जगन्नाथ जी की कहानी

जगन्नाथ जी की कहानी

श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवंती ने रोहिणी से किया निवेदन किया "बताइए न मां!"  

उसकी निश्छलता और प्रेम भरे निवेदन को देखकर बलभद्र जी की माता रोहिणी का वात्सल्य उमड़ आया। इस बार चलने का कारण था कि जाम्बवती श्रीकृष्ण की सभी पत्नियों में सबसे छोटी थीं। इस कारण देवकी और रोहिणी दोनों ही माताएं उसे सुभद्रा जितना ही प्रेम करती थीं।

"अरे जाम्बवंती? मेरी पुत्री! वह सब तो पुरानी बातें हैं। छोड़ो न, तुम गोकुल और नंदगांव का प्रसंग पर आ गई।" इन शब्दों को बोलते हुए उनका गला कुछ रुंध गया। आंखें नम हो गई और आंखों से निकले जल की दो बुंदे गालों पर ढलक गईं। उन्हें कंस के अत्याचार और परेशानियों में विताईं काली रातें याद आ गईं।



बड़ी बहू रुक्मिणी ने माता रोहिणी के हाथ थाम लिए। जाम्बवंती को एक मीठी झिड़की देते हुए कहा, " मैया को ऐसे सताना ठीक नहीं है। क्यों बुरे समय और मामाश्री कंस के अत्याचारों का स्मरण करती हो? " फिर जामवंती की ओर देखते ही बोली, "यदि याद कराना ही है तो गोकुल की फूटी मटकियों को याद कराओ, माखन और माखन चोर को याद कराओ। रास लीला के गान को याद कराओ।"

रासलीला का प्रसंग आते ही जाम्बवंती फिर बोल पड़ीं, " क्षमा करें दीदी ! मैं मैया को दुखी नहीं करना चाहती थी। मैं तो बस स्वामी की रासलीलाओं और बाललीलाओं क आनन्द लेना चाहती थी।"

मैंने एक बार देवक मां से यही प्रश्न कहा था तो देवकी मां भी कहती हैं, " बेटा ! मेरा सौभाग्य यह  नहीं था कि वह अपने पुत्रों की शरारतें देख सकूं। मुझे क्षमा कर दो। "

जाम्बवती से यह सुनकर माता रोहिणी ने कहा, " पुत्री ! निराश न हो, मैं तुम्हें कान्हा के बाल लीलाओं को अवश्य सुनाऊंगीं।" 

सभी वधुओं ने कहा, "माता ! शुभ काम में देरी कैसी ?"

"इसमें एक कठिनाई है।"

" कैसी कठिनाई?" वधूओं ने पूछा

रोहिणी बोली, " मेरी एक शर्त है। यह कथा सिर्फ तुम वधुओं के लिए है। तुम सबको यह सुनिश्चित करना है कि श्रीकृष्ण, बलभद्र और यहां तक कि सुभद्रा भी  इसे न सुनें। अगर उन्होंने इसे सुना लिया तो वे सब कुछ त्याग कर फिर से ब्रज चले जाएंगे, और हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे।"

इस पर सभी शांत हो गए। तभी सत्भामा प्रसन्न होते हुए बोलीं, " मैया ! आप चिंतित न हों, कुछ दिन बाद सुहागिन स्त्रियों किया जाने वाला मां अम्बिका के पूजन का दिन है। उस दिन हम सभी रैवतक पर्वत पर मां अम्बिका के पूजन के लिए चलेंगे।" 

"और सुभद्रा" 

" सुहागिन स्त्रियों के पूजन में दीदी सुभद्रा की मंदिर के भीतर क्या काम? बस यही कारण कहकर हम उनसे विहार करने के लिए कह देंगें या फिर उन्हें मंदिर के बाहर बैठ कर इंतजार करने के लिए कह देंगे।" 


वे अपनी योजना के अनुसार बड़ी ही उत्सुकता से श्रीकृष्ण की बालकथा सुनने के दिन की प्रतीक्षा करने लगीं। अंबिका पूजन वाले दिन वे सभी रोहिणी मां के साथ रैवतक पर्वत पर देवी अंबिका के मंदिर पहुंची।  

" बेटी सुभद्रा बिहार में कुछ पूजा में कुछ समय लगेगा तब तक तुम मंदिर के आसपास भ्रमण कर लो।" माता रोहिणी में कहा।

सुभद्रा को विहार पर भेजकर देवी रोहिणी ने कथा का प्रारंभ किया। कथा का आरंभ देवकी और यादव श्रेष्ठ वसुदेव के विवाह से हुआ। आकाशवाणी, नवदंपती को कारागार में डालना और उनके छह पुत्रों की हत्या और राज्य के ऋषि की हत्या आदि की घटना सुनकर सभी स्त्रियां द्रवित हो उठीं।

माता रोहिणी अपनी कहानी में एक-एक कर घटनाक्रम का वर्णन करती जा रही थीं। उन्होंने कहा- कि जिस तरह अमावस्या के बाद पूर्णिमा का चांद भी खिलता है, इसी तरह की एक काली रात में कान्हा ने बहन देवकी के गर्भ से जन्म लिया।

इस दौरान वर्षा ऋतु का समय था। घनघोर बारिश आ रही थी बरसाती जलने यमुना नदी के पानी को बहुत बढ़ा दिया था। अपने पुत्र के प्राण बचाने के लिए स्वामी ने उसे उफनती यमुना के पार गोकुल में पहुंचा दिया। तुम सबके दाऊ बलभद्र को मैं पहले ही गोकुल पहुंचा चुकी थी।

कान्हा के गोकुल में पहुंचते ही वहां के वातावरण में एक अलग सी बदलाव आ गया लगा जैसे सारी सृष्टि मुस्कुराने लगी हो। दिन बीतने लगे और बलभद्र वह कान्हा की शरारतों, अठखेलियों, नटखट लीलाओं से सारा ब्रज खिलखिलाने लगा।




उसने बालपन में ही कंस के भेजे राक्षसों का वध कर दिया.


शकटासुर, पूतना, वकासुर, अजासुर सभी को सद्गति दी. माता रोहिणी कथा सुनाते जा रही थीं और उनकी वधुएं इस कथा के सागर में डूबती जा रही थीं


जब सुभद्रा ने जाना सत्य
इधर, अपनी भाभियों को अब तक पूजन करके न लौटने के कारण सुभद्रा यह जानने को उत्सुक हुईं कि सभी अंदर क्या कर रही हैं. वह मंदिर के पास पहुंची पर द्वार बंद होने के कारण उत्सुकता वश इधर-उधर देखने लगीं. अचानक एक झरोखे से उन्होंने अंदर झांककर दृश्य देखना चाहा. उन्होंने जब देखा-सुना तो माता रोहिणी उनके प्रिय भ्राता कृष्ण की मुरली के चमत्कार सुना रही थीं. 


जब श्री कृष्ण बजाते थे मुरली
कृष्ण जब मुरली बजाना शुरू करते तो गोपियां अपने कार्यों से विमुख हो जातीं, गायों के थन से खुद दूध झरने लगते, रसोई में दूध उफन कर बह जाता तो चूल्हे पर रोटियां जल जातीं. स्त्रियां श्रृंगार भूल जातीं. काजल गाल पर लगा लेतीं, कुमकुम होंठ पर मल लेतीं और ध्यान में बैठी गोपियां भी सुध भूल जातीं. सबसे विचलित होती राधा, जो मुरली की तान सुनकर ही वन में दौड़ी चली जाती थी.    


कथा सुनते हो जड़वत हो गए तीनों भाई-बहन
सुभद्रा यह सब सुनते-सुनते जड़वत हो गईं. उधर, राजमहल में राज परिवार की स्त्रियों के न होने से हलचल मच गई. कृष्ण-बलराम ने सुना तो किसी अनिष्ट की आशंका से खुद सुभद्रा व अन्य सभी को खोजते हुए वहीं मंदिर के झरोखे के पास पहुंच गए. उनकी भी वही स्थिति होने लगी जो बहन सुभद्रा की थी. 


अपनी बालकथाएं सुनते-सुनते तीनों भाई-बहन जड़वत हो गए. उनके अस्तित्व खोने लगे. नेत्र फैलने लगे. हाथ-पैर लुप्तप्राय से लग रहे थे. ऐसा लगता था कि जैसे शरीर से कोई धारा ही फूट पड़ी हो. बाललीला का प्रसंग अंदर जारी था और इधर प्रभु अपने ज्येष्ठ और बहन के साथ परमलीला कर रहे थे. सुदर्शन ने भी लंबा आकार ले लिया था.


देवर्षि नारद ने की विनती
इतने में देवऋषि नारद वहां पहुंचे. प्रभु को इस रूप में देखकर वह भी विह्वल हो गए. नारद मुनि के चेताने पर प्रभु अपने वास्तव में लौटे तो देवर्षि ने उनसे इसी स्वरूप में दर्शन की विनती की. कहने लगे कि प्रभु मैंने जिस स्वरूप के दर्शन किए हैं, मैं चाहता हूं कि धरतीलोक में चिरकाल तक आपका इस स्वरूप में दर्शन हों.


इसलिए होती है रथयात्रा
प्रभु ने कहा-देवर्षि, एव मस्तु. कलिकाल में इसी रूप में नीलांचल क्षेत्र में अपना स्वरूप प्रकट करूंगा. आपने जिस बालभाव वाले रूप में मुझे अंगहीन देखा है. मेरा वही विग्रह प्रकट होगा. मैं स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए उनके बीच जाऊंगा. 


प्रभु के ब्रह्म वाक्यों के अनुसार कलयुग में उसी दिव्य स्वरूप के विग्रह ने प्रकट होकर जगन्नाथ प्रभु के रूप में भक्तों को दर्शन दिया. रथयात्रा के स्वरूप में भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा के साथ भक्तों के बीच आते हैं. उनके हाथ-पैर नहीं हैं. केवल आंखें ही आंखें हैं ताकि वे अपने भक्तों को जी भरकर देख सकें.  



इस रथ यात्रा से जुड़ी बहुत सी कथाएं है, जिसके कारण इस महोत्सव का आयोजन होता है। कुछ कथाएं मैं आपसे शेयर करती हूँ –

कुछ लोग का मानना है कि कृष्ण की बहन सुभद्रा अपने मायके आती है, और अपने भाइयों से नगर भ्रमण करने की इच्छा व्यक्त करती है, तब कृष्ण बलराम, सुभद्रा के साथ रथ में सवार होकर नगर घूमने जाते है। इसी घटना को रथ यात्रा के पर्व के रूप में मनाना प्रारंभ हुआ। 

जबकि कुछ लोगों का मानना है कि बुढ़िया गांव के मंदिर में स्थित देवी मां, भगवान कृष्ण की मौसी है। उन्होंने इन तीनों को अपने घर आने का निमंत्रण भैया उसी के उपलक्ष में, श्रीकृष्ण, बलराम बहन सुभद्रा के साथ अपनी मासी के घर 10 दिन के लिए रहने जाते है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण के मामा कंस उन्हें मथुरा बुलाते है, इसके लिए कंस गोकुल में सारथि के साथ रथ भिजवाता है। कृष्ण अपने भाई बलराम तथा बहन के साथ रथ में सवार होकर मथुरा जाते है। यह रथयात्रा उसी का प्रतीक है। जबकि इसके विपरीत कुछ लोग का मानना है कि इस दिन श्री कृष्ण कंस का वध करके बलराम के साथ अपनी प्रजा को दर्शन देने के लिए बलराम के साथ मथुरा में रथ यात्रा करते है।

कृष्ण की रानियाँ माता रोहिणी से उनकी रासलीला सुनाने को कहती है। माता रोहिणी को लगता है कि कृष्ण की गोपीयों के साथ रासलीला के बारे सुभद्रा को नहीं सुनना चाहिए, इसलिए वो उसे कृष्ण, बलराम के साथ रथ यात्रा के लिए भेज देती है। तभी वहां नारदजी प्रकट होते है, तीनों को एक साथ देख वे प्रसन्नचित्त हो जाते है, और प्रार्थना करते है कि मुझे तथा पूरे की प्रजा को इन तीनों के ऐसें ही दर्शन हर साल होते रहे। उनकी यह प्रार्थना सुन ली जाती है और रथ यात्रा के द्वारा इन तीनों के दर्शन सबको होते रहते है।

कहते है, श्रीकृष्ण की मौत के पश्चात् जब उनके पार्थिव शरीर को द्वारिका लाया जाता है, तब बलराम अपने भाई की मृत्यु से अत्याधिक दुखी होते है। कृष्ण के शरीर को लेकर समुद्र में कूद जाते है, उनके पीछे-पीछे सुभद्रा भी कूद जाती है। 

इसी समय भारत के पूर्व में स्थित पूरी के राजा इन्द्रद्मन को स्वप्न आता है कि भगवान् का शरीर समुद्र में तैर रहा है, अतः उन्हें यहाँ कृष्ण की एक विशाल प्रतिमा बनवानी चाहिए और मंदिर का निर्माण करवाना चाहिए। 

उन्हें स्वप्न में देवदूत बोलते है कि कृष्ण के साथ, बलराम, सुभद्रा की लकड़ी की प्रतिमा बनाई जाये और श्रीकृष्ण की अस्थियों को उनकी प्रतिमा के पीछे छेद करके रखा जाये।

राजा का सपना सच हुआ, उन्हें कृष्ण की अस्थियां मिल गई। लेकिन अब वह सोच रहा था कि इस प्रतिमा का निर्माण कौन करेगा। 

ऐसा कहा जाता है, शिल्पकार भगवान् विश्वकर्मा एक बढई के रूप में राजा के सामने प्रकट हुए और प्रतिमा बनाने की इच्छा जताई। राजा ने उन्हें मूर्ति बनाने की आज्ञा दे दी। इस पर विश्वकर्मा जी ने कहा कि उन्हें काम करते वक़्त परेशान नहीं किया जाये, नहीं तो वे बीच में ही काम छोड़ कर चले जायेगें। 

राजा के आश्वासन पर विश्वकर्मा जी ने मूर्ती निर्माण का कार्य शुरू कर दिया। 

शिल्पी बिना खाए पिए अंदर काम कर रहा था। उसके काम में उसे कई महीने बीत गए तो राजा का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने सोचा कि कहीं शिल्पी को कुछ हो तो नहीं गया इसलिए उन्होंने उतावली में बढई के कमरे का दरवाजा खोल दिया।

विश्वकर्मा ने कहा आप राजन आपने ऐसा क्यों किया मूर्तियां अधूरी ही रह गई मैं अब यहां एक क्षण भी नहीं ठहर सकता। कहकर भगवान् विश्वकर्मा अदृश्य हो गए। 

राजा को बड़ा दुख हुआ लेकिन जब उन्होंने मूर्तियों को देखा तो वह देखते ही रह गए वह बहुत ही सुंदर बनी हुई थी। परंतु मूर्तियां उस समय तक पूरी नहीं बन पाईं। अब हो क्या सकता था राजा ने ऐसे ही मूर्तियों को स्थापित कर दिया। और  सबसे पहले मूर्ती के पीछे भगवान कृष्ण की अस्थियाँ रखकर मंदिर में विराजमान कर दीं।

एक राजसी जुलूस तीन विशाल रथों में भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा का हर साल मूर्तियों के साथ निकाला जाता है। 

भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की प्रतिमा हर 12 साल के बाद बदली जाती है, जो नयी प्रतिमा रहती है वह भी पूरी बनी हुई नहीं रहती है। 

जगन्नाथ पूरी का यह मंदिर एकलौता ऐसा मंदिर है, जहाँ तीन भाई बहन की प्रतिमा एक साथ है, और उनकी पूजा अर्चना की जाती है।


क्रमांककिसका रथ हैरथ का नामरथ में मौजूद पहियेरथ की ऊंचाईलकड़ी की संख्या
1.जगन्नाथ/श्रीकृष्णनंदीघोष/गरुड़ध्वज/ कपिलध्वज1613.5 मीटर832
2.बलरामतलध्वज/लंगलाध्वज1413.2 मीटर763
3.सुभद्रादेवदलन/पद्मध्वज1212.9 मीटर593



देवशिल्पी विश्वकर्मा की शर्त

हिंदू धर्म में खण्डित या अधूरी मूर्ति की पूजा को अशुभ माना जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कि हिंदुओं के चार धामों में से एक पुरी के जगन्नाथ धाम की मूर्तियां अधूरी हैं। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है कि क्यों जगन्नाथ भगवान की अधूरी मूर्ति की पूजा की जाती है। कथा के अनुसार राजा इंद्रदयुम्न पुरी में मंदिर बनावा रहे थे तो भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बनाने का कार्य उन्होंने देव शिल्पी विश्वकार्मा को सौंपा। लेकिन भगवान विश्वकर्मा ने शर्त रखी की वो मूर्ति का निर्माण बंद कमरे में करेंगे और यदि किसी ने उन्हें मूर्त बनाते देखने की कोशिश की तो वो उसी क्षण कार्य छोड़ कर चले जाएंगे। राजा इंद्रदयुम्न ने शर्त मान ली और विश्वकर्मा जी ने मूर्ति निर्माण का कार्य प्रारंभ कर दिया।



Jagannath Puri Ratha Yatra 2021: हर साल की तरह इस साल भी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन किया जा रहा है। परंतु कोरोना महामारी के प्रोटोकॉल के कारण आम जनता को रथयात्रा में शामिल होने की मनाही है। इसके साथ ही कई अन्य कड़े नियमों का भी पालन किया जाएगा। परंतु रथ यात्रा की सभी रस्मों का विधिवत पालन होगा। 


इस साल भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा 12 जुलाई को शुरू होगी तथा इसका समापन देवशयनी एकादशी पर 20 जुलाई को होगा। 


देवशिल्पी विश्वकर्मा की शर्त

हिंदू धर्म में खण्डित या अधूरी मूर्ति की पूजा को अशुभ माना जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कि हिंदुओं के चार धामों में से एक पुरी के जगन्नाथ धाम की मूर्तियां अधूरी हैं। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है कि क्यों जगन्नाथ भगवान की अधूरी मूर्ति की पूजा की जाती है। कथा के अनुसार राजा इंद्रदयुम्न पुरी में मंदिर बनावा रहे थे तो भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बनाने का कार्य उन्होंने देव शिल्पी विश्वकार्मा को सौंपा। लेकिन भगवान विश्वकर्मा ने शर्त रखी की वो मूर्ति का निर्माण बंद कमरे में करेंगे और यदि किसी ने उन्हें मूर्त बनाते देखने की कोशिश की तो वो उसी क्षण कार्य छोड़ कर चले जाएंगे। राजा इंद्रदयुम्न ने शर्त मान ली और विश्वकर्मा जी ने मूर्ति निर्माण का कार्य प्रारंभ कर दिया।


राजा इंद्रदयुम्न की भूल

उत्सुकतावश राजा इंद्रदयुम्न रोज दरवाजे के बाहर से मूर्ति निर्माण की आवज सुनने जाने लगे। एक दिन राजा इंद्रदयुम्न को दरवाजे के बाहर कोई आवाज सुनाई नहीं दी तो उन्हें लगा कहीं विश्वकर्मा जी चले तो नहीं गए। ये जानने के लिए जैसे ही उन्होंने दरवाजा खोला देवशिल्पी विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और मूर्तियां वैसी ही अधूरी रह गई। आज तक भगवान जगन्नाथ,बलभद्र और बहिन सुभद्रा की मूर्तियां वैसी ही अधूरी हैं लेकिन उनके प्रति आस्था और विश्वास भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं।J agannath Rath Yatra 2021: अपने आप में एक रहस्य है प्रभु जगन्नाथ की मूर्ति, आज तक जवाब नहीं दे पाया कोई भी पुजारी

    मान्यताओं के मुताबिक मालवा नरेश इंद्रद्युम्न, जो भगवान विष्णु के भक्त थे. उन्हें स्वयं श्री हरि ने सपने में दर्शन दिए और कहा कि पुरी के समुद्र तट पर तुम्हें लकड़ी का एक लट्ठा मिलेगा, उस से मूर्ति का निर्माण कराओ।

पुराणों में जगन्नाथ धाम की काफी महिमा है, इसे धरती का बैकुंठ भी कहा गया है। 

मंदिर में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा दाईं तरफ स्थित है। बीच में उनकी बहन सुभद्रा की प्रतिमा है और बाईं तरफ उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) विराजते हैं। 

महाप्रभु जगन्नाथ (श्री कृष्ण) को कलयुग का भगवान भी कहा जाता है.

ऐसी मान्यता है कि मंदिर में मौजूद प्रतिमा के अंदर ब्रह्माजी का वास है। जब श्रीकृष्ण ने धर्म स्थापना के लिए धरती पर अवतार लिया तब उनके पास अलौकिक शक्तियां थीं लेकिन शरीर मानव का था। जब धरती पर उनका समय पूरा हो गया तो वो शरीर त्यागकर अपने धाम चले गए। इसके बाद पांडवों ने उनका अंतिम संस्कार किया। लेकिन शरीर ब्रह्मलीन होने के बाद भी उनका हृदय जलता ही रहा। पांडवों ने इसे जल में प्रवाहित कर दिया। जल में हृदय ने लट्ठे का रूप धारण कर लिया और ओडिशा के समुद्र तट पर पहुंच गया। यही लठ्ठा राजा इंद्रदुयम्न को मिल गया।

इस वजह से आज तक अधूरी हैं मूर्तियां

मान्यताओं के मुताबिक मालवा नरेश इंद्रद्युम्न, जो भगवान विष्णु के भक्त थे. उन्हें स्वयं श्री हरि ने सपने में दर्शन दिए और कहा कि पुरी के समुद्र तट पर तुम्हें एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा, उस से मूर्ति का निर्माण कराओ. राजा जब तट पर पंहुचे तो उन्हें लकड़ी का लट्ठा मिल गया. अब उनके सामने यह प्रश्न था कि मूर्ति किससे बनवाएं. कहा जाता है कि भगवान विष्णु और स्वयं श्री विश्वकर्मा के साथ एक वृद्ध मूर्तिकार के रुप में प्रकट हुए. वृद्ध मूर्तिकार नें कहा कि वे एक महीने के अंदर मूर्तियों का निर्माण कर देंगें लेकिन इस काम को एक बंद कमरे में अंजाम देंगें. एक महीने तक कोई भी इसमें प्रवेश नहीं करेगा और न कोई तांक-झांक करेगा, चाहे वह राजा ही क्यों न हों. महीने का आखिरी दिन था, कमरे से भी कई दिन से कोई आवाज नहीं आ रही थी. कोतुहलवश राजा से रहा न गया और वे अंदर झांककर देखने लगे लेकिन तभी वृद्ध मूर्तिकार दरवाजा खोलकर बाहर आ गए और राजा को बताया कि मूर्तियां अभी अधूरी हैं, उनके हाथ और पैर नहीं बने हैं.

राजा को अपने कृत्य पर बहुत पश्चाताप हुआ और उन्होंने वृद्ध से माफी भी मांगी लेकिन उन्होंने कहा कि यह सब दैव वश हुआ है और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जाएंगीं. तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गईं. आज भी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा की मूर्तियां उसी अवस्था में हैं.

पुजारियों की आंख पर बंधी होती है पट्टी

इनका काष्ठ आवरण हर 12 साल के बाद बदल दिया जाता है। मगर लठ्ठा वैसा ही रहता है. जब मंदिर के पुजारी इस लठ्ठे को बदलते हैं तो उनकी आंखों पर पट्टियां बंधी रहती हैं और हाथ कपड़े से ढके रहते हैं। ऐसे में पुजारी न तो इसे देख पाते हैं और न ही छू पाते हैं। ऐसा माना जाता है कि यदि किसी ने इसे देख लिया, उसकी मृत्यु जाएगी। उस समय सुरक्षा बहुत ज्यादा होती है. कोई भी मंदिर में नही जा सकता। मंदिर के अंदर घना अंधेरा रहता है। पुजारी की आंखों में पट्टी बंधी होती है। पुजारी के हाथ मे दस्ताने होते है। वे पुरानी मूर्ती से “ब्रह्म पदार्थ” निकालता है और नई मूर्ती में डाल देता है।

मूर्ति के बारे में आज तक नहीं बता पाया कोई पुजारी

ये ब्रह्म पदार्थ क्या है आज तक किसी को नही पता। इसे आज तक किसी ने नहीं देखा। ये एक अलौकिक पदार्थ है, जिसे छूने मात्र से किसी इंसान के जिस्म के चिथड़े उड़ जाएं। इस ब्रह्म पदार्थ का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है. मगर, आज तक कोई भी पुजारी ये नहीं बता पाया कि महाप्रभु जगन्नाथ की मूर्ती में आखिर ऐसा क्या है? कुछ पुजारियों का कहना है कि जब हमने उसे हाथ में लिया तो खरगोश जैसा उछल रहा था। आंखों में पट्टी थी, हाथ मे दस्ताने थे तो हम सिर्फ महसूस कर पाए

जगन्नाथ रथयात्रा से जुड़ी रोचक बातें –कलियुग का पवित्र धाम है जगन्नाथपुरी!!!!!!

हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं में चारों धामों को एक युग का प्रतीक माना जाता है। इसी प्रकार कलियुग का पवित्र धाम जगन्नाथपुरी माना गया है। यह भारत के पूर्व में उड़ीसा राज्य में स्थित है, जिसका पुरातन नाम पुरुषोत्तम पुरी, नीलांचल, शंख और श्रीक्षेत्र भी है। उड़ीसा या उत्कल क्षेत्र के प्रमुख देव भगवान जगन्नाथ हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा राधा और श्रीकृष्ण का युगल स्वरूप है। श्रीकृष्ण, भगवान जगन्नाथ के ही अंश स्वरूप हैं। इसलिए भगवान जगन्नाथ को ही पूर्ण ईश्वर माना गया है।

भगवान जगन्नाथ की यह रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से आरंभ होती है। जगन्नाथ रथयात्रा एक महोत्सव और पर्व के रूप में पूरे देश में मनाया जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि इस रथयात्रा के मात्र रथ के शिखर दर्शन से ही व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। स्कन्दपुराण में वर्णन है कि आषाढ़ मास में पुरी तीर्थ में स्नान करने से सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य फल प्राप्त होता है और भक्त को शिवलोक की प्राप्ति होती है।


धार्मिक मान्यता है कि इस रथयात्रा के मात्र रथ के शिखर दर्शन से ही व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। 

स्कन्दपुराण में वर्णन है कि आषाढ़ मास में पुरी तीर्थ में स्नान करने से सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य फल प्राप्त होता है और भक्त को शिवलोक की प्राप्ति होती है।

1- भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा- तीनों के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते हैं। ये लकड़ी वजन में भी अन्य लकडिय़ों की तुलना में हल्की होती है और इसे आसानी से खींचा जा सकता है। भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है और यह अन्य रथों से आकार में बड़ा भी होता है। यह रथ यात्रा में बलभद्र और सुभद्रा के रथ के पीछे होता है।

2- भगवान जगन्नाथ के रथ के कई नाम हैं जैसे- गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष आदि। इस रथ के घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है, जिनका रंग सफेद होता है। इस रथ के सारथी का नाम दारुक है। भगवान जगन्नाथ के रथ पर हनुमानजी और नरसिंह भगवान का प्रतीक होता है। इसके अलावा भगवान जगन्नाथ के रथ पर सुदर्शन स्तंभ भी होता है। यह स्तंभ रथ की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।

इस रथ के रक्षक भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ हैं। रथ की ध्वजा यानि झंडा त्रिलोक्यवाहिनी कहलाता है। रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, वह शंखचूड़ नाम से जानी जाती है। इसके 16 पहिए होते हैं व ऊंचाई साढ़े 13 मीटर तक होती है। इसमें लगभग 1100 मीटर कपड़ा रथ को ढंकने के लिए उपयोग में लाया जाता है।

3- बलरामजी के रथ का नाम तालध्वज है। इनके रथ पर महादेवजी का प्रतीक होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं। त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा इसके अश्व हैं। यह 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है, जो लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है।

4- सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है। सुभद्राजी के रथ पर देवी दुर्गा का प्रतीक मढ़ा जाता है। रथ की रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं। रथ का ध्वज नदंबिक कहलाता है। रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुड़ा कहते हैं। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है।

5- भगवान जगन्नाथ, बलराम व सुभद्रा के रथों पर जो घोड़ों की कृतियां मढ़ी जाती हैं, उसमें भी अंतर होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ पर मढ़े घोड़ों का रंग सफेद, सुभद्राजी के रथ पर कॉफी कलर का, जबकि बलरामजी के रथ पर मढ़े गए घोड़ों का रंग नीला होता है।

6- रथयात्रा में तीनों रथों के शिखरों के रंग भी अलग-अलग होते हैं। बलरामजी के रथ का शिखर लाल-पीला, सुभद्राजी के रथ का शिखर लाल और ग्रे रंग का, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ के शिखर का रंग लाल और हरा होता है।

विश्व की सबसे बड़ी रसोई है ये!!!!!

1- जगन्नाथ मंदिर का एक बड़ा आकर्षण यहां की रसोई है। यह रसोई विश्व की सबसे बड़ी रसोई के रूप में जानी जाती है। यह मंदिर के दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है। इस रसोई में भगवान जगन्नाथ के लिए भोग तैयार किया जाता है।

2- इस विशाल रसोई में भगवान को चढ़ाने वाले महाप्रसाद को तैयार करने के लिए लगभग 500 रसोइए तथा उनके 300 सहयोगी काम करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस रसोई में जो भी भोग बनाया जाता है, उसका निर्माण माता लक्ष्मी की देखरेख में ही होता है।

3- यहां बनाया जाने वाला हर पकवान हिंदू धर्म पुस्तकों के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही बनाया जाता है। भोग पूर्णत: शाकाहारी होता है। भोग में किसी भी रूप में प्याज व लहसुन का भी प्रयोग नहीं किया जाता। भोग निर्माण के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया जाता है।

4- रसोई के पास ही दो कुएं हैं जिन्हें गंगा व यमुना कहा जाता है। केवल इनसे निकले पानी से ही भोग का निर्माण किया जाता है। इस रसोई में 56 प्रकार के भोगों का निर्माण किया जाता है। रसोई में पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी यह व्यर्थ नहीं जाएगी, चाहे कुछ हजार लोगों से 20 लाख लोगों को खिला सकते हैं।

5- मंदिर में भोग पकाने के लिए 7 मिट्टी के बर्तन एक दूसरे पर रखे जाते हैं और लकड़ी पर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में सबसे ऊपर रखे बर्तन की भोग सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकते जाती है।


ऐसा है मंदिर का स्वरूप,,,जगन्नाथ मंदिर का 4,00,000 वर्ग फुट में फैला है और चहारदीवारी से घिरा है। कलिंग शैली के मंदिर स्थापत्यकला, और शिल्प के आश्चर्यजनक प्रयोग से परिपूर्ण, यह मंदिर, भारत के भव्य स्मारक स्थलों में से एक है। मुख्य मंदिर वक्र रेखीय आकार का है, जिसके शिखर पर भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र मंडित है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है। मंदिर के भीतर आंतरिक गर्भगृह में मुख्य देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।

यह भाग इसे घेरे हुए अन्य भागों की अपेक्षा अधिक वर्चस्व वाला है। इससे लगे घेरदार मंदिर की पिरामिडाकार छत और लगे हुए मण्डप, अट्टालिका रूपी मुख्य मंदिर के निकट होते हुए ऊंचे होते गये हैं। यह एक पर्वत को घेरे हुए अन्य छोटे पहाडिय़ों, फिर छोटे टीलों के समूह रूपी बना है। मुख्य भवन एक 20 फुट ऊंची दीवार से घिरा हुआ है तथा दूसरी दीवार मुख्य मंदिर को घेरती है। एक भव्य सोलह किनारों वाला एकाश्म स्तंभ, मुख्य द्वार के ठीक सामने स्थित है। इसका द्वार दो सिंहों द्वारा रक्षित हैं।

ये हैं पुरी के दर्शनीय स्थल,,,,पुरी की मूर्ति, स्थापत्य कला और समुद्र का मनोरम किनारा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। कोणार्क का अद्भुत सूर्य मंदिर, भगवान बुद्ध की अनुपम मूर्तियों से सजा धौलागिरि और उदयगिरि की गुफाएं, जैन मुनियों की तपस्थली खंड-गिरि की गुफाएं, लिंग-राज, साक्षी गोपाल और भगवान जगन्नाथ के मंदिर दर्शनीय है। पुरी और चंद्रभागा का मनोरम समुद्री किनारा, चंदन तालाब, जनकपुर और नंदनकानन अभयारण्य बड़ा ही मनोरम और दर्शनीय है।

यहां के प्रसाद को कहते हैं महाप्रसाद,,,,,जगन्नाथ मंदिर के प्रसाद को महाप्रसाद माना जाता है जबकि अन्य तीर्थों के प्रसाद को सामान्यतया प्रसाद ही कहा जाता है। भगवान जगन्नाथ के प्रसाद को महाप्रसाद का स्वरूप महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के द्वारा मिला। कहते हैं कि महाप्रभु वल्लभाचार्य की निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए उनके एकादशी व्रत के दिन पुरी पहुँचने पर मंदिर में ही किसी ने उन्हें प्रसाद दे दिया। महाप्रभु ने प्रसाद हाथ में लेकर स्तवन करते हुए दिन के बाद रात्रि भी बिता दी। अगले दिन द्वादशी को स्तवन की समाप्ति पर उस प्रसाद को ग्रहण किया और उस प्रसाद को महाप्रसाद का गौरव प्राप्त हुआ।

ऐसे शुरू हुई रथयात्रा की परंपरा,,,,,उड़ीसा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने की परंपरा काफी पुरानी है। इस रथ यात्रा से जुड़ी कई किवंदतियां भी प्रचलित हैं। उसी के अनुसार भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने की परंपरा राजा इंद्रद्युम ने प्रारंभ की थी। यह कथा संक्षेप में इस प्रकार है-

कलयुग के प्रारंभिक काल में मालव देश पर राजा इंद्रद्युम का शासन था। वह भगवान जगन्नाथ का भक्त था। एक दिन इंद्रद्युम भगवान के दर्शन करने नीलांचल पर्वत पर गया तो उसे वहां देव प्रतिमा के दर्शन नहीं हुए। निराश होकर जब वह वापस आने लगा तभी आकाशवाणी हुई कि शीघ्र ही भगवान जगन्नाथ मूर्ति के स्वरूप में पुन: धरती पर आएंगे। यह सुनकर वह खुश हुआ।

एक बार जब इंद्रद्युम पुरी के समुद्र तट पर टहल रहा था, तभी उसे समुद्र में लकड़ी के दो विशाल टुकड़े तैरते हुए दिखाई दिए। तब उसे आकाशवाणी की याद आई और उसने सोचा कि इसी लकड़ी से वह भगवान की मूर्ति बनवाएगा। तभी भगवान की आज्ञा से देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा वहां बढ़ई के रूप में आए और उन्होंने उन लकडिय़ों से भगवान की मूर्ति बनाने के लिए राजा से कहा। राजा ने तुरंत हां कर दी।

तब बढ़ई रूपी विश्वकर्मा ने यह शर्त रखी कि वह मूर्ति का निर्माण एकांत में करेगा यदि कोई वहां आया तो वह काम अधूरा छोड़कर चला जाएगा। राजा ने शर्त मान ली। तब विश्वकर्मा ने गुण्डिचा नामक स्थान पर मूर्ति बनाने का काम शुरू किया। एक दिन भूलवश राजा बढ़ई से मिलने पहुंच गए। उन्हें देखकर विश्वकर्मा वहां से अन्तर्धान हो गए और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी रह गईं। तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में स्थापित होना चाहते हैं। तब राजा इंद्रद्युम ने विशाल मंदिर बनवा कर तीनों मूर्तियों को वहां स्थापित किया।

भगवान जगन्नाथ ने मंदिर निर्माण के समय राजा इंद्रद्युम को बताया था कि वे वर्ष में एक बार अपनी जन्मभूमि अवश्य जाएंगे। स्कंदपुराण के उत्कल खंड के अनुसार इंद्रद्युम ने आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन प्रभु के उनकी जन्मभूमि जाने की व्यवस्था की। तभी से यह परंपरा रथयात्रा के रूप में चली आ रही है।

एक अन्य मत के अनुसार सुभद्रा के द्वारिका दर्शन की इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण व बलराम ने अलग-अलग रथों में बैठकर यात्रा की थी। सुभद्रा की नगर यात्रा की स्मृति में ही यह रथयात्रा पुरी में हर साल होती है।

विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा को अलग-अलग रथों में विराजित कर नगर भ्रमण कराने की परंपरा है। यहां यह बात विचारणीय है कि श्रीकृष्ण के साथ राधा या रुक्मणी का रथ क्यों नहीं होता? इसका जवाब हिन्दू पौराणिक कथा में मिलता है। जिसके अनुसार –

एक बार द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण रात्रि में शयन कर रहे थे। समीप ही रुक्मणी भी सो रही थीं। निद्रा के दौरान श्रीकृष्ण ने राधा के नाम का उच्चारण किया। यह सुनकर रुक्मणी अचंभित हुई। सुबह होने पर रुक्मणी ने यह बात अन्य पटरानियों को बताकर कहा कि हमारे इतने सेवा, प्रेम और समर्पण के बाद भी स्वामी राधा को याद करना नहीं भूलते।

इस बात का रहस्य जानने के लिए सभी रानियां माता रोहिणी के पास गई और उनसे राधा और श्रीकृष्ण की लीला के बारे में जानना चाहा क्योंकि माता रोहिणी वृंदावन में राधा और श्रीकृष्ण की रास लीलाओं के बारे में बहुत अच्छे से जानती थीं। रानियों के आग्रह और जिद करने पर माता ने यह शर्त रखी कि मैं जब तक श्रीकृष्ण-राधा के प्रसंग को सुनाऊं, तब तक कोई भी कक्ष के अंदर न आ पाए। इसके लिए श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा को द्वार पर निगरानी के लिए रखा गया।

इसके बाद माता रोहिणी ने श्रीकृष्ण व राधा लीला पर अपनी बात शुरू की। कुछ समय बीतते ही सुभद्रा ने देखा कि उनके भाई बलराम और श्रीकृष्ण माता के कक्ष की ओर चले आ रहे हैं। तब सुभद्रा ने किसी बहाने उन्हें माता के कक्ष में जाने से रोका किंतु कक्ष के द्वार पर खड़े होने पर भी श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा को श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला के प्रसंग सुनाई दे रहा था। तीनों राधिका के नाम और कृष्ण के प्रति अद्भुत प्रेम व भक्ति भावना को सुनकर इतने भाव विभोर हो गए कि श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के शरीर गलने लगे, उनके हाथ-पैर आदि अदृश्य हो गए। यह भी कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र ने गलकर लंबा आकार ले लिया।

इसी दौरान वहां से देवर्षि नारद का गुजरना हुआ। वह भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के अलौकिक स्वरूप के दर्शन कर अभिभूत हो गए। किंतु तीनों नारद को देखकर अपने मूल स्वरूप में आ गए, यह सोचकर कि नारद ने संभवत: यह दृश्य न देखा हो। किंतु नारद मुनि ने तीनों से प्रार्थना की कि मैंने अभी आपके जिस स्वरूप के दर्शन किए हैं, उसी स्वरूप के दर्शन कलयुग में सभी भक्तों को भी हो। तब भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा ने नारद की विनय को मानकर ऐसा करना स्वीकार किया।

यही कारण है कि धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं में भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण और राधा का दिव्य युगल स्वरुप मानकर उनके साथ भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की अधूरी बनी काष्ठ यानी लकड़ी की प्रतिमाओं के साथ रथयात्रा निकालने की परंपरा है।

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। यह यात्रा गुंडिचा मंदिर तक जाकर पुन: आती है। ऐसी मान्यता है कि इसी गुंडिचा मंदिर में देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्राजी की प्रतिमाओं का निर्माण किया था इसलिए गुंडिचा मंदिर को ब्रह्मलोक या जनकपुरी भी कहा जाता है। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ कुछ समय इस मंदिर में बिताते हैं। इस समय गुंडिचा मंदिर में भव्य महोत्सव मनाया जाता है। इसे गुंडिचा महोत्सव कहते हैं।

इस प्रकार गुंडिचा नगर में जाकर भगवान विन्दुतीर्थ के तट पर सात दिन तक निवास करते हैं क्योंकि प्राचीन काल में उन्होंने राजा इंद्रद्युम को यह वर दिया था कि मैं तुम्हारे तीर्थ के किनारे प्रतिवर्ष निवास करुंगा। मेरे वहां स्थित रहने पर सभी तीर्थ उसमें निवास करेंगे। उस तीर्थ में विधिपूर्वक स्नान करके, जो लोग सात दिनों तक गुंडिचा मंडप में विराजमान मेरा, बलराम व सुभद्रा का दर्शन करेंगे, वे मेरी कृपा प्राप्त कर लेंगे।

गुंडिचा मंडप से रथ पर बैठकर दक्षिण दिशा की ओर आते हुए श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजी के जो दर्शन करता है, वे मोक्ष के भागी होते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार जो प्रतिदिन सुबह उठकर इस प्रसंग का पाठ करता है या सुनता है वह भी भगवान विष्णु की कृपा से गुंडिचा महोत्सव के फलस्वरूप वैकुण्ठधाम में जाता है

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