संस्कृत 01 || वेद मन्त्रों के उच्चारण करने के सामान्य नियम
वेद मन्त्रों के उच्चारण करने के सामान्य नियम
अधिकतर लोग यह सोचते है कि वेद मन्त्रों का उच्चारण कठिन है क्योंकि उन्होंने कभी संस्कृत भाषा का अध्ययन नहीं किया है। तो हम आपसे कहेंगे कि आप इस विचार को पूरी तरह त्याग दें क्योंकि संस्कृत भाषा देवों की भाषा है। इस कारण यह भाषा अत्यन्त सरल, सुस्पष्ट और सुव्यवस्थित है। इसे बिना किसी कठिनाई के शीघ्र ही सीखा जा सकता है।
इसका गद्दारों बहुत आसान है परंतु मन्त्रों के उच्चारण करने के कुछ नियम होते हैं जिन्हें हम यहाँ दे रहे हैं। यदि कोई इन नियमों का ध्यान रखें तो कुछ ही दिनों में सामान्य व्यक्ति भी वैदिक मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण कर सकता है। तो आप पीछे क्यों है आप भी संस्कृत भाषा को पढ़ना, लिखना और बोलना सीख सकता है।
संस्कृत भाषा के कुछ अक्षर, उनके नाम और बोलने की विधि हैं-
संस्कृत को हिंदी की माता कहा जाता है। इस कारण दोनों में बहुत अधिक समानता है। इस भाग में हम समानताओं पर ज्यादा जोर नहीं देंगे। हम आपको सीधे विषय पर लेकर आते हैं। हिन्दी भी भाषा में दो प्रकार के अक्षर होते हैं। स्वर तथा व्यंजन।
स्वर
संस्कृत भाषा में अ, ई, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ आदि अक्षर स्वर कहलाते हैं। इनके तीन भेद होते हृस्व, दीर्घ और प्लुत है।
ह्रस्व
वनअ, इ, उ, ऋ, ऌ इन अक्षरों को ह्रस्व कहा जाता है। इनका उच्चारण 'एक मात्रिक' होता अर्थात् जितने समय में हाथ की कलाई की नाड़ी एक बार धड़कती है उतने समय में इनका उच्चारण करना चाहिए।
दीर्घ
आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ इन अक्षरों को दीर्घ कहा जाता है। इनका उच्चारण - 'द्विमात्रिक' होता है अर्थात् जितने काल में हाथ की कलाई की नाड़ी दो बार धड़कती है उतने काल में इनका उच्चारण करना चाहिए।
प्लुत
अ३, ६३, उ३, ऋ३, ए३, ऐ३, ओ३, और ये प्लुत अक्षर है इनका उच्चारण 'त्रिमात्रिक' ये होता है अर्थात् जितने काल में हाथ की कलाई की नाड़ी दो बार धड़कती है उतने काल में इनका उच्चारण करना चाहिए।
व्यंजन
क्, ख, ग् घ् आदि अक्षर व्यंजन कहलाते हैं ये सभी व्यंजन अर्धमात्रिक होते हैं और इनका उच्चारण बिना स्वर के नहीं होता। प्रत्येक व्यंजन का उच्चारण स्वर को मिला के ही ठीक प्रकार से होता है। जैसे- क् +अ =क, खू+अ = ख इत्यादि।
अकुहविसर्जनीयाः कण्ठयाः
अर्थात् अ, आ, अ३ कु अर्थात् क, ख, ग, घ, ङ, ह और (:) | विसर्जनीय इन वर्णों का उच्चारण कण्ठ से होता है अर्थात् जो जिह्वा का मूल कण्ठ का अग्रभाग काकल्क के नीचे देश है उस कण्ठ स्थान से इनका उच्चारण शुद्ध होता है।
इचुयशास्तालव्याः
अर्थात् इ, ई, इ३, चु अर्थात् च, छ, ज, झ, ञ, य और श इनका तालु स्थान अर्थात् दांतों के ऊपर से उच्चारण करना चाहिए।
ऋटुरषा मूर्द्धन्याः
अर्थात् ऋ ॠ, ऋ३ टु अर्थात् ट, उ, ड, ढ, ण, र और प का उच्चारण मूर्द्धास्थान अर्थात् तालु के ऊपर से करना चाहिए।
लृतुलसा उनत्याः
अर्थात् लृ लृ३, तु अर्थात् त, थ, द, ध, न, ल और इन वर्गों का दन्तस्थान अर्थात् दांतों में जिह्वा लगाके इनका उच्चारण करना चाहिए।
वकारो दत्नयौष्ठयः
अर्थात् व का उच्चारण दांत और ओष्ठ से करना चाहिए।
उ, ऊ, उ३. पू अर्थात् प, फ, ब, भ, म और उपध्मानीय का उच्चारण ओष्ठ स्थान से करना शुद्ध है।
अनुस्वारयमा नासिक्याः
अर्थात् ल को छोड़कर (गं) इन तीनों और ( ं ) अनुस्वार को नासिका से बोलना चाहिए।
एदैतौ कण्ठयतालव्यौ
अर्थात् ए, ऐ कण्ठ और तालु से बोलने चाहिए।
ओदीतो कण्ठयोष्ठयौ
अर्थात् ओ औ को कण्ठ से बोलना चाहिए।
अक्षरों के नाम पहचान और उच्चारण
इस (ं ) आकृति वाले अक्षर को 'अनुस्वार' कहते हैं। इसका उच्चारण नाक से वायु निकालते हुए किया जाता है। जैसे ओम् राम् ।
इस (ँँ ) आकृति वाले अक्षर को अनुनासिक कहते हैं। इसे भी नासिका से वायु निकालते हुए बोला जाता है। जैसे चलूँ, कहूँ।
यह (गंग) अक्षर 'अयोगवाह ह्रस्व' है। इसका उच्चारण कांसे के पात्र पर डण्डा मारने से जो ध्वनि निकलती है वैसे होता है। जैसे त्वमग्ने यज्ञानाथ होता।
Post a Comment
Post a Comment