जय जगन्नाथ (स्वर्ग द्वार)पुरी के पाँच कुण्डों में स्नान करने का विशेष महत्त्व

जय जगन्नाथ (स्वर्ग द्वार)पुरी के कुण्डों में स्नान करने का विशेष महत्त्व है। 

वैसे जगन्‍नाथ पुरी में मंदिर के आस-पास छः चमत्‍कारिक कुंड हैं। इन सभी कुंडों से कोई न कोई पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। जगन्‍नाथ पुरी जाने पर इन कुंडों के दर्शन व स्नान के पश्चात् ही तीर्थ यात्रा पूर्ण मानी जाती है। हिन्दू धर्म की मान्यतानुसार जगन्नाथ के दर्शन करने और पञ्च तीर्थों में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं इन कुंडों के बारे में…

1. मार्कण्डेय कुंड
मार्कण्डेय कुंड, तीर्थयात्रा का प्रारंभिक बिंदु माना जाता है। भगवान् शिव ने इसी स्थान पर ऋषि मार्कण्डेय की समुद्र से रक्षा की थी। ऐसी भी मान्यता है कि यह वही स्थान है जहां पर ऋषि मार्कण्डेय ने भागवत के भावार्थ को समझा  और एक महान यज्ञ का आयोजन किया था। 
इसी स्थान पर ऋषि मार्कण्डेय जी द्वारा भगवान शिव के एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया, जिसे ‘मार्कण्डेश्वर मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। इसी मंदिर के बिल्कुल साथ में ‘मार्कण्डेय तीर्थ’ नामक सरोवर या कुंड स्थित है।

2. इन्द्रद्युम्न कुण्ड
इन्द्रद्युम्न कुण्ड ,गुंडिचा मंदिर के उत्तर-पश्चिमी छोर पर, 4.5 एकड़ में बना हुआ है। यह कुण्ड पुरी के प्रसिद्ध पञ्च तीर्थों में से एक है। इन्द्रद्युम्न कुण्ड का सम्बन्ध भगवान् श्री कृष्ण से माना जाता है। यह कुण्ड पर ही श्री कृष्ण के बालरूप को समर्पित एक मंदिर भी है। 
समीप ही राजा इन्द्रद्युम्न को समर्पित एक देवालय भी है। महाभारत में राजा इन्द्रद्युम्न द्वारा आयोजित अश्वमेध यज्ञ और जगन्नाथ के चार प्रमुख आराध्यों के अवतारों का भी वर्णन मिलता है। साथ ही यह भी वर्णित है कि राजा इन्द्रद्युम्न द्वारा आयोजित अश्वमेध यज्ञ के लिए इसी स्थान पर एक यज्ञ कुंड का निर्माण किया गया था। 
इस कुंड के किनारे अनेकों छोटे-बड़े मंदिर बने हुए हैं। पुराग्रंथों (ब्रह्मपुराण) में उल्लेख है कि जो इस कुंड में एक बार भी स्नान कर लेता है वह इंद्रलोक को जाता है। 
यहां पितरों के लिए पिंडदान करने का भी प्रचलन है। ऐसी मान्यता है कि यहां आकर पिंडदान करने वाले की 21 पीढ़ियों का उद्घार होता है। इस कुंड के बारे में कहा जाता है यहां स्‍नान करने वाला व्‍यक्ति इंद्रलोक को जाता है।  स्वयं इंद्रलोक जाता है। जो भी इस स्थान पर स्नान करके महाप्रसाद ग्रहण करता है उसे एक करोड़ गऊदान करने का पुण्य प्राप्त होता है।

3. रोहिणी कुण्ड
रोहिणी कुण्ड ,जगन्नाथ मंदिर परिसर में, विमला मंदिर के समीप स्थित है। यहाँ विद्यमान वट वृक्ष को ‘अक्षय कल्पवट’ के नाम से जाना जाता है। इसमें भगवान विष्‍णु (श्री हरि नारायण) का निवास मानकर, भक्तों द्वारा बड़ी ही श्रद्धा से यहां पूजा पाठ होती आ रही है। यहां स्‍नान करने पर व्‍यक्ति सदैव के लिए पापमुक्‍त हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है। इसमें जो व्यक्ति स्नान कर लेता है वह सदैव के लिए पापमुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। 
इस कुण्ड के बारे में ऐसी भी मानयता है कि एक बार एक कौए ने अनजाने ही अपनी प्यास बुझाने के लिए इस कुण्ड का पानी पी लिया था। इस कुंड का पानी पीने के कारण, वह कैआ मृत्यु को प्राप्त करने के पूर्व भगवान के चतुर्भुज अलौकिक स्वरूप के दर्शन करते हुए सीधे स्वर्ग चला गया था।

पुराणों के अनुसार, जरा सावर नामक शिकारी द्वारा अनजाने में ही श्री कृष्ण की जंगल में पड़ी मानव अस्थियों का दाह-संस्कार किया था। तत्पश्चात् श्री कृष्ण ने जरा को स्वप्न में दर्शन देकर बताया कि तुमने जंगल में पड़ी जिन हस्तियों का दाह संस्कार किया है वह मेरी ही थीं। अब उनके अवशेष, लकड़ी के एक लट्ठे में परिवर्तित हों जाएंगे, जो समुद्र से बहते हुए रोहिणी कुण्ड में पहुँचेगें। 
यह जानकर जरा जरा ने सारी बात महाराज इंद्रदेव को बताई। राजा इन्द्रद्युम्न ने उस पवित्र लट्ठे को ढूंढ निकाला और उसी पवित्र लट्ठे से भगवान् जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की प्रतिमाएं बनवाईं।

4. श्वेतगंगा सरोवर
श्वेतगंगा सरोवर, नीलाचल के दक्षिण में, सिंह द्वार और स्वर्ग द्वार के मध्य स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस सरोवर का निर्माण भगवान विष्‍णु के नाखूनों से हुआ है और ऐसी मान्‍यता है कि इस कुंड का जल पृथ्‍वी के तल से स्वप्रवाहित रहा है। जल के सस्वप्रवाहित होने के कारण इसे बहुत पवित्र माना जाता है।
ऐसी भी मान्यता है कि श्वेतगंगा सरोवर और गंगा नदी में, पृथ्वी के नीचे, कोई सम्बन्ध है। जगन्नाथ जी के दर्शन से पूर्व, समुद्र में स्नान करने के पश्चात् भक्त पहले श्वेतगंगा सरोवर में स्नान करते हैं।

5. महोदधि या समुद्र
महोदधि या समुद्र , पुरी में स्वर्ग द्वार क्षेत्र का ‘समुद्र’ अथवा ‘महोदधि’ पञ्च तीर्थों में से ही एक है। वर्तमान शंकराचार्य द्वारा नौ वर्ष पूर्व समुद्र आरती का शुभारम्भ किया गया था। पुरी में स्वर्गद्वार पर, प्रतिदिन संपन्न होने वाली समुद्र आरती का शुभारम्भ मठ के शिष्यों किया जाता है। इसके लिए समुद्र देव के निकट ज्योति प्रज्ज्वलित कर प्रार्थना सहित समुद्र की आरती की जाती है। 
हर वर्ष पौष पूर्णिमा के पुण्य अवसर पर भव्‍य तरीके से समुद्र की आरती का आयोजन होता है क्योंकि शंकराचार्य जी स्वयं समुद्र की पूजा और आरती करने यहाँ आते हैं।

चंदन सरोवर या कुंड:
चंदन सरोवर या कुंड जग्‍गनाथ पुरी के पवित्र कुंडों में से छठवां कुंड है। ऐसी मान्यता है कि चंदन सरोवर या कुंड में भी जो व्यक्ति स्नान करके अपने पूर्वजों का तर्पण करता है उसके पूर्वजों की आत्मा बन्धनमुक्त हो जाती है। अतः यहां आकर अपने पूर्वजों का तर्पण कर उनकी आत्मा की मुक्ति का प्रयास करना चाहिए। 
🌹🙏🌹जय जगन्नाथ भगवान जी की🌹🙏🌹

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