भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर

भारतीय मोर मोरनी
अर्थात
इंडियन पीफाॅल


भारतीय मोर मोरनी को अंग्रेजी में इंडियन पीफाॅल के नाम से जाना जाता है । यह पक्षियों के फिजेंट्स अर्थात तीतर समूह की प्रजातियों में शामिल है । इसमें नर को मोर अर्थात पीकाॅक कहते हैं। जबकि मादा मोरनी को पीहैन कहते हैं। दोनों को संयुक्त रूप से पीफॉल कहा जाता है।

मोर उड़ सकने वाले सबसे बड़े पक्षियों में से एक हैं । इसके पंख इस प्रकार बने हैं कि इसके भारी शरीर के होने के बावजूद, जरूरत पड़ने पर, यह ऊंची उड़ान भरकर पेड़ों की ऊंचाइयों पर आसानी से पहुंच सकता है। मोर मूलतः वन्य पक्षी है, लेकिन भोजन की तलाश इसे कई बार मानव आबादी तक ले आती है।
मोर को पक्षियों का राजा माना जाता है। यह शिव पुत्र कार्तिकेय का वाहन है। भगवान कृष्ण के मुकुट में लगा मोर का पंख इस पक्षी के महत्व को दर्शाता है। यह भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। अनेक धार्मिक कथाओं में मोर को बहुत ऊंचा दर्जा दिया गया है। हिन्दू धर्म में मोर को मार कर खाना महापाप समझा जाता है।

मोर अथवा मयूर एक पक्षी है जिसका मूलस्थान दक्षिणी और दक्षिणपूर्वी एशिया है। इसी क्षेत्र में श्रीलंका और भारत आते हैं। ज़्यादातर मोर खुले वनों में वन्यपक्षी की तरह रहते हैं।
नीला मोर जिसे नीलकंठ भी कहा जाता है। भारत का ही नहीं बल्कि श्रीलंका का भी राष्ट्रीय पक्षी है।
नर की एक ख़ूबसूरत और रंग-बिरंगी फरों से बनी पूँछ होती है, जिसे मोर कहा जाता है । मोर विशेष रूप से बसन्त और बारिश के मौसम में, अपनी सुंदर पूछ को खोलकर प्रणय निवेदन के लिए नाचता है। मादा मोर पक्षी मोरनी कहलाती है। जावाई मोर हरे रंग का होता है।

बरसात के मौसम में काली घटा छाने पर जब मोर पंख फैला कर नाचता है तो ऐसा लगता मानो इसने हीरों से जड़ी शाही पोशाक पहनी हुई हो; इसीलिए मोर को पक्षियों का राजा कहा जाता है।
पक्षियों का राजा होने के कारण ही प्रकृति ने इसके सिर पर ताज जैसी कलंगी लगायी है।
इसकी सुंदरता को देखते हुए, भारत सरकार ने 26 जनवरी,1963 को इसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया। हमारे पड़ोसी देश म्यांमार और श्रीलंका का राष्ट्रीय पक्षी भी मोर ही है।
‘फैसियानिडाई’ परिवार के सदस्य मोर का वैज्ञानिक नाम ‘पावो क्रिस्टेटस’ है। अंग्रेजी भाषा में इसे ‘ब्ल्यू पीफॉउल’ अथवा ‘पीकॉक’ कहते हैं। संस्कृत भाषा में यह मयूर के नाम से जाना जाता है।
मोर भारत तथा श्रीलंका में बहुतायत में पाया जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण के मुकुट में लगा मोर का पंख इस पक्षी के महत्त्व को दर्शाता है। महाकवि कालिदास ने महाकाव्य ‘मेघदूत’ में मोर को राष्ट्रीय पक्षी से भी अधिक ऊँचा स्थान दिया है।
राजा-महाराजाओं को भी मोर बहुत पसंद रहा है। प्रसिद्ध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के राज्य में जो सिक्के चलते थे, उनके एक तरफ मोर बना होता था।
मुगल बादशाह शाहजहाँ जिस तख्त पर बैठते थे, उसकी संरचना मोर जैसी थी। दो मोरों के मध्य बादशाह की गद्दी थी तथा पीछे पंख फैलाये मोर। हीरों-पन्नों से जरे इस तख्त का नाम तख्त-ए-ताऊस’ रखा गया। अरबी भाषा में मोर को ‘ताऊस’ कहते हैं।
मोर के सिर पर एक सुंदर कलगी होती है । उसकी लंबी गर्दन चमकदार नीले पंखों से ढकी होती है । यह रंग रॉयल ब्लू से मिलता-जुलता होता है । पीछे की ओर मोर की पूंछ को सुंदर पंख ढके रहते हैं । यह 5 से 6 फुट तक लंबा हो सकता है । इसके पंख अधिकतर हरे रंग की छवि पैदा करता है और बीच में इस पर नीले और भूरे रंग का अर्थ चंद्र बना होता है । जो इसे बहुत ही सुंदर और आकर्षक रंग प्रदान करता है। यह सुंदर पंख वास्तव में उसकी पीठ में उगते हैं ने की पूंछ से । नाचते समय इन पंखों को फैलाने के लिए वे अपने पूंछ के नीचे मौजूद कम छोटे और मजबूत पंखों को ऊपर उठाते हैं।

नाचते समय मोरनी को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए मोर सुंदर पंखों को पंखे की तरह फैला लेता है और फिर एक बड़ा सुंदर पंखा जैसा बना कर उन्हें हिला हिला कर वह सरसराहट सी उत्पन्न करके मोरनी को अपनी ओर आकर्षित करता है ऐसा माना जाता है कि मोरनी सबसे सुंदर पंखों वाले मोर का ही चयन करती है हालांकि मोरनी अपने बच्चों को अकेले ही पार्टी है मुर्गा इसमें कोई लेना देना नहीं होता।
जहां मोर देखने में बहुत सुंदर होता है इसके विपरीत मोरनी, मोर की तरह सुंदर नहीं होती और उसके मोर की तरह सुंदर वह लंबे पंख भी नहीं होती । उसकी पीठ पर पंख भूरे रंग के होते हैं जबकि पेट की और उसका रंग सफेद होता है। वैसे मादा के सिर पर कलगी और गर्दन पर हरे या रॉयल ब्लू रंग देखा जा सकता है । जिससे नर और मादा के पहचानने में कठिनाई हो सकती है।

मोर एक सर्वाहारी पक्षी है। इनके आहार में पौधे की और अन्य छोटे जीव शामिल होते हैं।भारतीय मूल सांपों का शिकार करना अधिक पसंद करता है। भारतीय मोर मोरनी मूल रूप से दक्षिण एशिया में भारत और श्रीलंका में पाए जाते हैं । उन्हें अन्य देशों में भी ले जाया गया है जहां आमतौर पर पार्को, चिड़िया घरों और प्राकृतिक केंद्रों में यह घरेलू पालतू पक्षियों के रूप में रखे जाते हैं। जहां वयस्क मोर के सिर तथा शरीर की लंबाई 3 से 4 फीट तक होती है तो उसकी पूंछ की लंबाई 6 फीट तक हो सकती है।
आइए जाने मोर के बारे में कुछ अन्य जानकारी :-
मोर एक सर्वाहारी पक्षी है इसका वैज्ञानिक नाम पावो क्रिस्टेटस है इसका जीवन का लगभग 20 वर्ष होता है यह घास के मैदानों तथा वनों और उप वनों में रहता है इसका वजन 4 से 6 किलो तक तथा इसकी लंबाई 8 से 9 फुट तक हो सकती है।
मोर पक्षियों में सबसे सुंदर पक्षी होता है । इसकी सुराही दार गर्दन सिर कलगी । नीले हरे कृष्ण समान रंग बिरंगी दुम और उसके पंखों के चांद बाकी सब को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है ।
अंडों के साथ मोरनी
बच्चों के साथ मोरनी
युवा मोर

 मोर हमारा राष्ट्रीय पक्षी है। इसके पैर भद्दे और खुरदरे होते हैं । इसके पंख भी केवल दिखावे के होते हैं । इनसे मोर को उड़ने में कोई सहायता नहीं मिलती क्योंकि भारी शरीर होने के कारण ही अधिक से अधिक जमीन से उड़कर वृक्ष पर ही बैठ सकते हैं । यह स्थल पर तेजी से दौड़ सकता है ।
मोर मोरनी से ज्यादा सुंदर होता है । मोरनी के सुंदर पंख नहीं होते। मोर नृत्य करते समय चारों ओर चक्कर लगाता है और मोरनी इसके चारों तरफ घूमती रहती हैं, और यही इनके समागम का समय होता है। इनकी दुम के पंखों में नीले हरे चंद्रमा जैसे गोल सुंदर चिन्ह होते हैं और नृत्य करते समय यह गोल पंखे की तरह फैल जाती है । नृत्य के समय मोर बिल्कुल मस्त हो जाता है। नृत्य का यह समय तब होता है जब काले बादल छाए हों और बादल गरजने लगते हैं तो मोर नृत्य करने लगते हैं । कुछ मोर सफेद रंग के भी होते हैं । नृत्य करते समय मोर और भी सुंदर लगता है ।
मोर सर्वाहारी प्राणी है । यह कीड़े मकोड़े के साथ जंगली छोटे फल आदि भी खाते हैं । यह सांप को भी पकड़ कर खा जाते हैं इसलिए इन्हें सांपों का शत्रु भी कहा जाता है।यह मनुष्य से बहुत कम डरता है और पालने से उनके साथ हिल मिल भी जाता है ।
ऐसा वर्णन मिलता है कि मोर और मोरनी कभी संभोग नहीं करते । यदि मोर और मोरनी संभोग करते दिखने लगे तो समझो कि कलयुग आ चुका है। ऐसा भी वर्णन मिलता है कि मोर जब नृत्य करता है तो उसके निकले आंसुओं को पीने से वह गर्भवती रह जाती है । परंतु जैसे ही कलयुग शुरू होगा तो यह पक्षी भी संभोग करने लगेगा । ऐसा अब देखने में आने लगा है कि मोर मोरनीबी संभोग करते हैं।
मोरनी वर्ष में एक बार अंडे देती है जो संख्या में 4 से 15 तक हो सकते हैं। मुर्गी के समान मोरनी भी अंडे सेती है और उन से बच्चे निकलते हैं। बच्चे जब छोटे होते हैं तब तक नर और मादा में की पहचान करना बहुत कठिन होता है किंतु 1 वर्ष की उम्र पर इनकी सुन्दर दुम निकलने लगती है । और फिर थोड़े समय में ये व्यस्क बन जाता है।

प्रस्तुती
ऊँ जितेन्द्र सिंह तोमर 

Post a Comment

Email Subscription

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner