समय वर्णन - 01 || चारों युगों के महामंत्र

मुहूर्त

मुहूर्त  एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है  जिसमें  ग्रह निहारिकाओं की  शुभ रश्मियों  के आगमन से  मानव मन  उत्साह से  अपने शुभ कार्यों को संपादित कर सकता है  इसके लिए  यह वर्णन यहां प्रस्तुत किया जा रहा है ।

5000 वर्ष पूर्व श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए सृष्टि चक्र की सुरक्षा के लिए यज्ञ एवं कर्तव्य कर्म करने की आवश्यकता पर बल देते हैं श्रीमद् भगवत गीता के तीसरे अध्याय में भगवान कहते हैं ।

अन्नाद्भवती भूतानि पर्जन्यादन्न संभव । 
यज्ञाद्भवति पर्जन्य यज्ञ कर्म समुद्भव।।

अर्थात संपूर्ण प्राणी अन्न से से उत्पन्न होते हैं, अन्नू वर्षा से होता है वर्षा यज्ञ से होती है यज्ञ निष्काम कर्मों से संपन्न होता है यह इसलिए कहा गया है कि भारतीय ज्योतिष विज्ञान के विकास क्रम की दिशा में ऋषियों ने जनकल्याण स्वास्थ्य शिक्षा संस्कार समृद्धता के उपायों के लिए पुष्ट वर्षा पुष्ट धान्य पुष्ट रस कस पर्यावरण की शुद्धता व सुरक्षा हरे भरे वृक्ष लताएं बगीचे निर्मल जल इसके लिए मेघ बादलों से गहन वर्षा, वर्षा के लिए पुष्टिप्रद यज्ञ करने की योजना को क्रियान्वित किया।

यदि वह विधि है जिसके द्वारा प्राकृतिक संतुलन बनाए रखा जा सकता है यज्ञ से पर्यावरण की शुद्धता, सुरक्षा वायुमंडल की पवित्रता, विविध रोगों का नाश, शारीरिक व मानसिक उन्नति तथा रोग निवारण के  साथ दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है यज्ञ के द्वारा भूमि जलवायु और ध्वनि प्रदूषण को दूर किया जा सकता है क्योंकि यह वह वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बना रहता है इसलिए कि प्रकृति में एक चक्र व्यवस्था है जिसके अनुसार प्रत्येक पदार्थ अपने मूल स्थान पर पहुंचता है इसी आधार पर ऋतु चक्र, वर्ष चक्र ,अहोरात्र चक्र, सौर चक्र, चंद्र चक्र आदि प्रवर्तित होते हैं।

इस प्राकृतिक चक्र को ही यज्ञ कैसे हैं यह 
प्रक्रिया अनु परमाणु से लेकर सूर्य चंद्र आदि तक  सभी जगह चल रही है सृष्टि के प्रत्येक कण में नित्य निरंतर परिवर्तन हो रहा है सृष्टि चक्र चल रहा है अतः सृष्टि चक्र का आधार केंद्र यज्ञ ही है।
यज्ञ के लिए कॉल अर्थात मुहूर्त समय निर्धारित किए गए हैं यद्यपि उस समय ज्योतिष विज्ञान का प्राकट्य मुहूर्त के लिए ही प्रयोग में लाया जाता था इस महत्व का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ज्ञान विज्ञान को समझने के लिए ज्योतिष का ज्ञान अनिवार्य है अथर्ववेद के 19 वें कांड के सूक्तों 53 और 54 के मंत्रों में काल के विराट स्वरूप का वर्णन किया गया है।

जिसमें यह बताया गया है कि समूचा जगत देवता  वेद शास्त्र आदि सब काल अर्थात समय के अधीन है।

सूर्य चंद्र अग्नि वायु आदि सभी उसके आज्ञा में चलते हैं। वर्तमान भूत और भविष्य सभी काल के अंतर्गत रहकर सूर्य उदयास्त भी इसी के आदेश अनुसार होता है अतः समय निर्धारण की प्रक्रिया जिसे मुहूर्त कहा गया है। तिथि वार नक्षत्र योग करण सूर्य बृहस्पति आदि ग्रहों की रश्मिया  भ्रमण व्यवस्थाएं उनकी सुरक्षा पद्धतियां अर्थात बारीकियों का ज्ञान ज्योतिष के द्वारा प्राप्त होता है और ज्योतिषी उसकी विस्तृत व्याख्या करता है क्योंकि प्रकृति द्वारा संचालित व्यवस्थाएं तो अपना काम कर रही है लेकिन सृष्टि चक्र के अनुसार चलने की जिम्मेदारी मनुष्य की है।
मुहूर्त में अयन संक्रांति और मास में एक प्रकार का ऋतु चक्र है इसकी प्राथमिकता उपयोगिता का उदाहरण हमें महाभारत काल के भीष्म पितामह से मिलता है जिन्होंने शर शय्या पर लेटे हुए उत्तरायण के सूर्य के समय अपनी मृत्यु की इच्छा प्रकट की थी। उत्तरायण मकर संक्रांति से आरंभ होता है इस दिन से सूर्य प्रतिदिन तिल-तिल बढ़ते हुए  जीवन गति की ओर अग्रसर होता है क्योंकि विज्ञान की भाषा में उत्तरायण सूर्य ऑक्सीजन (देवयान) तथा दक्षिणायन का सूर्य हाइड्रोजन गैस (पितृ यान) का देने वाला बताया गया है।

अतः सूर्य के उत्तरायण प्रवेश को एक पर्व या उत्सव के रूप में मनाया जाता है खगोल स्थित घटनाक्रमों पर निर्धारित कुछ निषेध मुहूर्त का यहां वर्णन कर रहा हूं -
ग्रहण सूर्य और चंद्रमा के कारण होकर इसका प्रकृति पर विशेष घटनाओं के रूप में असर होता है । 

चंद्रलोप सूर्य और चंद्रमा की युति अमावस्या अर्थात आत्मा और मन का नियोजन।
 अधिक मास प्रति 3 वर्ष में सौरपक्षीय गणना पर हिंदी मास का बढ़ना मलमास कहलाता है।
 सिंहस्थ अर्थात सिंह राशि का बृहस्पति सूर्य की राशि में बृहस्पति अग्नि तत्व की वृद्धि।
धनार्क मीनर्क अर्थात बृहस्पति की राशि में सूर्य का प्रवेश अग्नि तत्व की वृद्धि ।

गुरु शुक्र का अस्त सूर्य के अंश से 11 अंश पहले वह 11 अंश बाद तक बृहस्पति की उपस्थिति तथा सूर्य के अंश  से 9 अंश पहले व 9 अंश बाद तक शुक्र की उपस्थिति यह इनका अस्त काल रहता है जिसमें इनकी शुभ रश्मियां पृथ्वी पर नहीं पहुंच पाती इसलिए गुरु शुक्र अस्त को भी वर्जित बताया गया है।

 नीच राशिस्थ चंद्रमा अर्थात वृश्चिक राशि का चंद्रमा या बिछुड़ा यह भी क्षेत्र विशेष में वर्जित है।
पौष मास चैत्र मास हेमंत ऋतु क्रमशः धनु और मीन के सूर्य का भ्रमण इसके साथ व्यतिपात वैधृति भद्रादि योग तिथि एवं नक्षत्र की योगों से  उत्पन्न होने वाली मन को विचलित एवं अस्थिर करने वाली रश्मियों में शुभ कार्यों का निषेध  किया गया है क्योंकि यह ग्रह नक्षत्र निहारिकाओं की उत्साह प्रदान करने वाली किरणों को मानव तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करती है जिसके कारण मन में विचलित ता अधीरता रहती है और जब यह स्थिति रहती है तब मानव मन शुभ कार्य में पूरी तरह नहीं रह पाता इसलिए मुहूर्त संहिता में मंगल कार्य संस्कार व यज्ञादि करने को निश्चित समय मे  निषिद्ध ठहराया गया है।

शृष्टि प्रारंभ

विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि पुरूषाख्यान्यथो विदुः।
एकं तु महतः स्त्रष्टृ द्वितीयं त्वण्डसंस्थितम् ।
तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्यते ।।

“सृष्टि के लिए भगवान् कृष्ण का स्वांश तीन विष्णुओं का रूप धारण करता है। पहले महा विष्णु हैं, जो सम्पूर्ण भौतिक शक्ति महत्तत्व को उत्पन्न करते हैं। द्वितीय गर्भोदकशायी विष्णु हैं, जो समस्त ब्रह्माण्डों में प्रविष्ट होकर उनमें विविधता उत्पन्न करते हैं। तृतीय क्षीरोदकशायी विष्णु हैं जो समस्त ब्रह्माण्डों में सर्वव्यापी परमात्मा के रूप में फैले हुए हैं और परमात्मा कहलाते हैं वे प्रत्येक परमाणु तक के भीतर उपस्थित हैं जो भी इन तीनों विष्णु रूपों को जानता है, वह भवबन्धन से मुक्त हो सकता है।

💐💐जय श्री कृष्ण💐💐

🌷*चारो युगो के महामंत्र*🌷

🌹1) सत्ययुग का--
नारायण परावेदा: नारायण पराक्षरा:।।
नारायण परामुक्ती:नारायण परागति:।।

🌹2)त्रेतायुग का--
रामनारायणान॔त मुकुंद मधुसूदन।
कृष्ण केशव कंसारे हरे वैकुण्ठ वामन:।।

🌹3)द्वापरयुग का--
हरे मुरारे मधुकैटभारे गोपाल गोविंद मुकुंद शोरे।
यज्ञेश नारायण कृष्ण विशणो निराश्रयं मां जगदीश रक्ष:।।

🌹4)कलियुग का--
*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे*।
*हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे*।।

प्रलय तत्व पहले चार प्रकार के होते हैं १)नैमित्तिक, २)प्राकृतिक, ३)आत्यंतिक और ४)नित्य 
प्रथम प्रलय ब्रह्मा जी का एक दिन समाप्त हो जाने पर रात्रि के प्रारंभिक काल में होता है जिसे नैमित्तिक पहले कहते हैं ।

दूसरा प्राकृतिक प्रलय तब होता है जब ब्रह्मांड महा प्रकृति में विलीन हो जाता है।

 तीसरा आत्यंतिक प्रलय योगीजन ज्ञान के द्वारा ब्रह्म में लीन हो जाने को कहते हैं । 

उत्पन्न पदार्थो का जो अहर्निश क्षय होता रहता है, उसे नित्य प्रलय के नाम से व्यवहृत  करते हैं इन चतुर्विध प्रलयों में से नैमित्तिक एवं प्राकृतिक महाप्रलय ब्रह्मांडों से संबंधित होते हैं तथा शेष से जो दो प्रलय देह धारियों से संबंधित हैं।

नैमित्तिक प्रलय के सन्दर्भ में विष्णु पुराण का मत यह है कि -
ब्रह्मा की जागृत अवस्था में उनकी प्राण शक्ति के प्रेरणा से ब्रह्मांड चक्र प्रचलित रहता है किंतु उनकी निद्रा अवस्था में समस्त ब्रह्मांड निश्चेष्ट हो जाता है और उसकी स्थिति जल भुन कर नष्ट हो जाती है नैमित्तिक प्रलय को ब्राह्म प्रलय भी कहते हैं उसमें ब्रह्मा जी विष्णु जी के साथ योग निद्रा में प्रसुप्त हो जाते हैं।

इस समय प्रलय में भी रहने की शक्ति रखने वाले कुछ योगी गण जनलोक में अपने को जीवित रखते हुए ध्यान परायण रहते हैं ऐसे योगियों द्वारा चिंत्य मान कमल योनि ब्रम्हा ब्रह्म रात्रि को व्यतीत कर ब्राह्म दिवस के उदय में प्रबुद्ध हो जाते हैं और पुनः समस्त ब्रह्मांड की रचना करते हैं। इस प्रकार ब्रह्मा जी के सौ वर्ष  पूर्ण होने के अनन्तर ब्रह्मा भी पर ब्रह्म में लीन हो जाते हैं, उस समय प्राकृतिक महाप्रलय का उदय होता है। 

  इसी क्रम में ब्रह्मांड प्रकृति अनादि काल से महाकाल के महान चक्र परिभ्रमण में रहती आती है। इन प्रलयों का विस्तृत वर्णन विष्णु पुराणस्थ प्रलय वर्णन में दृष्टव्य है।  

अव्याकृत प्रकृति तथा उसके प्रेरक ईश्वर की विलिनता के प्रश्न को विष्णु पुराण सरल तरीके से स्पष्ट कर देता है :-
"प्रकृतिर्या मयाख्याता व्यक्ताव्यक्त रूपिणी।
पुरुषश्चाप्युभावेतौ लीयते परमात्मनि।।"
व्यक्त और अव्यक्त, प्रकृति और ईश्वर ये दोनों ही निर्गुण एवं निष्क्रिय ब्रह्मतत्व में विलीन हो जाते हैं।

यही आधिदैवी सृष्टिरूप महाप्रलय है।
जितने समय तक ब्रह्मांड प्रकृति में सृष्टि स्थिति लीला का विस्तार प्रवर्तमान रहता है, ठीक उतने ही समय तक महाप्रलय गर्भ में भी ब्रह्मांड सृष्टि पूर्ण  रूप से विलीन रहती है। 

इस समय जीवों की अनन्त कर्म राशियां उस महाकाश के आश्रित रहती हैं। 

सृष्टि के उद्भव व विकास के बारे में जितना अभी तक वैज्ञानिकों ने बताया है उसके अनुसार नभमंडल में बहुत बहुत  पहले एक भयानक वह विराट विस्फोट हुआ और उससे जो शक्ति प्रकट हुई वह निहारिकाओं, आकाशगंगाओं, तारों व ग्रहों के रूप में निरंतर अनंत विस्तार की ओर अग्रसर है उसका वेग व बल आज भी सृष्टि को आगे धकेल रहा है अन्य लोगों का मत है कि सृष्टि का विस्तार वेग अब समाप्त प्राय: हैं और संकुचन आरंभ हो चुका है।

श्याम शून्य या ब्लैक होल के रूप में सृष्टि का विलय शुरू हो रहा है पदार्थ यहां तक कि प्रकाश भी घनत्व बढ़ाता हुआ इतनी तीव्र गति से सिमट रहा है कि पृथ्वी उसमें एक रज कण जैसी लघु होकर जाने कहां विलीन हो जाएगी।  उसका भार व चाप अतुलनीय है। कुछ विद्वानों का मत है कि संकोच और विकास साथ साथ चल रहा है यह दोनों प्रवाह परस्पर एक दूसरे के जनक व भक्षक क्रम क्रम से बनते चले जा रहे हैं।

पदार्थ में से जीवन की उत्पत्ति और विकास कैसे हुआ इसकी कथा भी वैज्ञानिक गति व स्थिति आरोह अवरोह संकोच विकास के सिद्धांत का आधार लेकर लिखते हैं आदि पदार्थों के उबलते हुए कड़ाह में से कैसे वह रसायन बना जो जीवन वनस्पतियों का जाता है और फिर वनस्पतियों के संयोग व संघर्ष के फल स्वरुप कैसे एक कोशीय व बहु कोशीय प्राणी पैदा हुए।

जीवन के विकास के साथ चेतना के जागरण या स्फुरण का प्रश्न भी अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है हर पदार्थ में चेतना है या नहीं ?

प्रच्छन्न या सुषुप्त व जागृत चेतना में क्या क्या अंतर है व चेतना के क्रमिक विकास में कौन कारक है इस विषय मे भी अनेक मत हैं । विज्ञान अपने सारे उपकरणों व सिद्धान्तों के बल पर भी अभी तक एक भी कृत्रिम  चेतना नही बना पाया है। क्या ऐसा कभी हो पाएगा? 

इस बारे में मतैक्यता नही है।  यूं तो हमारे हमारे वेद व उपनिषदों में यह सिद्धांत प्रति पादित है कि चेतना ही समस्त सृष्टि की मूल धातु है। 


ग्रेगेरियन कलेण्डर
ग्रेगेरियन कलेण्डर की काल गणना मात्र दो हजार वर्षों के अति अल्प समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की काल गणना 3588 वर्ष, रोम की 2765 वर्ष यहूदी 5776 वर्ष, मिस्त्र की 28679 वर्ष, पारसी 198883 वर्ष तथा चीन की 96002313 वर्ष पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु 1 अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 120 वर्ष है। जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में एक-एक पल की गणना की गयी है।

जिस प्रकार ईस्वी सम्वत् का सम्बन्ध ईसा जगत से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मुहम्मद साहब से है।

किन्तु विक्रमी सम्वत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रह्माण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्माण्ड के सबसे पुरातन ग्रंथ वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानि संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27वें व 30वें अध्या...य के मंत्र क्रमांक क्रमशः 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है। विश्व में सौर मण्डल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं।

इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्चात्य देशों के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, जन्म की बात हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारम्भ करने की बात हो, सभी में हम एक कुशल पंडित के पास जाकर शुभ लग्न व मुहूर्त पूछते हैं। और तो और, देश के बडे से बडे़ राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इंतजार करते हैं जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पंचांग पर आधारित होता है। भारतीय मान्यतानुसार कोई भी काम यदि शुभ मुहूर्त में प्रारम्भ किया जाये तो उसकी सफलता में चार चांद लग जाते हैं। वैसे भी भारतीय संस्कृति श्रेष्ठता की उपासक है। जो प्रसंग समाज में हर्ष व उल्लास जगाते हुए एक सही दिशा प्रदान करते हैं उन सभी को हम उत्सव के रूप में मनाते हैं।

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