Mathematical Journeys: Carl Gauss and the Sum of an Arithmetic Series
There's a famous (and probably apocryphal) story about the mathematician Carl Friedrich Gauss that goes something like this:
Gauss was 9 years old, and sitting in his math class. He was a genius even at this young age, and as such was incredibly bored in his class and would always goof off and get into trouble. One day his teacher wanted to punish him for goofing off, and told him that if he was so smart, why didn't he go sit in the corner and add up all the integers from 1 to 100? Gauss went and sat in the corner, but didn't pick up his pencil. The teacher confronted him, saying “Carl! Why aren't you working? I suppose you've figured it out already, have you?” Gauss responded with “Yes – it's 5,050.” The teacher didn't believe him and spent the next ten minutes or so adding everything up by hand, only to find that Gauss was right!
So how did Gauss find the answer so fast? What did he see that his teacher didn't? The answer is simple, really – it's all about pattern recognition. Let's look at the problem more closely.
1 + 2 + 3 + 4 + 5 +...+ 95 + 96 + 97 + 98 + 99 + 100 = ?
Now it's true that adding all that up by hand would take forever, but we don't really need to add it all up by hand. Look at this series from each end simultaneously instead of just left to right. You'll see that we can think of this series as a set of pairs of numbers, each of which adds up to 101:
1 + 2 + 3 + 4 + 5 +...+ 95 + 96 + 97 + 98 + 99 + 100 = ?
1 + 100 = 101
2 + 99 = 101
3 + 98 = 101
4 + 97 = 101
5 + 96 = 101
and so on right through to the middle, where:
48 + 53 = 101
49 + 52 = 101
50 + 51 = 101
So we've got a total of 50 pairs, each of which adds up to 101. Since all our chunks are the same size, we can take a shortcut and simply multiply the size of the pair (101) by the number of pairs (50). Which is really easy to do in your head, since it's just (100 x 50) plus (1 x 50), or 5000 + 50 = 5,050.
This reasoning can actually be extrapolated to work with any arithmetic series, and in fact is how we get the formula for the sum of an arithmetic series. Check it out:
Each pair added up to the same number, so we could actually use the mathematical expression for any one of those pairs in our formula. Since the first and last term are the ones most often known, let's use those. Remember, the last term in the series is written as an, where n is the number of terms in the series. So that 101 will be represented by:
The first term (a1) + the last term (an), or (a1 + an)
Check out the first term in each of our pairs above. They range from 1 to 50, so there are 50 terms – exactly half the number of terms in the series. Which makes sense, since we're pairing up the terms and that by definition gives us half as many pairs as terms.
So 50 in our example is represented by one-half of n, or n/2.
And what are we doing with these two bits of information? Multiplying them together. So our final formula would be:
Σ = (n/2)(a1 + an)
Now, sometimes you see this formula written as n(a1 + an),
2
or the number of terms times the average of the first and last terms. Practically that is exactly the same thing as the way we wrote it first, it's just written a little differently. But they both have the same value, so if it's easier for you to remember it as the average times the number of terms, do so.
This formula works for any arithmetic series, so the next time you come up against one, remember Gauss and his pairs of terms!
पाइथागोरस प्रमेय या बोधायन प्रमेय ?
कल्पसूत्र ग्रंथों के अनेक अध्यायों में एक अध्याय शुल्ब सूत्रों का होता है। वेदी नापने की रस्सी को रज्जू अथवा शुल्ब कहते हैं। इस प्रकार ज्यामिति को शुल्ब या रज्जू गणित कहा जाता था। अत: ज्यामिति का विषय शुल्ब सूत्रों के अन्तर्गत आता था। उनमें बोधायन ऋषि का बोधायन प्रमेय निम्न है-
दीर्घचतुरस स्याक्ष्णया रज्जू:
पार्श्वमानी तिर्यक्मानी
यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं
करोति। (बोधायन शुलब सूत्र १-१२)
इसका अर्थ है, किसी आयात का कर्ण क्षेत्रफल में उतना ही होता है, जितना कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई होती है। इसको पढ़ते ही तुरंत समझ में आता है कि यदि किसी आयत का कर्ण ब स, लम्बाई अ ब तथा चौड़ाई अ स है तो बोधायन का प्रमेय ब स२ उ अ ब२ अ अ स२ बनता है। इस प्रमेय को आजकल के विद्यार्थियों को पाइथागोरस प्रमेय नाम से पढ़ाया जाता है, जबकि यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस से कम से कम एक हजार साल पहले बोधायन ने इस प्रमेय का वर्णन किया है। यह भी हो सकता है कि पाइथागोरस ने शुल्ब-सूत्र का अध्ययन करने के पश्चात् अपनी पुस्तक में यह प्रमेय दिया हो। जो भी हो, यह निर्विवाद है कि ज्यामिति के क्षेत्र में भारतीय गणितज्ञ आधुनिक गणितज्ञों से भी आगे थे।
बोधायन ने उक्त प्रसिद्ध प्रमेय के अतिरिक्त कुछ और प्रमेय भी दिए हैं- किसी आयत का कर्ण आयत का समद्विभाजन करता है आयत के दो कर्ण एक दूसरे का समद्विभाजन करते हैं। समचतुर्भुज के कर्ण एक दूसरे को समकोण पर विभाजित करते हैं आदि। बोधायन और आपस्तम्ब दोनों ने ही किसी वर्ग के कर्ण और उसकी भुजा का अनुपात बताया है, जो एकदम सही है।
शुल्ब-सूत्र में किसी त्रिकोण के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल का वर्ग बनाना, वर्ग के क्षेत्रफल के बराबर का वृत्त बनाना, वर्ग के दोगुने, तीन गुने या एक तिहाई क्षेत्रफल के समान क्षेत्रफल का वृत्त बनाना आदि विधियां बताई गई हैं। भास्कराचार्य की ‘लीलावती‘ में यह बताया गया है कि किसी वृत्त में बने समचतुर्भुज, पंचभुज, षड्भुज, अष्टभुज आदि की एक भुजा उस वृत्त के व्यास के एक निश्चित अनुपात में होती है।
आर्यभट्ट ने त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने का सूत्र भी दिया है। यह सूत्र इस प्रकार है-
त्रिभुजस्य फलशरीरं समदल कोटी भुजार्धासंवर्ग:।
त्रिभुज का क्षेत्रफल उसके लम्ब तथा लम्ब के आधार वाली भुजा के आधे के गुणनफल के बराबर होता है।
पाई का मान- आज से १५०० वर्ष पूर्व आर्यभट्ट ने का मान निकाला था। किसी वृत्त के व्यास तथा उसकी परिधि के (घेरे के) प्रमाण को आजकल पाई कहा जाता है। पहले इसके लिए माप १० (दस का वर्ग मूल) ऐसा अंदाजा लगाया गया। एक संख्या को उसी से गुणा करने पर आने वाले गुणनफल की प्रथम संख्या वर्गमूल बनती है। जैसे- २न्२ उ ४ अत: २ ही ४ का वर्ग मूल है। किन्तु १० का सही मूल्य बताना यद्यपि कठिन है, पर हिसाब की दृष्टि से अति निकट का मूल्य जान लेना जरूरी था। इसे आर्यभट्ट ऐसे कहते हैं-
चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्ठिस्तथा सहस्राणाम्
अयुतद्वयनिष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाह:॥
(आर्य भट्टीय-१०)
अर्थात् एक वृत्त का व्यास यदि २०००० हो, तो उसकी परिधि ६२२३२ होगी।
परिधि – ६२८३२
व्यास – २००००
आर्यभट्ट इस मान को एकदम शुद्ध नहीं परन्तु आसन्न यानी निकट है, ऐसा कहते हैं। इससे ज्ञात होता है कि वे सत्य के कितने आग्रही थे।
अकबर के दरबार में मंत्री अबुल फजल ने अपने समय की घटनाओं को ‘आईने अकबरी‘ में लिखा है। वे लिखते हैं कि यूनानियों को हिन्दुओं द्वारा पता लगाये गए वृत्त के व्यास तथा उसकी परिधि के मध्य सम्बंध के रहस्य की जानकारी नहीं थी। इस बारे में ठोस परिज्ञान प्राप्त करने वाले हिन्दू ही थे। आर्यभट्ट को ही पाई का मूल्य बताने वाला प्रथम व्यक्ति बताया गया है।
गणित शास्त्र की परम्परा भारत में बहुत प्राचीन काल से ही रही है। गणित के महत्व को प्रतिपादित करने वाला एक श्लोक प्राचीन काल से प्रचलित है।
यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्।। (याजुष ज्योतिषम)
अर्थात् जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि सबसे ऊपर रहती है, उसी प्रकार वेदांग और शास्त्रों में गणित सर्वोच्च स्थान पर स्थित है।
ईशावास्योपनिषद् के शांति मंत्र में कहा गया है-
ॐपूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
यह मंत्र मात्र आध्यात्मिक वर्णन नहीं है, अपितु इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण गणितीय संकेत छिपा है, जो समग्र गणित शास्त्र का आधार बना। मंत्र कहता है, यह भी पूर्ण है, वह भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, तो भी वह पूर्ण है और अंत में पूर्ण में लीन होने पर भी अवशिष्ट पूर्ण ही रहता है। जो वैशिष्ट्य पूर्ण के वर्णन में है वही वैशिष्ट्य शून्य व अनंत में है। शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य ही रहता है। यही बात अनन्त की भी है।
हमारे यहां जगत के संदर्भ में विचार करते समय दो प्रकार के चिंतक हुए। एक इति और दूसरा नेति। इति यानी पूर्णता के बारे में कहने वाले। नेति यानी शून्यता के बारे में कहने वाले। यह शून्य का आविष्कार गणना की दृष्टि से, गणित के विकास की दृष्टि से अप्रतिम रहा है।
भारत गणित शास्त्र का जन्मदाता रहा है, यह दुनिया भी मानने लगी है। यूरोप की सबसे पुरानी गणित की पुस्तक "कोडेक्स विजिलेन्स" है। यह पुस्तक स्पेन की राजधानी मेड्रिड के संग्राहलय में रखी है। इसमें लिखा है-
"गणना के चिन्हों से (अंकों से) हमें यह अनुभव होता है कि प्राचीन हिन्दुआें की बुद्धि बड़ी पैनी थी तथा अन्य देश गणना व ज्यामिति तथा अन्य विज्ञानों में उनसे बहुत पीछे थे। यह उनके नौ अंकों से प्रमाणित हो जाता है, जिनकी सहायता से कोई भी संख्या लिखी जा सकती है।"
नौ अंक और शून्य के संयोग से अनंत गणनाएं करने की सामर्थ्य और उसकी दुनिया के वैज्ञानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका की वर्तमान युग के विज्ञानी लाप्लास तथा अल्बर्ट आईंस्टीन ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।
भारतीय अंकों की विश्व यात्रा की कथा विश्व के अनेक विद्वानों ने वर्णित की है। इनका संक्षिप्त उल्लेख पुरी के शंकराचार्य श्रीमत् भारती कृष्णतीर्थ जी ने अपनी गणित शास्त्र की अद्भुत पुस्तक "वैदिक मैथेमेटिक्स" की प्रस्तावना में किया है।
जब विश्व १०,००० जानता था, तब भारत ने अनंत खोजा
संस्कृत का एकं हिन्दी में एक हुआ, अरबी व ग्रीक में बदल कर ‘वन‘ हुआ। शून्य अरबी में सिफर हुआ, ग्रीक में जीफर और अंग्रेजी में जीरो हो गया। इस प्रकार भारतीय अंक दुनिया में छाये।
अंक गणित- अंकों का क्रम से विवेचन यजुर्वेद में मिलता है - सविता प्रथमेऽहन्नग्नि र्द्वितीये वायुस्तृतीयऽआदिचतुर्थे चन्द्रमा: पञ्चमऽऋतु:षष्ठे मरूत: सप्तमे बृहस्पतिरष्टमे। मित्रो नवमे वरुणो दशमंऽइन्द्र एकादशे विश्वेदेवा द्वादशे। (यजुर्वेद-३९-६)। इसमें विशेषता है अंक एक से बारह तक क्रम से दिए हैं।
(मतलब ये तो सिद्ध हो गया की द्वापर और त्रेता युग में शून्य का ज्ञान था लोगो को)
आर्यभट्ट को शून्य का आविष्कारक नहीं माना जा सकता। आर्यभट्ट ने एक नई अक्षरांक पद्धति को जन्म दिया था। उन्होंने अपने ग्रंथ आर्यभटीय में भी उसी पद्धति में कार्य किया है। आर्यभट्ट को लोग शून्य का जनक इसलिए मानते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने ग्रंथ आर्यभटीय (498 ई.) के गणितपाद 2 में एक से अरब तक की संख्याएं बताकर लिखा है 'स्थानात् स्थानं दशगुणं स्यात' मतलब प्रत्येक अगली संख्या पिछली संख्या से दस गुना है। उनके ऐसे कहने से यह सिद्ध होता है कि निश्चित रूप से शून्य का आविष्कार आर्यभट्ट के काल से प्राचीन है।
जानें, महान गणितज्ञ ‘लीलावती’ वो पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थी
महान गणितज्ञ लीलावती का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना है। आज की पीढ़ी उन्हें बहुत अधिक नहीं जानती। शायद ही कोई जानता हो कि आज यूरोप सहित विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की महान पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता भारत की एक महान गणितज्ञ महर्षि भास्कराचार्य की पुत्री “सुश्री लीलावती” है। आइए जानते हैं महान गणितज्ञ लीलावती के बारे में जिनके नाम से गणित को पहचाना जाता था।
भारत में गणित की जड़े बहुत पुरानी और गहरी हैं परन्तु महिला गणितज्ञ के रूप में अभी तक प्राचीन महिला गणितज्ञ के रूप में 12 वी शताब्दी में लीलावती नाम की महिला जानी-मानी गणितज्ञ थी। जहाँ आज भारतीय नारी समाज में अपनी जगह बनाने में लगी हैं और फिर से अपने को स्थापित करने में लगी हैं। वही प्राचीन काल में भारतीय नारी सभी विषयों में रूचि लेती थी, सिर्फ रूचि ही नहीं वो उन विषयों की सभाओ में तर्क-वितर्क करने के लिए भाग लेती थी। लीलावती गणित विद्या की आचार्या थीं, जिस समय विदेशी क-ख-ग भी नहीं जानते थे, उस समय उसने गणित के ऐसे-ऐसे सिद्धांत सोच डाले, जिन पर आधुनिक गणितज्ञों की भी बुद्धि चकरा जाती है।
दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था। वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्योतिष की गणना से जान लिया कि ‘वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी।’ उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था। एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी।
विधाता का ही सोचा होता है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला। विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा। लीलावती विधवा हो गई, पिता और पुत्री के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी।
पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी। थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटीगणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है। पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है।
भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे। उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे। कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे। वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, “हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं…।” बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।
आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है, इसका नमूना है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई। अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे..?‘ उत्तर-१२० कमल के फूल।
वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं ‘अये बाले,लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है। दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।‘ ‘मूल” शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात् वर्ग एक भुजा‘। इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं। लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया, जिसके चार भाग हैं- (१) लीलावती (२) बीजगणित (३) ग्रह गणिताध्याय और (४) गोलाध्याय।
‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है। बादशाह अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन् १५८७ में “लीलावती” का फारसी भाषा में अनुवाद किया। अंग्रेजी में “लीलावती” का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन् १७१६ में किया। कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा
…तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे… अट्ठ बीसा, नौ पैंतीसा…। इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमय सूत्र में था, “सि अप जूनो तीस के, बाकी के इकतीस, अट्ठाईस की फरवरी चौथे सन् उनतीस!” इस तरह गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गयी।
आज गणित जैसे विषय को लड़किया क्या लड़के भी कम पसंद करते है वही 12 वी शताब्दी में लीलावती नाम की महिला जानी-मानी गणितज्ञ थी। मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है। आज गणितज्ञो को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में लीलावती पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है।
।। वर्ग की एक अन्य सर्वसमिका (Identity) ।।
।। मानस-गणित (Vedic-Mathematics) ।।
हमारे वैदिक संस्कृति की दिव्यता के वर्णन में गणित की बीजगणितीय शाखा के एक सर्वसमिका (Identity) की चर्चा करेंगे जो हमारे प्राचीन गणितीय ज्ञान को न सिर्फ प्रमाणित करेगा बल्कि गणित को सरल तथा रोचक बनाने में मदद करेगा।
—श्रीधराचार्य ने की एक विधि के अन्तर्गत एक अन्य प्रसिद्ध सर्वसमिका प्रकट की है।
इष्टोनयुतवधो वा तदिष्ट-वर्गान्वितो वर्गाः।
( —त्रिशतिका, श्लोक - 11)
अर्थात :-
जिस संख्या का वर्ग करना है, उसमें किसी इष्ट संख्या को घटावें तथा उसमें उसी को जोड़े। पुनः घटाई गई तथा जोड़ी गई संख्या का आपस में गुणन करें तथा तथा इस गुणनफल में इष्ट संख्या को जोड़ने से उस संख्या का वर्ग प्राप्त होता है।
—भास्कराचार्य द्वारा
इष्टोनयुग्राशिवधः कृतिः स्यादिष्टस्य वर्गेण समन्वितो वा।
( —लीलावती, अभिन्नपरिकर्माष्टक, श्लोक - 9)
अर्थात :-
वर्ग करने योग्य संख्या से किसी कल्पित संख्या को एक जगह जोड़कर तथा दूसरी जगह घटाकर उन दोनों योगान्तरों के गुणनफल में उस कल्पित संख्या का वर्ग जोड़ देने से उस आलोच्य संख्या का वर्ग प्राप्त होता है।
—प्राचीन गणित का प्रसिद्ध कथन
वरगान्तरं तु योगान्तरघातसमो भवन्ति।
अर्थात :-
किन्हीं दो वर्ग संख्याओं का अन्तर उन्ही संख्याओं के योग तथा अन्तर के फलों के गुणन के समतुल्य होता है।
इस नियम को गणित की भाषा में इस प्रकार लिखते हैं —
a² = ( a + b) × ( a - b) + b²
उदाहरण (Example) :-
( 67) ² = ( 67 + 3) × ( 67 - 3) + 3 ²
= 70 × 64 + 9
= 4489 ( उत्तर)
इस सूत्र पर समीकरण के नियम का उपयोग करते हुए हम यह सर्वसमिका ( Identity) प्राप्त करते हैं —
a ² — b ² = ( a + b) ( a + b)
उपरोक्त सूत्र का प्रयोग गणित के विभिन्न अध्याय में होता है जो कि विषय को सरलता तथा मनोरंजक तरीके से हल करने के लिए आवश्यक है।
अभ्यास (Exercise) :-
(1) (67) ² (2) 43 × 37 (3) 66 × 54 (4) 35 ² - 14 ² (5) 69 ² - 49 ²
—×—
।। देश को बदलना है तो शिक्षा को बदलना होगा।।
वैदिक गणित के प्रणेता स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज को उनकी जयंती पर कोटि कोटि नमन
स्वामी भारती कृष्ण जी का जन्म 14 मार्च 1888 को तमिलनाडु में एक विद्या विनय संपन्न परिवार में हुआ था । माता-पिता की ओर से उन्हें वेंकटरमन नाम प्राप्त हुआ ।वेंकटरमन एक असाधारण कुशाग्र बुद्धि वाले विद्यार्थी थे ।अपने विद्यार्थी जीवन में सभी कक्षाओं में प्रथम स्थान पाते थे । उन्होंने अपनी मैट्रिक के परीक्षा मद्रास विश्वविद्यालय से हमेशा की तरह सर्व प्रथम स्थान प्राप्त किया उनकी संस्कृत भाषा पर उनका अधिकार और प्रभावपूर्ण धाराप्रवाह भाषण से प्रभावित होकर वर्ष 1889 में ही संस्कृत संस्थान ने उन को सरस्वती की उपाधि से विभूषित किया गया। इस स्थिति में उनके संस्कृत के गुरु श्री गौतम विनय शास्त्री का उनके ऊपर प्रभाव नहीं भुलाया जा सकता । b.a. और m.a. की परीक्षा में उन्होंने पूर्व सर्वोच्च अंक प्राप्त किया। केवल 20 वर्ष की आयु में 1904 में अमेरिकन कॉलेज ऑफ साइंस मुंबई केंद्र से 7 विषयों में सर्वोच्च अंकों के साथ में इतिहास, दर्शन, अंग्रेजी, और विज्ञान विषय में पासकर सबको आश्चर्य में डाल दिया। धर्म और दर्शन के साथ साथ आधुनिक राजनीति विज्ञान और अनुसंधान में उनकी रुचि हुई । शिक्षा पूर्ण कर लेने के बाद गोपाल कृष्ण गोखले और देशबंधु चितरंजन दास द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय शिक्षा के आंदोलन में भाग लेने के लिए नाम मात्र के वेतन पर अध्यापक बन गए। 3 वर्ष पूरे होते ही वे कॉलेज के प्राचार्य के यहां भी 3 वर्ष सेवा करने के बाद सन् 1919 में शंकराचार्य स्वामी सच्चिदानंद भारती के पास चले गए वहां उन्होंने अगले 8 वर्ष वेद विज्ञान और दर्शन के निकटवर्ती गांव में योग साधना के दौरान उनको वैदिक ज्ञान और अनुभव की पूर्णता प्राप्त कर लेने के बाद 35 वर्ष की आयु में शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी महाराज ने 4 जुलाई 1919 को एकादशी में उनको सन्यास की दीक्षा दी और नाम स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ रखा गया। सन 1921 में उन्हें शारदा पीठ का शंकराचार्य बनाया गया ।
वैदिक गणित नामक ग्रंथ स्वामी जी के देहावसान के पश्चात 1965 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा प्रथम प्रकाशित हुआ जो विश्वप्रसिद्ध है । इस पुस्तक का संपादन डॉक्टर वासुदेव शरण अग्रवाल ने किया जो उन दिनों विश्वविद्यालय में नेपाल राज्य ग्रंथ माला के प्रमुख संपादक थे ।इस पुस्तक की प्रस्तावना स्वामी श्री आत्मानंद जी ने लिखी ।
आधुनिक काल में वैदिक गणित के सूत्रों के प्रयोग से अंकगणित, रेखा गणित, त्रिकोणमिति, खगोल शास्त्र, कलन शास्त्र, संख्या की प्रायिकता इत्यादि में हाल आसानी से किया जा सकता है। इन सूत्रों के प्रयोग से विषय वस्तु को सरल व आनंददाई बनाने में बहुत लाभ होता है। सूत्रों के अभ्यास पूर्वक प्रयोग से न केवल क्षमताएं का विकास होता हैं अपितु मेघा शक्ति शक्ति, तर्कशक्ति, अनुमांक्षमता आकलनशक्ति व विश्लेषण की क्षमता का विकास भी होता है
श्रीधराचार्य
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श्रीधराचार्य प्राचीन भारत के एक महान गणितज्ञ थे। इन्होंने शून्य की व्याख्या की तथा द्विघात समीकरण को हल करने सम्बन्धी सूत्र का प्रतिपादन किया।
उनके बारे में हमारी जानकारी बहुत ही अल्प है। उनके समय और स्थान के बारे में निश्चित रुप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। किन्तु ऐसा अनुमान है कि उनका जीवनकाल ८७० ई से ९३० ई के बीच था; वे वर्तमान हुगली जिले में उत्पन्न हुए थे; उनके पिताजी का नाम बलदेवाचार्य औरा माताजी का नाम अच्चोका था।
कृतियाँ तथा योगदान
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इन्होंने 750 ई. के लगभग दो प्रसिद्ध पुस्तकें, त्रिशतिका (इसे 'पाटीगणितसार' भी कहते हैं) , पाटीगणित और गणितसार, लिखीं। इन्होंने बीजगणित के अनेक महत्वपूर्ण आविष्कार किए। वर्गात्मक समीकरण को पूर्ण वर्ग बनाकर हल करने का इनके द्वारा आविष्कृत नियम आज भी 'श्रीधर नियम' अथवा 'हिंदू नियम' के नाम से प्रचलित है।
'पाटीगणित, पाटीगणित सार और त्रिशतिका उनकी उपलब्ध रचनाएँ हैं जो मूलतः अंकगणित और क्षेत्र-व्यवहार से संबंधित हैं। भास्कराचार्य ने बीजगणित के अंत में - ब्रह्मगुप्त, श्रीधर और पद्मनाभ के बीजगणित को विस्तृत और व्यापक कहा है - :'ब्रह्माह्नयश्रीधरपद्मनाभबीजानि यस्मादतिविस्तृतानि' ।
इससे प्रतीत होता है कि श्रीधर ने बीजगणित पर भी एक वृहद् ग्रन्थ की रचना की थी जो अब उपलब्ध नहीं है। भास्कर ने ही अपने बीजगणित में वर्ग समीकरणों के हल के लिए श्रीधर के नियम को उद्धृत किया है -
चतुराहतवर्गसमै रुपैः पक्षद्वयं गुणयेत
अव्यक्तवर्गरुयैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम्
अन्य सभी भारतीय गणिताचार्यों की तुलना में श्रीधराचार्य द्वारा प्रस्तुत शून्य की व्याख्या सर्वाधिक स्पष्ट है। उन्होने लिखा है- यदि किसी संख्या में शून्य जोड़ा जाता है तो योगफल उस संख्या के बराबर होता है; यदि किसी संख्या से शून्य घटाया जाता है तो परिणाम उस संख्या के बराबर ही होता है; यदि किसी शून्य को सकिसी भी संख्या से गुणा किया जाता है तो गुणनफल शून्य ही होगा। उन्होने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा है कि किसी संख्या में शून्य से भाग करने पर क्या होगा।
किसी संख्या को भिन्न (fraction) द्वारा भाजित करने के लिये उन्होने बताया है कि उस संख्या में उस भिन्न के व्युत्क्रम (reciprocal) से गुणा कर देना चाहिये।
उन्होने बीजगणित के व्यावहारिक उपयोगों के बारे में लिखा है और बीजगणित को अंकगणित से अलग किया।
वर्ग समीकरण का हल प्रस्तुत करने वाले आरम्भिक गणितज्ञों में श्रीधराचार्य का नाम अग्रणी है।
वर्ग समीकरण हल करने की श्रीधराचार्य विधि
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ax2 + bx + c = 0
4a2x2 + 4abx + 4ac = 0 ; ( 4a से गुणा करने पर )
4a2x2 + 4abx + 4ac + b2 = 0 + b2 ; (दोनों पक्षों में b2 जोड़ने पर)
(4a2x2 + 4abx + b2 ) + 4ac = b2
(2ax + b)(2ax + b) + 4ac = b2
(2ax + b)2 = b2 - 4ac
(2ax + b)2 = (√D)2 ; ( D = b2-4ac )
अतः x के दो मूल (रूट) निम्नलिखित हैं-
पहला मूल α = (-b - √(b2-4ac)) / 2a
दूसरा मूल β = (-b + √(b2-4ac)) / 2a
*वैदिक गणित ( पुस्तक)*
जगद्गुरु स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ द्वारा विरचित
वैदिक गणित अंकगणितीय गणना की वैकल्पिक एवं
संक्षिप्त विधियों का समूह है। इसमें १६ मूल सूत्र दिये
गये हैं। वैदिक गणित गणना की ऐसी पद्धति है, जिससे
जटिल अंकगणितीय गणनाएं अत्यंत ही सरल, सहज व
त्वरित संभव हैं। स्वामीजी ने इसका प्रणयन बीसवीं
शती के आरम्भिक दिनों में किया। स्वामीजी के कथन
के अनुसार वे सूत्र, जिन पर ‘वैदिक गणित’ नामक उनकी
कृति आधारित है, अथर्ववेद के परिशिष्ट में आते हैं। परंतु
विद्वानों का कथन है कि ये सूत्र अभी तक के ज्ञात
अथर्ववेद के किसी परिशिष्ट में नहीं मिलते। हो सकता
है कि स्वामीजी ने ये सूत्र जिस परिशिष्ट में देखे हों
वह दुर्लभ हो तथा केवल स्वामीजी के ही सज्ञान में
हो। वस्तुतः आज की स्थिति में स्वामीजी की
‘वैदिक गणित’ नामक कृति स्वयं में एक नवीन वैदिक
परिशिष्ट बन गई है।
वैदिक गणित के सोलह सूत्र
स्वामीजी के एकमात्र उपलब्ध गणितीय ग्रंथ ‘वैदिक
गणित' या 'वेदों के सोलह सरल गणितीय सूत्र’ के बिखरे
हुए सन्दर्भों से छाँटकर डॉ॰ वासुदेव शरण अग्रवाल ने
सूत्रों तथा उपसूत्रों की सूची ग्रंथ के आरंभ में इस प्रकार
दी है—
1. एकाधिकेन पूर्वेण
2. निखिलं नवतश्चरमं
दशतः
3. ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्
4. परावर्त्य योजयेत्
5. शून्यं साम्यसमुच्चये
6. (आनुरूप्ये) शून्यमन्यत्
7.
संकलनव्यवकलनाभ्याम्
8. पूरणापूरणाभ्याम्
9. चलनकलनाभ्याम्
10. यावदूनम्
11. व्यष्टिसमष्टिः
12. शेषाण्यङ्केन चरमेण
13.
सोपान्त्यद्वयमन्त्च्यम्
14. एकन्यूनेन पूर्वेण
15. गुणितसमुच्चयः
16. गुणकसमुच्चयः
उपसूत्र
आनुरूप्येण
शिष्यते शेषसंज्ञः
आधमाधेनान्त्यमन्त्येन
केवलैः सप्तकं गुण्यात्
वेष्टनम्
यावदूनं तावदूनं
यावदूनं तावदूनीकृत्य
वर्गं च योजयेत्
अन्त्ययोर्द्दशकेऽपि
अन्त्ययोरेव
समुच्चयगुणितः
लोपनस्थापनाभ्यां
विलोकनं
गुणितसमुच्चयः
समुच्चयगुणितः
ध्वजाङ्क
वैदिक गणितीय सूत्रों की
विशेषताएँ
(1) ये सूत्र सहज ही में समझ में आ जाते हैं। उनका
अनुप्रयोग सरल है तथा सहज ही याद हो जाते हैं।
सारी प्रक्रिया मौखिक हो जाती है।
(2) ये सूत्र गणित की सभी शाखाओं के सभी
अध्यायों में सभी विभागों पर लागू होते हैं। शुद्ध
अथवा प्रयुक्त गणित में ऐसा कोई भाग नहीं जिसमें
उनका प्रयोग न हो। अंकगणित, बीजगणित,
रेखागणित समतल तथा गोलीय त्रिकाणमितीय,
समतल तथा घन ज्यामिति (वैश्लेषिक),
ज्योतिर्विज्ञान, समाकल तथा अवकल कलन आदि
सभी क्षेत्रों में वैदिक सूत्रों का अनुप्रयोग समान रूप
से किया जा सकता है। वास्तव में स्वामीजी ने इन
विषयों पर सोलह कृतियों की एक श्रृंखला का सृजन
किया था, जिनमें वैदिक सूत्रों की विस्तृत
व्याख्या थी। दुर्भाग्य से सोलह कृतियाँ
प्रकाशित होने से पूर्व ही काल-कवलित हो गईं तथा
स्वामीजी भी ब्रह्मलीन हो गए।
(3) कई पैड़ियों की प्रक्रियावाले जटिल गणितीय
प्रश्नों को हल करने में प्रचलित विधियों की तुलना
में वैदिक गणित विधियाँ काफी कम समय लेती हैं।
(4) छोटी उम्र के बच्चे भी सूत्रों की सहायता से
प्रश्नों को मौखिक हल कर उत्तर बता सकते हैं।
(5) वैदिक गणित का संपूर्ण पाठ्यक्रम प्रचलित
गणितीय पाठ्यक्रम की तुलना में काफी कम समय में
पूर्ण किया जा सकता है।
।। प्राचीन भारतीय गणित का परिचय (Introduction of Ancient Indian Mathematics)।।
इहलौकिक एवं पारलौकिक ज्ञान के आदि एवं अनंत श्रोत वेद है, "वेद" का भावार्थ है — अनंत ज्ञान-विज्ञान का अक्षय भण्डार। विश्व में गणित शास्त्र का उद्भव तथा विकास उतना ही प्राचीन है जितना मानव सभ्यता का इतिहास है। दुनिया के पुस्तकालयों के प्राचीनतम ग्रंथ तथा वेद संहिताओं से गणित तथा ज्योतिष को अलग-अलग शास्त्रों के रुप में मान्यता प्राप्त हो चुकी थी
प्रज्ञानाय नक्षत्रदर्शम्
(~यजुर्वेद - 30 - 10)
यजुर्वेद में खगोलशास्त्र (ज्योतिष) के विद्वान के लिए "नक्षत्रदर्श" का प्रयोग किया है तथा सलाह यह दी है कि उत्तम प्रतिभा प्राप्त करने के लिए उसके पास जाना चाहिए।
यादसे शाबल्यां ग्रामण्यं गणकम्
(~यजुर्वेद - 30 - 20)
वेद में शास्त्र के रुप में गणित शब्द का नामतः उल्लेख तो नहीं किया गया है पर यह कहा है कि जल के विविध रूपों का लेखा-जोखा रखने के लिए "गणक" की सहायता ली जानी चाहिए।
शास्त्र के रुप में 'गणित' का प्राचीनतम प्रयोग 'लगध ऋषि' द्वारा प्रोक्त 'वेदांग-ज्योतिष' नामक ग्रंथ के एक श्लोक में माना जाता है —
यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्धनि वर्तते ।।
(~वेदांग ज्योतिष)
अर्थात् —
जिस प्रकार मोर को शिखा सबसे उपर होता है, नाग के मणि भी सबसे उपर होते हैं साथ में दोनों ही बहुमूल्य होते हैं। इसी तरह सभी वेद-शास्त्रों में गणित को सर्वोच्च तथा बहुमूल्य कहा गया है।
परन्तु इससे भी पूर्व छन्दयोग्य उपनिषद् में सनतकुमार के पुछने पर देवऋषि नारद ने जो 18 अधीत विद्याओं की सूची प्रस्तुत की है —
स होवाच —
ऋग्वेदं भगवोsध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पंचम वेदानं वेदं पित्र्यं "राशिं" दैवं निधि वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां "क्षत्रविद्यां" नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यामेतद् भगवोsध्येमि ।
(~छन्दयोग्य उपनिषद् - 7. 1. 2)
इसके शंकरभाष्य में 'राशिम् ' का अर्थ 'राशि गणितम्' किया है,
उसमें ज्योतिष के लिए नक्षत्र विद्या तथा गणित के लिए राशि विद्या ' नाम प्रदान किया है।
अतः हम कह सकते हैं कि "गणित" समस्त ज्ञान-विज्ञान का मेरुदंड है। ( Ganit is the back bone of the all sciences.)
प्राचीन भारतीय गणित को पांच कालखण्डों में विभाजित किया जा सकता है —
(1) वैदिक काल - 5000 BC से 800 BC तक
चारों वेद, शुल्बसूत्र, लगध मुनि इत्यादि
(2) पूर्व मध्यकाल 800 BC से 400 AD तक
पाणिनी, पिंगला, कौटिल्य, सूर्य सिद्धांत
(3) मध्यकाल अथवा स्वर्णयुग 400 AD से 1200 AD तक
आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य प्रथम, ब्रह्मगुप्त, श्रीधराचार्य, महावीराचार्य, मंजुलाचार्य, आर्यभट्ट द्वितीय, भास्कराचार्य द्वितीय इत्यादि
(4) उत्तर मध्यकाल 1200 AD से 1800 AD तक
नारायणा पंडित, परमेश्वरा, नीलकण्ठं इत्यादि
(5) वर्तमान - 1800 AD से आज तक
श्रीनिवासन रामानुजन, स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ इत्यादि
सेक्युलर संस्कृत से क्यों डरते हैं ?
न्यूटन से पहले हजारों सेब गिर चुके हैं.
आज हमें पढ़ाया जाता है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त न्यूटन (1642
-1726) ने दिया. यदि विद्यार्थी संस्कृत पढेंगे तो जान जाएंगे कि
यह झूठ है.
---
प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य (1114 –
1185) के द्वारा रचित एक मुख्य ग्रन्थ *सिद्धान्त शिरोमणि* है हैं।
भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्तशिरोमणि में यह कहा है-
*आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत् खस्थं गुरूं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या ।*
*आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे ।।*
– सिद्धान्त० भुवन० १६
अर्थात – पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर
की भारी वस्तु को अपनी ओर
खींच लेती है । वह वस्तु पृथ्वी पर
गिरती हुई सी लगती है । पृथ्वी
स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है,अतः वह निराधार
आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं
है और न गिरती है । वह अपनी कील पर
घूमती है।
-------------------
वराहमिहिर ( 57 BC ) ने अपने ग्रन्थ *पञ्चसिद्धान्तिका*में कहा है-
*पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः।*
*खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।*
– पञ्चसिद्धान्तिका पृ०३१
अर्थात- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथ्वी
इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के
बीच में लोहा ।
--------------------
अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में आचार्य श्रीपति ने कहा है –
*उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे ।।*
– सिद्धान्तशेखर १५/२१ )
नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।
आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।।
–सिद्धान्तशेखर १५/२२
अर्थात -पृथ्वी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी
प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में
शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों nके
बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार
पृथ्वी भी अपनी धुरी पर
रुकी हुई है ।
ऐसे अनेकों प्रामाणिक उदाहरण हैं परन्तु भारतीयों की भारतीयता के तन्द्रावस्था में लीन होने के कारण प्राचीन भारतीय विज्ञान के स्रोत विलुप्त प्रायः हैं ।
भारतीय गणित ग्रन्थ
क्रमांक -- ग्रंथ -- रचनाकार
वेदांग ज्योतिष -- लगध
बौधायन शुल्बसूत्र -- बौधायन
मानव शुल्बसूत्र -- मानव
आपस्तम्ब शुल्बसूत्र -- आपस्तम्ब
सूर्यप्रज्ञप्ति --
चन्द्रप्रज्ञप्ति --
स्थानांग सूत्र --
भगवती सूत्र --
अनुयोगद्वार सूत्र
बख्शाली पाण्डुलिपि
छन्दशास्त्र -- पिंगल
लोकविभाग -- सर्वनन्दी
आर्यभटीय -- आर्यभट प्रथम
आर्यभट्ट सिद्धांत -- आर्यभट प्रथम
दशगीतिका -- आर्यभट प्रथम
पंचसिद्धान्तिका -- वाराहमिहिर
महाभास्करीय -- भास्कर प्रथम
आर्यभटीय भाष्य -- भास्कर प्रथम
लघुभास्करीय -- भास्कर प्रथम
लघुभास्करीयविवरण -- शंकरनारायण
यवनजातक -- स्फुजिध्वज
ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त -- ब्रह्मगुप्त
करणपद्धति -- पुदुमन सोम्याजिन्
करणतिलक -- विजय नन्दी
गणिततिलक -- श्रीपति
सिद्धान्तशेखर -- श्रीपति
ध्रुवमानस -- श्रीपति
महासिद्धान्त -- आर्यभट द्वितीय
अज्ञात रचना -- जयदेव (गणितज्ञ), उदयदिवाकर की सुन्दरी नामक टीका में इनकी विधि का उल्लेख है।
पौलिसा सिद्धान्त --
पितामह सिद्धान्त --
रोमक सिद्धान्त --
सिद्धान्त शिरोमणि -- भास्कर द्वितीय
ग्रहगणित -- भास्कर द्वितीय
करणकौतूहल -- भास्कर द्वितीय
बीजपल्लवम् -- कृष्ण दैवज्ञ -- भास्कराचार्य के 'बीजगणित' की टीका
बुद्धिविलासिनी -- गणेश दैवज्ञ -- भास्कराचार्य के 'लीलावती' की टीका
गणितसारसंग्रह -- महावीराचार्य
सारसंग्रह गणितमु (तेलुगु) -- पावुलूरी मल्लन (गणितसारसंग्रह का अनुवाद)
वासनाभाष्य -- पृथूदक स्वामी -- ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त का भाष्य (८६४ ई)
पाटीगणित -- श्रीधराचार्य
पाटीगणितसार या त्रिशतिका -- श्रीधराचार्य
गणितपञ्चविंशिका -- श्रीधराचार्य
गणितसार -- श्रीधराचार्य
नवशतिका -- श्रीधराचार्य
क्षेत्रसमास -- जयशेखर सूरि (भूगोल/ज्यामिति विषयक जैन ग्रन्थ)
सद्रत्नमाला -- शंकर वर्मन ; पहले रचित अनेकानेक गणित-ग्रन्थों का सार
सूर्य सिद्धान्त -- रचनाकार अज्ञात ; वाराहमिहिर ने इस ग्रन्थ का उल्लेख किया है।
तन्त्रसंग्रह -- नीलकण्ठ सोमयाजिन्
वशिष्ठ सिद्धान्त --
वेण्वारोह -- संगमग्राम के माधव
युक्तिभाषा या 'गणितन्यायसंग्रह' (मलयालम भाषा में) -- ज्येष्ठदेव
गणितयुक्तिभाषा (संस्कृत में) -- रचनाकार अज्ञात
युक्तिदीपिका -- शंकर वारियर
लघुविवृति -- शंकर वारियर
क्रियाक्रमकरी (लीलावती की टीका) -- शंकर वारियर और नारायण पण्डित ने सम्मिलित रूप से रची है।
भटदीपिका -- परमेश्वर (गणितज्ञ) -- आर्यभटीय की टीका
कर्मदीपिका -- परमेश्वर -- महाभास्करीय की टीका
परमेश्वरी -- परमेश्वर -- लघुभास्करीय की टिका
विवरण -- परमेश्वर -- सूर्यसिद्धान्त और लीलावती की टीका
दिग्गणित -- परमेश्वर -- दृक-पद्धति का वर्णन (१४३१ में रचित)
गोलदीपिका -- परमेश्वर -- गोलीय ज्यामिति एवं खगोल (१४४३ में रचित)
वाक्यकरण -- परमेश्वर -- अनेकों खगोलीय सारणियों के परिकलन की विधियाँ दी गयी हैं।
गणितकौमुदी -- नारायण पंडित
तगिकानि कान्ति -- नीलकान्त
यंत्रचिंतामणि -- कृपाराम
मुहर्ततत्व -- कृपाराम
भारतीय ज्योतिष (मराठी में) -- शंकर बालकृष्ण दीक्षित
दीर्घवृत्तलक्षण -- सुधाकर द्विवेदी
गोलीय रेखागणित -- सुधाकर द्विवेदी
समीकरण मीमांसा -- सुधाकर द्विवेदी
चलन कलन -- सुधाकर द्विवेदी
वैदिक गणित -- स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ
सिद्धान्ततत्वविवेक -- कमलाकर
रेखागणित -- जगन्नाथ सम्राट
सिद्धान्तसारकौस्तुभ -- जगन्नाथ सम्राट
सिद्धान्तसम्राट -- जगन्नाथ सम्राट
करणकौस्तुभ -- कृष्ण दैवज्ञ
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भारतीय ज्योतिषी - भारतीय खगोलशास्त्रियों के नामेवं उनके कार्यों का विवरण
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