रासो काव्य परंपरा

कुछ विद्वानों ने 'रासो' शब्द का संबंध 'रहस्य' और 'रामायण' से जोड़ा है जो हास्यास्पद प्रतीत होता है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'रासो' शब्द का संबंध 'रसायन' से माना है जिसका अर्थ काव्य के रूप में लिया गया है | श्री चंद्रबली पांडेय ने 'रासो' शब्द की व्युत्पत्ति 'रासक' से मानी है जिसका अर्थ रूपक के एक भेद से है | अनेक विद्वान हैं जो 'रासो' कि व्युत्पत्ति 'रासक' से मानते हैं। डॉ. भागीरथ मिश्र इस विषय में लिखते हैं "पहले गेय काव्य को रासक कहते थे । पीछे इसका प्रयोग चरित्र-काव्य और कथा-काव्य के लिए होने लगा ।" 

"रासत एक छंद भी है और काव्य भेद भी आदिकाल में रचित वीरगाथाओं में चारण कवियों ने रासत शब्द का प्रयोग चरित काव्यों के लिए किया है।"
       आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आदिकाल में रचित साहित्य में रासों काव्य ग्रंथों का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां यह उल्लेखनीय है कि आदिकाल में जैन कवियों ने जिस रासों काव्य की रचना की है वह वीर रस प्रधान रासो काव्य से भिन्न है अतः हम यहां उन्हीं रासो रास ग्रंथों का उल्लेख करेंगे जो वीर रस प्रधान है। और जिनकी रचना चरण कवियों ने की है। रास काव्य उन रचनाओं को कहा जाता है जिनमें रासत छंद की प्रधानता रहती थी आगे चलकर रास काव्य ऐसी रचनाओं को कहने लगे जिनमें किसी भी गेय छंद का प्रयोग किया गया हो।

रासो शब्द की व्युत्पत्ति : 

रासो काव्य हिन्दी के आदिकाल में रचित ग्रन्थ हैं। इसमें अधिकतर वीर-गाथाएं हीं हैं। पृथ्वीराजरासो प्रसिद्ध हिन्दी रासो काव्य है। रास साहित्य जैन परम्परा से संबंधित है तो रासो का संबंध अधिकांशत: वीर काव्य से, जो डिंगल भाषा में लिखा गया ।

रासो शब्द की उत्पत्ति रासो काव्य के अंतर्गत आने वाले दोहे से देखी जाती है:

रासउ असंभू नवरस सरस छंदू चंदू किअ अमिअ सम
शृंगार वीर करुणा बिभछ भय अद्भूत्तह संत सम।

रास और रासो शब्द की व्युत्पति संबंधी विद्वानों में मतभेद है ।

रासो शब्द के व्युत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में मतभेद हैं। डॉक्टर नरोत्तम स्वामी ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति राजस्थानी भाषा के 'रसिक'शब्द से मानी है जिसका अर्थ है-'कथाकाव्य'।
उनके अनुसार रसिका से रासो का विकास निम्नलिखित क्रम में हुआ
रसिक => रासउ => रासो
      आचार्य शुक्ल ने रासो शब्द का संबंध रसायन से जोड़ दिया है उन्होंने वीसलदेव रासो एक पंक्ति को अपने मत का समर्थन किया है जिसमें रसायन शब्द का उल्लेख हुआ है।


पौराणिक रासो काव्य परंपरा-

इसके अंतर्गत जैन राम काव्य, कृष्ण राम काव्य को देखा जा सकता है

राम गुण रासो – माधवदास

पञ्च पंडव चरित रास –शालिभद्र सूरि

हरिवंश पुराण रास – ब्रहमदास

रुक्मणी हरण रास – पद्म कृत

यहाँ राम, कृष्ण, महाभारत आदि पौराणिक कथाओं को आधार बनाकर रचना की गई है. 

धार्मिक रासो काव्य परंपरा :

यहाँ धार्मिक परंपरा में उपदेशात्मकता की प्रवृत्ति का प्राधान्य है।

बुद्धि रास – शालिभद्र सूरि

जीव दया रास – आसिगु कवि

श्रावक विधि – धनपाल

उपर्युक्त काव्यों में भिक्षुओं में आदि को उपदेश दिया गया है.


रोमांचक रासो काव्य परंपरा

इन कथाओं का उद्देश्य मूलतः मनोरंजन होता है तथा यहाँ कल्पना का प्राधान्य होता है, नायज के अनेक विवाहों का वर्णन होता है, काव्यों में लोक कथा के तत्व मौजूद होते है, मन्त्र-शाप आदि बातों की अधिकता होती है।

सन्देश रासक – अद्दहमाण

चंदनबाला रास – आसुग

बीसलदेव रासो – नरपति नाल्ह

सुरसुंदरी रास – नयसुन्दर


ऐतिहासिक रासो काव्य परंपरा :

भारतीय साहित्य में पुराण एवं इतिहास दोनों का महत्त्व है। यहाँ विभिन्न ऐतिहासिक पात्रों पर काव्यों की रचना की गई है जिसमें वीरता एवं श्रृंगार दोनों का मिश्रण है।

1. पृथ्वीराज रासो – चंदवरदायी

2. रासा भगवंत सिंह – सदानंद

3. हम्मीर रासो –जोघराज

4. हम्मीर रासो –महेश कवि

5. प्रताप रासो – षुसाल कवि

इस प्रकार रासो काव्य परंपरा विविध विषयों को आधार बनाकर लिखे गए हैं। यहाँ वीरता, श्रृंगार उपदेश, ऐतिहासिकता आदि सभी को स्थान दिया गया है लेकिन मूल रूप से रासो' को वीरता प्रधान काव्य के आलोक में ही देखा गया है तथा श्रृंगार उसका गौण पक्ष है। वीरता परक परंपरा में पृथ्वीराज रासो, खुमाण रासो, विजयपाल रासो, परमाल रासो का मुख्य स्थान है यद्यपि इनकी प्रमाणिकता असंदिग्ध नहीं है तथा विभिन्न विद्वानों के मत इस पर अलग-अलग है।


रासो काव्य परंपरा डॉक्टर गणपति चंद्रगुप्त ने हिंदी रासो काव्य परंपरा को दो वर्गों में विभक्त किया है।
क) धार्मिक रासो काव्य परंपरा
ख) ऐतिहासिक रासो काव्य परंपरा

क) धार्मिक रासो काव्य परंपरा

धार्मिक रासो काव्य परंपरा के अंतर्गत उन ग्रंथों को दिया जा सकता है जो जैन कवियों के द्वारा लिखे गए हैं और जिनमें जैन धर्म से संबंधित व्यक्तियों को चरित नायक बनाया गया है इनमें कुछ निम्नलिखित है-
१. भूतेश्वर बाहुबली रास:-
मुनि जिन विजय ने इस ग्रंथ को जैन साहित्य की रासो परंपरा का प्रथम ग्रंथ माना है। इसकी रचना 1184 ईस्वी में शालिभद्र सूरी ने की थी। अपने समय के प्रसिद्ध आचार्य और कवि थे। इस ग्रंथ में भूतेश्वर और बाहुबली का चरित वर्णन है

२. चंदनबाला रास:
1209ई. में रचित इस काव्य को जिन धर्म सूरि की रचना या कृति माना जाता है। इसमें कोसा वेश्या के पास भोगलिफ्ट रहने वाले स्थूलीभद्र को कवि नहीं जैन धर्म की दीक्षा देने के बाद मोक्ष का अधिकारी सिद्ध किया है। इसकी भावों में और अभिव्यंजना काव्य अनुकूल है।

३. रेवंतिगिरिरास : 

यह विजयसेन सूरि की काव्य कृति हैं। 1231 ई. के लगभग लिखित इस काव्य में तीर्थ कार नेमिनाथ की प्रतिभा तथा रेवंतिगिरि तीर्थ का वर्णन है। प्रकृति के रमणीक चित्र इस काव्य के भाव तथा कला पक्षों का श्रृंगार करते हैं।

४. नेमिनाथ रास:-
इस काव्य की रचना सुमति गणी ने 1213 ई. में की थी। 58 छंदों की इस रचना में कवि ने नेमिनाथ का चरित्र सरस शैली में प्रस्तुत किया है। नेमिनाथ के प्रसंग में श्री कृष्ण का वर्णन इस काव्य का विषय है और इन दोनों के माध्यम से विभिन्न भावों की व्यंजना हुई है।

ख) ऐतिहासिक रासो काव्य परंपरा

ऐतिहासिक रासो काव्य परंपरा के कवि प्राय: राज्याश्रित थे। जिनका उद्देश्य अपने आश्रय दाता के सौंदर्य एवं ऐश्वर्य की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा करना था। इस काव्य परंपरा के प्रमुख ग्रंथों का परिचय इस प्रकार है।

१. विसल देव रासों :-

इस ग्रंथ की रचना नरपतिनल्ह कवि ने 1155 ई. में की थी। विसलदेव रासो हिंदी के आदिकाल की एक श्रेष्ठ काव्य कृति है इसमें भोज परमार की पुत्री राजमती और अजमेर के चौहान राजा विशाल देव तृतीय के विवाह वियोग एवं पुनर्मिलन की कथा सरस शैली में प्रस्तुत की गई है। विसल देव रासो 125 छंदों की एक प्रेम परक रचना है जिसमें संदेश रासक की भांति विराह की प्रधानता है।

२. पृथ्वीराज रासो:
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पृथ्वीराज रासो को हिंदी का प्रथम महाकाव्य माना है जिसकी रचना पृथ्वीराज चौहान के अभिन्न मिस्र एवं दरबारी कवि चंदबरदाई द्वारा की गई है। भाव वस्तु और ध्वनि की सम्मिलित प्रभाव अनविति के उदाहरण पृथ्वीराज रासो में भरे पड़े हैं। पृथ्वीराज रासों में वस्तु वर्णन का भी आधिक्या है। कवि ने बड़ी तन्मयता के साथ नगरों वर्णो सखरो किलो आदि का वर्णन किया है। रासो काव्य परंपरा का सर्वोत्तम ग्रंथ माना जाता है।

३. परमाल रासो :
परमाल रासो का रचयिता कवि जगनिक था जिसे चंदेल वंशी राजा परमार्दिदेव का दरबारी कवि माना जाता है। आल्हा और ऊदल नामक दो क्षेत्रीय सामंतों की वीरता का वर्णन परमाल रासो के अंतर्गत प्रमुख रूप से किया गया है। युद्धों के अत्यंत प्रभावशाली वर्णनों की काव्य में भरमार है इसमें वीर भावना का चेतना प्रौढ़ रूप मिलता है उतना अयंत्र दुर्लभ है।

४. खुमान रासो :-

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे नवीं शताब्दी की रचना माना है। इसमें नवी सदी के चित्तौड़ नरेश खुमान के युद्धों का वर्णन है। राजाओं के वर्णनों पर आधारित होने पर भी इसमें काव्यात्मक सरस वर्णनों का प्राचुर्य है। वीरस के साथ-साथ श्रृंगार की धारा भी आदि से अंत तक प्रवाहित होती चली।

५. हमीर रासो:- 

प्राकृत पैंगलम में इस काव्य के कुछ छंद मिले थे और उन्हीं के आधार पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसके अस्तित्व की कल्पना की थी। उनका अनुमान था कि हमें हमीर और अलाउद्दीन की युद्धों का वर्णन तथा हमीर की प्रशंसा चित्रित हुई है। राहुल सनकृत्यायन ने इस के पदों को जंजाल नामक कवि की रचना घोषित किया है। हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार हमीर शब्द अमीर का विकृत रूप है। अभी तक इसकी कोई प्रति उपलब्ध नहीं हो सकी है।

६. जयचंद प्रकाश :-
जिस प्रकार चंदबरदाई ने महाराज पृथ्वीराज को कीर्तिमान किया है उसी प्रकार भट्ट केदार ने कन्नौज के सम्राट जयचंद का गुण गाया है। रासो में चंद और भट्ट केदार के संवाद का एक स्थान पर उल्लेख भी है। भट्ट केदार ने जयचंद प्रकाश नाम का एक महाकाव्य लिखा था। जिसमें महाराज जयचंद के प्रताप और पराक्रम का विस्तृत वर्णन था इसी प्रकार जय मयंक जस चंद्रिका नाम का एक बड़ा ग्रंथ मधुकर कवि ने लिखा था राजा जयचंद का प्रभाव बुंदेल खा के राजाओं पर था।

७.रणमल्ल छंद:-
श्रीधर नामक कवि ने 1397 ईस्वी में रणमल्ल छंद नामक एक काव्य रचा। जिसमें राठौर राजा र रणमल्ल कि उस विजय का वर्णन है जो उसने है पाटन के सूबेदार जफर खां पर प्राप्त की थी।

इस प्रकार उपयुक्त विवेचन के आधार पर यह नि: संदेह कहा जा सकता है कि आदिकाल में रासो काव्य परंपरा की समृद्ध परंपरा रही है। धार्मिक रासो काव्य परंपरा का उल्लेख धर्म तत्वों का निरूपण करना है तो ऐतिहासिक रासो काव्य परंपरा ग्रंथों यथा पृथ्वीराज रासो, परमान रासो आदि में सामंती जीवन की पूरी झलक मिलती है। वीर एवं श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति इन रासो ग्रंथों में प्रधान रूप से हुई है। वीर रस की सहज अभिव्यक्ति एवं मध्यकालीन सामंती जीवन के यथार्थ चित्रण की दृष्टि से रासो काव्य परंपरा के ग्रंथ महत्वपूर्ण कहे जा सकते हैं। 


इस संदर्भ में निम्नलिखित कथन उल्लेखनीय हैं-
"काव्य के तत्व इस परंपरा की रचनाओं में प्राय: प्रचुरता के साथ मिलते हैं। अतः साहित्य की दृष्टि से यह परंपरा निसंदेह अपेक्षाकृत अधिक महत्व की है"

संक्षेप में कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं।

  • इन रचनाओं में कवियों द्वारा अपने आश्रयदाताओं के शौर्य एवं ऐश्वर्य का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है।
  • यह साहित्य मुख्यतः राव चारण कवियों द्वारा रचा गया।
  • इन रचनाओं में ऐतिहासिकता के साथ-साथ कवियों द्वारा अपनी कल्पना का समावेश भी किया गया है। अधिकांश रचनाएं संदिग्ध एवं अर्धप्रामाणिक मानी जाती हैं।
  • इनमें विविध प्रकार की भाषाओं एवं अनेक प्रकार के छंदों का प्रयोग किया गया है।

हिन्दी साहित्य में रासो काव्य परम्पराऐ

रासो

आदिकाल के हिन्दी-साहित्य में वीर गाथायें प्रमुख हैं। वीर गाथाओं के रुप में ही "रासो' ग्रन्थों की रचनायें हुई हैं।

हिन्दी साहित्य में "रास' या "रासक' का अर्थ लास्य से लिया गया है जो नृत्य का एक भेद है। अतः इसी अर्थ भेद के आधार पर गीत नृत्य परक रचनायें "रास' नाम से जानी जाती हैं "रासो' या "रासउ' में विभिन्न प्रकार के अडिल्ल, ढूसा, छप्पर, कुण्डलियां, पद्धटिका आदि छन्द प्रयुक्त होते हैं। इस कारण ऐसी रचनायें "रासो' के नाम से जानी जाती हैं।

"रासो' शब्द विद्वानों के लिए विवाद का विषय रहा है। इस पर किसी भी विद्वान का निश्चयात्मक एवं उपयुक्त मत प्रतीत नहीं होता। विभिन्न विद्वानों ने अनेक प्रकार से इस शब्द की व्याख्या करने का प्रयास किया है। कुछ विद्वानों ने अनेक प्रकार से इस शब्द की व्याख्या करने का प्रयास किया है। कुछ विद्वानों ने "रासो' की व्युत्पत्ति "रहस्य' शब्द के "रसह' या "रहस्य' का प्राकृत रुप मालूम से मानी जाती है। श्री रामनारायण दूगड लिखते हैं- "रासो' या रासो शब्द "रहस' या "रहस्य' का प्राकृत रुप मालूम पड़ता है। इसका अर्थ गुप्त बात या भेद है। जैसे कि शिव रहस्य, देवी रहस्य आदि ग्रन्थों के नाम हैं, वैसे शुद्ध नाम पृथ्वीराज रहस्य है जोकि प्राकृत में पृथ्वीराज रास, रासा या रासो हो गया।

डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल और कविराज श्यामदास के अनुसार "रहस्य' पद का प्राकृत रुप रहस्सो बनता है, जिसका कालान्तर में उच्चारण भेद से बिगड़ता हुआ रुपान्तर रासो बन गया है। रहस्य रहस्सो रअस्सो रासो इसका विकास क्रम है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल "रासो' की व्युत्पत्ति "रसायण' से मानते हैं। डॉ उदयनारायण तिवारी "रासक शब्द से रासो' का उदभव मानते हैं।

वीसलदेव रासो में "रास' और "रासायण' शब्द का प्रयोग काव्य के लिए हुआ है। ""नाल्ह रसायण आरंभई'', एवं ""रास रसायण सुणै सब कोई'' आदि।

रस को उत्पन्न करने वाला काव्य रसायन है। वीसलदेव रासो में प्रयुक्त "रसायन' एवं "रसिय' शब्दों से "रासो' शब्द बना।

प्रो. ललिता प्रसाद सुकुल रसायण को रस की निष्पत्ति का आधार मानते हैं।

मुंशी देवी प्रसार के अनुसार-""रासो के मायने कथा के हैं, वह रुढि शब्द है। एक वचन "रासा' और बहुवचन "रासा' हैं। मेवाड, ढूढाड और मारवाड में झगड़ने को भी रासा कहते हैं। जैसे यदि कई आदमी झगड़ रहे हों, या वाद विवाद कर रहे हों, तो तीसरा आकर पूछेगा "कांई रासो है' है। लम्बी चौडी वार्ता को भी रासो और रसायण कहते हैं। बकवाद को भी रासा और रामायण ढूंढाण में बोलते हैं। कांई रामायण है? क्या बकवाद है? यह एक मुहावरा है। ऐसे ही रासो भी इस विषय में बोला जाता है, कांई रासो है?''

महामहोपाध्याय डॉ. हरप्रसाद शास्री-""राजस्थान के भाट चारण आदि रासा (क्रीडा या झगड़ा) शब्द से रासो का विकास बतलाते हैं।''

गार्सा-द तासी ने रासो शब्द राजसूय से निकला बतलाया है।

डॉ. ग्रियर्सन "रासो' का रुप रासा अथवा रासो मानते हैं तथा उसकी निष्पत्ति "राजादेश' से हुई बतलाते हैं। इनके अनुसार-""इस रासो शब्द की निष्पत्ति "राजादेश' से हुई है, क्योंकि आदेश का रुपान्तर आयसु है।''

महामहोपाध्याय डॉ गौरीशंकर हीराचन्द ओझा हिन्दी के "रासा' शब्द को संस्कृत के "रास' शब्द से अनुस्यूत कहते हैं। उनके मतानुसार-"" मैं रासा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के रास शब्द से मानता हँ। रास शब्द का अर्थ विलास भी होता है (शब्द कल्पदुम चतुर्थ काण्ड) और विलास शब्द चरित, इतिहास आदि के अर्थ में प्रचलित है।''

डॉ. ओझा जी ने अपने उपर्युक्त मत में रासा का अर्थ विलास बतलाया है जबकि श्री डी. आर. मंकड "रास' शब्द की उत्पत्ति तो संस्कृत की "रास' धातु से बतलाते हैं, पर इसका अर्थ उन्होंने जोर से चिल्लाना लिया है, विलास के अर्थ में नहीं।

डॉ. दशरथ शर्मा एवं डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है कि "रास' परम्परा की गीत नृत्य परक रचनायें ही आगे चलकर वीर रस के पद्यात्मक इति वृत्तों में परिणत हो गई। ""रासो प्रधानतः गानयुक्त नृत्य विशेष से क्रमशः विकसित होते-होते उपरुपक और किंफर उपरुपक से वीर रस के पद्यात्मक प्रबन्धों में परिणत हो गया।''

""इस गेय नाट्यों का गीत भाग कालान्तर में क्रमशः स्वतन्त्र श्रव्य अथवा पाठ्य काव्य हो गया और इनके चरित नायकों के अनुसार इसमें युद्ध वर्णन का समावेश हुआ।''

पं. विन्ध्येश्वरी प्रसाद द्विवेदी रासो शब्द को "राजयश' शब्द से विनिश्रत हुआ मानते हैं।
साहित्याचार्य मथुरा प्रसाद दीक्षित रासो पद का जन्म राज से बतलाते हैं।
इन अभिमतों के विश्लेषण का निष्कर्ष रासो शब्द "रास' का विकास है।

बुन्देलखण्ड में कुछ ऐसी उक्तियाँ भी पाई जाती है, जिनसे रासो शब्द के स्वरुप पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ता है, जैसे ""होन लगे सास बहू के राछरे''। यह "राछरा' शब्द रासो से ही सम्बन्धित है। सास बहू के बीच होने वाले वाक्युद्ध को प्रकट करने वाला यह "राछरा' शब्द बड़ी स्वाभाविकता से रायसा या रासो के शाब्दिक महत्व को प्रगट करता है। वीर काव्य परम्परा में यह रासो शब्द युद्ध सम्बन्धी कविता के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। इसका ही बुन्देलखण्डी संस्करण "राछरौ' है।

उपर्युक्त सभी मतों के निष्कर्षस्वरुप यह एक ऐसा काव्य है जिसमें राजाओं का यश वर्णन किया जाता है और यश वर्णन में युद्ध वर्णन स्वतः समाहित होता है।

परम्परा

रासो काव्य परम्परा हिन्दी साहित्य की एक विशिष्ट काव्यधारा रही है, जो वीरगाथा काल में उत्पन्न होकर मध्य युग तक चली आई। कहना यों चाहिए कि आदि काल में जन्म लेने वाली इस विधा को मध्यकाल में विशेष पोषण मिला। पृथ्वीराज रासो' से प्रारम्भ होने वाली यह काव्य विधा देशी राज्यों में भी मिलती है। तत्कालीन कविगण अपने आश्रयदाताओं को युद्ध की प्रेरणा देने के लिए उनके बल पौरुष आदि का अतिरंजित वर्णन इन रासो काव्यों में करते रहे हैं।

रासो काव्य परम्परा में सर्वप्रथम ग्रन्थ "पृथ्वीराज रासो' माना जाता है। संस्कृत, जैन और बौद्ध साहित्य में "रास', "रासक' नाम की अनेक रचनायें लिखी गईं। गुर्जर एवं राजस्थानी साहित्य में तो इसकी एक लम्बी परम्परा पाई जाती है।

यह निर्विवाद सत्य है कि संस्कृत काव्य ग्रन्थों का हिन्दी साहित्य पर बहुत प्रभाव पड़ा। संस्कृत काव्य ग्रन्थों में वीर रस पूर्ण वर्णनों की कमी नहीं है। ॠगवेद में तथा शतपथ ब्राह्मण में युद्ध एवं वीरता सम्बन्धी सूक्त हैं। महाभारत तो वीर काव्य ही है। यहीं से सूत, मागध आदि द्वारा राजाओं की प्रशंसा का सूत्रपात हुआ जो आगे चलकर भाट, चारण, ढुलियों आदि द्वारा अतिरंजित रुप को प्राप्त कर सका। वीर काव्य की दृष्टि से "रामायण' में भी युद्ध के अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन हैं। "किरातार्जुनीय, में वीरोक्तियों द्वारावीर रस की सृष्टि बड़ी स्वाभाविक है। "उत्तर रामचरित' में जहाँ "एको रसः करुण एव' का प्रतिपदान है वहीं चन्द्रकेतु और लव के वीर रस से भरे वाद विवाद भी हैं। भ नारायण कृत "वेणी संहार' में वीर रस का अत्यन्त सुन्दर परिपाक हुआ है। इससे स्पष्ट है कि हिन्दी की वीर काव्य प्रवृति संस्कृत से ही विनिश्रित हुई है। डॉ. उदय नारायण तिवादी ने "वीर काव्य' में हिन्दी की वीर काव्यधारा का उद्गम संस्कृत की वरी रस रचनाओं से माना है।

रासो परम्परा दो रुपों में मिलती है-प्रबन्ध काव्य और वीरगीत। प्रबन्ध काव्य में "पृथ्वी राज रासो' तथा वीर गीत के रुप में "वीसलदेव रासो' जैसी रचनायें हैं। जगनिक का रासो अपने मूल रुप में तो अप्राप्त है किन्तु, आल्ह खण्ड' नाम की वीर रस रचना उसी का परिवर्तित रुप है। आल्हा, ऊदल एवं पृथ्वीराज की लड़ाइयों से सम्बन्धित वीर गीतों की यह रचना हिन्दी भाषा क्षेत्र के जनमानस में गूंज रही है।

आदि काल की प्रमुख रचनायें पृथ्वीराज रासो, खुमान ख्रासो एवं वीसलदेव रासो हैं। हिन्दी साहित्य के प्रारम्भ काल की ये रचनायें वीर रस एवं श्रृंगार रस का मिला-जुला रुप प्रस्तुत करती हैं।

जैन साहित्य में "रास' एवं "रासक' नम से अभिहित अनेक रचनायें हैं जिनमें सन्देश रासक, भरतेश्वर बाहुबलि रास, कच्छूलिरास आदि प्रतिनिधि हैं।
आदि काल की बहुत सी रचनायें तो अनुपलब्ध ही हैं। संकेत सूत्रों के आधर पर सूचना मात्र मिलती है अथवा काल क्रमानुसार कुछ रचनाओं का रुप ऐसा परिवर्तित हो गया है कि उनके मूल रुप का अनुमान भी लगाना कठिन हो गया है। "पृथ्वीराज रासो' जैसी वहदाकार रचनाओं की ऐतिहासिकता संदिग्ध है। उसकी तिथियों, घटनाओं आदि के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं।

पृथ्वीराज रासो एवं वीसलदेव रासो को कुछ विद्वान सोलहवीं एवं सत्रहवीं शताब्दी की रचना मानते हैं। डॉ. माताप्रसाद गुप्त इन्हें १३ वीं १४ वीं शताब्दी का मानते हैं।

यह रासो परम्परा हिन्दी के जन्म से पूर्व अपभ्रंश में वर्तमान थी तथा हिन्दी की उत्पत्ति के साथ'साथ गुर्जर साहित्य में।

अपभ्रंश में "मु"जरास' तथा "सन्देश रासक' दो रचनायें हैं। इनमें से मुंजरास अनुपलब्ध है। केवल हेमचन्द्र के "सिद्ध हेम' व्याकरण ग्रन्थ में तथा मेरु तुंग के प्रबन्ध् चिन्तामणि में इसके कुछ छन्द उद्धृत किए गये हैं। डॉ. माता प्रसाद गुप्त "मुंजरास' की रचना काल १०५४ वि. और ११९७ वी. के बीच मानते हैं, क्योंकि मुंज का समय १००७ वि. से १०५४ वि. का है। "संदेश रासक' को विद्वानों ने १२०७ वि. की रचना माना है। पृथ्वीराज रासो की तरह "मुंजरास' एवं "संदेश रास भी प्रबन्ध रचनायें हैं। पृथ्वीराज रासो दुखान्त रचना है। वीसलदेव रासो सुखान्त रचना है एवं इसी तरह "संदेश रासकद्' सुखान्त एवं "मुंजरास' दुखान्त रचनायें हैं।

अपभ्रंश काल की एक और रचना जिन्दत्त सूरि का "उपदेश रसायन रास' है। यह भक्ति परक धार्मिक रचना है। डॉ. माता प्रसाद गुप्त जिनदत्त सूरि का स्वर्गवास सं. १२९५ वि. में मानते हैं। अतः रचना सं. १२९५ वि. के कुछ पूर्व की ही होनी चाहिए। अपभ्रशं की उपर्युक्त रचनायें रासो काव्य की मुख्य प्रवृत्तियों की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं करतीा

गुर्जर साहित्य में लिखी रासो रचनायें आकार में छोटी हैं। इनके रचयिता जैन कवि थे और उन्होंने इनकी रचना जैन धर्म सिद्धान्तों के अनुसार की।
सर्वप्रथम "शालिभ्रद सूरि' की "भरतेश्वर बाहुबलि रास' एवं "वद्धि रास' रचनायें उपलब्ध होती है। "भरतेश्वर बाहुबलि रास' राजसत्ता के लिए हुआ भरतेश्वर एवं बाहुबलि का संघर्ष है जो जैन तीथर्ंकर स्वामी ॠषभदेव के पुत्र थे। इसकी रचना वीर रस में हुई है। "बुद्धि रास' शान्त रस में लिखा गया उपदेश परक ग्रन्थ है।
 


रासो काव्य की विशेषताएँ :

रासो काव्य आदिकालीन कविता की मुख्य धारा है. इस्मने वीरता एवं श्रृंगार प्रधान दोनों प्रवृत्तियों का चित्रण किया गया है. इस युग के महत्वपूर्ण रासो काव्यों में पृथ्वीराज रासो, खुमान रासो, बीसलदेव रासो, परमाल रासो प्रमुख हैं. रासो काव्यों के लेखक राजाओं की वीरता की प्रशंसा राज्य दरबार में रहकर करते थे तथा अपने काव्य के माध्यम से उन्हें प्रेरित किया करते थे.

1. वीरता एवं श्रृंगार की प्रधानता-

इन काव्य में वीरता एवं श्रृंगार का विषद चित्रं किया गया है. वीरता एवं श्रृंगार आदिकालीन कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ है जहाँ युद्ध का करण नायिकाओं की सुन्दरता भी होती थी. पृथ्वीराज रासो में वीरता एवं श्रृंगार दोनों प्रकार के पद्य देखने को मिलते हैं वहीँ बीसलदेव रासो में मुख्य रूप से वियोग श्रृंगार का चित्रण हुआ है.

वीरता परक पद-
फ़ौज रची सामंत, गरुड़ व्यूहं रचि गढ़िय.
भूमि पर्यो तत्तार, मारि कमनेत प्रहारे.
फ़ौज बन्धि सुरतन मुष्ष अग्गे तत्तारिय
सिर धूनत पतिसाह, धाह सुनी सेना सत्थिय.


श्रृंगार परक पद :
इस पद में राग वसंत का प्रयोग करते हुए वसंत को प्रेम का उद्दीपक और श्रृंगार को उनका सहायक माना गया है. यह श्रृंगार ही अंततः ही अंततः युद्ध में सहायक भी बनता है-


अलि अलक कंठ कलकंठ मंत, संयोगी भोग वर भुआ वसंत,
मधुर हिमंत रितुराज मंत. परस पर प्रेम से पियन कन्त.

बीसलदेव रासो में वियोग के पद-
जइ तं पूछइ धरइ नरेश
वनषंड सेवती हिरणी कइ बेस
निरनाला करती एकादसी
एक आहाणीय बनह मंझारि,
बिहूँ बाणे उरिआं हणी.
म्हाकउ काल घटयउ जगन्नाथ दुआरि.[3]

2. लोक कथाओं की बहुलता :

रासो काव्य की रचना पद्य में की गई है जिसमें विजय उल्लास का वर्णन है. लोक कथाओं का प्रयोग करते हुए अनुष्ठान, टोन, भूत-प्रेत, कल्पना, लोक विश्वास और लोकगीत को लेते हुए जनसाधारण में प्रचलित कथाओं को इन कवियों ने चुना है इसीलिए ये सरे रास व्यक्ति-विशेष की सम्पदा न रहकर हिंदी की जातीय सम्पदा बन चुके हैं. डॉ० सुमन राजे लोक गाथाओं की प्रमुख विशेषताएँ मानती हैं-



अनेक रचनाओं के रचयिता का अज्ञात होना

मौखिक परंपरा द्वारा रचनाओ का विकास

प्रमाणिक मूल पाठ का प्रायः अभाव

स्थानीय रंग और लोक संस्कृति का प्रयोग

विकसनशील काव्य

नाम रहित वस्तुओं की अधिकता

सार्वभौम कथाएँ जिनका अंततः सुख में होता है.[4]



उदाहरण के लिए-



संदेश रासक की नायिका ‘णवगिम्हागमि पहियउ णाहु तव पवसियउ’ कहकर जिस विरह यात्रा का आरम्भ करती है उसका अंत अंततः नायक के आगमन से होता है.

ऐतिहासिकता और प्रमाणिकता का आभाव :




रासो काव्य के रचयिता मूलतः आश्रयदाताओं के सरक्षण में रहकर रचना करते थे इसलिए अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन करने के कारण अनेक स्थानों पर ऐतिहासिकता का आभाव दिखाई देता है. आश्रयदाता की हार को जीत के रूप में बदलने की विवशता भी अनेक अलौकिक और असंभव घटनाओं को जन्म देती है. वीरों के सर कटने से लेकर मानवीय, अतिमानवीय और बाह्य सहायता के माध्यम से अंततः आश्रयदाता की सफलता को अभिव्यक्त करना ही इन रचनाकारों का लक्ष्य था. अतः इनकी प्रामाणिकता संदिग्ध होना स्वाभाविक ही है.




आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पृथ्वीराज रासो को अर्धप्रामाणिक और पृथ्वीराज विजय को डॉ० बूलर के निश्कर्षानुसार अधिक प्रामाणिक मानते हैं परन्तु इससे पृथ्वीराज रासो की साहित्यिक महत्ता कहीं भी कम नहीं हो जाति. राजप्रशस्ति का उद्देश्य होने के कारण किसी भी प्रकार राजा की उपलब्धियाँ चित्रित करने वाले यह काव्य भी किसी सीमा तक इतिहास की रक्षा कर पाए हैं परन्तु पूरी तरह इतिहास की कसौटी पर कसना ही यदि उद्देश्य हो तो इन काव्यों के साथ सही न्याय नहीं हो पायेगा. हालाँकि देशकाल, वातावरण के अनुसार पृथ्वीराज रासो में ही पट्टन गजनी दिल्ली आदि नगरों के कालानुसार वर्णन मिलते हैं-




तिन नगर पहुच्यौ चंद कवि, मनौ कैलास समाष लहि.




उपकंठ महल सागर प्रबल, सघन साइ चाहन चलहि[5]




4. जनचेतना का आभाव :




यह काव्य मूलतः राजाओं की वीरता, उनके आख्यानों, श्रृंगार की सीमाओं, रूप-सौन्दर्य, नख-शिख वर्णन से होता हुआ युद्ध के मैदान तक की यात्रा का काव्य है. चारण और भात कवि युद्धों में भाग लेकर राजाओं की व्यक्तिगत वीरता के साक्षी बनते थे जो मूलतः किसी स्त्री अथवा नायिका की प्राप्ति से जुड़े हुए शौर्य का प्रदर्शन मात्र ही थी. ऐसे में यह काव्य सामाजिक जन-जीवन के भीतर होने वाली हलचलों के देखता और समझता दिखाई नहीं देता. व्यक्तिगत शौर्य की लड़ाइयोंके केंद्र में समाज दिखाई नहीं देता. व्यक्तिगत शौर्य की लड़ाइयों के केंद्र में समाज कहीं केंद्र में नहीं आता. वैसे भी यह युग अपने-अपने राज्यों को ही राष्ट्र मानने की सीमाओं से बंधा हुआ था ऐसे में जान सामान्य के सुख-दुःख से इनका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध दिखाई नहीं देता.




“ वास्तविक जीवन के कर्तव्य-द्वंद्व, आत्म विरोध और आत्म प्रतिरोध जैसी बातें उसमें नहीं आ पाती.”[6]


5. कथानक रूढ़ियाँ :




रूप-सौन्दर्य, ऋतु, युद्ध सभी का वर्णन करते हुए रासो काव्य के रचयिता परंपरा प्रचलित उपमानों को केंद्र में रखते हैं और इसी कारण कथानक रुढियों और काव्य रुढियों का प्रयोग यहाँ विशेष रूप से हुआ है. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अनेक कथानक रुढियों में कहानी कहने वाला तोता, स्वप्न में प्रेम मूर्ति दर्शन, मुनि का शाप, लिंग परिवर्तन, नायिका का चित्र, चरी प्रेम, आकाशवाणी, परकाया प्रवेश जैसी लगभग बीस प्रमुख कथानक रुढियों का वर्जन किया है.[7]




डॉ० सुमन राजे ने कथानक रुढियों को 8 भागों में विभाजित किया है तो कहीं कवी कपोल कल्पना मात्र है.




उदाहरण के लिए पृथ्वीराज रासो का प्रामाणिक माना जाने वाला अंश शुक-शुकी संवाद भी इसी काव्य रुढ़ि से उपजा है. उनके द्वारा बताई गई कथानक रूढ़ियाँ इस प्रकार है-




संभावना अथवा कल्पना पर आधारित


अलौकिक और अप्राकृतिक शक्तियों से सम्बंधित


अतिमानवीय शक्ति और कार्य से सम्बंधित


संयोग और भाग्य पर आधारित


निषेध और शकुन सम्बंधित


शरीर वैज्ञानिक रूढ़ियाँ


आध्यत्मिक और मनोवैज्ञानिक रूढ़ियाँ


सामाजिक रीति-रिवाज और परिस्थितियों का परिचय देने वाली रूढ़ियाँ[8]




उदाहरण-




चंद कवि स्वयं को अत्यंत आत्महीन बताते हुए अपने गुरु की उपासना कर रहे हैं-




गुरं राब्ब कव्वी लहू चंद कव्वी, जिनै दर्सियं देविसा अंगहब्बी.




कवी कित्ती कित्ती उकत्ती सुदिक्खी, तिनैकी उचिष्टी कबी चंद चंद मक्खी.[9]




6. शैलीगत वैशिष्ट्य :




रासो काव्य मूलतः प्रबंध शैली लिखे हैं. वर्णनात्मकता जिनकी प्रमुख विशेषता है. सन्देश रासक और पृथ्वीराज रासो को यदि छोड़ दिया जाए तो विकसनशीलता के कारण अलंकृति भी बहुत अधिक दिखाई नहीं देती. वाक् कौशल अथवा चमत्कारोत्पादक संवादों, प्रश्नोत्तर शैली, हेलिका-प्रहेलिका, समस्या पूर्ति, सुभाषित सुक्ति, कहावतों का प्रयोग विशेष रूप से दिखाई देता है.




यह काव्य मुख्यतः कथात्मक है. संवाद शैली का प्रयोग करते हुए आद्यांत एक ही छंद का प्रयोग करने का प्रयास दिखाई देता है. वाक् कौशल का एक उदाहरण-




चढि तुरंग चहुआन, आन फेरीत परद्धर


हिंदी साहित्य में रासो काव्य परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।  हिंदी साहित्य का सर्वप्रथम  काव्य इतिहास है। रासो साहित्य का संबंध आदि काल से है।  आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रासो ग्रंथों के आधार पर ही  इस काल को वीरगाथा काल नाम दिया था। रासो शब्द का अर्थ क्या है, इस बारे में विद्वानों ने अलग-अलग मत दिए हैं जो इस प्रकार है-

गार्सा द तासी ने रासो शब्द की उत्पत्ति राजसूय शब्द से मानी है।  उनकी धारणा है कि राज्य शब्द पृथ्वीराज रासो की प्रतिलिपियों पर लिखा हुआ था।  इसके साथ ही राजा लोगों में  यज्ञ करने की प्रवृत्ति होती थी और उन  यज्ञों को  राजसूय यज्ञ कहा जाता था।  यह ग्रंथ राजाओं की वीरता पर आधारित है  इसीलिए रासो राजसूय का ही प्रतीक है।

डॉ. ग्रियर्सन ने रासो शब्द की उत्पत्ति  राजादेश शब्द से मानी है।  जिसका अर्थ है राजा के आदेश से लिखा गया काव्य।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रासो शब्द की उत्पत्ति रसायन शब्द से मानी है।  इसके पीछे यह धारणा है कि बीसलदेव रासो में रसायन शब्द का प्रयोग बार-बार किया गया है और यही रसायन शब्द आगे चलकर राष्ट्र के रूप में प्रयुक्त हुआ।डॉ. ग्रियर्सन ने रासो शब्द की उत्पत्ति  राजादेश शब्द से मानी है।  जिसका अर्थ है राजा के आदेश से लिखा गया काव्य।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रासो शब्द की उत्पत्ति रासक शब्द से मानी है। रासक संस्कृत परंपरा का उदाहरण है। अपभ्रंश भाषा में 29 मात्राओं का एक छंद होता है,  जिसका प्रयोग  श्रृंगार एवं वीरता पर रचनाओं के लिए किया जाता है।  रासो ग्रंथ भी इसी रासक छंद में लिखे गए हैं, इसीलिए रासो शब्द की उत्पत्ति रासक से ही मानी जानी चाहिए।  द्विवेदी जी की यह धारणा सर्वमान्य हो गई।

रासो साहित्य मूलतः सामंती व्यवस्था, प्रकृति और संस्कार से उपजा साहित्य है, जिसका संबंध पश्चिमी हिंदी प्रदेश से है।  इसे देश भाषा काव्य के नाम से भी जाना जाता है। इस साहित्य के रचनाकार हिंदू राजपूत राजाओं के आश्रय में रहने वाले चारण या भाट कवि थे। समाज में उनका सम्मान था क्योंकि उनका जुड़ाव सीधे राजा से होता था।  आदिकाल की राजनीतिक परिस्थितियां असंतुलित व अव्यवस्थित थी।  हर्षवर्धन के शक्तिशाली राज्य की समाप्ति के पश्चात केंद्रीकृत शक्तियों का अभाव हो गया।  पश्चिमी भारत में गहरवाल, चौहान, चंदेल, परिहार आदि राज्यों की स्थापना हुई।  यह राज्य आपसी प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या रखते थे।  पूरा देश छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया था और इन राज्यों के राजा एक दूसरे के साथ युद्धरत रहते थे।  आपसी लड़ाई और मुसलमानों के आक्रमण से देश आक्रांत था।  ऐसे समय में राजाओं के आश्रित कवि इस तरह की रचनाएं लिख रहे थे, जो युद्धक्षेत्र में अपने राजा, आश्रय दाता, वीर पुरुषों तथा सैनिकों के मनोबल को बढ़ाएं और उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित करती रहे।  आदिकाल के इन चारण भाट कवियों ने न केवल वीरतापूर्ण युद्ध घटनाओं का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन किया बल्कि अपने आश्रय दाता वह वीर सैनिकों की वीरता का भी ओजपूर्ण वर्णन किया है। इन कवियों ने युद्ध की यथास्थितियों का भी बारीकी से चित्रण किया है, क्योंकि ये स्वयं युद्धभूमि में राजा के साथ रहते थे। यही वीरतापूर्ण रचनाएं रासो ग्रंथों के नाम से प्रसिद्ध हुई।  रासो काव्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार है-

 1- दरबारी साहित्यः

रासो काव्य रचनाएं लिखने वाले कवि प्रायः दरबारी कवि थे। अपने सुख के लिए नहीं बल्कि अपने स्वामी के सुख के लिए काव्य की रचना की है।  प्रायः तत्कालीन सभी राजपूत राजाओं के दरबारों में आश्रित चारण या भाट रहते थे जो अवसर आने पर अपने राजाओं की प्रशंसा व उनके युद्ध कौशल का चित्रण करते थे। अतः आदिकालीन साहित्य को दरबारी साहित्य भी कहा जा सकता है।

 2- संदिग्ध रचनाएंः

इस काल में प्राप्त होने वाली रचनाओं को विद्वानों ने संदिग्ध रचनाएं माना है।  विशेष रुप से जो वीर ग्रंथ है उनकी प्रमाणिकता को लेकर विद्वानों में मतभेद है।  इन ग्रंथों में चार प्रमुख ग्रंथ है पृथ्वीराज रासो बीसलदेव रासो खुमान रासो तथा परमाल रासो।  इन काव्य रचनाओं में शताब्दियों तक परिवर्तन होते चले गए पृथ्वीराज रासो में कुछ ऐसी घटनाएं हैं जो किसी भी दृष्टि से प्रामाणिक प्रतीत नहीं होती और उसी तरह खुमान रासो को राष्ट्र परंपरा की प्रथम रचना कहा गया है परंतु इसमें 16 वीं शताब्दी तक की घटनाएं दी गई है।

 3- ऐतिहासिकता का अभावः

कहने को तो यह रचना ऐतिहासिक है परंतु इनमें ऐतिहासिकता का अभाव है।  इन रचनाओं में ऐतिहासिक राजाओं की वीरता का वर्णन तो किया गया है परंतु कवि ने अपनी तरफ से भी कुछ ऐसे तथ्य जोड़ दिए हैं जिनका इतिहास से कोई संबंध नहीं है।  इनमें ऐतिहासिकता का कम और कल्पना का विकास अधिक हुआ है।

 4- युद्धों का सजीव वर्णनः

इस काल के चारण कवि केवल कलम के ही धनी नहीं थे बल्कि आवश्यकता पड़ने पर वह तलवार निकालकर अपनी वीरता का परिचय भी देते थे।  यह कवि अपने आश्रय दाताओं के साथ युद्ध क्षेत्र में जाते थे।  अतः इनकी रचनाओं में अपनी आश्रय दाताओं की युद्ध कौशल के साथ साथ युद्ध भूमि का सजीव सुंदर और यथार्थ वर्णन बन पड़ा है।  उदाहरण के लिए परमाल रासो में आल्हा-ऊदल की 52 लड़ाइयों का जो चित्रण हुआ है वह अद्भुत बन पड़ा है।

 5- आश्रय दाताओं का यशोगानः

इस काल के सभी कवियों ने अपने आश्रय दाताओं की वीरता एवं चरित्र का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन किया है। यह कभी ओजस्वी भाषा द्वारा अपने आश्रय दाता की वीरता, उसके युद्ध कौशल और ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए दिखाई देते हैं। यह कभी आशय दाताओं के मित्र और सलाहकार भी होते थे अतः उनकी आजीविका आश्रयदाता पर ही निर्भर होती थी। दूसरे इस युग में सौ-पचास गांव को ही राजा अपना राष्ट्र मान लेता था और पड़ोसी राज्य के पतन को देखकर राजा और राजकवि दोनों ही प्रसन्न होते थे। इसीलिए भी यह कवि अपने राजाओं की वीरता का अतिशयोक्ति पूर्ण शैली में वर्णन करते थे।

 6- वस्तु वर्णन और प्रकृति वर्णनः

रासो कवियों ने अनेक प्रकार के वर्णन किए हैं।  इन कवियों ने अपनी रचनाओं में राजाओं की शूरवीरता, पराक्रम, युद्ध, शत्रु विजय, रण सज्जा, आखेट आदि का वर्णन किया है, साथ ही अपने राजाओं को सिंह के समान वीर माना है।  इन चारण कवियों की प्रकृति में बड़ी रुचि रही है। इन्होंने प्राकृतिक दृश्यों का मानवीकरण किया है तो कहीं-कहीं प्रकृति को दूत के रूप में भी प्रस्तुत किया है।  श्रृंगार वर्णन करते हुए जहां संयोगावस्था में प्रकृति का सुखद चित्रण किया गया है वहीं वियोगावस्था में प्रकृति चित्रण दुखदाई हो जाता है।

 7- जन जीवन के प्रति उपेक्षा का भावः

रासो कवि केवल अपने राजा तक जुड़े थे उन्हें जनता के सुख-दुख तथा व्यथा से कुछ भी लेना देना नहीं था।  इनका साहित्य राज दरबार तक ही सीमित रह गया था जन जीवन के प्रति यह पूर्णता  उपेक्षा का भाव प्रति थे।

 8- काव्य रूप और भाषाः

आदि काल में प्रबंध और मुक्तक दोनों प्रकार की काव्य रचनाएं उपलब्ध होती है बीसलदेव रासो आदि काल का प्राचीनतम प्रबंध काव्य है जिसमें नायिका की विरह व्यथा का चित्रण हुआ है। पृथ्वीराज रासो एक अन्य प्रबंध काव्य है।

 रासो काव्य में जिस भाषा का प्रयोग हुआ है उसे विद्वानों ने डिंगल पिंगल का नाम दिया है। डिंगल राजस्थानी और अपभ्रंश का मिश्रित रूप है। यह वीर रस की रचनाओं के लिए प्रयुक्त भाषा है।  दूसरी ओर पिंगल भाषा अपभ्रंश और ब्रज का मिश्रित रूप है। श्रृंगार वर्णन के लिए रासो कवियों ने पिंगल भाषा का ही प्रयोग किया है।

 9- रस, छंद एवं, अलंकारः

रासो साहित्य वीर रस के साथ साथ पूरा रस का सुंदर वर्णन प्रस्तुत करता है।  इसमें रासक नामक एक छंद का प्रयोग हुआ है जिससे इस काव्य को रासो काव्य का नाम दिया गया है। इसके अतिरिक्त दोहा,  तोटक,  छप्पय,  कवित्त,  सवैया आदि असंख्य छंदों का प्रयोग इन काव्य रचनाओं में किया गया है।  जहां तक अलंकारों की बात है अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, संदेश, अतिशयोक्ति आदि अलंकारों की प्रधानता किस काव्य में मिलती है।