कोस मीनारें, आइए जानें ये क्या है ?

आइए जानें क्या है कोस मीनारें 

आप यह जो चित्र देख रहे हैं उसका नाम है कोस मीनार आइए आज हम इसी के बारे में बताते हैं लेकिन उससे पहले आप इसके नीचे दिए हुए एक और चित्र को देख ले शायद कुछ कुछ समझ जाए।
यहां चित्र में 3 कोस मीनार और 2 मील के पत्थर हैं। वर्तमान में इन मील के पत्थरों से हमें दूरी का भाव स्पष्ट होता है। अतः ये हमें दूरी का एहसास कराते हैं कि हम किसी स्थान से कितनी दूर है। इन्हें हम किलोमीटर पत्थरों के नाम से भी जानते हैं। क्योंकि इन्हें हर किलोमीटर के अंदर से देखा जा सकता है अर्थात दो निकटतम किलोमीटर पत्थरों के बीच की दूरी एक किलोमीटर होती है।

जब दूरी मापने का तरीका बदला तो लोग इस कोस मीनार को भी भूल गए। वक्त के थपेड़ों के चलते कई जगहों पर कोस मीनार गायब हो गई या टूट गई तो कई राज्यों में लोगों ने कोस मीनार पर अवैध कब्जा कर उन्हें नष्ट कर दिया।

अब हम आपको स्पष्टत: कह सकते हैं कि कोस मीनारें भी इसी प्रकार के ही स्तंभ हैं। जो बहुत समय पहले मील के पत्थरों की तरह ही दूरी बताने का कार्य करते थे। 

कोलकाता से पेशावर तक जाने वाली सड़क को हम ग्रैंड ट्रंक रोड अर्थात जीटी रोड के नाम से जानते हैं। इसे शेरशाह सूरी ने बनाया था। इसलिए इस मार्ग को शेरशाह सूरी मार्ग भी कहा जाता था । यह कोलकाता से पेशावर को जोड़ने वाला मार्ग था, अर्थात उस समय कोलकाता से पेशावर तक की दूरी इसी रास्ते से तय होती थी। कोस मीनार जीटी रोड के साथ-साथ बंगाल की गांव सोनार से लेकर आगरा, मथुरा दिल्ली, हरियाणा, पंजाब के खेतों से होते हुए पाकिस्तान के पेसावर तक बनी हैं। 

शेरशाह सूरी ने सड़कों की दूरियां को मापने का तरीका अपनाया। उसने सड़कों की दूरी को सही से मापने के लिए ही कोस मीनारें बनवाई थीं, अतः हम कह सकते हैं कि यह शेरशाह सूरी के सड़कों के सुधार की एक कड़ी थीं ये कोस मीनारें। 

वास्तव में ये मीनारें यात्रा के पहचान चिन्ह हुआ करती थी क्योंकि वार्षिक बाढ़ आदि के कारण साड़के नष्ट भ्रष्ट हो जाती थी, तो ये मीनारें ही रास्ता बताने का एक मात्र साधन हुआ करती थी। इसी कारण इन कोस मीनारों को कुछ यात्रियों ने चमत्कार कहा है।

भारत की विशेषता बताने वाली एक कहावत काफी मशहूर है कि कोस कोस पर पानी बदले, आठ कोस पर बानी। लेकिन क्या कभी आपने इस कोस का मतलब समझने की कोशिश की है। नहीं, तो चलो हम आप को समझाने का प्रयास करते हैं कि प्राचीन काल में कोस दूरी को मापने की एक इकाई होती थी, जिससे यात्रियों को पता चलता था कि वो कितनी दूरी पर या किस इलाके में मौजूद हैं। यात्रियों की सहूलियत के लिए एक तय दूरी पर कोस मीनार बनाई गईं थीं।

'कोस' का शाब्दिक अर्थ है - 'दूरी की एक माप '। संस्कृत में कोस एक दूरी मापक इकाई है जिसका अर्थ एक योजन का एक चौथाई माना जाता है। अतः कोस दूरी को मापने की एक प्राचीन भारतीय इकाई है। इन मीनारों के एक एक कोस की दूरी पर होने के कारण ही इन्हें कोस मीनारों का नाम दिया गया। एक कोस में लगभग 2 मील या 3.22 किलोमीटर की दूरी होती है। यानि वर्तमान में जहां किलोमीटर पत्थरों के बीच की दूरी 1 किलोमीटर होती है उसी तरह ही एक कोस मीनार से दूसरी कोस मीनार की दूरी 3.22 किलोमीटर हुआ करती थी। उस समय उसके लिए सामान्य रूप से जो नियम बनाया गया था वह यह था कि गाय के रंभाने की आवाज़ सामान्य स्थिति में जितनी दूर तक सुनी जा सके वही दूरी 'कोस' है।
          
शेरशाह सूरी ने  1556-1707 के बीच इन मीनारों को एक एक कोस की दूरी पर लगवाया था। उसने ग्रैंड ट्रंक रोड के किनारे हर कोस पर मीनारें बनवाई गई थीं। कई मीनारें आज भी सुरक्षित हैं तथा इन्हें दिल्ली-अंबाला राजमार्ग पर देखा जा सकता है।    

आईने अकबरी में अबुल फजल द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार मुगल काल में देशभर में लगभग 600 कोस मीनार बनाई गई थी । परंतु वर्तमान में इनमें से कुछ ही बची हैं। 

कोस मीनार नामक स्तंभ ज़मीन से 9 फुट ऊंचे अष्टकोणीय आधार पर बनें हैं। इनकी गोलाई 17 फुट है। कोस मीनार की कुल ऊंचाई 26 फुट (5 मीटर) है।  जो ऊपर की ओर जाते हुए लगभग 10 फुट की तथा अष्टकोणीय के स्थान पर गोलाई लिए हुए शंक्वाकार होता हुए शीर्ष पर बंद हो जाती है। 

नीचे से इसका आधार चौड़ा, चौकोर और मज़बूत है। कोस मीनार चूने और छोटी ईंटों (लखोड़ी इंटों) से बनी हुई हैं। इन मीनारों पर चारों ओर थोड़ी थोड़ी दूरी पर चौकोर खाने बने हुए हैं। जिन्हे साधारण भाषा में आले कहा जाता है। प्रत्येक मीनार में इन आलों की संख्या 24 है। इसमें आलों के तीन पायदान बनाए गए हैं। हर पायदान पर आठ चौकोर आले हैं। 

यह चौकोर आले कोस मीनारों की मरम्मत करने या सफेदी के कार्य के लिए छोड़े जाते थे। इन आलों का एक फायदा होता था कि इन मीनारों को मरम्मत आदि के लिए बार-बार छेद करने से बचाया जा सके। कुछ लोगों का मानना है कि इनका उपयोग शायद मसाल जलाकर प्रकाश व्यवस्था करने के लिए प्रयोग किया जाता था। लेकिन यह संभव नहीं हैं कि 2गुना 2 फीट तथा दो इंच गहरे इन आलों में मसाल कैसे रखी जाती होगी। 

ऐसा संभवतः बल्लियों से मचान बनाने के लिए किया जाता था। ताकि मरम्मत और रखरखाव के समय मीनारों पर नीचे से ऊपर तक चौकोर आलों में लकड़ी की पेटी लगाकर बल्लियों को खड़ा कर, आपस में रस्सी से बांधकर, उनपर चढ़कर मीनारों की मरम्मत या सफेदी जैसा कार्य संपन्न किया जा सके। 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार इन मीनारों का निमार्ण दूरी और दिशा की सही जानकारी देने के लिए किया गया था। कोस मीनार का निर्माण अपने वक्त कि बेहद खूबसूरत सरचना है। इन्हे देखकर राजसी परिवार के लोग यह तय किया करते थे कि उनकी मंज़िल अभी और कितनी दूर है।

शेरशाह सूरी सामाजिक सरोकारों में भी दिलचस्पी रखते थे। कोस मीनारें उसका एक उदाहरण हैं। सम्राट शेरशाह सूरी के बाद कुछ मुगल बादशाहों ने भी कोस मीनारों के निर्माण की परंपरा को आगे बढ़ाया जैसे कि अकबर ने भी अनेक कोस मीनार बनवाई। कोस मिनारें विशेष रूप से राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश के साथ साथ कश्मीर में भी हैं। मुग़ल शासकों ने ये कोस मीनार पश्चिम में आगरा से अजमेर वाया जयपुर, उत्तर में आगरा से लाहौर वाया दिल्ली व दक्षिण में आगरा से मांडू वाया शिवपुरी के रास्तों में बनवाई थी। इन मीनारों का प्रयोग मील के पत्थर के रूप में किया जाता था।

भारतीय पुरात्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार पूरे देश में करीब 110 कोस मीनारें बची हैं। जिसमें सर्वाधिक मीनारें हरियाणा में हैं जिनकी संख्या 49 है। (जिनमें से फरीदाबाद में 17, सोनीपत में 7, पानीपत में 5, करनालमें 10, कुरुक्षेत्र में 9 हैं।) इसके अलावा लुधियाना में 5, मथुरा में 9 व दिल्ली में 1 है। 

ये कोस मीनार मुख्यतः दिल्ली, सोनीपत, पानीपत, कुरुक्षेत्र, अंबाला, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर से पेशावर (पाकिस्तान) तक व दिल्ली - आगरा राजमार्ग पर स्थापित हैं।

वर्तमान में दिल्ली की एकमात्र बची कोस मीनार चिड़ियाघर के बीचों-बीच स्थित है। जोकि शेरशाह सूरी की राजधानी पुराना किला के करीब ग्रैंड ट्रांक रोड पर स्थित है। गोल आकार में बनी इस कोस मीनार की ऊंचाई करीब 30 फीट है और इसे लाल ईंटों व चूना पत्थरों से बनाया गया है। ये यात्रियों को रास्ता दिखाया करती थी। लेकिन सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि दिल्ली के चिड़ियाघर में धूमने आने वाले पर्यटक को भी इतिहास में प्रमुख स्थान रखने वाली कोस मीनार की अधिक जानकारी नहीं है। 

इन मीनारों को दूरी जानने के साथ साथ यात्री को रास्ता पहचानने में मदद मिलती थी। हर मीनार के पास हरे भरे पेड़ों का बगीचा भी होता था, जिससे छाया में बैठकर राहगीर आराम कर सकें। मीनारों के पास हमेशा से एक कुआं या बावड़ी होती थी, ताकि वहां पर कुछ देर बैठकर आराम किया जा सके और पानी पीकर प्यास बुझाई जा सके। कुछ विशेष कोस मीनार के पास मौजूद सरायों में मुसाफिरों को आराम मिलता था। लंबी लंबी यात्राएं करने वाले कोस मीनारों को देख अपना आराम का पडाव इसे ही बनाते थे। यहां यात्री कुछ देर आराम कर सकते थे। 

कोस मीनार को प्रशासन की ओर से संदेशवाहन के रूप में प्रयोग किया जाता था। कोस मीनार पर प्रशासन की ओर से एक संदेश वाहक और शाही सैनिक की नियुक्ति होती थी जो शाही संदेश और पत्र को एक मीनार से दूसरी मीनार तक पहुंचाने का काम करता था। इसी प्रकार यह संदेश आगे बढ़ता जाता था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारत में संदेश भेजने की यह व्यवस्था उसी समय से शुरू हुई थी। इस प्रकार इस व्यवस्था को भारत की डाक सेवा का जन्मदाता माना जा सकता है। 

इन मीनारों पर शासन की ओर से आदमी नियुक्त होते थे। ये दिन में लोगों की सेवा करते थे और रात में मीनार के ऊपर रोशनी करते थे, जिससे रात में भटके राहगीर को रास्ता मिल जाए।

शेरशाह सूरी या उसके बाद आने वाले कई यूरोपीय यात्रियों ने भी अपने संस्मरणों में कोस मीनार का वर्णन किया है। सर थॉमस रो जोकि एक यूरोपीय यात्री थे उन्होंने कोस मीनारों को भारत का चमत्कार बताया है। जबकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) इसे भारत की राष्ट्रीय संचार प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग बताता है।

कभी शेरशाह सूरी के शासनकाल में इन्हीं कोस मीनारों को देखकर सैनिकों को राजधानी व जहां भी उन्हें भेजा जाता था। उस स्थान का वो पता लगा पाते थे। सही मायने में यह मुगलों द्वारा प्रयोग में लाया जाने वाला मुख्य मार्ग था, जिससे वो दिल्ली से लाहौर तक आया-जाया करते थे। 

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शेरशाह सूरी ने यात्रियों की सहूलियत के लिए ग्रैंड ट्रंक रोड पर बनवाई थी कोस मीनार

कभी शेरशाह सूरी के शासनकाल में इन्हीं कोस मीनारों को देखकर सैनिकों को राजधानी व जहां भी उन्हें भेजा जाता था। उस स्थान का वो पता लगा पाते थे। सही मायने में यह मुगलों द्वारा प्रयोग बताता है। में लाया जाने वाला मुख्य मार्ग था, जिससे वो दिल्ली से लाहौर तक आया-जाया करते थे।

लेखक 
ॐ जितेंद्र सिंह तोमर

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