने ! मुझे यह बताने की कृपा करें कि इस विस्तृत ब्रह्माण्ड़ के प्रधान कर्ता कौन हैं? यह ब्रह्माण्ड कहाँ से उत्पन्न हुआ है ? यह विनाशशील है या अविनाशी? इसके रचियता एक है या अनेक ? कुछ विद्यवान शंकर जी को, कुछ विष्णु जी को, कुछ ब्रह्मा जी को, कुछ सूर्यदेव को तथा कुछ शतक्रतु इन्द्र को तथा दूसरे अन्य सम्प्रदाय वालों में कुछ वरूण को, कुछ सोम को, कुछ अग्नि को, कुछ पवन को, कुछ यम को कुछ कुबेर को एवं कुछ गणेश को प्रधान देवता स्वीकार करते हैं।
कुछ आचार्य बताते हैं कि भवानी आद्यशक्ति महामाया के रूप में परमपुरूष के साथ रहकर सृष्टि कार्य संपादित करती है। ये हमेशा सृष्टि, स्थिति व प्रलय के कार्य में लगी रहती हैं। ये देवी ही सृष्टि के समय संपूर्ण जगत के प्राणियों को बनाती हैं। ये देवी अजन्मा, पूर्ण व सर्वव्यापक होने के कारण सकल विश्व की अधिष्ठात्री कहलाती हैं। इनका विग्रह सगुण, निर्गुण तथा कल्याणमयी है। संसार रूपी वृक्ष को धारण करने वाली इन देवी का स्मरण मात्र ही काम्य वस्तुओं की प्राप्ति, मुक्ति तथा अभीष्ट फल देने वाला है।
जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ कि कुछ आचार्य भगवान शंकर को इस ब्रह्माण्ड का रचियता बताते हैं। वे उन्हे अविनाशी, अजन्मा, आत्मा में रमण करने वाले, देवताओं के शासक, तीनों गुणों (सत्व, रज और तम) से युक्त होते हुए भी इनसे रहित संसार के उद्धार के लिए सदा तत्पर रहने वाले हैं। वे इन्हें ही सृष्टि, स्थिति व प्रलय का आदि कारण बताते हैं।
कुछ लोग भगवान विष्णु को शक्तिशली पुरूष, अव्यक्त, अखिल एश्वर्य से सम्पन्न परब्रह्म परमात्मा मानते हैं। ये शांत स्वरूप भगवान भक्ति और मुक्ति देने वाले हैं। ये अजन्मा, विश्व को शरण देने वाले हैं। रहस्य के जानकार इन्हे ही पुरूषोंत्तम कहते हैं। उनके अनुसार आकाश इन श्री विष्णु का चरण है। कुछ लोग ब्रह्मा को निर्विकार, निरंजन, निराकार, निर्लेप एवं सर्वव्यापक मानकर उनसे समस्त जगत की सृष्टि मानते हैं। ब्रह्मा जी को ही वेद और उपनिषदों का तेज बताया जाता है।
कुछ आचार्य इस ब्रह्माण्ड को अनिश्वरी मानते हैं अतः ये आचार्य नास्तिकता के जन्म देने वाले जगत को, अचिन्त्य तथा सदा बना रहने वाला मानते हैं। इनके अनुसार देवताओं में सभी सत्व गुण व धर्म विधमान रहते हैं। दुरात्मा और दैत्य उन्हे सदा पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। फिर धर्म की मर्यादा ही कहाँ रह जाती है। कुछ सूर्यदेव को इस जगत का सृष्टा तथा आत्मा बताते हैं। वे इन्हे सृष्टि का पालक व संहारक भी मानते हैं। इसलिए देव त्रिकाल इन्ही की स्तुति व यशोगान करते हैं। कुछ लोग हजार नेत्र वाले शतक्रतु इन्द्र को संपूर्ण प्राणियों का स्वामी मानते हैं। यज्ञेश, सुरेश व त्रिलोकी की संज्ञा इन्हीं को देते हैं। हे देव ! मेरे इस संशय को दूर करें क्योंकि में अपने इसी ज्ञान रूपी विचार में डूबता, गिरता व अचेत होता रहता हूँ।
नारद जी ने उत्तर में कहा, व्यास जी ! प्राचीन समय में मैं भी इसी संशय में पड़ गया था। इस संशय के निवारण के लिए मैने अपने पिता ब्रह्मा जी से यही प्रश्न किया तो उन्होने कहा, बेटा! यह प्रश्न बहुत ही जटिल है। भगवान विष्णुजी मेरे जनक ही इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। पूर्व काल में जब सर्वत्र जल ही जल था। उस समय सूर्य, चन्द्र, वृक्ष व पर्वत आदि कुछ भी नहीं थे। स्थावर, जंगम प्राणियों में कोई नहीं था तब उनके नाभि कमल से मेरी उत्पत्ती हुई थी।
मैं सोचने लगा कि इस जल में मेरा जन्म किस हुआ। इसका रक्षक, सृष्टा व संहारक कौन है ? यह कमल कहाँ से आया? यह कहाँ टिका है ? इसलिए में कमल नाल के सहारे एक हजार वर्ष तक भटकता रहा, परंतु इसका मूल नहीं मिला। इसी समय भविषवाणी हुई ‘तप करो। तप करो’। मैने बहुत समय तक तप किया।
जब संपूर्ण जगत (विश्व) एकार्णव (एक अणु) में निमग्न था और भगवान विष्णु शेषनाग की सैय्या पर योगनिद्रा में लीन थे। इसी समय विष्णु जी के नाभि कमल से मैं उत्पन्न हुआ था। इसके कुछ समय बाद भगवान के कानों के मैल से दो भयंकर असुर मधु व कैटभ उत्पन्न हुए। दोनों धीरे-धीरे तरूण हो गए।
अपने आसपास किसी को न पाकर तथा आकाश में उच्चरित वांगबीज को सुनकर मधु व कैटभ तपस्या करने लगे। उन्होने एक हजार वर्श तक तपस्या की। मधु व कैटभ की तपस्या से प्रसन्न होकर शक्ति द्वारा भविष्यवाणी हुई। उन्होने दैत्यों से कहा, ‘‘मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। तुम वर मांगो मैं उसे पूर्ण कर दुंगी।’’ इस पर मधु व कैटभ ने स्वेच्छा मरण का वर माँगा तो आकाशवाणी ने उन्हे किसी से भी पराजित ने होने तथा स्वेच्छा मरण का वर दिया। इस वर को पाकर उन्हे अभिमान हो गया।
एक दिन उनकी दृष्टि कमल के आसन पर विराजमान मुझ पर पड़ी तो वे दोनो मेरा वध करने के लिए आगे बढे। उनकी मनसा देखकर मैं कमल का ड़ंठल पकड़कर जल में उतरा, तो मेघ के समान श्याम रंग वाले चार भुजाओं से युक्त पीताम्बरधारी अद्भुत पुरूष भगवान विष्णु शेषनाग की सैय्या पर योगनिद्रा लीन थे। ये शंख, चक्र, गदा और पद्म से शोभित थे। उन्हे निद्रमग्न देखकर तथा अपने आप को खतरे में जानकर मैं सोचने लगा कि मुझे उन योगनिद्रा का स्तवन करना चाहिए जिनके प्रभाव से भगवान तक हिलडुल नहीं सकते और उनकी इच्छा के बिना कुछ हो भी नहीं सकता। इस प्रकार मैं समझ गया कि यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड महामाया के आधीन है।
तब मैने भगवती निद्रादेवी की स्तुति की। मेरी स्तुति से योगामाय भगवान जनार्दन के शरीर से निकल खड़ी हो गई। तब श्री हरि ने उठकर मधु और कैटभ से 5000 वर्ष तक बाहु युद्ध किया। महामाया के मोह में ड़ाल देने के कारण दोनो राक्षस भगवान से बोले, ‘‘ हम तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हैं। हमसे कोई वर मांगो।’’ तब श्री हरि ने कहा कि यदि मुझ पर प्रसन्न हो तो मेरे हाथों से मारे जाओ। इस प्रकार मोह में पड़ जाने पर दोने ने कहा कि जहाँ जल न हो वहीं हमारा वध करना। तब श्री हरि ने अपनी जाँघ पर सिर रखकर उन दोनो का वध किया।
मधु व कैटभ के वध के उपरांत मैं और भगवान विष्णु ही वहाँ विराजमान थे। इसी समय न जाने कहाँ से भगवान रूद्र वहाँ प्रकट हुए। जब हम तीनों एक दूसरे के बारे में जानने के बारे में सोच ही रहे थे कि तभी आद्यशक्ति ने अपना दिव्य रूप में हमें दर्शन दिए। हम अनजाने ही उनकी उत्तम स्तुति करने लगे। हमारी स्तुति से प्रसन्न होकर उन्होंने हमसे कहा, तुम तीनों अपनी सृष्टि, स्थिति तथा संहार कार्यो में लग जाओ। उस वक्त उन्होने मुझे सृष्टि रचना का कार्य, विष्णु को सृष्टि के पालन का कार्य तथा रूद्र को संहार कार्य करते हुए चार प्रकार की सृष्टि (अण्डज, पिण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज) की रचना करो।
इस पर हम लोगों ने उन से पूछा,‘ हे माते ! पंचतत्व उनके गुण तथा तन्मात्राओं और इन्द्रियों के अभाव में जहाँ चारों ओर जल ही जल है तो सृष्टि किस प्रकार रची जायेगी। कृपया हमें कार्य करने की शक्ति, सामर्थ्य तथा स्थान दें।
देवी ने मुस्करा कर एक विमान हमारे सामने प्रकट कर दिया और हमें उसमें बैठने की आज्ञा दी। हम बिना सोचे उस में बैठ गए। वह दिव्य विमान हमें लेकर आकाश में उड़ गया। अमरावती के समान दिव्य विमान मोतियों से सुशोभित था। यह विमान मन के समान गतिमान होकर पर्वत, वन, उपवन, स्त्री पुरूष, पशु, पक्षी, बावली, कुएँ पौखरों व झरनों से सुशोभित एक अपरिचित स्थान पर पहुँचा। यह विमान आगे चलकर एक ऊँचे-ऊँचे भवनों वाले नगर में पहुँचा। बड़ी-बड़ी यज्ञशालाओं वाले इस अद्भुत नगर में पुरूष रागरंग में व्यस्त थे। वहाँ का राजा एक देव के समान एक दिव्य पुरूष था। यहीं हमें विमान पर भगवती जगदम्बा भी दिखाई दीं।
पिताजी ने आगे बताया कि इससे पहले कि इस नगर के बारे में कुछ इच्छा जता पाते। हमारा विमान इस सुंदर स्थान को छोड़कर पुनः आकाश में उड़ चला। क्षण भर बाद ही हम एक अन्य लोक में थे। वहाँ हम तीनों को नन्दन वन, पारिजात वृक्ष तथा इसकी छाया में बेठी सुरभी गाय, एरावत हाथी आदि के साथ ही सैंकडों अप्सराएँ, यक्ष, गंधर्व, विद्याधर आदि को गाते, विहार करते तथा बैठे हुए देखा। यही पर इन्द्रदेव अपनी प्राण प्रिया शची के साथ विराजमान थे। यहीं पर जल के स्वामी वरूण के साथ कुबेर, यमराज, सूर्यदेव, अग्निदेव, आदि विराजमान थे। सजे हुए इस नगर के राजा इन्द्रदेव थे इसलिए यह स्वर्ग था। यह समझते हमें देर ने लगी। अभी हम इस लोक को ठीक से देख भी नहीं पाए थे कि हमारा विमान पुनः उड़ चला। इस प्रकार यह विमान हमें लेकर तीसरे लोक जा पहुँचा।
इस लोक में दूसरे ब्रह्मा जी विराजमान थे। उनके सामने सभी देव अपना मस्तक झुका रहे थे। सभी वेद व उपनिषद अपने अंगों सहित मानव रूप धारण करके यहाँ विराजमान थे। यहाँ पर पर्वत, नदियाँ, सागर आदि भी एकत्रित थे। इस पर आश्चर्य चकित होकर भगवान विष्णु तथा रूद्र ने ब्रह्माजी से प्रश्न किया। ब्रह्मा जी ये अविनाशी कौन हैं ? तब मैने उत्तर दिया, ‘पता नहीं सृष्टि के अधिष्ठाता ये कौन हैं ? इनका उद्देश्य क्या है ?’ यह सोचते-सोचते हमारा मन व बुद्धि दोनों चकरा रहे थे। तभी विमान पुनः गतिमान होकर चौथे लोक जा पहुँचा।
कैलाश के समान सुरम्य पर्वत पर मंदार के वन में यक्ष विहार तथा पक्षी कलरव कर रहे थे। दिव्यवाद्य यंत्र (पखावज, वीणा आदि) की दिव्य ध्वनि मन मोह रही थी। यहाँ भगवान महादेव की शाही सवारी निकल रही थी जिसमें त्रिनेत्रधारी, पंचमुखी, दशभुजधारी भगवान शंकर, नन्दी वृषभ पर विराजमान थे। सर्वप्रथम पूज्य महाशक्तिशाली गणेश, देवताओं के सेनापति कार्तिकेय तथा अन्य शिवगण आदि भगवान शंकर के अगल-बगल जय ध्वनि करते हुए चल रहे थे। रूद्र के समान रूपधारी शंकर को वहाँ देख हम एक बार फिर आश्चर्य में पड़ गए तभी विमान ने पुनः गति पकड़ी और हमें पाँचवे लोक ले पहुँचा।
यह लोक बैकुण्ठ के समान था। यहाँ अपनी अथाह धन संपत्ती के साथ महालक्ष्मी जी कमल लोचन, चार भुजाधारी श्री हरि के साथ पक्षीराज गरूड़ पर विराजमान थीं। श्री हरि अलसी के फूलों के समान पीताम्बर धारण किए हुए थे। एक स्थान पर हमने देखा कि श्री हरि वट वृक्ष के एक पत्ते पर शिशु रूप में विराजमान हैं। महालक्ष्मी जी उन्हे चँवर डुला रहीं हैं। शिशुरूप में श्री हरि को देख हम पुनः आश्चर्य में पड़ गए। हमारे सामने एक के बाद एक आश्चर्यजनक जनक घटनाएँ घटित हो रहीं थीं और हमारे मन में कोई विचार आता उससे पहले हमारा विमान उस लोक को छोड़कर पुनः उड़ने लगता। इस बार भी ऐसा ही हुआ। विमान पुनः उड़ा तथा हमें लेकर छठे लोक जा पहुँचा।
इस लोक के मधुर जल वाले सागर में जलचर तैर रहे थे। इसके एक मनोहर द्वीप पर मंदार व पारिजात के वृक्षों के मध्य भूमि पर मोती व मालाओं से सजे बिस्तर बिछे हुए थे। इस द्वीप पर अशोक, केतकी व चम्पा के मनोहर वृक्षों पर कोयलें कूक रहीं थी। भौरे गुनगुना रहे थे। सर्वत्र सुगंध फैली हुई थी। बिस्तरों के मध्य रत्नादि से सजे एक षट्कोणिय विमान पर लाल वस्त्र, लाल माला, लाल चन्दन, व लाल दाँतों से सुशोभित दिव्य स्त्री विरामान थीं। उनकी प्रभा करोड़ों बिजलियों के समान तथा चमक करोड़ों सूर्यों के समान थी। उनके पास बैठे साधक ‘हीं’ मंत्र का जाप कर रहे थे। उनकी सखियाँ उन्हे भुवनेशी, भुवनेश्वरी, माहेष्वरी आदि नामों से पुकार रहीं थीं।
इन देवी को देखकर हम तीनों देव सोचने लगे कि हजार हाथ, हजार मुख तथा हजार नेत्र वाली ये सुन्दरी कौन है ? इसका क्या नाम है ? हम इनके बारे में कुछ भी नहीं जानते। ये न तो अप्सरा है न गंधर्व कन्या और न ही ये देव कन्या हैं। ये दूर से देखने में कितनी सुंदर लग रही हैं। भगवान विष्णु जान गए कि ये ही भगवती जगदम्बा हैं। पूर्ण प्रकृति, अजन्मा, अज्ञानियों की समझ में न आने वाली ये देवी ही महाविद्या तथा महामाया हैं। नित्य तथा नित्य विग्रह वाली ये देवी ही विश्वेश्वरी, वेदगर्भा एवं शिवा कहलाती हैं। विशाल नेत्रों वाली, सर्वबीजमयी देवी आदि जननी हैं तथा प्रलयकाल में सबको आपने शरीर (विग्रह) में लीन कर लेती हैं। भगवान विष्णु बोले ये ही मूल प्रकृति है। प्रलय के समय ये मुझे दिखाई दी थीं। ये परमशक्ति परमपुरूष के साथ रहती है। ये ब्रह्माण्ड़ की रचना करके दिखाती हैं कि परम पुरूष द्रष्टा है तथा जगत दृश्य है। ये परम पुरूष की आदि शक्ति हैं। प्रलयार्णव के समय में बालक बनकर जब मैं वट वृक्ष के पत्ते पर लेटा हुआ अपना अंगूठा पी रहा था तब ये देवी मुझे लोरी गाकर झुला रही तथा सुला रही थी।
हम तीनों समझ गए कि ये ही महामाया हैं। हम तीनों ने महामाया के पास जाकर वर पाने का निश्चय कर लिया जैसे ही हम तीनों विमान से उतर कर देवी के द्वार पर पहुँचे तो उन्होंने मुस्करा कर हमे देखा। उनके देखते ही हम स्त्री रूप में बदल गए। त्रिदेव हाथ जोड़कर माता के चरणकमलों को निहारने लगे। तो हमने देखा कि उनके नख दपर्ण के समान हैं। जिसमें स्थावर जंघम, संपूर्ण ब्रह्माण्ड़, त्रिदेव, वसु, अग्नि, यमराज, सूर्य, चन्द्र, वरूण, कुबेर, त्वष्टा, इन्द्र, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, गंधर्व, अप्सराएँ, विश्वानु, चित्रकेतु, नारद, तुम्बरू, अश्विनी कुमार, वसुगण, सिद्ध, पितर, नाग, किन्नर, राक्षस, ब्रह्मलोक, बैकुंठ व कैलाश दिखाई दे रहा था। वहीं एक कमल पर चार मुख वाला मैं तथा शेष सैय्या पर भगवान विष्णु व मधुकैटभ दिखाई दे रहे थे।
यह सब देख हम तीनो आश्चर्य में पड़ गए। अब हम समझ गए कि हमारे साथ लीला करने वाली ये देवी ही अखिल ब्रह्माण्ड़ की जननी हैं। तब तीनों ने बारी-बारी से भगवती भुवनेश्वरी की स्तुति की। तब महादेवी ने प्रसन्न होकर कहा, ‘‘मैं और ब्रह्मा एक ही हैं। इसमें लेसमात्र भी दोष नहीं हैं। केवल बुद्धि के भ्रम से भेद को जाना जाता है। जो बुद्धिमान है तथा जो यह जान लेता है जो वे हैं, वही मैं हूँ, और जो मैं हूँ वही वे हैं। वही बुद्धिमान पुरूष संसार सागर से मुक्त हो जाता है। इसमें संदेह नहीं है।’’
इसके उपरांत नारद जी पुनः बतलाने लगे कि ये संसार रचना के समय द्वैत को प्राप्त होती हैं। दपर्ण की तरह कार्य कारण के भेद के कारण ही हमारे प्रतिबिम्ब अलग-अलग कहलाते हैं। पृथ्वी तभी तक ही प्राणिमात्र को धारण करती है जब तक ये उनके साथ हैं। यदि पृथ्वी इन शक्ति से हीन हो जाए तो परमाणु तक को भी वह धारण नहीं कर सकती। प्राणी हिलडुल भी नहीं सकते। उस शक्ति से रहित हो जाने पर ये निष्प्राण हैं।
विचार करने पर ज्ञात होता है कि परमाणु तक नष्ट हो जाते हैं परंतु क्षणिक होने के बावजूद इस सृष्टि में महतत्व का अभाव नहीं होता। कर्ता के आधीन होने के कारण वह नित्य होते हुए भी अनित्य के समान रहता है। यह महतत्व सात भागों में बट जाता है। महदेवी ने पुनः कहा कि ब्रह्मा जी मैं तुम्हे महतत्व देती हूँ इसे लो और पुनः पहले की तरह सृष्टि रचो क्योंकि महतत्व से अहंकार उत्पन्न होता है। ब्रह्मा जी तुम रजोगुण संपन्न महासरस्वती नामक मेरी शक्ति को अपनी स्त्री के रूप में स्वीकार करो। इसे मेरी विभूति समझकर आदर व सम्मान से देखना। इसका तिरस्कार वांछित नहीं है।
तुम इसे लेकर सत्य लोक पधारो तथा महतत्व का सहारा लेकर अण्डज, पिण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज नामक चार प्रकार की सृष्टि रचना करो परंतु ध्यान रखो कि काल, कर्म, स्वभाव, गुण आदि के करणों के अनुसार ही चराचर जगत की रचना करनी है। उन्होने ब्रह्मा जी को सदा विष्णु जी का आदर करने को कहा। इस प्रकार आदेश देकर भगवती ने भगवान विष्णु की ओर रूख किया।
उन्होने विष्णु जी से कहा कि आप सत्वगुण प्रधान होने के कारण सब तरह से श्रेष्ठ हो। जब-जब जगत में कठिन कार्य पैदा होगा तब-तब तुम अवतार लेकर दानवों का संहार करोगे। इस कार्य में महादेव जी तुम्हारी सहायता करेंगें। उन्होने सत्वगुण प्रधान महालक्ष्मी को भगवान विष्णु को सौपा और कहा कि यह सदैव तुम्हारे वक्ष स्थल में विराजमान रहेंगीं। इनका सदा आदर करना इनका तिरस्कार कभी मत करना। संपूर्ण मनोरथों वाली लक्ष्मी जी के मिलने पर आप लक्ष्मीनारायण कहलाओगे।
इसके उपरांत वे महेश्वर से बोली कि यह मेरी शक्ति महाकाली हैं जो गौरी के नाम से प्रसिद्ध है। महेश तुम इन्हे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करो। तुम सृष्टि में संहार तथा संहार में सृष्टि स्वरूप दर्शाओ। तुम्हारी लीलाओं में तमोगुण की प्रधानता रहेगी, फिर भी तुम तीनों गुणों से संपन्न रहोगे।
तुम तीनों महान पुरूष हो। विष्णु सत्वगुण प्रधान हैं शेष दो गुण, उनमें गोण रूप में विराजमान हैं। ब्रह्मा जी रजोगुण प्रधान हैं तथा उनके शेष दो गुण, उनमें गोण रूप में विराजमान हैं। इसी प्रकार रूद्र तमोगुण प्रधान हैं तथा शेष दो गुण, उनमें भी गोण रूप में विराजमान हैं।
मेरा मंत्र तीनों गुणों से पूर्ण हैं। पहला वाग्बीज ‘ऐं ’ तथा दूसरा कामबीज ‘क्लीं ’ और तीसरा मायाबीज ‘ह्वीं ’ जब प्रणव ‘ऊँ ’ के साथ मिलाने पर नर्वाण मंत्र बनता है। जो मेरे महामंत्र, बीजमंत्र या नवार्ण मंत्र से जप या तप करेगा या मेरे नामों का जप करेगा। उसके कल्याण के लिए मैं सगुण या निगुर्ण रूप में प्रकट होकर उसका कल्याण करूँगी।
मेरा विग्रह सर्वोत्तम है। मैं परमपुरूष के साथ सदा कारण होकर रहती हूँ। मैं कार्य कभी नहीं होती। मैं कारण श्रेणी में सगुण रूप में तथा परम पुरूष के साथ निर्गुण रूप में रहती हूँ।
महतत्व से अहंकार उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह अहंकार मुझ से उत्पन्न होता है। अहंकार सत्व, रज और तम तीनों गुणों से परिपूर्ण है। अहंकार से तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं। सबके सृजन में पंचभूतों के साथ क्रमशः 5 कर्मेंन्द्रियाँ, 5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 महाभूत तथा 16वाँ मन उत्पन्न होता है। इन 16 पदार्थो के समुदाय ही प्राणी कहलाते हैं। अब आप अपने-अपने लोकों को अपनी-अपनी शक्ति के साथ प्रस्थान करें तथा सृष्टि कार्य संपन्न करें। नारद तुम मेरे इस उत्तर से संतुष्ट होओगे। इस प्रकार हम तीनों ने यह मान लिया कि हम आदिशक्ति महामाया तथा आदिपुरूष की संतान हैं। सभी प्राणियों को भी उन्ही का ध्यान करना चाहिए जिनका ध्यान मैं, विष्णु तथा रूद्र करतें हैं।
संक्षेप में हम बस इतना समझ सकते हैं कि मूलतः माँ जगदम्बा ही सृष्टि की आधार शक्ति हैं। वे सक्ष्म होते हुए भी सृष्टि के सृजन, विकास व संहार का कार्य स्वयं नहीं करतीं बल्कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) को इस कार्य के लिए प्रेरित करतीं हैं और उनकी इच्छानुसार यह संपूर्ण विश्व और सर्वशक्तिमान काल (समय) दोनों गतिशील रहते हैं।
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प्राचीन समय में एक निर्धन वैश्य रहता था। वह महान दुखी था। कौसल देश के किसी सज्जन पुरूष ने उसका विवाह करा दिया। भगवत कृपा से उसके अनेक बच्चे हुए। गरीबी के कारण उन्हे भरपेट भोजन नहीं मिलता। जिस कारण वे हमेशा भूखे रहते थे। वह वैश्य दूसरों की सेवा में लगा रहता था। जिसके कारण सायंकाल में वैश्य के परिवार को खाने के लिए कुछ मिल जाता था। इस प्रकार बड़ी कठिनता से उसके परिवार का भरण पोषण हो रहा था।
वह वैश्य सत्यवादी, सदाचारी तथा धर्म में तत्पर रहने वाला था। मन के चिन्ता ग्रस्त रहने के उपरांत भी वह इंन्द्रियों से शांत रहता था। वह अपने मन में ड़ाह, लोभ, मोह, काम क्रोध व अहंकार को कभी नहीं आने देता था। वह देवताओं, पितरों व अतिथियों को भोजन कराने के उपरांत ही स्वयं भोजन करता था। यह उसका प्रतिदिन का नियम था। लोगों ने उसके उत्तम गुणों के कारण उसका नाम सुशील रख दिया।
एक दिन एक मुनि उसके घर आए। अपने नियम के अनुसार उसने दरिद्रता से परेशान रहने के बाद भी शांत बुद्धि से उन्हे भोजन कराया। फिर उसने मुनि से पूछा, ‘‘ब्राह्मण देवता ! आपकी बुद्धि बड़ी विलक्षण है। आप मुझे पर कृपा कर बताओं कि मेरी दरिद्रता निश्चय कर कैसे दूर होगी। हे मुनिवर ! मुझे धन की चाह नहीं है। मैं खूब संपन्न भी नहीं होना चाहता। आपसे पूछने का मेरा केवल इतना ही अभिप्राय है कि मुझमें अपने परिवार के भरण पोषणण की शक्ति आए। मेरे बच्चे भोजन के लिए तरसते रहते हैं। घर में मुठ्ठी भर भी अन्न नहीं है। मेरे कुछ बच्चों ने रोते हुए घर त्याग दिया है। मेरी बड़ी बेटी शादी के लायक है। अतः मेरे हृदय में चिन्ता की आग लगी हुई है। परंतु धन के अभाव में क्या करूँ ? हे ब्राह्मण देव ! आपसे कोई बात छिपी नहीं है। मेरा मन चिन्तित रहता है। तप, दान, व्रत, मंत्र, एव जप जो कोई भी उपाय बताओ ताकि मैं अपने परिवार का भरण पोषण सुचारू रूप से कर सकूं। मुझे इससे अधिक की चाह नहीं है। हे महाभाग ! आपकी कृपा से मेरा परिवार सुखी हो जाए ऐसा सोचकर मुझे कोई उपाय बताईए।’’
इस पर श्रेष्ठ मुनि ने वैश्य से कहा कि हे वैश्यवर ! तुुम श्रेष्ठ नवरात्र व्रत का पालन करो। इसमें देवी जगदम्बा की पूजा, हवन और ब्राह्मण भोजन कराना होता है। इसमें वेद का पारायण, भगवती के मंत्र का जप और होमआदि किए जाते हैं। परंतु तुम इस समय इसे अपनी शक्ति के अनुसार करो। तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा। वैश्य इस जगत में इस व्रत से बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं है। इसे नवरात्र व्रत कहते हैं। इससे निरंतर करने पर सुख व संतान में वृद्धि होती है, शत्रु अपने पैर नहीं जमा पाता तथा अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भगवान राम वनवास गए। उसके बाद उनकी सीता का हरण हो गया। सीता के वियोग में नारद जी के कहने पर उन्होनें किष्किंधा में यह व्रत किया। उन्होने नवरात्र व्रत करके भगवती की एक सौ आठ कमल पुष्पों से उनकी उपासन की। ऐसा वर्णन मिलता है कि जब वे देवी की स्तुति मंत्रों तथा कमल पुष्पों से कर रहे थे। तो उनका एक पुष्प कम पड़ गया। इस पर उन्हे बचपन के माता के वे शब्द याद आऐ जब वे उन्हें कमलनयन कहकर पुकारती थीं। इस पर उन्होंने एक सौ आठवें कमल के स्थान पर अपने नेत्र को चढ़ाने के लिए जैसे ही अपनी तीर उठाया देवी माता उनके सामने प्रगट हो गईं। उन्होंने भगवान राम को रावण पर विजय प्राप्त करने का वर दिया। इसके उपरांत उन्होने सागर बाँधा और रावण का वध कर सीता को प्राप्त किया तथा अयोध्या पर निष्कंटक राज्य किया। भगवान श्री राम को यह सुख नवरात्र व्रत के प्रभाव से ही सुलभ हुआ था।
इस बात को सुनकर वैश्य ने उन मुनि को अपना गुरू बना लिया। मुनि ने खुश होकर उन्हे मायाबीज नामक भुवनेश्वरी मंत्र की दीक्षा दी। इसके उपरांत सुशील ने संयम पूर्वक नवरात्र व्रत आरम्भ किया। यथा शक्ति भगवती का आदर पूर्वक पूजना करता रहा। नवें वर्ष नवरात्र के अंतिम दिन अष्टमी को भगवती ने वैश्य को दर्शन दिए। माँ भगवती ने वैश्य को विविध प्रकारा के वर देकर कृतकृत्य कर दिया।
जिस प्रकार वैश्य की बुद्धि माता भगवती में लगी उसी प्रकार मेरी बुद्धि भी माता में लगे और मैं भी उनकेे दर्शन पाकर कृतकृत्य हो जाऊँ। ऐसी माता भगवती से प्रार्थना है।
नवरात्र व्रत कथा . 02
मनोहर नामक नगर में एक अनाथ नामक ब्राह्मण रहता था। वह भगवती दुर्गा का अनन्य भक्त था। उसके सुमति नाम की एक सुंदर कन्या थी। सुमति अपने पिता अनाथ के पूजा पाठ में सहयोग करती थीं। एक दिन वह सखियों के साथ खेलने मे व्यस्त रहने के कारण पूजा में उपस्थित नहीं हो सकी। इस असावधानी पर ब्राह्मण ने पुत्री से कहा कि तूने आज भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण तेरा विवाह किसी कुष्ठरोगी तथा दरिद्र से करूँगा।
पिता के वचन सुन सुमति को बहुत दुख हुआ। उसने दीन वचन में पिता से कहा, ‘‘पिताजी ! मैं आपकी पुत्री हूँ। इसकारण आपके आधीन हूँ। आप जैसा चाहेंगें मैं वैसा ही करूँगी। आप जिसके साथ भी मेरा विवाह कर देंगें। मैं उसी को अपना पति स्वीकार कर लुँगी। होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है। मेरे भाग्य में लिखे को कोई नहीं मिटा सकता।’’
कन्या के वचन सुनकर ब्राह्मण को और अधिक क्रोध आया। उन्होने तभी एक कुष्ठी व दरिद्र को देखकर उसके साथ कन्या का विवाह कर दिया। मेरे घर से जल्दी से जल्दी से जाओं और अपने भाग्य या कर्म को भोगो। सुमति अपने पति के साथ सहर्ष ससुराल चली गई। उसका पति भयानक वन में रहता था। उसकी वह रात पति के साथ कुशायुक्त स्थान पर बड़े कष्ट से कटी।
उन गरीब पति-पत्नी की दशा देखकर माता भगवती बड़ी दुखी हुई। वे पूर्व पुण्य के प्रभाव से सुमति के सामने प्रकट हुई और कहने लगी, ‘‘ हे दीन ब्रह्माणी ! मैं तुम्हारे पूर्व जन्म और इस जन्म के पुण्य कर्म से तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहो वरदान माँग सकती हो। मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूँ।’’
भगवती के वचन सुनकर सुमति ने भगवती से पूछा, ‘‘ आप कौन हैं ? जो मुझ पर प्रसन्न हो वर प्रदान करना चाहती हैं। ’’
इस पर देवी ने कहा, ‘‘ मैं जगत माता जगदम्बा हूँ। मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के कारण प्रसन्न हूँ। तुम पूर्व जन्म में एक निषाद की पतिव्रता पत्नी थीं। तेरा पति चोर था। सिपाहियों ने एक दिन तेरे पति तथा तुझ को चोरी के जुर्म में पकड़ कर कैद में डाल दिया। उन लोगों ने तुम्हे भोजन भी नहीं दिया। ये नवरात्रे के दिन थे। अनजाने में ही तुमसे नौ दिन के नवरात्रों का व्रत हो गया। हे ब्रह्माणी ! तेरे उसी कर्म के कारण तुझे मनोवांछित वस्तु देने को तैयार हूँ।’’
इस पर ब्राह्मणी बोली, ‘‘हे माता ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तथा वर देना ही चाहती हैं तो आपसे अनुरोध है कि आप मेरे पति के कुष्ठ तथा दरिद्रता को दूर करें।’’ देवी तथास्तु कहकर अंतर्धान हो गईं।
इस प्रकार उसके पति का शरीर भगवती की कृपा से कुष्ठ रहित और कांतिवान हो गया। शीध्र ही वे धन धान्य से परिपूर्ण हो गाए।
दुर्गासप्तशती
दुर्गा सप्तशती की रचना : - जैसा कि हम जानते हैं कि त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि भृगु, महर्षि वसिष्ठ तथा महर्षि कश्यप द्वारा भी इस व्रत का अनुष्ठान किया जा चुका है। इस व्रत की महिमा को जानकर ब्रह्माजी, वसिष्ठ जी तथा विश्वामित्र जी द्वारा 700 श्लोकों की रचना की गई। श्लोको की संख्या सप्त शत (सात सौ) होने के कारण इन सात सौ श्लोकों के संग्रह को ‘सप्तशती’ कहा जाता है। इस एक तंत्रोक्त ग्रंथ है। इसमें वशीकरण, मारण, मोहन, उच्चाटन, स्तंभन, विद्वेषण आदि से संबंधित मंत्र हैं।
इसमें 90 मारण, 90 मोहन, 200 उच्चाटन, 200 स्तंभन, 60 वशीकरण तथा 60 विद्वेषण से संबंधित मंत्र है। इस प्रकार कुल मिलाकर दुर्गासप्तशती में सात सौ (700) श्लोक हैं।
इस प्राकर दुर्गा सप्तशती की रचना हो गई। इसकी रचना के उपरांत जब तीनों ( ब्रह्माजी, वसिष्ठ तथा विश्वामित्र जी) ने योगबल से देखा कि जब-जब कलियुग आयेगा तो अधर्म का बोलबाला हो जायेगा । मानव अपने स्वार्थ के लिए इन मंत्रों का उपयोग दूसरों के अहित के लिए करने लगेगा। इस ग्रंथ के दुरूपयोग के बारे में सोच तीनों ने जल हाथ में लेकर अपनी संकल्प शक्ति से मंत्रों को शापित कर प्रभावहीन कर दिया।
इसी समय प्रभुइच्छा से देवर्षि नारद यहाँ आ पहुँचे। उन्होने उनसे कहा, ‘‘ हे पुण्यात्माओं ! यह आपने क्या किया ? इस तरह तो धर्मनिष्ठ, सत्यवादी, अहिंसक, पुण्यकर्मी व्यक्ति भी इन मंत्रों का उपयोग नहीं कर पायेगा। आपने पापी के साथ साथ निष्पापी को भी दण्ड़ दे दिया। जो आपके लिए शोभनिय नहीं है।’’
देवर्षि नारद की प्रार्थना पर ऋषियों ने 24 अन्य मंत्रों का निर्माण किया। इन मंत्रों के उच्चारण के समय व्यक्ति संकल्प लेता है कि मैं इन मंत्रों का किसी भी रूप में दुरूपयोग नहीं करूँगा। तो वह व्यक्ति श्राप मुक्त होकर किसी विशेष मंत्र या श्लोक के जप का फल पा लेता है।
निम्न श्लोकों से इस बात की पुष्टि हो जाती है। इन मंत्रों के उच्चारण से निम्न मंत्रों में श्राप से मुक्त होने की कामना की गई है। अतः श्राप से विमुक्त होने के बाद ही दुर्गासप्तशती के मंत्रों से इच्छित लाभ पाया जा सकता है।
ऊँ (हीं) रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधु-कैटभ-मर्दिन्यै ब्रह्मा-वसिष्ठ-विश्वमित्र-शापाद् विमुक्ता भव।
अथवा
ऊँ जां जाति-स्वरूपिण्यै निशुंभ-वध कारिण्यै ब्रह्मा-वसिष्ठ-विश्वमित्र-शापाद् विमुक्ता भव।
सिद्धकुंजिका स्तोत्र
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| प्रतिदिन प्रातःकाल सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से सब प्रकार की विध्न-बाधाऐं नष्ट हो जाती हैं। सिद्धि प्राप्ती के लिए सिद्धकुंजिका स्तोत्र तथा परम सिद्धि के लिए सिद्धकुंजिका स्तोत्र व देवीसूक्त सहित शप्तशती पाठ करना चाहिए। |
सिद्धकुंजिका स्तोत्रम्
भगवान षिव उवाच -
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्।।
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्।।
कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अतिगुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्।।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्धयेत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्।।
अथ मंत्र
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।। ऊँ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः। ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ज्वलं हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।
।। इतिमन्त्रः।।
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि।। 01।।
नमस्ते शुम्भहन्न्न्यै च निशुम्भासुरघातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे। 02।।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽतु ते।। 03।।
चमुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
विच्चै चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि।। 04।।
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं श्रीं में शुभं कुरू, ऐं ऊँ ऐं रक्ष सर्वदा।। 05।।
ऊँ ऊँ ऊँकार-रूपायै, ज्रां ज्रां ज्रम्भाल-नादिनी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि ! शां शीं शूं में शुभं कुरु।। 06।।
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः।। 07।।
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।। 08।।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे।
इदं तु कुंजिका-स्तोत्रं मन्त्र-जागर्ति-हेतवे।। 09।।
अभक्ते नैव दातव्यं हीनां सप्तशती पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा।।10।।
(इति श्री रूद्रयामले गोरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।)
सिद्धकुंजिका स्तोत्र का हिन्दी अर्थ - भगवान षिव देवी से बोले - देवी ! सुनो। मैं उत्तम कुंजिकास्तोत्र का उपदेष करूँगा, जिसके मंन्त्रों के प्रभाव से देवी का जाप या पाठ सफल होता है।। 01 ।। देवी पाठ की सफलता के लिए क्वच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास यहाँ तक कि अर्चन भी आवष्यक नहीं है।। 02।। यह कुंजिका स्तोत्र गुप्त तथा देवों के लिए भी दुलर्भ है और इसके पाठमात्र से दुर्गा पाठ का फल प्राप्त हो जाता है। हे देवी । जो बिना कुंजिका के सप्तषती का पाठ करता है। उसे उसी प्रकार सिद्धि नहीं मिलती जिस प्रकार वन में रोना निरर्थक सिद्ध होता है।। 10।। हे पार्वती ! इसे जैसे स्त्री अपनी योनि को गुप्त रखती है उसी प्रकार प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए। यह उत्तम कुंजिकास्तोत्र केवल पाठ मात्र के द्वारा मारण, मोहन, वषीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि (अभिचारिक) उद्देष्यों को सिद्ध करता है।। 04।। |
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04।। मंत्र - ऊँ ऐं ह्नीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।। ऊँ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्नी क्लीं चामुण्डायै च्चि ज्वलं हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।। हे रुद्रस्वरूपिणी ! तुम्हे नमस्कार है। हे मधु मर्दनी, कैटभविनाषिनी और महिशासुर हन्ता आपको नमस्कार है।। 01।। षुंभ हननी, निषुम्भासुर घतिनी आपको नमस्कार है।। 02।। हे महादेवी ! मेरे जप को जाग्रत् और सिद्ध करो। ‘एेंकार’ रूपी सृश्टिस्वरूपिणी, ‘ह्नी’ रूप में सृश्टि पालने वाली, ‘क्लीं’ रूप में कामरूपिणी और (संपूर्ण ब्रह्माण्ड) की बीजरूपिणी देवी ! तुम्हे नमस्कार है। चामुण्डा के रूप में चण्डघातिनी और ‘यैकार’ के रूप में तुम वर देने वाली हो।।04।। ‘विच्चे’ के रूप में तुम नित्य अभय प्रदान करती हो। अतः तुम ही इस मंत्र (ऐं ह्नीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।) का स्वरूप हो।।05।। ‘धां धीं धूं के रूप में धूर्जटी नाम षिव की तुम पत्नी हो। ‘वां वीं वूं ’ के रूप में तुम वाणी की अधीष्वरी हो। ‘क्रां क्रीं क्रूं ’ के रूप तुम कालिका देवी, ‘षां षीं षूं ’ के रूप में मेरा कल्याण करो।। 06।। ‘हुं हुं हुंकार’ स्वरूपिणी, जं जं जं जम्भनाषिनी, ‘भ्रां भ्रीं भ्रूं’ के रूप में हे कल्याणकारी भौरवी भवानी ! तुम्हे बार-बार प्रणाम है।। 07।। ‘ अं कं चं टं तं पं यं षं वीं दुं एें वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं ’ इन सबको तोड़ो दीप्त करो करो स्वाहा। ‘ पां पीं पूं ’ के रूप में तुम पार्वती हो। ‘ खां खीं खूं ’ के रूप में तुम खेचरी (आकाषचारिणी या खेचरी मुद्रा) हो।। 08।। ‘ सां सीं सूं ’ स्वरूपिणी सप्तषती देवी के मंत्रों को मेरे लिए सिद्ध करो। यह कुंजिका स्तोत्र मंत्र को जगाने (जाग्रत करने) के लिए है। इसे किसी भी भक्तिहीन पुरूश को नहीं देना चाहिए। हे पार्वती ! इसे गुप्त रखो। हे देवी जो बिना कुंजिका के सप्तषती का पाठ करता है। उसे उसी प्रकार सिद्धि नहीं मिलती जिस प्राकार वन में रोना निरर्थक होता है।। 09 दृ 10।। |
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gSA vr% vki mlds o/k dk dksbZ mik; lksfp,A
;g lqudj Hkxoku fo”.kq
rFkk Hkxoku f’ko dks nSR;ksa ij egku dzks/k vk;kA os vR;Ur dzks/k esa Hkj x,A
Jh fo”.kq ds eq[k ls rFkk czãk] f’ko o bUnzkfn nsorkvksa ds ‘kjhj ls cM+k Hkkjh
rFkk vrqyfu; rst fudykA ;g rst ,df=r gksdj ,d ukjh :i eas cny x;kA Hkxoku f’ko
ds rst ls nsoh dk eq[k] ;e ds rst ls cky] Jh fo”.kq ds rst ls Hkqtk,¡] pUnzek
ds rst ls Lru] bUnz ds rst ls dfVizns’k] o:.k ds rst ls t¡?kk o fi.Myh] i`Foh
ds rst ls furEc] czãk ds rst ls nksuks pj.k] lw;Z ds rst ls v¡xqfy;k¡] olqvksa
ds rst ls gkFkksa dh v¡xqfy;k¡] dqcsj ds rst ls ukfldk] iztkifr ds rst ls nk¡r]
vfXu ds rst ls rhuksa us=] la/;k ds rst ls HkkSagsa] ok;q ds rst ls dku mRiUu
gq,A bl izdkj fofHkUu nsorkvksa ds rst ls dY;k.ke;h nsoh nqxkZ dk izkdkV~;
gqvkA os mUgs lkeus ns[k cgqr izlUu gq,A
txn~tuuh nsoh dks lkeus
ns[k nsorkvksa us oL=] vkHkw”k.k] ‘kL=kfn ls mUgs lqlfTtr fd;kA blds fy, Hkxoku
f’ko us ‘kwy] fo”.kq us pdz] o:.k us ‘ka[k] vfXu us ‘kfDr] ok;q us /kuq”k rFkk
ck.kksa ls Hkjs gq, rjdl] bUnz us otz o ?k.Vk] ;ejkt us dkyn.M] o:.k us ik’k]
iztkifr us LQfVd ekyk] czãk th us de.Myq] lw;Z nso us muds jksedwiksa esa
fdj.kksa dk rst Hkj fn;k] dky us pedrh <ky o ryokj nh] {khj leqnz us mTToy
gkj rFkk dHkh us th.kZ gksus okys nks fnO; oL=] pw.kkef.k] nks dq.My] dMs+]
mTToy v/kZpUnz] lHkh cktqvksa ds fy,
ds;wj] pj.kksa ds fy, fueZy uwiqj] xys dh g¡lyh rFkk lc v¡xqfy;ksa ds fy,
v¡xwfB;k¡ nhaA fo’odekZ us Qjlk] vL= vkSj vHks| dop rFkk eLrd vkSj o{k ij
/kkj.k djus ds fy, u dqEgykus okys iq”iksa dh ekyk nhA tyf/k us dey ds Qwy]
fgeky; us flag rFkk rjg&rjg ds jRu fn,] /ku ds v/;{k dqcsj us e/kq ls Hkjk
ikuik= rFkk ukxksa ds jktk ‘ks”k us mUgs ef.k;ksa ls ;qDr ukxgkj HksV fd;kA
oL=] vkHkw”k.k] ‘kL=kfn ls lqlfTtr gksus ds mijkar mUgksus H;adj vV~Vgkl fd;kA
ftlls laiw.kZ vkdk’k x¡wt mBkA nsoh dk ;g flagukn dgha lek u ldkA laiw.kZ fo’o
esa gypy epus yxh] leqnz dk¡i mBs] i`Foh M+ksyus yxh] ioZr fgyus yxsA bl ij
izlUu gksdj egf”kZ;ksa o nsorkvksa us mudh Lrou fd;kA
nSR;x.k {kksHkxzLr gks
lsuk dks lqlfTtr dj gfFk;kj gkFk esa ysdj flagukn dh vksj nkSM+ iMs+A mUgksus
ogk¡ rhuksa yksdksa dks izdkf’kr djus okyh nsoh dks ns[kkA ftuds Hkkj ls /kjrh
nch tk jgh FkhA eqdqV vkdk’k esa js[kk [khaprk tku iM+rk FkkA muds /kuq”k dh
Vadkj ls lkrksa ikrky {kqC/k gks jgs FksA nSR;ksa us ukuk izdkj ds vL= ‘kL=ksa
ls ;q) NsM+ fn;kA bl le; efg”kklqj dk lsuku;d fp{kqj FkkA og prqjkafx.kh lsuk
ds lkFk ;q) eas jr gks x;kA blds mijkar vukdkusd egknSR; rksej] fHkUnhiky]
‘kfDr] ewly] [kM+x] ij’kq] ifV~V’k vkfn vL= ‘kL=ksa ls ;q) dj jgs FksA nsoh us
dzks/k esa Hkjdj [ksy gh [ksy esa muds vL=&’kL=ksa dks dkV dj nSR;ksa ij
vL=&’kL= cjlkus yxhaA
nsoh dk okgu flag vlqjksa
esa nkokuy dh rjg fopjus yxkA vfEcdk dh fu%’oklksa ls mRiUu vL= ‘kL=ksa ls ;qDr
x.k vlqjksa ls fHkM+ dj mudk uk’k djus yxsA bl ?kksj laxzke esa txnEck us
vklqjksa dh fo’kky lsuk dks {k.kHkj esa gh u”V dj M+kykA
¼bl izdkj ekrk txnEck dk
izkdkV~; rFkk efg”kklqj dh lsuk dk o/k uked nwljk v/;k; lekIr gqvkA ½
![]()
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lsuk dks rgl&ugl gksrs ns[k fp{kqj nsoh ij
ck.kksa ls o”kkZ djus yxkA nsoh us mlds ck.kksa dks dkVdj mlds lkjFkh o ?kksM+s
dks ekj fxjk;kA lkFk gh mldh /ot irkdk dks dkVdj tehu ij fxjk fn;k vkSj mlds
‘kjhj dks ck.kksa ls cha/k fn;kA ck.kksa ls cha/ks tkus ds mijkar mlus ryokj ls
flag ds eLrd rFkk nsoh dh Hkqtk ij izgkj fd;kA nsoh dh Hkqtk ls Vdjkrs gh ryokj
VwV xbZA vc mlus Hknzdkyh ij ‘kwy ls izgkj fd;kA nsoh us vius ‘kwy ls mlds ‘kwy
ds VqdMs dj fn, vkSj vius ‘kwy ds izgkj ls ml egknSR; fp{kqj dks ekj fxjk;kA
fp{kqj
ds ekjs tkus ij pkej nsoh ds lkFk gkFkh ij cSBdj ;q) djus yxkA mlus nsoh ij
‘kfDr ls izgkj fd;kA ;g ‘kfDr nsoh dh gqadkj ek= ls u”V gks xbZA flag us pkej
ds gkFkh ij /kkok cksy fn;kA os nksuksa Hk;adj :i ls yM+us yxsA bl ;q) esa flag
ds iats dh ekj ls pkej dk flj /kM+ ls vyx gks x;kA blds mijkar nsoh us mnxz]
djky] m)r] ok”dy] vU/kd] mxzL;] mxzoh;Z] egkguq] foM+ky] nq/kZj vkSj nqeZq[k
vkfn nSR;ksa dks ekj fxjk;kA
viuh
lsuk dk lagkj gksrs ns[k efg”kklqj HkSls dk :i cuk nsoh ds x.kksa dks =kl nsus
yxkA og lhax ls ioZr m[kkM+dj QSadus yxkA mlds osx ls leqnz fgyus yxk] i`Foh
Mwcus yxh] ckny VqdM+s&VqdMs+ gks x,A bl ij pf.M+dk us ik’k QSaddj mls
ck¡/k fy;kA og HkSls dk :i R;kxdj flag :i esa izdV gks x;kA og iqu% [kM+x/kkjh
:i /kjdj nsoh ls ;q) djus yxkA nsoh ds vL=ksa ls r`Lr gks og xtjkt dk :i /kj
flag dks [khapus yxk rks nsoh us ryokj ls mldh lwaM dkV MkyhA og iqu% HkSls dk
:i /kjdj rhuksa yksdksa dks O;kdqy djus yxkA bl ij nsoh us mNydj ml egknsR; dks
iSjksa ls nck fy;kA og tSls gh HkSls ds :i ls iq:”k :i esa ckgj fudyus yxk rks
nsoh us viuh ‘kfDr ls mls jksddj ryokj ls mldk eLrd dkV M+kykA efg”kklqj ds o/k
dks ns[k lkjh lsuk Hkkx [kM+h gqbZA efg”kklqj ds o/k ds mijkar egf”kZ;ksa us
nsoh dk Lrou fd;k rFkk xU/koZjkt xkus o vIljk,¡ u`R; djus yxhaA
¼bl izdkj efg”kklqj o/k
uked rhljk v/;k; lekIr gqvkA ½
![]()
efg"kklqj ds o/k ds
mijkar bUnzkfn nsoksa us Hkxorh dk cgqfo/k Lrou fd;kA mUgksus uUnu ou ds iq”i]
pUnu vkfn ls mudk iwtu fd;k rks nsoh us izlUu gksdj nsorkvksa ls viuh
vfHkykf”kr oLrq ek¡xus dks dgkA
rc nsork cksys] ^^Hkxorh
vkius gekjh lc bPNk,¡ iw.kZ dj nhaA brus ij Hkh ;fn vki oj nsuk pkgrh gSa rks
gesa oj nsa fd tc Hkh ge vkidk Lej.k djsaA vki n’kZu nsdj gekjs ladVksa dks nwj
djsa rFkk ge ij lnk izlUu jgsaA** bl ij rFkkLrq dgdj ek¡ Hkxorh vUr/kkZu gks
xbZaA
¼bl izdkj ‘kdzkfnd Lrqfr
uked pkSFkk v/;k; lekIr gqvkA ½
![]()
iwoZ dky esa cy ds ?ke.M esa ‘kqHk vkSj fu’kqaHk
uked vlqjksa us rhuksa yksdksa dk jkT; o ;K Hkkx nsorkvksa ls Nhu fy;kA os lw;Z
pUnz] dqcsj] ;e o o:.kkfn ds vf/kdkj dk mi;ksx rFkk ok;q o vfXu ds dk;Z Lo;a
djuss yxsA mUgksus nsorkvksa dks ijkftr] viekfur o vf/kdkj ghu djds LoxZ ls
fudky fn;kA vlqjksa }kjk frjLd`r o jkT;Hkz”V nsork ,df=r gksdj nsoh dk Lrou
djus yxsA blh le; nsoh ikoZrh] xaxk Luku ds fy, vkbZ rks nsorkvksa ls iwNus yxh
fd vki yksx fdldh Lrqfr dj jgsa gSaA rHkh muds ‘kjhj dks’k ls mRiUu f’kok
cksyha] ^^‘kqaHk ls frjLd`r o fu’kqaHk ls ijkftr ;s nso esjh gh Lrqfr dj jgs
gSaA** ikoZrh ds ‘kjhj ls vfEcdk dk izknqHkkZo gksus ds dkj.k os [12]dkSf’kdh dgykbZaA dkSf’kdh ds izdV
gksus ds ckn ikoZrh dk :i dkyk gks x;kA bl dkj.k os [13]dkfydk nsoh dgykbZA
‘kqaHk o fu’kqaHk ds Hk`R;
p.M+ vkSj eq.M+ us tc vR;Ur euksgj :i okyh nsoh vfEcdk dks ns[kk rks os ‘kqaHk
ds ikl tkdj cksys] ^^egkjkt ! ,d vR;Ur fnO; ,oa euksgkjh L=h fgeky; dks
izdk’koku dj jgh gSA mls ys yhft,A og fL=;ksa esa jRu gSA mlds Jh vaxksa ds
izdk’k ls lHkh fn’kk,¡ izdkf’kr gks jgh gSaA rhuksa yksdksa esa ftrus Hkh jRu
gSaA os lHkh vkius ,df=r dj fy, gSa rks ml jRue;h L=h dks vki vius vf/kdkj esa
D;ksa ugha dj ysrs \** bl ij ‘kqaHk us egknSR; lqxzho dks nwr cukdj Hkxorh ds
ikl ml ioZr ij Hkstk tgk¡ nsoh fojkteku FkhaA og e/kqj ok.kh esa cksyk] ^^gs
nsoh ! bl le; ‘kqaHk rhuksa yksdksa ds bZ’oj gSaA eSa mUgh dk nwr gw¡A mUgksus
rqEgkjs fy, tks lans’k Hkstk gS mls lquksA nsoh ! ge rqEgs L=h jRu ekurs gSa
vr% rqe esjh ;k esjs HkkbZ fu’kaqHk dh lsok esa vk tkvksA**
;g lqudj nsoh eqldjk;ha
vkSj cksyha] ^^nwr! rqeus lR; dgk gSA ij eSus viuh vYicqf) ls ,d izfrKk dj yh
mls lquksA tks eq>s laxzke esa thr dj esjs vfHkeku dks pw.kZ dj nsxkA ogh
cyoku esjk ifr gksxkA blfy, ‘kqaHk vkSj fu’kqaHk ;gk¡ i/kkjsa rFkk eq>s
thrdj esjk ikf.kxzg.k dj ysaA**
¼bl izdkj nsoh nwr laokn
uked ik¡poka v/;k; lekIr gqvkA ½
![]()
nsoh dk dFku lqudj
nSR;kjkt us dqfir gksdj lsukifr /kwezykspu ls nsoh ds ds’k idM+dj ?klhVrs gq,
ykus dks dgkA /kwezykspu lkB gtkj vlqjksa dh lsuk ysdj nsoh ds ikl igq¡pk o
mUgs yydkj dj dgus yxk] ^^vjh ! rw izlUurk iwoZd esjs Lokeh ds ikl py] ugha rks
>ksaVk idM+dj cyiwoZd ys pyw¡xkA**
rc nsoh cksyha] ^^gs
/kwezykspu ! rqe cyoku gks rFkk fo’kky lsuk ds lkFk gksA ;fn rqe cy iwoZd ys
pyksxs rks eSa rqEgkjk D;k fcxkM+ ldrh gw¡A** ;g lqudj /kwezykspu nsoh dh vksj
nkSM+k rks nsoh us ^gqa* ‘kCn dh gqadkj ls mls rRdky HkLe dj fn;kA bl ij
nSR; lsuk nsoh ds lkFk ;q) djus yxhA bl Hk;adj ;q) esa nsoh rFkk nsoh ds flag
us vlqjksa dh lkjh lsuk dks {k.k Hkj esa ekj fxjk;kA /kwezykspu dh e`R;q ds ckn
‘kqaHk us p.M+ vkSj eq.M+ dks nsoh ds >ksaVs idM+ dj vFkok ck¡/k dj ykus dh
vkKk nhA
¼bl izdkj /kwezykspu o/k
uked NBoka v/;k; lekIr gqvkA ½
![]()
p.M+
vkSj eq.M+ prjafx.kh lsuk ds lkFk fgeky; igq¡psA tgk¡ nsoh flag ij fojkteku
FkhaA os nSR; rRijrk ls idM+us ds fy, nkSM+s rFkk dqN us nsoh dks ?ksj fy;kA rc
nsoh ‘k=qvksa ds izfr dzks/k dj dkfydk nsoh ds :i esa nSR; lsuk ij VwV iM+hA
mUgksus nSR;ksa dh lkjh lsuk jkSan M+kyh] [kk M+kyh rFkk ekj HkxkbZA {k.k Hkj
esa lsuk dks u”V gqvk ns[kA p.M+] dkyh nsoh dh vkSj nkSM+kA eq.M+ us Hkh
ck.kksa ls o”kkZ dh rks dkyh us vV~Vgkl dj gkFk esa ryokj ys ^gaq*
mPpkj.k ds lkFk p.M+ ij /kkok cksykA lkFk gh mlds ds’k idM+ dj mldk eLrd mrkj
fy;kA
p.M+ dks
ejk ns[k eq.M+ nsoh dh vksj nkSMk rks nsoh us mls Hkh ekj fxjk;kA p.M+ vkSj
eq.M+ dh e`R;q ds ckn nSR;ksa dh lkjh lsuk Hkkx xbZA pf.Mdk us nsoh ds ikl tkdj
dgk] ^^eSus p.M+ vkSj eq.M+ uked nks egki’kqvksa dks rqEgs HksV fd;k gSA ‘kqaHk
vkSj fu’kaqHk dk rqe Lo;a o/k djukA** bl ij nsoh us dkyh ls e/kqj ok.kh esa
dgk] ^^gs nsoh] rqe p.M+ vkSj eq.M+ ds flj ysdj vkbZ gks blfy, rqe fo’o esa [14]pkeq.Mk ds :i eas izfl) gksvksxhA**
¼bl izdkj p.M+ vkSj eq.M+
o/k uked lkroka v/;k; lekIr gqvkA½
![]()
p.M+
vkSj eq.M+ ds ekjs tkus ij ‘kqaHk nSR; lsuk dks ;q) ds fy, dwp djus dh vkKk
nsrs gq, cksyk] ^^mnk;q/k uked 86 lsukifr] dEcw uked 84 lsukuk;d] 50 dksfVoh;Z] 100 /kwezdqy ds lsukifr] dkyd] nksgknZ] ekS;Z] dkyds; lHkh ;q) ds
fy, izLFkku djsaA**
‘kaqHk
dh Hk;adj lsuk dks ns[k pf.M+dk us /kuq”k dh Vadkj ls i`Foh o vkdk’k ds e/;
LFkku dks xq¡tk fn;k] flag ngkM+us yxk] vfEcdk ?kaVk /ofu djus yxhA blls lHkh
fn’kk,¡ xw¡t mBhA vlqj lsuk us pf.M+dk] flag o dkyh dks pkjksa vksj ls ?ksj
fy;k rks nsorkvksa ds mRFkku ds fy, czãk] f’ko vkSj dkfrZds; o bUnz dh ‘kfDr
Hkh muds ikl vk xbZA rc egknso th pf.M+dk ls cksys] ^^esjh izlUurk ds fy, rqe
‘kh?kz gh bu nSR;ksa dk lagkj djksA** bl ij os mxz p.M+h :i esa izdV gqbZa rFkk
Hkxorh us egknso th dks nwr cukdj nSR;ksa ds ikl HkstkA f’ko dks nwr cukus ds
dkj.k os [15]f’konwrh dgykbZA f’ko us nsoh dh
vksj ls nSR;ksa ls dgk] ^^ nSR;ksa ! ;fn rqe thfor jguk pkgrs gks rks bUnz dks
f=yksdh rFkk nsorkvksa dks mudk ;KHkkx lkasi dj ikrky ykSV tkvksA ;fn rqe ;q)
dh vfHkyk”kk j[krs gks rks esjh ;ksxfu;k¡ rqEgkjs dPps ekal ls r`Ir gksaA**
bl ij
nSR;ksa us vkdzks’k esa Hkjdj dkR;k;u iq=h [16]dkR;k;uh dh vksj dwp fd;kA nksuks
vksj ls Hk;adj ;q) fNM+ x;kA dkyh ‘k=qvksa dk lagkj djrh gqbZ j.k eas fopjus
yxhA czãk.kh de.My ds ty ls ‘k=qvksa ds rst dks u”V djus yxhaA dzksf/kr
egs’ojh] oS”.oh] dkfrZds; vkSj bUnz dh ‘kfDr;k¡ dze’k% f=’kwy] pdz] ‘kfDr rFkk
otz vkfn ls izgkj djus yxhaA okjkgh FkwFku ls] ujflagh u[kksa ls egknSR;ksa dk
fouk’k djus yxhaA f’konwrh cM+s vV~Vgkl ls vlqjksa dks u”V djus yxhaA
vlqjksa
dk enZu ns[k jDrcht dzks/k esa Hkjdj ;q) djus yxkA mlds jDr dh cwan i`Foh ij
fxjus ij mlh ds leku jDrcht iSnk gks tkrsA ekr`’kfDr;ksa ds izgkj ls /kk;y jDr
cht ds jDr ls vusdkusd jDrcht mRiUu gksus yxsA rc pf.M+dk us dkyh ls dgk]
^^pkeq.Ms+ ! rqe viu eq[k QSykdj jDrcht ds jDr fcUnqvksa ls mRiUu egknSR;ksa
dks [kk tkvksA** dkyh nsoh ds ,slk djus ls vkgr jDrcht jDrghu gks i`Foh ij fxj
x;kA blls nso gf”kZr gq, rFkk ekr`x.k izlUu gksdj u`R; djus yxsA
¼bl izdkj jDrchp o/k uked
vkBoka v/;k; lekIr gqvkA ½
![]()
jDrcht
ds ekjs tkus ij ‘kqaHk o fu’kqaHk cgqr dzksf/kr gq,A gksB pckrs gq, nksuksa nSR;
pf.Mdk dks ekjus ds fy, m|r gq,A nksuksa esa ?kksj laxzke fNM+ x;kA nksuksa
fHkUu&fHkUu vL=ksa ls ;q) djus yxsA nsoh us fu’kqaHk dks ?kk;y dj /kjrh ij
fxjk fn;kA bl ij ‘kqaHk dzksf/kr gksdj Hk;adj ;q) djus yxkA bl ij pf.M+dk us ‘kqaHk
dks ‘kwy ls ?kk;y dj ewfNZr dj fn;kA
vc psruk
vkus ij fu’kqaHk us nl gtkj ckgsa cuk mlds pdz ls nsoh ij izgkj fd;kA nsoh us ‘kwy
ls mldh Nkrh Hksn M+kyhA mldh Nkrh ls ,d vU; ekgk;ks)k mRiUu gks nsoh ls ;q)
djus yxkA nsoh us rqjar gh mls ekj fxjk;kA flag nk<+ksa ls nSR;ksa dk Hk{k.k
djus yxk rFkk dkyh o f’konwrh Hkh nSR;kas dk Hk{k.k djus yxha] bl Hk;adj ;q)
esa dkSekjh ‘kfDr ls] czãk.kh e=iwr ty ls] egs’ojh f=’kwy ls] okjkgh FkwFku ls]
oS”.koh pdz ls] ,sUnzh otz vkfn ds izgkj ls vlqj izk.kghu gksus yxsA tks cps os
Hkkx x,A
¼bl izdkj fu’kqaHk o/k
uked ukSoka v/;k; lekIr gqvkA ½
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fu'kaqHk
dks ejk le>dj ‘kqaHk dqfir gksdj cksyk] ^^nq”V nqxsZ ! rw cy ds vfHkeku esa
nwljh fL=;ksa dk lgkj ysdj yM+rh gSA** bl ij nsoh us dgk] ^^vks nq”V ! eSa
vdsyh gh gw¡A ;s esjh gh foHkwfr;k¡ gSaA ns[k] ;s eq>esa gh izos’k dj jgha
gSaA** ,slk dgrs&dgrs leLr ekr`’kfDr;k¡ nsoh esa ‘kek xbZaA vc ‘kqaHk ds
lkeus dsoy vfEcdk nsoh gh jg xbZaA vc nsoh iqu% cksyh] ^^ eSus vius :iksa dks
lesV fy;kA vc vdsyh gw¡A rqe Hkh fLFkj gksdj ;q) djksA**
nksuksa
esa Hk;adj ;q) fNM+ x;kA ;g ;q) lcds fy, Hk;kud rFkk vk’p;Z esa M+kyus okyk
FkkA nksuksa ,d nwljs ds fnO; vL=ksa dks dkVus yxsA ;q) esa nSR;Lokeh ds lkjFkh
o ?kksM+s ekjs x,A vUr esa vfEcdk us ‘kqaHk dks /kjrh ij iVd fn;kA og iqu% mBk
vkSj pf.M+dk dk o/k djus ds fy, nkSMkA nsoh us f=’kwy ls mldks izk.kghu dj
fn;kA ‘kqaHk ds ejrs gh vkdk’k LoPN gks x;kA mRikr lwpd es?k o mYdkikr ‘kkar
gks x,A ufn;k¡ Bhd ls cgus yxhaA nSork o xU/koZx.k e/kqj xhr xkus yxsA ifo=
ok;q cgus yxhA ;K’kkykvksa dh vfXu Lo;a izTTofyr gks xbZA lEiw.kZ fn’kkvksa esa
vlhe ‘kkafr Nk xbZA
¼bl izdkj ’kqaHk o/k uked
nloka v/;k; lekIr gqvkA ½
![]()
![]()
‘kqaHk
ds ekjs tkus ij lHkh nsork dkR;k;uh nsoh dh Lrqfr djus yxsA mUgksus cgqfo/k
mudh Lrqfr dhA mudh Lrqfr ls izlUu gksdj nsoh mUgs iqu% oj nsus ds fy, rS;kj
gks xbZaA os cksyha] ^^ nsorkvks ! eSa oj nsus dks rS;kj gw¡A tks bPNk gks ekax
yksA **
rc nsork
cksys] ^^[17]losZ’ojh ! rqe rhuksa yksdksa dh
ck/kk’kkar dj ‘k=q uk’k djrh jgksA** rc nsoh cksyh fd oSoLor euoUrj ds 28 osa ;qx esa eSa iqu% ‘kqaHk vkSj fu’kqaHk uked nks vU;
nSR;ksa dk o/k d:¡xhA rc eSa uUn ds ?kj ;’kksnk ds xHkZ ls tUe ysdj foa/;kpy ij
okl d:¡xh rFkk oSizpfr uked nSR;ksa dk uk’k d:¡xhA tc mu nSR;ksa ds Hk{k.k ls
esjs nk¡r yky gks tk;sxas rks euq”; eq>s [18]jDrnfUrdk dgsaxsaA
rc i`Foh
ij o”kkZ :d tk;sxhA gj rjQ ikuh dk vHkko gks tk;sxk rks v;ksfutk izdV gksdj lkS
uS=ksa ls eqfu;ksa dks ns[kw¡xhA rc eSa [19]‘krk{kh dgykÅ¡xhA blh le; vius
‘kjhj ds ‘kkdksa ls lalkj dk Hkj.k iks”k.k djus ds dkj.k [20]‘kkdEHkjh rFkk nqxZe uked nSR; dks
ekjus ds dkj.k [21]nqxkZ uke ls izfl) gksšxhA tc
Hkhek :i /kj eqfu;ksa dh j{kk ds fy, fgeky; ds jk{klksa dks ek:¡xh rks [22]Hkheknsoh ds uke ls tkuh tkÅ¡xhA
v:.k uked nSR; dks Hkzej ¼HkkSjs½ ds :i esa ekjus ds dkj.k [23]Hkzkejh
ds uke ls izfl) gksÅ¡xhA tc tc lalkj esa nkuoh ck/kk,¡ mRiUu gksaxhA eSa vorkj
ysdj ‘k=qvksa dk lagkkj d:¡xhA
¼bl izdkj nsorkvksa }kjk
nsoh Lrqfr o nsoh }kjk nsorkvksa dks ojnku izkIr gksuk uked X;kjgoka v/;k;
lekIr gqvkA ½
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nsoh us
dgk fd tks e/kqdSVHk uk’k] efg”kklqj o ‘kqaHk fu’kqHk o/k dk ikB djsaxsaA rFkk
v”Veh prqnZ’kh] uoeh dks HkfDriwoZd ekgkRE; lqusaxsA mu ij iki tfur vkifRr;k¡
ugha vk;asxhaA muds ?kj esa nfjnzrk] izsehtu fcNksg d”V]
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दुर्गा गायत्री
महादेव्यै विद्महे, दुर्गायै धीमहि, तन्नः देवी प्रचोदयात।
देवी सूक्तम्
देवा ऊचुः -
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ।।
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धार्त्यै नमो नमः ।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ।।
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः ।
नैऋर्त्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ।।
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ।।
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः ।
नमो जगत्प्रतिष्टायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ।।
या देवी सर्वभूतेशु विश्णुमायेति षब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेशु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेशु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
... निद्रारूपेण ...। ... क्षुघारूपेण ....। ... च्छायारूपेण ...।
... षक्तिरूपेण...। ... तृश्णारूपेण ...। ... क्षान्तिरूपेण ...।
... जातिरूपेण ...। ... लज्जारूपेण ...। ... षान्तिरूपेण ...।
... श्रद्धारूपेण ...। ... कान्तिरूपेण ...। ... लक्ष्मीरूपेण ...।
... वृत्तिरूपेण ...। ... स्मृतिरूपेण ...। ... दयारूपेण .....।
... तुश्टिरूपेण ...। ... मातृरूपेण ...। ... भ्रान्तिरूपेण ...।
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या ।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ।।
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत् ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रया-त्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता ।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ।।
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै- रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते ।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्त्तिविनम्रमूर्तिभिः ।।
दुर्गासप्तषती
प्रथम अध्याय
(राजा सुरथ तथा वैष्य का मेघा मुनि की षरण में जाना।)
दुर्गासप्तषती मार्कण्डेय पुराण का एक हिस्सा है। इसके प्रथम अध्याय में श्री मार्कण्डेय जी बताते हैं कि स्वारोचिश मनवन्तर में सुरथ नाम के राजा का संपूर्ण भूमंडल पर अधिकार था। उन्हे षत्रुओं ने परास्त कर दिया। वे षिकार के बहाने मेघा मुनि के दिव्य आश्रम में पहुँचे और उनकी सेवा में लग गए। वहीं उनका मिलन समाधि नामक वैष्य से हुआ। दोनो की बुद्धि अपने-अपने परिवार में क्यों बनी रहती है ? इस बात का हल जानने के लिए वे दोनों मेघा मुनि के सम्मुख पहुँचे तथा सारी बात कह सुनाई। उनके मन में उपजे ममता जनित आकर्शण तथा उनके विवेकषून्य होने का कारण पूछा।
ऋशि बोले संसार के सभी प्राणी, देवता, दानव, गन्धर्व, नाग, राक्षस, मनुश्य, वृक्ष, लता, पषु, मृग और यहाँ तक की पक्षी भी महामाया जगदम्बा की माया के आधीन हैं। इन्होने जन्म मरण की परंपरा को बनाए रखने के लिए सबको मोह के गहरे गर्त में गिरा दिया है। जिससे निकलना साधारण मनुश्य के वष में नहीं है। सृश्टि के प्रारम्भ में जगदीश्वर क्षीर सागर में योगनिद्रा के आधीन थे। वह योगनिद्रा भगवती महामाया ही हैं। उन्होने जब भगवान को मोहित कर रखा है तो इस जगत की बात ही क्या है। ये ज्ञानियों के चित्त को बलपूर्वक मोह में डाल देती हैं। ये ही संपूर्ण जगत की सृश्टी करती हैं।
(महायोगमाया की उत्पत्ती व मधु व कैटभ नामक असुरों का जन्म व वध।)
कल्प के अंत में जब संपूर्ण जगत (विष्व) एकार्णव (एक अणु) में निमग्न था और भगवान विश्णु षेशनाग की सैय्या पर योगनिद्रा में लीन थे। उसी समय उनके नाभिकमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए। इसके कुछ समय बाद भगवान के कानों के मैल से दो मधु व कैटभ नामक दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए। दोनों धीरे-धीरे तरूण हो गए।
वे दोनो, अपने आसपास किसी को न पाकर तथा आकाष में उच्चरित वांगबीज को सुनकर तपस्या करने लगे। उन्होने एक हजार वर्श तक तपस्या की। तब तपस्या से प्रसन्न होकर षक्ति द्वारा भविश्यवाणी हुई। उन्होने दैत्यों से कहा, ‘‘मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। तुम वर मांगो मैं उसे पूर्ण कर दुंगी।’’ इस पर मधु व कैटभ ने स्वेच्छा मरण का वर माँगा तो आकाषवाणी ने उन्हे किसी से भी पराजित ने होने तथा स्वेच्छा मरण का वर दिया। इस वर को पाकर उन्हे अभिमान हो गया।
एक दिन उनकी दृश्टि कमल के आसन पर विराजमान ब्रह्मा जी पर पड़ी तो वे दोनो उनका वध करने के लिए आगे बढे। तब ब्रह्मा जी कमल की डण्डी के सहारे विश्णु जी के पास जा पहँचे। उन्हे निद्रमग्न देखकर वे सोचने लगे कि मुझे योगनिद्रा का स्तवन करना चाहिए जिनके प्रभाव से भगवान हिलडुल तक नहीं सकते। वे समझ गए कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड महामाया के आधीन है।
तब ब्रह्मा जी ने भगवती निद्रादेवी की स्तुति की। ब्रह्मा जी की स्तुति से योगामाय भगवान जनार्दन के षरीर से निकलकर खड़ी हो गई। तब श्री हरि ने उठकर मधु और कैटभ से 5000 वर्श तक बाहु युद्ध किया। महामाया के मोह में ड़ाल देने के कारण दोनो राक्षस भगवान से बोले, ‘‘ हम तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हैं। हमसे कोई वर मांगो।’’ तब श्री हरि ने कहा कि यदि मुझ पर प्रसन्न हो तो मेरे हाथों से मारे जाओ। इस प्रकार मोह में पड़ जाने पर दोनों ने कहा कि जहाँ जल न हो वही हमारा वध करना। तब श्री हरि ने अपनी जाँघ पर सिर रखकर उन दोनो का वध किया।
(इस प्रकार राजा सुरथ तथा वैष्य का मेघा मुनि की षरण में जाना और महायोगमाया की उत्पत्ती व मधु व कैटभ नामक असुरों का जन्म व वध नामक प्रथम अध्याय समाप्त हुआ। )
द्वितीय अध्याय
(माता जगदम्बा का प्राकाट्य तथा महिशासुर की सेना का वध)
पूर्व काल में देवताओं व असुरों में सौ वर्शो तक घोर संग्राम हुआ। असुरों का स्वामी भस्मासुर संपूर्ण देवताओं को जीत इन्द्र बन बैठा। पराजित देवता ब्रह्मा जी को आगे करके भगवान षंकर और विश्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतांत कह सुनाया। उन्होने कहा कि महिशासुर देवताओं का अधिकार छीनकर स्वयं ही सबका अधिश्ठाता बन बैठा है। हम आपकी षरण है। अतः आप उसके वध का कोई उपाय सोचिए।
यह सुनकर भगवान विश्णु तथा भगवान षिव को दैत्यों पर महान क्रोध आया। वे अत्यन्त क्रोध में भर गए। श्री विश्णु के मुख से तथा ब्रह्मा, षिव व इन्द्रादि देवताओं के षरीर से बड़ा भारी तथा अतुलनिय तेज निकला। यह तेज एकत्रित होकर एक नारी रूप में बदल गया। भगवान षिव के तेज से देवी का मुख, यम के तेज से बाल, श्री विश्णु के तेज से भुजाएँ, चन्द्रमा के तेज से स्तन, इन्द्र के तेज से कटिप्रदेष, वरूण के तेज से जँघा व पिण्डली, पृथ्वी के तेज से नितम्ब, ब्रह्मा के तेज से दोनो चरण, सूर्य के तेज से अँगुलियाँ, वसुओं के तेज से हाथों की अँगुलियाँ, कुबेर के तेज से नासिका, प्रजापति के तेज से दाँत, अग्नि के तेज से तीनों नेत्र, संध्या के तेज से भौंहें, वायु के तेज से कान उत्पन्न हुए। इस प्रकार विभिन्न देवताओं के तेज से कल्याणमयी देवी दुर्गा का प्राकाट्य हुआ। वे उन्हे सामने देख बहुत प्रसन्न हुए।
जगद्जननी देवी को सामने देख देवताओं ने वस्त्र, आभूशण, षस्त्रादि से उन्हे सुसज्जित किया। इसके लिए भगवान षिव ने षूल, विश्णु ने चक्र, वरूण ने षंख, अग्नि ने षक्ति, वायु ने धनुश तथा बाणों से भरे हुए तरकस, इन्द्र ने वज्र व घण्टा, यमराज ने कालदण्ड, वरूण ने पाष, प्रजापति ने स्फटिक माला, ब्रह्मा जी ने कमण्डलु, सूर्य देव ने उनके रोमकूपों में किरणों का तेज भर दिया, काल ने चमकती ढाल व तलवार दी, क्षीर समुद्र ने उज्ज्वल हार तथा कभी ने जीर्ण होने वाले दो दिव्य वस्त्र, चूणामणि, दो कुण्डल, कडे़, उज्ज्वल अर्धचन्द्र, सभी बाजुओं के लिए केयूर, चरणों के लिए निर्मल नूपुर, गले की हँसली तथा सब अँगुलियों के लिए अँगूठियाँ दीं। विष्वकर्मा ने फरसा, अस्त्र और अभेद्य कवच तथा मस्तक और वक्ष पर धारण करने के लिए न कुम्हलाने वाले पुश्पों की माला दी। जलधि ने कमल के फूल, हिमालय ने सिंह तथा तरह-तरह के रत्न दिए, धन के अध्यक्ष कुबेर ने मधु से भरा पानपात्र तथा नागों के राजा षेश ने उन्हे मणियों से युक्त नागहार भेट किया। वस्त्र, आभूशण, षस्त्रादि से सुसज्जित होने के उपरांत उन्होने भ्यंकर अट्टहास किया। जिससे संपूर्ण आकाष गूँज उठा। देवी का यह सिंहनाद कहीं समा न सका। संपूर्ण विष्व में हलचल मचने लगी, समुद्र काँप उठे, पृथ्वी ड़ोलने लगी, पर्वत हिलने लगे। इस पर प्रसन्न होकर महर्शियों व देवताओं ने उनकी स्तवन किया।
दैत्यगण क्षोभग्रस्त हो सेना को सुसज्जित कर हथियार हाथ में लेकर सिंहनाद की ओर दौड़ पडे़। उन्होने वहाँ तीनों लोकों को प्रकाषित करने वाली देवी को देखा। जिनके भार से धरती दबी जा रही थी। मुकुट आकाष में रेखा खींचता जान पड़ता था। उनके धनुश की टंकार से सातों पाताल क्षुब्ध हो रहे थे। दैत्यों ने नाना प्रकार के अस्त्र षस्त्रों से युद्ध छेड़ दिया। इस समय महिशासुर का सेनानयक चिक्षुर था। वह चतुरांगिणी सेना के साथ युद्ध में रत हो गया। इसके उपरांत अनाकानेक महादैत्य तोमर, भिन्दीपाल, षक्ति, मूसल, खड़ग, परषु, पट्टिष आदि अस्त्र षस्त्रों से युद्ध कर रहे थे। देवी ने क्रोध में भरकर खेल ही खेल में उनके अस्त्र-षस्त्रों को काट कर दैत्यों पर अस्त्र-षस्त्र बरसाने लगीं।
देवी का वाहन सिंह असुरों में दावानल की तरह विचरने लगा। अम्बिका की निःष्वासों से उत्पन्न अस्त्र षस्त्रों से युक्त गण असुरों से भिड़ कर उनका नाष करने लगे। इस घोर संग्राम में जगदम्बा ने आसुरों की विषाल सेना को क्षणभर में ही नश्ट कर ड़ाला।
(इस प्रकार माता जगदम्बा का प्राकाट्य तथा महिशासुर की सेना का वध नामक दूसरा अध्याय समाप्त हुआ। )
तृतीय अध्याय
(दैत्यासुर महिशासुर का वध।)
सेना को तहस-नहस होते देख चिक्षुर देवी पर बाणों से वर्शा करने लगा। देवी ने उसके बाणों को काटकर उसके सारथी व घोड़े को मार गिराया। साथ ही उसकी ध्वज पताका को काटकर जमीन पर गिरा दिया और उसके षरीर को बाणों से बींध दिया। बाणों से बींधे जाने के उपरांत उसने तलवार से सिंह के मस्तक तथा देवी की भुजा पर प्रहार किया। देवी की भुजा से टकराते ही तलवार टूट गई। अब उसने भद्रकाली पर षूल से प्रहार किया। देवी ने अपने षूल से उसके षूल के टुकडे कर दिए और अपने षूल के प्रहार से उस महादैत्य चिक्षुर को मार गिराया।
चिक्षुर के मारे जाने पर चामर देवी के साथ हाथी पर बैठकर युद्ध करने लगा। उसने देवी पर षक्ति से प्रहार किया। यह षक्ति देवी की हुंकार मात्र से नश्ट हो गई। सिंह ने चामर के हाथी पर धावा बोल दिया। वे दोनों भयंकर रूप से लड़ने लगे। इस युद्ध में सिंह के पंजे की मार से चामर का सिर धड़ से अलग हो गया। इसके उपरांत देवी ने उदग्र, कराल, उद्धत, वाश्कल, अन्धक, उग्रस्य, उग्रवीर्य, महाहनु, विड़ाल, दुर्धर और दुर्मुख आदि दैत्यों को मार गिराया।
अपनी सेना का संहार होते देख महिशासुर भैसे का रूप बना देवी के गणों को त्रास देने लगा। वह सींग से पर्वत उखाड़कर फैंकने लगा। उसके वेग से समुद्र हिलने लगा, पृथ्वी डूबने लगी, बादल टुकड़े-टुकडे़ हो गए। इस पर चण्ड़िका ने पाष फैंककर उसे बाँध लिया। वह भैसे का रूप त्यागकर सिंह रूप में प्रकट हो गया। वह पुनः खड़गधारी रूप धरकर देवी से युद्ध करने लगा। देवी के अस्त्रों से तृस्त हो वह गजराज का रूप धर सिंह को खींचने लगा तो देवी ने तलवार से उसकी सूंड काट डाली। वह पुनः भैसे का रूप धरकर तीनों लोकों को व्याकुल करने लगा। इस पर देवी ने उछलकर उस महादेत्य को पैरों से दबा लिया। वह जैसे ही भैसे के रूप से पुरूश रूप में बाहर निकलने लगा तो देवी ने अपनी षक्ति से उसे रोककर तलवार से उसका मस्तक काट ड़ाला। महिशासुर के वध को देख सारी सेना भाग खड़ी हुई। महिशासुर के वध के उपरांत महर्शियों ने देवी का स्तवन किया तथा गन्धर्वराज गाने व अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।
(इस प्रकार महिशासुर वध नामक तीसरा अध्याय समाप्त हुआ। )
चतुर्थ अध्याय (शक्रादि स्तुति)
महिषासुर के वध के उपरांत इन्द्रादि देवों ने भगवती का बहुविध स्तवन किया। उन्होने नन्दन वन के पुश्प, चन्दन आदि से उनका पूजन किया तो देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं से अपनी अभिलाशित वस्तु माँगने को कहा।
तब देवता बोले, ‘‘भगवती आपने हमारी सब इच्छाएँ पूर्ण कर दीं। इतने पर भी यदि आप वर देना चाहती हैं तो हमें वर दें कि जब भी हम आपका स्मरण करें। आप दर्षन देकर हमारे संकटों को दूर करें तथा हम पर सदा प्रसन्न रहें।’’ इस पर तथास्तु कहकर माँ भगवती अन्तर्धान हो गईं।
(इस प्रकार षक्रादिक स्तुति नामक चौथा अध्याय समाप्त हुआ। )
पंचम अध्याय (देवी दूत संवाद)
पूर्व काल में बल के घमण्ड में षुभ और निषुंभ नामक असुरों ने तीनों लोकों का राज्य व यज्ञ भाग देवताओं से छीन लिया। वे सूर्य चन्द्र, कुबेर, यम व वरूणादि के अधिकार का उपयोग तथा वायु व अग्नि के कार्य स्वयं करने लगे। उन्होने देवताओं को पराजित, अपमानित व अधिकार हीन करके स्वर्ग से निकाल दिया। असुरों द्वारा तिरस्कृत व राज्यभ्रश्ट देवता एकत्रित होकर देवी का स्तवन करने लगे। इसी समय देवी पार्वती, गंगा स्नान के लिए आई तो देवताओं से पूछने लगी कि आप लोग किसकी स्तुति कर रहें हैं। तभी उनके षरीर कोष से उत्पन्न षिवा बोलीं, ‘‘षुंभ से तिरस्कृत व निषुंभ से पराजित ये देव मेरी ही स्तुति कर रहे हैं।’’ पार्वती के षरीर से अम्बिका का प्रादुर्भाव होने के कारण वे ख्12,कौषिकी कहलाईं। कौषिकी के प्रकट होने के बाद पार्वती का रूप काला हो गया। इस कारण वे ख्13,कालिका देवी कहलाई।
षुंभ व निषुंभ के भृत्य चण्ड़ और मुण्ड़ ने जब अत्यन्त मनोहर रूप वाली देवी अम्बिका को देखा तो वे षुंभ के पास जाकर बोले, ‘‘महाराज ! एक अत्यन्त दिव्य एवं मनोहारी स्त्री हिमालय को प्रकाषवान कर रही है। उसे ले लीजिए। वह स्त्रियों में रत्न है। उसके श्री अंगों के प्रकाष से सभी दिषाएँ प्रकाषित हो रही हैं। तीनों लोकों में जितने भी रत्न हैं। वे सभी आपने एकत्रित कर लिए हैं तो उस रत्नमयी स्त्री को आप अपने अधिकार में क्यों नहीं कर लेते ?’’ इस पर षुंभ ने महादैत्य सुग्रीव को दूत बनाकर भगवती के पास उस पर्वत पर भेजा जहाँ देवी विराजमान थीं। वह मधुर वाणी में बोला, ‘‘हे देवी ! इस समय षुंभ तीनों लोकों के ईष्वर हैं। मैं उन्ही का दूत हूँ। उन्होने तुम्हारे लिए जो संदेष भेजा है उसे सुनो। देवी ! हम तुम्हे स्त्री रत्न मानते हैं अतः तुम मेरी या मेरे भाई निषुंभ की सेवा में आ जाओ।’’
यह सुनकर देवी मुसकरायीं और बोलीं, ‘‘दूत! तुमने सत्य कहा है। पर मैने अपनी अल्पबुद्धि से एक प्रतिज्ञा कर ली उसे सुनो। जो मुझे संग्राम में जीत कर मेरे अभिमान को चूर्ण कर देगा। वही बलवान मेरा पति होगा। इसलिए षुंभ और निषुंभ यहाँ पधारें तथा मुझे जीतकर मेरा पाणिग्रहण कर लें।’’
(इस प्रकार देवी दूत संवाद नामक पाँचवां अध्याय समाप्त हुआ। )
षष्ठम् अध्याय (धूम्रलोचन वध)
देवी का कथन सुनकर दैत्याराज ने कुपित होकर सेनापति धूम्रलोचन से देवी के केष पकड़कर घसीटते हुए लाने को कहा। धूम्रलोचन साठ हजार असुरों की सेना लेकर देवी के पास पहुँचा व उन्हे ललकार कर कहने लगा, ‘‘अरी ! तू प्रसन्नता पूर्वक मेरे स्वामी के पास चल, नहीं तो झोंटा पकड़कर बलपूर्वक ले चलूँगा।’’
तब देवी बोलीं, ‘‘हे धूम्रलोचन ! तुम बलवान हो तथा विषाल सेना के साथ हो। यदि तुम बल पूर्वक ले चलोगे तो मैं तुम्हारा क्या बिगाड़ सकती हूँ।’’ यह सुनकर धूम्रलोचन देवी की ओर दौड़ा तो देवी ने ‘हुं’ षब्द की हुंकार से उसे तत्काल भस्म कर दिया। इस पर दैत्य सेना देवी के साथ युद्ध करने लगी। इस भयंकर युद्ध में देवी तथा देवी के सिंह ने असुरों की सारी सेना को क्षण भर में मार गिराया। धूम्रलोचन की मृत्यु के बाद षुंभ ने चण्ड़ और मुण्ड़ को देवी के झोंटे पकड़ कर अथवा बाँध कर लाने की आज्ञा दी।
(इस प्रकार धूम्रलोचन वध नामक छठवां अध्याय समाप्त हुआ। )
सप्तम अध्याय (चण्ड़ और मुण्ड़ वध)
चण्ड़ और मुण्ड़ चतरंगिणी सेना के साथ हिमालय पहुँचे। जहाँ देवी सिंह पर विराजमान थीं। वे दैत्य तत्परता से पकड़ने के लिए दौड़े तथा कुछ ने देवी को घेर लिया। तब देवी षत्रुओं के प्रति क्रोध कर कालिका देवी के रूप में दैत्य सेना पर टूट पड़ी। उन्होने दैत्यों की सारी सेना रौंद ड़ाली, खा ड़ाली तथा मार भगाई। क्षण भर में सेना को नश्ट हुआ देख। चण्ड़, काली देवी की और दौड़ा। मुण्ड़ ने भी बाणों से वर्शा की तो काली ने अट्टहास कर हाथ में तलवार ले ‘हुं’ उच्चारण के साथ चण्ड़ पर धावा बोला। साथ ही उसके केष पकड़ कर उसका मस्तक उतार लिया।
चण्ड़ को मरा देख मुण्ड़ देवी की ओर दौडा तो देवी ने उसे भी मार गिराया। चण्ड़ और मुण्ड़ की मृत्यु के बाद दैत्यों की सारी सेना भाग गई। चण्डिका ने देवी के पास जाकर कहा, ‘‘मैने चण्ड़ और मुण्ड़ नामक दो महापषुओं को तुम्हे भेट किया है। षुंभ और निषुंभ का तुम स्वयं वध करना।’’ इस पर देवी ने काली से मधुर वाणी में कहा, ‘‘हे देवी, तुम चण्ड़ और मुण्ड़ के सिर लेकर आई हो इसलिए तुम विष्व में ख्14,चामुण्डा के रूप में प्रसिद्ध होओगी।’’
(इस प्रकार चण्ड़ और मुण्ड़ वध नामक सातवां अध्याय समाप्त हुआ।)
अष्टम् अध्याय (रक्तबीज का वध)
चण्ड़ और मुण्ड़ के मारे जाने पर षुंभ दैत्य सेना को युद्ध के लिए कूच करने की आज्ञा देते हुए बोला, ‘‘उदायुध नामक 86 सेनापति, कम्बू नामक 84 सेनानायक, 50 कोटिवीर्य, 100 धूम्रकुल के सेनापति, कालक, दोहार्द, मौर्य, कालकेय सभी युद्ध के लिए प्रस्थान करें।’’
षुंभ की भयंकर सेना को देख चण्ड़िका ने धनुश की टंकार से पृथ्वी व आकाष के मध्य स्थान को गुँजा दिया, सिंह दहाड़ने लगा, अम्बिका घंटा ध्वनि करने लगी। इससे सभी दिषाएँ गूँज उठी। असुर सेना ने चण्ड़िका, सिंह व काली को चारों ओर से घेर लिया तो देवताओं के उत्थान के लिए ब्रह्मा, षिव और कार्तिकेय व इन्द्र की षक्ति भी उनके पास आ गई। तब महादेव जी चण्ड़िका से बोले, ‘‘मेरी प्रसन्नता के लिए तुम षीघ्र ही इन दैत्यों का संहार करो।’’ इस पर वे उग्र चण्ड़ी रूप में प्रकट हुईं तथा भगवती ने महादेव जी को दूत बनाकर दैत्यों के पास भेजा। षिव को दूत बनाने के कारण वे ख्15,षिवदूती कहलाई। षिव ने देवी की ओर से दैत्यों से कहा, ‘‘ दैत्यों ! यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो इन्द्र को त्रिलोकी तथा देवताओं को उनका यज्ञभाग सांप कर पाताल लौट जाओ। यदि तुम युद्ध की अभिलाशा रखते हो तो मेरी योगनियाँ तुम्हारे कच्चे मांस से तृप्त हों।’’
इस पर दैत्यों ने आक्रोष में भरकर कात्यायन पुत्री ख्16,कात्यायनी की ओर कूच किया। दोनो ओर से भयंकर युद्ध छिड़ गया। काली षत्रुओं का संहार करती हुई रण में विचरने लगी। ब्रह्माणी कमण्डल के जल से षत्रुओं के तेज को नश्ट करने लगीं। क्रोधित महेष्वरी, वैश्ण्वी, कार्तिकेय और इन्द्र की षक्तियाँ क्रमषः त्रिषूल, चक्र, षक्ति तथा वज्र आदि से प्रहार करने लगीं। वाराही थूथन से, नरसिंही नखों से महादैत्यों का विनाष करने लगीं। षिवदूती बड़े अट्टहास से असुरों को नश्ट करने लगीं।
असुरों का मर्दन देख रक्तबीज क्रोध में भरकर युद्ध करने लगा। उसके रक्त की बूंद पृथ्वी पर गिरने पर उसी के समान रक्तबीज पैदा हो जाते। मातृषक्तियों के प्रहार से धायल रक्त बीज के रक्त से अनेकानेक रक्तबीज उत्पन्न होने लगे। तब चण्ड़िका ने काली से कहा, ‘‘चामुण्डे़ ! तुम अपन मुख फैलाकर रक्तबीज के रक्त बिन्दुओं से उत्पन्न महादैत्यों को खा जाओ।’’ काली देवी के ऐसा करने से आहत रक्तबीज रक्तहीन हो पृथ्वी पर गिर गया। इससे देव हर्शित हुए तथा मातृगण प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे।
(इस प्रकार रक्तबीच वध नामक आठवां अध्याय समाप्त हुआ। )
नवम अध्याय (निशुंभ वध)
रक्तबीज के मारे जाने पर षुंभ व निषुंभ बहुत क्रोधित हुए। होठ चबाते हुए दोनों दैत्य चण्डिका को मारने के लिए उद्यत हुए। दोनों में घोर संग्राम छिड़ गया। दोनों भिन्न-भिन्न अस्त्रों से युद्ध करने लगे। देवी ने निषुंभ को घायल कर धरती पर गिरा दिया। इस पर षुंभ क्रोधित होकर भयंकर युद्ध करने लगा। इस पर चण्ड़िका ने षुंभ को षूल से घायल कर मूर्छित कर दिया।
अब चेतना आने पर निषुंभ ने दस हजार बाहें बना उसके चक्र से देवी पर प्रहार किया। देवी ने षूल से उसकी छाती भेद ड़ाली। उसकी छाती से एक अन्य माहायोद्धा उत्पन्न हो देवी से युद्ध करने लगा। देवी ने तुरंत ही उसे मार गिराया। सिंह दाढ़ों से दैत्यों का भक्षण करने लगा तथा काली व षिवदूती भी दैत्यां का भक्षण करने लगीं, इस भयंकर युद्ध में कौमारी षक्ति से, ब्रह्माणी मत्रपूत जल से, महेष्वरी त्रिषूल से, वाराही थूथन से, वैश्णवी चक्र से, ऐन्द्री वज्र आदि के प्रहार से असुर प्राणहीन होने लगे। जो बचे वे भाग गए।
(इस प्रकार निषुंभ वध नामक नौवां अध्याय समाप्त हुआ। )
दशम अध्याय (शुंभ वध)
निशुंभ को मरा समझकर षुंभ कुपित होकर बोला, ‘‘दुश्ट दुर्गे ! तू बल के अभिमान में दूसरी स्त्रियों का सहार लेकर लड़ती है।’’ इस पर देवी ने कहा, ‘‘ओ दुश्ट ! मैं अकेली ही हूँ। ये मेरी ही विभूतियाँ हैं। देख, ये मुझमें ही प्रवेष कर रहीं हैं।’’ ऐसा कहते-कहते समस्त मातृषक्तियाँ देवी में षमा गईं। अब षुंभ के सामने केवल अम्बिका देवी ही रह गईं। अब देवी पुनः बोली, ‘‘ मैने अपने रूपों को समेट लिया। अब अकेली हूँ। तुम भी स्थिर होकर युद्ध करो।’’
दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ गया। यह युद्ध सबके लिए भयानक तथा आष्चर्य में ड़ालने वाला था। दोनों एक दूसरे के दिव्य अस्त्रों को काटने लगे। युद्ध में दैत्यस्वामी के सारथी व घोड़े मारे गए। अन्त में अम्बिका ने षुंभ को धरती पर पटक दिया। वह पुनः उठा और चण्ड़िका का वध करने के लिए दौडा। देवी ने त्रिषूल से उसको प्राणहीन कर दिया। षुंभ के मरते ही आकाष स्वच्छ हो गया। उत्पात सूचक मेघ व उल्कापात षांत हो गए। नदियाँ ठीक से बहने लगीं। दैवता व गन्धर्वगण मधुर गीत गाने लगे। पवित्र वायु बहने लगी। यज्ञषालाओं की अग्नि स्वयं प्रज्ज्वलित हो गई। सम्पूर्ण दिषाओं में असीम षांति छा गई।
(इस प्रकार षुंभ वध नामक दसवां अध्याय समाप्त हुआ। )
एकादश अध्याय
(देवताओं द्वारा देवी स्तुति व देवी द्वारा देवताओं को वरदान प्राप्त होना)
षुंभ के मारे जाने पर सभी देवता कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे। उन्होने बहुविध उनकी स्तुति की। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर देवी उन्हे पुनः वर देने के लिए तैयार हो गईं। वे बोलीं, ‘‘ देवताओ ! मैं वर देने को तैयार हूँ। जो इच्छा हो मांग लो। ’’
तब देवता बोले, ‘‘ख्17,सर्वेष्वरी ! तुम तीनों लोकों की बाधाषांत कर षत्रु नाष करती रहो।’’ तब देवी बोली कि वैवस्वत मनवन्तर के 28 वें युग में मैं पुनः षुंभ और निषुंभ नामक दो अन्य दैत्यों का वध करूँगी। तब मैं नन्द के घर यषोदा के गर्भ से जन्म लेकर विंध्याचल पर वास करूँगी तथा वैप्रचति नामक दैत्यों का नाष करूँगी। जब उन दैत्यों के भक्षण से मेरे दाँत लाल हो जायेगें तो मनुश्य मुझे ख्18,रक्तदन्तिका कहेंगें।
तब पृथ्वी पर वर्शा रूक जायेगी। हर तरफ पानी का अभाव हो जायेगा तो अयोनिजा प्रकट होकर सौ नैत्रों से मुनियों को देखूँगी। तब मैं ख्19,षताक्षी कहलाऊँगी। इसी समय अपने षरीर के षाकों से संसार का भरण पोशण करने के कारण ख्20,षाकम्भरी तथा दुर्गम नामक दैत्य को मारने के कारण ख्21,दुर्गा नाम से प्रसिद्ध होऊँगी। जब भीमा रूप धर मुनियों की रक्षा के लिए हिमालय के राक्षसों को मारूँगी तो ख्22,भीमादेवी के नाम से जानी जाऊँगी। अरूण नामक दैत्य को भ्रमर (भौरे) के रूप में मारने के कारण ख्23,भ्रामरी के नाम से प्रसिद्ध होऊँगी। जब जब संसार में दानवी बाधाएँ उत्पन्न होंगी। मैं अवतार लेकर षत्रुओं का संहार करूँगी।
(इस प्रकार देवताओं द्वारा देवी स्तुति व देवी द्वारा देवताओं को वरदान प्राप्त होना नामक ग्यारहवां अध्याय समाप्त हुआ। )
द्वादश अध्याय
(देवी चरित्र के पाठ का माहात्म्य)
देवी ने कहा कि जो मधुकैटभ नाष, महिशासुर व षुंभ निषुभ वध का पाठ करेंगें। तथा अश्टमी चतुर्दषी, नवमी को भक्तिपूर्वक माहात्म्य सुनेंगे। उन पर पाप जनित आपत्तियाँ नहीं आयेंगीं। उनके घर में दरिद्रता, प्रेमीजन बिछोह कश्ट, षत्रु-लुटेरे-राजा, षस्त्र, जल राषि आदि का भय नहीं रहेगा।
मेरे प्रादुर्भाव की कथा तथा पराक्रम सुनने से मनुश्य निर्भय हो जाता है। मेरे चरित्र का स्मरण करने मात्र से ही सभी कश्ट दूर भागते हैं।
(इस प्रकार देवी चरित्र के पाठ का माहात्म्य नामक बारहवां अध्याय समाप्त हुआ। )
त्रयोदश अध्याय
(राजा सुरथ व वैश्य को देवी को वरदान)
इस प्रकार देवी माहात्म्य, कथा व पराक्रम का वर्णन करने के बाद ऋशि बोले, ‘‘हे राजन ! मैने तुमसे जगतधारणी देवी का वर्णन कर दिया। वे विद्या देती हैं। अपनी माया से विवेकी जनों को मोहित कर लेती हैं। आराधना करने पर प्रसन्न होकर भोग, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं। राजन, आप दोनों उन्ही की षरण में जाइए।
मेघा मुनि के वचन सुनकर राजा तथा वैष्य तत्काल तपस्या के लिए चले गए। वे दोनो धूप, दीप, हवन आदि से आराधना करने लगे। उनके तीन वर्श तक संयम पूर्वक तपस्या करने पर देवी ने दर्षन देकर वर मांगने को कहा।
इस पर राजा सुरथ ने दूसरे जन्म में न नश्ट होने वाला राज्य मांगा और इस जन्म में अपना राज्य वापिस मांगा। देवी ने वरदान देकर कहा कि अगले जन्म में तुम सावर्णिक मनु होओगे तथा अखण्ड राज्य को भोगोगे।
वैष्य का मन इस संसार से विरक्त हो चुका था। उसने ममता व आषक्ति का नाष करने वाला वाला ज्ञान मांगा तो माता ने उसे मोक्ष का ज्ञान प्राप्त करने का वरदान दिया। माता दोनों को वरदान देकर अन्तर्धान हो गईं।
(इस प्रकार राजा सुरथ व वैष्य को वरदान नामक तेरहवां अध्याय समाप्त हुआ। )
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माँ दुर्गा जी की सरल पूजा
पूजा का आरम्भ :- पूजा प्रारम्भ करने से पूर्व पूजा का सारा सामान आपने आसपास रख लें। इस पूजन के लिए या तो पुरोहित की मदद लें या फिर स्वयं बताए गए क्रमानुसार अपनी पूजन स्वयं करें।
अकेले पूजन करें या पत्नी के साथ यदि हो सके तो पति-पत्नी साथ पूजा करें। पूजा करने से पूर्व गठबंधन अवश्य कर लें। इसके लिए एक सुपारी, एक रूपये का सिक्का तथा कुछ चावल लेकर उसे गंठ में बांध लें तथा पत्नी को अपनी बाई ओर बिठाऐं।
01. प्रारम्भिक ध्यान - पूजा प्रारम्भ में ही सबसे पहले विध्नेश्वर को याद करना चाहिए इसके लिए एक अखंड दीप जलाएं।
शुभं करोतु कल्याणं आरोग्य सुखसम्पादाम्।
मम बुद्धिप्रकाशाय दीपज्योतिर्नमोऽतु ते।।
साथ ही एक लोटे या बर्तन में गंगाजल डालकर जल भर कर रखें। एक चौकी पर पहले कलावा बांधे उसके उपरांत उस पर कपडा बिछा कर मिट्टी या सुपारी से बनाए गए गणेश जी की स्थापना करें। इसके उपरांत आँख बंद करके विध्नेश्वर का ध्यान करना चाहिए।
ऊँ शुक्लाम्बधरं देवं शशिवर्णं चर्तुभुजम्।
प्रसन्न-वदनं ध्यायेत् सर्व-विध्नाप-शान्तये।।
ऊँ गजाननं भूतगणधिसेवितम कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम उमासुतम शोकविनाशकारकमं नमानि विध्नेश्वर: पादपंकजम।। वक्रतुण्डमहकाय सूर्यकोटि समप्रभ निर्विध्नं कुरू में देव सर्व कार्येशु सर्वदा।।
श्री गणेश गुरू पूजा
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
02. आसन शुद्वि - आसन शुद्धि की भावना से धरती माता को स्पर्श करें तथा निम्न विनियोग पढेंं।
ऊँ पृथ्वि त्वया घृता लोका देवि त्वं वष्णुना घृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्र कुरू चासनम्।।
03. स्वयं की शुद्वि के लिए आचमन - वाणी, मन, अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से जल को तीन बार भूमि पर गिराएं। हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाना चाहिए। ऊँ केशवाय नमः। ऊँ नाराणाय नमः। ऊँ माघवाय नमः। यह कहकर हम हाथ धांए तथा निम्न मंत्र बोंलें ‘ऊँ ह्यशिकेशाय नमः।’
04. पवित्री करण या पवित्री धारण - इसके लिए दाएं हाथ में कुशा की पवित्री धारण करें यदि अंगुली में स्वर्ण की अंगूठी है तो कुशा की पवित्री की आवश्यक्ता नहीं है।
अब बाए हाथ में जल लें कर उसे दाहिने हाथ से ढ़क लें। मंत्रोच्चारण के साथ जल को सिर तथा शरीर पर छिड़कें और भावना बनाएं कि मन व शरीर पवित्र हो गया है। इसके लिए निम्न मंत्र को पढें।
‘ऊँ अपविः पवित्रों वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्यभ्यन्तरः शुचिः।।
05. प्राणायाम -
श्वांस गति को धीमे से शरीर के भीतर गहरा खींचे फिर थोडा रोकें और धीरे-धीरे श्वांस छोंडें। इसी को प्राणायाम कहतें हैं। प्राण छोड़ते वक्त यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण दुष्प्रवृत्तियां, बुरे विचार प्रश्वांस के साथ बाहर निकाल रहें हैं। प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाता है।
ऊँ भूः ऊँ भुवः ऊँ स्वः ऊँ मह ऊँ जनः ऊँ तपः ऊँ सत्यम् ऊँ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्। ऊँ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भवः स्वरोम्।
06. न्यास - इसका प्रायोजन, शरीर के सभी अंगों में पवित्रता का समावेश करने तथा अंतःकरण की चेतना को जगाने के लिए है, ताकि देव पूजन जैसा श्रेष्ठ कार्य किया जा किया जा सके। बायें हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पांचों उंगलियों को उनमे भिगो कर बताए गए स्थानों पर मंत्रोच्चारण के साथ स्पर्श करें।
ऊँ वाड्.मेऽआस्येऽस्तु।
मुख को
ऊँ नासोर्मेप्राणोऽस्तु।
नासिका के दोनो छिद्रों को
ऊँ अक्ष्णोर्मेचक्षुरस्तु।
दोनों नेत्रों को
ऊँ कर्णयोर्में श्रोत्रमस्तु।
दोनों कानों को
ऊँ बाहृवोर्मे बलमस्तु।
दोनों बाहों को
ऊँ ऊर्वोमेंओजोऽस्तु।
दोनों जंधाओं को
ऊँ अरिष्टानिमेऽअड.गानि तनुस्तन्वा में सह सन्तु।
समस्त शरीर को
07. रक्षा विधान :- देखा गया है कि शुभ कार्यो में असुरी शक्तियां बांधा डालने का प्रयास करती हैं। इन असुरी षक्तियों से रक्षा के लिए रक्षा विधान किया जाता हैं। इसके लिए पीली सरसों अथवा अक्षत (चावल) बाएं हाथ में लेंकर उसे दाएं हाथ से ढक लें। और दाएं घुटने पर रखकर ऐसी भावना करें कि दसों दिशाओं में स्थित देव तथा भगवान इस शुभ आयोजन में असुरी शक्ति को न आने देकर इस शुभ आयोजन का तथा इसमें सम्मिलित लोगों का संरक्षण करेंगें। इसके लिए निम्न मंत्र को पढें -
ऊँ अपसर्पन्तमु ते भूता ये भूता भूतले स्थिताः। ये भूता विध्नकर्तारस्ते नश्य शि्वाज्ञया।।
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतोदिशम्। सर्वेषामविरोधेन पूजा कर्मसमारंभे।।
इसके बाद इन दानों को दसों दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, उत्तर-पश्चिम (वायव्य), उत्तर-पूर्व (ईशान), दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), दक्षिण-पूर्व (अग्नि), ऊपर तथा नीचे। इन दस दिशाओं में फैंक दें।
08. तीर्थावहान - अब सबसे पहले तीथों का आवाह्न किया जाता है ताकि उनमें विराजमान देव हमारे पूजन में शामिल हो सकें। इसके लिए तीर्थों का आवाह्न करें और निम्न मंत्र को पढें।।
पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा।आगच्छन्तु पवित्राणि पूजा काले सदा मम।। गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरू।। कुरूक्षेत्रे गया गंगा प्रभास, पुष्कराणि च । एतानि पुण्यतीर्थानि पूजा काले भवन्त्विह।।
09. मांगलिक देव आवाह्न :- इसके लिए अपने ईष्टटदेव सहित मांगलिक देवों का आवाह्न किया जाता है।
ऊँ श्रीमन्महागणाधिपतये नमः।
ऊँ ईष्टदेवाताभ्यो नमः। कुलदेवताभ्यो नमः। ग्रामदेवताभ्यो नमः। स्थान देवताभ्यो नमः। वास्तु देवताभ्यो नमः। हिरण्यगर्भाभ्यां नमः। श्री लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः। उमा महेवराभ्यां नमः। शचीपुरन्द्राभ्यां नमः। मात्र-पित्र चरण कमलेभ्यो नमः। सर्वेभ्यो ब्राहमणेभ्यो नमः।
10. चंदन धारण - सबसे पहले ईष्ट देव (मुख्य देवों) के मस्तिष्क पर चंदन लगाएं उसके बाद स्वयं चंदन धारण करें। मस्तिष्क के विचारों को शांत, शीतल, पवित्र और निष्पाप करने के लिए चंदन को मस्तिष्क पर लगाया जाता है।
श्रीखण्ड चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
थ्वलेपनं सुरश्रेष्ठ ! चन्दनं प्रतिगृहयताम्।।
चंदनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पाप नाशनम्।
आपदां हरते नित्यश्ं लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा।।
11. रक्षा सूत्रम् - अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने के पुण्य कार्य के लिए व्रतशीलता धारण करूंगा। यह भाव रखते हुए रक्षा सूत्र को बांधा जाता है। रक्षा सूत्र सबसे पहले देवों को अर्पित करें, फिर ब्राह्मण को बांधें उसके उपरंत स्वयं बधवाएं। यह ध्यान रखें कि पुरूषों तथा अविवाहित लडकियों के दाहिने (सीधे) हाथ में तथा महिलाओं के बाएं हाथ में कलावा (रक्षासूत्र) बांधा जाता है।
सबसे पहले साधक (पूजक या ब्राह्मण) देवों को कलावा दें।
ऊँ व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोवि दक्षिणाम्।
दक्षिणास श्रद्वामाप्नोति श्रद्वया सत्यमाप्यते।
फिर ब्राह्मण को कलावा बांधें उसके उपरांत स्वयं अपने आप को कलावा बंधवाएं व निम्न मंत्र पढें़ -
येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम बध्नामिं रक्षे मा चल मा चल।।
12. संकल्प :- किसी भी स्नान, पूजा, दान, देवपूजन या किसी सतकर्म के प्रारम्भ में संकल्प अवश्य किया जाता है। संकल्प से पूर्व पवित्री धारण कर आचमन आदि से शुद्व होकर दाएं हाथ में जल अथवा अक्षत अथवा पुुष्प लेकर निम्न प्रकार से संकल्प किया जात है। हम यह क्रिया पहले ही कर चुकें हैं। इसलिए अब केवल संकल्प ही पढें।
सभी देवों के लिए संकल्प उनके नाम के साथ किया जाता हैं आईए संकल्प के बारे में जानें। यह संकल्प प्रत्येक व्यक्ति को कंठस्थ कर लेना चाहिए।
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2071, तमेऽब्दे प्लवंग नाम संवत्सरे दक्षिणायने …….
ऊँ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु श्री पुराण पुरूषोंतमाय प्रर्वतमान्स्य अद्य ब्रहमणोऽहि द्वितीय परार्धे, श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे। कलियुगे कलि प्रथम चरणे बौद्वावतारे भूर्लोकें जम्बूद्वीपे भरतखंडे भारतवर्षे (अमुक) प्रदेशे (अमुक) क्षेत्रे (अमुक) नगरे (अमुक) ग्रामें (अमुक) नाम संवतसरे (अमुक) मासे (अमुक) पक्षे (अमुक) तिथियों (अमुक) वासरे (अमुक) गोत्रोत्पन्न (अमुक) नामाः अहं सपरिवारस्य लोककल्याणाय आत्मकल्याणाय, भविष्य उज्जवल कामना पूर्तये श्रुति-स्मृति-पुराणोक्तफल प्राप्तिर्थ, दीर्धायु-आरोग्य-पुत्र-पौत्र-धन-धान्य आदि समृद्ध्यर्थे कामनयाज्ञाता ज्ञात कायिक वाचिक मानसिक सकल पापनिवृत्तिपूर्वकं ममसर्वा पच्छन्ति पूर्वक दीर्घायु पुण्य बल पुष्टि नेरूज्यादि सकल शुभ फल प्राप्तार्थ गजतुरंग-रथ-राज्य-एश्वर्य-आदि सकल-सम्पदाम-उत्तरोत्तर-अभिवृद्वयर्थम् मनोकामना पूर्णाथ यथाशक्ति श्रीमहादुर्गादेव्यो प्रसन्नार्थ नवरात्र पूजन संकल्प अंह करिष्ये। औप
अमुक - जहाँ -जहाँ भी अमुक शब्द आया है उसके स्थान पर अपने से संबंधित जानकारी बोलें। जैसे (अमुक) {अपने प्रदेश का नाम} प्रदेशे (अमुक) {अपने क्षेत्र का नाम} क्षेत्रे (अमुक) {अपने नगर का नाम} नगरे (अमुक) {अपने गाँव का नाम} ग्रामें (अमुक) {वर्तमान संवत्सर का नाम} नाम संवत्सरे (अमुक) {वर्तमान मास का नाम} मासे (अमुक) {वर्तमान पक्ष का नाम} पक्षे (अमुक) {वर्तमान तिथि का नाम} तिथियों (अमुक) {वर्तमान दिन का नाम} वासरे (अमुक) {अपने गोत्र का नाम} गोत्रोत्पन्न (अमुक) {अपना नाम} नामाः
बाकी जानकारी तो सहज मिल जाती है। परंतु संवतसर, मास, पक्ष, तिथि व दिन आदि की जानकारी के लिए पांचांग (पत्रे या हिन्दी कैलेंडर) की आवष्यकता होगी।
13. संक्षिप्त षोडशोपचार पूजन
01. ध्यान –
आप जिस भी देवी या देवता की पूजा करना चाहते हैं उसका ध्यान करें तथा उनके किसी नाम से उनका ध्यान करें। ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।’
02. आवाहन
अपने हाथ में अक्षत (चावल) तथा पुष्प लेकर अपने पूज्य देवता या देवी का आवाहन करें।
‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः आवाहयामि।’
और हाथ का सामान जमीन पर छोड़ दें।
03. आसन
‘पाद्योः पाद्यं समर्पयामि’ ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
04. अर्ध्य
‘हस्तयोरर्ध्यं समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
05. आचमन
‘आचमनीयं जलम समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
06. स्नान
‘स्नानं जलम समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
07. वस्त्र
‘वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
08. यज्ञोपवीत
‘यज्ञोपवीतं समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
09. चन्दनं
‘चन्दनं समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
10. अक्षत
‘अक्षतान् समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
11. पुष्प
‘ पुष्पाणि समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
12. पुष्पमाला
‘पुष्पमालां समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
13. धूप
‘धूपमाघ्रापयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
14. दीप
‘दीपं दर्शयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
15. नैवेद्य
‘नैवेद्यं निवेदयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
16. फल
फलं समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
17. ताम्बूल
‘ताम्बूलं समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
18. दक्षिणा
दक्षिणां समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
14. आरती : - ‘आरार्तिक्यं समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
15. मंत्रपुष्जलि : - ‘मंत्रपुष्जलि समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
16. प्रदक्षिणा : - ‘प्रदक्षिणा समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
17. नमस्कार : - ‘प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि’ ‘ऊँ दुर्गा देव्यै नमः।
18. क्षमा याचना : - निम्न मंत्र के उच्चारण ने माता से क्षमा प्रार्थना करें कि हो सकता हैं हमसे कोई त्रूटि रह गई। इससे उनसे प्रार्थना करें कि वे हमारी त्रूटि को माफ कर हम पर अपनी कृपा दृृष्टि बनाऐं।
आवहानं न जानामि न जातनामि विसर्जनम्। पूजां च न जानामि क्षमत्व परमेश्वर:।।
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु में।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेब बंधु च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव।।
पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः।
त्राहि मां परमेशानि सर्वपापहराभव।।
अपराध सहस्त्राणि क्रियंते ऽहर्निशं मया।
दासोऽमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर।।
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवल तरांशुकगन्ध माल्यशोभे।
भगवन महागणाधिपतयै प्रसीद मह्यम्।।
19. समपर्ण : - ‘ऊँ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु’ कहते हुए समस्त पूजा भगवान को समर्पित कर दें।
अथवा
पूजा के बाद निम्न मंत्र को अवश्य पढें।
लम्बोदर! नमस्तुभ्य सततं मोदक प्रिय। निर्विध्नं कुरू में देव सर्व कार्येषु सवर्दा।। त्वांध्नि शत्रु दलनेति च सुंदरेति। भक्ति प्रदेति सुख देति फल प्रदेति।। विद्या प्रदेत्य धहरेति च ये स्तुवंति। तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्य मेव।।
इसके बाद दंडवत प्रणाम करें अंजुलि में पुष्प आदि लेकर देवो पर पुष्पवर्षा कर दें।
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